हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

इतिहास को दोहराने की दिक़्क़तें

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/26/2011 01:17:00 PM

नीलाभ
यह बात मैं शुरू ही में स्वीकार कर रहा हूं कि मैं अन्ना हज़ारे का प्रशंसक नहीं हूं, न उनका अथवा उनके आन्दोलन का समर्थक ही हूं. यह ठीक है कि अन्ना हज़ारे ने ऐसी दुखती हुई रग पर उंगली रखी है जो एक लम्बे अर्से से इलाज-उपचार की मांग करती रही है. भ्रष्टाचार किसी नासूर की तरह हमारे जीवन के हर क्षेत्र में घर करता चला गया है और इसके साथ ही हर क्षेत्र में - चाहे वह नितान्त निजी क्षेत्र हो या एकदम सार्वजनिक - जवाबदेही के अभाव ने इस नासूर को लगभग लाइलाज बना दिया है. इस बात से भी मुझे इनकार नहीं है कि जबसे अन्ना हज़ारे ने अपना अन्दोलन शुरू किया है, उन्हें आम जनता का, ख़ासकर शहरी और क़स्बाई मध्यवर्ग के लोगों का भरपूर समर्थन मिला है, यहां तक कि दूर-दूर के देशों में भी इसके समर्थन में लोग सामने आये हैं. यह इस बात का भी सबूत है कि एक तो हमारी जनता क़दम-क़दम पर भ्रष्ट आचरण का सामना करते-करते आजिज़ आ चुकी है, दूसरी ओर देश के सार्वजनिक पटल पर जिस तरह के घोटाले सामने आये हैं और उन्हें ले कर सत्ताधारी दलों में -- चाहे वह प्रान्तीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी हो या केन्द्रीय स्तर पर कान्ग्रेस पार्टी -- जैसा दुचित्तापन और लीपा-पोती करने की मानसिकता दिखाई दी है, उससे जनता को यक़ीन होने लगा है कि क़ानूनी और संवैधानिक तरीक़ों से अब बहुत कुछ सपरने वाला नहीं है. इस नासूर से निपटने के लिए कुछ और ही तरीक़े अपनाने होंगे. यह भी सही है कि अन्ना के आन्दोलन ने हमारी केन्द्रीय सरकार को किसी हद तक हिला कर भी रख दिया है. यह सब स्वीकार करने के बाद अगर मैं फिर अन्ना हज़ारे और उनके आन्दोलन की ओर लौटूं तो मैं यही कहना चाहता हूं कि इस सब को ले कर अभी बहुत आशा बंधती नहीं नज़र आती और मेरे ही नहीं बहुतों के मन में सवाल-ही-सवाल हैं.

पहली बात तो यह है कि अभी तक न तो अन्ना हज़ारे ने यह साफ़ किया है न उनके आन्दोलन में शामिल उनके साथियों ने कि उनकी नज़र में क्या भ्रष्टाचार कोई रोग है या रोग का लक्षण ? अगर तो यह रोग है, तब इस से लड़ने की रणनीति अलग होगी और अगर यह लक्षण है, जैसा कि अन्ना और उनके साथियों की अब तक की कार्रवाई से जान पड़ता है, तब भिन्न उपाय अपनाने होंगे और हमें समस्या की गहराई में उतर कर पहले यह तय करना होगा कि उस रोग का स्वरूप क्या है जिसका लक्षण भ्रष्टाचार के रूप में हमें दिखायी दे रहा है; वैसे ही जैसे बुख़ार अपने आप में रोग नहीं होता, बल्कि हम उसे दूर तभी कर पाते हैं जब हम रोग का निदान कर लेते हैं कि बुख़ार तपेदिक़ की वजह से है या मलेरिया अथवा और किसी गड़बड़ी के कारण.

