हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भारत अभिजातों का लोकतंत्र हैः अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/23/2011 03:15:00 AM

भारत सरकार आदिवासी इलाकों में सेना के आधार कैम्प बनाने जा रही है. ऐसे दो ट्रेनिंग कैम्प उड़ीसा के रायगढ़ा व छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिलों में जल्दी ही स्थापित करने की योजना है, जिसके लिए बड़ी मात्रा में आदिवासी जमीन का अधिग्रहण किया जाने वाला है. अबूझमाड़ के कुल क्षेत्रफल 4000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का 600 वर्ग किमी सेना को बेस कैम्प के लिए सौंपा जा रहा है. इतने बड़े इलाके में सेना के आने से स्थानीय लोगों का विस्थापन व जंगल की तबाही होना तय है. सेना के अनुसार ही ये तथाकथित कैम्प मिजोरम व कांकेर के जंगल युद्ध प्रशिक्षण स्कूल के माडल पर ही स्थापित किये जा रहे हैं. सरकार के इस कदम का विरोध करने के लिए देश के कुछ जाने-माने बुद्धिजीवी और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने शनिवार को गांधी शांति प्रतिष्ठान में एक बैठक की. फोरम अगेंस्ट वार ऑन पीपुल के तहत आयोजित इस आम सभा में लोगों ने एकस्वर से इस जनविरोधी दमनकारी कदम का विरोध किया और यह आशंका भी जतायी कि इसके जरिए सरकार संघर्षरत जनता के खिलाफ सेना के औपचारिक इस्तेमाल का रास्ता साफ कर रही है.

इस मौके पर अर्थशास्त्री अमित भादुड़ी, कवि मदन कश्यप, लेखिका अरुंधति राय, पूर्व न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर, सीपीआई के महासचिव एबी वर्धन, मेनस्ट्रीम के संपादक सुमित चक्रवर्ती और समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट समेत इस सभा में शामिल सभी वक्ताओं ने यह मांग की कि जनता के खिलाफ सभी युद्धों को तत्काल बंद किया जाए, कंपनियों के साथ किये गये सारे करारों को सार्वजनिक करके रद्द किया जाये तथा सारे अर्धसैनिक बलों को वापस बुलाया जाये.

हाशिया  पर इस कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग अलग-अलग हिस्सों में पोस्ट की जायेगी. इस सिलसिले में पेश है जानी-मानी लेखिका अरुंधति रॉय का वक्तव्य. इसमें अरुंधति ने सरकार के इस दमनकारी कदम का आरंभ से ही मजबूत विरोध करने और इसे शुरू न होने देने के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया है.

सुनिए.

मजदूरों की आत्महत्याओं का भूमंडलीकृत ब्रांड

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/23/2011 02:27:00 AM

तिरुपुर से आने वाली मजदूरों की आत्महत्याओं की रिपोर्टों को देखते हुए 'कमेटी ऑफ कन्सर्न्ड सिटीजन-स्टूडेंट्‌स एण्ड यूथ' का गठन किया गया था जिसकी एक फैक्ट फाइंडिंग टीम पिछले दिनों तिरुपुर गयी थी. इस कमेटी ने पड़ताल के बाद जो तथ्य जुटाए उसमें से एक हिस्सा हाशिया पर पहले भी पोस्ट किया गया है. रविवार, 22 मई, 2011 को गांधी शांति प्रतिष्ठान में इस पूरी रिपोर्ट को रिलीज किया गया. प्रस्तुत है इस रिपोर्ट से एक और अंश.

तिरुपुर से मजदूरों की आत्महत्याओं की जो रपटें आ रही थीं वे पहली नजर में बिल्कुल बेजा जान पड़ती थीं. यह तमिलनाडु का एक चर्चित व्यापारिक शहर है जो कताई, बुनाई व सिलाई की मार्फत खुशहाली के राजपथ पर सरपट दौड़ रहा है. इस शहर से आत्महत्या की कहानियां सामने आ रही हैं. यह सचमुच एक भूमंडलीकृत उत्पादन प्रक्रिया का एक नमूना है जो वालमार्ट, सी एण्ड ए, डीज़ल, फिला, रीबौक आदि जैसे तमाम बड़े अन्तर्राष्ट्रीय ब्रांडों को कपड़ों की आपूर्ति करता है. यह वैसी जगह नहीं है जहां कपास की फसल व बिक्री मारी गई थीं और निरुपाय होकर कपास पैदा करने वाले किसानों ने आत्महत्या कर ली थी, जैसा कि विदर्भ में. कपास तो यहां के लिए सोने की खान है. तिरुपुर की तकदीर चमकी हुई है और यहां से 12,000 करोड़ या इससे ज्यादा रुपयों का निर्यात होता है. यह एक वैसा शहर है जहां उद्यमिता के असली मायनों से हम रू-ब-रू होते हैं. 1970 के दशक में जो एक छोटा होजरी, मुख्यतः अंतःवस्त्र, बनाने वाला केन्द्र था. उसने भूमंडलीकृत होते दशकों में कपड़ों का एक अग्रणी निर्यातक होने का रास्ता पकड़ लिया और विकास की गति यहां अत्यंत तीव्र हो गई. ऐसी जगह पर आत्महत्या विडम्बनापूर्ण परिघटना प्रतीत होती है.

सस्ता और प्रचुर श्रम के जोर पर तिरुपुर के कारखानेदारों ने अपने लिए जगह बनाई है. 1980 के दशक के अंत की ओर निर्यात में तेजी आई और '90 के दशक के भूमंडलीकृत वातावरण में तिरुपुर अपने रंग में आ गया.

भूमंडलीकृत वातावरण में मुकाबला करने के लिए अपने सस्ते श्रम के भण्डार को इस्तेमाल करने की भारत की योजना है. नवउदारवाद के हिमायती तथा योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने सस्ते श्रम की बदौलत कपड़ा और चमड़ा के उत्पादक और निर्यातक के रूप में चीन को हटाकर उसकी जगह लेने की इच्छा जाहिर करते हुए हाल ही में एक बयान दिया है. 21 अप्रैल, 2011 के अखबारों में एक रिपोर्ट आई थी जिसमें उन्होंने कहा था - ''चीनी कपड़ा व चमड़ा जैसे मूल्य स्पेक्ट्रम के निचले सिरे को खाली करने जा रहे हैं. इसलिए उनकी जगह कौन लेगा? क्या हमलोग उस जगह को लेने जा रहे हैं या वह वियतनाम या तुर्की या इंडोनेशिया होगा?'' और उन्होंने आगे कहा कि भारतीय निर्यात ज्यादा प्रतियोगी होगा क्योंकि चीन निर्यातोन्मुखी विकास की अपनी नीति को समाप्त करने वाला है जिसके फलस्वरूप वहां मजदूरी बढ़ने वाली है. भूमंडलीकृत काम की जगह में यह भारत है जो सस्ता श्रम से लाभ उठा रहा है.
तिरुपुर के लिए इसके मायने आत्महत्या की उच्चतर दर हो सकता है.

इस रिपोर्ट को रिलीज करने के बाद इस पर विभिन्न संगठनों के बीच इसके अलग-अलग पहलुओं पर व्यापक बहस भी हुई. इस रिपोर्ट के संदर्भ में एक मुख्य सुझाव यह था कि मजदूरों की आत्महत्याओं को किसानों की आत्महत्याओं तथा कृषि क्षेत्र की व्यापक समस्याओं के साथ जोड़ कर देखा जाना चाहिए. प्रस्तुत है इस मौके पर सामाजिक कार्यकर्ता अंजनी कुमार के वक्तव्य की रिकार्डिंगः


तिरुपुर में मजदूरों की आत्महत्याओं पर एक रिपोर्ट

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/21/2011 02:14:00 PM

तमिलनाडू का तिरुपुर निर्यात के लिए तैयार किए जानेवाले अपने ब्रांडेड कपड़ों के उत्पादन के लिए जाना जाता है. लेकिन पिछले कुछ समय में तिरुपुर की फैक्टरियों में मजदूरों की आत्महत्याओं का उत्पादन हो रहा है. अमानवीय उत्पीड़न और शोषण की इस दास्तान का ताना-बाना जिन रेशों से बुना गया है, उनकी पहचान करने के लिए कुछ छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक टीम मार्च के पहले हफ्ते में तिरुपुर गई थी. इस यात्रा के दौरान टीम ने जो कुछ देखा और वह जिन नतीजों पर पहुंची है, उसे एक रिपोर्ट की शक्ल में जारी करने वाली है. इसका विवरण नीचे है. साथ में, हम इस रिपोर्ट का एक हिस्सा भी प्रस्तुत कर रहे हैं.

तिरुपुर रिपोर्ट को जारी किए जाने के मौके पर 
वहां हो रही आत्महत्याओं के बारे में चर्चा के लिए
 आमंत्रण
स्थान : गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली (आईटीओ के नजदीक)
समय : 22 मई, 2011, 11 बजे दिन से 3 बजे तक
पिछले दिनों तिरुपुर से स्तब्ध कर देने वाली खबरें आई हैं। वहां सैकड़ों की संख्या में मजदूरों ने आत्महत्याएं की हैं। यहां की हालत कुछ दूसरी ही है। यह विफलता का मारा विदर्भ का कपास उत्पादक उजाड़ क्षेत्र नहीं, बल्कि कामयाबी से भरा दमकता तिरुपुर है जो कपड़ा उत्पादक हब के रूप में जाना जाता है। और ऐसी समृद्‌ध जगह में मजदूरों की आत्महत्या का सिलसिला चल रहा है। मार्च महीने में एक फैक्ट फाइण्डिंग टीम तमिलनाडु के तिरुपुर गई थी। उसने कुछ तथ्यों को इकट्‌ठा किया है। हम जिन नतीजों पर पहुंचे हैं और हमारे जो अवलोकन रहे हैं, उन्हें हम आपके साथ साझा करना चाहते हैं।
   
हम आपको चर्चा के लिए आमंत्रित करते हैं। हम आपके सक्रिय भागीदारी की आशा करते हैं।

संतोष कुमार
कमिटी ऑफ कनसर्न्ड सीटिजन-स्टूडेन्ट्‌स एण्ड यूथ की ओर से

भारत अपनी महान भूमिः सुनिए गदर के कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/21/2011 11:46:00 AM

पिछली पोस्टों में क्रांतिकारी गायक गदर के जेएनयू में हुए कार्यक्रम का जिक्र भर हुआ था. अलग तेलंगाना राज्य की मांग के समर्थन में बनी छात्रों की कमेटी (स्टूडेंट्स सोलिडेरिटी कमेटी फॉर सेपरेट स्टेट ऑफ तेलंगाना) द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में गदर ने आमतौर पर भारत और खासतौर पर तेलंगाना की मेहनतकश जनता के अंतहीन शोषण, दमन और उत्पीड़न के लिए स्थापित फौजी और संरचनात्मक हिंसा की राजकीय संस्थाओं के बारे में बताया. उन्होंने इस हिंसक भारतीय राज्य की संरचना के खिलाफ संघर्ष कर रही जनता की कहानी भी कही. औपनिवेशिक शासन काल से लेकर मौजूदा अर्ध औपनिवेशिक -अर्ध सामंती राज्य के चरित्र को गदर ने अपने गीतों के जरिए पेश किया.

इस कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग टुकड़ों-टुकड़ों में पेश की जाएगी. सबसे इस कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग का एक हिस्सा, जिसमें गदर ने नागार्जुन सागर बांध के जरिए तेलंगाना के मजदूरों और किसानों के साथ भेदभाव और उनकी बरबादी की कहानी कही है. तेज हवा और खराब माइक के कारण रिकॉर्डिंग की क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं है, और इसे कंप्यूटर पर संपादित करने के बाद थोड़ा सुनने लायक बनाया जा सका है.

सुनिएः भारत अपनी महान भूमि


सुनिएः क्रांतिकारी गायक गदर का एक और गीत

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/20/2011 02:32:00 AM

शायद यह गीत आंसुओं के बारे में है. या शायद खून के बारे में. या शायद पसीने के बारे में. हो सकता है कि यह लड़ाई के लिए जाते साथी के लिए विदाई का गीत हो या यह भी हो सकता है कि शहीद हुए किसी परिजन की याद में गाया जा रहा गीत. खेतों में काम करते हुए, कारखानों में पसीना बहाते हुए, अपने औजारों पर धार चढ़ाते हुए या अपने हथियारों को तेज करते हुए...भाषा इस गीत को समझने में सबसे बड़ी बाधा है और नहीं भी है. सुन कर देखिए और यकीन कीजिए. गदर के गीत और संगीत की सारी खूबियों को आप इसमें महसूस कर सकते हैं. आप अपने आपको करुणा, दर्द और आक्रोश के शिखर पर पाएंगे.

गदर का एक और गीत.


देखो रे देखो भइया अमरीका वाला आता: सुनिए गदर को

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/20/2011 01:44:00 AM

कुछ ही देर पहले गदर यहां से गए हैं. उनके जाने के बाद कुछ भी कहा जाना बाकी नहीं रह गया है. जो कहा जाएगा और जो भी पढ़ा जाएगा वह जेएनयू के केसी-ओएटी में दो घंटे के उनके सांस्कृतिक कार्यक्रम के असर की दूर दूर तक भी बराबरी नहीं कर सकेगा. गदर अलग तेलंगाना राज्य की मांग के लिए जारी आंदोलन के सिलसिले में दिल्ली में आये थे और जेएनयू में अलग तेलंगाना राज्य के समर्थन में बनी छात्रों की समिति द्वारा आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में शिरकत करने आये थे. देश के मेहनतकश मजदूरों के खून और पसीने की गंध समोए गदर के गीत हमें एक ऐसी दुनिया में पहुंचाते हैं जहां हम श्रम के शोषण और संघर्ष को संगीत में महसूस कर सकते हैं. कारखाने में पसीना बहाते मजदूर की व्यथा हो या क्रांतिकारी संघर्षों में शामिल युवाओं के उम्मीद भरे सपने हों गदर उन्हें आवाज देते हैं. उनके गीतों में हथियारों और औजारों दोनों की खनक मिलेगी.

उनके बारे में कांचा इलैया का कहना है, 'गदर तेलंगाना के पहले बुद्धिजीवी हैं, जिन्होंने उत्पादन में लगी जनता और साहित्यिक रचनाओं के बीच संबंध स्थापित किया.'

हैदराबाद के पास मेदक जिले में तूपरन गांव में एक दलित परिवार में जन्मे गदर का असली नाम गुम्मादी विट्टल राव है. ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ शुरुआती क्रांतिक्रारी संघर्षों के लिए जानी जानेवाली गदर पार्टी के सम्मान में उन्होंने यह नाम अपना लिया और गदर बन गये. उस्मानिया विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़ कर वे नक्सलवादी आंदोलन में शामिल हुए.

गदर अपने क्रांतिकारी गीत और संगीत रचना के लिए जाने जाते हैं. आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उनके द्वारा स्थापित सांस्कृतिक संगठन जन नाट्य मंडली ने जन कलाओं के क्रांतिकारी तत्वों को विकसित किया है. यह संगठन एक परिघटना के रूप में स्थापित हुआ है.

गदर के बारे में फिर कभी हाशिया  पर विस्तार से कुछ पोस्ट किया जाएगा. अभी तो गदर का एक मशहूर गीत, फिल्म मा भूमि से.

जिन दिनों पटना में अभियान  के साथ मैंने सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू किया, उन दिनों जो पहला गीत मैंने सीखा था वह गदर के एक गीत का हिंदी संस्करण था-देखो रे देखो भइया अमरीका वाला आता. इस गीत में अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों के जरिए हमारे जीवन को विभिन्न तरीकों से नियंत्रित करने और अपार मुनाफा बटोरे जाने का जिक्र किया गया है. इसमें यह दिखाया गया है कि किस तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियां और अमेरिकी सैन्यवाद एक ही साम्राज्यवादी सिक्के के दो पहलू हैं.

प्रस्तुत है मूल तेलुगु गीत.

माकपा की हार है, वामपंथ की नहीं

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/19/2011 05:17:00 PM

पश्चिम बंगाल के चुनाव के नतीजों पर बहस लंबी चलेगी. यह एक राज्य के भविष्य की बात भर नहीं है, इन चुनाव परिणामों ने एक विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद के वर्तमान और भविष्य पर बहस को भी नए सिरे से शुरु किया है. हम इसके विभिन्न पहलुओं के बारे में लेख प्रस्तुत करते रहेंगे. जसम से जुड़े रहे वरिष्ठ आलोचक रविभूषण बता रहे हैं कि वामपंथ की दावेदारी सिर्फ माकपा के पास ही नहीं है. मूलतः प्रभात खबर में प्रकाशित.

पश्चिम बंगाल में वाम मोरचे की हार को वामपंथ की हार समझने वालों को ममता बनर्जी का यह कथन ध्यान में रखना चाहिए कि वामपंथ बुरा नहीं है, माकपा की अगुवाई वाला वाम मोरचा बुरा है. ममता का विरोध वामपंथ से नहीं, वाम मोरचा से रहा है. जहां तक राजनीतिक विचारधारा का प्रश्न है, तृणमूल कांग्रेस की विचारधारा निरंकुश और आततायी पूंजीवाद के पक्ष में नहीं है. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को अपदस्थ कर 1977 में जब वाम मोरचा सत्ता में आया था, उसका चरित्र भिन्न था. ऑपरेशन बर्गा को भुलाया नहीं जा सकता. वाम मोरचा ने आरंभ में भूमि सुधार किया था, पंचायती राज कायम किया था. मार्क्सवादी विचारधारा को भावधारा न बना सकने के जो घातक परिणाम हो सकते हैं, उसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी. उसका मार्क्सवाद जमीनी न रह कर किताबी और आसमानी बन गया था. 2006 के चुनाव में माकपा को मिली 176 सीटें इस बार 40 पर क्यों सिमटी? जबकि इससे अधिक सीटें (45) उसे केरल में मिली है. जाहिर है, 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद भी उसने अपने को नहीं सुधारा.

21 जून, 1977 और 13 मई, 2011 का अंतर साफ़ है. तब पहली बार पश्चिम बंगाल में वाम मोरचे की सरकार बनी थी. सात बार विजयी बनाते रहने के बाद आठवीं बार राज्य के मतदाताओं ने माकपा को खारिज क्यों किया? ऐसी हार की कल्पना वाम मोरचे के किसी धड़े ने नहीं की थी. नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के दौर में माकपा का चरित्र बदला. उसका रास्ता वाम का रास्ता नहीं रहा. प्रशासन पंगु होता गया और पार्टी के कार्यकर्ता प्रमुख होते गये. सरकार पार्टी के अधीन हो गयी. पार्टी-संगठन का सरकार पर वर्चस्व माकपा के पतन का कारण बना. सोवियत रूस के विघटन के बाद पार्टी के सरोकार भी बदले. ज्योति बसु के कार्यकाल के अंतिम दस वर्ष और बुद्धदेव के कार्यकाल के ग्यारह वर्ष माकपा के आरंभिक वर्षो की तुलना में भिन्न रहे हैं. भूमि सुधार से भूमि अधिग्रहण तक की यात्रा पर अंतरमंथन किये बिना माकपा अपनी कमजोरियों को नहीं समझ सकती है. एक व्यक्ति के समक्ष एक प्रमुख राजनीतिक विचारधारा वाली पार्टी की हार सामान्य घटना नहीं है.

