हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

चंद सवाल रह गए थे बादल दा

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/15/2011 11:18:00 PM

अंधेरे कमरों में लगातार फुसफुसाती, चीखती और सिर पीटती आवाजें. कथ्य को दिशा देनेवाली सभी घटनाएं प्रायः दृश्य से बाहर घटती हुईं. बीच-बीच में शांति के कुछ पल... कर्मकांडी उदासी और बोझिल परिवेश. बादल सरकार के नाटकों की याद आते ही कुछ निश्चित से दृश्य खिंच जाते हैं. ब्रह्म प्रकाश बादल सरकार के नाटकों को एक सही राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश की है. उन्होंने बादल सरकार की कथित क्रांतिकारिता और रचनात्मक प्रतिबद्धता की भी पड़ताल की है. जेएनयू में आरसीएफ से जुड़े एक सक्रिय रंगकर्मी रहे ब्रह्म प्रकाश लंदन विश्वविद्यालय से जन कलाओं पर शोध कर रहे हैं और इसे पूरा करने की व्यस्तता के बावजूद उन्होंने हाशिया के अनुरोध पर बहुत झिझकते हुए यह लेख भेजा है.


बादल दा, जब अनायास ही एक साइट पर आपकी मृत्यु का समाचार पढ़ा तो थोड़ी देर के लिए भरोसा ही नहीं हुआ. भरोसा इसलिए भी नहीं हो पा रहा था क्योंकि आपसे करने के लिए चंद सवाल जो रह गये थे. हां, बादल दा एक इच्छा थी कि आपसे एक दिन जरूर मिलूंगा और मिल कर कुछ अटपटे और अनसुलझे सवाल करूंगा. वे सवाल जो असल में अनसुलझे नहीं थे, बल्कि आपने उन्हें उलझा कर रख दिया था. आपके वो उलझे सवाल हम जैसे बहुतों के मन में होंगे. खास कर जब भी आपका कोई नाटक देखा, सवाल करने की इच्छा उतनी ही तीव्र हुई. परंतु जब भी आपको लिखने के लिए सोचा, थोड़ी झिझक ने मुझे रोक लिया. यह जानते हुए भी कि आप नहीं रहे आज वे सवाल पूछ रहा हूं. सवाल इसलिए भी जरूरी हैं कि आपकी विरासत तीसरा रंगमंच (Third Theatre) के रूप में जिंदा है. आपके लिखे गये उन अनगिनत नाटकों में के रूप में. सवाल आप से भी हैं और आपके उन शागिर्दों से भी जो आपके नाटकों के गुणगान करते नहीं थकते. वैसे कुछ मामलों में, खास कर तीसरा रंगमंच को लेकर तो मैं खुद ही आपका गुणगान करता हूं.

