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बीच सफ़हे की लड़ाई

माकपा की हार है, वामपंथ की नहीं

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/19/2011 05:17:00 PM

पश्चिम बंगाल के चुनाव के नतीजों पर बहस लंबी चलेगी. यह एक राज्य के भविष्य की बात भर नहीं है, इन चुनाव परिणामों ने एक विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद के वर्तमान और भविष्य पर बहस को भी नए सिरे से शुरु किया है. हम इसके विभिन्न पहलुओं के बारे में लेख प्रस्तुत करते रहेंगे. जसम से जुड़े रहे वरिष्ठ आलोचक रविभूषण बता रहे हैं कि वामपंथ की दावेदारी सिर्फ माकपा के पास ही नहीं है. मूलतः प्रभात खबर में प्रकाशित.

पश्चिम बंगाल में वाम मोरचे की हार को वामपंथ की हार समझने वालों को ममता बनर्जी का यह कथन ध्यान में रखना चाहिए कि वामपंथ बुरा नहीं है, माकपा की अगुवाई वाला वाम मोरचा बुरा है. ममता का विरोध वामपंथ से नहीं, वाम मोरचा से रहा है. जहां तक राजनीतिक विचारधारा का प्रश्न है, तृणमूल कांग्रेस की विचारधारा निरंकुश और आततायी पूंजीवाद के पक्ष में नहीं है. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को अपदस्थ कर 1977 में जब वाम मोरचा सत्ता में आया था, उसका चरित्र भिन्न था. ऑपरेशन बर्गा को भुलाया नहीं जा सकता. वाम मोरचा ने आरंभ में भूमि सुधार किया था, पंचायती राज कायम किया था. मार्क्सवादी विचारधारा को भावधारा न बना सकने के जो घातक परिणाम हो सकते हैं, उसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी. उसका मार्क्सवाद जमीनी न रह कर किताबी और आसमानी बन गया था. 2006 के चुनाव में माकपा को मिली 176 सीटें इस बार 40 पर क्यों सिमटी? जबकि इससे अधिक सीटें (45) उसे केरल में मिली है. जाहिर है, 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद भी उसने अपने को नहीं सुधारा.

21 जून, 1977 और 13 मई, 2011 का अंतर साफ़ है. तब पहली बार पश्चिम बंगाल में वाम मोरचे की सरकार बनी थी. सात बार विजयी बनाते रहने के बाद आठवीं बार राज्य के मतदाताओं ने माकपा को खारिज क्यों किया? ऐसी हार की कल्पना वाम मोरचे के किसी धड़े ने नहीं की थी. नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के दौर में माकपा का चरित्र बदला. उसका रास्ता वाम का रास्ता नहीं रहा. प्रशासन पंगु होता गया और पार्टी के कार्यकर्ता प्रमुख होते गये. सरकार पार्टी के अधीन हो गयी. पार्टी-संगठन का सरकार पर वर्चस्व माकपा के पतन का कारण बना. सोवियत रूस के विघटन के बाद पार्टी के सरोकार भी बदले. ज्योति बसु के कार्यकाल के अंतिम दस वर्ष और बुद्धदेव के कार्यकाल के ग्यारह वर्ष माकपा के आरंभिक वर्षो की तुलना में भिन्न रहे हैं. भूमि सुधार से भूमि अधिग्रहण तक की यात्रा पर अंतरमंथन किये बिना माकपा अपनी कमजोरियों को नहीं समझ सकती है. एक व्यक्ति के समक्ष एक प्रमुख राजनीतिक विचारधारा वाली पार्टी की हार सामान्य घटना नहीं है.

तृणमूल कांग्रेस का गठन 1 जनवरी 1998 को हुआ था. ममता राजग के भी साथ रही हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस चमकी. एक 13 वर्षीय पार्टी द्वारा माकपा जैसी पार्टी को हराने का अर्थ स्पष्ट है. यह माकपा के नेतृत्व की भी असफ़लता है. बुद्धदेव की हार और अच्युतानंदन की जीत माकपा के लिए एक सीख है. केरल में माकपा एकजुट नहीं है. अच्युतानंदन के साथ पार्टी नेतृत्व नहीं था. उनके साथ जनता थी. यूडीएफ़ ने पांच सीटें पांच सौ से कम वोटों के अंतर से जीती हैं. ये सीटें एलडीएफ़ को मिलतीं, तो फ़िर एलडीएफ़ की ही सरकार बनती. यूडीएफ़ को एलडीएफ़ से मात्र चार सीटें अधिक हैं.