तृणमूल कांग्रेस का गठन 1 जनवरी 1998 को हुआ था. ममता राजग के भी साथ रही हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस चमकी. एक 13 वर्षीय पार्टी द्वारा माकपा जैसी पार्टी को हराने का अर्थ स्पष्ट है. यह माकपा के नेतृत्व की भी असफ़लता है. बुद्धदेव की हार और अच्युतानंदन की जीत माकपा के लिए एक सीख है. केरल में माकपा एकजुट नहीं है. अच्युतानंदन के साथ पार्टी नेतृत्व नहीं था. उनके साथ जनता थी. यूडीएफ़ ने पांच सीटें पांच सौ से कम वोटों के अंतर से जीती हैं. ये सीटें एलडीएफ़ को मिलतीं, तो फ़िर एलडीएफ़ की ही सरकार बनती. यूडीएफ़ को एलडीएफ़ से मात्र चार सीटें अधिक हैं.

पश्चिम बंगाल में माकपा ने सामान्य जन ही नहीं, बुद्धिजीवियों से भी खुद को अलग कर लिया. सिद्धांत व्यवहार के कारण ही जीवित और उपयोगी होता है. माकपा ने कार्य-पद्धति, शासन-पद्धति से मार्क्सवादी सिद्धांत को क्षति पहुंचायी है. मतदाताओं ने माकपा से इसी का बदला लिया है. जनता का धैर्य सदैव बना नहीं रह सकता. परमाणु करार मुद्दे पर माकपा का भाजपा के साथ खड़ा होना  गलत था. मुद्दा-आधारित राजनीति विचारधारात्मक राजनीति को कमजोर करती है. उदारवादी अर्थव्यवस्था ने माकपा और उसके सहयोगी दलों को कई रूपों-स्तरों पर प्रभावित किया. कांग्रेस और भाजपा की विकास-नीति से माकपा की विकास-नीति भिन्न नहीं रही. वह सत्ता-सुख में डूबी रही. उसका अपना एजेंडा बदल गया. उसका अहंकार उसे ले डूबा. सिंगूर और नंदीग्राम प्रतिरोध के प्रतीक बने. किसानों की रजामंदी के बिना किया जानेवाला भूमि-अधिग्रहण पश्चिम बंगाल में सत्ता-पलट का कारण बना.

ममता अपनी जीत के बाद अगर बंगाल में सच्चे लोकतंत्र के आगमन, वाम मोरचा से पश्चिम बंगाल को आजाद कराने, बंद और बुलेट की राजनीति न होने देने और 'मां, माटी, मानुष की जीत' की बात कहती है, तो इसमें सच्चाई है. जिस बदलाव की राजनीति में वामपंथियों को आस्था होनी चाहिए थी, वह दूर रही.  'परिवर्तन' की बात ममता ने की. माकपा ने अपने कार्डधारियों का केवल ख्याल रखा. कार्डधारियों को मार्क्सवाद से कम, अपने से अधिक मतलब था. माकपा नेता निजी-सार्वजनिक जीवन में जितने भी पाक-साफ़ रहे हों, उनके अधिसंख्य कार्यकर्ताओं की जीवन-दशा भिन्न थी. ऐसे में मार्क्सवाद की पश्चिम बंगाल में क्या दिशा होती? भय और आतंक से, दादागीरी से जनता मुक्त होना चाहती थी. उसने ममता में विश्वास जताया. ममता का जीवन उसके सामने उदाहरण बना. वे 'लड़ाकू' रहीं, 'अग्नि कन्या' बनीं.

माकपा और वाम मोरचे की हार वामपंथ की हार नहीं है. पश्चिम बंगाल की जनता ने माकपा को एक पाठ पढ़ाया है, उसे सुधरने के लिए हराया है. तृणमूल कांग्रेस की विचारधारा नहीं है. अब तक सभी दल विकास के पूंजीवादी रास्ते का ही समर्थन करते रहे हैं. बंगाल में विकास के कांग्रेसी मार्ग पर चलना तृणमूल कांग्रेस के लिए घातक होगा. संत्रास और विलगाव की राजनीति से अलग विकास और बदलाव की राजनीति प्रमुख होगी. एक व्यक्ति के समक्ष एक विचारधारा का अंत नहीं हो सकता. अहम प्रश्न यह है कि पश्चिम बंगाल में विकास की दिशा क्या होगी? विकास का मॉडल क्या होगा? चुनौतियां सबके सामने हैं. ममता के सामने चुनौतियां अधिक हैं. वहीं माकपा को भी नयी, सही और ठोस समझ से अपने को बदलना होगा.

बस्तर में सैन्य दखलंदाजी के खिलाफ सम्मेलन

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/19/2011 04:45:00 PM

जनता पर राजकीय हमले का विरोध करो

वक्ता
एबी वर्धन, महासचिव, सीपीआई
अमित भादुड़ी, प्रोफेसर एमेरिटस, जेएनयू
अर्पणा, सीपीआई एमएल- न्यूडेमोक्रेसी
अरूंधति राय,लेखिका
बीडी शर्मा, पूर्व कमिश्नर बस्तर
ईएन राममोहन, पूर्व डीजीपी, बीएसएफ
मदन कश्यप, साहित्यकार
सुमित चक्रवर्ती, सम्पादक- मेनस्ट्रीम
सुधा भारद्वाज, पीयूसीएल, छत्तीसगढ़
गिरिजा पाठक, सीपीआई एमएल- लिबरेशन
पंकज बिष्ट, सम्पादक- समयांतर
एसएआर गिलानी, दिल्ली विश्वविद्यालय
शशि भूषण पाठक,पीयूसीएल, झारखंड
अर्जुन प्रसाद, पीडीएफआई

दिनांक : 21 मई, 2011, समय : दोपहर 3 बजे से रात 8 बजे तक
स्थान : गांधी शांति प्रतिष्ठान, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ के पास



जनता पर भारत सरकार द्वारा थोपे गए युद्ध आपरेशन ग्रीन हंट को लगभग 2 साल पूरे होने जा रहे हैं। राजकीय दमन का दो सालों का इतिहास खून से सना हुआ है। 2009 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने दोबारा आने के साथ ही जल-जंगल-जमीन के लिए चल रहे जनांदोलनों पर क्रूर दमन का जोर बढ़़ा दिया। इसने जनता के खिलाफ ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम से युद्ध घोषित कर दिया। केन्द्रीय सरकार के नेतृत्व में छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, झारखण्ड़, उड़ीसा व अन्य राज्य सरकारों ने इसी युद्ध को जोर-शोर से आगे बढ़ाया। सेना की कमान में आपरेशन ग्रीन हंट की शुरुआत होने के साथ ही मध्य और पूर्वी भारत की जनता खासतौर पर आदिवासियों पर राजकीय दमन बेइन्तहा बढ़ गया। इस दौरान दो लाख से अधिक पुलिस व अर्धसैनिक बल इन क्षेत्रों में तैनात किए गए। अकेले छत्तीसगढ़ में दो सालों में सौ से अधिक लोग मारे गए। आपरेशन ग्रीन हंट को चलाने वाले अर्धसैनिक बलों में सीआरपीएफ, कोबरा, बीएसएफ, ग्रेहाउंड, आईटीबीपी, सी सिक्सटी, सीआईएसएफ आदि के साथ साथ स्थानीय एसपीओ, पुलिस बल भी शामिल हैं। इन्होंने ऑपरेशन के दौरान विभिन्न गांवों में आदिवासियों की हत्याएं कीं और आदिवासियों को बड़े पैमाने पर आंध्र प्रदेश में पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया। छत्तीसगढ़ में इन बलों के अलावा अवैधानिक सलवा जूड़ूम गिरोह भी हैं जो विभिन्न तरह की क्रूरताओं से आदिवासी जनता का दमन कर रहे हैं। इन दमन की छानबीन रिपोर्ट हासिल करना भी आसान नहीं है। नागरिक व जनवादी अधिकार संगठनों को बमुश्किल ही वहां जाने की अनुमति मिल पाती है। यदि कोई इन इलाकों में जाने की कोशिश करता भी है तो राज्य के समर्थन से सलवा जुडूम, मां दंतेश्वरी स्वाभिमान मंच जैसे लम्पट गिरोह उन्हें अन्दर जाने से रोकते हैं और मार-पिटाई करते हैं।

पिछले दो सालों से उड़ीसा सरकार सीआरपीएफ का प्रयोग जनता के जमीन पर अधिकार व उसके आन्दोलन को कुचलने के लिए कर रही है। इन दो सालों में वहां जनांदोलनों से जुड़े लोगों की झूठी मुठभेड़ों में लगभग 20 लोगों की हत्या की गई। ये शहीद लोग काशीपुर, सुन्दरगढ़, गंधमर्दन, नियमगिरी, कलिंगनगर जैसे विस्थापन विरोधी आन्दोलन से जुड़े हुए थे। उत्तर और पश्चिम उड़ीसा के आदिवासी इलाकों के लोगों को राजकीय दमन का लगातार शिकार बनाया जा रहा है। ऐसे ही हालात झारखंड में हैं। खरसावां और लातेहर में पुलिस व अर्धसैनिक बलों के उत्पीउऩ के 30 मामले सामने आए। इन मामलों में पुलिस ने लोगों पर झूठे केस बनाए, उन्हें थर्ड डिग्री यातनाएं दी गईं, उनके घर जलाए, जंगलों में आग लगा दी और शादी जैसे उत्सव में दखलंदाजी किया। महिलाओं को सलवार और कमीज पहनने के अपराध में गिरफ्तार किया गया। जिन लोगों ने इसका विरोध किया उन्हें झूठे मामलों में गिरफ्‌तार किया। इसके साथ साथ झारखंड सरकार टीपीसी, जेपीसी, जेएलटी जैसे भाड़े के गिरोहों का प्रयोग जनता के जुझारू आन्दोलन और उनके नेतृत्व को खत्म करने के लिए कर रही है।

पश्चिम बंगाल की सीपीएम सरकार ने जंगल महाल पर जो जुल्म किया वो तो जगजाहिर है। अकेले लालगढ़ में राजकीय समर्थन से सीपीएम के पचास अवैध हथियारबंद ट्रेनिंग कैम्प चल रहे हैं। लगभग सोलह सौ से अधिक हरमद गुंड़े इन कैम्पों में हैं जो जनता पर सलवा जुडूम जैसा ही अत्याचार-दमन कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में संयुक्त सैन्य बल, हरमद और गणप्रतिरोध कमेटी ने सौ से अधिक लोगों की हत्याएं की हैं। पुलिस संत्रास विरोधी जनसाधारणेर कमेटी के नेतृत्व जैसे लालमोहन टुडु, उमाकांत महतो, सिद्धु सोरेन को सीआरपीएफ ने झूठी मुठभेड़ में मार दिया। सैकड़ों लोगों को गम्भीर मामलों में फंसा कर जेल में डाल दिया गया। पूरे के पूरे इलाके में धारा 144 लगाकर जनाधिकारों को कुचला जाना आम बात है। जनांदोलनों को बदनाम करने के लिए ज्ञानेश्वरी ट्रेन दुर्घटना का षडयंत्र रचा गया। जिसके चलते सैंकड़ों लोगों की जान गई। बिहार में नीतिश कुमार सरकार ने दोबारा सत्ता में आते ही दमन के कुख्यात आंध्र मॉडल को लागू करना शुरू कर दिया है और खुफिया तरीकों से क्रान्तिकारी और जनवादी आन्दोलन के नेतृत्व के अभियान में लग गया।

जनता के खिलाप चलाये जा रहे इस युद्ध को तेज करने के लिए अब आदिवासी इलाकों में भारतीय सेना का आधार कैम्प बनाया जा रहा है। भारतीय सेना के दो ट्रेनिंग कैम्प उड़ीसा के रायगढ़ा व छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिलों में जल्दी ही स्थापित करने की योजना है। खुद सेना के अनुसार ही ये तथाकथित कैम्प मिजोरम व कांकेर के जंगल युद्ध प्रशिक्षण स्कूल के माडल पर ही स्थापित किये जा रहे हैं। सवाल उठता है कि ये कैम्प क्या केवल ट्रेनिंग देने के लिए ही है? या इनका कोई और रणनीतिक उद्‌देश्य है। ऐसे देखें तो पिछले कई सालों से सरकार इस बात पर जोर दे रही है कि नक्सलवाद आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इसका कुल जमा अर्थ कारपोरेट जगत की लूट के खिलाफ बढ़ रहे जनांदोलनों का हिंसक दमन करना है। ये कैम्प इसी उद्देश्य को पूरा करेंगे। कहने को भारतीय सेना नक्सलवाद के खिलाफ किसी सीधी लड़ाई में उतरने से इन्कार कर रही है लेकिन सेना के कैम्प की जिस तरह की व्यवस्था की जा रही है उससे साफ है कि इसका मकसद जनता के खिलाफ युद्ध तेज करना है।

छत्तीसगढ़ व उड़ीसा में भारतीय सेना के बेस कैम्प बनाने का मूल मंतव्य जनता पर सीधा सैन्य युद्ध थोपना ही है। हम देख सकते हैं कि सेना के सीधे उतरने के पहले ही वहां जनता पर व्यापक हमला जारी है। सेना की सीधी भागीदारी से जनता के क्रूर दमन के हालात का अंदाजा हम लगा सकते हैं। सेना के दो कमान पैदल व हवाई सेना आपरेशन ग्रीन हंट के साथ शुरुआत से ही शामिल है। अब तो वायुसेना के जवानों को आत्मरक्षा के नाम पर गोली मारने का लाईसेंस भी मिल गया है। सच्चाई यही है कि आपरेशन ग्रीन हंट में जिन लोगों को लगाया गया है वह लोग सेना द्वारा संचालित मिजोरम के जंगल युद्ध प्रशिक्षण स्कूल से ही निकले हुए लोग हैं। इसी अभियान के लिए सेना लंबे समय से छत्तीसगढ़ के कांकेर में युद्ध प्रशिक्षण दे रही है।

आपरेशन ग्रीन हंट जनता पर व्यापक दमन का अभियान है। इस दमनकारी अभियान के शुरूआती दौर में बिलासपुर में सेना के केन्द्रीय कमान ने मातहत सब डिवीजन बनाया। साथ ही केन्द्रीय गृह मंत्रालय की देख-रेख में विभिन्न राज्यों में चलाए जा रहे ऑपरेशन ग्रीनहंट के लिए एकीकृत कमांड बनाया गया। ट्रेनिंग कैम्प वस्तुतः सेना को जनता के ऊपर युद्ध थोपने के उद्देश्य से ही बनाया जा रहा है। द हिन्दू अखबार के अनुसार अबूझमाड़ के कुल क्षेत्रफल 4000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का 600 वर्ग किमी सेना को बेस कैम्प के लिए सौंपा जा रहा है। इतने बड़े इलाके में सेना के आने से स्थानीय लोगों का विस्थापन व जंगल की तबाही होना तय है। कैम्प बनाने की प्रक्रिया के नाम पर जंगल जमीन व खनिज सम्पदा और जनांदोलनों को तबाह करने के अभियान को अंजाम देने की ही तैयारी है। 23 मार्च, 2011 को जनसत्ता में सेना ने बयान दिया है कि 'सेना पहले दुश्मन के हमले का इंतजार नहीं करेगी बल्कि पहले हमले के अधिकार का प्रयोग करेगी'। कांकेर के युद्ध प्रशिक्षक सैन्य ब्रिगेडियर पंवार ने बयान दिया है, ''माओवादियों को यह साफ बता देना है कि उनके दरवाजे पर शेर इंतजार कर रहा है'। इस बयान का मकसद साफ है।

सेना के इस हस्तक्षेप का विरोध जरूरी है। केन्द्र की सरकार देश के संपूर्ण मध्य भूभाग को दुनिया के बड़े कारपोरेट घरानों को देने का मन बना चुकी है। दरअसल सेना के ट्रेनिंग कैम्प का पूरा मकसद इन कारपोरेट घरानों की सेवा करना है। ऐसी ही योजना के तहत सलवा जुड़़ूम के बर्बर अभियान में 650 गांवों को उजाड़ दिया और लोगों को सरकार के शिविर में बंदी बनाकर छोड़ दिया गया। जब जनांदोलनों से जुड़ी ताकतों ने इस अभियान की सफल खिलाफत की तो सरकार सेना का प्रयोग कर रही है। 600 वर्ग किमी के विशाल इलाके पर कब्जे की योजना इसी मद्देनजर है। इस बेस कैम्प में उतरने के साथ ही आदिवासी इलाके में सेना के हमले की शुरुआत और कारपोरेट लूट के लिए कब्जा करने का अभियान शुरू होगा। जाहिर है एक विशाल फौज और उसके द्वारा हिंसक गतिविधियों की शुरुआत देश को गृहयुद्ध की ओर ले जाएगा। जनता पर युद्ध विरोधी मंच देश की प्रगतिशील व जनवादी समूहों से अपील करता है कि भारत सरकार की सेना के बेस कैंप बनाने और जनता के संहार करने के कार्रवाई के खिलाफत में एकजुट होकर आवाज बुलंद करें।

जनता पर युद्ध बंद करो! केन्द्रीय सैन्यबलों को वापिस बुलाओ! बस्तर में सैन्य बेस कैंप को खत्म करो!

आयोजक: जनता पर युद्ध के खिलाफ मंच (Forum Against War on People)
सम्पर्क : forumagainstwaronpeople@gmail.com

पश्चिम बंगाल चुनावः नक्सलबाड़ी से जंगल महल

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/17/2011 03:04:00 AM

जाने-माने पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी का यह आलेख आज प्रभात खबर,रांची में छपा है. पश्चिम बंगाल चुनावों के इतिहास और वर्तमान पर, उनके मुद्दों और राजनीति पर तथा उसके दूरगामी नतीजों पर रोशनी डालता हुआ यह आलेख उन सभी आलेखों से अलग है, जो या तो सीपीएम पर निशाना साधते हुए कम्युनिज्म को भी खारिज कर रहे हैं या फिर सीपीएम के समर्थन में ममता बनर्जी की विधान सभा चुनाव में जीत के प्रतिक्रियावादी अर्थ तलाश रहे हैं. जाहिर है, ममता बनर्जी उस राजनीति का हिस्सा हैं और उस राजनीति के जरिए ही सत्ता में आयी हैं जो फासीवादी और जनविरोधी चरित्र के आधार पर खड़ी है. ऐसे में उनके लिए सीपीएम या किसी भी पार्टी से बहुत अलग कुछ कर पाने की उम्मीद सही नहीं है. इसके संकेत दिखने भी लगे हैं, जब प बंगाल के वित्त मंत्री और दूसरे मंत्रालयों के लिए उद्योग जगत से जुड़ी हस्तियों के नाम सामने आ रहे हैं. फिर भी, पिछले साढ़े तीन दशक के सीपीएम के कथित वामपंथी शासन के बाद एक मध्यमार्गी पार्टी के राज्य के शासन में आने का क्या अर्थ है और इसमें कैसे भविष्य की आहटें छुपी हैं, इसकी तरफ यह आलेख संकेत करता है.