आपसे और आपके तीसरे रंगमंच के बारे में मेरा पहला परिचय जेएनयू में तब हुआ जब मैं कैंपस आधारित नुक्कड़ नाटक समूह जुगनू से जुड़ा था. परिचय क्या था, प्रेरणा थी. तब आपके तीसरा रंगमंच का प्रशंसक हो गया था मैं. आप जिस खूबी से स्पेस का इस्तेमाल किया करते थे, अपने नाटकों में आपने जिस बारीकी से अभिनेताओं की देह (body) का इस्तेमाल किया था और उसमें एक नयी जान फूंक दी थी, वह पहली नजर में बहुत प्रभावशाली लगता था. जब चाहा आपने उसे पेड़ बना दिया, जब चाहा एक लैंप पोस्ट. खास कर जिस तरह से आपके एक चरित्र दूसरे चरित्र में बदल जाते थे और दूसरे चरित्र को आत्मसात कर लेते थे, वह काबिले तारीफ था. स्पेस और बॉडी का ऐसा मेल आधुनिक भारतीय रंगमंच में शायद ही किसी ने किया हो. आप सिर्फ रंगमंच को सभागार (auditorium) से बाहर ही नहीं लाये, आपने नुक्कड़ों और सड़कों को ही मंच (स्टेज) बना दिया. बुर्जुआ रंगमंच के सभागार को तो आपने ध्वस्त कर दिया. आपने यह साबित कर दिया कि पैसे और सभागारों से रंगमंच नहीं चलता, रंगमंच के लिए अभिनेता की देह, न्यूनतम स्पेस और दर्शक की कल्पनाशक्ति काफी है. आपका वह सवाल कि ‘थिएटर करने के लिए कम से कम क्या चाहिए’, नाट्यकर्मियों के लिए आज भी प्रेरणास्रोत है. एक चुनौती है. आपने जिस तरह से वस्त्र सज्जा (कॉस्ट्यूम) और साज सज्जा (मेक अप) को गैरजरूरी बना दिया और इस तरह कुल मिला कर नाटक के अर्थशास्त्र को बदल कर रख दिया वह हमारे समाज के संदर्भ में रेडिकल ही नहीं क्रांतिकारी भी था. आपने बुर्जुआ रंगमंच और रंगकर्मियों को उनकी सही औकात बता दी थी. इसके लिए देश के नाट्यकर्मी आपके कायल हैं. खास कर हमारे जैसे देश में आपके प्रयोग और भी अहम हो जाते हैं, क्योंकि यूरोप और अमेरिका की तरह रंगमंच अब भी यहां उद्योग नहीं है. कुछ गिने-चुने लोगों को छोड़ कर रंगमंच की कमान अब भी आम लोगों के हाथों में है. वही आम लोग जो बड़े बड़े थिएटर हॉलों में किए गए नाटकों पर घास भी नहीं डालते. आज भी उनके लिए थिएटर गांव के मेलों में शहर की गलियों और चौराहों पर है. उन्हें आनेवाले दिनों में भी मुफ्त का थिएटर ही चाहिए होगा, जो उनका वाजिब हक है.

ऐसे रंगमंच के लिए आपका योगदान बहुत बड़ा है. उसे जितना भी सराहा जाए वह कम है. आपके रूप में हमें एक आगस्टो बोअल मिल गया था. असल में आपके कामों से ही हमने ऑगस्टो बोअल को जाना.
तब तक आपका नाटक देखने भी लगा था और पढ़ने भी लगा था. जैसे-जैसे आपके नाटकों से परिचय होता गया आपके नाटकों को लेकर बेचैनी बढ़ने लगी. चंद सवाल उठने लगे थे. पहले तो कुछ समझ में नहीं आया लेकिन जबसे कुछ समझने लगा तो आप पर गुस्सा भी आने लगा था. आपने अपने नाटकों में कथ्य (कंटेंट) पर ज्यादा महत्व देने की बात कही थी, क्या कथ्य को महत्व देने भर से हर नाटक क्रांतिकारी हो जाता है? बल्कि वह तो इस बात पर निर्भर करता है कि आपके नाटक का कथ्य क्या है. और वैसे भी आपके नाटकों का कंटेंट क्या था बादल दा? उलझा हुआ आम आदमी जो अपनी उलझनों में फंस कर रह जाता है, उनसे बाहर नहीं निकल पाता और निकल भी नहीं पायेगा. आपका वह आम आदमी मध्यवर्ग से लेकर दलित और आदिवासी भी था. वह कोलकाता की सड़कों से लेकर झारखंड के जंगलों तक फैला हुआ था. एक ऐसा आम आदमी जिसकी कहानी मौत, हताशा और खुदकुशी के ईर्द-गिर्द घूमती रहती है और वहीं खत्म हो जाती है (याद कीजिए कि एवम इंद्रजीत, बाकी इतिहास और पगला घोड़ा नाटक खुदकुशी के आसपास ही घूमते हैं, वहीं मिछिल, भूमा और बासी खबर पर मौत के ईर्द-गिर्द घूमते हैं). आम लोगों को लेकर आपकी इतनी निराशावादी सोच क्यों थी बादल दा? आपको लोग हमेशा अंधेरे में ही क्यों दिखते थे. आमलोगों के बारे में यह एकतरफा सोच कोई बुर्जुआ ही रख सकता है. और यह बात भी सही है कि आपने आमलोगों पर बुर्जुआ समस्याओं और उसकी मानसिकता (साइकोलॉजी) को थोप दिया था.

