हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

गद्दाफी, साम्राज्यवाद और लीबिया की जनता की मुक्ति का सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/10/2011 05:34:00 PM

हुस्नी मुबारक जहां शुरू से ही अमेरिका के पिछलग्गू थे वहीं गद्‌दाफी काफी समय तक अमेरिका के आंख की किरकिरी बने हुए थे। लंबे समय तक उस क्षेत्र में लीबिया अकेला ऐसा देश था जो अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज उठाता था। इराक की घटनाओं के बाद गद्‌दाफी के रुख में तब्दीली आयी लेकिन वह कभी भी गद्दाफी पर पूरा भरोसा नहीं कर सका। अभी लीबिया में असंतोष की स्थिति देखकर अमेरिका सहित अनेक पश्चिमी देश इस आस में हैं कि इस उथल-पुथल में ही शायद गद्‌दाफी का कोई विकल्प तैयार हो जाय। अमेरिका की रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र 'रिवोल्यूशन' ने प्रमुख बुद्धिजीवी रेमण्ड लोट्‌टा से बातचीत की जिसके विशेष अंश प्रस्तुत हैं. यह बातचीत लीबिया पर अमेरिकी हमले से पहले की गई थी.

हम आज ऐसे समय आपसे बातचीत कर रहे हैं जब मुअम्मर गद्दाफी द्वारा लीबिया के जनविद्रोह का बर्बरता से दमन किया जा रहा है। मिस्र में जनविद्रोह और जाहिर तौर पर सेना के बढ़ते दबाव के कारण मुबारक की सरकार को हटना पड़ा। इसलिए आज लोगों के दिमाग में सबसे बड़ा सवाल यह है कि लीबिया और मिस्र की घटनाओं में किस तरह की समानताएं और भिन्नताएं हैं।

बातचीत शुरू करने के लिए यह सही मुकाम है। लीबिया का विद्रोह लीबियाई समाज में व्याप्त जबर्दस्त असंतोष की अभिव्यक्ति है। लीबियाई समाज के व्यापक हिस्से ने ट्‌यूनीशिया और मिस्र से प्रेरणा लेते हुए एक उत्पीड़क शासक के खिलाफ विद्रोह किया है। यह विद्रोह साम्राज्यवादियों के प्रभुत्व वाले समूचे मध्य पूर्व के देशों में आई लहर का एक हिस्सा है।
 
लेकिन जब मिस्र के साथ लीबिया की आप तुलना करेंगे तो दो खास फर्क दिखायी देगा। पहली बात तो यह कि लीबिया में ऐसी स्थिति है जहां साम्राज्यवादी साजिशें एक न्यायोचित ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में लीबिया की घटनाएं जनविद्रोह के साथ घुलमिल गयी हैं। इसकी वजह से स्थितियां काफी जटिल हो गयी हैं। जहां तक मिस्र की बात है यहां जनता का विद्रोह पूरी तरह अमेरिका द्वारा समर्थित शासन के खिलाफ था। मिस्र की सेना में नेतृत्व और ढांचे के अंतर्गत अमेरिकी साम्राज्यवाद का एक विश्वसनीय आधार था। यहां की सेना को अमेरिका ने प्रशिक्षित किया था और इसने ही इसे हथियारों से पूरी तरह लैस भी किया था। इसलिए मिस्र में स्थिरता लाने का अमेरिका का प्रयास खुद उसके हित में था। मेरे कहने का मतलब यह है कि वह राज्य के उस ढांचे के भीतर ही स्थिरता लाने की कोशिश कर रहा था ताकि मध्य पूर्व में मिस्र को वह अभी भी अपने प्रभुत्व के अंतर्गत बनाए रख सके। इसके अलावा मिस्र में अमेरिका का बड़े पैमाने पर और प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक हित जुड़ा हुआ था।

मिस्र के विद्रोह से जो नतीजे निकलने चाहिए थे उस पर अब रोक लग गयी है। जनता के अंदर विरोध अभी भी है और लोग इस बहस में लगे हैं कि इस विद्रोह से क्या हासिल हुआ और क्या हासिल नहीं हुआ। अभी भी मिस्र पर अमेरिकी साम्राज्यवाद की पकड़ बनी हुई है और उसकी काफी पूंजी वहां स्थित है। लीबिया का मामला इससे भिन्न है। लीबिया का सैनिक तंत्र ऐसा नहीं है जिसका अमेरिका के साथ इतना घनिष्ठ संबंध हो। लीबियाई राज्य का ढांचा - और इससे मेरा तात्पर्य प्रमुख मंत्रालयों तथा सुरक्षा तंत्रों से है - टूट रहा है और विद्रोह के फलस्वरूप तथा साम्राज्यवादी दबाव के कारण इसमें दरारें पड़ रही हैं।
 
