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अन्ना आंदोलन: शासक वर्ग का फासिस्ट पुनर्गठन

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/03/2011 12:48:00 PM

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे और उनकी टीम के कथित आंदोलन के फासीवादी चरित्र को समझने में बहुतों से चूक हुई है. यहां तक कि अपने नाम के साथ कम्युनिस्ट और मार्क्सवादी-लेनिनवादी पहचान जोड़नेवाले भी बुरी तरह चूके हैं. हम यह नहीं कहेंगे कि यह उनकी भूल है. उनकी राजनीति और रणनीतियों के इतिहास को देखते हुए यह साफ तौर से कहा जाना चाहिए कि यह उनकी बेईमानी और अवसरवाद है. जो वामपंथी इस आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए और जिन्होंने बाहर से इसे समर्थन दिया, उन सबने इस आंदोलन की मुखालिफत करनेवालों पर अपने ‘कागजी’ दुर्गों से ‘हवाई’ हमले करने की कोशिश की. यहां अंजनी कुमार ने इसका जायजा लेने की कोशिश की है.

अन्ना आंदोलन के भूत ने सत्ता में बैठे लोगों को सताया हो या नहीं, वामपंथ के एक हिस्से को वह खूब सता रहा है. वह वामपंथ के पूरे इतिहास व वर्तमान के गिरेबान में झांककर बोल रहा है कि जैसा अन्ना ने किया वैसा आज तक तुम न कर सके. कि तुम अपनी कमियों से चिपके रहे और देश की जनता की नब्ज को टटोल सकने में आज अक्षम बने रहे. कि यह तुम्हारी ही कमियां हैं जिनके चलते शासक वर्ग और मजबूत होता जा रहा है और जितना लोगों को तुम आज तक कुल जमा राजनीति सिखा पाए उससे कई गुना यह चंद दिनों का आंदोलन सिखा गया. कि तुम सीखने को तैयार नहीं हो और न ही सुधरने को. कि तुम देश के सबसे वाहियात और अकर्मण्य लोग हो. कि तुम्हें अपना यह अपराध स्वीकार करना चाहिए और नए तरह के उभर रहे आंदोलनों में खुद को समाहित कर देना चाहिए. वामपंथ के एक हिस्से ने इस झोंक में खुद को समाहित करने के लिए एड़ी-चोटी लगा दी. उसने इनकलाब जिंदाबाद के नारे के साथ वंदे मातरम और भारत माता की जय के नारे को अपना लिया. पर इससे भी बात बनी नहीं. धारा के बहाव में उनकी न तैरने की आवाज सुनाई दी और न ही डूबने की. जिस दिन अन्ना ने रामलीला मैदान से अस्पताल का रास्ता लिया. उस दिन से सड़कें खाली हो गईं और जनता नारों-तख्तियों के साथ नदारद हो गई. यह सब कुछ सिनेमा हाल में बैठ कर फिल्म देखने जैसा था. जब तक फिल्म चलती रही सभी दृश्य के मर्म के साथ उतराते बैठते रहे. फिल्म खत्म होने के साथ ही इसके असर के साथ एक दूसरी तरह की दुनिया में घुस जाने जैसा था. सारा दारोमदार एक बार फिर संसद के पास है कि वह जन लोकपाल बिल के कितने हिस्से को समाहित करेगा. बात नहीं बनी तो अन्ना एक बार फिर आएंगे.