जो लोग आपके नाटकों को क्रांतिकारी साबित करने पर तुले हुए हैं उन्हें क्या समझ में नहीं आता कि आपके नाटक असंगति (एब्सर्डिटी), घिनौनेपन (सॉरडिडनेस) और भ्रम (कन्फ्यूजन) की बेतरतीब जोड़-तोड़ पर टिके हुए हैं (जो आप भी कुछ हद तक स्वीकार करते थे). ऐसा भ्रम जिसमें सार्थक जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती. बिना सार्थक और सुंदर जीवन की कल्पना किए हुए कोई क्रांति के बारे में कैसे सोच सकता है? बेतरतीब जोड़-तोड़ भ्रम पैदा करती है, क्रांति नहीं लाती बादल दा.

हां, आपके नाटक जुलूस (मिछिल) में कुछ क्रांतिकारी-सा दिखा था, जब आम आदमी जुलूस से जुड़ता है. लेकिन उस जुलूस की विडंबना तो यह है कि आपका आम आदमी जुलूस में क्रांति के लिए नहीं जुड़ता, बल्कि उसकी खोज एक सच्चे आत्म तक सीमित कर दी जाती है. आपका जुलूस एक मरी हुई प्रतिमा जैसा है, जो न तो हमला करती है और न ही उसे किसी वर्ग शत्रु से कोई लेना देना है. आखिर आपका जुलूस किसके खिलाफ था? उससे भी बड़ी विडंबना है- जुलूस के लिए इंतजार करना. आपका आम आदमी जुलूस के लिए इंतजार करता है, सैमुअल बेकेट के वेटिंग फॉर गोदो की तरह. मिछिल ने मुझे यह भी आभास करा दिया था कि आप एक ही साथ में बोअल और बेकेट थे. जब मैंने देखा कि आपका चरित्र खोका, राज्य की एजेंसियों द्वारा बार-बार मारे जाने के बाद उठ कर लड़ने के बजाय जीने की आशा ही छोड़ देता है तो आम लोगों को लेकर आपकी अंधेरी और गहरी निराशा साफ दिखी. उसमें एक बूढ़े का प्रकट होना और खोका से कहना कि वह सच्चे आत्म की तलाश करे- यह क्रांतिकारी कम और किसी पुरोहित का उपदेश ज्यादा लगता है. वैसे भी आपके नाटक ईसाइयों के पाप प्रायश्चित करनेवाले नाटकीय कर्मकांडों से ज्यादा प्रभावित लगते हैं. अन्याय का भुक्तभोगी उत्पीड़ित कोई पापी नहीं होता, जिसके लिए उसे अपने ऊपर प्रायश्चित करना पड़े.

आपका आम आदमी हमेशा अपने आपको कोसता हुआ मर जाता है, या पागल हो जाता है. एक हद तक जबरन मान भी लूं कि कुछ चीजों के लिए आम आदमी जिम्मेवार है, लेकिन सब कुछ उसी पर डाल देना कहां तक उचित था? कब तक आम आदमी आपके बेहूदे सवाल ‘मैं कौन हूं’ और ‘मैं क्यों हूं’ की जद्दोजहद में जीता रहेगा? जबकि उसे पता है कि वह कौन है, उसका वर्ग क्या है और उसका (वर्ग) दुश्मन कौन है. शासक वर्ग कौन है. क्या मैं जान सकता हूं आपके आम आदमी का वर्ग क्या था बादल दा? क्या आपने भोमा पर अपने खुद के वर्ग की मानसिकता (साइकोलॉजी) और विचारधारा नहीं थोप दिया था? यह कौन-सी नीतिपरकता थी?