लीबिया में अमेरिका के उस तरह के व्यापक आर्थिक हित भी नहीं हैं जैसे मिस्र में थे। इसलिए अमेरिका तथा पश्चिमी यूरोप के साम्राज्यवादी देशों के लिए यहां जरूरत और अवसर दोनों पैदा हो गए हैं। ये ताकतें लीबिया में प्रतिपक्ष की ताकतों को यह सोचकर मजबूत बनाने में लगी हैं कि शायद इनमें से ही आगे चल कर कोई पूरी तरह नव औपनिवेशिक शासन का रूप ले ले... अगर ऐसा शासन हुआ तो वह पश्चिमी हितों के लिए ज्यादा उपयोगी होगा। इसीलिए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि विद्रोह के शुरुआती दिनों से ही यहां सक्रिय साम्राज्यवादी ताकतें प्रतिपक्ष की ताकतों को मदद पहुंचा रही हों। इसलिए जैसा कि मैंने कहा लीबिया में सही अर्थों में और एक न्यायपूर्ण जनविद्रोह तो है लेकिन यहां साम्राज्यवादी छल-कपट भी पूरी तरह जारी है। ये ऐसी बातें हैं जिन्हें हमें गहराई से समझना चाहिए और विश्लेषण करना चाहिए।
 
आपने दो प्रमुख अंतर का उल्लेख किया।

बिल्कुल, लीबिया के विद्रोह और मध्य पूर्व के अन्य देशों में हुए विद्रोह के बीच दूसरा जो बड़ा अंतर है उसका संबंध् खुद गद्दाफी से है। यह अंतर वैसा ही है जैसा हुस्नी मुबारक और मुअम्मर गद्दाफी के बीच है। मुझे पता है कि अमेरिका का विदेश विभाग इस बात को नहीं मानेगा जो सीएनएन के जरिए गद्दाफी की एक पागल तानाशाह की छवि बनाने में लगा है... लेकिन दरअसल 1969 में जब गद्दाफी सत्ता में आए तो उन्हें जबर्दस्त जनसमर्थन प्राप्त था। उन्हें यह समर्थन खास तौर पर बुद्धिजीवियों, पेशेवर समूहों और मध्यवर्ग से मिला था। अपने शासन के अनेक वर्षों तक उन्हें यह समर्थन हासिल रहा। लगातार तीन दशकों तक लीबिया में और लीबिया के बाहर लोगों ने गद्दाफी को ऐसे व्यक्ति के रूप में मान्यता दी जो वास्तविक राष्ट्रीय हितों के पक्ष में खड़ा हो, जो साम्राज्यवाद के विरोध में आवाज उठा रहा हो और जिसने फिलिस्तीन पर इजराइली कब्जे का विरोध किया हो।
 
और यही सच्चाई भी थी। कई वर्षों तक गद्दाफी साम्राज्यवाद के और खास तौर पर अमेरिकी साम्राज्यवाद के आंख की किरकिरी बने रहे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1986 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन ने लीबिया के दो सबसे बड़े शहरों पर बमबारी की थी, गद्दाफी की हत्या का प्रयास किया था और इस बमबारी में  गद्दाफी की एक बेटी की मृत्यु हुई थी। गद्दाफी मिस्र के हुस्नी मुबारक की तरह साम्राज्यवादियों की जी-हुजूरी नहीं कर रहे थे हालांकि उन्होंने मूलभूत तौर पर न तो कभी साम्राज्यवाद से संबंध तोड़ा और न उसे चुनौती दी।
 
उनकी इन खूबियों की वजह से हमें लीबिया और गद्दाफी के इतिहास में जाने की जरूरत महसूस होती है। क्या आप इनकी पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताएंगे।

वस्तुतः दूसरे विश्व युद्ध के बाद तक लीबिया का अस्तित्व किसी एकात्मक राज्य की तरह नहीं था। इसे 1951 में औपचारिक तौर पर आजादी मिली। सन्‌ 1500 वाले दशक के उत्तरार्ध में तुर्की के ऑटोमान साम्राज्य का वह हिस्सा था जिसे आज हम लीबिया कहते हैं। 1910 में इतालवी साम्राज्य ने लीबिया को अपना उपनिवेश बनाया। लीबिया उत्तरी अफ्रीका में भूमध्यसागर के तट पर स्थित है और यह सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इटली ने जिस समय साम्राज्यवादी रुख अखितयार किया, उस समय तक अन्य औपनिवेशिक ताकतें इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुकी थीं। ब्रिटेन ने मिस्र पर शासन शुरू कर दिया था। फ्रांस ने अल्जीरिया को अपना उपनिवेश बना लिया था।
 
1911 से 1943 तक लीबिया पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए इटली ने अनेक बर्बर तरीकों का इस्तेमाल किया। इतिहासकार अब्दुल लतीफ अहमिदा ने 20वीं शताब्दी के अत्यंत बर्बर औपनिवेशीकरण के रूप में इसका उल्लेख किया है।
 
दूसरे विश्वयुद्ध में इटली को पराजय मिली। युद्ध के बाद अमेरिका और ब्रिटेन ने लीबिया में सम्राट इद्रीश के संवैधनिक राजतंत्र को मदद पहुंचानी शुरू की क्योंकि उनका रुझान पश्चिमी देशों की ओर था। सम्राट इद्रीश ने अमेरिकी वायुसेना को 'व्हीलस एयरबेस' बनाने की इजाजत दी। किसी अन्य देश में अमेरिका का यह सबसे बड़ा सैनिक अड्‌डा था और इसका इस्तेमाल वह सैनिक प्रशिक्षण, मिसाइल प्रशिक्षण और अपने युद्धक विमानों को तरह-तरह के प्रशिक्षण देने के लिए इस्तेमाल करता था।
 
लेकिन लीबिया तो एक प्रमुख तेल उत्पादक देश भी था?

