हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

जेएनयू में लिंगदोह को लागू करवाने की साजिशें और इसका विरोध

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/19/2011 01:09:00 AM

सीपीएम के छात्र संगठन एसएफआई ने जेएनयू में आजकल एक उन्माद का माहौल पैदा किया हुआ है- चुनाव कराने का. उनका नारा है कि वे किसी भी हालत में चुनाव कराएंगे. यानी लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को कबूल करके भी चुनाव कराएंगे. पिछले तीन सालों से जेएनयू के छात्रों ने एक आवाज में लिंगदोह को नकारा है और इसीलिए यहां चुनावों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक लगी हुई है. लेकिन अब इस उन्माद की लहरों पर सवार होकर लिंगदोह को जेएनयू में लाने की तैयारी चल रही है. छात्रों के हितों के खिलाफ और देश भर के कैंपसों के कारपोरेटीकरण, निजीकरण, ब्राह्मणीकरण और अ-राजनीतिकरण की तरफ ले जाने वाले इस कदम में एसएफआई के साथ अब आइसा भी शामिल हो गया है. आइसा उसी भाकपा माले लिबरेशन का छात्र संगठन है, जो अन्ना के फासीवादी आंदोलन के लिए लोगों को जुटाते हुए देखा गया था. बल्कि उसने वर्ल्ड बैंक और आरएसएस समर्थिक अन्ना आंदोलन को साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन तक साबित करने की कोशिश की. यह भी याद रखना जरूरी है कि लिबरेशन की सांस्कृति ईकाई जसम के एक हिस्से ने नया ज्ञानोदय में विवादित इंटरव्यू के मामले में विभूतिनारायण राय का भरपूर समर्थन किया था. दोनों संगठनों द्वारा लिंगदोह को लाने की इस कोशिश का जेएनयू के कई संगठन और छात्र मजबूती से विरोध कर रहे हैं. इसी क्रम में आज कई जगह लिंगदोह के खिलाफ नाटक किए गए और कुछ छात्रों ने यह पर्चा वितरित किया. आप भी पढ़िए. यह मुद्दा इसलिए भी जरूरी है कि यह पूरे देश में चल रहे निजीकरण और कारपोरेटीकरण की प्रक्रिया से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है.

एसएफआई से आई आवाज, आईसा जिंदाबाद

( यहां विरोध ही वाजिब कदम है/हम समझते हैं/हम कदम कदम पर समझौता करते हैं/हम समझते हैं/हम समझौते के लिए तर्क गढ़ते हैं/ हर तर्क को गोल-मटोल भाषा में पेश करते हैं/ हम समझते हैं/हम गोल-मटोल भाषा का तर्क भी समझते हैं-गोरख पाण्डेय, ‘ समझदारों [आइसा-एसएफआई] का गीत’)

परसों मंगलवार को एक ऐतिहासिक UGBM है. हम दूर-दराज के गांवों, छोटे कस्बों और शहरों से, मुसहरी और मुस्लिम बस्तियों से, जंगलों और घाटियों से आनेवाले छात्रों के लिए एक ऐतिहासिक मौका है, जब हम यह तय करने जा रहे हैं कि हमारे छात्रसंघ का चुनाव किस तरीके से होगा. यह एक ऐतिहासिक मौका है क्योंकि UGBM में शामिल होकर वोट डाल कर जब हम यह तय करेंगे कि रेफरेंडम किन विकल्पों के साथ होनेवाला है तो साथ में हम यह भी तय करेंगे कि यूनिवर्सिटी में हमारी फीस सस्ती रहेगी या महंगी हो जाएगी. हमें हॉस्टल और मेस की सब्सीडियां मिलती रहेंगी या बंद हो जाएंगी. हम यह भी तय करेंगे कि हमारे कैंपस में छात्रों को हासिल जनवादी अधिकार, असहमति व्यक्त करने और संघर्ष करने का अधिकार, पब्लिक मीटिंग करने, परचा लाने और पोस्टर लगाने का अधिकार रहेगा या नहीं. क्योंकि ये सारे मामले इस बात से जुड़े हुए हैं कि हम रेफरेंडम के लिए कौन-से विकल्प चुनते हैं और अपना छात्र संघ चुनाव किस तरीके से कराते हैं. पिछले तीन सालों से इस कैंपस के छात्रों ने लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को एक आवाज में नकारा है. लिंगदोह का मकसद निजीकरण को बढ़ावा देना और फीस बढ़ाना है. यह हमारे संघर्षों और छात्रसंघ संविधान द्वारा हासिल हमारे अधिकारों को कुचल देगा. साथ ही लिंगदोह कमेटी का एजेंडा यह भी है कि छात्र अपने आस-पास में क्या हो रहा है, इससे कट जाएं, सारी दुनिया में क्या हो रहा है इससे वो मतलब नहीं रखें. वे कैंपस से बाहर की राजनीति से कोई संबंध नहीं रखें और कारपोरेट कंपनियों के चाकर बन जाएं. साथियो, यह ऐतिहासिक मौका इसलिए भी है कि तीन साल तक लगातार लिंगदोह को बाहर रखने की कोशिशों को नाकाम करते हुए इस कैंपस के दो संगठन AISA और SFI लिंगदोह को एक विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं.