आमार बाड़ी नक्सलबाड़ी. यह नारा 1967 में लगा, तो सत्ता में सीपीएम के आने का रास्ता खुला. और पहली बार 2007 में जब आमारबाड़ी नंदीग्राम का नारा लगा, तो सत्ता में ममता बनर्जी के आने का रास्ता खुला.

1967 के विधानसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस हारी और पहली बार मुख्यमंत्री प्रफ़ुल्ल चंद्र सेन भी हारे. वहीं 2011 में पहली बार सीपीएम हारी और पहली बार सीपीएम के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य भी हारे. बुद्धदेव को उनके दौर में मुख्य सचिव रहे मनीष गुप्ता ने ठीक उसी तरह हराया, जैसे 1967 में कांग्रेसी सीएम प्रफ़ुल्ल सेन को उनके अपने मंत्री अजय मुखर्जी ने हराया. ममता के मंत्रिमंडल के अनमोल हीरे मनीष गुप्ता हैं और 1967 में तो अजय मुखर्जी ही संयुक्त मोरचे की अगुवाई करते हुए मुख्यमंत्री बने.

1967 में नक्सलबाड़ी से निकले वाम आंदोलन ने उन्हीं मुद्दों को कांग्रेस के खिलाफ़ खड़ा किया, जिसकी आवाज नक्सलवादी लगा रहे थे. किसान, मजदूर और जमीन का सवाल लेकर नक्सलबाड़ी ने जो आग पकड़ी, उसकी हद में कांग्रेस की सियासत भी आयी और वाम दलों का संघर्ष भी. और उस वक्त कांग्रेस ने वामपंथियों पर सीधा निशाना यह कह कर साधा कि संविधान के खिलाफ़ नक्सलवादियों की पहल का साथ वामपंथी दे रहे हैं. और संयोग देखिये 2007 में जब नंदीग्राम में केमिकल हब के विरोध में माओवादियों की अगुवाई में जब किसान अपनी जमीन के लिए व मजदूर-आदिवासी अपनी रोजी-रोटी के सवाल को लेकर खड़े हुए, तो इसकी आग में वामपंथी सत्ता भी आयी और ममता बनर्जी ने भी ठीक उसी तर्ज पर माओवादियों के मुद्दों को हाथों-हाथ लपका, जैसे 1967 में सीपीएम ने नक्सलवादियों के मुद्दों को लपका था.
यानी इन 44 बरस में बंगाल में सत्ता परिवर्तन के दौर को परखें, तो वाकई यह सवाल बड़ा हो जाता है कि जिस संगठन को संसदीय चुनाव पर भरोसा नहीं है, उसकी राजनीतिक कवायद को जिस राजनीतिक दल ने अपनाया, उसे सत्ता मिली और जिसने विरोध किया, उसकी सत्ता चली गयी. 1967 के बंगाल चुनाव में पहली बार सीपीएम ने ही भूमि सुधार से लेकर किसान मजदूर के वही सवाल उठाये, जो उस वक्त नक्सलबाड़ी एवं कृषक संग्राम सहायक कमेटी ने उठाये. 2007 में नंदीग्राम में केमिकल हब की जद में किसानों की जमीन आयी, तो माओवादियों ने ही सबसे पहले जमीन अधिग्रहण को किसान- मजदूर विरोधी करार दिया. और यही सुर ममता ने पकड़ा.

1967 से लेकर 1977 के दौर में जब तक सीपीएम की अगुवाई में पूर्ण बहुमत वाम मोरचा को नहीं मिला, तब तक राजनीतिक हिंसा में पांच हजार से ज्यादा हत्याएं हुईं. जिसमें तीन हजार से ज्यादा नक्सलवादी तो डेढ़ हजार से ज्यादा वामपंथी कैडर मारे गये. सैकड़ों छात्र जो मार्क्स- लेनिन की थ्योरी में विकल्प का सपना संजोये किसान-मजदूरों के हक का सवाल खड़ा कर रहे थे, वह भी राज्य हिंसा के शिकार हुए. हजार से ज्यादा को जेल में ठंस दिया गया. और इसी कड़ी ने कांग्रेसियों को पूरी तरह 1977 में सत्ता से ऐसा उखाड़ फ़ेंका कि बीते तीन दशक से बंगाल में आज भी कोई बंगाली कांग्रेस के हाथ सत्ता देने को तैयार नहीं है. इसीलिए राष्ट्रीय पार्टी का तमगा लिये कांग्रेस ने 1967 के दाग को मिटाने के लिए उसी ममता के पीछे खड़ा होना सही माना, जिसने 1997 में कांग्रेस को सीपीएम की बी टीम से लेकर चमचा तक कहते हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में बगावत कर अपनी नयी पार्टी तृणमूल बनाने का ऐलान किया था.

लेकिन ममता के लिए 2011 के चुनाव परिणाम सिर्फ़ माओवादियों के साथ खड़े होकर मुद्दों की लड़ाई लड़ना भर नहीं है. बल्कि 1971-1972 में जो तांडव कांग्रेसी सिद्धार्थ शंकर रे नक्सलबाड़ी के नाम पर कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज तक में कर रहे थे. कुछ ऐसी ही कार्रवाई 2007 से 2011 के दौर में बुद्धदेव भट्टाचार्य के जरिये जंगल महल के नाम पर कोलकाता तक में नजर आया. इसी का परिणाम हुआ कि मई 2007 में नंदीग्राम में जब 14 किसान पुलिस फ़ायिरग में मारे गये, उसके बाद से 13 मई 2011 तक यानी ममता बनर्जी के जीतने और वाम मोरचे की करारी हार से पहले राजनीतिक हिंसा में एक हजार से ज्यादा मौतें हुई. करीब 700 को जेल में ठूंसा गया. आंकड़ों के लिहाज से अगर इस दौर में दलों और संगठनों के दावों को देखें, तो माओवादियों के 550 कार्यकर्ता मारे गये. तृणमूल कांग्रेस के 358 कार्यकर्ता मारे गये. सौ से ज्यादा आम ग्रामीण- आदिवासी मारे गये. सिर्फ़ जंगल महल के 700 से ज्यादा ग्रामीणों को जेल में ठूंस दिया गया. तो क्या जिन परिस्थितियों के खिलाफ़ साठ और सत्तर के दशक में वामपंथियों ने लड़ाई लड़ी, जिन मुद्दों के आसरे उस दौर में कांग्रेस की सत्ता को चुनौती दी, उन्हीं परिस्थितियों और उन्हीं मुद्दों को 44 बरस बाद वामपंथियों ने सत्ता संभालते हुए पैदा कर दी. जाहिर है ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि सत्ता संभालने के बाद ममता बनर्जी नहीं भटकेगी, इसकी क्या गारंटी है. जबकि ज्योति बसु ने मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद जो पहला निर्णय लिया था, वह नक्सलवादियों के संघर्ष के मूल मुद्दे से ही उपजा था.

21 जून 1977 को ज्योति बसु ने सीएम पद की शपथ ली और 29 सितंबर 1977 को वेस्ट बंगाल लैंड अमेंडमेंट बिल विधानसभा में पारित करा दिया. और दो साल बाद 30 अगस्त 1979 में चार संशोधन के साथ दि वेस्ट बंगाल लैंड फ़ार्म होल्डिंग रेवेन्यू बिल-1979 विधानसभा में पारित करवाने के बाद कहा, अब हम पूर्ण रूप से सामंती राजस्व व्यवस्था से बाहर आ गये. और इसके एक साल बाद 27 मई 1980 को ट्रेड यूनियनों से छीने गये सभी अधिकार वापस देने का बिल भी पास किया. इसी बीच 10 वीं तक मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा भी ज्योति बसु ने दिलायी. यानी ध्यान दें तो सीपीएम पहले पांच बरस में नक्सलबाड़ी से उपजे मुद्दों के अमलीकरण में ही लगी रही. और जनता से उसे ताकत भी जनवादी मुद्दों की दिशा में बढ़ते कदम के साथ मिला. लेकिन जैसे-जैसे चुनावी प्रक्रिया में सत्ता के लिए वामपंथियों ने अपनी लड़ाई पंचायत से लेकर लोकसभा तक के लिए फ़ैलायी और चुनाव के केंद्र में सत्ता न गंवाने की सोच शुरू हुई, वैसे-वैसे सीपीएम के भीतर ही कैडर में प्रभावी ताकतों का मतलब वोट बटोरनेवाले औजार हो गये. और यहीं से राजनीति जनता से हट कर सत्ता के लिए घुमड़ने लगी.

जाहिर है ममता ने भी चुनाव जनता को जोर पर मां, माटी, मानुष के नारे तले जीता है. और सत्ता उसे जनता ने दी है. इसलिए ममता के सत्ता संभालने के बाद बिलकुल ज्योति बसु की तर्ज पर बंगाल में कुछ निर्णय पारदर्शी होंगे. जैसे जंगल महल के इलाके में ज्वाइंट-फ़ोर्स का ऑपरेशन जो माओवादियों को खत्म करने के नाम पर हो रहा है, वह बंद होगा. राज्य की बंजर जमीन पर इंफ्रास्ट्रक्चर शुरू कर औद्योगिक विकास का रास्ता खुलेगा. छोटे किसान, मजदूर और आदिवासियों के लिए रोजगार और रोजगार की व्यवस्था होने से पहले रोजी-रोटी की व्यवस्था ममता अपने हाथ में लेगी. बीपीएल की नयी सूची बनाने और राशन कार्ड बांटने के लिए एक खास विभाग बना कर काम तुरंत शुरू करने की दिशा में नीतिगत फ़ैसला होगा. जमीन अधिग्रहण के एवज में सिर्फ़ मुआवजे की थ्योरी को खारिज कर औद्योगिक विकास में किसानों की भागीदारी शुरू होगी. यानी कह सकते हैं कि माओवादियों के उठाये मुद्दे राज्य नीति का हिस्सा बनेंगे. लेकिन यहीं से ममता की असल परीक्षा भी शुरू होगी.

ममता के सामने चुनौती माओवादियों को मुख्यधारा में लाने का भी होगा और अभी तक सत्ताधारी रहे वाम कैडर को कानून-व्यवस्था के दायरे में बांधने का भी.ज्योति बसु ने नक्सलवादियों को ठिकाने अपने कैडर और पुलिसिया कार्रवाई से लगाया. और उस वक्त सत्ता राइट से लेफ्ट में आयी थी. लेकिन ममता का सोच अलग है. यहां लेफ्ट के राइट में बदलने को ही बंगाल बरदाश्त नहीं कर पाया, राइट से निकली ममता कहीं ज्यादा लेफ्ट हो गयी. इसलिए बंगाल पुलिस के पास भी वह नैतिक साहस नहीं है, जिसमें वह माओवादियों को खत्म कर सके. क्योंकि बंगाल पुलिस का लालन-पोषण बीते दौर में उन्हीं वामपंथियों ने किया, जिसका कैडर वाम फ़िलासफ़ी को जमीन में गढ़ कर सत्ता में प्रभावी बना. जाहिर है ममता ने सीपीएम का हश्र देख लिया और बंगाल के मानुष के अतिवाम मिजाज को भी समझ लिया है, जो बीते 44 बरस में नहीं बदला है.

इसलिए ममता डिगेगी यह तो असंभव है, लेकिन ममता माओवादियों से तालमेल बैठा कर कैसे सत्ता चलाती है और बंगाल को कैसे बदलती है, नजर सभी की इसी पर है.

बिहार का मीडिया सरकारी जनसंपर्क अधिकारी है

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/17/2011 02:40:00 AM

बिहार में मीडिया की दशा और दिशा को लेकर पिछले कुछ सालों से चिंता बढ़ने लगी है, जब सरकार की विज्ञापन नीतियों और दूसरे कदमों ने मीडिया की आजादी पर कई तरह की पाबंदियां लगा दीं. दूसरी तरफ, मीडिया घरानों के लगातार बढ़ते एकाधिकार और उनके बड़ी कंपनियों में बदलते जाने से भी मीडिया चरित्र बदला है. वह अधिक से अधिक शहर केंद्रित, उत्पादकेंद्रित और गहन पूंजी वाला क्षेत्र बनता गया है. इसने वास्तव में एक लोकतांत्रिक समाज में संचार की संभावनाओं को खत्म किया है. कुछ दिन पहले पटना में इन सब सवालों को लेकर एक गोष्ठी हुई. आल इंडिया बैकवर्ड स्टुडेंट्‌स फोरम और अभियान द्वारा बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के सभागार में आयोजित इस पर मनीष शांडिल्य की रिपोर्ट.

