अन्ना का आंदोलन: बाजार, मनु और फासीवाद की रामलीला
Posted by Reyaz-ul-haque on 8/27/2011 07:50:00 PMअन्ना बैठे हैं और ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ के उन्माद से भरे नारों के बीच वे मुस्कुरा रहे हैं. आरक्षण के विरोध में सड़कें बहारने और जूते पालिश करने वालों की फौज उनके साथ है. उनका आंदोलन ‘अहिंसक’ है, भले ही इसकी रीढ़ वह संघ परिवार है, जिसका इतिहास अल्पसंख्यकों के खिलाफ दंगों और जनसंहारों का इतिहास है. अन्ना की भूख पर खर्च हो रहा एक-एक पैसा बहुराष्ट्रीय कारपोरेट कंपनियों की तरफ से आ रहा है. कारपोरेट मीडिया के चमकते हुए कैमरे अन्ना की मुस्कुराहट के चारों तरफ एक आभामंडल बुन रहे हैं. और अन्ना मुस्कुरा रहे हैं. लाखों घरों में. टीवी के परदों पर.
अन्ना मुस्कुरा रहे हैं. क्योंकि उन्होंने एक के बाद एक भ्रष्टाचार के खुलासों के बाद बुरी तरह घिर चुकी सरकार और कंपनियों को उबार लिया है. अपनी भ्रष्टाचार विरोधी बयानबाजी के जरिए वे दुनिया भर की साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्थाओं के गहरे आर्थिक संकट में खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे भारतीय मध्यवर्ग को एक झूठी दिलासा दे रहे हैं. उनके पास भारत की सारी समस्याओं का अकेला समाधान है: भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका आंदोलन. वैश्विक पूंजीवाद के आर्थिक संकट के नतीजे में भारत के शासक वर्ग के अंतर्विरोध काफी बढ़ चुके हैं. जनता के संसाधनों की जबरदस्ती लूट और इसके खिलाफ संघर्षरत जनता पर बढ़ती दमनकारी हिंसा के साथ-साथ जीवनयापन की बुनियादी सुविधाओं और चीजों की कीमतें भी आसमान छू रही हैं. ऐसी स्थिति में अपनी वैधता खो चुके शासक वर्ग के सामने इसे हासिल करने का एकमात्र उपाय हमेशा से प्रतिक्रियावाद रहा है. अन्ना हजारे के प्रतिक्रियावादी आंदोलन का उभार इसी का नतीजा है.
अन्ना और उनकी रहनुमाई में ‘बुद्धिजीवी समाज’ की सारी बहसें और समाधान सिरे से ही बेईमानी से भरे हुए हैं. ये वास्तविक वजहों की तरफ संकेत तक नहीं करते. घोटाले और भ्रष्टाचार भारतीय व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं, मसलन सरकारी कामकाज में लॉबिंग की मौजूदगी. इसके जरिए कंपनियों द्वारा योजनाओं में हेर-फेर की जाती है, कंपनियों के हितों में नीतियां लागू करायी जाती हैं और कानून बनाए जाते हैं. कारपोरेट कंपनियों को सार्वजनिक पैसे से भारी रियायतें और करों में छूट देना तथा दूसरे फायदे पहुंचाना भ्रष्टाचार नहीं माना जाता. और न ही देश की खनिज संपदा और जमीन को कौड़ियों के मोल कंपनियों को बेचा जाना भ्रष्टाचार माना जाता है. मुट्ठी भर लोगों के पास बेशुमार धन का जमा है, जबकि देश की बहुसंख्यक आबादी 20 रुपए रोजाना पर गुजर कर रही है. उसे जिस बाजार के भरोसे छोड़ा गया है, वह जनता को जीवनयापन के साधन मुहैया नहीं कर सकता. वह तो भ्रष्टाचार के जरिए बस असमानता को ही बढ़ा सकता है. इसलिए निजी पूंजी पर आधारित मुनाफे की व्यवस्था भ्रष्टाचार की जड़ में है. साम्राज्यवाद के तहत यह प्रक्रिया खुल कर सामने आ जाती है, जिसमें साम्राज्यवादी मालिकों के इशारे पर सरकारों को चलाने में भ्रष्टाचार मददगार होता है. जाहिर है, साम्राज्यवाद की सेवा में जुटे पूरे राजनीतिक-आर्थिक ढांचे को बदले बिना भ्रष्टाचार को खत्म नहीं किया जा सकता. चूंकि मध्य वर्ग द्वारा चलाए जा रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में इस बात की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिखती है, इसलिए यह बस एक