वामपंथियों का यह समूह बेहद स्वाभाविकता के साथ अन्ना आंदोलन के नारों, झंडों व कार्यक्रमों का हिस्सा बन गया. भारत माता की जय! वंदेमातरम! और तिरंगे को हथियार की तरह फहराने से उसके अंदर भी झुरझुरी उठी. इस नारे को देश की असली नब्ज की पकड़ के रूप में देखा. प्रगतिशील आवरण के लिए इनकलाब जिंदाबाद का नारा था. और जिस किसी ने अन्ना आंदोलन का विरोध किया, उसके खिलाफ इस नारे का धारदार हथियार तरह प्रयोग किया.  जो सामाजिक-राजनीतिक समूह पूरे आंदोलन पर छाया रहा और कस्बों से लेकर दिल्ली के ठेठ संसद तक हो रहे प्रदर्शनों पर काबिज रहा, उसके साथ यह वामपंथी समूह स्वभाविक मित्रता महसूस कर रहा था. उसके साथ वह मजे ले रहा था. उसकी पीठ थपथपाकर फोटो खींच व खिंचा रहा था. यह उसके हमजोली का हिस्सा था और उनकी आकांक्षा को पूरा करने का असली हमसफर भी. यह समूह इन आंदोलनकारियों की आवाज में अपनी दबी आवाज को देख रहा था. वामपंथियों का यह समूह लगातार किसानों, मजदूरों, गरीबों को खोज रहा था, मानों इसके बिना यह आंदोलन वैध साबित नहीं हो पाएगा. वह इस देश के पायदान पर पड़े लोगों को लगातार खोज रहा था और नहीं मिलने पर बेचैन हो कम्युनिस्ट पार्टियों को लगातार गरिया रहा था कि वे ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैं, कि इस आंदोलन में उनकी भी वैधता सिद्ध होगी, कि उन्हें भी इस देश का सही नेतृत्वकारी मान लिया जाएगा. इस समूह की यह बेचैनी दरअसल इस हिंदुत्व के जलसे में उसकी बनी स्वभाविक एकता को वैध बना लेने की छटपटाहट थी. यह किसी भी वामपंथ धड़े के छोटे से छोटे वाक्यांशों को अन्ना आंदोलन के समर्थन का नारा बना देने को उतावला हो उठा था. यह पूरे वक्तव्य को संदर्भ और समय से काट कर मचान का झंडा बना कर पेश कर रहा था. वह काट-पीट कर किसी भी तरह एक दुनिया गढ़ लेने के लिए उतावला हो रहा था, जो उसके मन मुताबिक हो,  जो उसकी आकांक्षा के अनुरूप हो.
वामपंथियों का यह समूह अन्ना आंदोलन की पृष्ठभूमि, इतिहास व राजनीतिक उद्देश्य, संगठन आदि किसी पक्ष को देखने-समझने व उसकी व्याख्या भी करने को तैयार नहीं था. हालांकि यह सबकुछ पिछले छह महीने के भीतर हुआ है और आंख के सामने घटित हुआ है. इसके लिए कोई मोटी किताब या किसी जांच-पड़ताल से भी नहीं गुजरना था. पर यह समूह इस आंदोलन के संदर्भ में उपरोक्त बातों को फालतू बता कर जयकारे में लग गया. इस समूह का मानना है कि इस तरह के विश्लेषण से अन्ना आंदोलन पर क्या फर्क पड़ जाएगा, कि जनता तो चल चुकी है और आप सिद्धांत बघार रहे हैं, कि यदि आप भागीदार नहीं हुए तो आप को कुत्ता तक नहीं पूछेगा. यह तर्कहीनता और राजनीति में दृष्टिहीनता यह समूह जान-बूझ कर अपना रहा था. वह इस पचड़े में पड़कर उमड़ रहे नवधनिकों से किसी भी स्तर पर अलग नहीं होना चाहता था. यह इस एकता की गुहार थी कि पुराने ढांचों व मूल्यों और दृष्टि को तोड़ कर फेंक दिया जाए. और उलट कर कम्युनिस्टों को इस बात की गाली दी जाये कि वे आज के समय को समझ नहीं पा रहे हैं.  कि वे सत्तर साल के बूढ़े की मर्दानगी को समझ नहीं पा रहे हैं. कि वे अब कूड़ेदान में ही पड़े रहेंगे और अन्ना जैसा आंदोलन ही भविष्य का असल ‘मर्द’ आंदोलन होगा.