बिहार में मीडिया जनसंपर्क अधिकारी की भूमिका में है. सरकार मुख्यधारा के मीडिया को अपने प्रचार तंत्र के रूप में प्रयोग कर रही है. बिहार सरकार अपनी छवि चमकाने के लिए जनता का पैसा विज्ञापन के रूप में मुख्यधारा के मीडिया पर लुटा रही है. सरकार छवि चमकाने के लिए योजनाओं के प्रचार-प्रसार पर कम और अपनी उपलब्धियों की चर्चा ज्यादा करती है. सरकार मुख्यधारा के मीडिया पर खर्च कर अपनी सत्ता वापसी का रास्ता तैयार करने में लगातार लगी रहती है. सरकार एक गिरोह के रूप में भी कार्य कर रही हैं. दूसरी ओर आज बिहार का मुख्यधारा का मीडिया सवाल नहीं उठा रहा है. जनपक्षी खबरें सामने नहीं आ रही हैं. बिहार में भ्रष्टाचार काफी बढ़ गया है. मनरेगा, आंगनबाड़ी समेत सारी योजनाओं में भ्रष्टाचार चरम पर है लेकिन यह बातें अखबारों से गायब हैं. मीडिया चुप है. मीडिया संस्थानों में पत्रकार नहीं चाटुकारों को बढ़ावा मिल रहा है. कोशिश की जा रही है कि पत्रकार चोट करने के लायक ही नहीं रहे. मगर चूंकि पत्रकार और पत्रकार संगठनों में एकता की कमी है इस कारण वे इस चाटुकारिता के खिलाफ खड़े नहीं हो रहे हैं. जबकि प्रेस-बिल के समय जैसी एकजुटता दिखाने की जरूरत है. इस कारण बिहार में मुख्यधारा का मीडिया कटघरे में है.
    बीबीसी से जुड़ वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर जब ये बातें कह रहे थे तो वे राजनीति और मीडिया के बेहद करीबी रिश्तों पर भी नजर डाल रहे थे. उन्होंने आमलोगों के जीवन से जुड़े सवालों को खड़ा करते हुए सवाल किया कि पांच साल में बिजली क्यों नहीं ठीक हुई? शिक्षा रसातल में चली गई. जो सही हस्ताक्षर नहीं कर सकता वह शिक्षक बन गया और प्राथमिक शिक्षा बुरी तरह चौपट हो गयी. विकास मित्र बहाल हुए हैं लेकिन वह अलग-अलग वजहों से मतदाता को बूथ पर ले जाने और सरकार के पक्ष में वोट दिलवाने का काम करते हैं. इसकी चर्चा मुख्यधारा के मीडिया में नहीं होती है. हत्या, अपहरण, फिरौती, बलात्कार जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं. लेकिन मुख्यधारा का मीडिया इस पर प्रहार करने की जगह कानून-व्यवस्था में सुधार के सरकारी दावों के सुर में सुर मिलाता है. मणिकांत ठाकुर ने आगे कहा कि बड़े अखबार पूंजीपतियों के कब्जे में हैं. जिनका एक मात्र उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना भर रह गया है. ऐसे में मालिकों की मर्जी से अखबारों का तेवर तय हो रहा है. इस कारण बड़े अखबार आज बिहार में सरकारी भोंपू बन गये हैं और जनता की मूल समस्याओं को उजागर नहीं कर रहे हैं. ऐसे में आज वैकल्पिक मीडिया की जरूरत है. छोटे अखबार, छोटी पत्रिका, वेब पत्रिका, ब्लॉग्स को सशक्त बनाते हुए वैकल्पिक मीडिया को मजबूत किया जा सकता है और जनपक्षी पत्रकारिता की जा सकती हैं.
    गोष्ठी में बहस को आगे बढ़ाते हुए दैनिक जागरण से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे ने कहा कि भारत में आज तक पाठकीय संप्रभुता बन ही नहीं पाई. आगे के समय में यह और भी संभव नहीं दिखाई देता है क्योंकि यह वित्तीय मुद्रा व मुद्रा के वर्चस्व का युग है. बड़ी पूंजी से संचालित बाजार कह रहा है कि तुम्हें वही चीजें चाहनी होंगी जो हम पैदा कर रहे हैं. यह सब मात्र मुनाफा कमाने की होड़ में किया जा रहा है. इसी दौर में खबरों को भी सेलेबल प्रोडक्ट के रूप में भी तैयार किया जा चुका है. राजनीति और मुख्यधारा के मीडिया दोनों पर पूंजी का दबाव है. उन्होंने आगे कहा कि पहले जनाधार और कैडर आधारित पार्टियां मुख्यधारा के मीडिया को अपने लिहाज से महत्वहीन मानती थीं. लेकिन जैसे-जैसे समय बदला जनाधार कमजोर हुआ, पार्टियां कैडरविहीनता की स्थिति में आने लगीं, पार्टियां मीडिया के द्वारा छवि निर्माण करने लगीं. पार्टियां मुख्यधारा के मीडिया का इस्तेमाल कर उन पैसिव वोटरों को प्रभावित करने लगीं जो पाठक-दर्शक है. ऐसे में ही पार्टियों और मुख्यधारा के मीडिया का नापाक गठबंधन शुरू हुआ. राघवेंद्र दुबे ने अपने विचार क्रम को आगे बढ़ाते हुए याद दिलाया कि पत्रकारिता तो नैसर्गिक प्रतिपक्ष है. साथ ही उन्होंने मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने को साजिश करार देते हुए कहा कि ऐसा कहना मीडिया को भी बाकी तीनों स्तंभों के वर्ग-चरित्र का हिस्सा बनाना है. इसके बाद उन्होंने याद दिलाया कि आज सर्वाधिक असरदार पत्रकारिता डिजिटल वर्ल्ड में हो रही है. उन्होंने अपने वक्तव्य के अंत में सबसे आह्‌वान किया कि सब पाठकीय राज की स्थापना के लिए आगे बढ़ें लेकिन इस राह पर आगे बढ़ने के लिए जिस पूंजी का सहारा लेंगे उसका रंग और स्रोत देखना न भूलें.
    गोष्ठी में आईआईएमसी में प्राध्यापक और मीडिया शोधार्थी दिलीप मंडल ने एक तरह से पत्रकारों का बचाव करते हुए कहा कि पत्रकार दोषी नहीं हैं क्योंकि चीजें बहुत हद तक मीडिया संस्थानों के प्रबंधन तय कर रहे हैं. किसी भी मीडिया संस्थान के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में पत्रकार नहीं हैं. उन्होंन आगे कहा कि सैकड़ों शोध अब यह साबित कर चुके हैं कि मुद्दे मास मीडिया तय करता है. ऐसे में सरकारों द्वारा कन्सेंट मैनुफैक्चर (सहमति निर्माण) के लिए आज बड़े पैमाने पर मुख्यधारा की मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है. वर्तमान में इसका सबसे सटीक उदाहरण बिहार सरकार है. बिहार में पिछले 6 सालों के दौरान कोई नया उद्योग नहीं स्थापित हुआ लेकिन प्रचार के बूते सरकार ने विकास के नाम पर जनता का समर्थन बटोर लिया.
    अपनी चिर-परिचित शैली में उन्होंने आगे कुछ तथ्यों को रखते हुए बताया कि अगर अखबारों की बात करें तो बिहार के 89 प्रतिशत अखबार पढ़ने वाले लोग सिर्फ दो अखबार हिंदुस्तान और दैनिक जागरण पढ़ते हैं. ऐसे में सरकार मात्र इन दो अखबार को ही मैनेज कर बिहार में बहुत बड़े स्तर पर पाठकों को प्रभावित कर रही है. बिहार सरकार के लिए ऐसा करना तब और आसान हो जाता है जब सत्तारूढ़ जनता दल (यू) का एक सांसद एन. के. सिंह एचटी मीडिया के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में भी शामिल हो. लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मीडियाकर्मियों का जातिवादी चरित्र भी बिहार में मीडिया की पथभ्रष्ट होने की एक बड़ी वजह है. मगर साथ में उन्होंने यह भी जोड़ा कि सवर्णों के न्यायपूर्ण तबके से ही उम्मीद भी है. उन्होंने अंत में कहा कि न्यू मीडिया के रूप में जनपक्षी मीडियाकर्मियों को नये हथियार तलाशने-तराशने होंगे. नये समानांतर मीडिया से ही भविष्य में उम्मीद की जा सकती है.
    जनसत्ता के गंगा प्रसाद ने कहा कि आज अखबारों में सूचना है मगर खबर नहीं. पटना में खबर लिखने वाले तीन पत्रकारों को हाल के दिनों में नौकरी से हाथ धोना पड़ा. आज नेता मीडिया को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं और ज्यादातर पत्रकार पत्रकारिता नहीं धंधा करने लगे हैं. उन्होंने मीडिया के बदलते स्वरूप के लिए अखबार चलाने वालों की मानसिकता में आये बदलाव को मुख्य वजह बताते हुए कहा कि विज्ञापन से तो अखबार पहले भी चलते थे मगर विज्ञापन संपादकीय पर पहले इस कदर हावी नहीं था. उन्होंने इस पर चिंता जतायी कि अब अखबारों में प्रभावशाली पत्रकार यूनियन नहीं रह गये हैं क्योंकि वेज रोल पर पत्रकार नहीं हैं. अंत में उन्होंने कहा कि विकल्प तैयार करना आवश्यक है और इसके लिए जरूरी है कि पत्रकार मानसिक तौर पर दीन-हीन न बने, गुलाम होने से बचें.
    संगोष्ठी में वरीय पत्रकार सुकांत ने कहा कि पटना और दिल्ली में बैठे पत्रकार कान्सेंट मैनुफैक्चर (सहमति निर्माण) ज्यादा कर रहे हैं. जबकि कस्बाई पत्रकार, मुफ्फसिल पत्रकार अपनी जिम्मेवारी का निवर्हन कहीं बेहतर ढंग से, ईमानदारी से कर रहे हैं. ये पत्रकार अपना पत्रकारीय कर्म नहीं भूले हैं. किंतु शीर्ष पर बैठे पत्रकार मीडिया की धार कुंद कर रहे हैं.
    साहित्यकार व विधान पार्षद प्रेम कुमार मणि ने कहा कि वर्तमान निजाम में कुछ काम के साथ बड़े पैमाने पर पाखंड राज भी चल रहा है. नीतीश कुमार यह मानते हैं कि आज सम्राट अशोक के कार्य नहीं उनके द्वारा स्थापित लाट ही दिखाई देते हैं, इस कारण इसी राह पर आगे बढ़़ो. यह बड़ा अंतर्विरोध है. सरकार चाहती है कि पाखंड पर टिप्पणी न हो और इसके लिए वह मुख्यधारा का मीडिया का सहारा लेकर अपनी छवि को चमकाने में लगी है. और ऐसा करने में सत्ता शीर्ष के पांव दबाने वाले पत्रकार मददगार साबित हो रहे हैं जो लालू के समय भी चाटुकारिता कर रहे थे और आज नीतीश का यशोगान कर रहे हैं. लोकतंत्र के घोषित तीनों खंभों की तरह चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया भी भ्रष्टाचार के रोग से ग्रसित हो चुका है. उन्होंने अंत में कहा कि नेता लगातार पत्रकारों को हरेक स्तर पर भ्रष्ट बनाने में लगे हैं. लेकिन पत्रकारों की जिम्मेवारी है कि इससे बचते हुए वो हरेक स्तर पर पाखंड का भंडाफोड़ करें.
    संगोष्ठी के अंत में अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रो. नवल किशोर चौधरी ने कहा कि आज के दौर में हम राजनीति, मीडिया से लेकर हरेक क्षेत्र में अतिवाद के शिकार हैं. फिलहाल अगर सिर्फ मीडिया की बात करें तो मीडिया पर ज्यादा नजर रखी जा रही है, उसमें ज्यादा हस्तक्षेप किया जा रहा है. बिहार में आज मीडिया भक्ति मार्ग अपनाते हुए भजन-कीर्तन में लगा है. भक्ति मार्ग से ज्ञान मार्ग की ओर मीडिया नहीं बढ़ रहा है. यह बहुत ही चिंताजनक बात है.

सरकारी पैसे पर फ्री थिएटर नहीं चल सकताः बादल सरकार से एक बातचीत

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/16/2011 10:57:00 AM

बादल सरकार के निधन के बाद शम्सुल इसलाम ने मेल के जरिए सरकार से की गयी अपनी एक बातचीत की कटिंग भेजी है, जो द संडे टाइम्स ऑफ इंडिया के 11 अक्तूबर, 1992 संस्करण में छपी थी. हम यहां इसका अनुवाद पेश कर रहे हैं. इसे हम यहां बादल सरकार के रंगमंच पर जारी बहस के सिलसिले के रूप में पोस्ट कर रहे हैं. इसके पहले हाशिया ने अपने नजरिये के रूप में ब्रह्म प्रकाश द्वारा बादल सरकार का एक आलोचनात्मक आकलन पेश किया था.
आपने तीसरा रंगमंच के सिद्धांत की शुरुआत की और आप अपनी राय बदलते रहे हैं. अब आप फ्री थिएटर को कैसे देखते हैं?

यह सही है, एक बार मैंने तीसरा रंगमंच को शहरी और ग्रामीण रंगमंच के मेल (संश्लेषण) से बने रंगमंच के रूप में सोचा था. लेकिन इस पर काम करते हुए मैंने अपने विचारों को सुधारा. मुझे लगा कि अगर तीसरा रंगमंच को एक वैकल्पिक रंगमंच होना था तो यह किसी का भी संश्लेषण नहीं हो सकता था. पहले मैं यांत्रिक नजरिये का शिकार हो गया था. मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि तीसरा रंगमंच को फ्री थिएटर होने के लिए उसे महंगा, स्थिर और व्यवसायिकरण का शिकार होने से बचना चाहिए. इसे दर्शकों से संवाद बनाने की कोशिश करनी चाहिए.
एक बार जब आप पारंपरिक मंच नाटक (प्रोसीनियम थिएटर) की चीजों से पार पा लेते हैं तो आपको मुख्यतः मानव देह पर निर्भर रहना पड़ता है. इसकी क्षमताओं को गहरे प्रशिक्षण के जरिये विकसित किया जाना चाहिए. फ्री थिएटर को बीते हुए समय की तरह नहीं लिया जा सकता. हमारे लिए किसी कहानी को कहने के बजाय रंग अनुभव अधिक प्रासंगिक होता है. किसी भी हालत में भाषा पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय शारीरिक अनुभव कहीं अधिक असरदार होता है.
आलोचक महसूस करते हैं कि आपका रंगमंच भाषा या बोले गये शब्दों की कीमत पर महज एक शारीरिक रंगमंच है. वे यह भी कहते हैं कि शारीरिक प्रदर्शन पर अधिक निर्भरता आपके रंगमंच को एक करतब देखने के अनुभव में बदल देती है, जो सिर्फ मध्यवर्ग के दर्शकों को ही संप्रेषणीय होता है. आपका इन टिप्पणियों पर क्या जवाब है?

ऐसी बातें केवल वहीं लोग कहेंगे जिन्होंने कभी हमारे प्रदर्शन नहीं देखे, और जो रंगमंच के बारे में कुछ भी जानना नहीं चाहते. वे हमारी तारीफ भी करते हैं तो गलत वजहों से. लेकिन इस देश में ऐसे ही होता हैः बिना कुछ भी जाने लोग फैसले देते हैं.
 
असल में हम उसका उल्टा करते हैं, जिसका आरोप हम पर लगाया जाता है. हम थीम के नाट्यालेख से शुरू करते हैं और फिर फॉर्म को विकसित (एक्सप्लोर) करते हैं. हमारे लिए कथ्य रंगमंच का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है. अनेक लोग फॉर्म से शुरू करते हैं और फिर एक विषय या नाट्यालेख को काट-छांट कर उसमें फिट कर देते हैं. हम ऐसा कभी नहीं करते.
 
इन आलोचकों के साथ एक और समस्या है. वे यह मानना पसंद करते हैं कि आम आदमी किसी प्रस्तुति की बारीकियों पर अपनी राय नहीं रख सकता, कि यह कुलीनों-अभिजातों का विशेषाधिकार है. हमारा अनुभव है कि आम आदमी नाटक के प्रतीकों, भंगिमाओं और आत्मा को उन तथाकथित शहरी बुद्धिजीवियों से अधिक समझता है.
आप अपनी रंगमंचीय कार्यशालाओं की लोकप्रियता के बारे में क्या कहेंगे?

मेरी कार्यशालाओं में कभी भी नाट्यालेख या नाटक पर काम नहीं होता. यह पूरी तरह बेकार होगा. खुल कर कहूं तो मेरी कार्यशालाओं का ऐसा कोई नतीजा नहीं निकलता. उनका कोई अंतिम नतीजा होता ही नहीं. क्योंकि मैं मानता हूं कि एक रंगमंचीय कार्यशाला को भागीदारों को रचनात्मक होने में मददगार होना चाहिए. भागीदारों को रंगमंच को जीना चाहिए और उनकी जिम्मेदारी कही गयी बातों की नकल करना या उसे मान लेना भर नहीं होना चाहिए. रंगमंच पर अकेले निर्देशक का अधिकार नहीं होना चाहिए.
 
इस प्रक्रिया में क्या बातें निकल कर आती हैं?

उत्तर भारत में तो अधिक नहीं. दिल्ली में मैंने एनएसडी, संभव, एसआरसी रंगमंडल के लिए कार्यशालाएं की हैं. लेकिन इनमें से कोई फ्री थिएटर नहीं करता. आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में इसका उल्टा है. इन राज्यों में फ्री थिएटर एक आंदोलन की शक्ल ले रहा है. इन कार्यशालाओं ने पाकिस्तान के रंगकर्मियों तक की एक फ्री थिएटर आंदोलन शुरू करने में मदद की है.
संस्कृति को राजकीय संरक्षण दिए जाने के मुद्दे पर आपका क्या विचार है?

हम इसके पूरी तरह खिलाफ हैं. हमने कभी भी राज्य या इसकी एजेंसियों से अनुदान या किसी मदद के लिए आवेदन नहीं किया है. अगर हम संरक्षण की मांग करना शुरू करेंगे तो फिर फ्री थिएटर बेमानी हो जाएगा. 20 सालों का हमारा अनुभव रहा है कि आप राज्य के अनुदान के बिना भी जनता के स्वैच्छिक योगदान के जरिए नाटक कर सकते हैं.
 
वे लोग कितने सही हैं जो यह मानते हैं कि आप मंच नाटकों (प्रोसीनियम) को खत्म करना चाहते हैं?

अगर मैंने कोशिश भी की होती तो तय है कि मैं सफल नहीं हुआ होता. यह तो एक मिथक है जिसका प्रचार किया गया है. सही बात यह है कि मैं मंच नाटकों में भरोसा नहीं करता और न इस पर काम करता हूं. मैं ऐसा क्यों करूंगा जब मैं इसे प्रासंगिक ही नहीं मानता? लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जो लोग मंच नाटक करते हैं वे मेरे दुश्मन हैं.
आपके नाटकों में बार बार खुदकुशी क्यों एक थीम के रूप में आती है?

ऐसा मेरे 50 नाटकों में से केवल तीन नाटकों में हुआ है- पगला घोड़ा, एवम इंद्रजीत और बाकी इतिहास में. यह एक गलत सामान्यीकरण है. और कृपया ध्यान दीजिए कि इन नाटकों में खुदकुशी होने के बावजूद वे निराशावादी नाटक नहीं हैं. वे जीवन से भरे हुए हैं. उनमें खुदकुशी का प्रचार नहीं है. ऐसा इसलिए है क्योंकि यह नाटक के ढांचे में फिट बैठता है.

चंद सवाल रह गए थे बादल दा

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/15/2011 11:18:00 PM

अंधेरे कमरों में लगातार फुसफुसाती, चीखती और सिर पीटती आवाजें. कथ्य को दिशा देनेवाली सभी घटनाएं प्रायः दृश्य से बाहर घटती हुईं. बीच-बीच में शांति के कुछ पल... कर्मकांडी उदासी और बोझिल परिवेश. बादल सरकार के नाटकों की याद आते ही कुछ निश्चित से दृश्य खिंच जाते हैं. ब्रह्म प्रकाश बादल सरकार के नाटकों को एक सही राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश की है. उन्होंने बादल सरकार की कथित क्रांतिकारिता और रचनात्मक प्रतिबद्धता की भी पड़ताल की है. जेएनयू में आरसीएफ से जुड़े एक सक्रिय रंगकर्मी रहे ब्रह्म प्रकाश लंदन विश्वविद्यालय से जन कलाओं पर शोध कर रहे हैं और इसे पूरा करने की व्यस्तता के बावजूद उन्होंने हाशिया के अनुरोध पर बहुत झिझकते हुए यह लेख भेजा है.


बादल दा, जब अनायास ही एक साइट पर आपकी मृत्यु का समाचार पढ़ा तो थोड़ी देर के लिए भरोसा ही नहीं हुआ. भरोसा इसलिए भी नहीं हो पा रहा था क्योंकि आपसे करने के लिए चंद सवाल जो रह गये थे. हां, बादल दा एक इच्छा थी कि आपसे एक दिन जरूर मिलूंगा और मिल कर कुछ अटपटे और अनसुलझे सवाल करूंगा. वे सवाल जो असल में अनसुलझे नहीं थे, बल्कि आपने उन्हें उलझा कर रख दिया था. आपके वो उलझे सवाल हम जैसे बहुतों के मन में होंगे. खास कर जब भी आपका कोई नाटक देखा, सवाल करने की इच्छा उतनी ही तीव्र हुई. परंतु जब भी आपको लिखने के लिए सोचा, थोड़ी झिझक ने मुझे रोक लिया. यह जानते हुए भी कि आप नहीं रहे आज वे सवाल पूछ रहा हूं. सवाल इसलिए भी जरूरी हैं कि आपकी विरासत तीसरा रंगमंच (Third Theatre) के रूप में जिंदा है. आपके लिखे गये उन अनगिनत नाटकों में के रूप में. सवाल आप से भी हैं और आपके उन शागिर्दों से भी जो आपके नाटकों के गुणगान करते नहीं थकते. वैसे कुछ मामलों में, खास कर तीसरा रंगमंच को लेकर तो मैं खुद ही आपका गुणगान करता हूं.

आपसे और आपके तीसरे रंगमंच के बारे में मेरा पहला परिचय जेएनयू में तब हुआ जब मैं कैंपस आधारित नुक्कड़ नाटक समूह जुगनू से जुड़ा था. परिचय क्या था, प्रेरणा थी. तब आपके तीसरा रंगमंच का प्रशंसक हो गया था मैं. आप जिस खूबी से स्पेस का इस्तेमाल किया करते थे, अपने नाटकों में आपने जिस बारीकी से अभिनेताओं की देह (body) का इस्तेमाल किया था और उसमें एक नयी जान फूंक दी थी, वह पहली नजर में बहुत प्रभावशाली लगता था. जब चाहा आपने उसे पेड़ बना दिया, जब चाहा एक लैंप पोस्ट. खास कर जिस तरह से आपके एक चरित्र दूसरे चरित्र में बदल जाते थे और दूसरे चरित्र को आत्मसात कर लेते थे, वह काबिले तारीफ था. स्पेस और बॉडी का ऐसा मेल आधुनिक भारतीय रंगमंच में शायद ही किसी ने किया हो. आप सिर्फ रंगमंच को सभागार (auditorium) से बाहर ही नहीं लाये, आपने नुक्कड़ों और सड़कों को ही मंच (स्टेज) बना दिया. बुर्जुआ रंगमंच के सभागार को तो आपने ध्वस्त कर दिया. आपने यह साबित कर दिया कि पैसे और सभागारों से रंगमंच नहीं चलता, रंगमंच के लिए अभिनेता की देह, न्यूनतम स्पेस और दर्शक की कल्पनाशक्ति काफी है. आपका वह सवाल कि ‘थिएटर करने के लिए कम से कम क्या चाहिए’, नाट्यकर्मियों के लिए आज भी प्रेरणास्रोत है. एक चुनौती है. आपने जिस तरह से वस्त्र सज्जा (कॉस्ट्यूम) और साज सज्जा (मेक अप) को गैरजरूरी बना दिया और इस तरह कुल मिला कर नाटक के अर्थशास्त्र को बदल कर रख दिया वह हमारे समाज के संदर्भ में रेडिकल ही नहीं क्रांतिकारी भी था. आपने बुर्जुआ रंगमंच और रंगकर्मियों को उनकी सही औकात बता दी थी. इसके लिए देश के नाट्यकर्मी आपके कायल हैं. खास कर हमारे जैसे देश में आपके प्रयोग और भी अहम हो जाते हैं, क्योंकि यूरोप और अमेरिका की तरह रंगमंच अब भी यहां उद्योग नहीं है. कुछ गिने-चुने लोगों को छोड़ कर रंगमंच की कमान अब भी आम लोगों के हाथों में है. वही आम लोग जो बड़े बड़े थिएटर हॉलों में किए गए नाटकों पर घास भी नहीं डालते. आज भी उनके लिए थिएटर गांव के मेलों में शहर की गलियों और चौराहों पर है. उन्हें आनेवाले दिनों में भी मुफ्त का थिएटर ही चाहिए होगा, जो उनका वाजिब हक है.