दरअसल लीबिया में 1959 में विशाल तेल भंडारों का पता चला। इसके बाद अमेरिका और यूरोप की कंपनियों ने बड़े पैमाने पर वहां प्रवेश किया। बैंकिंग के क्षेत्र में भी तेजी से विकास हुआ- खास तौर पर भूमध्यसागर में तेल की पाइपलाइन बिछाने के बाद इस काम में काफी तेजी आयी। 1960 के दशक में तेल से मिलने वाले राजस्व में जबर्दस्त वृद्ध हुई लेकिन इस आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशी तेल कंपनियों की झोली में चला जाता था। जो बचा रहता था वह लीबिया के अभिजात वर्गों के हाथ में पहुंचता था जो उसे व्यापार, बैंकिंग तथा सट्‌टेबाजी में लगाते थे। आम आदमी की गरीबी में कोई कमी नहीं आयी। तेल कंपनियों के साथ अपने संबंध के कारण जो नया मध्यवर्ग विकसित हो रहा था उसके अवसर भी बहुत सीमित थे। इसलिए सम्राट इद्रीश के शासन के खिलाफ जनता में असंतोष बढ़ता जा रहा था।

यह ऐसा दौर था जब क्षेत्रीय और विश्व घटनाओं का असर भी दिखायी देने लगा था। 1967 में इजराइल ने अमेरिका के समर्थन से मिस्र और सीरिया पर हमला किया। लीबिया में छात्रों, बुद्धिजीवियों और मजदूरों ने इन हमलों के खिलाफ हड़तालें की। वियतनाम में अमेरिका द्वारा छेड़े गये युद्ध के खिलाफ भी विरोध तेज होता जा रहा था। पश्चिमी देशों के सामने लीबिया सरकार द्वारा पूरी तरह घुटने टेकने के खिलाफ भी जनता के अंदर असंतोष बढ़ रहा था।
1960 के दशक में ही एशिया, लातिन अमेरिका और अफ्रका में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों की लहर आ गयी थी जो साम्राज्यवाद और उसकी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को दहला रही थी। इन घटनाओं ने समूची दुनिया में लाखों लोगों को प्रतिरोध की प्रेरणा दी। यही वह दौर था जब लीबिया में भी एक नयी राष्ट्रवादी भावना असर कर रही थी और साम्राज्यवाद के खिलाफ अरब एकता का विचार मजबूती से अपनी जगह बना रहा था। यही वह समय था जब क्रांतिकारी चीन सामाजिक शक्तियों को प्रभावित कर रहा था और वैचारिक विमर्श में मार्क्सवाद-लेनिनवाद को महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ था। अमेरिका के इस तरह घिर जाने से उन विभिन्न वर्ग शक्तियों को भी एक नया अवसर मिला जिन्हें अब तक साम्राज्यवाद ने दबा कर रखा था। उन्हें नयी संभावनाएं दिखायी दी।
 
तो यहां से गद्दाफी का प्रादुर्भाव हुआ?

बिल्कुल। गद्दाफी उन युवा सैनिक अफसरों की जमात में थे जो मिस्र के नेता गमाल अब्दुल नासिर के पैन-अरबवाद और सामाजिक सुधारवादी विचारों से काफी प्रभावित थे। गद्दाफी मरुस्थल में बसने वाले गरीब आदिवासी कबीले के थे और इनके साथियों में बहुत सारे ऐसे अफसर थे जो निम्नवर्गीय पृष्ठभूमि के थे। लीबिया के समाज में सेना उन गिनी-चुनी संस्थाओं में से थी जहां इन जैसे लोगों को प्रशिक्षण और कुछ करने का अवसर मिल पाता था। सेना के इन युवा अफसरों के अंदर भ्रष्टाचार और सत्ता की घुटनाटेकू नीति को लेकर काफी असंतोष था। वे खुद को नए लीबिया के हिरावल समझते थे। 1969 में उन्होंने सम्राट इद्रीश के खिलाफ सैनिक विद्रोह किया और एक रिवोल्यूशनरी कमांड कौंसिल बना कर इसके तहत नयी सरकार का गठन किया।
 
गद्दाफी की दलील थी कि लीबिया की राष्ट्रीय संप्रभुता को बेच दिया गया है और विदेशी पूंजी को इस बात की इजाजत दे दी गयी है कि वह लीबिया की जनता पर हुकूमत करे। उन्होंने पुरानी सत्ता पर आरोप लगाया कि इसने तेल से होने वाली आय का महज अपने हित में इस्तेमाल किया है और जनता को बदहाली से निजात दिलाने पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया है। गद्दाफी ने 'व्हीलस एयरबेस' को बंद करने के लिए अमेरिका पर दबाव डाला और कहा कि इसके लिए एक समय सीमा निर्धरित करे। उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। तेल उद्योग में उन्होंने राज्य की प्रमुख हिस्सेदारी तय की। गद्दाफी ने कृषि और उद्योग के विकास का वायदा किया और इन क्षेत्रों के लिए प्रत्यक्ष तौर पर राशि निर्धरित की। 1970 के दशक में उन्होंने जिन सामाजिक कार्यक्रमों को अपनाया उससे अगले 20 वर्षों तक जन साक्षरता, आवास तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में सही अर्थों में काफी विकास हुआ। उनकी इन नीतियों और कार्यक्रमों को जनता का जबर्दस्त समर्थन मिला।
 
