हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कृष्ण बलदेव वैद की किताबों का लोकार्पण

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/29/2011 11:23:00 PM

कहते हैं कि उनकी कहानियां सार्वजनिकता में निजी स्पेस के निर्माण की कहानियां हैं. उनकी बहुत मशहूर कहानी 'बदचलन' बीवियों का द्वीप हो या फिर हालिया कहानी प्रवास गंगा. कृष्ण बलदेव वैद की कहानियों में मनुष्य नहीं उसका अंतर्जगत, उसके मन के अनछुए कोने नायक होते हैं. नायक थोड़ा आक्रामक लगे तो केंद्रीय चरित्र कह सकते हैं. कल एक साथ पेंगुइन हिंदी से प्रकाशित उनकी दो किताबों का विमोचन है. ये किताबें हैं- खाली किताब का जादू और प्रवास गंगा. पिछले दिनों हिंदी अकादेमी द्वारा दिखाई गयी तानाशाही और अभद्रता के बाद पहली बार वैद जी भारत में किसी सार्वजनिक मंच पर आयेंगे, इसलिए भी यह कार्यक्रम थोड़ा रोचक होगा. किताबों के बारे में और अधिक जानने के लिए यहां क्लिक करें.

लोकार्पण- खाली किताब का जादू और प्रवास गंगा
शनिवार, 30 अप्रैल 2011, शाम 6.00 बजे
लेक्चर हॉल, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एनेक्सी,
लोधी एस्टेट, नई दिल्ली

भ्रष्टाचार पर फलने फूलने वाले साम्राज्यवादी विकास का नाटक

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/29/2011 02:55:00 PM

भ्रष्टाचार एक बार फिर बहस के केंद्र में है. शाइनिंग इंडिया में राज्य की हर नीति पर भ्रष्टाचार की एक कहानी मौजूद है. चाहे वह ग्रामीण विद्यालयों के लिए मिड डे मील योजना हो या कोई रक्षा सौदा या फिर स्पेक्ट्रम घोटाला. हम अन्ना हजारे के चार दिन के भव्य तमाशे के गवाह रहे. हमने खाते पीते मध्यम वर्ग के उत्साही समर्थन वाले 'सिविल सोसाइटी' द्वारा सहअभिनीत और हर एक रंग की संसदीय पार्टियों - एक इन्द्रधनुषीय गठबधन-द्वारा प्रशंसित 'नए गांधी' के 'ऐतिहासिक सत्याग्रह' को देखा. सनसनी से संचालित हमारे 24x7 रियलिटी टीवी चैनल जिन्हें अन्यथा न्यूज़ चैनल भी कहा जाता है, जंतर मंतर को तहरीर चौक की संज्ञा देने से खुद को नहीं रोक पाए. 'भारत माता' और गाँधी के चित्रों के आगे बैठे अन्ना हजारे की तस्वीरें हर घर के ड्राईंग रूम में प्राइम टाइम पर प्रसारित हो रहे थे. जल्दी ही 'शाइनिंग इंडिया' के हर छोटे बड़े शहर से अन्ना प्रेरित जनप्रदर्शनों की तस्वीरें आने लगी. नारा बहुत सरल था (या ऐसा लगा) : भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए जरुरत थी जन लोकपाल की. सुपर कॉप, न्यायकर्ता, कानून तीनों का संयोजन- जो भ्रष्टाचार मिटाने के लिए सबसे ऊपर होगा. चार दिन के प्रदर्शन के बाद अन्ना हजारे ने अपना सत्याग्रह समाप्त किया. जब सरकार ने मान लिया कि नया बिल 'सिविल सोसाइटी' के नेताओं के साथ विचार-विमर्श करने के बाद बनाया जायेगा. ईमानदारी का रस्मी प्रदर्शन (जो इस तमाशे की प्रमुख विशेषता थी) करते हुए मीडिया के सामने बताया गया कि चार दिन के प्रदर्शन पर कुल 82 लाख रूपये खर्च हुए.नेता-नौकरशाह-कारपोरेट गठबंधन द्वारा डकारे गए धन से शायद काफी कम. लेकिन अन्ना हजारे और उनके समर्थक, बड़ी आसानी से यह बताना भूल गए कि प्रदर्शन के प्रायोजक थे टाटा, इन्फ़ोसिस और अन्य कारपोरेट घराने. और बहुत सी चीजें आँखों के सामने नहीं आ पाईं. सिविल सोसाइटी के कुछ हलको में यह भी कहा जा रहा था कि भावुक अपील करते हुए और मिस कॉल कर अपने समर्थन दिखाने का आग्रह करते हुए SMS लाखों उपभोक्ताओं तक पहुँचाने के लिए बड़ी मोबाईल कंपनियों से 20 लाख रुपये का करार किया गया था.