ऐसे रंगमंच के लिए आपका योगदान बहुत बड़ा है. उसे जितना भी सराहा जाए वह कम है. आपके रूप में हमें एक आगस्टो बोअल मिल गया था. असल में आपके कामों से ही हमने ऑगस्टो बोअल को जाना.
तब तक आपका नाटक देखने भी लगा था और पढ़ने भी लगा था. जैसे-जैसे आपके नाटकों से परिचय होता गया आपके नाटकों को लेकर बेचैनी बढ़ने लगी. चंद सवाल उठने लगे थे. पहले तो कुछ समझ में नहीं आया लेकिन जबसे कुछ समझने लगा तो आप पर गुस्सा भी आने लगा था. आपने अपने नाटकों में कथ्य (कंटेंट) पर ज्यादा महत्व देने की बात कही थी, क्या कथ्य को महत्व देने भर से हर नाटक क्रांतिकारी हो जाता है? बल्कि वह तो इस बात पर निर्भर करता है कि आपके नाटक का कथ्य क्या है. और वैसे भी आपके नाटकों का कंटेंट क्या था बादल दा? उलझा हुआ आम आदमी जो अपनी उलझनों में फंस कर रह जाता है, उनसे बाहर नहीं निकल पाता और निकल भी नहीं पायेगा. आपका वह आम आदमी मध्यवर्ग से लेकर दलित और आदिवासी भी था. वह कोलकाता की सड़कों से लेकर झारखंड के जंगलों तक फैला हुआ था. एक ऐसा आम आदमी जिसकी कहानी मौत, हताशा और खुदकुशी के ईर्द-गिर्द घूमती रहती है और वहीं खत्म हो जाती है (याद कीजिए कि एवम इंद्रजीत, बाकी इतिहास और पगला घोड़ा नाटक खुदकुशी के आसपास ही घूमते हैं, वहीं मिछिल, भूमा और बासी खबर पर मौत के ईर्द-गिर्द घूमते हैं). आम लोगों को लेकर आपकी इतनी निराशावादी सोच क्यों थी बादल दा? आपको लोग हमेशा अंधेरे में ही क्यों दिखते थे. आमलोगों के बारे में यह एकतरफा सोच कोई बुर्जुआ ही रख सकता है. और यह बात भी सही है कि आपने आमलोगों पर बुर्जुआ समस्याओं और उसकी मानसिकता (साइकोलॉजी) को थोप दिया था.

जो लोग आपके नाटकों को क्रांतिकारी साबित करने पर तुले हुए हैं उन्हें क्या समझ में नहीं आता कि आपके नाटक असंगति (एब्सर्डिटी), घिनौनेपन (सॉरडिडनेस) और भ्रम (कन्फ्यूजन) की बेतरतीब जोड़-तोड़ पर टिके हुए हैं (जो आप भी कुछ हद तक स्वीकार करते थे). ऐसा भ्रम जिसमें सार्थक जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती. बिना सार्थक और सुंदर जीवन की कल्पना किए हुए कोई क्रांति के बारे में कैसे सोच सकता है? बेतरतीब जोड़-तोड़ भ्रम पैदा करती है, क्रांति नहीं लाती बादल दा.

हां, आपके नाटक जुलूस (मिछिल) में कुछ क्रांतिकारी-सा दिखा था, जब आम आदमी जुलूस से जुड़ता है. लेकिन उस जुलूस की विडंबना तो यह है कि आपका आम आदमी जुलूस में क्रांति के लिए नहीं जुड़ता, बल्कि उसकी खोज एक सच्चे आत्म तक सीमित कर दी जाती है. आपका जुलूस एक मरी हुई प्रतिमा जैसा है, जो न तो हमला करती है और न ही उसे किसी वर्ग शत्रु से कोई लेना देना है. आखिर आपका जुलूस किसके खिलाफ था? उससे भी बड़ी विडंबना है- जुलूस के लिए इंतजार करना. आपका आम आदमी जुलूस के लिए इंतजार करता है, सैमुअल बेकेट के वेटिंग फॉर गोदो की तरह. मिछिल ने मुझे यह भी आभास करा दिया था कि आप एक ही साथ में बोअल और बेकेट थे. जब मैंने देखा कि आपका चरित्र खोका, राज्य की एजेंसियों द्वारा बार-बार मारे जाने के बाद उठ कर लड़ने के बजाय जीने की आशा ही छोड़ देता है तो आम लोगों को लेकर आपकी अंधेरी और गहरी निराशा साफ दिखी. उसमें एक बूढ़े का प्रकट होना और खोका से कहना कि वह सच्चे आत्म की तलाश करे- यह क्रांतिकारी कम और किसी पुरोहित का उपदेश ज्यादा लगता है. वैसे भी आपके नाटक ईसाइयों के पाप प्रायश्चित करनेवाले नाटकीय कर्मकांडों से ज्यादा प्रभावित लगते हैं. अन्याय का भुक्तभोगी उत्पीड़ित कोई पापी नहीं होता, जिसके लिए उसे अपने ऊपर प्रायश्चित करना पड़े.

आपका आम आदमी हमेशा अपने आपको कोसता हुआ मर जाता है, या पागल हो जाता है. एक हद तक जबरन मान भी लूं कि कुछ चीजों के लिए आम आदमी जिम्मेवार है, लेकिन सब कुछ उसी पर डाल देना कहां तक उचित था? कब तक आम आदमी आपके बेहूदे सवाल ‘मैं कौन हूं’ और ‘मैं क्यों हूं’ की जद्दोजहद में जीता रहेगा? जबकि उसे पता है कि वह कौन है, उसका वर्ग क्या है और उसका (वर्ग) दुश्मन कौन है. शासक वर्ग कौन है. क्या मैं जान सकता हूं आपके आम आदमी का वर्ग क्या था बादल दा? क्या आपने भोमा पर अपने खुद के वर्ग की मानसिकता (साइकोलॉजी) और विचारधारा नहीं थोप दिया था? यह कौन-सी नीतिपरकता थी?

मुझे आपके नाटक की बुनावट बहुत अच्छी लगती थी. वह काफी निजी और अपने में दर्शक को रमा लेने वाली होती थी. लेकिन मुझे निराशा तब होती है जब आपकी सारी राजनीति इस रमा लेने के आकर्षण में ही खत्म हो जाती है. क्रांति खिलवाड़ में खत्म हो जाती है. आपके यहां आकर्षण एक विमर्श बन कर रह जाता है. मुझे आज भी लगता है कि आप चाहते तो इसे एक शानदार और क्रांतिकारी दिशा में मोड़ सकते थे. लेकिन आपको जटिलता की सनक थी. आपको किसी भी क्रांतिकारी समाधान से परहेज था. आपने अपने नाटकों को इस तरह बुना कि उनसे क्रांति की हर एक गुंजाइश खत्म हो जाए. यहां पर कुछ लोग कहेंगे कि समाधान देना रंगमंच का मकसद नहीं होना चाहिए, लेकिन लोगों को भारी भ्रम और हताशा में डालना, लोगों को निराश बना कर छोड़ देना और हर क्रांतिकारी समाधान की संभानवाओं को नाटकों में से खत्म कर देना कैसी क्रांतिकारिता और नीतिपरकता है? और फिर, क्या एक क्रांतिकारी समाधान नहीं देना भी अपने आप में समाधान देना नहीं है? दुख की बात तो यह है कि आपके द्वारा दिये गये समाधान लोगों को अपने विनाश और पीड़ा की एक अनंत और अंधेरी कोठरी में बंद कर देते हैं. बादल दा, मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आप अपने नाटकों में आम लोगों के लिए वही कुछ गिने-चुने ही समाधान छोड़ते थेः वह जहर खा ले, फांसी लगा ले, पागल हो जाए, या कम से कम क्रांतिकारी रास्ते से भटक ही जाए. और आदमी यह सब इसीलिए करे कि उससे आम आदमी की समस्याओं को मान्यता मिलेगी. बचपन में एक कहानी पढ़ा करता था कि कैसे अपने बारे में अखबार में छपवाने के लिए आदमी कार के नीचे आ गया था. आपके नाटक हर बार उस कहानी की याद दिला देते हैं. फांसी लगा लेना या खुदकुशी करने से राज्य आम लोगों की समस्याओं को मान्यता नहीं दे देता. और मान्यता मिल जाने से समस्या का हल नहीं हो जाता. ऐसा ही होता तो हमारे देश के किसानों की समस्याएं कब की हल हो गयी रहतीं. हो सकता है कि आप मध्यवर्ग से उन समस्याओं की मान्यता दिलवाना चाहते थे, यह जानते हुए भी कि आपका भद्रलोक मध्यवर्ग नाटक के चरित्र को मान्यता तो दे सकता है कि लेकिन वह ‘अभद्र’ आम आदमी के अस्तित्व को ही नहीं स्वीकारता. और वैसे भी आप कमोबेश 40 साल में किस वर्ग की किस समस्या को मान्यता दिलवा पाए? विषय को मान्यता दिलवाने का आपका यह तरीका हास्यास्पद ही नहीं, अनैतिहासिक भी था.

आपके नाटक के बारे में कहा जाता है कि आपके नाटक क्रांतिकारी थे, राज्य विरोधी और सत्ता विरोधी थे. जब राज्य और सत्ता विरोधी ही थे तो उनके खिलाफ आम लोगों के खड़े होने की आपने हिमायत क्यों नहीं की. कौन-सा क्रांतिकारी रंगमंच या सौंदर्यशास्त्र इसकी इजाजत नहीं देता? और फिर जो लोग सत्ता विरोधी थे, राज्य विरोधी थे, उनसे आपने अपने नाटकों में लगातार पश्चाताप क्यों करवाया है? नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान या उसके पहले के इतिहास में लोगों ने ऐसी कौन-सी गलती की थी, ऐसा कौन-सा पाप किया था, जिसका पश्चाताप उनको पूरे नाटक के दौरान करना पड़ता था. अपने आपको छोटी-छोटी गलतियों के लिए कोसते रहना पड़ता था. और अगर वह पश्चाताप आत्मालोचना थी तो उसका उत्तर लोगों का संघर्ष और क्रांति क्यों नहीं थी बादल दा?

अगर आपके नाटकों का दार्शनिक विश्लेषण किया जाए जो वह दो तरह के दर्शन का नेतृत्व करता है. पहला तो अस्तित्ववाद है, जिसका कुछ लोगों ने उल्लेख किया है. लेकिन आपका अस्तित्ववाद सार्त्र और सिमोन द बोउवार का अस्तित्ववाद नहीं बल्कि सैमुएल बेकेट और नीत्शे का अस्तित्ववाद है. आपके नाटकों का दूसरा दर्शन उत्तर आधुनिकता है, जो उसी अस्तित्ववाद का विस्तार है और रिचर्ड शेसनर (Richard Schechner) से प्रभावित है. बाद में इसकी अधिक पुष्टि तब हो गयी जब पता लगा कि आपका काम उसी उत्तर आधुनिक परफॉर्मेंस स्टडीज के विद्वान रिचर्ड शेसनर से प्रभावित था.

आपने एक इंटरव्यू में कहा था कि ‘बहुत लोगों को लगता है कि मेरा नाटक ब्रेख्त से प्रभावित है, लेकिन मेरा नाटक ब्रेख्त से प्रभावित नहीं है.’ बता नहीं लोगों को आपके नाटक के बारे में ऐसा भ्रम क्यों था. शायद ऐसा उन्हीं को लगता होगा जो आपको क्रांतिकारी मानते हैं. आपका काम ब्रेख्त से दूर दूर तक प्रभावित नहीं लगता. आपका मिछिल हमेशा वेटिंग फॉर गोदो की याद दिलाता रहा और भोमा रिचर्ड शेसनर के एब्सर्ड थिएटर की. आप भारत के बेकेट थे और भारतीय रंगमंच के सभी उत्तर आधुनिकतावादियों के पितामह थे. दूर-दूर तक आप ब्रेख्त नहीं थे.

बादल दा, आपकी कुछ-कुछ निजी प्रतिबद्धताएं बहुत अच्छी लगी थीं. आपने जिस तरह पद्म विभूषण लेने से इनकार कर दिया था, आप ऐसे समय कोलकाता में रंगमंच करते रहे जब इप्टा मुंबइया सिनेमा का भर्ती दफ्तर बन गया था और बहुत सारे प्रगतिशील कलाकार व्यावसायिक उद्योग की ओर रुख कर रहे थे. कलाकार कारपोरेट के पैसे के लिए हाथ फैलाये खड़े थे, तब आपने जमीन से जुड़ाव और सादगी का परिचय देते हुए भारतीय रंगमंच का सिर ऊंचा किया. आपका सरोकार तब और भी अच्छा लगा जब बहुत सारे भद्रलोकी कलाकार ऐतिहासिक रूप से बेशर्म, पथभ्रष्ट और फासीवादी वामपंथ के साथ खड़े थे और पूरी बेशर्मी से भारतीय राज्य द्वारा शुरू किए गए ऑपरेशन ग्रीन हंट का समर्थन कर रहे थे, तब आप क्रांतिकारी गदर के साथ जुलूस में खड़े थे. आपका ऐसे कई जुलूसों में शामिल होना ही साबित करता है कि लोग जुलूस का इंतजार नहीं करते, लोग जुलूसों का नेतृत्व करते हैं. आपके जीते जी इतिहास ने आपके नाटकों को बार-बार गलत साबित कर दिया था बादल दा. क्या अपनी वह ऐतिहासिक भूल आप समझ पा रहे थे बादल दा?
इस बार फरवरी में जब मैं लंदन लौटने की तैयारियां कर रहा था, तो दिल्ली में आपका एक नाटक अंत नहीं देखा. कुछ लोग कह रहे हैं कि आपका जाना एक युग का अंत है. मैं इसे क्या समझूं बादल दा, ‘अंत नहीं’ या ‘एक युग का अंत’? देखो, इस बाद कन्फ्यूज करने की कोशिश नहीं करना बादल दा. ऐसे भी मैं आपके कन्फ्यूजन से बाहर आ गया हूं.

क्या अब मैं आपके जवाब का इंतजार करूं?

तिरुपुर में मजदूरों की आत्महत्याओं पर एक रिपोर्ट

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/10/2011 07:20:00 PM

तमिलनाडू का तिरुपुर निर्यात के लिए तैयार किए जानेवाले अपने ब्रांडेड कपड़ों के उत्पादन के लिए जाना जाता है. लेकिन पिछले कुछ समय में तिरुपुर की फैक्टरियों में मजदूरों की आत्महत्याओं का उत्पादन हो रहा है. अमानवीय उत्पीड़न और शोषण की इस दास्तान का ताना-बाना जिन रेशों से बुना गया है, उनकी पहचान करने के लिए कुछ छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक टीम मार्च के पहले हफ्ते में तिरुपुर गई थी. इस यात्रा के दौरान टीम ने जो कुछ देखा और वह जिन नतीजों पर पहुंची है, उसे एक रिपोर्ट की शक्ल में जारी करने वाली है. इसका विवरण नीचे है. साथ में, हम इस रिपोर्ट का एक हिस्सा भी प्रस्तुत कर रहे हैं.

तिरुपुर रिपोर्ट को जारी किए जाने के मौके पर 
वहां हो रही आत्महत्याओं के बारे में चर्चा के लिए
 आमंत्रण
स्थान : गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली (आईटीओ के नजदीक)
समय : 22 मई, 2011, 11 बजे दिन से 3 बजे तक
पिछले दिनों तिरुपुर से स्तब्ध कर देने वाली खबरें आई हैं। वहां सैकड़ों की संख्या में मजदूरों ने आत्महत्याएं की हैं। यहां की हालत कुछ दूसरी ही है। यह विफलता का मारा विदर्भ का कपास उत्पादक उजाड़ क्षेत्र नहीं, बल्कि कामयाबी से भरा दमकता तिरुपुर है जो कपड़ा उत्पादक हब के रूप में जाना जाता है। और ऐसी समृद्‌ध जगह में मजदूरों की आत्महत्या का सिलसिला चल रहा है। मार्च महीने में एक फैक्ट फाइण्डिंग टीम तमिलनाडु के तिरुपुर गई थी। उसने कुछ तथ्यों को इकट्‌ठा किया है। हम जिन नतीजों पर पहुंचे हैं और हमारे जो अवलोकन रहे हैं, उन्हें हम आपके साथ साझा करना चाहते हैं।
   
हम आपको चर्चा के लिए आमंत्रित करते हैं। हम आपके सक्रिय भागीदारी की आशा करते हैं।

संतोष कुमार
कमिटी ऑफ कनसर्न्ड सीटिजन-स्टूडेन्ट्‌स एण्ड यूथ की ओर से

महिलाओं के अंतहीन उत्पीड़न की सुमंगली योजना
संतोष कुमार

तमिलनाडु स्थित तिरुपुर कपड़ा उद्योग का फलता-फूलता केंद्र होने के साथ-साथ भूमंडलीकृत नवउदारवादी विश्व आर्थिक व्यवस्था का मॉडल है. यहां से वालमार्ट, फिला, रीबॉक, एडीडास, डीजल जैसे नामी-गिरामी ब्रांडों को यहां से उत्पादों की आपूर्ति की जाती है.

पर इस मॉडल का एक स्याह पक्ष यह  भी है कि पिछले दो सालों (2009-2010) के दौरान यहां 1,050 से भी ज्यादा आत्महत्याएं हुई हैं, जिनमें से अधिकतर फैक्टरी मजदूरों की हैं. जिस शहर को कभी डॉलर सिटी और निटवियर कैपिटल कहा जाता था, उसे आज आत्महत्याओं की राजधानी के रूप में जाना जाने लगा है.अकेले 2010 में ही 565 आत्महत्याएं हुई हैं.