लेकिन गद्दाफी के इन सभी साम्राज्यवाद विरोधी नारों के बावजूद उनकी सारी परियोजनाएं लीबिया की तेल आधारित अर्थव्यवस्था को बनाए रखने और इसके विस्तार पर ही टिकी थी। ये परियोजनाएं विश्व पूंजीवादी व्यवस्था में लीबिया के लगातार शामिल रहने और श्रम के विभाजन तथा शोषण के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को बरकरार रखने पर ही टिकी थीं। गद्दाफी अपने तेल के बाजार के लिए पश्चिमी यूरोप पर बुरी तरह निर्भर थे। उन्होंने तेल से मिले पैसों से फ्रांस से जेट विमान खरीदे, निर्माण के क्षेत्र में जर्मनी की पूंजी को आमंत्रित किया और यहां तक कि इटली की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी में पूंजी निवेश करने वाले प्रमुख राष्ट्र का दर्जा हासिल किया। इसके साथ ही इटली को, जिसने लीबिया को काफी समय तक अपना उपनिवेश बना रखा था, इस बात की इजाजत दी गयी कि वह लीबिया में अपना कारोबार जारी रखे।
 
आपने गद्दाफी के कार्यक्रम के आर्थिक आधार पर रोशनी डाली लेकिन उनके कार्यों के अन्य क्षेत्रों के बारे में आपको क्या कहना है?

गद्दाफी ने तेल से होने वाली आय का इस्तेमाल समाज की पुनर्संरचना में किया। वह एक खास राजनीतिक विशिष्टता वाली सामाजिक कल्याण प्रणाली तैयार कर रहे थे। उन्होंने स्थानीय स्तर पर 'जन समितियों' का गठन किया जिसका मकसद अपने राजनीतिक समर्थन को विस्तार देना और केन्द्रीय सत्ता के प्रति आदिवासी समूहों और कबीलों की निष्ठा हासिल करना था। इसके साथ ही उन्होंने मजदूर यूनियनों और स्वतंत्र राजनीतिक संगठनों को गैर कानूनी घोषित कर दिया तथा प्रेस द्वारा सरकार की आलोचना पर लगभग प्रतिबंध लगा दिया। उन्होंने तेल से होने वाली आय का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर सुरक्षा और सैनिक तंत्र को विकसित करने के लिए किया। इसका मकसद सरकार के विरुद्ध आंतरिक विपक्ष का दमन करना था और लीबिया को समूचे मध्य पूर्व तथा अफ्रीका में एक राजनीतिक मॉडल और क्षेत्रीय शक्ति के तौर पर स्थापित करना था।
 
वैचारिक तौर पर देखें तो गद्दाफी के शासन ने सामाजिक कल्याणकारी कार्यक्रमों और पैन-अरबवाद को प्रतिगामी मूल्यों के साथ जोड़कर आगे बढ़ाया। इस्लाम को सरकारी तौर पर राज्य का धर्म घोषित किया गया। महिलाओं को पहले के मुकाबले बेशक ज्यादा अवसर मिले लेकिन पितृसत्तात्मक शरीयत कानून को वैधानिक-सामाजिक संहिता का आधार बनाया गया। गद्दाफी जबर्दस्त रूप से कम्युनिस्ट विरोधी थे और उनका दावा था कि पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच उन्होंने तीसरा रास्ता ढूंढ निकाला है। सच्चाई यह थी कि वह राज्य पूंजीवाद की स्थापना में लगे थे जो तेल से होने वाली आय पर आधरित था और जिसने बाजार, टेक्नॉलाजी, परिवहन और निवेश की जाने वाली पूंजी के लिए विश्व साम्राज्यवाद को गले लगा लिया था।

क्या इसका अर्थ यह माना जाए कि उनकी परियोजनाओं में कुछ भी क्रांतिकारी नहीं था?

गद्दाफी एक परिवर्तन जरूर ला रहे थे लेकिन यह परिवर्तन साम्राज्यवादी प्रभुत्व, पूंजीवादी संपत्ति संबंध और  कबीलाई निष्ठा एवं क्षेत्रीय भेदभाव के जटिल चक्र के ढांचे के अंतर्गत ही हो रहा था। कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे सही अर्थों में साम्राज्यवाद से नाता तोड़ते हुए रूपांतरण की दिशा कहा जाए। कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे महसूस हो कि जनता को कुछ अलग किस्म की राजनीतिक राजसत्ता अथवा नेतृत्व प्राप्त होने जा रहा है जो उन्हें इस योग्य बनाए कि वे सही अर्थों में मुक्ति की दिशा में अपनी अर्थव्यवस्था और अपने समाज का पुनर्गठन कर सकें। बॉब एवेकियन ने दुनिया में 'तीन विकल्पों' के बारे में एक सूत्रीकरण किया था उसे मैं अपने शब्दों में कहूं तो पहले विकल्प के रूप में उनका कहना था कि दुनिया जैसे चल रही है वैसे ही चलने दो। इसे मैं पूरी तरह खारिज करता हूं- यह बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है। दूसरा विकल्प उन्होंने यह कहा कि आप संपत्ति के वितरण और शासन के तरीके में कुछ परिवर्तन कर सकते हैं लेकिन शोषणकारी उत्पादन प्रणाली तथा समाज के दमनकारी सामाजिक संबंधों को ज्यों का त्यों रहने दें। यह उनका दूसरा विकल्प था। तीसरे विकल्प के बारे में उनका कहना था कि आप सही अर्थों में क्रांति कर सकते हैं। ऐसी क्रांति जिसका मतलब शोषण के सभी संबंधों का रूपांतरण, दमनकारी संस्थाओं की समाप्ति, गुलाम बनाने वाले विचारों और मूल्यों तथा उत्पीड़नकारी सामाजिक व्यवस्था का अंत। एक ऐसी क्रांति जो मानव समाज के वर्गों में विभाजन पर काबू पा सके। यह तीसरा विकल्प ही साम्यवाद की दिशा में विश्व सर्वहारा क्रांति का विकल्प है।
गद्दाफी ने सामाजिक और आर्थिक मॉडल के रूप में जो कार्यक्रम अपनाया वह दूसरे विकल्प के दायरे में आता है। जिसके अंतर्गत यथास्थिति के कुछ पहलुओं को बदल दिया जाए लेकिन दमनकारी समाज व्यवस्था को ज्यों का त्यों रहने दिया जाए।
 
