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बीच सफ़हे की लड़ाई

बस्तर में सैन्य दखलंदाजी के खिलाफ सम्मेलन

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/19/2011 04:45:00 PM

जनता पर राजकीय हमले का विरोध करो

वक्ता
एबी वर्धन, महासचिव, सीपीआई
अमित भादुड़ी, प्रोफेसर एमेरिटस, जेएनयू
अर्पणा, सीपीआई एमएल- न्यूडेमोक्रेसी
अरूंधति राय,लेखिका
बीडी शर्मा, पूर्व कमिश्नर बस्तर
ईएन राममोहन, पूर्व डीजीपी, बीएसएफ
मदन कश्यप, साहित्यकार
सुमित चक्रवर्ती, सम्पादक- मेनस्ट्रीम
सुधा भारद्वाज, पीयूसीएल, छत्तीसगढ़
गिरिजा पाठक, सीपीआई एमएल- लिबरेशन
पंकज बिष्ट, सम्पादक- समयांतर
एसएआर गिलानी, दिल्ली विश्वविद्यालय
शशि भूषण पाठक,पीयूसीएल, झारखंड
अर्जुन प्रसाद, पीडीएफआई

दिनांक : 21 मई, 2011, समय : दोपहर 3 बजे से रात 8 बजे तक
स्थान : गांधी शांति प्रतिष्ठान, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ के पास



जनता पर भारत सरकार द्वारा थोपे गए युद्ध आपरेशन ग्रीन हंट को लगभग 2 साल पूरे होने जा रहे हैं। राजकीय दमन का दो सालों का इतिहास खून से सना हुआ है। 2009 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने दोबारा आने के साथ ही जल-जंगल-जमीन के लिए चल रहे जनांदोलनों पर क्रूर दमन का जोर बढ़़ा दिया। इसने जनता के खिलाफ ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम से युद्ध घोषित कर दिया। केन्द्रीय सरकार के नेतृत्व में छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, झारखण्ड़, उड़ीसा व अन्य राज्य सरकारों ने इसी युद्ध को जोर-शोर से आगे बढ़ाया। सेना की कमान में आपरेशन ग्रीन हंट की शुरुआत होने के साथ ही मध्य और पूर्वी भारत की जनता खासतौर पर आदिवासियों पर राजकीय दमन बेइन्तहा बढ़ गया। इस दौरान दो लाख से अधिक पुलिस व अर्धसैनिक बल इन क्षेत्रों में तैनात किए गए। अकेले छत्तीसगढ़ में दो सालों में सौ से अधिक लोग मारे गए। आपरेशन ग्रीन हंट को चलाने वाले अर्धसैनिक बलों में सीआरपीएफ, कोबरा, बीएसएफ, ग्रेहाउंड, आईटीबीपी, सी सिक्सटी, सीआईएसएफ आदि के साथ साथ स्थानीय एसपीओ, पुलिस बल भी शामिल हैं। इन्होंने ऑपरेशन के दौरान विभिन्न गांवों में आदिवासियों की हत्याएं कीं और आदिवासियों को बड़े पैमाने पर आंध्र प्रदेश में पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया। छत्तीसगढ़ में इन बलों के अलावा अवैधानिक सलवा जूड़ूम गिरोह भी हैं जो विभिन्न तरह की क्रूरताओं से आदिवासी जनता का दमन कर रहे हैं। इन दमन की छानबीन रिपोर्ट हासिल करना भी आसान नहीं है। नागरिक व जनवादी अधिकार संगठनों को बमुश्किल ही वहां जाने की अनुमति मिल पाती है। यदि कोई इन इलाकों में जाने की कोशिश करता भी है तो राज्य के समर्थन से सलवा जुडूम, मां दंतेश्वरी स्वाभिमान मंच जैसे लम्पट गिरोह उन्हें अन्दर जाने से रोकते हैं और मार-पिटाई करते हैं।

पिछले दो सालों से उड़ीसा सरकार सीआरपीएफ का प्रयोग जनता के जमीन पर अधिकार व उसके आन्दोलन को कुचलने के लिए कर रही है। इन दो सालों में वहां जनांदोलनों से जुड़े लोगों की झूठी मुठभेड़ों में लगभग 20 लोगों की हत्या की गई। ये शहीद लोग काशीपुर, सुन्दरगढ़, गंधमर्दन, नियमगिरी, कलिंगनगर जैसे विस्थापन विरोधी आन्दोलन से जुड़े हुए थे। उत्तर और पश्चिम उड़ीसा के आदिवासी इलाकों के लोगों को राजकीय दमन का लगातार शिकार बनाया जा रहा है। ऐसे ही हालात झारखंड में हैं। खरसावां और लातेहर में पुलिस व अर्धसैनिक बलों के उत्पीउऩ के 30 मामले सामने आए। इन मामलों में पुलिस ने लोगों पर झूठे केस बनाए, उन्हें थर्ड डिग्री यातनाएं दी गईं, उनके घर जलाए, जंगलों में आग लगा दी और शादी जैसे उत्सव में दखलंदाजी किया। महिलाओं को सलवार और कमीज पहनने के अपराध में गिरफ्तार किया गया। जिन लोगों ने इसका विरोध किया उन्हें झूठे मामलों में गिरफ्‌तार किया। इसके साथ साथ झारखंड सरकार टीपीसी, जेपीसी, जेएलटी जैसे भाड़े के गिरोहों का प्रयोग जनता के जुझारू आन्दोलन और उनके नेतृत्व को खत्म करने के लिए कर रही है।