इस आंदोलन की राजनीतिक इकाई का गठन, जिसे आज अन्ना टीम के नाम से जाना जा रहा है, को बने हुए बहुत दिन नहीं गुजरे. संसद के पिछले सत्र में प्रस्तावित लोकपाल बिल के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर एनजीओ से जुड़े लोगों ने बैठक किया था. उस बैठक को लेकर कारपोरेट सेक्टर काफी उत्साहित था. और सबसे ज्यादा उत्साहित थी भाजपा. उस सत्र में भाजपा की ओर से सुषमा स्वराज ने मनमोहन सरकार को नंगा कर देने की चुनौती दी थी. बाद के दिनों में भ्रष्टाचार की घटनाओं की बाढ़ में भाजपा खुद ही डूबने लगी. कांग्रेस और भाजपा दोनों एक ही नाव पर सवार हो किसी तरह पार हो जाने की जुगत में लग गए. संसद में अरुण जेतली और मनमोहन सिंह के बीच इस बात पर तनातनी हुई कि संसद में अन्ना को बुलाकर भाषण क्यों दिलाया गया. पर दोनों ही अन्ना को साधने में लगे रहे और सफल रहे. लोकपाल बिल के खिलाफ जन लोकपाल बिल का प्रस्ताव आया और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन अन्ना आंदोलन में बदल गया. इस बदलाव में उपरोक्त एनजीओ के कई भागीदार इस आंदोलन से अलग हो गए. कई नाराज हुए. और कई नयों की भर्ती हुई. कुछ दबे हुए चेहरे चमक उठे. इस पूरी प्रक्रिया में पार्टियों के प्रतिनिधि, एनजीओ, कारपोरेट सेक्टर के प्रबंधकों और मीडिया समूहों ने निर्णायक भूमिका को अंजाम दिया. यह एक आंदोलन की पूर्वपीठिका की एक राजनीतिक गोलबंदी थी. राजनीति सिद्धांत की शब्दावली में यह इस आंदोलन की नेतृत्वकारी इकाई थी जिसने बाद के दिनों में अपनी क्षमता व दिशा का प्रदर्शन किया. बाद के दिनों में बस इतना ही फर्क आया कि अन्ना के बिना अन्ना टीम अवैधानिक व्यवस्था जैसी बन चुकी थी. और आंदोलन ‘मैं अन्ना हूं’ में बदल गया.
अन्ना व टीम अन्ना के बाद मीडिया घरानों से लेकर आरएसएस के विभिन्न संगठनकर्ता, नेता, विभिन्न पार्टियों के प्रतिनिधि व दलाल और कारपोरेट प्रबंधन के एलीट हैं. मीडिया प्रसारण के तौर तरीकों और मुद्‌दों को उछालने की नीति तय करने में लगा है. भाजपा आरएसएस राष्ट्रवादियों के पुराने व नए घरानों को साधने में लगा है. कारपोरेट एलीट भ्रष्टाचार को नेता-नौकरशाह तक सीमित कर अपनी लूट और कब्जा की नीति को पूरी तरह मजबूत कर लेने के लिए प्रयासरत है. वह वहां उबल रहे राष्ट्रवाद में पैसा झोंक रहा है कि यह और भड़क उठे. उसे आर्थिक मंदी की मार सता रही है. उसे और अधिक लूट की नीतियां चाहिए. उसे अब दूसरे दौर के भूमंडलीकरण की जरूरत है. इसके लिए राष्ट्रव्यापी राष्ट्रवादी आंदोलन व माहौल चाहिए.
इस घेरे के बाद 1990 के बाद उभरे नव धनाढ्य मध्यवर्ग अपने परिवारों और गैरसरकारी संगठनों के साथ सक्रिय भागीदार है. यह समूह सरकार में राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए छटपटा रहा है. यह देश की कुल कमाई में हिस्सेदार होने के लिए राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से गठजोड़ कर एनजीओ के माध्यम से सक्रिय है. ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ से लेकर ‘यूथ फॉर डेमोक्रेसी’ जैसे संगठन अपने नारों संगठनों व आर्थिक स्रोतों की बदौलत मीडिया के सहयोग से रातोंरात इनकी हजारों नेतृत्वकारी ईकाइयां उभर आयी हैं. ये भाजपा नहीं है. ये आरएसएस नहीं है. ये राष्ट्रवादी ब्राहमणवाद का नया स्वायत्त समूह है. इन्हें भाजपा-आरएसएस का भरपूर समर्थन और इनके साथ स्वभाविक गठजोड़ है. इन्होंने 'गर्व से कहो मैं हिंदू हूं' को 'मैं अन्ना हूं’ में बदल दिया है.
