हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भ्रष्ट्राचार विरोधी राष्ट्रवाद चाहिए

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/12/2011 12:41:00 PM

अनिल चमड़िया

दो दिनों पहले जहानाबाद में एक थोक व्यापारी ने तीसी का भाव अट्ठाईस रुपये किलो बताया था और कल मैंने दिल्ली में रोहिणी के एक दुकानदार के यहां तीसी सत्तर रुपये खरीदी। संसद में महंगाई पर जो बहस हुई उसमें सासंदों ने अपने-अपने हिस्से के अनुभव सुनाए। संसद में बताया गया कि किसान तीन हजार रुपये प्रति क्विंटल दाल बेचता है और वह व्यापारी के यहां से होकर दुकानदार के यहां नब्बे रुपये किलो बिकता है। किसान के यहां का सात सौ रुपये का चावल दो हजार रुपये में बिकता है। बिहार के गांवों में दो रुपये किलो की सब्जी पटना के बाजार में 15 रुपये किलो और दिल्ली के बाजार में 15 रुपये पाव बिकती है।
मौजूदा सरकार के कार्यकाल में संसद में बारह बार महंगाई पर बहस हो चुकी है और सरकार ने मंहगाई को रोकने में अपनी लाचारी जाहिर कर दी है। अन्ना हजारे के आंदोलन के जवाब में सरकार का यह कहना कि यह संसद और संविधान की सर्वोच्चता को चुनौती है, तो शायद ये लोकतंत्र का सबसे बड़ा झूठ है। कई ऐसे विषयों की गिनती करायी जा सकती है जिसमें सरकार ने संसद की प्रासंगिकता को कटघरे में खड़ा किया है। परमाणु समझौते के खिलाफ पिछले सदन की आम राय थी। जातिवार गणना को लेकर सदन की आम राय थी। नागरिकों पर एक पहचान पत्र लादने के फैसले को बिना सदन की अनुमति के लागू की कर दिया गया। संसद और संविधान को चुनौती अंदर से है। प्रधानमंत्री की यह सफाई कि मैं कमजोर नहीं हूं, यह लाचारी कि वे ज्योतिषी नहीं होने की वजह से महंगाई को रोकने की अवधि नहीं बता सकते और लाचारी के तौर पर यह प्रस्तुति कि भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जादू की छड़ी नहीं बना सकते ये संसद की ताकत के कमजोर होने की ही घोषणाएं हैं। लोकतंत्र में मतदान का ऊपरी ढांचा ही संविधान की समाजवादी भावनाओं की रक्षा को सुनिश्चित नहीं करता है। चुनाव के आवरण के अलावा पूरी प्रक्रिया में क्या बचा है जहां संसद कमजोर नहीं की गई है। जिस देश में 20 रुपये से आठ रुपये तक रोजाना की कमाई पर 77 प्रतिशत आबादी जीवन काटती हो वहां सांसद को चुनाव लड़ने के लिए वैधानिक तौर पर कम से कम पच्चीस लाख रुपये चाहिए। सांसद दलबदल कानून से बंधा है उसे अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है। भ्रष्टाचार को खत्म करने के नाम पर ही यह कानून बना था। संसद की राजनीति बुरी तरह कुंठित हुई है। दरअसल सरकार और संसदीय पार्टियों ने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के विरोध में जन लोकपाल को एक मात्र हथियार बनाने के आंदोलन के खिलाफ जो रास्ते तैयार किए उनमें तो कोई दम नहीं है।
इसमें भी दो राय नहीं होनी चाहिए कि गांधीवादी छवि के अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने देश में के एक तरह की सोच वाले लोगों को एकजुट किया है। जो वर्ग अपने आप में सिमटा हुआ था और रात को इंडिया गेट पर टहलने निकलता था वह रामलीला मैदान में भी दिखा। युवाओं तक आंदोलनों की जरूरत पहुंची। भूमंडलीकरण के दौर में पहले के मुकाबले बेहतर जीवन जीने वाले वर्ग ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भागीदारी की है। एक चेतना का विस्फोट हुआ है। उसने समाज के दूसरे वर्गों को भी प्रभावित किया है। वैसे भी भूमंडलीकरण का दौर शुरू होने के बाद अलग अलग मुद्दों के प्रति जागरूक करने का ही अभियान चला है। शायद ही कोई ऐसा मुद्दा होगा जिसे लेकर सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने अलग अलग आंदोलन नहीं किया होगा और जन समर्थन नहीं बटोरा हो। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह इस किस्म का पहला ऐसा आंदोलन है लिहाजा उसने भी सत्ता के स्तंभों के भ्रष्टाचार की तरफ लोगों को जागरूक किया है। समाज के प्रति समग्रता में जागरूकता मुक्कमल राजनीतिक चेतना विकसित करती है। उपनिवेशवाद का विरोध एक मुक्कमल राजनीतिक चेतना का विस्तार करता है। लेकिन भ्रष्टाचार उपनिवेशवाद नहीं है। अन्ना केवल भ्रष्टाचार के विरोधी नेता के रूप में उभरे हैं। यह ध्यान रखना होगा।