बेकार और खोखले तमाशे के अलावा कुछ नहीं है. अन्ना बड़े गर्व से यह ऐलान करते हैं कि सेना और पुलिस का पूरा समर्थन उन्हें हासिल है. यह विडंबना ही है, क्योंकि इस देश के सबसे भ्रष्ट संस्थानों में सेना और पुलिस सबसे आगे हैं. जाहिर है कि लोकपाल इन दोनों के भ्रष्टाचार से आंखें मूंदे रहेगा. न ही लोकपाल का मकसद नीतियों और सरकारी योजनाओं के जरिए संस्थागत हो चुके भ्रष्टाचार को खत्म करना है. वह नरेगा और अंत्योदय जैसी योजनाओं में भ्रष्टाचार पर रोक नहीं लगा सकता, जो भ्रष्टाचार को पाल-पोस रही हैं और ग्रामीण इलाकों में एक कुलीन तबके के हाथों में भारी रकम को जमा कर रही हैं. यही कुलीन तबका इस व्यवस्था का आधार है. जंतर-मंतर और रामलीला मैदान की चमक-दमक के बाहर जीवन और मौत के सवालों से जूझते हुए मेहनतकश जनता गहरे तक पैठी कृषि संकट से जूझ रही है. वह अपनी बदतर होती जा रही जीवन स्थितियों के खिलाफ संघर्ष में एकजुट हो रही है. लेकिन इनका कोई जिक्र तक नहीं होता. जनता का बहुत बड़ा हिस्सा संसदीय व्यवस्था जैसे संस्थानों और शासक वर्ग को चुनौती दे रहा है, जिसे हजारे अपनी ‘गुलाबी क्रांति’ के जरिए थोड़ी राहत पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. अन्ना हजारे हमें उत्पीड़ित जनता के असली सवालों की तरफ से मोड़ना चाहते हैं. जबकि जनता पूरी मौजूदा व्यवस्था को बदलना चाहती है, क्योंकि वह जानती है कि यह व्यवस्था इतनी खुल्लम खुल्ला जनविरोधी है कि इसे परदों और मुखौटों से छुपाया नहीं जा सकता.
अन्ना मौजूदा उत्पीड़क व्यवस्था के लिए खतरा नहीं बल्कि मददगार हैं. यही वजह है कि राज्य उन्हें ‘विरोध’ करने की सारी सुविधाएं मुहैया कर रहा है. संघ परिवार उनके आंदोलन की रीढ़ है. वे नरेंद्र मोदी, राज ठाकरे और नीतीश कुमार जैसे प्रतिक्रियावादियों की तारीफ कर चुके हैं. महाराष्ट्र में उनके ‘आदर्श गांव’ रालेगान सीधी में इस नीति का सख्ती से पालन किया जाता है कि ‘हर गाँव में एक चमार, एक सुनार, एक लुहार होने चाहिए और इसी तरह से और लोग भी. उन सभी को अपना काम अपनी भूमिका और अपने पेशे के हिसाब से करना चाहिए, इस तरह से हर गाँव आत्म-निर्भर हो जाएगा.’ उनका यह दलित-पिछड़ा, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी सांप्रदायिक फासीवादी असली चेहरा जान-बूझ कर जनता से छुपाया जा रहा है. अन्ना के आंदोलन में लग रहे ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ जैसे नारे उनके असली राजनीतिक चेहरे को बेनकाब कर रहे हैं. इस खुलेआम फासीवादी आंदोलन में न केवल रामदेव, रवि शंकर और कारपोरेट कंपनियां शामिल हैं, बल्कि कुछ ‘मार्क्सवादी-लेनिनवादी’ नामधारी संगठन भी उनके सुर में सुर मिला रहे हैं.
इसीलिए अन्ना मुस्कुरा रहे हैं. वे मुस्कुरा रहे हैं क्योंकि संकट में फंसे शासक वर्ग को फासीवाद की मदद चाहिए. इस समय, जब उनकी मुस्कुराहट परदे पर छाई हुई है और उसने बाकी सारी चीजों को ढंक रखा है, कंपनियों को जनता के जल, जंगल, जमीन पर कब्जा दिलाने के लिए छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में सेना मार्च कर रही है, जिसका मकसद भारत में तेजी से बढ़ रहे क्रांतिकारी आंदोलनों को कुचल देना है. इसलिए हमें फैसला करना होगा कि हम किस तरफ हैं. हम अन्ना हजारे के प्रतिक्रियावादी ‘आंदोलन’ का हिस्सा बनना चाहते हैं और उनके आरक्षण विरोधी ‘मेरिटोरियस’ चेहरों के साथ दिखना चाहते हैं या हम मजबूती से अपनी उत्पीड़ित मेहनतकश जनता के क्रांतिकारी आंदोलन के साथ खड़े होना चाहते हैं, ताकि इस सामाजिक ढांचे को पूरी तरह बदला जा सके?