भ्रष्टाचार की कथा: 'गणतंत्र' जितनी ही पुरानी

47 के बाद के पूरे इतिहास में हमने सभी संसदीय पार्टियों के बहुत से नेताओं को भ्रष्टाचार मिटाने के लम्बे चौड़े दावे करते हुए देखा है. 'नेहरुवादी समाजवाद' के ज़माने से उदारीकरण के दौर तक भाई भतीजावाद, सार्वजनिक धन की लूट खसोट, कमीशनखोरी या विदेशी अनुदान के दुरूपयोग के मामले इस देश की जनता के लिए कोई नई बात नहीं है. लेकिन उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण के इस दौर में भ्रष्टाचार की व्यापकता में कई गुना वृद्धि हुई है और उतनी ही वृद्धि हुई है अमीर और गरीब के बीच के अंतर में. इसके बावजूद भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई एक वास्तविक समस्या बनी हुई है. वह है बीमारी के बजाय उसके लक्षणों को दूर करने की कोशिश करना. ऐसा क्यों है?

1947 के बाद भारतीय राज्य द्वारा अपनाए गए विकास के रास्ते को देखे बिना भ्रष्टाचार के बारे में विचार करना नादानी होगा. और यह नोट करना गलत न होगा कि चाहे वह 'नेहरूवादी समाजवाद, का दौर रहा हो या आज का नवउदारवादी दौर, भारतीय शासक वर्ग के लिए विकास का अर्थ पूरी तरह पूँजी पर आधारित रहा है. शहरी केंद्र अपने मॉलों, फ्लाईओवरों, एक्सप्रेस हाइवे, आयातित कारों, फ्लडलाइटों से जगमगाते स्टेडियमों, डे नाईट मैचों, आधुनिक सुविधासंपन्न एयरपोर्टों, मोटे बटुओं वाले नवाचारीउपभोक्ताओं, के साथ विकास का प्रदर्शन करते हैं. यह आम धारणा है कि ग्रामीण इलाकों में कम पूँजी होने के कारण कम विकास है. सच्चाई यह है कि ग्रामीण इलाकों से उगाही जा रही व्यापक अधिशेष अनुत्पादक गतिविधियों में खपाया जाता है और उसका बहुत कम हिस्सा वापस खेती में लगाया जाता है. इस तरह विकास और पूँजी, वर्ग/जाति/क्षेत्र के सन्दर्भ से परे एक दूसरे का पर्याय बन गए हैं. जहाँ पूँजी की मौजूदगी का अर्थ है विकास की मौजूदगी और इसके विपरीत भी.

आज तक 'शाइनिंग इंडिया' तकनीकी सहायता के लिए साम्राज्यवादी पश्चिम पर बुरी तरह निर्भर है. दलाल पूंजीपति जिसने राज्य प्रदत्त सब्सिडी को आधार बना कर बाज़ार पर अपना नियंत्रण और एकाधिकार कायम कर लिया है, वास्तव में पश्चिमी तकनीक पर आधारित विकास के लिए बाज़ार का थानेदार बन गया है. यही दलाल पूंजीपति सामंती भूस्वामी वर्ग के साथ मिलकर साम्राज्यवादी बाज़ार के लिए जरुरी विकास और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कायम रखता है. इस तरह पहले दिन से ही अर्थव्यवस्था पैसे से पैसा बनाने वाली सूदखोर परजीवी पूँजी पर आधारित रही है. जो व्यापक जनता के वास्तविक विकास के खिलाफ थी. दलाल पूँजी के हित में मुनाफे को बढ़ाते रहना प्राथमिक बन गया और सभी सामाजिक सम्बन्ध इसके अधीन ही गए. आश्चर्य नहीं कि इससे भ्रष्टाचार फला फूला और अमीर और गरीब में संपत्ति की चरम विषमताएं पैदा हुईं. व्यापक खेतिहर अर्थव्यवस्था से वसूला गया भारी अधिशेष वेतनभोगी शहरी मध्यम/उच्च मध्यम वर्गीय उपभोक्ता की क्रयशक्ति बढाने में खर्च किया गया है. चाहे वह कोई अफसर हो या सिलिकोन वैली का आधुनिक अधिकारी. गाँव के स्तर पर इसका प्रतिबिम्बन भ्रष्टाचार के विभिन्न नामों के साथ चलन में हुआ. और यह सामुदायिक जीवन का हिस्सा बन गया. नए ज़माने के फ्लैगशिप कार्यक्रमों जैसे मनरेगा और बीपीएल राशन कार्डों के द्वारा उपभोक्ताओं के एक नए संस्तर का निर्माण हुआ. सुदूर बस्तर के मुरिया आदिवासियों के लिए जंगलों में महुआ ख़ुशी का प्रतीक था. भ्रष्टाचार वन विभाग के अधिकारी/ठेकेदार के रूप में उसके बीच में आ घुसा.