इस अभियान ने आंदोलनों के लिए कई सवालों को हल किया है। मसलन आंदोलन का रूप महत्वपूर्ण नहीं होता है। आंदोलन के मुद्दे और उसके समर्थक शक्तियां महत्वपूर्ण होती हैं। मणिपुर में इरोम शर्मिला दस वर्षों से ज्यादा समय से बंदूकधारी सैनिकों को यमराज जैसे प्राप्त अधिकारों के खिलाफ सत्याग्रह कर रही है। लेकिन प्रधानमंत्री के आश्वासन के बावजूद सैनिकों के अधिकार बने हुए हैं। दूसरा कि भगवा लिबास में भूमंडलीकरण के दौर के राष्ट्रवाद को खड़ा नहीं किया जा सकता है। योग व्यापारी बाबा रामदेव को उनके आंदोलन के दमन के बाद वह समर्थन हासिल नहीं हुआ जो अन्ना को हुआ। यह स्थापित हुआ है कि उपनिवेशवाद के दौर में गांधी की जो वेशभूषा प्रतिष्ठित हुई उसी रंग-रोगन में ही भूमंडलीकरण के दौर का नया राष्ट्रवाद खड़ा किया जा सकता है। भूमंडलीकरण की नीतियों के आधार में जो समर्थक वर्ग रहा है वही प्रभावशाली रूप में दिल्ली में अन्ना के आंदोलन के समर्थन में उतरा इसीलिए सरकार का रूख दुविधाग्रस्त दिखाई देता रहा। मीडिया को दुविधा नहीं हुई क्योंकि हर लिहाज से अन्ना का आंदोलन उसके हित में रहा। मीडिया की इस समय बहुत बड़ी भूमिका हो गई है। महंगाई के खिलाफ कई बार विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने आंदोलन करने की कोशिश की। भ्रष्टाचार के खिलाफ भी विभिन्न राजनीतिक संगठनों ने आंदोलन करने की कोशिश की है। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ गैर राजनीतिक नेतृत्व के आंदोलन को ही समर्थन हासिल होते क्यों देखा जा रहा है? क्या यह माना जाए कि किसी मुद्दे पर अब राजनीतिक आंदोलन का समय चला गया? या फिर यह माना जाए कि देश की राजनीति एक नई शक्ल अख्तियार कर रही है ?
दुनिया भर में शासन चलाने के लिए आधुनिक राजनीतिक व्यवस्थाएं ही बनी हुई हैं। इसीलिए राजनीतिक रास्तों से ही इन व्यवस्थाओं में सुधार किया जा सकता है। राजनीतिक पार्टियां संसदीय व्यवस्था में चाहें सत्ता में हो या विरोध में रही हो वे कमोबेश भूमंडलीकरण की व्यवस्था की पक्षधर रही हैं। संसद अब शायद उसी के लिए चलने का एहसास कराती है। अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर तो सरकार जाने के जोखिम से ज्यादा इस बात को लेकर ज्यादा भरोसा दिखा कि संसदीय परंपराएं और मर्यादाएं नहीं भूमंडलीकरण की पक्षधर शक्तियां सरकार को बचा ले जाएंगी। यह भरोसा इसीलिए बना क्योंकि अपनी अंतर्धारा में संसद भूमंडलीकरण की हो चुकी है। यह अंतर्धारा कैसे मजबूत होती चली गई है, इसे समझने की कोशिश की जा सकती है। क्या आंदोलन, मीडिया और पार्टियों के भीतर एक ऐसी अंतरधारा विस्तारित हुई है जो विभिन्न रूपों में अलग-अलग या विरोधी दिखने के बावजूद एक होती है? नई आर्थिक नीतियों को लागू करने वाली सरकारों पर यह दबाव बढ़ रहा है कि वह देश में बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए दरवाजे और खोल दें। सरकार में वैसे लोग बड़ी तादाद में है जो इस किस्म का बहाना ढूंढ़ रहे हैं कि वे उसकी आड़ में कंपनी राज के हितों में फैसले लेने की मजबूरी जाहिर कर दें। अभी योजना आयोग ने भविष्य के लिए अपने नजरिये को इसी तरह पेश किया है। योजना आयोग का ये कहना है कि लाइसेंस परमिट राज खत्म करने से भ्रष्टाचार खत्म हो गया। जबकि हकीकत तो यह है कि जिन अफसरों और विभागों और राजनीतिक नेताओं को परमिट लाइसेंस देने के लिए घूस देना पड़ता था वे बिना परमिट लाइसेंस के समाज को ज्यादा लूट रहे हैं। उन पर किसी तरह का कोई नियंत्रण नहीं है। वे लोग ज्यादा लूट के लिए पहले के मुकाबले विभाग, अफसर और राजनीतिक नेताओं को ज्यादा घूस दे रहे हैं। यही वजह है कि भ्रष्टाचार का दायरा बढ़ा है। ज्यादा से ज्यादा लूटने के लाइसेंस खरीदने की होड़ मची है और वह विकास का मानक बना हुआ है।