मुझे आपके नाटक की बुनावट बहुत अच्छी लगती थी. वह काफी निजी और अपने में दर्शक को रमा लेने वाली होती थी. लेकिन मुझे निराशा तब होती है जब आपकी सारी राजनीति इस रमा लेने के आकर्षण में ही खत्म हो जाती है. क्रांति खिलवाड़ में खत्म हो जाती है. आपके यहां आकर्षण एक विमर्श बन कर रह जाता है. मुझे आज भी लगता है कि आप चाहते तो इसे एक शानदार और क्रांतिकारी दिशा में मोड़ सकते थे. लेकिन आपको जटिलता की सनक थी. आपको किसी भी क्रांतिकारी समाधान से परहेज था. आपने अपने नाटकों को इस तरह बुना कि उनसे क्रांति की हर एक गुंजाइश खत्म हो जाए. यहां पर कुछ लोग कहेंगे कि समाधान देना रंगमंच का मकसद नहीं होना चाहिए, लेकिन लोगों को भारी भ्रम और हताशा में डालना, लोगों को निराश बना कर छोड़ देना और हर क्रांतिकारी समाधान की संभानवाओं को नाटकों में से खत्म कर देना कैसी क्रांतिकारिता और नीतिपरकता है? और फिर, क्या एक क्रांतिकारी समाधान नहीं देना भी अपने आप में समाधान देना नहीं है? दुख की बात तो यह है कि आपके द्वारा दिये गये समाधान लोगों को अपने विनाश और पीड़ा की एक अनंत और अंधेरी कोठरी में बंद कर देते हैं. बादल दा, मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आप अपने नाटकों में आम लोगों के लिए वही कुछ गिने-चुने ही समाधान छोड़ते थेः वह जहर खा ले, फांसी लगा ले, पागल हो जाए, या कम से कम क्रांतिकारी रास्ते से भटक ही जाए. और आदमी यह सब इसीलिए करे कि उससे आम आदमी की समस्याओं को मान्यता मिलेगी. बचपन में एक कहानी पढ़ा करता था कि कैसे अपने बारे में अखबार में छपवाने के लिए आदमी कार के नीचे आ गया था. आपके नाटक हर बार उस कहानी की याद दिला देते हैं. फांसी लगा लेना या खुदकुशी करने से राज्य आम लोगों की समस्याओं को मान्यता नहीं दे देता. और मान्यता मिल जाने से समस्या का हल नहीं हो जाता. ऐसा ही होता तो हमारे देश के किसानों की समस्याएं कब की हल हो गयी रहतीं. हो सकता है कि आप मध्यवर्ग से उन समस्याओं की मान्यता दिलवाना चाहते थे, यह जानते हुए भी कि आपका भद्रलोक मध्यवर्ग नाटक के चरित्र को मान्यता तो दे सकता है कि लेकिन वह ‘अभद्र’ आम आदमी के अस्तित्व को ही नहीं स्वीकारता. और वैसे भी आप कमोबेश 40 साल में किस वर्ग की किस समस्या को मान्यता दिलवा पाए? विषय को मान्यता दिलवाने का आपका यह तरीका हास्यास्पद ही नहीं, अनैतिहासिक भी था.

आपके नाटक के बारे में कहा जाता है कि आपके नाटक क्रांतिकारी थे, राज्य विरोधी और सत्ता विरोधी थे. जब राज्य और सत्ता विरोधी ही थे तो उनके खिलाफ आम लोगों के खड़े होने की आपने हिमायत क्यों नहीं की. कौन-सा क्रांतिकारी रंगमंच या सौंदर्यशास्त्र इसकी इजाजत नहीं देता? और फिर जो लोग सत्ता विरोधी थे, राज्य विरोधी थे, उनसे आपने अपने नाटकों में लगातार पश्चाताप क्यों करवाया है? नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान या उसके पहले के इतिहास में लोगों ने ऐसी कौन-सी गलती की थी, ऐसा कौन-सा पाप किया था, जिसका पश्चाताप उनको पूरे नाटक के दौरान करना पड़ता था. अपने आपको छोटी-छोटी गलतियों के लिए कोसते रहना पड़ता था. और अगर वह पश्चाताप आत्मालोचना थी तो उसका उत्तर लोगों का संघर्ष और क्रांति क्यों नहीं थी बादल दा?

