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प्रभाष जोशी का क्रिकेट-लेखन युद्धप्रिय राष्ट्रवाद की मिसाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/09/2011 11:25:00 AM

जिया के क्रिकेट में कूटनीति ज्यादा : प्रभाष जोशी
... भारतीयों को पाकिस्तान से हारना जितना बुरा लगता है उतना किसी देश की टीम से किसी खेल में हारना नहीं। और पाकिस्तान तो मानता है कि मांस, मच्छी, अंडे आदि खाने वाले जो मुसलमान हमलावर खैबर के दर्रे से आये वे इसलिए तो जीते और राज करते रहे कि दाल चावल खाने वाले हिंदुओं से ज्यादा ताकतवर थे और इसलिए उन पर राज करने के लिए ही बने थे। लेकिन जब अंग्रेज जाने लगे और जम्हूरियत आने लगी तो लीग के नेताओं को लगा कि हिंदू बहुमत में हैं इसलिए उनका राज हो जाएगा। अब तक अंग्रेजों के रहते हुए अल्पसंख्यक होते हुए भी हिंदुओं के बराबर और पुराने बादशाह और नवाब होने के कारण उनसे ऊपर थे। अब नीचे हो जायेंगे। राज करने वालों पर राज किया जाएगा। इसलिए भारतीय प्रजातंत्र के बजाय लीग ने भारत के विरोध में खड़े होकर मूंछ पर ताव देते रहना पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए जरूरी है। जरूरी यह भी है कि वह अपने को दाल भात और इडली डोसा खाने वाले हिंदुस्तानियों से ज्यादा ताकतवर माने। आप देखिए इमरान खान तेज गोलंदाजी करते हुए कैसी पठानी दिखाते हैं और जहीर अब्बास और जावेद मियांदाद के सामने कोई भी भारतीय गोलंदाज पाकिस्तान में टिक क्यों नहीं पाता था।
... इस बार भारत में भारत को हराने के पक्के इरादे से इमरान खान घोड़े पर चढ़कर आये हैं और अपनी गोलंदाजी को बड़ी तोप बता रहे हैं। पहले टेस्ट में मद्रास में श्रीकांत ने खुद इमरान खान और उनके सबसे घातक गोलंदाज कादिर की गेंदों में भुस भर दिया। श्रीकांत ने इमरान की ऐसी बेशर्मी से धुनाई की है कि पहले किसी बल्लेवाज ने नहीं की थी। इडली डोसे ने तंदूरी मुर्गे और गोश्त दो पियाजा में मसाले की जगह भूसा भर दिया। कादिर को दुनिया का सबसे घातक लेग ब्रेक गोलंदाज माना जाता है लेकिन उन्हें समझ नहीं पड़ रहा था कि श्रीकांत, गावसकर, मोहिंदर और वेंगसरकर को किस जगह टप्पा दें। मद्रास में पाकिस्तान की दोनों तुरुपों के अकेले श्रीकांत ने धुर्रे बिखेर दिये। इस तरह पाकिस्तान गोलंदाज का दबदबा धूल चाट रहा है। उल्टे मनिंदर की उल्टे हाथ की धीमी गोलंदाजी का भारी खौफ पाकिस्तानी बल्लेवाजों में समा गया है।
यूनुस अहमद को तत्काल पाकिस्तान से बुलाया गया है। बेचारे यूनुस 19 साल पहले टेस्ट खेले थे। लगभग 40 साल की उम्र है। लेकिन बायें हाथ से खेलते हैं इसलिए मनिंदर का सामना करने के लिए बुलाये गये हैं। जिया का ऐसे में आना और अपनी टीम का हौसला बढ़ाना और क्रिकेट को लेकर सद्‌भाव फैलाना जरूरी है।
('हंस', नवंबर 1987 में प्रकाशित आनंद स्वरूप वर्मा के लेख 'हिंदी पत्रकारिताः संदर्भ प्रभाष जोशी' से)

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ प्रभाष जोशी का क्रिकेट-लेखन युद्धप्रिय राष्ट्रवाद की मिसाल ”

  2. By Ek ziddi dhun on May 10, 2011 at 11:30 AM

    जी ये वही प्रभाष जोषी हैं जो हमारे बहुत से `प्रगतिशीलों` तक के दिलों में भगवान् की तरह विराजमान हैं. हिंदी साहित्य और पत्रकारिता हिन्दुवाद-ब्राहमणवाद से कितनी ग्रस्त है, इसके उदाहरण लगातार मिलते रहते हैं. प्रभाष जोषी जैसे लोग अपना वमन खुलकर करते रहते हैं और बहुत से परम्परा,संस्कार, प्रकृति आदि की आड़ लेकर आपने विष को छुपाने का प्रयास करते हैं. महान पत्रकार राजेन्द्र माथुर और धर्मवीर भारती ने भी इस तरह के गुल खिलाये हैं. लौन्गोवाल की हत्या पर जेन्द्र माथुर ने शीर्षक कुछ इस तरह दिया था कि देश के लिये पहला सिख शहीद.
    बांग्लादेश `मुक्ति युद्ध` के दिनों में उन्होंने बिहारी मुसलामानों पर भद्दी टिप्पणी वाला शीर्षक दिया था.
    इधर अपने साथियों में भी पुनरुत्थानवाद जोर मार रहा है.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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