(जेएनयू में वितरित DSU का पर्चा)
अन्ना मुस्कुरा रहे हैं. क्योंकि उन्होंने एक के बाद एक भ्रष्टाचार के खुलासों के बाद बुरी तरह घिर चुकी सरकार और कंपनियों को उबार लिया है. अपनी भ्रष्टाचार विरोधी बयानबाजी के जरिए वे दुनिया भर की साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्थाओं के गहरे आर्थिक संकट में खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे भारतीय मध्यवर्ग को एक झूठी दिलासा दे रहे हैं. उनके पास भारत की सारी समस्याओं का अकेला समाधान है: भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका आंदोलन. वैश्विक पूंजीवाद के आर्थिक संकट के नतीजे में भारत के शासक वर्ग के अंतर्विरोध काफी बढ़ चुके हैं. जनता के संसाधनों की जबरदस्ती लूट और इसके खिलाफ संघर्षरत जनता पर बढ़ती दमनकारी हिंसा के साथ-साथ जीवनयापन की बुनियादी सुविधाओं और चीजों की कीमतें भी आसमान छू रही हैं. ऐसी स्थिति में अपनी वैधता खो चुके शासक वर्ग के सामने इसे हासिल करने का एकमात्र उपाय हमेशा से प्रतिक्रियावाद रहा है. अन्ना हजारे के प्रतिक्रियावादी आंदोलन का उभार इसी का नतीजा है.
अन्ना और उनकी रहनुमाई में ‘बुद्धिजीवी समाज’ की सारी बहसें और समाधान सिरे से ही बेईमानी से भरे हुए हैं. ये वास्तविक वजहों की तरफ संकेत तक नहीं करते. घोटाले और भ्रष्टाचार भारतीय व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं, मसलन सरकारी कामकाज में लॉबिंग की मौजूदगी. इसके जरिए कंपनियों द्वारा योजनाओं में हेर-फेर की जाती है, कंपनियों के हितों में नीतियां लागू करायी जाती हैं और कानून बनाए जाते हैं. कारपोरेट कंपनियों को सार्वजनिक पैसे से भारी रियायतें और करों में छूट देना तथा दूसरे फायदे पहुंचाना भ्रष्टाचार नहीं माना जाता. और न ही देश की खनिज संपदा और जमीन को कौड़ियों के मोल कंपनियों को बेचा जाना भ्रष्टाचार माना जाता है. मुट्ठी भर लोगों के पास बेशुमार धन का जमा है, जबकि देश की बहुसंख्यक आबादी 20 रुपए रोजाना पर गुजर कर रही है. उसे जिस बाजार के भरोसे छोड़ा गया है, वह जनता को जीवनयापन के साधन मुहैया नहीं कर सकता. वह तो भ्रष्टाचार के जरिए बस असमानता को ही बढ़ा सकता है. इसलिए निजी पूंजी पर आधारित मुनाफे की व्यवस्था भ्रष्टाचार की जड़ में है. साम्राज्यवाद के तहत यह प्रक्रिया खुल कर सामने आ जाती है, जिसमें साम्राज्यवादी मालिकों के इशारे पर सरकारों को चलाने में भ्रष्टाचार मददगार होता है. जाहिर है, साम्राज्यवाद की सेवा में जुटे पूरे राजनीतिक-आर्थिक ढांचे को बदले बिना भ्रष्टाचार को खत्म नहीं किया जा सकता. चूंकि मध्य वर्ग द्वारा चलाए जा रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में इस बात की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिखती है, इसलिए यह बस एक बेकार और खोखले तमाशे के अलावा कुछ नहीं है. अन्ना बड़े गर्व से यह ऐलान करते हैं कि सेना और पुलिस का पूरा समर्थन उन्हें हासिल है. यह विडंबना ही है, क्योंकि इस देश के सबसे भ्रष्ट संस्थानों में सेना और पुलिस सबसे आगे हैं. जाहिर है कि लोकपाल इन दोनों के भ्रष्टाचार से आंखें मूंदे रहेगा. न ही लोकपाल का मकसद नीतियों और सरकारी योजनाओं के जरिए संस्थागत हो चुके भ्रष्टाचार