अगर आपके नाटकों का दार्शनिक विश्लेषण किया जाए जो वह दो तरह के दर्शन का नेतृत्व करता है. पहला तो अस्तित्ववाद है, जिसका कुछ लोगों ने उल्लेख किया है. लेकिन आपका अस्तित्ववाद सार्त्र और सिमोन द बोउवार का अस्तित्ववाद नहीं बल्कि सैमुएल बेकेट और नीत्शे का अस्तित्ववाद है. आपके नाटकों का दूसरा दर्शन उत्तर आधुनिकता है, जो उसी अस्तित्ववाद का विस्तार है और रिचर्ड शेसनर (Richard Schechner) से प्रभावित है. बाद में इसकी अधिक पुष्टि तब हो गयी जब पता लगा कि आपका काम उसी उत्तर आधुनिक परफॉर्मेंस स्टडीज के विद्वान रिचर्ड शेसनर से प्रभावित था.

आपने एक इंटरव्यू में कहा था कि ‘बहुत लोगों को लगता है कि मेरा नाटक ब्रेख्त से प्रभावित है, लेकिन मेरा नाटक ब्रेख्त से प्रभावित नहीं है.’ बता नहीं लोगों को आपके नाटक के बारे में ऐसा भ्रम क्यों था. शायद ऐसा उन्हीं को लगता होगा जो आपको क्रांतिकारी मानते हैं. आपका काम ब्रेख्त से दूर दूर तक प्रभावित नहीं लगता. आपका मिछिल हमेशा वेटिंग फॉर गोदो की याद दिलाता रहा और भोमा रिचर्ड शेसनर के एब्सर्ड थिएटर की. आप भारत के बेकेट थे और भारतीय रंगमंच के सभी उत्तर आधुनिकतावादियों के पितामह थे. दूर-दूर तक आप ब्रेख्त नहीं थे.

बादल दा, आपकी कुछ-कुछ निजी प्रतिबद्धताएं बहुत अच्छी लगी थीं. आपने जिस तरह पद्म विभूषण लेने से इनकार कर दिया था, आप ऐसे समय कोलकाता में रंगमंच करते रहे जब इप्टा मुंबइया सिनेमा का भर्ती दफ्तर बन गया था और बहुत सारे प्रगतिशील कलाकार व्यावसायिक उद्योग की ओर रुख कर रहे थे. कलाकार कारपोरेट के पैसे के लिए हाथ फैलाये खड़े थे, तब आपने जमीन से जुड़ाव और सादगी का परिचय देते हुए भारतीय रंगमंच का सिर ऊंचा किया. आपका सरोकार तब और भी अच्छा लगा जब बहुत सारे भद्रलोकी कलाकार ऐतिहासिक रूप से बेशर्म, पथभ्रष्ट और फासीवादी वामपंथ के साथ खड़े थे और पूरी बेशर्मी से भारतीय राज्य द्वारा शुरू किए गए ऑपरेशन ग्रीन हंट का समर्थन कर रहे थे, तब आप क्रांतिकारी गदर के साथ जुलूस में खड़े थे. आपका ऐसे कई जुलूसों में शामिल होना ही साबित करता है कि लोग जुलूस का इंतजार नहीं करते, लोग जुलूसों का नेतृत्व करते हैं. आपके जीते जी इतिहास ने आपके नाटकों को बार-बार गलत साबित कर दिया था बादल दा. क्या अपनी वह ऐतिहासिक भूल आप समझ पा रहे थे बादल दा?
इस बार फरवरी में जब मैं लंदन लौटने की तैयारियां कर रहा था, तो दिल्ली में आपका एक नाटक अंत नहीं देखा. कुछ लोग कह रहे हैं कि आपका जाना एक युग का अंत है. मैं इसे क्या समझूं बादल दा, ‘अंत नहीं’ या ‘एक युग का अंत’? देखो, इस बाद कन्फ्यूज करने की कोशिश नहीं करना बादल दा. ऐसे भी मैं आपके कन्फ्यूजन से बाहर आ गया हूं.

क्या अब मैं आपके जवाब का इंतजार करूं?