इस आंदोलन के भागीदारों में सबसे निचले पायदान पर स्वतःस्फूर्त जनता का हिस्सा है जिनकी हिस्सेदारी  कस्बों में अधिक पर दिल्ली के रामलीला मैदान में कम थी. यह समूह रोजमर्रा के भ्रघ्टाचार से लेकर वर्तमान फासिस्ट जनविरोधी मनमोहन सरकार व विभिन्न पार्टियों की राज्य स्तर के दमनकारी सरकारों के खिलाफ विरोध व अपने क्षोभ को दर्ज कराने के लिए भागीदार रहा. यह अन्ना आंदोलन का सबसे बाहरी हिस्सा है. इस समूह की न तो अन्ना टीम तक पहुंच थी और न ही इस टीम को अपनी हिस्सेदारी के एजेंडे को पहुंचा सकने के हालात थे. सच्चाई यह भी थी कि टीम अन्ना व उसके घेरे के एजेंडे पर यह समूह था ही नहीं. यद्यपि टीम अन्ना बीच-बीच में मीडिया से यह आग्रह करती रही कि कैमरे का मुंह इन तबाह हिस्सों की ओर भी कर लिया जाए. यह आग्रह इस समूह का प्रतिनिधित्व करने के उद्‌देश्य से नहीं बल्कि पूरे भारत के आम व खास सभी का अन्ना का आंदोलन में भागीदारी को वैधता देने के मद्‌देनजर ही किया जा रहा था. यह समूह उपरोक्त राजनीतिक गोलबंदी से बाहर था. यह समूह इस आंदोलन को प्रभावित करने के किसी भी टूल से वंचित था. ऐसी स्थिति में यह खुद उनका टूल बन रहा था और तेजी से उनके प्रभाव में आ रहा था.
1995 के बाद के दौर में वित्तीय पूंजी की खुली आवाजाही व तकनीक सेवा ओर प्रबंधन की संस्थाओं से पैदा हुए नवधनाढ्यों और सट्‌टेबाजों की दावेदारी ने पुनर्गठन की जरूरत को पैदा किया है. यह वर्ग इसके बदले में कारपोरेट सेक्टर को लूटने की खुली छूट दे रहा है. इस पुनर्गठन से शासक वर्ग के किसी भी हिस्से को नुकसान नहीं होना है. यह जनता की लूट, शोषण, शासन, दमन का फासिस्ट पुनर्गठन है. समाज में जीवन स्तर, आय और जरूरत के आधार पर बंटवारे की गति और तेज होगी. चंद लोगों के हाथ में अथाह संपत्ति होगी और देश की बहुसंख्य आबादी भोजन के लिए पहले से और अधिक मोहताज होगी. अन्ना का जनलोकपाल बिल, राष्ट्रवाद वर्तमान दमनकारी फासीवादी व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने का प्रवर्तन है. इस आंदोलन में अल्पसंख्यक खासतौर से मुसलमान समुदाय की भागीदारी न होना, दलित व आदिवासी समुदाय का इससे दूरी बनाए रखने के पीछे आत्मगत से अधिक वस्तुगत कारण ही प्रमुख रहे हैं . भूमंडलीकरण का सबसे अधिक नुकसान इन्हीं समुदायों का हुआ. बैंकों ने मुसलमान समुदाय के खाता खोलने तक से कोताही बरती. इनके एनजीओ पर पचास तरह के जांच व रोक लगे. इनकी आजीविका के साधनों को नीतियां बनाकर नुकसान पहुंचाया गया. इसका विस्तार पूर्वक वर्णन सच्चर कमेटी ने प्रस्तुत किया है. यही हालात दलित व आदिवासी समुदाय का रहा. दलित समुदाय एक छोटा हिस्सा जरूर ऊपर गया है पर वह अन्ना आंदोलन के फासिस्ट हिंदूत्ववादी पुनर्गठन का हिस्सा नहीं बनना चाहता. अन्ना आंदोलन भारतीय समाज की एक प्रतिगामी परिघटना है. यह शासक वर्ग के फासिस्ट पुनर्गठन की मांग है. इसमें भागीदारी इसके दार्शनिक पहलू को आत्मसात करना है.

