हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भजनपुर नीतीश के बिहार का असली चेहरा है

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/12/2011 10:20:00 AM

मनीष शांडिल्य



एक घायल युवक जमीन पर बेसुध पड़ा हो और फाइरिंग करने वाली पुलिस का एक जवान उस पर प्रतिशोध में कूदे और उसे बेरहमी से रौंदे. और वहां मौजूद पुलिस कप्तान (एसपी) से लेकर पूरा-का-पूरा पुलिस व प्रसाशन का कुनबा बस तमाशबीन ही बना रहे. क्या एक 'लोकतांत्रिक' देश की पुलिस से ऐसे कुकृत्य की कल्पना की जा सकती है? स्वाभाविक तौर पर हरेक का जबाव न होगा. लेकिन बिहार के भजनपुर गांव में पुलिस का जो अमानवीय, क्रूर और बर्बर चेहरा बेनकाब हुआ है, उसके बाद ऊपर पूछे गये सवाल का जबाव खुद-ब-खुद पलट जाता है. साथ ही रोंगटे खड़े कर देने वाली यह बर्बरता हरेक जागरूक व संवेदनशील जनता को यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम कैसे छद्म लोकतंत्र में जी रहे हैं. एक ऐसा लोकतंत्र जिसमें पुलिस का जवान घायल के जिस्म पर 'तांडव नृत्य' करता है, उपस्थित अधिकारी मूकदर्शक भर बने रहते हैं और वीडियो फुटेज के कारण जब पुलिस बेनकाब होती है तो सरकार मात्र उस कूदने वाले जवान पर कार्रवाई करने की खानापूर्ति कर वहां मौजूद बाकी सभी को बचाने की कोशिश करती है. जबकि होना यह चाहिए था कि वहां उपस्थित पुलिस जवान से लेकर हरेक अधिकारी पर सरकार हत्या का मामला दर्ज कर उन्हें सीखचों के पीछे डालती ताकि पुलिस- प्रशासन में यह सन्देश जाता कि लोकतंत्र में जनता का दमन करने का क्या अंजाम हो सकता है. भजनपुर में बिहार पुलिस जैसी बर्बरता तो शायद अमेरिकी सैनिकों ने भी अपने तालिबानी और इराकी दुश्मनों से साथ नहीं दिखाई होगी.

बिहार का भजनपुर गांव, जहां पुलिस का दमन अपने क्रूरतम रूप में सामने आया है, राज्य में एक-एक कर उग रहे नंदीग्रामों की कड़ी में एक नया नाम भर है. यह गांव राज्य के अररिया जिले के फारबिसगंज अनुमंडल के अंतर्गत आता है. विगत तीन जून को यहां चार ग्रामीण पुलिस की गोली का शिकार हुए और लगभग दर्जन भर घायल. घायलों में से एक और युवक की मौत घटना के दूसरे दिन चार जून को हुई. मरने वालों में एक महिला और आठ महीने का बच्चा भी शामिल हैं. सभी मृतक मुस्लिम समुदाय से हैं. इनका कसूर बस इतना भर था कि ये ग्रामीण उद्योग के लिए सरकार द्वारा आवंटित जमीन से होकर आने-जाने का अधिकार मांग रहे थे क्योंकि आवंटित किये जाने के पहले इसी जमीन से होकर गुजरने वाला रास्ता उन्हें आस-पास के इलाकों से जोड़ता था. इस गोलीबारी के दूसरे दिन एक टीवी चैनल द्वारा इस घटना से संबंधित एक वीडियो फुटेज जारी करने के बाद भारतीय लोकतंत्र और इसके नये उभरते नायक नीतीश कुमार के सरकार के 'सुशासन' का यह वीभत्स चेहरा सामने आया है.

भजनपुर की घटना के पहले भी पिछले एक साल में राज्य भर में किसान कई जगह पर पुलिस का शिकार बने हैं. पटना जिले के बिहटा, औरंगाबाद के नबीनगर और मुजफ्फरपुर के मड़वन इलाके में फोर-लेन सड़क, थर्मल पावर प्लांट और एस्बेस्टस फैक्ट्री का विरोध करने पर किसानों पर पुलिस का कहर बरपना कुछ उदाहरण भर हैं. औरंगाबाद में किसान मारे भी गये थे. इसके अलावे पिछले छह सालों के दौरान अन्य कई मौकों पर भी पुलिस बर्बर कार्रवाई कर चुकी है. जैसे कि कहलगांव में साल 2008 के जनवरी महीने में नियमित बिजली की मांग कर रहे लोगों में से तीन शहरी पुलिस की गोलियों के शिकार हुए थे. साल 2007 में भागलपुर में चोरी के आरोपी औरंगजेब का 'स्पीडी ट्रायल' करते हुए एक पुलिस अधिकारी ने उसे अपने मोटरसाइकिल के पीछे बांधकर घसीटा था. कोसी इलाके में उचित मुआवजा और पुनर्वास की मांग करने वाले बाढ़-प्रभावित भी पुलिस की गोली का निशाना बने थे.