अन्ना हजारे मॉडल:उपमहाद्वीप में साम्राज्यवाद की छाया

विकास का यह मॉडल ब्रेटन वुड्स संस्थाओं के आशीर्वाद से 'कैचिंग अप विद द वेस्ट' के नारे के साथ शुरू हुआ. जिन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवादकि जरूरतों के मुताबिक विकासशील और अभी अभी प्रत्यक्ष औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुएदेशों के 'तीव्र विकास' की बात की. भारत जैसे अर्ध उपनिवेशों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण बनाये रखने के लिए 'विकास' के अर्थशास्त्र को सभी समस्याओं के समाधान की तरह पेश कियागया. भारतीय उपमहाद्वीप में पहले पहल इन नीतियों को साम्राज्यवादी पूँजी को आमंत्रित करने के लिए सरकार से सरकार को मदद के नाम पर पेश किया गया. ठीक इसी कारण से सत्तर के दशक में विकास में राज्य के हस्तक्षेप का लाइसेंस राज को ख़त्म करने के नाम पर विरोध किया गया. और जैसे जैसे साम्राज्यवाद का संकट हमारे हालिया समय कि दूसरी महामंदी बनाने की तरफ बढ़ता गया. विषाक्त पूँजी के वैश्विक फैलाव के फलस्वरूप पैदा हुए संकट ने वाशिंगटन के उन्ही प्रतिपादकों को राज्य की भूमिका को फिर से मानने के लिए मजबूर किया. अलबत्ता नवउदारवाद को हानि पहुंचाए बिना. पश्चिम द्वारा यही मार्ग लातिन अमेरिका और अफ्रीका में भी प्रसारित किया गया. और आज हम भारतीय उपमहाद्वीप में अपने सामने एक नाटक होता हुआ देख रहे हैं- अन्ना हजारे का उनके 'शक्तिशाली' सत्याग्रह के जरिये भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध.

और वस्तुतः पश्चिम के विकास प्रबंधकों की तरह ही यह कोरपोरेट सेक्टर है जिसकी आतंक के खिलाफ युद्ध, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ युद्ध के साथ-साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में रूचि है. क्योंकि वे विकास के नाम पर जनता के धन के बड़े पैमाने पर हो रही लूट के खिलाफ वास्तविक जन असंतोष से डरते हैं. दलाल पूंजीपति यह किसी से भी ज्यादा जानते हैं कि पिछले बीस सालों में उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की मोटी हेडलाइन के नीचे कार्यक्षमता, उद्यमशीलता, प्रतियोगिताऔर संवृद्धि के नाम पर दरअसल और कुछ नहीं वरन अतिशय घोटाले थे - एनरॉन-दाभोल बिजली घोटाला, बोफोर्स, लॉटरी, स्टाम्प पेपर, पीडीएस अनाज घोटाला, सत्यम, मनरेगा, आदर्श, सतना भूमि घोटाला, ताबूत घोटाला, IPL  घोटाला, एयर इंडिया, राडिया टेप, 2G स्पेक्ट्रम घोटाला इत्यादि. इन सबके बाद विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा बहुराष्ट्रीय निगमों से किये गए सैकड़ों करारनामों की अनकही कहानियां. असके अलावा विपक्ष की सांठगांठ से केंद्र की संप्रग सरकार ने स्विस बैंक में ले जाये गए धन की अब तक उपलब्ध जानकारी को भी जनता से छिपाया है. जनता के धन से खरबों रुपयों की लूट के इन सभी मामलों में कारपोरेट जगत राजनेताओं और नौकरशाहों के साथ शामिल रहा है. टाटा इन्फ़ोसिस और एस्सार जैसे कंपनियों द्वारा अन्ना हजारे के सत्याग्रह को दिए गए उदार दान का कारण समझ में आता है. यही कारपोरेट क्षेत्र अपनी फिक्की जैसी संस्थाओं के माध्यम से सरकार को छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों में अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे आदिवासियों के खिलाफ सलवा जुडूम जैसे निजी सैन्य गिरोहों को संगठित करने की रणनीति को आगे बढाने का सुझाव और धन देता है. कहानी का दूसरा भाग उन्हीं कारपोरेट द्वारा जनता में मौजूद असंतोष का इस्तेमाल करते हुए अन्ना हजारे के सत्याग्रह तमाशे को प्रायोजित करने से समाप्त होता है.