गद्दाफी के बारे में आम तौर पर जो लिखा या कहा जाता है उसमें उनकी छवि एक निर्दय 'स्ट्रांग मैन' की पेश की जाती है। क्या आपको भी ऐसा लगता है?

देखिए, 'स्ट्रांगमैन' या 'स्ट्रॉ मैन' जैसी शब्दावली या इस तरह की धरणाएं एक भ्रम फैलाती हैं। यह वर्गीय सार तत्व को धुंधला करती हैं। मार्क्सवाद इस मामले में हमारी समझ विकसित करता है। मानव इतिहास की जिस अवस्था में हम हैं उसमें सभी समाज वर्गों में विभाजित हैं। जो नेतागण हैं वे किसी शून्य में विचरण नहीं करते हैं। वे विभिन्न वर्गों के दृष्टिकोण, तरीकों और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति करते हैं। गद्दाफी और अन्य सैनिक अधिकारियों ने जिन्होंने 1969 में सत्ता पर कब्जा किया वे साम्राज्यवाद द्वारा उत्पीड़ित एक राष्ट्र के निम्न पूंजीपति वर्ग तथा राष्ट्रीय बुर्जुआ के रेडिकल हिस्से के नजरिए का प्रतिनिध्त्वि कर रहे थे। साम्राज्यवादी गुलामी में उनका दम घुट रहा था। अपने वर्गीय नजरिए से उनको यह महसूस हो रहा था कि उनके देश लीबिया के साथ बहुत बुरा बर्ताव किया जा रहा है। वे चाहते थे कि बाजार के इस तंत्र को, जो शोषण और मुनाफा कमाने के सिद्धांत पर आधारित है, किसी तरह ऐसा बनाया जाए ताकि समूचे देश को इसका लाभ मिल सके। वे इस भ्रम में भी थे कि साम्राज्यवाद से कुछ रियायत झपट लेने में उन्हें कामयाबी मिलेगी और वे साम्राज्यवाद को अपनी शर्तों के अनुरूप ला देंगे। लेकिन सच्चाई तो यह है कि विश्व पूंजीवाद एक निश्चित तर्क के अनुसार चलता है और इन समाजों तथा अर्थव्यवस्थाओं पर अपने ही तर्क थोपता है।
 
लीबिया की इन बुर्जुआ राष्ट्रवादी ताकतों ने समूचे राष्ट्र की ओर से बोलने का दावा किया। उन्होंने अपने हितों को देश के सभी वर्गों के हितों के अनुरूप समझ लिया। लेकिन इन देशों में एक वर्ग है जो शासन करता है और एक वर्ग है जो शासित होता है। आपको याद होगा कि गद्दाफी ने एक नारा दिया था जो शायद उनकी तथाकथित 'ग्रीन बुक' में शामिल है और वह नारा था 'मजदूर नहीं बल्कि पार्टनर'। दूसरे शब्दों में कहें तो आपके पास एक तरफ तो वह प्रणाली है जो मुनाफे पर आधारित है और जो पूंजीवादी विश्व बाजार के साथ घुल-मिल कर रहना चाहती है और दूसरी तरफ आप सबको समान रूप से पार्टनर बनाने की बात कह रहे हैं। यह कोरा भ्रम था और जनता को महज लुभाने वाला नारा था। मजदूरी करने वाले अथवा सर्वहारा वर्ग के लोग उत्पादन के साधनों के स्वामी नहीं हो सकते। जिंदा रहने के लिए उन्हें उन लोगों को अपना श्रम बेचना ही होता है जिनका उत्पादन संबंधों पर नियंत्रण है अर्थात जो पूंजीपति हैं। पूंजीपति वर्ग उत्पादन प्रक्रिया में मजदूरों का शोषण मुनाफा कमाने के लिए करता है और उसकी कोशिश यही होती है कि इस मुनाफे में लगातार इजाफा होता जाए। जब पर्याप्त मुनाफा नहीं होता है तो मजदूरों की छंटनी कर दी जाती है। इसलिए मजदूरी करने वाले की बुनियादी स्थिति पूंजी के प्रभुत्व के अधीन रहने की ही होती है। यही वजह है कि कामगरों और पूंजीपतियों के बीच एक बुनियादी अंतर्विरोध होता है जो प्रकृति से शत्रुतापूर्ण रहता है।
 