भजनपुर की हालिया घटना में पुलिस की इस बर्बर कार्रवाई की पृष्टभूमि कुछ यूं है कि बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकार (बियाडा) ने भजनपुर गांव के पास मैसर्स औरो सुन्दरम इंटरनेशनल  को स्टार्च और ग्लूकोज फैक्ट्री स्थापित करने के लिए 36.65 एकड़ जमीन आवंटित की थी. इस कंपनी में सत्तारूढ़ भाजपा के विधान पार्षद अशोक अग्रवाल के पुत्र सौरभ अग्रवाल भी साझेदार हैं. कंपनी ने जब इस जमीन पर निर्माण कार्य शुरू किया तो ग्रामीणों के काम आने वाला रास्ता बंद कर दिया गया. इस कारण भजनपुरा के गांववाले उद्योग के लिए चिह्नित जमीन से होकर रास्ता बहाल किये जाने की मांग पर गोलबंद होने लगे. मगर हमेशा की तरह जिला प्रशासन ने इस मसले पर तुरंत गंभीरता नहीं दिखाई, समय रहते मामला सुलझाया नहीं. नतीजतन 03 जून को गाववालों ने फैक्ट्री के सामने सरकारी दावे के अनुसार हिंसक प्रदर्शन शुरू किया, मशीनों में आग लगाई, तैनात पुलिस बल पर फाइरिंग की. इसके जबाव में पुलिस को आत्मरक्षार्थ जब गोली चलानी पड़ी तो 05 लोग मारे गये. सरकार के अधिकारीयों के अनुसार इस घटना में अररिया के एसपी और मजिस्ट्रेट सहित 27 पुलिसकर्मी, दर्जन भर ग्रामीण भी घायल हुए हैं.

उग्र ग्रामीणों द्वारा देशी बंदूक से पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों पर हमला किये जाने के सरकारी दावे को अगर सही माने तो इसके लिए भी पहले कई वजहों से पुलिस व प्रशासन को ही कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए. पहला यह कि सीमांचल के भजनपुर जैसे संवेदनशील इलाके में बड़े पैमाने पर हथियार इकट्ठा किये जा रहे थे तो पुलिस इसका पता लगाने और इसे रोकने में क्यों नाकाम रही? दूसरा यह कि क्या राज्य के अन्य इलाकों की तरह भजनपुर में भी हथियार पुलिस की जानकारी में, उनको आंखें-मूंदने के लिए रिश्वत देकर जमा किये गये? और तीसरा अगर पुलिस- प्रशासन को पहले से ही वहां बड़े पैमाने पर हथियार होने का पता था तो वो उग्र ग्रामीणों को रोकने के लिए पहले आधी-अधूरी तैयारी के साथ क्यों गई? जिस कारण पहले वह पिटी और फिर जब अतिरिक्त पुलिस-बल मंगाई गई तो उसने गुस्से में उग्र भीड़ को तितर-बितर करने की बजाए भीड़ का एक तरह से ' एन्कोउन्टर ' किया. पुलिस ने कितने गुस्से, खीझ और प्रतिशोध में कार्रवाई की होगी उसका अदांजा तो उस वीडियो फुटेज से लगाया जा सकता है, जिसका जिक्र ऊपर है. दूसरी ओर बिहार के गृह सचिव आमिर सुबहानी की माने तो विगत 01 जून को इस विवाद पर ग्रामीणों ओर फैक्ट्री प्रबंधन के बीच समझौता भी हो गया था. इसके बावजूद ग्रामीणों का उग्र होना जांच का विषय है.
भजनपुर ने 2007 में नंदीग्राम (प. बंगाल) के पुलिस अत्याचार की याद को फिर ताजा कर दिया है. वहां भी प्रशाशकों के उतावलेपन के कारण जमीन संबंधी जो विवाद प्रारंभ हुआ था वो आज तक सुलझ नहीं पाया है. नीतीश सरकार की 'पीपुल्स फ्रेंडली' पुलिस भजनपुर में जब गोलयां बरसा रही थी तब सरकार के मुखिया नीतीश कुमार जागरण समूह के आयोजन में आत्ममुग्धता में यह पाठ पढ़ा रहे थे कि सुशासन का सबसे बड़ा मंत्र है लोगों की बात सुनना. मगर भजनपुर के पूरे घटनाक्रम से यह साफ है कि विस्फोटक हालात इस कारण बने चूंकि प्रशासन ने लोगों की छोटी सी मांग को भी अनसुना कर दिया, जनप्रतिनिधियों ने लोगों के साथ संवाद नहीं कायम किया, समय रहते वैकल्पिक रास्ता नहीं निकाला गया. यह विफलता नीतीश कुमार के सुशासन के दावों की पोल खोलती है. साथ ही नीतीश कुमार का यह प्रवचन और भजनपुर में राज्य सरकार के अधिकारियों की विफलता और पुलिस की बर्बरता सुशासन के दावों व जमीनी हकीकत के बीच जो चौड़ी खाई है, उसका सबसे सटीक रूपक भी है.