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  1. 6 टिप्पणियां: Responses to “ अन्ना आंदोलन: शासक वर्ग का फासिस्ट पुनर्गठन ”

  2. By मृत्युंजय on September 3, 2011 at 8:28 PM

    अछूत जनता!

    देखो, देखो,
    छू मत जाना,जनता से !

    बंद कक्ष की कठिन तपस्या खंडित होगी
    पोथे-पत्रे क्रांतिकारिता के सब गंदे हो जायेंगें
    मंदे पड़ जायेंगें धंधे क्रान्ति- व्रांति के
    सात हाथ की चौकस दूरी हरदम रहो बनाए
    छाया भी न कहीं पड़ जाए...

    जनता संघी, जनता पागल, जनता है बदमाश
    मध्य वर्ग कैंडिलधारी है, निम्न वर्ग बकवास
    दिल्ली, बंबई, बंगलोर में लघु कमरों के अंदर
    पांच-पांच रहते हैं सब है अन्ना टीम के बन्दर

    नौजवान-नवयुवती करते पिकनिक में आन्दोलन
    तुम पवित्र अति धीर भाव करते विचार उत्तोलन

    यह जनता अब काम न देगी
    जनता नयी गढ़ाओ

    कुछ सुमेरु कुछ मंगल ग्रह से
    कुछ नेपाल से कुछ क्यूबा से
    जनता मांग ले आओ

    क्रान्ति की अलख जगाओ !

    देखो बंधू, छू मत जाना
    मत शरमाना
    जनता नयी मंगाना
    फिर बदलना ज़माना.

  3. By Anonymous on September 4, 2011 at 9:35 PM

    जनता को समझो जनता को पहचानो
    जनता जनता चिल्लानेवालों
    जन-आन्दोलन का मकसद भी समझो,
    जनता का मतलब भी जानो!
    समझ है तो समझो चारु के पथ को भी
    समर्पण है तो बढ़ो उस पथ पे,
    राम-रथ पर मत चढ जाओ!
    समझो जन-आन्दोलन का मतलब
    समझो अन्ना आन्दोलन के मकसद को भी
    मतलब मकसद भूल गये तो
    जनता पार्टी हो जाओगे
    फिर भारतीय जनता पार्टी भी
    फिर जनता के नाम पर
    चलाना राम-मंदिर का जन-आन्दोलन
    उसमे भी जनता आयेगी
    वही जनता जो प्रकट हुई थी
    राम-राज्य का सपना लेकर
    रामलीला मैदान में,
    पाने को रामलला अन्ना का दर्शन
    और चखने को जनलोकपाल का प्रसाद!
    जिन्हें डर है पहचान मिटने का
    वो जनता नयी gadhen
    या भीड़ में शामिल हो जाये
    करने को बम-बम इन्कलाब
    और जलाने के लिए
    रावण के पुतले,
    होलिका को फेक कर आग में
    देखें जनता के जलते सपने को!
    दुरी बनानी होगी
    वंदे मातरम की भीड़ से
    अंतर करने होंगे
    कार्पोराती और क्रन्तिकारी जनता में
    तय करने होंगे जन-आन्दोलन के रास्ते
    तोड़ने होंगे अन्ना जैसे मठअधिसों के मठ
    गिराने होंगे जन-आन्दोलन के नाम पर
    चलाये जा रहे NGO के कॉर्पोरेट मुखोटे को
    बोलना होगा इन्कलाब जिंदाबाद
    अगर जरा भी शेष है
    क्रांति का सपना तो
    ऐसे आपका इन्कलाब का मुखौटा
    मुखौटे से बाहर आ चूका है
    -Guddu