पश्चिम बंगाल की सीपीएम सरकार ने जंगल महाल पर जो जुल्म किया वो तो जगजाहिर है। अकेले लालगढ़ में राजकीय समर्थन से सीपीएम के पचास अवैध हथियारबंद ट्रेनिंग कैम्प चल रहे हैं। लगभग सोलह सौ से अधिक हरमद गुंड़े इन कैम्पों में हैं जो जनता पर सलवा जुडूम जैसा ही अत्याचार-दमन कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में संयुक्त सैन्य बल, हरमद और गणप्रतिरोध कमेटी ने सौ से अधिक लोगों की हत्याएं की हैं। पुलिस संत्रास विरोधी जनसाधारणेर कमेटी के नेतृत्व जैसे लालमोहन टुडु, उमाकांत महतो, सिद्धु सोरेन को सीआरपीएफ ने झूठी मुठभेड़ में मार दिया। सैकड़ों लोगों को गम्भीर मामलों में फंसा कर जेल में डाल दिया गया। पूरे के पूरे इलाके में धारा 144 लगाकर जनाधिकारों को कुचला जाना आम बात है। जनांदोलनों को बदनाम करने के लिए ज्ञानेश्वरी ट्रेन दुर्घटना का षडयंत्र रचा गया। जिसके चलते सैंकड़ों लोगों की जान गई। बिहार में नीतिश कुमार सरकार ने दोबारा सत्ता में आते ही दमन के कुख्यात आंध्र मॉडल को लागू करना शुरू कर दिया है और खुफिया तरीकों से क्रान्तिकारी और जनवादी आन्दोलन के नेतृत्व के अभियान में लग गया।

जनता के खिलाप चलाये जा रहे इस युद्ध को तेज करने के लिए अब आदिवासी इलाकों में भारतीय सेना का आधार कैम्प बनाया जा रहा है। भारतीय सेना के दो ट्रेनिंग कैम्प उड़ीसा के रायगढ़ा व छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिलों में जल्दी ही स्थापित करने की योजना है। खुद सेना के अनुसार ही ये तथाकथित कैम्प मिजोरम व कांकेर के जंगल युद्ध प्रशिक्षण स्कूल के माडल पर ही स्थापित किये जा रहे हैं। सवाल उठता है कि ये कैम्प क्या केवल ट्रेनिंग देने के लिए ही है? या इनका कोई और रणनीतिक उद्‌देश्य है। ऐसे देखें तो पिछले कई सालों से सरकार इस बात पर जोर दे रही है कि नक्सलवाद आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इसका कुल जमा अर्थ कारपोरेट जगत की लूट के खिलाफ बढ़ रहे जनांदोलनों का हिंसक दमन करना है। ये कैम्प इसी उद्देश्य को पूरा करेंगे। कहने को भारतीय सेना नक्सलवाद के खिलाफ किसी सीधी लड़ाई में उतरने से इन्कार कर रही है लेकिन सेना के कैम्प की जिस तरह की व्यवस्था की जा रही है उससे साफ है कि इसका मकसद जनता के खिलाफ युद्ध तेज करना है।

छत्तीसगढ़ व उड़ीसा में भारतीय सेना के बेस कैम्प बनाने का मूल मंतव्य जनता पर सीधा सैन्य युद्ध थोपना ही है। हम देख सकते हैं कि सेना के सीधे उतरने के पहले ही वहां जनता पर व्यापक हमला जारी है। सेना की सीधी भागीदारी से जनता के क्रूर दमन के हालात का अंदाजा हम लगा सकते हैं। सेना के दो कमान पैदल व हवाई सेना आपरेशन ग्रीन हंट के साथ शुरुआत से ही शामिल है। अब तो वायुसेना के जवानों को आत्मरक्षा के नाम पर गोली मारने का लाईसेंस भी मिल गया है। सच्चाई यही है कि आपरेशन ग्रीन हंट में जिन लोगों को लगाया गया है वह लोग सेना द्वारा संचालित मिजोरम के जंगल युद्ध प्रशिक्षण स्कूल से ही निकले हुए लोग हैं। इसी अभियान के लिए सेना लंबे समय से छत्तीसगढ़ के कांकेर में युद्ध प्रशिक्षण दे रही है।