लीबिया में मजदूर अर्थव्यवस्था की बुनियाद हैं। आज के लीबिया में 20 प्रतिशत बेरोजगारी है। इसलिए सच्चाई यही है कि मजदूरी करने वाले पूंजी के कभी 'पार्टनर' नहीं बन सकते। राजनीतिक और वैचारिक तौर पर उभरती हुई ये बुर्जुआ ताकतें बुनियादी जनता से डरती थीं... उन्हें इस बात का हमेशा भय रहता था कि साम्राज्यवादी कार्यक्रम के साथ तालमेल बनाकर चलने की इनकी नीति और इनके सुधरवाद से आगे बढ़कर जनता कोई कदम उठा सकती है। इसलिए उन्होंने इन शक्तियों को नियंत्रिात करने का प्रयास किया।
मेरा कहने का मतलब यह है कि गद्दाफी की इन तमाम ऊल-जलूल हरकतों के बावजूद अगर आप गद्दाफी के कार्यक्रम को समझना चाहते हैं तो आपको उन वर्ग हितों और दृष्टिकोण का विश्लेषण करना होगा, जिसका गद्दाफी प्रतिनिधित्व करते थे और यह देखना होगा कि विश्व परिस्थिति के साथ उन हितों की किस तरह की अंतःक्रियाहोती थी। मेरा मतलब यह है कि भले ही आप बराक ओबामा को बहुत 'शांत' और 'सुसंस्कृत' कह दें लेकिन उसे एक साम्राज्यवादी सत्ताधारी वर्ग के विश्व दृष्टिकोण और साम्राज्य के शोषक तथा जानलेवा हितों पर खुद को केन्द्रित करना ही होगा।
 
फिर भी गद्दाफी का शासन लम्बे समय तक बना रहा और उनकी छवि एक रेडिकल नेता की थी। ऐसा क्यों?

1970 के दशक के प्रारंभ में जब गद्दाफी ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत की तो उन दिनों विश्व राजनीति और विश्व अर्थव्यवस्था में कुछ खास किस्म की बातें हो रही थीं। अमेरिका को वियतनाम में पराजय का सामना करना पड़ रहा था और दुनिया के स्तर पर उसकी आर्थिक सत्ता कमजोर हो रही थी। इस स्थिति ने गद्दाफी के लिए एक गुंजाइश पैदा की।
 
दूसरी बात यह कि विश्व स्तर पर सोवियत संघ द्वारा अमेरिका को चुनौती मिल रही थी। सोवियत संघ खुद को समाजवादी होने का दावा कर रहा था लेकिन 1950 के दशक के मध्य में वहां एक नए पूंजीपति वर्ग ने समाजवाद को ध्वस्त कर दिया था। सोवियत संघ अब एक सामाजिक-साम्राज्यवादी शक्ति बन गया था। 1970 के दशक के मध्य तक दुनिया के विभिन्न हिस्सों में वह अपना प्रभाव और नियंत्रण कायम करने की होड़ में लगा था। विश्व रणनीति के एक हिस्से के रूप में उसे तीसरी दुनिया के प्रमुख देशों में अपनी समर्थक सत्ताएं बनानी थीं। इस क्रम में सोवियत संघ ने गद्दाफी जैसे शासकों वाले देशों को पटाने के लिए आर्थिक सहायता, कूटनीतिक समर्थन और तेल समझौतों का सहारा लिया। सोवियत संघ लीबिया को हथियारों की सप्लाई करने वाला प्रमुख देश बन गया।
 
इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण बात यह थी कि 1960 के दशक के उत्तरार्ध और 1970 के दशक के पूर्वार्ध में विश्व स्तर पर तेल उद्योग परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। प्रमुख तेल कंपनियां तीसरी दुनिया के तेल उत्पादकों के साथ नयी तरह की व्यवस्था बनाने में लगी थीं। उत्पादन पर औपचारिक नियंत्रण को तीसरी दुनिया के देशों की सरकारों और इन सरकारों द्वारा नियंत्रित तेल कंपनियों के हाथों में जाने की इजाजत दे दी गयी। तेल शोधन, मार्केटिंग, टेक्नालॉजी और वित्तीय व्यवस्था के जरिए साम्राज्यवादी प्रभुत्व को मजबूत किया गया। लेकिन अब उत्पादक देशों की उत्पादन स्तर पर पकड़ मजबूत हो गयी थी और ओपेक जैसा संगठन बन गया था। 1970 के दशक में ही तेल की कीमतों में वृद्धि भी हो रही थी। इन सारी घटनाओं से गद्दाफी को लाभ मिला।
 