जिस तरह नरसंहारक नरेंद्र मोदी दलाल पूँजी का प्रिय चहेता है, अन्ना हजारे में हम उसका सामंती प्रतिरूप देख सकते हैं. कारपोरेट समर्थित अन्ना का मोदी द्वारा समर्थन प्राप्त करना स्वाभाविक ही था. और बाबा रामदेव, स्वामी अग्निवेश और श्रीश्री रविशंकर जैसी 'ईश्वरीय विभूतियाँ' भी इसमें शामिल हो गईं. इससे हमें विहिप को नब्बे के दशक में बिडला के द्वारा हिन्दू साम्प्रदायिकता के प्रचार-प्रसार के लिए वित्तपोषित आधुनिक सुविधाओं से पूर्ण वाहन मुहैया कराये जाने की याद आती है जिसे बाद में आडवानी कि 'रथ यात्रा' के लिए भी प्रयोग किया गया. और महाराष्ट्र के रालेगांव सीधी में अन्ना हजारे के 'आदर्श गाँव' में हमें ब्राह्मणवादी रामराज्य के दर्शन होते हैं जो पूरी तरह वर्ण व्यवस्था के नियमों पर आधारित है. महिलाएं, मुस्लिम और दलित इस 'आदर्श गाँव' में हाशिए पर हैं जिनकी कोई अहमियत नहीं है. इस समय जब कारपोरेट की साख जनता के सामने पूरी तरह ख़त्म होती जा रही है सबसे आसान रास्ता है सामंती-दलाल गठजोड़ को मजबूत करना. जिसका उदहारण अन्ना हजारे के सत्याग्रह तमाशे में दिखा. जन लोकपाल की बात करना दरअसल उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण कि नीतियों को जारी रखने के लिए इस गठबंधन का इस्तेमाल करना है. हजारे द्वारा प्रस्तावित जनलोकपाल विधेयक में लोक पाल का चुनाव करने के लिए बनाये जाने वाले निर्वाचक मंडल का विचार सारतः कुलीनवादी अल्पतंत्र को आगे बढ़ाता है. परजीवी मध्यम वर्ग के भौतिक आधार -जो उदारीकरण के दौर में फला फूला है- ने एक सुन्दर और शक्तिशाली न भी कहें तो ईमानदार और कुशल तानाशाह के लिए उन्माद पैदा किया है. जो व्यापक उत्पीडित जनसमुदाय की कीमत पर भी समस्याओं को हल कर सकता है. इस प्रकार हम भारतीय राजनीति के फासीवादीकरण की एक बड़ी योजना को देखते हैं. इसी परिप्रेक्ष्य में संसदीय वाम और 'सिविल सोसाइटी' का इस 'मध्यवर्गीय क्रांति' में बह जाना उल्लेखनीय है. जिसकी बेचैनी एक स्वनामधन्य वामपंथी अकादमिक की राय में झलकती है जब वह कि अन्ना के सत्याग्रह को समर्थन की जरुरत बताते हुए कहते हैं कि इसके असफल होने पर उपमहाद्वीप कि जनता के पास केवल एक विकल्प माओवादी आन्दोलन रह जाएगा. अब यह उपमहाद्वीप के लोगों पर है कि वे शासक वर्ग कि इस दोमुंही रणनीति को समझें और सभी प्रकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक समझौताविहीन संघर्ष चलायें, वह संघर्ष जो साथ ही साथ वर्ग, जाति, लिंग व धर्म के आधार पर होने वाले शोषण को समाप्त करेगा.
(आरडीएफ के बयान का संपादित अंश)

खुद को बेच दिया है उन्होंने अमेरिकी रोटी और हवा के लिए

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/28/2011 05:10:00 PM

स्पेनिश सीखते हुए पाब्लो नेरुदा का मूल स्पेनिश से अनुवाद करने की पहली कोशिश की है. नेरुदा ही मुझे जेएनयू लेकर आये और अब जेएनयू के जरिये फिर से नेरुदा को समझ रहा हूं. अब तक हुए अनुवादों की सीमाएं भी दिखने लगी हैं. यह अनुवाद भी बिल्कुल सही है, यह मैं नहीं कह रहा. यह तो आप तय कीजिए. यहां प्रस्तुत पहली कविता नेरुदा की अंतिम कविता है जो उन्होंने अपनी मौत से आठ दिन पहले लिखी थी- वह चिली में सीआईए द्वारा समर्थित जनरल पिनोशे के तख्तापलट का चौथा दिन था और नेरुदा अपनी बीमारी के अंतिम चरण में थे. यह उस कवि का गुस्सा है, जिसने अपनी पूरी जिंदगी मजदूरों के बीच काम करते हुए, अपने और दूसरे देशों में जनवाद के लिए लड़ते हुए और उनके लिए कविताएं लिखते हुए बितायी. नेरुदा सिर्फ अपने पूरे महाद्वीप के प्रतिनिधि कवि ही नहीं थे, वे पूरी लैटिन अमेरिकी जनता के इतिहासकार और राजनेता भी थे. दूसरी कविता नेरुदा ने अपनी पार्टी, चिली की कम्युनिस्ट पार्टी, को समर्पित की है जिसकी केंद्रीय कमेटी के वे वरिष्ठ सदस्य थे.
जागीरदार