एक तरफ अन्ना हजारे का अभियान इस बात को लेकर ही अड़ा हुआ है कि लोकपाल बिल में प्रधानमंत्री, संसद सदस्यों और न्यायपालिका को भी शामिल किया जाना चाहिए। ये राजनीतिक व्यवस्था को चलाने वाले तंत्र के हिस्से हैं। दूसरी तरफ भ्रष्टाचार से निपटने के लिए लोकपाल का जो तंत्र बनाने की वकालत की जा रही है उसका जनता से कोई सरोकार नहीं होगा। भ्रष्टाचार के अर्थ आंदोलन में खुल नहीं रहे हैं। बड़ी बड़ी कंपनियों के मालिक बीसेक वर्षों में हजारों हजार करोड़ के मालिक बन गए है। यह सही बात है कि इन कंपनियों का राज बनाने वाली यही संसद और उसके नेतागण रहे हैं। दरअसल राजनीति जब एक बार पूंजीवाद की गिरफ्त में चली जाती है तो फिर राजनीति को उसके दबाव में ही रहना पड़ता है। जनता की भलाई करने वाली राजनीति को परछाई और पूंजीवाद की शक्ल अख्तियार करनी पड़ती है। अभी पूंजीवाद की राजनीति पर गिरफ्त इतनी ज्यादा है कि उसके समर्थक ही सरकार के कर्ताधर्ता बने हुए हैं। देश में आम लोगों की भलाई के लिए चलने वाली राजनीति दोराहे पर खड़ी हो गई है।
अन्ना हजारे का अभियान इस रूप में जागरूक करने की कोशिश रहा है कि उनके द्वारा बनाया गया लोकपाल बिल यदि संसद से पारित कर दिया गया तो भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। दूसरा कोई नारा भी नहीं है। वंदे मातरम, भारत माता की जय और अन्ना का करिश्मा ही नारे की शक्ल में सामने आ रहा है। यह बहुत संभव है कि अन्ना पैसे-कौड़ी के मामले में ईमानदार व्यक्ति हों। मनमोहन सिंह के बारे में भी कहा जाता रहा है कि वे बेहद ईमानदार प्रधानमंत्री है। अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में भी यही बात कहीं जाती रही है। ईमानदार व्यक्ति ईमानदार के अलावा वो बहुत कुछ हो सकता है जो समाज और लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं हो। सवाल यह है कि ईमानदार व्यक्ति की ऊर्जा कहां लग रही है। ईमानदारी और व्यक्तिगत त्याग किसके काम आ रहा है। दरअसल किसी आंदोलन में मुद्दा ही महत्वपूर्ण नहीं होता है बल्कि किसी भी आंदोलन की अंतरधारा में क्या है वह बहुत महत्वपूर्ण होता है। अन्ना के आंदोलन में जो अंतरधाराएं हैं वे वंदे मातरम, भारत माता की जय की शक्ल में भी हैं। जय प्रकाश ने जब आंदोलन शुरू किया था तो ऊपर से वह दूसरी आजादी की लड़ाई दिख रही थी। लेकिन अंदर जाति, धर्म, पूंजीवादी , धार्मिक राष्ट्रवाद, भ्रष्टाचार आदि भी बने हुए थे। इसीलिए उस आंदोलन के बाद ये सारी धाराएं बहुत मजबूती से उभरकर सामने आईं। इतिहास में कई बार होता है कि जब राजनीतिक तौर पर अपनी ताकत बढ़ाना संभव नहीं होता है तो विभिन्न तरह की धाराएं किसी मुद्दे के जरिये अपनी हैसियत बढ़ाने की कोशिश करती है। भूमंडलीकरण के शुरू होने के बाद जिस तरह की धाराएं राजनीतिक तौर पर कमजोर व पराजित हुई है, वे लगातार अपनी जमीन को मजबूत करने की कोशिश में लगी है। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी धारा में कितनी तरह की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक धाराएं सक्रिय हैं, इसका अध्ययन किया जाना चाहिए। यह सच है कि समाज का हर हिस्सा भ्रष्टाचार की एक धारा के दमन का शिकार है लेकिन केवल वही एका का आधार बन सकता है?

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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