इस कैंपस में लिंगदोह की हिमायत में पहली आवाज ब्राह्मणवादी Youth For Equality ने उठाई थी. लेकिन लिंगदोह और ब्राह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष करते हुए छात्रों ने YFE की कमर तोड़ दी है. वह उठ नहीं पा रहा है. इसलिए उसका जिम्मा पहले SFI ने अपने कंधे पर उठाया और पिछले दो महीनों से वह कैंपस में लगातार लिंगदोह को एक विकल्प के रूप में प्रचारित कर रहा है. इसे वो हर हालत में चुनाव चाहिए के नारे की ओट में पेश कर रहा है. यह लिंगदोह के खिलाफ छात्रों के लतागार जारी संघर्षों और जनमत का ही नतीजा है कि एसएफआई खुल कर लिंगदोह का समर्थन नहीं कर पा रहा है.

लेकिन लिंगदोह को मान कर चुनाव कराने की SFI की कोशिशों को AISA ने पछाड़ दिया है. वो छात्रों में भ्रम फैलाने वाली अपनी ‘ग्रे एरिया’ (बीच के रास्ते वाली) राजनीति को लेकर छात्रों के सामने आया है. मजे की बात यह है कि उसका बीच का रास्ता लिंगदोह की दलदल से होकर गुजरता है. छात्रों को पता होगा कि रेफरेंडम के लिए  SFI के दो विकल्पों की जगह DSU ने एक दूसरा प्रस्ताव सामने रखा है, जिसमें लिंगदोह के लिए कोई जगह नहीं है. AISA ने इन दोनों विकल्पों की एक खिचड़ी बनाई है और रेफरेंडम के लिए तीन विकल्पों को लेकर सामने आया है. उसके विकल्प हैं: कोर्ट ऑर्डर को नकारते हुए JNUSU संविधान के तहत चुनाव कराना, Joint Struggle Committee का चुनाव कराना और लिंगदोह को मानकर चुनाव कराना. अपनी इस चालाकी भरी तरकीब के जरिए AISA ने लिंगदोह के लिए रास्ता साफ करने की कोशिश की है. इन तीन विकल्पों में पहले दोनों विकल्प लिंगदोह को नकारते हैं और अगर AISA के प्रस्ताव के मुताबिक रेफरेंडम होता है तो लिंगदोह विरोधी वोट बंट जाएंगे और इस तरह लिंगदोह के तहत चुनाव कराना और आसान हो जाएगा. AISA ने अपनी धूर्तता में SFI को बहुत पीछे छोड़ दिया है. इस तरह कैंपस में लिंगदोह को लाने का सेहरा अपने सिर बांधने के लिए AISA और SFI में जो होड़ चल रही है, उसमें AISA फिलहाल SFI से बहुत आगे निकलता दिख रहा है. वह अपने कंधे पर लिंगदोह की पालकी ढोने को बेकरार है.
 
साथियो, हमें AISA और SFI के लिंगदोह के विकल्प वाले प्रस्तावों के पीछे की राजनीति समझनी होगी. ये दोनों कह रहे हैं कि वे चुनाव कराने के तरीकों पर एक विचार-विमर्श के तहत ऐसा कर रहे हैं. लेकिन विचार-विमर्श तो तब होता है, जब सभी पक्ष अपना स्टैंड साफ-साफ रखें. AISA और SFI सिर्फ चुनाव कराने का नारा दे रहे हैं. वे लिंगदोह को मंजूर करने या न करने पर अपनी कोई राय नहीं रख रहे हैं. लेकिन साथ ही वे लिंगदोह के खिलाफ विकल्पों पर छात्रों को धमका भी रहे हैं. इस तरह वे ऐसी स्थितियां बना रहे हैं कि लिंगदोह को लाने का इलजाम उनके सिर न आए और बाद में वो इसका ठीकरा आम छात्रों के सिर पर फोड़ सकें. यहां तक कि AISA ने कल अपने पर्चे में लिंगदोह के तहत चुनाव कराने के फायदे भी गिनाए हैं. उन्हें अब लिंगदोह में फायदे भी नजर आने लगे हैं. चालाकी देखिए कि वे झूठ बोलने और छात्रों को बरगलाने से भी नहीं चूकते. AISA ने एक फायदा यह बताया है कि लिंगदोह को मान कर अभी चुनाव करा लेने से लिंगदोह के खिलाफ हमारे संघर्ष और कोर्ट में केस पर कोई उल्टा असर नहीं पड़ेगा. लेकिन सच तो यह है कि एक बार लिंगदोह को मान कर चुनाव करा लेने के बाद कोर्ट में हमारा केस खत्म हो जाएगा. सुप्रीम कोर्ट में हमारा केस लड़ रहे वकील का भी यही कहना है.
 