निक्सन, फ्रेई, पिनोशे
आज तक, 1973 के
इस कड़वे सितंबर महीने तक
हमारे इतिहास के भूखे लकड़बग्घों
बोर्दाबेर्री, गार्रास्तासु और बेनसेर के साथ मिलकर
कुतर रहे हैं उन झंडों को
जिन्हें जीता गया
इतने सारे खून और इतनी सारी आग से
अपनी जागीरों में कीचड़ में सने
जनता की संपदा के ये नारकीय लुटेरे
हजार बार बिके हुए ये जागीरदार
और बिचौलिये, न्यूयार्क के भेड़ियों की छोड़ी हुई
डॉलर की भूखी मशीनें
अपने ही लोगों की कुरबानियों के
खून से कलंकित
खुद को बेच दिया है उन्होंने
अमेरिकी रोटी और हवा के लिए
बदनाम जल्लाद
जलील तानाशाहों का गिरोह
जिनका लोगों को यातना देने के सिवा
कोई दूसरा कानून नहीं है
और जनता की भूखी दीमकें
 
(15 सितंबर, 1973, चिली)

अपनी पार्टी को
तुमने दिया भाईचारा उन लोगों से जिन्हें मैं नहीं जानता
तुमने भरी मुझमें उन सभी लोगों की ताकत जो जिंदा हैं
मानो एक जन्म में तुमने लौटायी है मेरी मातृभूमि,
तुमने दी है मुझे आजादी जिसे नहीं हासिल कर सकता अकेला आदमी
तुमने सिखायी है मुझे करुणा, आग की तरह
तुमने दी है मुझमें ईमानदारी पेड़ों की तरह
तुमने सिखाया है मुझे इनसानों में एकता और फर्क को देखना
तुमने दिखाया है कि कैसे एक आदमी का दर्द खत्म होता है सबकी जीत से
तुमने सिखाया मुझे सख्त बिस्तर पर सोना, अपने भाइयों की तरह
तुमने खड़ा किया मुझे यथार्थ पर चट्टान की तरह
तुमने बनाया मुझे बुरों का दुश्मन और डरे हुए लोगों का आसरा
तुमने सिखाया दुनिया और खुशी की संभावनाओं को देखना साफ-साफ
तुमने मुझे बनाया नश्वर, क्योंकि तुम हो तो मैं खत्म नहीं हो सकता.
(कान्तो खेनेराल से)

