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बीच सफ़हे की लड़ाई

मारूती-सुजुकी मजदूरों के संघर्ष में उनका साथ दें

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/10/2011 04:13:00 PM

गुड़गांव में मारूती-सुजुकी के मजदूरों का संघर्ष एक बार फिर तेज हुआ है. कुछ महीने पहले भी उन्होंने अपनी मांगों को लेकर आंदोलन किया था. उन्हें हमारे-आपके समर्थन की जरूरत है. सामाजिक कार्यकर्ता अंजनी कुमार ने मजदूरों की हालत और उनके आंदोलन का जायजा लेते हुए यह रिपोर्ट लिखी है. साथ में उन्होंने कुछ मजदूरों से बातचीत भी रिकॉर्ड की है, जिसे हम यहां पोस्ट कर रहे हैं.

मारूती सुजुकी इंडिया लिमिटेड, मानेसर गुडगांव की चार यूनिट कंपनियों में से एक में काम ठप्प है। अखबारों ने दावा किया कि एक बार फिर मजदूर हड़ताल पर हैं। प्रबंधन ने दावा किया कि वे मजदूरों के साथ वार्ता कर रहे हैं। अखबार में छपी इन खबरों पर यदि भरोसा किया जाए तो वहां के हालात बहुत बुरे नहीं हैं बल्कि यह सारा मामला मालिक मजदूर के बीच चलने वाले एक आम तनाव जैसा है.

पर वहां के हालात इन सारे दावों से अलग है। मारूती सुजुकी के गेट . 2 पर पुलिस प्राइवेट सेक्योरटी गार्ड पूरी मुस्तैदी के साथ तैनात हैं। मैं 6 सितंबर, 2011 को जब दोपहर एक बजे गेट . 2 पर पहुंचा तब सड़क के दोनों तरफ टेंट लगा हुआ था। कंपनी के प्रवेश वाले गेट से लेकर सड़क के सर्विस लेन तक स्थाई शेड वाला टेंट लगा हुआ था। सामने लगभग 50 सेक्योरिटी गार्ड पहरे पर थे। अंदर जाना मना था। मजदूर तो दूर पत्रकारों को भी इसके पास जाने पर धक्का-मुक्की झेलनी पड़ रही थी। शेड के अंदर सुरक्षा का दूसरा दायरा था। मजदूरों का दावा है कि अंदर कम से कम 500 पुलिस है। सच्चाई को देख मुश्किल था। यूनिट दो के विशाल दायरे को उंचे कनातों से घेर दिया गया था। इसलिए अंदर झांक सकना मुश्किल था। कंपनी की इमारत के ऊपर कई सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे जो सामने विरोध कर रहे मजदूरों की फिल्म बना रहे थे। मजदूर इस बात को जानते थे कि यदि समझौता हो भी गया तो सक्रिय लोगों के खिलाफ इसी सीसी कैमरे के फुटेज के आधार पर बाद में कार्रवाई होगी। इस फैक्टरी गेट पर लाउडस्पीकर से लगातार यह घोषणा की जा रहा था कि अनुशासन का उल्लघंन कंपनी नियमों का उलंघन है और इसका परिणाम मजूदरों का निष्कासन हो सकता है। इसी दिन कंपनी ने मजदूरों के नाम कंपनी के महाप्रबंधक एम के दवे ने एक नोटिस निकाल रखा था जिसका कुल जमा सार यह था कि मजदूर स्थाई आदेश के खंड 25-3बी के तहत उत्तम आचरण के अनुबंध पर हस्ताक्षर करें।

यह सब कुछ से ऐसा लग रहा था मानों मजदूर अनुशासन का उल्लंघन कर हड़ताल पर चले गए हों। पर बात इससे उलट है। सड़क के दूसरी ओर एक पेड़ के सहारे बांधे गए पतले कपड़े के टेंट के नीचे बैठे सैकड़ों मजदूर एक दूसरी ही बात बता रहे थे। उनके अनुसार कंपनी ने 28 अगस्त, 2011 की रात से ही लॉकआउट कर गेट पर पुलिस सेक्योरिटी गार्ड का पहरा बैठा रखा था। करीब ढाई हजार मजदूर इस लॉकआउट से प्रभावित हैं. किसी भी मजदूर को अंदर आना मना था। यह हड़ताल के बजाय लॉकआउट है। इसके पहले कुल एक महीने में लगभग 54 मजदूरों को अनुशासन के नाम पर निलंबित बर्खास्त किया जा चुका था। 29 अगस्त को गेट पर धक्का-मुक्की हुई। पर प्रबंधन की ओर से मजदूरों की बात सुनने कोई नहीं आया। मारूती सुजुकी के एक दूसरी ईकाई एकमात्र यूनियन के नेता कुलदीप ने जब बात करने की कोशिश की तो प्रबंधन ने बर्खास्त मजदूरों को किसी भी शर्त पर वापस लेने को तैयार नहीं हुआ। यूनिट दो में किसी भी यूनियन के होने की शर्त को सिरे से नकार दिया। यहां तक कि मजदूर प्रतिनिधियों से भी किसी तरह बात करने की उम्मीद को भी खारिज किया। यहां इस बात को याद करना जरूरी है कि इस इकाई में मजदूरों ने यूनियन बनाने के अधिकार को लेकर जून, 2011 के महीने में 13 दिनों का हड़ताल किया था। इसका अंत मजदूर प्रबंधन के बीच इस समझौते के साथ हुआ था कि यूनियन बनाया जा सकता है, बर्खास्त मजदूरों की वापसी होगी, बदले में मजदूरों को हड़ताल के दिनों के दोगुने के बराबर काम करना, उत्पादन और अनुशासन पालन की शर्त दी गई। कंपनी इस समझौते को लागू करने से बाद में मुकर गई और एक बार फिर मजदूरों को बर्खास्त करने का सिलसिला शुरू कर दिया। गुस्से की सुगबुगाहट को देखते हुए कंपनी ने लॉकआउट करने का निर्णय लेकर सारे ही मजदूरों को बाहर कर दिया। उन्हें इन आंदोलनकारी हो गये मजदूरों से डर लगने लगा था। मजदूर नेता कुलदीप के अनुसार प्रबंधन ऐसे अनुशासनहीन मजदूरों का बर्दाश्त नहीं कर सकती।

