हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कौन बताएगा कि हिंदी कैसे बदलेगी और कैसे चलेगी

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/11/2011 07:37:00 PM

सुशांत झा

12 मार्च को पेंग्विन बुक्स इंडिया और विजुअल आर्ट गैलरी की ओर से ‘हिंदी बदलेगी तो चलेगी’ नाम से एक वार्ता का आयोजन हो रहा है। इस वार्ता का विषय काफी स्पष्ट है। किसी भी जीवित भाषा में समय के साथ बदलाव उसकी कमजोरी नहीं बल्कि ताकत ही दिखाती है। दुनिया की सभी भाषाएं समय के साथ बदली हैं। शेक्सपीयर की अंग्रेजी आज के इंग्लैंड में नहीं चलती, इग्लैंड का लहजा अमेरिका में नहीं चलता और भारत में तो अंग्रेजी के कई रूप हैं। लेकिन हिंदी के संदर्भ में बात करें तो हिंदी बदलेगी ये स्वागतयोग्य और स्वाभाविक भी है, लेकिन सवाल है कि हिंदी कितना बदलेगी, इसकी दिशा क्या होगी और यह किस तरह वर्तमान समाज की चुनौतियों और सच्चाइयों का प्रतिनिधत्व कर पाएगी? क्या बेटा-बेटी के बदले सन और डॉटर मान्य करवा लिया जाएगा या फिर सरकारी पाठ्यक्रमों में मेटाबोलिज्म-कैटाबोलिज्म के बदले अपचय या उपचय जैसे शब्द ही चलते रहेंगे? दरअसल, आज की हिंदी इन्ही दो अतिवादी ध्रुवों के बीच फंसकर रह गयी है। यूं, मीडिया, सिनेमा और आम जनता के बीच संवाद में व्यापक तौर पर हिंदुस्तानी भाषा ही चलती है और यह एक सुकूनदेह बात भी है।

आजादी से पहले हिंदी और हिंदुस्तानी के प्रश्न पर महात्मा गांधी और पुरुषोत्तम दास टंडन में गंभीर बहस हुई थी। टंडन हिंदी (और एक हद तक हिंदू कट्टरपंथियों का भी) का प्रतिनिधित्व करते थे और उनका मानना था कि देवनागरी लिपि के साथ सिर्फ संस्कृतनिष्ठ हिंदी ही इस देश मे लागू की जानी चाहिए। गांधीजी हिंदुस्तानी के पक्ष में थे और वे देवनागरी या उर्दू में से एक को अपनाने के पक्षधर थे। गांधी ने इस मसले पर अखिल भारतीय हिंदी साहित्य परिषद से इस्तीफा तक दे दिया। लेकिन देश के बंटवारे ने हिंदुस्तानी का दावा कमजोर कर दिया और संस्कृतनिष्ठ सरकारी हिंदी देश पर थोप दी गयी। लेकिन फिर भी फिल्म, मीडिया और कला के स्वतंत्र क्षेत्रों में हिंदुस्तानी चलती रही और देश का आमजन हिंदुस्तानी में ही संवाद करते रहे।

लेकिन उस दौर में जो बहस हिंदी बनाम हिंदुस्तानी को लेकर हुई थी, वो आज खत्म हो चुकी है। सरकारी मठाधीशों से अलग प्रबुद्धजनों में इस बात पर लगभग आम सहमति बन चुकी है कि हिंदुस्तानी ही इस देश में चलेगी। लेकिन नब्बे के दशक के बाद से नयी अर्थव्यवस्था के दौर में बहस अब हिंदुस्तानी बनाम क्रियोलीकरण की हो रही है। एक तबका है जो आजादी पूर्व कट्टर हिंदी शुद्धतावादियों की तरह ही कट्टर क्रियोलीकरण का पक्षधर है। इसकी अगुआई कुछ मीडिया हाउस कर रहे हैं, जिन्हें लगता है कि दिल्ली-मुंबई के फ्लैटों में अखबार बिकवाने में मददगार हिंदी को दरभंगा या बलिया की कॉलोनियों में थोप देना चाहिए। जाहिर है, हिंदी को यहां असहजता का सामना करना पड़ रहा है और इन सारी कोशिशों को बदलाव के बहाने लागू करने की कोशिश की जा रही है। हिंदी में जबरन अंग्रेजी के शब्द ठूंसे जा रहे हैं, जिनका बाकायदा कई-कई विकल्प हिंदी-उर्दू में मौजूद होता है। ऐसा इस गलत धारणा के तहत किया जा रहा है कि अंग्रेजी के शब्द ठूंसने से भाषा ग्लोबल या एसपिरेशनल हो जाती है और लोगों की मानसिकता को अपील करती है। दरअसल कोई भाषा महज किसी अंतरराष्ट्रीय या प्रभावशाली भाषा से जबरन शब्द उधार लेकर ग्लोबल या एसपिरेशनल नहीं होती, बल्कि यह उस भाषा को बोलने वाले समाज की मजबूती और उस भाषा का ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला, रोजगार और व्यापार के क्षेत्रों में योगदान से होता है। जाहिर है, हिंदी इस मामले में काफी पीछे हैं।