संस्थागत भ्रष्टाचार को छुपाने की कोशिश

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/18/2011 02:08:00 AM

यह विश्व कप क्रिकेट मैच और आईपीएल के बीच एक कॉमर्शियल ब्रेक की तरह था. चार दिनों के भीतर भारत की ‘महान जैस्मिन क्रांति’ संपन्न हुई, जिसकी प्रतीक्षा में मध्यवर्ग एसी ऑन किये, पलक-पांवड़े बिछाये, रिमोट लिये और हाथों में कोक थामे बैठा था. या शायद अपने आयातित सोफे पर अधलेटा था. आइपीएल के शुरू होने से ठीक पहले सरकार जन-लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने पर सहमत हुई और अन्ना हजारे का भव्य तमाशा खत्म हुआ. जंतर-मंतर पर होनेवाले अधिकतर आयोजनों के उलट फंडेड भूख के इस प्रायोजित उत्सव में न तो कॉरपोरेट मीडिया ने पेशाब और शराब की बदबू खोजने की वह हिकारत दिखाई जो अक्सर किसानों के जुलूसों के समय पहले पन्ने पर आठ कॉलम की हेडिंग के साथ व्यक्त होती है और न सरकार ने जनता की मांगों को लेकर दिखाई जानेवाली अपनी स्थाई असंवेदनशीलता दिखाई. उल्टे पूरी व्यवस्था कतार बांधे खड़ी हो गयी- दुनिया की भ्रष्टतम कारपोरेट कंपनियां, टैक्सचोर मुंबइया फिल्मी सितारे और सांप्रदायिक फासीवादी से लेकर सरकारी वामपंथी पार्टियां तक- सभी इस तमाशे में अपनी भूमिका के साथ भारत माता की तसवीर के नीचे मौजूद थे. लेकिन इस ‘क्रांति’ की असलियत शुरू से ही उजागर थी. शिवाजी, नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की हिमायत और भ्रष्टाचारियों को ‘फांसी पर लटका दो’ और ‘उनके हाथ काट दो’ के नारे के साथ शुरू हुए इस ‘धर्मयुद्ध’ का असली उद्देश्य भ्रष्टाचार के ताबूत में आखिरी कील ठोकना नहीं है, बल्कि इसका मकसद वास्तव में भारतीय राज्य के फासीवाद को अधिक मजबूत बनाना है. जन लोकपाल विधेयक का मसौदा हालांकि तैयार होना अभी बाकी है, लेकिन इसके जिस मॉडल की चर्चा हो रही है उसके तहत गठित लोकपाल के पास सर्वोच्च ताकत होगी. यह संस्था कानून लागू करेगी, मामलों की जांच करेगी और सजा भी सुनायेगी. इसके पास न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका तीनों के अधिकार रहेंगे. सत्ता का इतना केंद्रीकरण और जिम्मेदारियों का अभाव फासीवादी राज्य को मजबूत करने के अलावा और क्या करेगा?
शुरू में ही मन में कुछ सवाल उठ रहे हैं. मसलन इस विधेयक के अनुसार भ्रष्टाचार का मतलब क्या होगा? क्या यह भोपाल गैस हत्याकांड में यूनियन कार्बाइड द्वारा नेताओं-जजों और अधिकारियों को बांटी गयी रकमों का खुलासा करेगा और एंडरसन को सजा देगा? क्या यह एनरॉन को बिजली न उत्पादित करने के लिए सरकार द्वारा दी जा रही रकम को ‘रिश्वत’ मानेगा? क्या यह कंपनियों के साथ सरकारों द्वारा किये जानेवाले जनविरोधी गोपनीय करारों को भ्रष्टाचार के रूप में परिभाषित करेगा? कंपनियों को करों की भारी छूट और कानून में ढील का क्या होगा? क्या सलवा जुडूम चलाने के लिए टाटा-एस्सार द्वारा रकम दिया जाना भ्रष्टाचार माना जायेगा? जाहिर है कि ऐसा कुछ भी नहीं होगा. और न ही यह विधेयक उन बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को पैसे बांटने से रोक पायेगा. इसके उलट, जैसा देखा गया है, यह दलितों और वंचित तबकों से आनेवाले अधिकारियों-नेताओं को परेशान करने और उन्हें अपने काबू में रखने के लिए शासक वर्ग द्वारा इस्तेमाल किया जायेगा. पहले भी भ्रष्टाचार के अधिकतर उन्हीं मामलों को उजागर किया गया जिनमें इन तबकों से जुड़े नेता-अधिकारी शामिल थे. जबकि ऐसा नहीं है कि प्रभुत्वशाली ब्राह्मणवादी तबकों के लोग भ्रष्टाचार में शामिल नहीं हैं. सबसे अधिक भ्रष्ट वे ही हैं, लेकिन उन्हें छुआ तक नहीं जाता. एक और तथ्य इस संदेह को मजबूत करता है, वह है मसौदा तैयार करनेवाली कमेटी की सामाजिक संरचना.
इसके अलावा लोकपाल एक चुनी हुई संस्था नहीं होगा और न ही यह जनता के प्रति जिम्मेदार होगा. इसमें भारत रत्न, नोबेल और मैग्सेसे सम्मान प्राप्त भारतीयों, सुप्रीम और हाई कोर्टों के वरिष्ठ जजों, महालेखाकार (कैग), मुख्य निर्वाचन आयुक्त और संसद के दोनों सदनों के अध्यक्ष लोकपालों की नियुक्ति करेंगे. सब जानते हैं कि नोबेल सम्मान किनके हितों के लिए काम करनेवालों को मिलता है. सब यह भी जानते हैं कि मैग्सेसे के जनसंहारों का इतिहास क्या है और यह किन्हें और क्यों दिया जाता है. भारत रत्न की राजनीति से हम सब वाकिफ हैं ही. इनमें से अधिकतर इस व्यवस्था का ही हिस्सा हैं और उनकी पक्षधरता पहले से ही जगजाहिर है. तो फिर लोकपाल किनके हितों के लिए काम करेंगे और उनमें कौन लोग चुने जायेंगे- इसकी राजनीति हम नहीं समझ सकते, इतने भी हम नादान नहीं हैं. तो फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ इस कवायद का मतलब क्या है?