लेकिन इन सबके बावजूद गद्दाफी जैसी बुर्जुआ राष्ट्रवादी ताकतें न तो साम्राज्यवाद के साथ अपने संबंध तोड़ने की इच्छुक थीं और न ऐसा करने के लिए जनता को नेतृत्व देने और सामाजिक क्रांति संपन्न करने की उनके अंदर क्षमता ही थी। जैसा कि मैंने पहले कहा ये ताकतें साम्राज्यवाद के अधीन फल-पफूल रही थीं लेकिन जनता से भयभीत भी थीं। यहां भी इन शासकों की वर्गीय प्रकृति ही इसके लिए जिम्मेदार थी। साम्राज्यवाद के साथ संबंधों के कारण इन्हें जकड़न का भी एहसास होता था लेकिन शोषणकारी संबंधों पर नियंत्रण से परे की दुनिया उन्हें दिखायी ही नहीं देती थी। इसलिए आपको एक ऐसे गद्दाफी का सामना करना पड़ता है जो साम्राज्यवाद के साथ तालमेल बनाते हुए सत्ता पर अपनी पकड़ और मजबूत करने में लगा था। वह उस तेल आधरित अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण करना चाहता था जो विश्व पूंजीवादी उत्पादन के तौर-तरीकों के अधीन काम कर रही थी। लीबिया को निर्यात से जो भी आय होती थी उसका 95 प्रतिशत से भी अध्कि हिस्सा तेल से प्राप्त होता था। और 1973 से 1983 के दशक में लीबिया तीसरी दुनिया के उन तीन प्रमुख देशों में से एक हो गया जो सबसे ज्यादा हथियारों का आयात कर रहे थे। यह एक तरह का विकृत और दूसरे पर निर्भर विकास था।
 
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गद्दाफी ने दकियानूस अरब शासकों की आलोचना की और खुद को फिलीस्तीनी जनता के अधिकारों के चैंपियन के रूप में पेश किया। उसने अफ्रीका की मुक्ति के समर्थन में आवाज उठायी। इन बातों से उसे काफी लोकप्रियता मिली।
 
1980 के दशक में अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा गद्दाफी को 'पागल कुत्ता' कहा गया और उसकी छवि एक बर्बर शासक की पेश की गयी। इसकी वजह क्या थी?

यह सही है लेकिन इसका ताल्लुक न तो गद्दाफी की दमनकारी सत्ता से है और न गद्दाफी के शासन करने के तरीके से। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उन्हीं दिनों अमेरिका बगल के मध्य अमेरिका में अनेक तानाशाहों को मजबूत बनाने में लगा था और इन तानाशाहों द्वारा किए जा रहे मानव अधिकारों के उल्लंघनों को देखते हुए गद्दाफी की छवि एक भले शासक की बन रही थी। दरअसल अमेरिका के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि गद्दाफी के संबंध लगातार सोवियत संघ के साथ मजबूत होते जा रहे थे। वह ऐसे समय क्रांतिकारी आंदोलनों और समूहों को समर्थन दे रहे थे जब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता एक सैनिक टकराव की दिशा में बढ़ रही थी। यही वजह है कि 1980 के दशक में अमेरिका ने गद्दाफी के खिलाफ एक मुहिम छेड़ दी। तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने लीबिया पर हवाई हमले किए और आर्थिक प्रतिबंधों तथा कूटनीतिक दबावों के जरिए लीबिया को दंडित करना चाहा। तेल कंपनियों ने अपना कामकाज बंद कर दिया। यहां यह ध्यान देने की जरूरत है कि लीबिया पश्चिमी यूरोप को ऊर्जा की सप्लाई करने वाला एक प्रमुख देश था। अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के साम्राज्यवादियों के बीच यह एक तनाव का कारण था। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि लीबिया पर अमेरिका द्वारा उन दिनों किए गए सैनिक आक्रमण का उद्देश्य पश्चिम यूरोप के साम्राज्यवादी देशों को भी रास्ते पर लाना था। अमेरिका के दबाव में ही संयुक्त राष्ट्र ने भी लीबिया के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा की। इन सारे कदमों से लीबिया को अलगाव में डाल दिया गया और इसका असर लीबिया की अर्थव्यवस्था पर दिखायी देने लगा। इसके साथ ही तेल की कीमतों में भी विश्वस्तर पर आयी गिरावटों का इसकी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा। अब जरूरत इस बात की थी कि लीबिया के तेल उद्योग में कुछ नए किस्म का पूंजीनिवेश हो।
 
इसी बीच 1989-91 में सोवियत संघ और इसका पूरा खेमा ध्वस्त हो गया। इस परिघटना ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में गुणात्मक परिवर्तन ला दिया। इससे गद्दाफी की अनेक परियोजनाओं की हवा निकल गयी। अब उसके पास इतना बड़ा समर्थन नहीं रह गया था। अमेरिका ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए मध्य पूर्व के देशों तथा तीसरी दुनिया के अन्य देशों की ओर रुख किया। इस बदली हुई परिस्थिति में गद्दाफी पश्चिमी यूरोप के साम्राज्यवादियों के साथ और भी ज्यादा घनिष्ठ संबंध बनाने में लग गए। 1990 के दशक के समाप्त होने तक ग्रेट ब्रिटेन के साथ लीबिया का संबंध सामान्य हो चुका था। इटली को भी लीबिया के तेल और प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्रवेश करने की इजाजत मिल गयी।
 
क्या 2003 में इराक पर हुए अमेरिकी हमले का भी लीबिया की राजनीति पर प्रभाव पड़ा?