साथियो, AISA आइसा का धोखेबाजी और गद्दारी भरा असली चरित्र बार-बार सामने आता रहा है. इसकी पैरेंट पार्टी भाकपा माले लिबरेशन को संघर्षरत किसान-मजदूर जनता ने खदेड़ कर भगा दिया है. वे अब इतिहास के कूड़ेदान में फेंके जाने का इंतजार कर रहे हैं. यह वही थकी, बिखरी, पतित और पराजित ताकत है, जो संघर्ष के मोर्चे के बजाय हमेशा बीच का रास्ता अपनाती है. जब जनता आर-पार की लड़ाई लड़ रही होती है तो वे ग्रे एरिया खोजते हैं और लोगों में कन्फयूजन फैलाते हैं. इस तरह वे जनता के दुश्मनों का पलड़ा ही भारी करते हैं. लड़ाई के मोर्चों पर वे कहीं नहीं दिखते. इसके बजाय वे समझौते के हर मंच पर दिखते हैं. उन्होंने रामलीला मैदान में वर्ल्ड बैंक और RSS द्वारा प्रायोजित अन्ना के फासीवादी आंदोलन के लिए लोगों को जुटाया. कारपोरेट लूट से लड़ने के नाम पर वे कारपोरेट फंडेड आंदोलनों में शामिल होते हैं और ब्राह्मणवाद से लड़ने के नाम पर ब्राह्मणवादी चालबाजियों को जगह देते हैं. कारपोरेट समर्थित ब्राह्मणवादी लिंगदोह आयोग की सिफारिशों के पक्ष में खड़ा होना इसकी सबसे ताजा मिसाल है. साथियो, संघर्ष में ही लोगों के चेहरे पहचाने जाते हैं, रंगे सियारों का भेद खुलता है. AISA बेनकाब हो चुका है. लिंगदोह को लाकर चुनाव कराने की उनकी बेकरारी को हम समझते हैं. वे लिंगदोह को मंजूर कर सकते हैं क्योंकि उनको संघर्ष और संघर्ष की राजनीति से कोई मतलब नहीं है. वे एनजीओ फंडेड ‘क्रांतिकारियों’ का गिरोह हैं, जिन्हें समझौतों और सौदेबाजियों की मलाई से मतलब है. लिंगदोह आ जाने से उनका काम आसान हो जाएगा.
 
इसलिए साथियों दांव पर बहुत कुछ लगा है. चालीस साल के हमारे संघर्षों से हासिल अधिकारों और तीन साल से लिंगदोह के खिलाफ हमारी कामयाबियां दांव पर हैं. हमारा डेमोक्रेटिक स्पेस और राजनीतिक बहस-मुबाहिसे और देश-दुनिया की राजनीति से हमारा जुड़ाव दांव पर है. संघर्ष की हमारी विरासत दांव पर है. यह हमें तय करना है कि अपनी राजनीति को हम खुद तय करेंगे या ब्राह्मणवादी और कारपोरेटों के दलाल प्रशासन और गृह मंत्रालय. AISA और SFI हमारे कैंपस की राजनीति और छात्रों के अधिकारों को इनके हाथ बंधक रखने को बेकरार हैं. क्या हम उन्हें ऐसा करने देंगे? हमारे सामने कोई बीच का रास्ता नहीं है. बस दो ही रास्ते हैं: या तो लिंगदोह को मंजूर करना या उसे पूरी तरह खारिज करना. अब तक हमने अपने संघर्षों से इसे खारिज किया है. इसे कैंपस में दाखिल न होने दें.
 
उमर, हेम, शाश्वती, रूबीना, रेयाज, गोगोल, अंजली, मनभंजन

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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