एक तरफ 12000  करोड़ रुपयों के साथ निर्यात का सफलतम मॉडल और दूसरी तरफ प्रतिदिन तकरीबन बीस मजदूरों द्वारा आत्महत्या या आत्महत्या करने की कोशिश. शायद यह नवउदारवादी विश्व आर्थिक व्यस्था के अमानवीय परिणाम का भी मॉडल है, जिसमें हरेक डॉलर का मुनाफा किसी मजदूर के खून से सना है.

इन सारी स्थितियों को समझने के लिए एक फैक्ट फाइंडिंग टीम ने मार्च के पहले हफ्ते में तिरुपुर का दौरा किया. टीम ने तिरुपुर में चल रही सुमंगली योजना का जायजा लिया है. इसमें पता चला कि  मजदूरों की भलाई के नाम पर चल रही यह योजना किस तरह उनके और अधिक तथा गहरे शोषण के एक औजार के रूप में काम कर रही है.

दुनियाभर में कैंप कुली लेबर व्यवस्था को मजदूरों के आवास संबंधी सवाल का सबसे बुरा रूप माना जाता है. इस व्यवस्था में मजदूरों को कारखाने द्वारा या कारखाने में उपलब्ध होस्टल में रखा जाता है. यह व्यवस्था मालिकों को बहुत प्रिय है, क्योंकि इसकी खासियत है- मजदूरों से 12 या उससे ज्यादा घंटे काम कराया जाना, कम मजदूरी की अदायगी, किसी भी तरह के मनोरंजन से वंचित रखना, बाहर निकलने या अपनी मरजी से कहीं आने-जाने या किसी से मिलने-जुलने पर पाबंदी, हर समय मजदूरों को सुरक्षा गार्डों या मालिकों के आदमियों की नजर में रखा जाना, जिससे उनकी आजादी पर ही पहरा लग जाता है. इन्हीं वजहों से बहुत सारे श्रमिक कार्यकर्ता और अध्ययनकर्ता इस व्यवस्था को जेल लेबर कैंप और बंधुआ लेबर व्यवस्था भी कहते हैं.

तिरुपुर में कपड़ा मिल मालिकों ने एक बहुत ही ’आकर्षक’ योजना के तहत 14 से 19 वर्ष की किशोरियों के लिए इसी तरह की व्यवस्था तैयार की है, जिसे सुमंगली योजना के नाम से जाना जाता है. रोचक बात यह है कि इस योजना को भारतीय समाज के एक घटिया चलन दहेज को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया है. इस योजना को 15 से 19 वर्ष की ग्रामीण और गरीब लड़कियों के लिए बनाया गया है, जो अपनी गरीबी की वजह से दहेज नहीं जुटा पातीं और उनकी शादी नहीं हो पाती.

ग्रामीणों की यह मजबूरी मिल मालिकों के लिए वरदान साबित हो रही है. मिल मालिक किशोरियों की ऊर्जा और कुशलता, जो कपड़ा उद्योग के लिए खासा महत्व रखती है, का अबाध शोषण कर अथाह मुनाफा बटोर रहे हैं. इस योजना में शामिल लड़कियों को कारखाने द्वारा उपलब्ध कराये गये होस्टल या कारखाने में ही 24 घंटे सुरक्षा गार्डों के निरीक्षण में रखा जाता है. इस योजना के तहत एक अनुबंध पर मालिकों, अभिभावकों और महिला मजदूरों के बीच हस्ताक्षर किया जाता है.

कई सारी अमानवीय शर्तों वाले इस अनुबंध में सामान्यतः तीन साल के अंत में 30 से 50 हजार के बीच एक तयशुदा राशि देनी तय होती है. कारखाने में नौकरी के लिए भरती होते समय उन्हें एक पारिवारिक सामूहिक फोटो देना होता है और करार की पूरी अवधि के दौरान उस फोटो में शामिल लोगों के अलावा वे किसी से नहीं मिल सकती हैं. इसमें काम के बाद लड़कियों का होस्टल से जाना मना होता है. वे अपने अभिभावकों से भी एक नियत समय पर ही मिल सकती हैं, जो सामान्यतः महीने में सिर्फ दो घंटा होता है. इसके लिए भी पहले अभिभावकों को मालिकों से अनुमति लेनी होती है.

ये महिला मजदूर महीने में केवल चार घंटे के लिए बाजार जाकर अपनी जरूरत का सामान खरीद सकती हैं और वह भी महिला सुरक्षा गार्डों की निगरानी में, जो उनकी हर गतिविधि पर नजर रखती हैं. साल में एक बार पोंगल या दीवाली की छुट्टी में वे 4-5 दिन के लिए घर जा सकती हैं. उन्हें इस अवधि के भीतर ही वापस कारखाने लाने की जिम्मेदारी उन बिचौलियों की होती है, जिनके माध्यम से उन्हें कारखाने में नौकरी मिली होती है. तयशुदा समय में वापस न आने पर बिचौलिये का कमीशन और महिला मजदूरों की तयशुदा रकम का न दिया जाना आम बात है.

शोषण का यह खेल यहीं खत्म नहीं होता. तीन सालों की अवधि के दौरान अगर कुछ भी नियत अनुबंध से इतर होता है तो मालिक पूरी तयशुदा राशि ही हड़प लेते हैं. इसके लिए मिल मालिक अक्सर विभिन्न तरकीबें अपनाते हैं. मजदूरों और उनके परिजनों से बातचीत करने पर फैक्ट फाइंडिंग टीम  को   एक तरकीब का पता लगा जिसके तहत ढाई या पौने तीन साल होने पर मिल मालिक घर के अभिभावकों को यह पत्र लिखते हैं कि उनकी बेटी का किसी साथी पुरुष मजदूर से शारीरिक संबंध है या इसी तरह की कुछ और ऊल-जुलूल बातें.

ऐसी चिट्ठी पाने के बाद ज्यादातर मामलों में अभिभावक अपनी बेटियों को वापस ले जाते हैं और  करार की शर्तों को तोड़ देने का बहाना बनाकर मालिक सारी राशि का गबन कर लेता है. इस योजना के बारे में मालिकों की तरफ से दावा किया जाता है कि महिला मजदूरों को अच्छा खाना, रहने की अच्छी व्यवस्था, औद्योगिक प्रशिक्षण और करार के अंत में शादी के लिए मोटी रकम और रोजाना के खर्चों के लिए अलग से स्टाइपेंड मुहैया करायी जायेगी. पर वास्तव में होता इसके बहुत उलट है.

करार की लुभावनी दिखने वाली हवाई शर्तों की ओट में महिला मजदूरों को बोनस, ईपीएफ, ईएसआई जैसे बुनियादी अधिकारों से तो वंचित किया ही जाता है, लड़कियों को रहने के लिए मुहैया कराये गये होस्टलों में स्वास्थ्य संबंधी कोई सुविधा नहीं होती है. यह पूरी योजना अप्रेंटिसशिप योजना के तहत चलायी जाती है, जिसमें एक नियत समय के लिए ही प्रशिक्षण के बाद नौकरी का प्रावधान है.

सुमंगली योजना के तहत लड़कियों की भरती के लिए कारखाना मालिकों ने मजदूर बिचौलियों का एक बहुत ही मजबूत नेटवर्क फैला रखा है.यह नेटवर्क आर्थिक रूप से पिछड़े दक्षिणी तमिलनाडु के जिलों मदुरै, थेनी, दिंदुगल एवं तिरुवन्नवेली के गांवों में पोस्टर, नोटिस एवं अखबारों में विज्ञापनों एवं अपने संपर्कों के जरिये काम करता है. लड़कियों को काम के लिए तिरुपुर लाने के लिए ये बिचौलिये गांव में इस योजना को बहुत ही खूबसूरती से पेश करके अभिभावकों को झांसा देते हैं. बिचौलिये मुख्यतः उन गरीब घरों पर नजर रखते हैं, जिनमें माता-पिता में से किसी एक का या दोनों का निधन हो गया हो, जिन परिवारों में पिता शराबखोरी करता हो या वैसे गरीब परिवार जिनमें बहुत सारी बेटियां हों.इन परिवारों से लड़कियों को कारखाने में ले आना आसान होता है.

कम मजदूरी, अमानवीय कार्यदिवस, बुनियादी अधिकारों का हनन, मनोरंजन का अभाव, शारीरिक एवं मानसिक शोषण के अलावा यौन शोषण ऐसे पहलू हैं जो इस सुमंगली योजना के तहत काम करनेवाली लड़कियों का जीवन दूभर करती हैं. 13 अक्तूबर, 2010 से 16 अक्तूबर, 2010 के बीच ’न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ के चेन्नई संस्करण में सुमंगली योजना के तहत काम करनेवाली महिला मजदूरों के शारीरिक-मानसिक एवं यौन शोषण की रिपोर्टिंग विस्तृत रूप से की गयी है. इन रिपोर्टों के अनुसार 19 साल से कम उम्र की इन लड़कियों का ठेकेदारों, सुपरवाइजरों, सुरक्षा गार्डों और साथी मजदूरों द्वारा शारीरिक शोषण की बहुत सारी घटनाएं पायी गयी हैं.

कई बार ऐसी घटनाओं में महिला मजदूरों की मौत तक हो जाती है या वे आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाती हैं. पुलिस इन मौतों को दुर्घटना का रूप देने की भरपूर कोशिश करती है. एक रिपोर्ट के अनुसार पांडिश्वरी में तिरुपुर के एक सेंटमिल में काम करनेवाली 17साल की एक महिला मजदूर (लोगों का कहना है कि वह महज 12 साल की ही थी) की 3 दिसंबर को हुई रहस्यमयी मौत के बारे में सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि लड़की की मौत का कारण उसका लगातार यौन शोषण किया जाना था. दिंदुगल में हुए पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में भी यह सामने आया कि लड़की गंभीर यौन शोषण का शिकार हुई थी.

इस मामले से जिले में हुई आत्महत्या की अनेक घटनाओं के बारे में नये सिरे से संदेह पैदा होने लगे हैं. सामाजिक संगठनों का कहना है कि अधिकतर आत्महत्याएं कारखानों और काम की जगहों पर यौन शोषण की वजह से होती हैं. महिलाओं को दोहरा उत्पीड़न झेलना पड़ता है. जब वे इन घटनाओं का विरोध करती हैं या ठेकेदारों, सुपरवाइजरों, सुरक्षा गार्डों और साथी मजदूरों को मनमानी से मना करती हैं , तो ऐसे में  बहाना बना कर नौकरी से निकाल दिया जाना और तयशुदा रकम का न दिया जाना आम बात है. नतीजतन अधिकतर महिलाएं जो इस योजना के सुनहरे प्रचार को देखकर भरती होती हैं, वे अंत में स्वास्थ्य,आत्मसम्मान, गरिमा और इज्जत को खोकर गरीबी के उसी कुचक्र में वापस लौट जाती हैं.

गद्दाफी, साम्राज्यवाद और लीबिया की जनता की मुक्ति का सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/10/2011 05:34:00 PM

हुस्नी मुबारक जहां शुरू से ही अमेरिका के पिछलग्गू थे वहीं गद्‌दाफी काफी समय तक अमेरिका के आंख की किरकिरी बने हुए थे। लंबे समय तक उस क्षेत्र में लीबिया अकेला ऐसा देश था जो अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज उठाता था। इराक की घटनाओं के बाद गद्‌दाफी के रुख में तब्दीली आयी लेकिन वह कभी भी गद्दाफी पर पूरा भरोसा नहीं कर सका। अभी लीबिया में असंतोष की स्थिति देखकर अमेरिका सहित अनेक पश्चिमी देश इस आस में हैं कि इस उथल-पुथल में ही शायद गद्‌दाफी का कोई विकल्प तैयार हो जाय। अमेरिका की रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र 'रिवोल्यूशन' ने प्रमुख बुद्धिजीवी रेमण्ड लोट्‌टा से बातचीत की जिसके विशेष अंश प्रस्तुत हैं. यह बातचीत लीबिया पर अमेरिकी हमले से पहले की गई थी.

हम आज ऐसे समय आपसे बातचीत कर रहे हैं जब मुअम्मर गद्दाफी द्वारा लीबिया के जनविद्रोह का बर्बरता से दमन किया जा रहा है। मिस्र में जनविद्रोह और जाहिर तौर पर सेना के बढ़ते दबाव के कारण मुबारक की सरकार को हटना पड़ा। इसलिए आज लोगों के दिमाग में सबसे बड़ा सवाल यह है कि लीबिया और मिस्र की घटनाओं में किस तरह की समानताएं और भिन्नताएं हैं।

बातचीत शुरू करने के लिए यह सही मुकाम है। लीबिया का विद्रोह लीबियाई समाज में व्याप्त जबर्दस्त असंतोष की अभिव्यक्ति है। लीबियाई समाज के व्यापक हिस्से ने ट्‌यूनीशिया और मिस्र से प्रेरणा लेते हुए एक उत्पीड़क शासक के खिलाफ विद्रोह किया है। यह विद्रोह साम्राज्यवादियों के प्रभुत्व वाले समूचे मध्य पूर्व के देशों में आई लहर का एक हिस्सा है।
 
लेकिन जब मिस्र के साथ लीबिया की आप तुलना करेंगे तो दो खास फर्क दिखायी देगा। पहली बात तो यह कि लीबिया में ऐसी स्थिति है जहां साम्राज्यवादी साजिशें एक न्यायोचित ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में लीबिया की घटनाएं जनविद्रोह के साथ घुलमिल गयी हैं। इसकी वजह से स्थितियां काफी जटिल हो गयी हैं। जहां तक मिस्र की बात है यहां जनता का विद्रोह पूरी तरह अमेरिका द्वारा समर्थित शासन के खिलाफ था। मिस्र की सेना में नेतृत्व और ढांचे के अंतर्गत अमेरिकी साम्राज्यवाद का एक विश्वसनीय आधार था। यहां की सेना को अमेरिका ने प्रशिक्षित किया था और इसने ही इसे हथियारों से पूरी तरह लैस भी किया था। इसलिए मिस्र में स्थिरता लाने का अमेरिका का प्रयास खुद उसके हित में था। मेरे कहने का मतलब यह है कि वह राज्य के उस ढांचे के भीतर ही स्थिरता लाने की कोशिश कर रहा था ताकि मध्य पूर्व में मिस्र को वह अभी भी अपने प्रभुत्व के अंतर्गत बनाए रख सके। इसके अलावा मिस्र में अमेरिका का बड़े पैमाने पर और प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक हित जुड़ा हुआ था।

मिस्र के विद्रोह से जो नतीजे निकलने चाहिए थे उस पर अब रोक लग गयी है। जनता के अंदर विरोध अभी भी है और लोग इस बहस में लगे हैं कि इस विद्रोह से क्या हासिल हुआ और क्या हासिल नहीं हुआ। अभी भी मिस्र पर अमेरिकी साम्राज्यवाद की पकड़ बनी हुई है और उसकी काफी पूंजी वहां स्थित है। लीबिया का मामला इससे भिन्न है। लीबिया का सैनिक तंत्र ऐसा नहीं है जिसका अमेरिका के साथ इतना घनिष्ठ संबंध हो। लीबियाई राज्य का ढांचा - और इससे मेरा तात्पर्य प्रमुख मंत्रालयों तथा सुरक्षा तंत्रों से है - टूट रहा है और विद्रोह के फलस्वरूप तथा साम्राज्यवादी दबाव के कारण इसमें दरारें पड़ रही हैं।
 
लीबिया में अमेरिका के उस तरह के व्यापक आर्थिक हित भी नहीं हैं जैसे मिस्र में थे। इसलिए अमेरिका तथा पश्चिमी यूरोप के साम्राज्यवादी देशों के लिए यहां जरूरत और अवसर दोनों पैदा हो गए हैं। ये ताकतें लीबिया में प्रतिपक्ष की ताकतों को यह सोचकर मजबूत बनाने में लगी हैं कि शायद इनमें से ही आगे चल कर कोई पूरी तरह नव औपनिवेशिक शासन का रूप ले ले... अगर ऐसा शासन हुआ तो वह पश्चिमी हितों के लिए ज्यादा उपयोगी होगा। इसीलिए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि विद्रोह के शुरुआती दिनों से ही यहां सक्रिय साम्राज्यवादी ताकतें प्रतिपक्ष की ताकतों को मदद पहुंचा रही हों। इसलिए जैसा कि मैंने कहा लीबिया में सही अर्थों में और एक न्यायपूर्ण जनविद्रोह तो है लेकिन यहां साम्राज्यवादी छल-कपट भी पूरी तरह जारी है। ये ऐसी बातें हैं जिन्हें हमें गहराई से समझना चाहिए और विश्लेषण करना चाहिए।
 
आपने दो प्रमुख अंतर का उल्लेख किया।

बिल्कुल, लीबिया के विद्रोह और मध्य पूर्व के अन्य देशों में हुए विद्रोह के बीच दूसरा जो बड़ा अंतर है उसका संबंध् खुद गद्दाफी से है। यह अंतर वैसा ही है जैसा हुस्नी मुबारक और मुअम्मर गद्दाफी के बीच है। मुझे पता है कि अमेरिका का विदेश विभाग इस बात को नहीं मानेगा जो सीएनएन के जरिए गद्दाफी की एक पागल तानाशाह की छवि बनाने में लगा है... लेकिन दरअसल 1969 में जब गद्दाफी सत्ता में आए तो उन्हें जबर्दस्त जनसमर्थन प्राप्त था। उन्हें यह समर्थन खास तौर पर बुद्धिजीवियों, पेशेवर समूहों और मध्यवर्ग से मिला था। अपने शासन के अनेक वर्षों तक उन्हें यह समर्थन हासिल रहा। लगातार तीन दशकों तक लीबिया में और लीबिया के बाहर लोगों ने गद्दाफी को ऐसे व्यक्ति के रूप में मान्यता दी जो वास्तविक राष्ट्रीय हितों के पक्ष में खड़ा हो, जो साम्राज्यवाद के विरोध में आवाज उठा रहा हो और जिसने फिलिस्तीन पर इजराइली कब्जे का विरोध किया हो।
 
और यही सच्चाई भी थी। कई वर्षों तक गद्दाफी साम्राज्यवाद के और खास तौर पर अमेरिकी साम्राज्यवाद के आंख की किरकिरी बने रहे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1986 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन ने लीबिया के दो सबसे बड़े शहरों पर बमबारी की थी, गद्दाफी की हत्या का प्रयास किया था और इस बमबारी में  गद्दाफी की एक बेटी की मृत्यु हुई थी। गद्दाफी मिस्र के हुस्नी मुबारक की तरह साम्राज्यवादियों की जी-हुजूरी नहीं कर रहे थे हालांकि उन्होंने मूलभूत तौर पर न तो कभी साम्राज्यवाद से संबंध तोड़ा और न उसे चुनौती दी।
 
उनकी इन खूबियों की वजह से हमें लीबिया और गद्दाफी के इतिहास में जाने की जरूरत महसूस होती है। क्या आप इनकी पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताएंगे।

वस्तुतः दूसरे विश्व युद्ध के बाद तक लीबिया का अस्तित्व किसी एकात्मक राज्य की तरह नहीं था। इसे 1951 में औपचारिक तौर पर आजादी मिली। सन्‌ 1500 वाले दशक के उत्तरार्ध में तुर्की के ऑटोमान साम्राज्य का वह हिस्सा था जिसे आज हम लीबिया कहते हैं। 1910 में इतालवी साम्राज्य ने लीबिया को अपना उपनिवेश बनाया। लीबिया उत्तरी अफ्रीका में भूमध्यसागर के तट पर स्थित है और यह सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इटली ने जिस समय साम्राज्यवादी रुख अखितयार किया, उस समय तक अन्य औपनिवेशिक ताकतें इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुकी थीं। ब्रिटेन ने मिस्र पर शासन शुरू कर दिया था। फ्रांस ने अल्जीरिया को अपना उपनिवेश बना लिया था।
 
1911 से 1943 तक लीबिया पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए इटली ने अनेक बर्बर तरीकों का इस्तेमाल किया। इतिहासकार अब्दुल लतीफ अहमिदा ने 20वीं शताब्दी के अत्यंत बर्बर औपनिवेशीकरण के रूप में इसका उल्लेख किया है।
 
दूसरे विश्वयुद्ध में इटली को पराजय मिली। युद्ध के बाद अमेरिका और ब्रिटेन ने लीबिया में सम्राट इद्रीश के संवैधनिक राजतंत्र को मदद पहुंचानी शुरू की क्योंकि उनका रुझान पश्चिमी देशों की ओर था। सम्राट इद्रीश ने अमेरिकी वायुसेना को 'व्हीलस एयरबेस' बनाने की इजाजत दी। किसी अन्य देश में अमेरिका का यह सबसे बड़ा सैनिक अड्‌डा था और इसका इस्तेमाल वह सैनिक प्रशिक्षण, मिसाइल प्रशिक्षण और अपने युद्धक विमानों को तरह-तरह के प्रशिक्षण देने के लिए इस्तेमाल करता था।
 
लेकिन लीबिया तो एक प्रमुख तेल उत्पादक देश भी था?

