हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बिहार का मीडिया सरकारी जनसंपर्क अधिकारी है

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/17/2011 02:40:00 AM

बिहार में मीडिया की दशा और दिशा को लेकर पिछले कुछ सालों से चिंता बढ़ने लगी है, जब सरकार की विज्ञापन नीतियों और दूसरे कदमों ने मीडिया की आजादी पर कई तरह की पाबंदियां लगा दीं. दूसरी तरफ, मीडिया घरानों के लगातार बढ़ते एकाधिकार और उनके बड़ी कंपनियों में बदलते जाने से भी मीडिया चरित्र बदला है. वह अधिक से अधिक शहर केंद्रित, उत्पादकेंद्रित और गहन पूंजी वाला क्षेत्र बनता गया है. इसने वास्तव में एक लोकतांत्रिक समाज में संचार की संभावनाओं को खत्म किया है. कुछ दिन पहले पटना में इन सब सवालों को लेकर एक गोष्ठी हुई. आल इंडिया बैकवर्ड स्टुडेंट्‌स फोरम और अभियान द्वारा बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के सभागार में आयोजित इस पर मनीष शांडिल्य की रिपोर्ट.

बिहार में मीडिया जनसंपर्क अधिकारी की भूमिका में है. सरकार मुख्यधारा के मीडिया को अपने प्रचार तंत्र के रूप में प्रयोग कर रही है. बिहार सरकार अपनी छवि चमकाने के लिए जनता का पैसा विज्ञापन के रूप में मुख्यधारा के मीडिया पर लुटा रही है. सरकार छवि चमकाने के लिए योजनाओं के प्रचार-प्रसार पर कम और अपनी उपलब्धियों की चर्चा ज्यादा करती है. सरकार मुख्यधारा के मीडिया पर खर्च कर अपनी सत्ता वापसी का रास्ता तैयार करने में लगातार लगी रहती है. सरकार एक गिरोह के रूप में भी कार्य कर रही हैं. दूसरी ओर आज बिहार का मुख्यधारा का मीडिया सवाल नहीं उठा रहा है. जनपक्षी खबरें सामने नहीं आ रही हैं. बिहार में भ्रष्टाचार काफी बढ़ गया है. मनरेगा, आंगनबाड़ी समेत सारी योजनाओं में भ्रष्टाचार चरम पर है लेकिन यह बातें अखबारों से गायब हैं. मीडिया चुप है. मीडिया संस्थानों में पत्रकार नहीं चाटुकारों को बढ़ावा मिल रहा है. कोशिश की जा रही है कि पत्रकार चोट करने के लायक ही नहीं रहे. मगर चूंकि पत्रकार और पत्रकार संगठनों में एकता की कमी है इस कारण वे इस चाटुकारिता के खिलाफ खड़े नहीं हो रहे हैं. जबकि प्रेस-बिल के समय जैसी एकजुटता दिखाने की जरूरत है. इस कारण बिहार में मुख्यधारा का मीडिया कटघरे में है.
    बीबीसी से जुड़ वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर जब ये बातें कह रहे थे तो वे राजनीति और मीडिया के बेहद करीबी रिश्तों पर भी नजर डाल रहे थे. उन्होंने आमलोगों के जीवन से जुड़े सवालों को खड़ा करते हुए सवाल किया कि पांच साल में बिजली क्यों नहीं ठीक हुई? शिक्षा रसातल में चली गई. जो सही हस्ताक्षर नहीं कर सकता वह शिक्षक बन गया और प्राथमिक शिक्षा बुरी तरह चौपट हो गयी. विकास मित्र बहाल हुए हैं लेकिन वह अलग-अलग वजहों से मतदाता को बूथ पर ले जाने और सरकार के पक्ष में वोट दिलवाने का काम करते हैं. इसकी चर्चा मुख्यधारा के मीडिया में नहीं होती है. हत्या, अपहरण, फिरौती, बलात्कार जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं. लेकिन मुख्यधारा का मीडिया इस पर प्रहार करने की जगह कानून-व्यवस्था में सुधार के सरकारी दावों के सुर में सुर मिलाता है. मणिकांत ठाकुर ने आगे कहा कि बड़े अखबार पूंजीपतियों के कब्जे में हैं. जिनका एक मात्र उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना भर रह गया है. ऐसे में मालिकों की मर्जी से अखबारों का तेवर तय हो रहा है. इस कारण बड़े अखबार आज बिहार में सरकारी भोंपू बन गये हैं और जनता की मूल समस्याओं को उजागर नहीं कर रहे हैं. ऐसे में आज वैकल्पिक मीडिया की जरूरत है. छोटे अखबार, छोटी पत्रिका, वेब पत्रिका, ब्लॉग्स को सशक्त बनाते हुए वैकल्पिक मीडिया को मजबूत किया जा सकता है और जनपक्षी पत्रकारिता की जा सकती हैं.