सो, अभी तक अन्ना हज़ारे और उनके साथी भ्रष्टाचार को लक्षण मान कर ही चल रहे लगते हैं जैसा कि उनकी मांगों से भी अनुमान होता है. उन्होंने अब तक जो बयान दिये हैं उनसे लोगों में यही सन्देश गया है कि कुल मिला कर राजनैतिक/प्रशासनिक तन्त्र ही भ्रष्टाचार के लिए ज़िम्मेदार है. उन्होंने अपने दायरे में स्वैच्छिक संस्थाओं, निजी क्षेत्र के उद्यमों-उद्योगों और ऐसे तमाम इलाक़ों को शामिल नहीं किया है जो इस देश-व्यापी भ्रष्टाचार का स्रोत भी हैं और हिस्सा भी. यही नहीं, फ़िलहाल अन्ना और उनके दल में शामिल लोगों में यही समझदारी  काम करती जान पड़ती है कि भ्रष्टाचार का सम्बन्ध सिर्फ़ और सिर्फ़ पैसे की अनुचित आवा-जाही से है. भ्रष्टाचार का एक और भी विराट सामाजिक परिप्रेक्ष्य हो सकता है या उसका उपचार हमारे समूचे देश की मनो-सामाजिक बनावट के उपचार में निहित है -- यह सोच फ़िलहाल अन्ना हज़ारे के आन्दोलन में नज़र नहीं आती. इसके साथ-साथ अन्ना ने हमारे देश की बुनियादी अर्थ-व्यवस्था पर भी कुछ नहीं कहा है. मिसाल के लिए उदारीकरण की नीति, मुक्त अर्थ-व्यवस्था, आवारा पूंजी और बड़े कारपोरेट जगत का कितना और कैसा हाथ मौजूदा भ्रष्टाचार के पीछे है इस पर अन्ना और उनके साथी मौन हैं. विदेशी कम्पनियां किस बेरहमी से हमारे देश की प्राकृतिक और दूसरी सम्पदा को लूट रही हैं, कहां-कहां कहर ढा रही हैं और इस प्रक्रिया में भ्रष्टाचार कैसे पनप रहा है, इसका कोई उल्लेख अन्ना के चार्टर में नहीं है.उनकी दृष्टि में एक सख़्त, तानाशाह-सरीखा लोकपाल ही, जो राजनीतिक दायरे के बाहर रह कर काम करे, इस नासूर का इलाज है.

अगर यह भी मान लिया जाये कि उन्होंने लोकपाल या कहा जाये जनलोकपाल की मांग इसलिए उठायी है कि वे भ्रष्टाचार को रोग मान कर चल रहे हैं तो फिर दूसरा और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या किसी भी सरकारी अधिनियम से,  किसी सरकार-नियुक्त लोकपाल के माध्यम से अथवा जनलोकपाल के ज़रिये भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाना सम्भव है ? सामान्य समझदारी के हिसाब से भी और अन्ना हज़ारे के वक्तव्यों से भी यही क़यास लगता है कि लोकपाल या जनलोकपाल अंकुश ही का काम करेगा जो भ्रष्टाचार को रोकेगा. इसमें प्रथमत: तो यह छिपी हुई स्वीकारोक्ति है कि भ्रष्टाचार तो मनुष्य की प्रकृति है और उसकी रोक-थाम ही की जा सकती है, यानी बाहरी उपाय से ही उस पर अंकुश लगाना सम्भव है. और इसी से दूसरी बात भी उभरती है कि लोकपाल ही समस्या का समाधान है. लेकिन जब भ्रष्ट होना मनुष्य की प्रकृति हो तब क्या लोकपाल भी किसी मुक़ाम पर भ्रष्ट नहीं हो सकता ? और अगर ऐसा हो तब लोकपाल पर अंकुश का काम कौन करेगा ? क्या ऐसा अचूक तरीक़ा या तन्त्र लागू किया जा सकता है जो भ्रष्टाचार की रोक-थाम करे, पर उससे दूषित अथवा प्रदूषित न हो ? कौन नहीं जानता है कि हमारे देश में क़ानूनों की कमी नहीं है. तो भी अपराध पर नियन्त्रण पाने में क़ानून किस हद तक सहायक होते हैं इसे ले कर लम्बी बहस चलती रही है. क्या यही हाल लोकपाल बिल का तो नहीं होने जा रहा है ?