गरीबी, उत्पीड़न, संसाधनों की लूट, दमन, एक के बाद एक घोटालों के उजागर होने और जनता के पैसे की भारी लूट सामने आने से जनता में गुस्सा और आक्रोश तेज होता जा रहा है. इससे मुसीबत में फंसे हुए शासक वर्ग ने पहले तो अजमेर शरीफ, समझौता एक्सप्रेस, मालेगांव, मक्का मसजिद जैसे बम हमलों के जरिये जनता को बांटने और इस गुस्से को अल्पसंख्यकों के खिलाफ मोड़ने की कोशिश की. लेकिन इसका भंडा फूट जाने के बाद शासक वर्ग ने जनता के असंतोष को भटकाने के लिए यह रणनीति अपनायी है. इसमें सभी पात्र अपनी भूमिकाएं बखूबी निभा रहे हैं- अन्ना हजारे भी. जिस मीडिया ने हजारे का इतना गुणगान किया, उसने हजारे के सामंती, सांप्रदायिक ब्राह्मणवादी फासीवादी चरित्र का जिक्र तक नहीं किया. इन ‘प्रदर्शनकारियों’ ने देश के विकास में भ्रष्टाचार को सबसे बड़ी बाधा बताया और इस तरह एक और दमनकारी कानून की पटकथा तैयार हो गयी. इस नाटक के जरिये सरकार ने यह भी दिखाने की कोशिश की कि वह शांतिपूर्ण तरीकों से आंदोलन करनेवालों की सुनती है. लेकिन यही सरकार AFSPA जैसे दमनकारी कानून के खिलाफ इरोम शर्मिला के दस साल से अधिक पुराने उपवास को नजरअंदाज करती रही है.
तब फिर हजारे को क्यों सुना गया?
एक पूर्व सेना कर्मचारी अन्ना हजारे महाराष्ट्र में यह एक ‘आदर्श गांव’ चलाता है. यह गांव ब्राह्मणवादी हिंदू धार्मिक मान्यताओं, राष्ट्रवादी उन्माद, ‘शुद्ध’ नैतिकता और जातीय उत्पीड़न के आधार पर चलता है. यहां स्त्रियां, दलित और अल्पसंख्यक उत्पीड़ित और हाशिये पर हैं. हजारे का सपना एक उग्र-राष्ट्रवादी ब्राह्मणवादी भारत का सपना है. 2009 में हजारे ने राज ठाकरे का समर्थन किया. नीतीश और नरेंद्र मोदी का समर्थन भी इसी की अगली कड़ी है. मोदी ने हजारे को जो चिट्ठी लिखी है, वह इन दोनों की वैचारिक एकता को ही दिखाती है. एक बार फिर भ्रष्टाचार का उपयोग फासीवाद को मजबूत करने के आधार के रूप में किया गया है. यही नाटक इंदिरा गांधी के शासनकाल में 1970 के दशक में खेला गया था, जब जनता इंदिरा शासन के खिलाफ उठ खड़ी हुई थी. तब इंदिरा ने कालाबाजार और भ्रष्टाचार को आपातकाल लागू करने का आधार बनाया था और असंतुष्ट जनता का फासीवादी दमन किया था. तब अन्ना हजारे की जगह विनोबा भावे ने इंदिरा के फासीवादी शासन के लिए लोगों की हिमायत जुटाने का काम किया और लोगों का ध्यान नक्सलबाड़ी के किसान आंदोलन से हटाया था. आज वह भूमिका अन्ना हजारे निभा रहे हैं. हजारे ने जनता के वाजिब गुस्से और असंतोष को एक फंडेड तमाशे में बदल दिया है. साथ ही हजारे के ‘आंदोलन’ ने उस शासक वर्ग को और अधिक ताकत दिला दी है जो गहराती सामाजिक-आर्थिक असमानता और जनता के दमन की बुनियाद पर ही जिंदा है. लेकिन तब भी वामपंथी पार्टियां (मुख्यतः सीपीआई, सीपीआईएम और भाकपा माले लिबरेशन) इस फासीवादी जुलूस में आगे-आगे रहे. लिबरेशन के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने हजारे और जन लोकपाल विधेयक को अपनी पूरी हिमायत दी. उन्होंने न हजारे के दक्षिणपंथी इतिहास की परवाह की और न ही उसके फासीवादी एजेंडे की. उनकी आंख तब खुली जब हजारे ने मोदी और नीतीश की तारीफ की. तब उन्होंने हजारे के बयान को नकारने की अपील की. पर यह बात वे नहीं समझ पाये कि भ्रष्टाचार से लड़ने के नाम पर हजारे के एजेंडे को अपनाते हुए- जो पूरी तरह ब्राह्मणवादी सांप्रदायिक एजेंडा है- उसके बयान को खारिज करना असंभव है.
यह समझना भी जरूरी है कि हजारे का भ्रष्टाचारविरोधी तमाशा शासकवर्ग की कलाबाजी है. इसलिए शासक वर्ग द्वारा प्रायोजित झूठे आंदोलनों के असली चरित्र को उजागर करने और उससे लड़ने के बजाय उसमें शामिल होना अवसरवाद और एनजीओपरस्त दिवालियेपन को ही दिखाता है. यह वैसी ही बात है जैसे साम्राज्यवादी एनजीओ मानते हैं कि महज कानून बना देना सारी समस्याओं का समाधान है- वह भी लोकपाल की तरह एक फासीवादी कानून. इसीलिए वे इस कानून को ’भ्रष्टाचार विरोधी एक मजबूत कानून’ मान रहे हैं. लेकिन वे भूल जाते हैं कि किसी कानून का लागू होना या न होना राज्य के चरित्र और उसके हितों पर निर्भर करता है. यही राज्य आरक्षण और नरेगा के कानून भी बनाता है पर उनको कभी ठीक से लागू नहीं करता, लेकिन AFSPA और UAPA जैसे कानूनों को लागू करने में कभी कोई लापरवाही नहीं बरती जाती.