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  1. 9 टिप्पणियां: Responses to “ चंद सवाल रह गए थे बादल दा ”

  2. By अनूप on May 16, 2011 at 12:18 AM

    क्या बात करते हैं भाई साहब. बादल सरकार तो आम जनता के रंगकर्मी थे. बड़े बड़े यही कहते हैं. आपने बादल सरकार की एक दूसरी ही छवि रख दी है. लगता है थोड़ा सोचना पड़ेगा.
    अनूप

  3. By Mrityunjay Prabhakar on May 16, 2011 at 12:20 AM

    yah alekh puri tarah purvagrah ka shikar hai. Badal Da jaise rangkarmi ke kam ko is tarah jhoothe sawal utha kar kharij nahi kiya ja sakta. Dusre unke kai natakon ke jo interpretation tumne rakhe hain wo vishwas se pare hain. unhe ek bar padh lene ki jahmat utha lete to behtar hota. yad karo 'Bhoma' natak ka wah samvad 'Machali ka khoon thanda, admi ka khoon bhi thanda', kaise darskon ki pasliyon ko kampa jata hai.

    hope you will try to see things in actual perspective not in a speculative way.

  4. By Sushant priyadarshi on May 16, 2011 at 12:24 AM

    Brahma is right Anup. after looking through proletariat and working class outlook, this is the very reality of Badal Sircar and such artists. They falls prey in tactics of ruling class.

    A good and radical analysis of the work of a great personality, without being rude. I like your humbleness though it is very political matter.

    Keep it up.

  5. By Reyaz-ul-haque on May 16, 2011 at 12:52 AM

    @ मृत्युंजय प्रभाकर

    बादल सरकार के पूरे योगदान को ब्रह्म ने वैसे भी खारिज नहीं किया है. अगर आपने ध्यान दिया होगा तो पायेंगे कि ब्रह्म प्रकाश उनके योगदानों की अहमियत का उल्लेख करते हैं, लेकिन साथ ही उनकी सीमाएं और राजनीतिक कमजोरियों को भी सामने लाते हैं.

    आपने जिस नाटक और संवाद को उद्धृत किया है, ठीक वही संवाद ब्रह्मा के नजरिए की पुष्टि करता है. सिर्फ सवाल और सिर्फ यथार्थ (वह कितना भी कटु और भयावह क्यों न हो) अपने आप में क्रांतिकारी नहीं हो जाते और न ही केवल हताशा, निराशा, भय और निर्मम क्रूरता(पसलियों को कंपा देने वाला) का वर्णन किसी रचना को क्रांतिकारी बनाता है. इसलिए जनता के लिए इसकी सार्थकता भी सीमित हो जाती है.

    जरूरत यथार्थ को सिर्फ बताने की नहीं है, उसे बदलने की है. बदलाव की यह जरूरत उन तबकों के लिए ही सबसे अधिक है, जिनके बारे में कहा जाता है कि बादल सरकार ने लिखा. और यह बदलाव भी वे ही लाएंगे. अपने समाज से सही मायनों में जुड़ा और प्रतिबद्ध लेखक-रंगकर्मी बदलाव की जरूरत को अपने-अपने तरीकों से पेश करते हुए वह अपने लोगों की इस बदलाव को लाने वाली क्षमता की पहचान भी करता है. यहां आकर भी बादल सरकार की सीमाएं साफ हो जाती हैं.


    वैसे थोड़ा अजीब लग रहा है कि आप पूर्वाग्रह मुक्त होने की मांग कर रहे हैं. अगर आपका मतलब दुनिया को देखने का अपने नजरिया और उसके लिए जरूरी विचारों से मुक्त होने से है तो इससे कोई भी कैसे मुक्त हो सकता है? वे भी नहीं जो इससे मुक्त होने का दावा करते हैं.

  6. By सहर् on May 16, 2011 at 11:13 AM

    mujhe ummid hai yah jawab likhne ke pahle tumne natak padhane aur usme is samvad ki kaise aur kya ahmiyat hai, yah samajhane ki jaroorat nahi samjhi hogi. yahhi bachkana roomanipan maovadiyon ki sabse badi samsya hai. main isse mukt hone ki batt kar raha hun. baki jo sawal guddu ne uthaye hain, uske kai jawab aaj ke interview men hain.