तीसरा सवाल यह है कि यह सारी क़वायद यों की जा रही है जैसे कि पहले से कोई व्यवस्था देश में काम न कर रही हो. अगर अन्ना हज़ारे और उनके साथी यह मानते हैं कि देश में संसदीय लोकतन्त्र है,  उसका एक संविधान है और उस संविधान द्वारा निर्वाचित और गठित लोकतान्त्रिक संस्थाएं भी हैं - मसलन न्यायपालिका, संसद अर्थात विधायिका और कार्यपालिका - तब ऐसा कोई प्रावधान या क़दम जो संविधान या इन लोकतान्त्रिक संस्थाओं का उल्लंघन करता हो, वह कैसे जनता को स्वीकार होगा ? अगर यह माना जाये कि पूरी व्यवस्था ही सड़ गयी है, तो फिर एक सड़ी हुई व्यवस्था से सिवा इसके कि वह विदा हो, कुछ भी मांगने का क्या तुक है ? वैसे भी अन्ना हज़ारे और उनके साथियों की तरफ़ से जो पर्चा बंटवाया गया है उसमें उन्होंने साफ़-साफ़ कहा है कि उनका उद्देश्य "व्यवस्था को बदलना" है. अगर ऐसा है तो फिर सरकार के सामने कोई मांग रखने का क्या औचित्य है ? इस समय हमारे देश में पूंजीवादी अएर्थ-व्यवस्था से युक्त संसदीय लोकतन्त्र है. कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना कभी की ख़ारिज कर दी गयी है. इस समय अगर पुराने गांधीवादी मुहावरे का प्रयोग करें तो "पैसे का राज" है. और वह भी निरुंकुश. हमारा सारा समाज, अगर मतसंग्रह किया जाये तो, एक स्वर से यही कहेगा कि पैसा ही ताक़त, ख़ुशहाली और उन्नति का स्रोत है. हमारे प्रधानमन्त्री जिनके वित्त-मन्त्रित्व काल में मौजूदा व्यवस्था का श्रीगणेश हुआ था, यह दोहराते नहीं थकते कि आर्थिक उन्नति ही उनकी सफलता का पैमाना माना जाये. इस अर्से में कितने लाख किसानों ने आत्म-हत्याएं की हैं, कितने आदिवासी पूंजीपतियों द्वारा बेघर हुए है, शरणार्थी बन कर बड़े शहरों में आदमी से कई दर्जे नीचे की ज़िन्दगी बसर करने को मजबूर हुए हैं, आम मध्यवर्गीय और विशेष रूप से निम्न मध्यवर्गीय जन कैसी मुसीबतें भुगत रहे हैं, मज़दूरों पर कितना कुठार चला है इसका लेखा-जोखा प्रधानमन्त्री के भाषणों में नहीं मिलता. और अचरज है कि अन्ना की भी नज़र इस पर नहीं गयी है. निजी सम्पत्ति की अवधारणा का कितना और कैसा सम्बन्ध भ्रष्टाचार से है, इस पर भी अन्ना की तरफ़ से कुछ सुनने को नहीं मिलता. यह ठीक है कि वे बार-बार कहते हैं कि उनके पास "अपना" कुछ भी नहीं है, लेकिन अपरिग्रह का जो विचार गांधी ने प्रचारित किया था और जिसके फलस्वरूप बड़े-बड़े लोगों ने अपनी निजी सम्पत्ति का त्याग कर दिया था, उसका कोई संकेत मौजूदा आन्दोलन में नहीं है. कहीं ऐसा तो नहीं है कि अन्ना यह समझ बैठे हैं कि एक गांव को सफलता से आदर्श गांव में तब्दील करने की हिकमत से ही इस विशाल देश की बहुमुखी और बहुसंख्यक समस्याएं निपटा दी जा सकेंगी ?

जिस "सिविक सोसाइटी" का ज़िक्र वे बार-बार करते हैं वह कैसी है, उसमें कौन-कौन है, कौन-कौन नहीं है, इसका भी कोई स्पष्ट सा ख़ाका अन्ना के पर्चे से नहीं लगता. क्या पूंजीपति वर्ग इस सिविक सोसाइटी में है या नहीं ? अगर है तो फिर अन्ना भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को कैसे उस संस्था के पहरेदारों के रूप में कल्पित करते हैं जो वे जनलोकपाल बिल द्वारा बनाना चाहते है ?

अन्ना हज़ारे के आन्दोलन की तुलना गान्धी और जयप्रकाश नारायण के आन्दोलनों से की गयी है. क्या सचमुच यह आन्दोलन उन आन्दोलनों जैसा है.?