    गोष्ठी में बहस को आगे बढ़ाते हुए दैनिक जागरण से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे ने कहा कि भारत में आज तक पाठकीय संप्रभुता बन ही नहीं पाई. आगे के समय में यह और भी संभव नहीं दिखाई देता है क्योंकि यह वित्तीय मुद्रा व मुद्रा के वर्चस्व का युग है. बड़ी पूंजी से संचालित बाजार कह रहा है कि तुम्हें वही चीजें चाहनी होंगी जो हम पैदा कर रहे हैं. यह सब मात्र मुनाफा कमाने की होड़ में किया जा रहा है. इसी दौर में खबरों को भी सेलेबल प्रोडक्ट के रूप में भी तैयार किया जा चुका है. राजनीति और मुख्यधारा के मीडिया दोनों पर पूंजी का दबाव है. उन्होंने आगे कहा कि पहले जनाधार और कैडर आधारित पार्टियां मुख्यधारा के मीडिया को अपने लिहाज से महत्वहीन मानती थीं. लेकिन जैसे-जैसे समय बदला जनाधार कमजोर हुआ, पार्टियां कैडरविहीनता की स्थिति में आने लगीं, पार्टियां मीडिया के द्वारा छवि निर्माण करने लगीं. पार्टियां मुख्यधारा के मीडिया का इस्तेमाल कर उन पैसिव वोटरों को प्रभावित करने लगीं जो पाठक-दर्शक है. ऐसे में ही पार्टियों और मुख्यधारा के मीडिया का नापाक गठबंधन शुरू हुआ. राघवेंद्र दुबे ने अपने विचार क्रम को आगे बढ़ाते हुए याद दिलाया कि पत्रकारिता तो नैसर्गिक प्रतिपक्ष है. साथ ही उन्होंने मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने को साजिश करार देते हुए कहा कि ऐसा कहना मीडिया को भी बाकी तीनों स्तंभों के वर्ग-चरित्र का हिस्सा बनाना है. इसके बाद उन्होंने याद दिलाया कि आज सर्वाधिक असरदार पत्रकारिता डिजिटल वर्ल्ड में हो रही है. उन्होंने अपने वक्तव्य के अंत में सबसे आह्‌वान किया कि सब पाठकीय राज की स्थापना के लिए आगे बढ़ें लेकिन इस राह पर आगे बढ़ने के लिए जिस पूंजी का सहारा लेंगे उसका रंग और स्रोत देखना न भूलें.
    गोष्ठी में आईआईएमसी में प्राध्यापक और मीडिया शोधार्थी दिलीप मंडल ने एक तरह से पत्रकारों का बचाव करते हुए कहा कि पत्रकार दोषी नहीं हैं क्योंकि चीजें बहुत हद तक मीडिया संस्थानों के प्रबंधन तय कर रहे हैं. किसी भी मीडिया संस्थान के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में पत्रकार नहीं हैं. उन्होंन आगे कहा कि सैकड़ों शोध अब यह साबित कर चुके हैं कि मुद्दे मास मीडिया तय करता है. ऐसे में सरकारों द्वारा कन्सेंट मैनुफैक्चर (सहमति निर्माण) के लिए आज बड़े पैमाने पर मुख्यधारा की मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है. वर्तमान में इसका सबसे सटीक उदाहरण बिहार सरकार है. बिहार में पिछले 6 सालों के दौरान कोई नया उद्योग नहीं स्थापित हुआ लेकिन प्रचार के बूते सरकार ने विकास के नाम पर जनता का समर्थन बटोर लिया.
    अपनी चिर-परिचित शैली में उन्होंने आगे कुछ तथ्यों को रखते हुए बताया कि अगर अखबारों की बात करें तो बिहार के 89 प्रतिशत अखबार पढ़ने वाले लोग सिर्फ दो अखबार हिंदुस्तान और दैनिक जागरण पढ़ते हैं. ऐसे में सरकार मात्र इन दो अखबार को ही मैनेज कर बिहार में बहुत बड़े स्तर पर पाठकों को प्रभावित कर रही है. बिहार सरकार के लिए ऐसा करना तब और आसान हो जाता है जब सत्तारूढ़ जनता दल (यू) का एक सांसद एन. के. सिंह एचटी मीडिया के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में भी शामिल हो. लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मीडियाकर्मियों का जातिवादी चरित्र भी बिहार में मीडिया की पथभ्रष्ट होने की एक बड़ी वजह है. मगर साथ में उन्होंने यह भी जोड़ा कि सवर्णों के न्यायपूर्ण तबके से ही उम्मीद भी है. उन्होंने अंत में कहा कि न्यू मीडिया के रूप में जनपक्षी मीडियाकर्मियों को नये हथियार तलाशने-तराशने होंगे. नये समानांतर मीडिया से ही भविष्य में उम्मीद की जा सकती है.