दरअसल लीबिया में 1959 में विशाल तेल भंडारों का पता चला। इसके बाद अमेरिका और यूरोप की कंपनियों ने बड़े पैमाने पर वहां प्रवेश किया। बैंकिंग के क्षेत्र में भी तेजी से विकास हुआ- खास तौर पर भूमध्यसागर में तेल की पाइपलाइन बिछाने के बाद इस काम में काफी तेजी आयी। 1960 के दशक में तेल से मिलने वाले राजस्व में जबर्दस्त वृद्ध हुई लेकिन इस आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशी तेल कंपनियों की झोली में चला जाता था। जो बचा रहता था वह लीबिया के अभिजात वर्गों के हाथ में पहुंचता था जो उसे व्यापार, बैंकिंग तथा सट्‌टेबाजी में लगाते थे। आम आदमी की गरीबी में कोई कमी नहीं आयी। तेल कंपनियों के साथ अपने संबंध के कारण जो नया मध्यवर्ग विकसित हो रहा था उसके अवसर भी बहुत सीमित थे। इसलिए सम्राट इद्रीश के शासन के खिलाफ जनता में असंतोष बढ़ता जा रहा था।

यह ऐसा दौर था जब क्षेत्रीय और विश्व घटनाओं का असर भी दिखायी देने लगा था। 1967 में इजराइल ने अमेरिका के समर्थन से मिस्र और सीरिया पर हमला किया। लीबिया में छात्रों, बुद्धिजीवियों और मजदूरों ने इन हमलों के खिलाफ हड़तालें की। वियतनाम में अमेरिका द्वारा छेड़े गये युद्ध के खिलाफ भी विरोध तेज होता जा रहा था। पश्चिमी देशों के सामने लीबिया सरकार द्वारा पूरी तरह घुटने टेकने के खिलाफ भी जनता के अंदर असंतोष बढ़ रहा था।
1960 के दशक में ही एशिया, लातिन अमेरिका और अफ्रका में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों की लहर आ गयी थी जो साम्राज्यवाद और उसकी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को दहला रही थी। इन घटनाओं ने समूची दुनिया में लाखों लोगों को प्रतिरोध की प्रेरणा दी। यही वह दौर था जब लीबिया में भी एक नयी राष्ट्रवादी भावना असर कर रही थी और साम्राज्यवाद के खिलाफ अरब एकता का विचार मजबूती से अपनी जगह बना रहा था। यही वह समय था जब क्रांतिकारी चीन सामाजिक शक्तियों को प्रभावित कर रहा था और वैचारिक विमर्श में मार्क्सवाद-लेनिनवाद को महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ था। अमेरिका के इस तरह घिर जाने से उन विभिन्न वर्ग शक्तियों को भी एक नया अवसर मिला जिन्हें अब तक साम्राज्यवाद ने दबा कर रखा था। उन्हें नयी संभावनाएं दिखायी दी।
 
तो यहां से गद्दाफी का प्रादुर्भाव हुआ?

बिल्कुल। गद्दाफी उन युवा सैनिक अफसरों की जमात में थे जो मिस्र के नेता गमाल अब्दुल नासिर के पैन-अरबवाद और सामाजिक सुधारवादी विचारों से काफी प्रभावित थे। गद्दाफी मरुस्थल में बसने वाले गरीब आदिवासी कबीले के थे और इनके साथियों में बहुत सारे ऐसे अफसर थे जो निम्नवर्गीय पृष्ठभूमि के थे। लीबिया के समाज में सेना उन गिनी-चुनी संस्थाओं में से थी जहां इन जैसे लोगों को प्रशिक्षण और कुछ करने का अवसर मिल पाता था। सेना के इन युवा अफसरों के अंदर भ्रष्टाचार और सत्ता की घुटनाटेकू नीति को लेकर काफी असंतोष था। वे खुद को नए लीबिया के हिरावल समझते थे। 1969 में उन्होंने सम्राट इद्रीश के खिलाफ सैनिक विद्रोह किया और एक रिवोल्यूशनरी कमांड कौंसिल बना कर इसके तहत नयी सरकार का गठन किया।
 
गद्दाफी की दलील थी कि लीबिया की राष्ट्रीय संप्रभुता को बेच दिया गया है और विदेशी पूंजी को इस बात की इजाजत दे दी गयी है कि वह लीबिया की जनता पर हुकूमत करे। उन्होंने पुरानी सत्ता पर आरोप लगाया कि इसने तेल से होने वाली आय का महज अपने हित में इस्तेमाल किया है और जनता को बदहाली से निजात दिलाने पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया है। गद्दाफी ने 'व्हीलस एयरबेस' को बंद करने के लिए अमेरिका पर दबाव डाला और कहा कि इसके लिए एक समय सीमा निर्धरित करे। उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। तेल उद्योग में उन्होंने राज्य की प्रमुख हिस्सेदारी तय की। गद्दाफी ने कृषि और उद्योग के विकास का वायदा किया और इन क्षेत्रों के लिए प्रत्यक्ष तौर पर राशि निर्धरित की। 1970 के दशक में उन्होंने जिन सामाजिक कार्यक्रमों को अपनाया उससे अगले 20 वर्षों तक जन साक्षरता, आवास तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में सही अर्थों में काफी विकास हुआ। उनकी इन नीतियों और कार्यक्रमों को जनता का जबर्दस्त समर्थन मिला।
 
लेकिन गद्दाफी के इन सभी साम्राज्यवाद विरोधी नारों के बावजूद उनकी सारी परियोजनाएं लीबिया की तेल आधारित अर्थव्यवस्था को बनाए रखने और इसके विस्तार पर ही टिकी थी। ये परियोजनाएं विश्व पूंजीवादी व्यवस्था में लीबिया के लगातार शामिल रहने और श्रम के विभाजन तथा शोषण के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को बरकरार रखने पर ही टिकी थीं। गद्दाफी अपने तेल के बाजार के लिए पश्चिमी यूरोप पर बुरी तरह निर्भर थे। उन्होंने तेल से मिले पैसों से फ्रांस से जेट विमान खरीदे, निर्माण के क्षेत्र में जर्मनी की पूंजी को आमंत्रित किया और यहां तक कि इटली की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी में पूंजी निवेश करने वाले प्रमुख राष्ट्र का दर्जा हासिल किया। इसके साथ ही इटली को, जिसने लीबिया को काफी समय तक अपना उपनिवेश बना रखा था, इस बात की इजाजत दी गयी कि वह लीबिया में अपना कारोबार जारी रखे।
 
आपने गद्दाफी के कार्यक्रम के आर्थिक आधार पर रोशनी डाली लेकिन उनके कार्यों के अन्य क्षेत्रों के बारे में आपको क्या कहना है?

गद्दाफी ने तेल से होने वाली आय का इस्तेमाल समाज की पुनर्संरचना में किया। वह एक खास राजनीतिक विशिष्टता वाली सामाजिक कल्याण प्रणाली तैयार कर रहे थे। उन्होंने स्थानीय स्तर पर 'जन समितियों' का गठन किया जिसका मकसद अपने राजनीतिक समर्थन को विस्तार देना और केन्द्रीय सत्ता के प्रति आदिवासी समूहों और कबीलों की निष्ठा हासिल करना था। इसके साथ ही उन्होंने मजदूर यूनियनों और स्वतंत्र राजनीतिक संगठनों को गैर कानूनी घोषित कर दिया तथा प्रेस द्वारा सरकार की आलोचना पर लगभग प्रतिबंध लगा दिया। उन्होंने तेल से होने वाली आय का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर सुरक्षा और सैनिक तंत्र को विकसित करने के लिए किया। इसका मकसद सरकार के विरुद्ध आंतरिक विपक्ष का दमन करना था और लीबिया को समूचे मध्य पूर्व तथा अफ्रीका में एक राजनीतिक मॉडल और क्षेत्रीय शक्ति के तौर पर स्थापित करना था।
 
वैचारिक तौर पर देखें तो गद्दाफी के शासन ने सामाजिक कल्याणकारी कार्यक्रमों और पैन-अरबवाद को प्रतिगामी मूल्यों के साथ जोड़कर आगे बढ़ाया। इस्लाम को सरकारी तौर पर राज्य का धर्म घोषित किया गया। महिलाओं को पहले के मुकाबले बेशक ज्यादा अवसर मिले लेकिन पितृसत्तात्मक शरीयत कानून को वैधानिक-सामाजिक संहिता का आधार बनाया गया। गद्दाफी जबर्दस्त रूप से कम्युनिस्ट विरोधी थे और उनका दावा था कि पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच उन्होंने तीसरा रास्ता ढूंढ निकाला है। सच्चाई यह थी कि वह राज्य पूंजीवाद की स्थापना में लगे थे जो तेल से होने वाली आय पर आधरित था और जिसने बाजार, टेक्नॉलाजी, परिवहन और निवेश की जाने वाली पूंजी के लिए विश्व साम्राज्यवाद को गले लगा लिया था।

क्या इसका अर्थ यह माना जाए कि उनकी परियोजनाओं में कुछ भी क्रांतिकारी नहीं था?

गद्दाफी एक परिवर्तन जरूर ला रहे थे लेकिन यह परिवर्तन साम्राज्यवादी प्रभुत्व, पूंजीवादी संपत्ति संबंध और  कबीलाई निष्ठा एवं क्षेत्रीय भेदभाव के जटिल चक्र के ढांचे के अंतर्गत ही हो रहा था। कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे सही अर्थों में साम्राज्यवाद से नाता तोड़ते हुए रूपांतरण की दिशा कहा जाए। कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे महसूस हो कि जनता को कुछ अलग किस्म की राजनीतिक राजसत्ता अथवा नेतृत्व प्राप्त होने जा रहा है जो उन्हें इस योग्य बनाए कि वे सही अर्थों में मुक्ति की दिशा में अपनी अर्थव्यवस्था और अपने समाज का पुनर्गठन कर सकें। बॉब एवेकियन ने दुनिया में 'तीन विकल्पों' के बारे में एक सूत्रीकरण किया था उसे मैं अपने शब्दों में कहूं तो पहले विकल्प के रूप में उनका कहना था कि दुनिया जैसे चल रही है वैसे ही चलने दो। इसे मैं पूरी तरह खारिज करता हूं- यह बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है। दूसरा विकल्प उन्होंने यह कहा कि आप संपत्ति के वितरण और शासन के तरीके में कुछ परिवर्तन कर सकते हैं लेकिन शोषणकारी उत्पादन प्रणाली तथा समाज के दमनकारी सामाजिक संबंधों को ज्यों का त्यों रहने दें। यह उनका दूसरा विकल्प था। तीसरे विकल्प के बारे में उनका कहना था कि आप सही अर्थों में क्रांति कर सकते हैं। ऐसी क्रांति जिसका मतलब शोषण के सभी संबंधों का रूपांतरण, दमनकारी संस्थाओं की समाप्ति, गुलाम बनाने वाले विचारों और मूल्यों तथा उत्पीड़नकारी सामाजिक व्यवस्था का अंत। एक ऐसी क्रांति जो मानव समाज के वर्गों में विभाजन पर काबू पा सके। यह तीसरा विकल्प ही साम्यवाद की दिशा में विश्व सर्वहारा क्रांति का विकल्प है।
गद्दाफी ने सामाजिक और आर्थिक मॉडल के रूप में जो कार्यक्रम अपनाया वह दूसरे विकल्प के दायरे में आता है। जिसके अंतर्गत यथास्थिति के कुछ पहलुओं को बदल दिया जाए लेकिन दमनकारी समाज व्यवस्था को ज्यों का त्यों रहने दिया जाए।
 
गद्दाफी के बारे में आम तौर पर जो लिखा या कहा जाता है उसमें उनकी छवि एक निर्दय 'स्ट्रांग मैन' की पेश की जाती है। क्या आपको भी ऐसा लगता है?

देखिए, 'स्ट्रांगमैन' या 'स्ट्रॉ मैन' जैसी शब्दावली या इस तरह की धरणाएं एक भ्रम फैलाती हैं। यह वर्गीय सार तत्व को धुंधला करती हैं। मार्क्सवाद इस मामले में हमारी समझ विकसित करता है। मानव इतिहास की जिस अवस्था में हम हैं उसमें सभी समाज वर्गों में विभाजित हैं। जो नेतागण हैं वे किसी शून्य में विचरण नहीं करते हैं। वे विभिन्न वर्गों के दृष्टिकोण, तरीकों और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति करते हैं। गद्दाफी और अन्य सैनिक अधिकारियों ने जिन्होंने 1969 में सत्ता पर कब्जा किया वे साम्राज्यवाद द्वारा उत्पीड़ित एक राष्ट्र के निम्न पूंजीपति वर्ग तथा राष्ट्रीय बुर्जुआ के रेडिकल हिस्से के नजरिए का प्रतिनिध्त्वि कर रहे थे। साम्राज्यवादी गुलामी में उनका दम घुट रहा था। अपने वर्गीय नजरिए से उनको यह महसूस हो रहा था कि उनके देश लीबिया के साथ बहुत बुरा बर्ताव किया जा रहा है। वे चाहते थे कि बाजार के इस तंत्र को, जो शोषण और मुनाफा कमाने के सिद्धांत पर आधारित है, किसी तरह ऐसा बनाया जाए ताकि समूचे देश को इसका लाभ मिल सके। वे इस भ्रम में भी थे कि साम्राज्यवाद से कुछ रियायत झपट लेने में उन्हें कामयाबी मिलेगी और वे साम्राज्यवाद को अपनी शर्तों के अनुरूप ला देंगे। लेकिन सच्चाई तो यह है कि विश्व पूंजीवाद एक निश्चित तर्क के अनुसार चलता है और इन समाजों तथा अर्थव्यवस्थाओं पर अपने ही तर्क थोपता है।
 
लीबिया की इन बुर्जुआ राष्ट्रवादी ताकतों ने समूचे राष्ट्र की ओर से बोलने का दावा किया। उन्होंने अपने हितों को देश के सभी वर्गों के हितों के अनुरूप समझ लिया। लेकिन इन देशों में एक वर्ग है जो शासन करता है और एक वर्ग है जो शासित होता है। आपको याद होगा कि गद्दाफी ने एक नारा दिया था जो शायद उनकी तथाकथित 'ग्रीन बुक' में शामिल है और वह नारा था 'मजदूर नहीं बल्कि पार्टनर'। दूसरे शब्दों में कहें तो आपके पास एक तरफ तो वह प्रणाली है जो मुनाफे पर आधारित है और जो पूंजीवादी विश्व बाजार के साथ घुल-मिल कर रहना चाहती है और दूसरी तरफ आप सबको समान रूप से पार्टनर बनाने की बात कह रहे हैं। यह कोरा भ्रम था और जनता को महज लुभाने वाला नारा था। मजदूरी करने वाले अथवा सर्वहारा वर्ग के लोग उत्पादन के साधनों के स्वामी नहीं हो सकते। जिंदा रहने के लिए उन्हें उन लोगों को अपना श्रम बेचना ही होता है जिनका उत्पादन संबंधों पर नियंत्रण है अर्थात जो पूंजीपति हैं। पूंजीपति वर्ग उत्पादन प्रक्रिया में मजदूरों का शोषण मुनाफा कमाने के लिए करता है और उसकी कोशिश यही होती है कि इस मुनाफे में लगातार इजाफा होता जाए। जब पर्याप्त मुनाफा नहीं होता है तो मजदूरों की छंटनी कर दी जाती है। इसलिए मजदूरी करने वाले की बुनियादी स्थिति पूंजी के प्रभुत्व के अधीन रहने की ही होती है। यही वजह है कि कामगरों और पूंजीपतियों के बीच एक बुनियादी अंतर्विरोध होता है जो प्रकृति से शत्रुतापूर्ण रहता है।
 
लीबिया में मजदूर अर्थव्यवस्था की बुनियाद हैं। आज के लीबिया में 20 प्रतिशत बेरोजगारी है। इसलिए सच्चाई यही है कि मजदूरी करने वाले पूंजी के कभी 'पार्टनर' नहीं बन सकते। राजनीतिक और वैचारिक तौर पर उभरती हुई ये बुर्जुआ ताकतें बुनियादी जनता से डरती थीं... उन्हें इस बात का हमेशा भय रहता था कि साम्राज्यवादी कार्यक्रम के साथ तालमेल बनाकर चलने की इनकी नीति और इनके सुधरवाद से आगे बढ़कर जनता कोई कदम उठा सकती है। इसलिए उन्होंने इन शक्तियों को नियंत्रिात करने का प्रयास किया।
मेरा कहने का मतलब यह है कि गद्दाफी की इन तमाम ऊल-जलूल हरकतों के बावजूद अगर आप गद्दाफी के कार्यक्रम को समझना चाहते हैं तो आपको उन वर्ग हितों और दृष्टिकोण का विश्लेषण करना होगा, जिसका गद्दाफी प्रतिनिधित्व करते थे और यह देखना होगा कि विश्व परिस्थिति के साथ उन हितों की किस तरह की अंतःक्रियाहोती थी। मेरा मतलब यह है कि भले ही आप बराक ओबामा को बहुत 'शांत' और 'सुसंस्कृत' कह दें लेकिन उसे एक साम्राज्यवादी सत्ताधारी वर्ग के विश्व दृष्टिकोण और साम्राज्य के शोषक तथा जानलेवा हितों पर खुद को केन्द्रित करना ही होगा।
 
फिर भी गद्दाफी का शासन लम्बे समय तक बना रहा और उनकी छवि एक रेडिकल नेता की थी। ऐसा क्यों?