सबसे पहली बात तो यह है कि गान्धी ने सत्याग्रह तो बुनियादी तौर पर आत्म-शुद्धि के, अपने विरोधी का हृदय परिवर्तन करने के, औज़ार के रूप में आविष्कृत किया था, इसलिए नहीं कि अनशन द्वारा अपने विरोधी को ज़बरदस्ती अपनी मांग मानने के लिए मजबूर किया जाये. उन्होंने बार-बार अंग्रेज़ी सरकार और उनके नुमाइन्दों से कहा था कि हिन्दुस्तान पर उनकी हुकूमत अनैतिक है. और वे उन्हें इस बात का बोध कराने के लिए सत्याग्रह का मार्ग अपना रहे हैं ताकि वे स्वेच्छा से हिन्दुस्तान छोड़ कर चले जायें. यहां लेकिन अन्ना का सारा ज़ोर इस बात पर है कि मौजूदा सरकार उनका जनलोकपाल बिल पारित कर दे या उसमें अमुक मांग जोड़ दे या हटा दे. उनके भाषणों में शान्ति और हिंस की अपीलों के साथ जो फ़्छ्पा हुआ उकसावा भी ध्वनित होता रहता है, वह भी संशय पैदा करता है.

अन्ना का निशाना भ्रष्टाचार का उन्मूलन नहीं जान पड़ता, वरना उनका निशाना वे सारे लोग होते जो भ्रष्ट हैं और अन्ना सत्याग्रह इसलिए करते कि ये भ्रष्ट लोग भ्रष्टाचार से किनाराकशी कर लें, जो गांधी का लक्ष्य होता. अगर अन्ना हज़ारे यह कहते कि जो रिश्वत ले रहा है, ग़लत रास्ते पर चल रहा है, वह उससे बाज़ आये और जो रिश्वत दे रहा है या ग़लत बातें बर्दाश्त कर रहा है, वह इस से गुरेज़ करे चाहे कितना ही कष्ट क्यों न उठाना पड़े, तो ज़रूर उनका सत्याग्रह सत्याग्रह कहला सकता था. लेकिन अन्ना ने ऐसा कोई आह्वान नहीं दिया न अपने अनशन के पीछे ऐसी कोई शर्त रखी.

एक अन्तर और भी है. गांधी का आन्दोलन पूरे समाज को साथ ले कर चलता था. अन्ना के आन्दोलन का दायरा अब भी बहुत सीमित है. देश की बहुसंख्यक मेहनतकश  किसान-मज़दूर आबादी अभी तक उनके पीछे नहीं आयी है. मुस्लिम बिरादरी के मन में अनेक शक-शुबहे हैं तो दलितों ने अपनी तरफ़ से एक लोकपाल बिल का प्रारूप पेश करने की बात कहते हुए अन्ना और सरकार, दोनों ही के लोकपाल बिलों से असहमति व्यक्त की है. बल्कि दलितों के कुछ संगठनों ने तो आरोप लगाया है कि अन्ना और उनके साथी एक बुनियादी सवर्ण. पितृसत्तात्मक समाज-व्यवस्था के हामी हैं.

यही नहीं बल्कि गान्धी से अन्ना की तुलना करने वाले एक बुनियादी अन्तर भी भूल गये हैं. गान्धी जब सत्याग्रह करते थे तो अपने हर समर्थक से यह वादा कराते थे कि वह ऐसा कोई आचरण नहीं करेगा जिसमें हिंसा का लेश भी हो या जिस से उच्छॄंखलता की गन्ध भी आये. यही कारण है कि सब के बरजने के बावजूद गांधी ने चौरा चौरी की घटना के बाद अपना आन्दोलन वापस ले लिया था और उसके बाद भड़की हिंसा के "प्रायश्चित्त स्वरूप"  अपना प्रसिद्ध इक्कीस दिन का उपवास शुरू किया था.

अन्ना हज़ारे का आन्दोलन हालांकि अभी तक बहुत हद तक अहिंसक ही रहा है, लेकिन जिस तरह के दृश्य जन्माष्टमी के दिन दिल्ली के रामलीला मैदान में देखने को मिले, भीड़ का एक हिस्सा नशे की हालत में जिस तरह की गालियां देते हुए पुलिस को उकसाने लगा, मोटरसाइकिलों पर बिना हेल्मेट के सवार तीन-तीन चार-चार नौजवान झण्डे लहराते हुए यातायात के नियमों का उल्लंघन करते नज़र आये, जिस तरह इस आन्दोलन ने सामान्य नागरिकों, यहां तक कि अन्ना का समर्थन करने वालों के लिए भी मुसीबतें खड़ी कीं, और इस सब पर अन्ना हज़ारे और उनके साथी ख़ामोश रहे, उसे देख कर यह अन्दाज़ा करना मुश्किल नहीं कि अन्ना का यह  आन्दोलन किसी भी वक़्त बेक़ाबू हो कर अराजकता की दिशा ग्रहण कर सकता है.