एक पत्रकार और एक अनुवादक के तौर पर मैं अंग्रेजी से उन शब्दों को लेने का पक्षधर हूं, जिसका हिंदी विकल्प या तो उपलब्ध नहीं है या वह प्रचलन से बाहर है। हिंदी में ज्ञान-विज्ञान, कारोबार, कानून या चिकित्सा से संबंधित शब्दों की काफी कमी है। उसे अंग्रेजी में हूबहू लिख देने में मुझे कोई आपत्ति नजर नहीं आती। लेकिन उन शब्दों को जबरन हिंदी के आवरण में पेश करने से वहीं हाल होता है, जो ‘केप ऑफ गुड होप’ को ‘उत्तमाशा अंतरीप’ कहने से होता है। दरअसल, हिंदी की यहीं असली समस्या है। हम अक्सर अतिवादी हो जाते हैं। हमें अतिवाद से बचते हुए भाषा में बदलाव लाना होगा और यह बदलाव तकनीकी, कारोबारी और रोजगारपरक शब्दों को हिंदी में लाने पर हो तो और भी अच्छा है। बदलाव महज इसलिए न हो कि एक छोटे से नव-धनाढ़्य प्रभु वर्ग को फैशनेबल हिंदी परोसा जाए या उनकी भाषा उधार ले ली जाए ताकि लोगों को ग्लोबल सिटिजन महसूस करवाया जा सके।

इसमें बड़ी समस्या सरकारी स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली हिंदी ने पैदा की है। एक ग्रामीण-कस्बाई छात्र जो जीवन का एक कीमती दशक इन स्कूलों में गुजारकर आता है, वो रोजगार के बाजार में अपने को असहाय पाता है, क्योंकि वहां अंग्रेजी या हिंग्लिश चलती है। जबकि वो स्कूलों में संस्कृतनिष्ठ हिंदी सीखकर निकला होता है, जो बहुत समय तक उसका पीछा नहीं छोड़ती। सवाल यहां फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने का नहीं, बल्कि ऐसी हिंदी बोलने का भी है जो सबको समझ आये, जिसमें संवाद हो, जो ज्ञान-विज्ञान, वित्त, व्यापार आदि के क्षेत्रों में आगे बढ़ने की ललक पैदा कर सके। लेकिन अफसोस की बात यह है कि सरकारी हिंदी पुरुषोत्तमदास टंडन से आगे नहीं आ पायी है।

महात्मा गांधी और टंडन में जो हिंदी और हिंदुस्तानी को लेकर विवाद हुआ था, वह भी बदलाव का ही विवाद था। जाहिर है गांधी बदलाव के पक्षधर थे, लेकिन उनके पास इतनी अंतर्दृष्टि मौजूद थी कि वो कृत्रिम और साष्टांग होकर हिंदी में अंग्रेजी के शब्द घुसेड़ना नहीं चाहते थे।

हिंदी में बदलाव की बात करनेवालों के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है और मौका भी है कि वो कैसे हिंदी को इस बदलती दुनिया के हिसाब से प्रसांगिक बना पाते हैं। किसी भी भाषा में उसके बोलनेवालों की संस्कृति, परंपरा, भाईचारा और राष्ट्रीयता तो झलकती ही है साथ ही उनकी आकांक्षा भी झलकती है। जाहिर है, हिंदी की भाषाई मौलिकता को बचाते हुए उसे आकांक्षा के साथ भी जोड़ना होगा।
(मोहल्ला लाइव से साभार)

पितृसत्ता की शुरुआत हुई थी और उसका अंत भी होगा

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/08/2011 12:34:00 PM

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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