पश्चिम बंगाल में माकपा ने सामान्य जन ही नहीं, बुद्धिजीवियों से भी खुद को अलग कर लिया. सिद्धांत व्यवहार के कारण ही जीवित और उपयोगी होता है. माकपा ने कार्य-पद्धति, शासन-पद्धति से मार्क्सवादी सिद्धांत को क्षति पहुंचायी है. मतदाताओं ने माकपा से इसी का बदला लिया है. जनता का धैर्य सदैव बना नहीं रह सकता. परमाणु करार मुद्दे पर माकपा का भाजपा के साथ खड़ा होना  गलत था. मुद्दा-आधारित राजनीति विचारधारात्मक राजनीति को कमजोर करती है. उदारवादी अर्थव्यवस्था ने माकपा और उसके सहयोगी दलों को कई रूपों-स्तरों पर प्रभावित किया. कांग्रेस और भाजपा की विकास-नीति से माकपा की विकास-नीति भिन्न नहीं रही. वह सत्ता-सुख में डूबी रही. उसका अपना एजेंडा बदल गया. उसका अहंकार उसे ले डूबा. सिंगूर और नंदीग्राम प्रतिरोध के प्रतीक बने. किसानों की रजामंदी के बिना किया जानेवाला भूमि-अधिग्रहण पश्चिम बंगाल में सत्ता-पलट का कारण बना.

ममता अपनी जीत के बाद अगर बंगाल में सच्चे लोकतंत्र के आगमन, वाम मोरचा से पश्चिम बंगाल को आजाद कराने, बंद और बुलेट की राजनीति न होने देने और 'मां, माटी, मानुष की जीत' की बात कहती है, तो इसमें सच्चाई है. जिस बदलाव की राजनीति में वामपंथियों को आस्था होनी चाहिए थी, वह दूर रही.  'परिवर्तन' की बात ममता ने की. माकपा ने अपने कार्डधारियों का केवल ख्याल रखा. कार्डधारियों को मार्क्सवाद से कम, अपने से अधिक मतलब था. माकपा नेता निजी-सार्वजनिक जीवन में जितने भी पाक-साफ़ रहे हों, उनके अधिसंख्य कार्यकर्ताओं की जीवन-दशा भिन्न थी. ऐसे में मार्क्सवाद की पश्चिम बंगाल में क्या दिशा होती? भय और आतंक से, दादागीरी से जनता मुक्त होना चाहती थी. उसने ममता में विश्वास जताया. ममता का जीवन उसके सामने उदाहरण बना. वे 'लड़ाकू' रहीं, 'अग्नि कन्या' बनीं.

माकपा और वाम मोरचे की हार वामपंथ की हार नहीं है. पश्चिम बंगाल की जनता ने माकपा को एक पाठ पढ़ाया है, उसे सुधरने के लिए हराया है. तृणमूल कांग्रेस की विचारधारा नहीं है. अब तक सभी दल विकास के पूंजीवादी रास्ते का ही समर्थन करते रहे हैं. बंगाल में विकास के कांग्रेसी मार्ग पर चलना तृणमूल कांग्रेस के लिए घातक होगा. संत्रास और विलगाव की राजनीति से अलग विकास और बदलाव की राजनीति प्रमुख होगी. एक व्यक्ति के समक्ष एक विचारधारा का अंत नहीं हो सकता. अहम प्रश्न यह है कि पश्चिम बंगाल में विकास की दिशा क्या होगी? विकास का मॉडल क्या होगा? चुनौतियां सबके सामने हैं. ममता के सामने चुनौतियां अधिक हैं. वहीं माकपा को भी नयी, सही और ठोस समझ से अपने को बदलना होगा.

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“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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