भजनपुर की घटना में एक और चिंताजनक बात इस मामले पर राज्य के सत्तारूढ़ राजनीतिक नेतृत्व की चुप्पी भी है. बिहार सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया तीन दिन बाद 06 जून को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ओर से आयी. साथ ही जिस प्रेस-क्रांफ्रेंस में मुख्यमंत्री ने न्यायिक जांच की घोषणा की वो इस गोलीबारी पर बुलाया गया कोई विशेष नहीं बल्कि नियमित साप्ताहिक प्रेस-क्रांफ्रेंस था. प्रेस-क्रांफ्रेंस में पुलिस गोलीबारी की सिर्फ न्यायिक जांच कराने की बात कही गयी. इस घटना से जुड़े भूमि अधिग्रहण, प्रशासनिक चूक, पूलिस बर्बरता जैसे मुद्दों पर वो चुप ही रहे. मृतक और घायलों के लिए किसी प्रकार की मुआवजे की घोषणा अब तक नहीं की गयी है. पिछले दिनों गोपालगंज जेल में हुई डाक्टर की हत्या के बाद जिले में व्यापक प्रशासनिक फेरबदल करने वाले और हत्या को प्रशासनिक चूक बताने वाले मुख्यमंत्री की भजनपुर में पुलिस की बर्बर कार्रवाई पर मौन की एक वजह यह है कि नीतीश कुमार राज्य में जिस कॉरपोरेट एजेंडे को बढ़ाने में लगे हैं, भजनपुर के बारे में कुछ कहना इस एजेंडे को आगे बढ़ाने की राह में रोड़े भी अटका सकता है.

यह बयान देने के पहले तक तक नीतीश सरकार ने जांच से लेकर बयान देने तक का सारा काम उसी नौकर शाही को सौंप दिया था जिसके असंवेदनशील  रवैये और काहिली के कारण पांच बिहारी असमय काल के गाल में समा गये. लेकिन न तो मुख्यमंत्री और न ही उनके मंत्रिमडल के किसी सहयोगी ने 06 जून के पहले तक इस पर कुछ कहने की जरूरत समझी. जबकि दूसरी ओर नीतीश कुमार से लेकर उपमुखयमंत्री सुशील मोदी तक सभी मीडिया में बाबा रामदेव के लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन की निंदा कर रहे थे. मगर पांच बिहारियों के मारे जाने पर वो चुप ही रहे. लगता है उनके लिए दिल्ली नजदीक है और अपने ही राज्य का भजनपुर दूर.

पिछले दिनों जब पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे की हार हुई, तब नीतीश कुमार और सुशील मोदी सहित राज्य के कई नेताओं ने इस हार के लिए नंदीग्राम की घटना को एक बड़ी वजह बताया था. लेकिन विडंबना यह है कि इनको अपना नंदीग्राम नहीं दिखाई दे रहा है. सरकार और बिहार की जनता, दोनों, के भविष्य के लिए यह बेहतर होगा कि राज्य में एक-एक कर नंदीग्राम जो उग रहे हैं, सरकार इस विष-बेल  को और बढ़ने से रोके. अगर भजनपुरा की घटना में वो नंदीग्राम नहीं देख रहे हैं, तो आगे बहुत देर हो चुकी होगी.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ भजनपुर नीतीश के बिहार का असली चेहरा है ”

  2. By satyendra... on June 28, 2011 at 9:27 PM

    आह, कितनी बचकानी उम्मीद है। जब सरकार ने ही पुलिसवालों को रौंदने के लिए भेजा हो, तो सरकार से ही कैसे उम्मीद करते हैं कि वह कड़ी कार्रवाई करेगी? उस बेचारे पुलिसवाले की क्या गलती है, जब उसे सरकार उसी काम के लिए पैसे देती है...

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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