  7. By Reyaz-ul-haque on May 16, 2011 at 11:41 AM

    अगर आपका सारा जोर इसी पर है कि मैंने (या गुड्डू ने) अपनी बातें कहने से पहले बादल सरकार के नाटक नहीं पढ़े या देखे हैं तो मुझे लगता है कि यह एक कमजोर आधार है हमारी आलोचना को काटने का. क्योंकि आप यह नहीं जान सकते कि हमने उन्हें पढ़ा या देखा नहीं है. इसलिए इस पर कुछ कहने या सफाई देने की जरूरत नहीं है.

    दूसरी बात बादल सरकार के इंटरव्यू के बारे में. पहले तो यह कि गुड्डू के सवाल किसी गलतफहमी के कारण नहीं उठाये गये हैं कि उनके जवाब बादल सरकार के इंटरव्यू में मिल जाएंगे. वे सवाल ठीक-ठीक बादल सरकार के राजनीतिक नजरिए के बारे में हैं और वे समग्रता में सरकार की आलोचना करते हैं. दूसरी बात खुदकुशी के बारे में. सरकार का कहना है कि उनके तीन नाटकों में ही खुदकुशी एक थीम के रूप में मौजूद है. लेकिन ये तीनों ही नाटक बादल सरकार के मुख्य और सबसे चर्चित नाटक हैं. उनकी पहचान बनाने में इन नाटकों का अहम योगदान है. इसलिए संख्या में भले कम लगें, इन नाटकों की थीम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. और सिर्फ खुदकुशी ही नहीं, सरकार के सारे नाटकों की थीम को समग्रता में देखें तो गुड्डू की बातें सही लगती हैं.

    अंतिम बात. चिदंबरम की तरह लोगों की लेबलिंग का काम आपने कब से शुरू कर दिया है?

  8. By 1 on May 16, 2011 at 8:51 PM

    Sorry late se debate join kar pya.
    @dikkat wahi hai ki kuch bde bde log critical analysis me jana nahi chahte..hame Badal da ke har chhavi ko dekhne ki koshish karni chahie.
    @ Shushant thanks agar apko mera analysis acha lga.
    @ Mrityunjay..kya haal chal hai bhai saheb? chalo isi bahane samvad to ho.Yaar yeh kab tak padhne ki salah dete rahoge..khair har ek rachna to nahin pdha hun lekin unka major wokrs padhne ki koshish kia hun..maine kabhi bhi Badal da ke kaam ko sire se kharij nahin kia, unke lie aur unke kaam ko lekar mera pura samman hai..wo main likha bhi hun.mera sirf itna kahna hai ki Badal Sircar ka play revolutionary plan nahin hai..yeh puri tarah se postmodernism ke category me rkha ja sakta hai. aur agar koi play revolutionary hai to aap mujhe batao main avashya padhna chahunga..har play me means chaotic hai, end confusion hai. individualist hai, middle class ka psychological maneuvring hai jo aam admi par thop dia gya hai..islie na to yeh dialectic hai aur nahin didectic hai.Badal da ka Bhoma usi postmodernism ki height hai..tum jis dialogue ko quote kar rhe ho wah aam admi ka pessimism hai..han sahi baat hai wah dialogue ek baar zarur kampa deta hai..lekin usi campan par shant bhi kar deta hai.han jahan tak tumhare dusre criticism aur roomani ka sawal hai.-han ham romantic hai revolution ko lekar, samaj ko badalne ko lekar..yeh har tarah se pessimist hone se accha hai..dusri baat main badal da ek ek natak nahin pdha hun, mila-julakar 10-12 natkon par apna analyis kia hun..wah mujhe badal da ek trend bhi lagta hai.aap pdhe ho to batao kaun sa natak revoltionary hai aur kyon hai?ya tumhare lie unka har natak hi revolutionary hai to kyon hai? isse pahle bhi Safdar Hashmi ne unke natkon par yeh criticism rkha tha. ab yeh nahi bolna ki safdar to unke natak samjhne ke pahle hi shahid ho gye the.unka natak radical hai main manta hun, revolutionary nahin hai.kabhi kabhi charitable hi jyada lagta hai; Hatamal ka hi chorus song dekho:
    Whatever we need in this world, whatever,
    We’ll make it all if we work together.
    Why go on shopping rampages?
    Why do we slave for more wages?
    We’ll share what we have together.
    yeh to yehi lagta hai ki Delhi electricity board 12 ghante ke lie mombati jalane ko suggest kar rha hai..
    Jahan tak natakon me hatasha, nirasha, pachyatap, khudkhusi aur mrityu ka sawal hai usse natak bhra hua hai. shamshul ka interview bhi pdha tha, usme Badal da kahna hai ki khudkusi hone ke babjud bhi wah nirashavadi natak nahin hai, mera unse prashn yeh hai ki usme aashavadi jaisi kya cheej hai. aur agar nirashavi bhi nahin hai aur aashavadi bhi nahin hai to kya tumhe yeh postmodern confusion nahin lagta.
    is criticism dwara main Badal da ke natkon ko kharij nahin kar rha hun..han badbadai karke main unke natkon ka revolutionary sabit nahin karunga, wah sheer glorification bankar rah jaega.
    jahan unke natakon ko lekar mera criticism bhi hai to unke third theatre aur personal commitment ko lekar appriciation bhi.chalo comments likhe accha lga.. aur baten hogi..take care.
    @ Reyaz bhai, type karke post karne ke lie shukriya..sabse badi baat hai ki Badal da ke kamon ko lekar ek bahas to shuru hui.
    Regards,
    BP