    जनसत्ता के गंगा प्रसाद ने कहा कि आज अखबारों में सूचना है मगर खबर नहीं. पटना में खबर लिखने वाले तीन पत्रकारों को हाल के दिनों में नौकरी से हाथ धोना पड़ा. आज नेता मीडिया को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं और ज्यादातर पत्रकार पत्रकारिता नहीं धंधा करने लगे हैं. उन्होंने मीडिया के बदलते स्वरूप के लिए अखबार चलाने वालों की मानसिकता में आये बदलाव को मुख्य वजह बताते हुए कहा कि विज्ञापन से तो अखबार पहले भी चलते थे मगर विज्ञापन संपादकीय पर पहले इस कदर हावी नहीं था. उन्होंने इस पर चिंता जतायी कि अब अखबारों में प्रभावशाली पत्रकार यूनियन नहीं रह गये हैं क्योंकि वेज रोल पर पत्रकार नहीं हैं. अंत में उन्होंने कहा कि विकल्प तैयार करना आवश्यक है और इसके लिए जरूरी है कि पत्रकार मानसिक तौर पर दीन-हीन न बने, गुलाम होने से बचें.
    संगोष्ठी में वरीय पत्रकार सुकांत ने कहा कि पटना और दिल्ली में बैठे पत्रकार कान्सेंट मैनुफैक्चर (सहमति निर्माण) ज्यादा कर रहे हैं. जबकि कस्बाई पत्रकार, मुफ्फसिल पत्रकार अपनी जिम्मेवारी का निवर्हन कहीं बेहतर ढंग से, ईमानदारी से कर रहे हैं. ये पत्रकार अपना पत्रकारीय कर्म नहीं भूले हैं. किंतु शीर्ष पर बैठे पत्रकार मीडिया की धार कुंद कर रहे हैं.
    साहित्यकार व विधान पार्षद प्रेम कुमार मणि ने कहा कि वर्तमान निजाम में कुछ काम के साथ बड़े पैमाने पर पाखंड राज भी चल रहा है. नीतीश कुमार यह मानते हैं कि आज सम्राट अशोक के कार्य नहीं उनके द्वारा स्थापित लाट ही दिखाई देते हैं, इस कारण इसी राह पर आगे बढ़़ो. यह बड़ा अंतर्विरोध है. सरकार चाहती है कि पाखंड पर टिप्पणी न हो और इसके लिए वह मुख्यधारा का मीडिया का सहारा लेकर अपनी छवि को चमकाने में लगी है. और ऐसा करने में सत्ता शीर्ष के पांव दबाने वाले पत्रकार मददगार साबित हो रहे हैं जो लालू के समय भी चाटुकारिता कर रहे थे और आज नीतीश का यशोगान कर रहे हैं. लोकतंत्र के घोषित तीनों खंभों की तरह चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया भी भ्रष्टाचार के रोग से ग्रसित हो चुका है. उन्होंने अंत में कहा कि नेता लगातार पत्रकारों को हरेक स्तर पर भ्रष्ट बनाने में लगे हैं. लेकिन पत्रकारों की जिम्मेवारी है कि इससे बचते हुए वो हरेक स्तर पर पाखंड का भंडाफोड़ करें.
    संगोष्ठी के अंत में अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रो. नवल किशोर चौधरी ने कहा कि आज के दौर में हम राजनीति, मीडिया से लेकर हरेक क्षेत्र में अतिवाद के शिकार हैं. फिलहाल अगर सिर्फ मीडिया की बात करें तो मीडिया पर ज्यादा नजर रखी जा रही है, उसमें ज्यादा हस्तक्षेप किया जा रहा है. बिहार में आज मीडिया भक्ति मार्ग अपनाते हुए भजन-कीर्तन में लगा है. भक्ति मार्ग से ज्ञान मार्ग की ओर मीडिया नहीं बढ़ रहा है. यह बहुत ही चिंताजनक बात है.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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