को खत्म करना है. वह नरेगा और अंत्योदय जैसी योजनाओं में भ्रष्टाचार पर रोक नहीं लगा सकता, जो भ्रष्टाचार को पाल-पोस रही हैं और ग्रामीण इलाकों में एक कुलीन तबके के हाथों में भारी रकम को जमा कर रही हैं. यही कुलीन तबका इस व्यवस्था का आधार है. जंतर-मंतर और रामलीला मैदान की चमक-दमक के बाहर जीवन और मौत के सवालों से जूझते हुए मेहनतकश जनता गहरे तक पैठी कृषि संकट से जूझ रही है. वह अपनी बदतर होती जा रही जीवन स्थितियों के खिलाफ संघर्ष में एकजुट हो रही है. लेकिन इनका कोई जिक्र तक नहीं होता. जनता का बहुत बड़ा हिस्सा संसदीय व्यवस्था जैसे संस्थानों और शासक वर्ग को चुनौती दे रहा है, जिसे हजारे अपनी ‘गुलाबी क्रांति’ के जरिए थोड़ी राहत पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. अन्ना हजारे हमें उत्पीड़ित जनता के असली सवालों की तरफ से मोड़ना चाहते हैं. जबकि जनता पूरी मौजूदा व्यवस्था को बदलना चाहती है, क्योंकि वह जानती है कि यह व्यवस्था इतनी खुल्लम खुल्ला जनविरोधी है कि इसे परदों और मुखौटों से छुपाया नहीं जा सकता.
अन्ना मौजूदा उत्पीड़क व्यवस्था के लिए खतरा नहीं बल्कि मददगार हैं. यही वजह है कि राज्य उन्हें ‘विरोध’ करने की सारी सुविधाएं मुहैया कर रहा है. संघ परिवार उनके आंदोलन की रीढ़ है. वे नरेंद्र मोदी, राज ठाकरे और नीतीश कुमार जैसे प्रतिक्रियावादियों की तारीफ कर चुके हैं. महाराष्ट्र में उनके ‘आदर्श गांव’ रालेगान सीधी में इस नीति का सख्ती से पालन किया जाता है कि ‘हर गाँव में एक चमार, एक सुनार, एक लुहार होने चाहिए और इसी तरह से और लोग भी. उन सभी को अपना काम अपनी भूमिका और अपने पेशे के हिसाब से करना चाहिए, इस तरह से हर गाँव आत्म-निर्भर हो जाएगा.’ उनका यह दलित-पिछड़ा, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी सांप्रदायिक फासीवादी असली चेहरा जान-बूझ कर जनता से छुपाया जा रहा है. अन्ना के आंदोलन में लग रहे ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ जैसे नारे उनके असली राजनीतिक चेहरे को बेनकाब कर रहे हैं. इस खुलेआम फासीवादी आंदोलन में न केवल रामदेव, रवि शंकर और कारपोरेट कंपनियां शामिल हैं, बल्कि कुछ ‘मार्क्सवादी-लेनिनवादी’ नामधारी संगठन भी उनके सुर में सुर मिला रहे हैं.
इसीलिए अन्ना मुस्कुरा रहे हैं. वे मुस्कुरा रहे हैं क्योंकि संकट में फंसे शासक वर्ग को फासीवाद की मदद चाहिए. इस समय, जब उनकी मुस्कुराहट परदे पर छाई हुई है और उसने बाकी सारी चीजों को ढंक रखा है, कंपनियों को जनता के जल, जंगल, जमीन पर कब्जा दिलाने के लिए छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में सेना मार्च कर रही है, जिसका मकसद भारत में तेजी से बढ़ रहे क्रांतिकारी आंदोलनों को कुचल देना है. इसलिए हमें फैसला करना होगा कि हम किस तरफ हैं. हम अन्ना हजारे के प्रतिक्रियावादी ‘आंदोलन’ का हिस्सा बनना चाहते हैं और उनके आरक्षण विरोधी ‘मेरिटोरियस’ चेहरों के साथ दिखना चाहते हैं या हम मजबूती से अपनी उत्पीड़ित मेहनतकश जनता के क्रांतिकारी आंदोलन के साथ खड़े होना चाहते हैं, ताकि इस सामाजिक ढांचे को पूरी तरह बदला जा सके?
(जेएनयू में वितरित DSU का पर्चा)
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