  4. By आशीर्वाद on September 4, 2011 at 10:32 PM

    आइसा के साथियों को अब जनता याद आई अचानक. शायद जनता को याद करने के लिए भी उन्हें फंड ही मिला होगा, तभी वे इतना जनता-जनता चिल्लाने का दिखावा कर रहे हैं. वरना जनता तो कश्मीर में भी पिछले साल निकली थी और आज भी निकल रही है. तब वे उसे गरिया कर दूर क्यों खड़े थे? और जनता तो छत्तीसगढ़ से लेकर लालगढ़ तक निकल रही है, तब वे उससे दूरी क्यों बनाए हुए हैं और आलोचनात्मक बने हुए हैं? यह कैसी 'विनोदबुद्धि' है कि अन्ना का तो आंख मूंद कर साथ देते हैं और वास्तव में लड़ रही जनता की आलोचना करते हुए उससे दूरी बनाए रखते हैं.

    शायद यह विश्व बैंक, फोर्ड फाउंडेशन और दूसरे एनजीओ डोनरों के पैसों का कमाल है, जिससे माले-लिबरेशन से लेकर जसम-आइसा तक बजबजा रहे हैं. आखिर विश्व बैंक ने भी मान ही लिया है न कि लोकपाल का पूरा आंदोलन बैंक द्वारा फंडेड था.

  5. By Vandna Tete on September 5, 2011 at 4:23 AM

    इसमें माओवादी भी जोड़ लिया जाए. 1 सितंबर को उन्होंने अन्ना के समर्थन में झारखंड बंद का आह्वान किया था. इससे कोई वामपंथी नहीं बचा. न सरकारी, गैर-सरकारी मार्क्सवादी, लेनिनवादी और न माओवादी.

  6. By Arun Kumar on September 5, 2011 at 6:09 PM

    चमार जनता सुनार जनता
    by Himanshu Pandya





    क्रांतिकारी कवि ने खाए दो दर्ज़न केले

    ओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ ले ले

    जनता की तलाश में इसने कितने पापड बेले



    टाटा बोला- मै जनता हूं

    जिंदल बोला - मैं जनता हूं

    कवि ने झुककर माना , उसको जनद्रोही न कहलाना था

    रालेगान सिद्धि में पायी असली जनता

    चमार जनता- सुनार जनता

    एक राजनीतिक दल के तो था नाम में जनता



    कोर्पोरेट सेक्टर ने बोला-हम ही तो हैं असली जनता

    हमरी मानो, सरकारी से छीनो सबकुछ

    हमरे पाले में लाओ

    कवि ने सोचा

    यह तो जन की सच्ची सेवा

    सरकारी तो दुश्मन जन का



    कल से कवि इस जनता के ही आगे शीश झुकायेगा

    खुद को जनता मान न पाया

    भला और के 'जन' होने के दावे को वह

    कैसे खारिज कर पायेगा

    इस स्वयम्भू जनता की जय हो

    जन जन का है एक बल , एक आस विश्वास

    इरोम शर्मिला को बनवास

    'बहन अरुंधती' को कारावास .

  7. By Mitul Malik on September 6, 2011 at 1:13 PM

    कामरेड अंजनी कुमार,
    जब मनचाही जनता आपको मिल जाये तो हमें भी खबर करना. इस बारीक कताई में हमारी बीनाई ख़त्म हो गई है. मुमकिन है आपको वह सत्य दिखाई दे रहा हो जो हम जैसे छुद्र लोगों को दिखाई नहीं पड़ रहा है. वैसे अगर लोकपाल का मकसद कॉर्पोरेट लूट को वैधता देना है तो क्या जनता उल्लू की पट्ठी है कि वह उसका विरोध नहीं करेगी? किसी को इतना दंभ कैसे हो सकता है कि उसी का विश्लेषण ठीक है!!! पूरी जिंदगी रणनीति बनाने और वस्तु -स्तिथि का विश्लेषण करने में लगे रहना. और अपने लिए जनता कहीं और से ढूंढ लाना!
    मितुल मलिक

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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