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बीच सफ़हे की लड़ाई

मजदूरों की आत्महत्याओं का भूमंडलीकृत ब्रांड

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/23/2011 02:27:00 AM

तिरुपुर से आने वाली मजदूरों की आत्महत्याओं की रिपोर्टों को देखते हुए 'कमेटी ऑफ कन्सर्न्ड सिटीजन-स्टूडेंट्‌स एण्ड यूथ' का गठन किया गया था जिसकी एक फैक्ट फाइंडिंग टीम पिछले दिनों तिरुपुर गयी थी. इस कमेटी ने पड़ताल के बाद जो तथ्य जुटाए उसमें से एक हिस्सा हाशिया पर पहले भी पोस्ट किया गया है. रविवार, 22 मई, 2011 को गांधी शांति प्रतिष्ठान में इस पूरी रिपोर्ट को रिलीज किया गया. प्रस्तुत है इस रिपोर्ट से एक और अंश.

तिरुपुर से मजदूरों की आत्महत्याओं की जो रपटें आ रही थीं वे पहली नजर में बिल्कुल बेजा जान पड़ती थीं. यह तमिलनाडु का एक चर्चित व्यापारिक शहर है जो कताई, बुनाई व सिलाई की मार्फत खुशहाली के राजपथ पर सरपट दौड़ रहा है. इस शहर से आत्महत्या की कहानियां सामने आ रही हैं. यह सचमुच एक भूमंडलीकृत उत्पादन प्रक्रिया का एक नमूना है जो वालमार्ट, सी एण्ड ए, डीज़ल, फिला, रीबौक आदि जैसे तमाम बड़े अन्तर्राष्ट्रीय ब्रांडों को कपड़ों की आपूर्ति करता है. यह वैसी जगह नहीं है जहां कपास की फसल व बिक्री मारी गई थीं और निरुपाय होकर कपास पैदा करने वाले किसानों ने आत्महत्या कर ली थी, जैसा कि विदर्भ में. कपास तो यहां के लिए सोने की खान है. तिरुपुर की तकदीर चमकी हुई है और यहां से 12,000 करोड़ या इससे ज्यादा रुपयों का निर्यात होता है. यह एक वैसा शहर है जहां उद्यमिता के असली मायनों से हम रू-ब-रू होते हैं. 1970 के दशक में जो एक छोटा होजरी, मुख्यतः अंतःवस्त्र, बनाने वाला केन्द्र था. उसने भूमंडलीकृत होते दशकों में कपड़ों का एक अग्रणी निर्यातक होने का रास्ता पकड़ लिया और विकास की गति यहां अत्यंत तीव्र हो गई. ऐसी जगह पर आत्महत्या विडम्बनापूर्ण परिघटना प्रतीत होती है.

सस्ता और प्रचुर श्रम के जोर पर तिरुपुर के कारखानेदारों ने अपने लिए जगह बनाई है. 1980 के दशक के अंत की ओर निर्यात में तेजी आई और '90 के दशक के भूमंडलीकृत वातावरण में तिरुपुर अपने रंग में आ गया.

भूमंडलीकृत वातावरण में मुकाबला करने के लिए अपने सस्ते श्रम के भण्डार को इस्तेमाल करने की भारत की योजना है. नवउदारवाद के हिमायती तथा योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने सस्ते श्रम की बदौलत कपड़ा और चमड़ा के उत्पादक और निर्यातक के रूप में चीन को हटाकर उसकी जगह लेने की इच्छा जाहिर करते हुए हाल ही में एक बयान दिया है. 21 अप्रैल, 2011 के अखबारों में एक रिपोर्ट आई थी जिसमें उन्होंने कहा था - ''चीनी कपड़ा व चमड़ा जैसे मूल्य स्पेक्ट्रम के निचले सिरे को खाली करने जा रहे हैं. इसलिए उनकी जगह कौन लेगा? क्या हमलोग उस जगह को लेने जा रहे हैं या वह वियतनाम या तुर्की या इंडोनेशिया होगा?'' और उन्होंने आगे कहा कि भारतीय निर्यात ज्यादा प्रतियोगी होगा क्योंकि चीन निर्यातोन्मुखी विकास की अपनी नीति को समाप्त करने वाला है जिसके फलस्वरूप वहां मजदूरी बढ़ने वाली है. भूमंडलीकृत काम की जगह में यह भारत है जो सस्ता श्रम से लाभ उठा रहा है.
तिरुपुर के लिए इसके मायने आत्महत्या की उच्चतर दर हो सकता है.

इस रिपोर्ट को रिलीज करने के बाद इस पर विभिन्न संगठनों के बीच इसके अलग-अलग पहलुओं पर व्यापक बहस भी हुई. इस रिपोर्ट के संदर्भ में एक मुख्य सुझाव यह था कि मजदूरों की आत्महत्याओं को किसानों की आत्महत्याओं तथा कृषि क्षेत्र की व्यापक समस्याओं के साथ जोड़ कर देखा जाना चाहिए. प्रस्तुत है इस मौके पर सामाजिक कार्यकर्ता अंजनी कुमार के वक्तव्य की रिकार्डिंगः


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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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