सच तो यह है कि वर्गों में विभाजित समाज में भ्रष्टाचार बुराई नहीं बल्कि व्यवस्था का एक अनिवार्य हिस्सा है. जिस समाज में सारी आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियों की बुनियाद निजी संपत्ति में इजाफा हो, उसमें कोई भी गतिविधि बिना भ्रष्टाचार के नहीं चल सकती. आय और संसाधनों पर अधिकारों का जितना अधिक संकेंद्रण होगा, भ्रष्टाचार की मात्रा भी उतनी ही अधिक होगी. क्योंकि एक वर्ग समाज भले ही सबकी समानता की बात करे वह असमानता पर आधारित होता है और भ्रष्टाचार उन औजारों में से है, जो इस असमानता को संभव बनाते हैं. नरेगा का उदाहरण लेते हैं. अपने लागू होने के कुछ ही सालों के भीतर नरेगा देश की सबसे अधिक भ्रष्ट योजनाओं के रूप में स्थापित हुआ है. कई जगहों पर सरकारी आंकड़ों के अनुसार नरेगा में तीन चौथाई रकम भ्रष्टाचारियों की जेब में चली जाती है. लेकिन सरकार इसे रोकने को लेकर गंभीर नहीं है, क्योंकि आर्थिक विकास के इस मॉडल में अर्थव्यवस्था तभी चल सकती है जब निचले स्तर पर धन का वितरण नहीं बल्कि संकेंद्रण हो. भ्रष्टाचार धन के इस संकेंद्रण को संभव बनाता है और इस तरह यह अर्थव्यवस्था को गति देता है. इसके अलावा आय और संसाधनों पर अधिकारों का ध्रुवीकरण तेज हो रहा हो और एक साथ सैकड़ों अरबपति और 20 रु रोज पर गुजर कर रहे करोड़ों गरीब मौजूद हों तो भ्रष्टाचार ही प्रभुत्वशाली तबके के विशेषाधिकारों को तय करने का औजार बनता है. इसलिए चाह कर भी शासक वर्ग मौजूदा व्यवस्था में भ्रष्टाचार को नहीं मिटा सकता, वरना वह खुद खत्म हो जायेगा.
भ्रष्टाचार का सवाल साम्राज्यवादी लूट से भी जुड़ा हुआ है. साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था भ्रष्टाचार के जरिये काम करती है. तीसरी दुनिया में भ्रष्टाचार के रूप में जमा रकम विभिन्न वित्तीय संस्थाओं द्वारा अमेरिका और दूसरे साम्राज्यवादी देशों में ले जायी जाती है, जहां वह साम्राज्यवादी देशों के व्यापार घाटे को पाटने के काम आती है. कुछ साल पहले अमेरिका में यह रकम सैकड़ों बिलियन डॉलर प्रतिवर्ष थी. अगर यह रकम अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मिलनी बंद हो जाये तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था का बाहरी खाता डगमगा जायेगा और वहां का जीवन स्तर जमीन पर आ जायेगा. डॉलर भी कमजोर हो जायेगा तथा निवेश और ऋण के लिए पूंजी की उपलब्धता कम हो जायेगी. यह स्थिति वैश्विक साम्राज्यवादी ताकत के अस्तित्व को हिला देगी. इसलिए दुनिया का बढ़ता ध्रुवीकरण वास्तव में आपराधिक भ्रष्टाचार द्वारा जमा रकम के वित्तीय लेन-देन से जुड़ा हुआ है. सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि 630 लाख करोड़ रुपये की रकम भारत से बाहर गयी है. साम्राज्यवादी देशों में बड़े पैमाने पर काले धन का यह प्रवाह इन देशों में गरीबी, आर्थिक अस्थिरता और संकट को जन्म देता है. इसके नतीजे में ये देश फिर से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के पास वित्तीय मदद के लिए पहुंचते हैं और साम्राज्यवादी गुलामी में और अधिक बंध जाते हैं. ठीक यही वजह है कि दलाल शासक वर्ग, कारपोरेट जगत और मीडिया नहीं चाहेंगे कि भ्रष्टाचार पर वास्तविक रोक लगाई जाये. उल्टे वे इसे अधिक से अधिक कानूनी रूप देते जा रहे हैं. यह विशालकाय कारपोरेट घरानों को करों में भारी कानूनी छूट और दूसरी सुविधाओं को मुफ्त या नाम मात्र रकम पर मुहैया कराये जाने के रूप में सामने आता है. अकेले झारखंड जैसे राज्य में कुछ महीनों के लिए मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा द्वारा 2000 करोड़ रुपये जमा कर लेना बताता है कि कारपोरेट चालित वैश्वीकरण के इस दौर में कितना पैसा भ्रष्टाचार के रूप में बहाया जा रहा है.
हम देख रहे हैं कि इस तरह वाशिंगटन से लेकर दिल्ली और पंचायतों तक जब पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचार की बुनियाद पर टिकी है, तब महज एक कानून बना देने से वह खत्म नहीं हो जायेगा. इसलिए जन लोकपाल विधेयक जनता के हितों को पूरा करना तो दूर, वह जनता के खिलाफ इस्तेमाल किया जायेगा. अन्ना हजारे जैसे लोग जनता का भला करने के लिए नहीं उठ खड़े हुए हैं. वे दरअसल इस समस्या के असली कारणों को छुपा रहे हैं.

(जेएनयू में वितरित डीएसयू के परचे का संशोधित और विस्तारित रूप. मूल पर्चे के लिए यहां देखें: http://dsujnu.blogspot.com/2011/04/dsu-pamphlet-on-fight-against.html )

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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