अख़बारों में ये ख़बरें भी छपी हैं कि अन्ना हज़ारे के आन्दोलन में शामिल होने के लिए आये लोगों में महिलाओं के साथ छेड़-छाड़ की घटनाएं भी इस मात्रा में नज़र आयीं कि महिलाओं के लिए अलग स्थान मुक़र्रर करना पड़ा. क्या गांधी के किसी भी आन्दोलन में ऐसा देखने में आया था ? यही नहीं इस आन्दोलन ने कुछ ऐसे नारे भी पैदा किये जो बुनियादी सभ्यता के ख़िलाफ़ हैं. मैंने और मिराण्डा हाउस के हिन्दी विभाग में पढ़ाने वाली सुश्री रमा यादव ने मेट्रो में सफ़र करते हुए चन्द "जोशीले" अन्नावादियों को "सोनिया जिसकी मम्मी है, वह सरकार निकम्मी है" का नारा लगाते सुना. यही नहीं सरकार के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए युवक गिरोह बना कर नारे लगाते और लोगों को भी नारे लगाने के लिए विवश करते दिखायी दिये. यह भी ग़ौर-तलब है कि जहां गांधी के आन्दोलन ने 1919  के बाद से ही बड़े पैमाने पर नारी-जागृति का काम किया था, महिलाएं खुल कर आन्दोलनों में हिस्सा लेती थीं, वहीं अन्ना के आन्दोलन में अगर महिलाएं शामिल हैं भी तो कम-से-कम नारी मुक्ति का वह पहलू उसमें से ग़ायब है उधर देहरादून से पुराने साथी धीरेन्द्र कुमार ने ख़बर दी की लोग सड़कों पर "जो नहीं है साथ में, चूड़ी पहने हाथ में" का नारा लगा रहे थे और इसमें महिलाएं भी शामिल थीं जिन्हें इस नारे के स्त्री-विरोधी होने का कोई अन्दाज़ा नहीं था.

आखिरी बात यह कि गांधी जब सत्याग्रह करते थे तो वे सरकार और सरकारी संस्थाओं से अनुमति नहीं मांगते थे कि वे इस या उस स्थल पर सत्याग्रह या उपवास करेंगे. अन्ना के आन्दोलन में जैसा नाटकीय घटनाक्रम आन्दोलन का स्थल तय करने के सिलसिले में दिखाई दिया उस से ऐसा लगा जैसे अन्ना का यह कोई प्रायोजित आयोजन हो. यहां हम फिर ध्यान दिला दें कि ऊपर हमने गांधी के जिस उपवास का ज़िक्र किया वह किसी सार्वजनिक स्थल पर नहीं बल्कि मौलाना मुहम्मद अली के घर पर रखा गया था और इक्कीस दिन बाद हिंसा के समाप्त हो जाने पर ही तोड़ा गया था.

गांधी और अन्ना में एक बुनियादी फ़र्क़ यह भी है कि हालांकि गांधी का सारा बल समग्र मानवीय स्थिति पर रहता था, वे बहुत बड़ी मात्रा में अध्यात्म और आध्यात्मिक उपायों को अपनी सामाजिक-राजनैतिक विचारधारा में गूंथे रहते थे, ताहम उन्होंने कभी इस बात से इनकार नहीं किया कि उनका आन्दोलन उतना ही राजनैतिक और सामाजिक भी है. अभी तक अन्ना और उनके साथियों ने यही कहा है कि उनका सम्बन्ध राजनीति से नहीं है. और, यह बात तो हम सब जानते हैं कि राजनीति से कोई सम्बन्ध न रखने की बात कहने वाले की भी एक राजनीति होती है. हमारे प्यारे कवि मुक्तिबोध जब किसी से मिलते थे तो एक सवाल ज़रूर करते थे -- "पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है?" इसलिए अभी नहीं तो अपने आन्दोलन के और आगे बढ़ने पर अन्ना हज़ारे और उनके साथियों को अपनी राजनीति तो स्पष्ट करनी ही होगी. अगर वे ऐसा नहीं करते तो वे गांधी के आन्दोलन की तो बात ही क्या, लोहिया और जयप्रकाश नारायण के आन्दोलनों के भी क़रीब नहीं पहुंच पायेंगे, भले ही इस समय कितनी ही तेजस्विता क्यों न दिखाई दे रही हो.