  9. By beingred on May 17, 2011 at 2:02 AM

    शुक्रिया ब्रह्म. आपके लेख और टिप्पणी से बादल सरकार के रंगकर्म पर एक नये नजरिये से बात शुरू हुई है (मैं लगातार इंटरनेट पर चेक करता रहा हूं और मुझे उन पर कोई हाल में लिखा गया आलोचनात्मक लेख नहीं मिला है). ऐसे में आपकी आलोचना बहुत जरूरी थी.

    मृत्युंजय से आग्रह है कि वे बादल सरकार पर अपनी राय को अगर ठोस रूप में रखना चाहते हों तो किसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी करने के बजाय बादल सरकार के रचना और रंगकर्म पर कुछ लिखें/बताएं. आखिर इस तरह बहस कैसे हो सकती है, जब आप दूसरे व्यक्ति को लगातार इसके लिए टोके जा रहे हों कि तुम तो पढ़े ही नहीं हो.

  10. By Manish on May 18, 2011 at 1:48 PM

    This is very nicely written commentary on Badal Sircar, Guddu; and thought provoking as well. But I am slightly disappointed with the way engagement with politics emerges, both in your write-up as well as in responses it has generated. Few uncomfortable feelings which are yet to be thought through from my side, and I cannot claim to have engaged with all of Badal Sircar’s work therefore they are very generic too, nonetheless here they are:

    (1) As you point out that as a person BS believed more in agency than a helpless subject, then in my opinion one needs to engage, particularly those who claim to be practicing political theatre and are student of it, with BS by way of asking if that gap between his person and his writings is a deliberate creative endeavor/tool or a mere reflection of his sub-conscious (?) non-revolutionariness. I think it is more important to examine why one writes what he writes and to what purpose, than engaging with just what one writes with a lens of ‘what we think he should be writing’. Judging an author against what we want to read is to deny agency to the author (and thus his revolutionary potential) and to assume that we are the only ones who matter as audience in political context. By no means I’m suggesting that our subjectivity doesn’t matter. Nor am I trying to prove that BS’ work was revolutionary in its essence. I have my own doubts about the work that all of us do in the name of political theatre, so nobody is beyond scrutiny. My only point here is that a political cultural activist and a student of political art must engage with the creative process and not just with the product of it.

    (2) I get a feeling that you seem to assume that any engagement with bourgeois psyche is bad. I understand that within limited space engagement with this and such questions is not possible; hence I may have had a wrong impression. Yet I think it worthwhile to flag this out, because in my view this again amounts to denial of agency.

    I’ve few more points but may be some other time….

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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