क्या वास्तव में ये मजदूर अनुशासनहीन हैं? पिछले 25 साल में एक करोड़ गाड़ी बनाने वाले मजदूरों के हिस्से जो आया भारतीय श्रम कानून के लिए शर्मनाक है। आज प्रति 42 सेकेंड में मारूती की एक गाड़ी ये मजदूर बनाकर खड़ी कर देते हैं। इस समय को भी प्रबंधक कम करने की जुगत में है। कुल 9 घंटे की ड्यूटी में 7 मिनट का टी-ब्रेक है जिसमें उन्हें पेशाब करने से लेकर चाय पीना तक शामिल है। 30 मिनट का लंच ब्रेक है। इन दो ब्रेकों में कैंटीन की विशाल लाइन में लगना पड़ता है। भोजन के नाम पर आलू की शोरबेदार सब्जी और चपाती-चावल मिलता है। किसी भी दिन स्पेशल भोजन या मिठाई नहीं है। काम करने वाले अस्थाई मजदूरों को सुरक्षा दस्तानो, जूते हेलमेट तक पहनने को नहीं दिए जाते। कई मजदूरों को फैक्टरी वर्दी तक नहीं दी जाती। एक दिन की छुट्टी पर 2000 रुपए की कटौती की जाती है। तीन दिन आने पर नौकरी चली जाती है। बच्चों की पढ़ाई के मद में 200रूपए मकान के हिस्से 1200 रूपए दिया जाता है। वेतन का बेसिक इतना कम है कि उसका पीएफ नाममात्र का बनता है। मेडिकल का खर्च केवल अनुबंध में दिखाने को है ठीक वैसे ही जैसे छुट्टी दिखाने भर को है। ये कभी भी लागू नही होते। उंगली कट जाने पर मजदूर घर भेज दिए जाते हैं। उन्हें हर्जाना तो दूर मेडिकल सुविधा भी नहीं दी जाती। इन हालातों में मारूती स्विफ् की चाल-चमक दाम जितनी चमकदार हो पर मजदूरों की जिंदगी उतनी ही बदतर है। मारूती की कमाई लगातार बढ़ती जा रही है पर मजदूर के हिस्से बर्बादी अपमान ही रहा है। इस व्यापक लूट का एक हिस्सा मीडिया को विज्ञापन के रूप में जाता है तो एक दूसरा अवैध हिस्सा नेता पुलिस के हिस्से आता है। कंपनी के मालिक प्रबंधक के हिस्से जो आता है वह भी अकूत है। सरकार के हिस्से जो टैक्स आता है वह भी मजदूरों के हिस्से से कहीं ज्यादा है। जिसका श्रम है उत्पादन है उसके हिस्से ऐसी बदतर जिंदगी होने पर सवाल उठना लाजिमी है। यदि यह सवाल मजदूर उठा रहा है तो यह अनुशासनहीनता की श्रेणी में कैसे सकता है? यह गुत्थी नहीं है। यह एक सरल समीकरण है जिसका हल उतना ही कठिन है। इस मुद्दे पर 6 सितंबर, 2011 को चौधरी देवी लाल पार्क, एमआईटी चौक पर संपन्न हुए मीटींग में मारूती सुजुकी मजदूरों की चार इकाइयों ने आपसी एकता बनाकर टूल डाउन करने कंपनी के भीतर भोजन बहिष्कार का निर्णय लिया। साथ ही 35 यूनियनों ने अपनी बैठक में मांग पूरी होने पर व्यापक हड़ताल पर जाने का निर्णय लिया।

इस संघर्ष में उन्हें हमारी आपकी जरूरत है. आइए, इसमें शामिल हों.

बातचीत-1





बातचीत-2




बातचीत-3




बातचीत-4




बातचीत-5




बातचीत-6




बातचीत-7




बातचीत-8




कंपनी की उद्घोषणा




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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ मारूती-सुजुकी मजदूरों के संघर्ष में उनका साथ दें ”

  2. By दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi on September 10, 2011 at 5:09 PM

    हम इस संघर्ष में आप के साथ हैं।

    कृपया ब्लाग से वर्ड वेरीफिकेशन हटाएँ, जिस से आने वाली प्रतिक्रियाएँ अधिक आ सकें।

  3. By Suman on September 10, 2011 at 5:31 PM

    संघर्ष में आप के साथ हैं

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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