आपरेशन ग्रीन हंट जनता पर व्यापक दमन का अभियान है। इस दमनकारी अभियान के शुरूआती दौर में बिलासपुर में सेना के केन्द्रीय कमान ने मातहत सब डिवीजन बनाया। साथ ही केन्द्रीय गृह मंत्रालय की देख-रेख में विभिन्न राज्यों में चलाए जा रहे ऑपरेशन ग्रीनहंट के लिए एकीकृत कमांड बनाया गया। ट्रेनिंग कैम्प वस्तुतः सेना को जनता के ऊपर युद्ध थोपने के उद्देश्य से ही बनाया जा रहा है। द हिन्दू अखबार के अनुसार अबूझमाड़ के कुल क्षेत्रफल 4000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का 600 वर्ग किमी सेना को बेस कैम्प के लिए सौंपा जा रहा है। इतने बड़े इलाके में सेना के आने से स्थानीय लोगों का विस्थापन व जंगल की तबाही होना तय है। कैम्प बनाने की प्रक्रिया के नाम पर जंगल जमीन व खनिज सम्पदा और जनांदोलनों को तबाह करने के अभियान को अंजाम देने की ही तैयारी है। 23 मार्च, 2011 को जनसत्ता में सेना ने बयान दिया है कि 'सेना पहले दुश्मन के हमले का इंतजार नहीं करेगी बल्कि पहले हमले के अधिकार का प्रयोग करेगी'। कांकेर के युद्ध प्रशिक्षक सैन्य ब्रिगेडियर पंवार ने बयान दिया है, ''माओवादियों को यह साफ बता देना है कि उनके दरवाजे पर शेर इंतजार कर रहा है'। इस बयान का मकसद साफ है।

सेना के इस हस्तक्षेप का विरोध जरूरी है। केन्द्र की सरकार देश के संपूर्ण मध्य भूभाग को दुनिया के बड़े कारपोरेट घरानों को देने का मन बना चुकी है। दरअसल सेना के ट्रेनिंग कैम्प का पूरा मकसद इन कारपोरेट घरानों की सेवा करना है। ऐसी ही योजना के तहत सलवा जुड़़ूम के बर्बर अभियान में 650 गांवों को उजाड़ दिया और लोगों को सरकार के शिविर में बंदी बनाकर छोड़ दिया गया। जब जनांदोलनों से जुड़ी ताकतों ने इस अभियान की सफल खिलाफत की तो सरकार सेना का प्रयोग कर रही है। 600 वर्ग किमी के विशाल इलाके पर कब्जे की योजना इसी मद्देनजर है। इस बेस कैम्प में उतरने के साथ ही आदिवासी इलाके में सेना के हमले की शुरुआत और कारपोरेट लूट के लिए कब्जा करने का अभियान शुरू होगा। जाहिर है एक विशाल फौज और उसके द्वारा हिंसक गतिविधियों की शुरुआत देश को गृहयुद्ध की ओर ले जाएगा। जनता पर युद्ध विरोधी मंच देश की प्रगतिशील व जनवादी समूहों से अपील करता है कि भारत सरकार की सेना के बेस कैंप बनाने और जनता के संहार करने के कार्रवाई के खिलाफत में एकजुट होकर आवाज बुलंद करें।

जनता पर युद्ध बंद करो! केन्द्रीय सैन्यबलों को वापिस बुलाओ! बस्तर में सैन्य बेस कैंप को खत्म करो!

आयोजक: जनता पर युद्ध के खिलाफ मंच (Forum Against War on People)
सम्पर्क : forumagainstwaronpeople@gmail.com

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ बस्तर में सैन्य दखलंदाजी के खिलाफ सम्मेलन ”

  2. By satyendra on May 31, 2011 4:49 PM

    बहुत बेहतरीन और तथ्यात्मक पेशकश। पहले भी जानकारी से भरपूर लेख आप देते रहे हैं। जारी रखें।

  3. By Anonymous on June 22, 2011 4:03 PM

    बस्तर में नक्सलवाद के दमन के लिये उठाए जा रहे हर प्रयास को समर्थन मिलना चाहिये। ये आठ दस तथाकथित बुद्धिजीवी अपने आप को बस्तर का विधाता समझने लगे हैं। हत्यारों के समर्थकों की मैं भर्त्सना करता हूँ।
    -एक बस्तरिया

सुनिए : हम देखेंगे/इकबाल बानो

बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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