मार्क्स का सुप्रसिद्ध कथन है कि इतिहास अपने को दोहराता है, मगर हू-ब-हू नहीं. पहली बार त्रासदी के रूप में और दूसरी बार स्वांग के रूप में. गांधी का आन्दोलन गांधी के करिश्माई व्यक्तित्व से मण्डित होने के बावजूद अपने समय और परिस्थितियों की पैदावार था. यही हाल जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन का भी था. उसे दोहराने की कोई भी कोशिश दिक़्क़तें ही पैदा करेगी. जयप्रकाश नारायण ने उसे दोहराने की कोशिश की थी तो अंजाम उन्नीस महीने के आपात काल और उसके बाद की विपदाओं की त्रासदी के रूप में सामने आया था. अन्ना हज़ारे के आन्दोलन में - अगर उसे क़ायदे से संभाला न गया तो स्वांग बनने की तमाम सम्भावनाएं मौजूद हैं जिनका एक ट्रेलर इसी रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव के उपवास में लोग देख चुके हैं.

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ इतिहास को दोहराने की दिक़्क़तें ”

  2. By Sanjeev Kumar on August 26, 2011 at 2:32 PM

    नीलाभ जी, आपने तो राहुल गांधी के लोकसभा में दिये गये बयान से भी ज्यादा कनफ्यूज करने वाला विश्लेषण कर दिया। भ्रष्टाचार का मारा, आम आदमी बेचारा इसमें क्या तो समझे, क्या करे, क्या सुखाये, क्या निचोड़े। मेरी सामान्य बुद्धि को टीम अन्ना की यह बात समझ में आ जाती है कि अभी सत्ताशीर्ष पर बैठे लोगों के भ्रष्टाचार पर त्वरित और प्रभावी कार्रवाई करने वाली कोई संस्था नहीं है। अभी बड़े अधिकारियों, राजनेताओं पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों एवं सबूतों के बावजूद कोई संक्षम एजेंसी उन्हें दंडित करने योग्य नहीं। उन पर केस करने के लिए अनुमति लेनी होती है। एजेंसियां उन्हीं के मातहत हैं। चोर-चोर मौसेरे भाई होते हैं। जनलोकपाल संस्था बन जायेगी तो सत्ताशीर्ष के भ्रष्टाचार को रोकने में जबरदस्त पहल संभव है। इससे राजनीतिक प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव होगा और निश्चय ही इसका लाभ उसी आम आदमी को होगा, जिसके लिए सारी क्रांति होनी है। अगर यह सुधारवादी कदम है तो क्या इसकी इजाजत नहीं देंगे।
    आपने बड़ी मेहनत से बड़ा आलेख लिखा। यह भ्रष्टाचार की परिघटना को समझने और इसके बहुआयामों को समझाने वाला आलेख है। एक सुझाव देना चाहूंगा। एक टीवी चैनल का रिपोर्टर बार-बार बोल रहा था- यहां रामलीला मैदान में जो भीड़ है, उसने लोकपाल या जन लोकपाल विधेयक नहीं पढ़ा है। अगर आपने अब तक जनलोकपाल विधेयक नहीं पढ़ा तो पढ़ने के लिए अपना एक घंटे का कीमती वक्त निकालें। इसके बाद शायद भ्रष्टाचार रोकने की दिशा में भी कुछ ठोस सलाह दे सकेंगे। आशा करूंगा कि एक नये कानून के आलोक में आपका ज्ञानवर्द्धक आलेख पढ़ने का सौभग्य मिलेगा।

  3. By Rahul Singh on August 27, 2011 at 8:33 AM

    अन्‍ना हजारे ने कहा कि देश में जनतंत्र की हत्‍या की जा रही है और भ्रष्‍ट सरकार की बलि ली जाएगी। यह गांधीवादी अहिंसक सत्‍याग्रह है या खून के बदले खून?

  4. By Anonymous on August 27, 2011 at 9:50 AM

    Gandhi ki seema jaha khatam hoti hai, waha se aage le jaane ke liye bhagat singh aur subhash v issi desh ne diye hai rahul jee. aaj jagran mey ek poster hai- Aaj gandhiwadi hai, kal anna ko kuch huwa tau mat kahana atankwadi hai.
    YE KAHA LIKHA HAI KI GANDHIWADI KABHI SUBHASWADI NAHI BANEGA?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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