1970 के दशक के प्रारंभ में जब गद्दाफी ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत की तो उन दिनों विश्व राजनीति और विश्व अर्थव्यवस्था में कुछ खास किस्म की बातें हो रही थीं। अमेरिका को वियतनाम में पराजय का सामना करना पड़ रहा था और दुनिया के स्तर पर उसकी आर्थिक सत्ता कमजोर हो रही थी। इस स्थिति ने गद्दाफी के लिए एक गुंजाइश पैदा की।
 
दूसरी बात यह कि विश्व स्तर पर सोवियत संघ द्वारा अमेरिका को चुनौती मिल रही थी। सोवियत संघ खुद को समाजवादी होने का दावा कर रहा था लेकिन 1950 के दशक के मध्य में वहां एक नए पूंजीपति वर्ग ने समाजवाद को ध्वस्त कर दिया था। सोवियत संघ अब एक सामाजिक-साम्राज्यवादी शक्ति बन गया था। 1970 के दशक के मध्य तक दुनिया के विभिन्न हिस्सों में वह अपना प्रभाव और नियंत्रण कायम करने की होड़ में लगा था। विश्व रणनीति के एक हिस्से के रूप में उसे तीसरी दुनिया के प्रमुख देशों में अपनी समर्थक सत्ताएं बनानी थीं। इस क्रम में सोवियत संघ ने गद्दाफी जैसे शासकों वाले देशों को पटाने के लिए आर्थिक सहायता, कूटनीतिक समर्थन और तेल समझौतों का सहारा लिया। सोवियत संघ लीबिया को हथियारों की सप्लाई करने वाला प्रमुख देश बन गया।
 
इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण बात यह थी कि 1960 के दशक के उत्तरार्ध और 1970 के दशक के पूर्वार्ध में विश्व स्तर पर तेल उद्योग परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। प्रमुख तेल कंपनियां तीसरी दुनिया के तेल उत्पादकों के साथ नयी तरह की व्यवस्था बनाने में लगी थीं। उत्पादन पर औपचारिक नियंत्रण को तीसरी दुनिया के देशों की सरकारों और इन सरकारों द्वारा नियंत्रित तेल कंपनियों के हाथों में जाने की इजाजत दे दी गयी। तेल शोधन, मार्केटिंग, टेक्नालॉजी और वित्तीय व्यवस्था के जरिए साम्राज्यवादी प्रभुत्व को मजबूत किया गया। लेकिन अब उत्पादक देशों की उत्पादन स्तर पर पकड़ मजबूत हो गयी थी और ओपेक जैसा संगठन बन गया था। 1970 के दशक में ही तेल की कीमतों में वृद्धि भी हो रही थी। इन सारी घटनाओं से गद्दाफी को लाभ मिला।
 
लेकिन इन सबके बावजूद गद्दाफी जैसी बुर्जुआ राष्ट्रवादी ताकतें न तो साम्राज्यवाद के साथ अपने संबंध तोड़ने की इच्छुक थीं और न ऐसा करने के लिए जनता को नेतृत्व देने और सामाजिक क्रांति संपन्न करने की उनके अंदर क्षमता ही थी। जैसा कि मैंने पहले कहा ये ताकतें साम्राज्यवाद के अधीन फल-पफूल रही थीं लेकिन जनता से भयभीत भी थीं। यहां भी इन शासकों की वर्गीय प्रकृति ही इसके लिए जिम्मेदार थी। साम्राज्यवाद के साथ संबंधों के कारण इन्हें जकड़न का भी एहसास होता था लेकिन शोषणकारी संबंधों पर नियंत्रण से परे की दुनिया उन्हें दिखायी ही नहीं देती थी। इसलिए आपको एक ऐसे गद्दाफी का सामना करना पड़ता है जो साम्राज्यवाद के साथ तालमेल बनाते हुए सत्ता पर अपनी पकड़ और मजबूत करने में लगा था। वह उस तेल आधरित अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण करना चाहता था जो विश्व पूंजीवादी उत्पादन के तौर-तरीकों के अधीन काम कर रही थी। लीबिया को निर्यात से जो भी आय होती थी उसका 95 प्रतिशत से भी अध्कि हिस्सा तेल से प्राप्त होता था। और 1973 से 1983 के दशक में लीबिया तीसरी दुनिया के उन तीन प्रमुख देशों में से एक हो गया जो सबसे ज्यादा हथियारों का आयात कर रहे थे। यह एक तरह का विकृत और दूसरे पर निर्भर विकास था।
 
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गद्दाफी ने दकियानूस अरब शासकों की आलोचना की और खुद को फिलीस्तीनी जनता के अधिकारों के चैंपियन के रूप में पेश किया। उसने अफ्रीका की मुक्ति के समर्थन में आवाज उठायी। इन बातों से उसे काफी लोकप्रियता मिली।
 
1980 के दशक में अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा गद्दाफी को 'पागल कुत्ता' कहा गया और उसकी छवि एक बर्बर शासक की पेश की गयी। इसकी वजह क्या थी?

यह सही है लेकिन इसका ताल्लुक न तो गद्दाफी की दमनकारी सत्ता से है और न गद्दाफी के शासन करने के तरीके से। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उन्हीं दिनों अमेरिका बगल के मध्य अमेरिका में अनेक तानाशाहों को मजबूत बनाने में लगा था और इन तानाशाहों द्वारा किए जा रहे मानव अधिकारों के उल्लंघनों को देखते हुए गद्दाफी की छवि एक भले शासक की बन रही थी। दरअसल अमेरिका के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि गद्दाफी के संबंध लगातार सोवियत संघ के साथ मजबूत होते जा रहे थे। वह ऐसे समय क्रांतिकारी आंदोलनों और समूहों को समर्थन दे रहे थे जब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता एक सैनिक टकराव की दिशा में बढ़ रही थी। यही वजह है कि 1980 के दशक में अमेरिका ने गद्दाफी के खिलाफ एक मुहिम छेड़ दी। तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने लीबिया पर हवाई हमले किए और आर्थिक प्रतिबंधों तथा कूटनीतिक दबावों के जरिए लीबिया को दंडित करना चाहा। तेल कंपनियों ने अपना कामकाज बंद कर दिया। यहां यह ध्यान देने की जरूरत है कि लीबिया पश्चिमी यूरोप को ऊर्जा की सप्लाई करने वाला एक प्रमुख देश था। अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के साम्राज्यवादियों के बीच यह एक तनाव का कारण था। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि लीबिया पर अमेरिका द्वारा उन दिनों किए गए सैनिक आक्रमण का उद्देश्य पश्चिम यूरोप के साम्राज्यवादी देशों को भी रास्ते पर लाना था। अमेरिका के दबाव में ही संयुक्त राष्ट्र ने भी लीबिया के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा की। इन सारे कदमों से लीबिया को अलगाव में डाल दिया गया और इसका असर लीबिया की अर्थव्यवस्था पर दिखायी देने लगा। इसके साथ ही तेल की कीमतों में भी विश्वस्तर पर आयी गिरावटों का इसकी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा। अब जरूरत इस बात की थी कि लीबिया के तेल उद्योग में कुछ नए किस्म का पूंजीनिवेश हो।
 
इसी बीच 1989-91 में सोवियत संघ और इसका पूरा खेमा ध्वस्त हो गया। इस परिघटना ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में गुणात्मक परिवर्तन ला दिया। इससे गद्दाफी की अनेक परियोजनाओं की हवा निकल गयी। अब उसके पास इतना बड़ा समर्थन नहीं रह गया था। अमेरिका ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए मध्य पूर्व के देशों तथा तीसरी दुनिया के अन्य देशों की ओर रुख किया। इस बदली हुई परिस्थिति में गद्दाफी पश्चिमी यूरोप के साम्राज्यवादियों के साथ और भी ज्यादा घनिष्ठ संबंध बनाने में लग गए। 1990 के दशक के समाप्त होने तक ग्रेट ब्रिटेन के साथ लीबिया का संबंध सामान्य हो चुका था। इटली को भी लीबिया के तेल और प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्रवेश करने की इजाजत मिल गयी।
 
क्या 2003 में इराक पर हुए अमेरिकी हमले का भी लीबिया की राजनीति पर प्रभाव पड़ा?

निश्चय ही। इसने गद्दाफी पर एक दबाव बनाया और उन्हें ये सोचने पर मजबूर किया कि क्या इराक के बाद अब अगला निशाना लीबिया होगा। गद्दाफी को कट्‌टर इस्लामिक ताकतों की चुनौती का भी खतरा दिखायी दे रहा था। इसलिए उन्होंने अब अमेरिका की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना शुरू किया। 9/11 के बाद गद्दाफी ने अलकायदा जैसे संगठनों के बारे में अमेरिका के साथ अपनी खुफिया सूचनाएं बांटनी शुरू कीं। 2004 में उन्होंने ऐलान किया कि वह अपने विभिन्न परमाणु हथियार कार्यक्रमों को खत्म कर रहे हैं। अमेरिका ने भी आतंकवादी संगठनों की सूची में से लीबिया का नाम हटा दिया। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में गद्दाफी अमेरिका के महत्वपूर्ण सहयोगी बन गए। राष्ट्रपति बुश ने अमेरिकी तेल कंपनियों को हरी झंडी दे दी कि वे लीबिया के साथ नए अनुबंध कर सकते हैं। गद्दाफी ने उद्योग के कुछ क्षेत्रों का निजीकरण कर दिया। पिछले वर्ष गद्दाफी ने इटली के साथ एक समझौता किया जिसमें कहा गया था कि उन अफ्रीकी आब्रजकों के लिए रास्ता बंद कर दिया जाए जो बिना किसी दस्तावेज के लीबिया से होकर यूरोप में प्रवेश कर रहे हों। इस सिलसिले में गद्दाफी ने एक चेतावनी जारी की जो पूरी तरह नस्लवादी थी और जिसमें कहा गया था कि अगर यूरोप में अीकी आब्रजकों को वापस भेजने के कड़े उपाय नहीं किए तो एक दिन वह पूरी तरह 'काला' हो जाएगा। यह गद्दाफी का एक नया रूप था। उनके बेटे ने हिलेरी क्लिंटन से भेंट की। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स को उन्होंने दान के रूप में बहुत बड़ी राशि दी। ब्रिटेन लीबिया को हथियार बेचने लगा। साम्राज्यवादियों को लगा कि गद्दाफी के रूप में उन्हें एक काम का आदमी मिल गया है। इतना ही नहीं फरवरी, 2011 के प्रारंभ में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने लीबिया की अर्थव्यवस्था पर एक रिपोर्ट जारी की जिसमें गद्दाफी की सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी। इसमें गद्दाफी के 'महत्वाकांक्षी सुधर एजेंडा' और 'जबर्दस्त मैक्रो इकोनॉमिक कार्यकुशलता' के लिए शाबासी दी गयी थी...
 
...लेकिन अब हैरानी की बात है कि जब उन्हें लगा कि जनता के असंतोष का फायदा उठाकर किसी और भी 'काम के आदमी' को सत्ता में आसीन किया जा सकता है तो साम्राज्यवादियों ने एक बार फिर 'पागल गद्दाफी' और 'तानाशाह गद्दाफी' की रट शुरू कर दी है।
 
लीबिया में फिलहाल क्या हो रहा है और वे कौन से बड़े मुद्दे और चुनौतियां हैं जो आज सामने आ रही हैं?

मैंने अब तक गद्दाफी की वर्ग-प्रकृति और गद्दाफी शासन द्वारा अपनाए गए विकास के मॉडल की सामाजिक आर्थिक प्रकृति की चर्चा की। यह चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि तभी हम यह समझ पाएंगे कि आखिर वह कौन-सी वजह है जिसने इतने बड़े पैमाने पर लोगों को गद्दाफी और उनके विकास के खिलाफ आंदोलित किया। पिछले समूचे दशक में तेल से होने वाली संपदा और राष्ट्रीयकृत संपत्ति का लाभ कुछ गिने-चुने परिवारों को मिला जिनमें गद्दाफी का परिवार शामिल था। इसकी जब भी आलोचना हुई तो शासन ने कड़ाई का रुख अख्तियार किया। लोग अपने मन का गुबार निकालना चाहते थे लेकिन जबर्दस्त सेंसरशिप ने अभिव्यक्ति के सारे रास्ते बंद कर दिए। विरोधियों को जेलों में ठूंस दिया गया। सरकारी तंत्र से बाहर राजनीतिक जीवन की लोगों की ललक बढ़ती चली गयी। तथाकथित 'जन समितियां' बदनाम हो गयीं और इनके जरिए विरोधियों की जासूसी की जाने लगी। अभी हाल तक स्कूलों में विदेशी भाषा पढ़ाने पर रोक लगा दी गयी थी। स्वास्थ्य सेवाओं में लगातार गिरावट आती गयी और बेरोजगारों की तादाद में जबर्दस्त वृद्धि हुई। पश्चिमी देशों ने गद्दाफी के खिलाफ लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को जब हटा लिया उसके बाद से ही यह महसूस किया गया कि गद्दाफी के साम्राज्यवाद विरोधी और राष्ट्रवादी नारों के प्रति जनता का आकर्षण समाप्त हो गया। जनता का विश्वास उन्होंने लगभग पूरी तरह खो दिया।
 
इसके बाद ट्‌यूनीशिया और मिस्र में आंदोलन भड़क उठे। 

हां, जिस समय हमलोग यह बातचीत कर रहे हैं लीबिया की स्थिति बहुत धुंधली और हिंसक है। गद्दाफी ने अंत तक लड़ने और सत्ता पर अपना कब्जा बनाए रखने का इरादा जाहिर किया है। फिलहाल राजधानी त्रिापोली और देश के पश्चिमी क्षेत्रों पर केन्द्रीय सरकार का कब्जा है जबकि पूर्वी क्षेत्र पर विरोधी ताकतों ने कब्जा कर रखा है। कुछ मंत्रियों और सैनिक अधिकारियों ने पाला बदल दिया है और वे प्रतिपक्ष के साथ शामिल हो गए हैं तथा संभावित अगली सरकार का हिस्सा बन गए हैं। इस 'अंतरिम राष्ट्रीय शासन कौंसिल' के कुछ सदस्य पश्चिमी देशों से मांग कर रहे हैं कि वे इनकी मदद में हवाई हमले करें। यह एक प्रतिक्रियावादी मांग है जिसके पीछे साम्राज्यवाद का समर्थन निहित है। यह लीबियाई जनता के हित में नहीं हैं जिसने साम्राज्यवादी प्रभुत्व के अधीन काफी कष्ट झेले हैं। यहां यह बात भी ध्यान में रखने की है कि इस क्षेत्र की यह पहली उथल-पुथल की घटना है जिसने तेल के उत्पादन को प्रभावित किया है। समूचे अफ्रीका में लीबिया के पास तेल का सबसे बड़ा भंडार है और लीबिया यूरोप की तेल की जरूरतों के एक महत्वपूर्ण हिस्से की आपूर्ति करता है। इसलिए साम्राज्यवादी गणित को प्रभावित करने में यह भी एक कारक है। साम्राज्यवादी ताकतें 'मानवीय सरोकार' का बहाना लेकर संभावित सैनिक हस्तक्षेप को वैचारिक आधार देने में लगी हैं।
 
यहां एक बात और ध्यान देने की है कि लीबिया की स्थिति को देखें और मिस्र में जो संघर्ष चल रहा है इन दोनों में 'नेताविहीन' आंदोलनों की एक बात दिखायी दे रही है जो सही नहीं है। प्रगतिशील और रेडिकल तत्वों में से बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता रखते हैं। इसलिए यह मानना गलत होगा। मिस्र की ही तरह लीबिया में भी विभिन्न वर्ग और सामाजिक शक्तियां मैदान में है। वे अपने हितों और दृष्टिकोणों को सामने ला रहे हैं और अलग-अलग शक्तियां नेतृत्व पर कब्जा करके अपने अनुरूप आंदोलन को दिशा देने के प्रयास में लगी हैं। लीबिया में ही देखें कि पूर्वी भाग में वकीलों का एक समूह है जो चाहता है कि 1952 के पुराने संविधान को लागू कर दिया जाए।
 
फिर आंदोलन में डाक्टरों, विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों, छात्रों, युवकों, मजदूरों आदि का बहुत बड़ा हिस्सा सड़कों पर उतर आया है और इन्हीं के साथ प्रतिक्रियावादी कबीलाई नेता, भूतपूर्व मंत्री, सेना के अधिकारी भी शामिल हो गए हैं और नेतृत्व हथियाने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो गद्दाफी के साथ अपना पुराना हिसाब चुकता करना चाहते हैं। नौजवानों का एक समूह है जो नारे लगा रहा है कि 'कबीलावाद नहीं चलेगा'। इन सबके बीच साम्राज्यावादियों की भी छल-कपट जारी है।
 
इसलिए सवाल इस बात का नहीं है कि नेतृत्व है अथवा आंदोलन नेतृत्वविहीन है। नहीं, सवाल यह है कि किस तरह का नेतृत्व है? इसके लक्ष्य क्या हैं? इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए किन तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है? इतिहास ने बार-बार यह दिखाया है कि अगर क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट नेतृत्व नहीं हुआ तो जनता को पराजय का ही सामना करना पड़ता है। ऐसी हालत में जनता का वह बहुत बड़ा हिस्सा जो सबसे ज्यादा उत्पीड़ित और शोषित है और जिसे बुनियादी परिवर्तन की सबसे ज्यादा जरूरत है वह अलग-थलग पड़ जाती है और उसके साथ धोखा होता है।
 
इसलिए जो कुछ हो रहा है उससे हमें महत्वपूर्ण सबक लेने हैं। हमारे सामने आज बहुत बड़ी चुनौतियां हैं।
(समकालीन तीसरी दुनिया से साभार)

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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