निश्चय ही। इसने गद्दाफी पर एक दबाव बनाया और उन्हें ये सोचने पर मजबूर किया कि क्या इराक के बाद अब अगला निशाना लीबिया होगा। गद्दाफी को कट्‌टर इस्लामिक ताकतों की चुनौती का भी खतरा दिखायी दे रहा था। इसलिए उन्होंने अब अमेरिका की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना शुरू किया। 9/11 के बाद गद्दाफी ने अलकायदा जैसे संगठनों के बारे में अमेरिका के साथ अपनी खुफिया सूचनाएं बांटनी शुरू कीं। 2004 में उन्होंने ऐलान किया कि वह अपने विभिन्न परमाणु हथियार कार्यक्रमों को खत्म कर रहे हैं। अमेरिका ने भी आतंकवादी संगठनों की सूची में से लीबिया का नाम हटा दिया। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में गद्दाफी अमेरिका के महत्वपूर्ण सहयोगी बन गए। राष्ट्रपति बुश ने अमेरिकी तेल कंपनियों को हरी झंडी दे दी कि वे लीबिया के साथ नए अनुबंध कर सकते हैं। गद्दाफी ने उद्योग के कुछ क्षेत्रों का निजीकरण कर दिया। पिछले वर्ष गद्दाफी ने इटली के साथ एक समझौता किया जिसमें कहा गया था कि उन अफ्रीकी आब्रजकों के लिए रास्ता बंद कर दिया जाए जो बिना किसी दस्तावेज के लीबिया से होकर यूरोप में प्रवेश कर रहे हों। इस सिलसिले में गद्दाफी ने एक चेतावनी जारी की जो पूरी तरह नस्लवादी थी और जिसमें कहा गया था कि अगर यूरोप में अीकी आब्रजकों को वापस भेजने के कड़े उपाय नहीं किए तो एक दिन वह पूरी तरह 'काला' हो जाएगा। यह गद्दाफी का एक नया रूप था। उनके बेटे ने हिलेरी क्लिंटन से भेंट की। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स को उन्होंने दान के रूप में बहुत बड़ी राशि दी। ब्रिटेन लीबिया को हथियार बेचने लगा। साम्राज्यवादियों को लगा कि गद्दाफी के रूप में उन्हें एक काम का आदमी मिल गया है। इतना ही नहीं फरवरी, 2011 के प्रारंभ में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने लीबिया की अर्थव्यवस्था पर एक रिपोर्ट जारी की जिसमें गद्दाफी की सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी। इसमें गद्दाफी के 'महत्वाकांक्षी सुधर एजेंडा' और 'जबर्दस्त मैक्रो इकोनॉमिक कार्यकुशलता' के लिए शाबासी दी गयी थी...
 
...लेकिन अब हैरानी की बात है कि जब उन्हें लगा कि जनता के असंतोष का फायदा उठाकर किसी और भी 'काम के आदमी' को सत्ता में आसीन किया जा सकता है तो साम्राज्यवादियों ने एक बार फिर 'पागल गद्दाफी' और 'तानाशाह गद्दाफी' की रट शुरू कर दी है।
 
लीबिया में फिलहाल क्या हो रहा है और वे कौन से बड़े मुद्दे और चुनौतियां हैं जो आज सामने आ रही हैं?

मैंने अब तक गद्दाफी की वर्ग-प्रकृति और गद्दाफी शासन द्वारा अपनाए गए विकास के मॉडल की सामाजिक आर्थिक प्रकृति की चर्चा की। यह चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि तभी हम यह समझ पाएंगे कि आखिर वह कौन-सी वजह है जिसने इतने बड़े पैमाने पर लोगों को गद्दाफी और उनके विकास के खिलाफ आंदोलित किया। पिछले समूचे दशक में तेल से होने वाली संपदा और राष्ट्रीयकृत संपत्ति का लाभ कुछ गिने-चुने परिवारों को मिला जिनमें गद्दाफी का परिवार शामिल था। इसकी जब भी आलोचना हुई तो शासन ने कड़ाई का रुख अख्तियार किया। लोग अपने मन का गुबार निकालना चाहते थे लेकिन जबर्दस्त सेंसरशिप ने अभिव्यक्ति के सारे रास्ते बंद कर दिए। विरोधियों को जेलों में ठूंस दिया गया। सरकारी तंत्र से बाहर राजनीतिक जीवन की लोगों की ललक बढ़ती चली गयी। तथाकथित 'जन समितियां' बदनाम हो गयीं और इनके जरिए विरोधियों की जासूसी की जाने लगी। अभी हाल तक स्कूलों में विदेशी भाषा पढ़ाने पर रोक लगा दी गयी थी। स्वास्थ्य सेवाओं में लगातार गिरावट आती गयी और बेरोजगारों की तादाद में जबर्दस्त वृद्धि हुई। पश्चिमी देशों ने गद्दाफी के खिलाफ लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को जब हटा लिया उसके बाद से ही यह महसूस किया गया कि गद्दाफी के साम्राज्यवाद विरोधी और राष्ट्रवादी नारों के प्रति जनता का आकर्षण समाप्त हो गया। जनता का विश्वास उन्होंने लगभग पूरी तरह खो दिया।
 
इसके बाद ट्‌यूनीशिया और मिस्र में आंदोलन भड़क उठे। 

हां, जिस समय हमलोग यह बातचीत कर रहे हैं लीबिया की स्थिति बहुत धुंधली और हिंसक है। गद्दाफी ने अंत तक लड़ने और सत्ता पर अपना कब्जा बनाए रखने का इरादा जाहिर किया है। फिलहाल राजधानी त्रिापोली और देश के पश्चिमी क्षेत्रों पर केन्द्रीय सरकार का कब्जा है जबकि पूर्वी क्षेत्र पर विरोधी ताकतों ने कब्जा कर रखा है। कुछ मंत्रियों और सैनिक अधिकारियों ने पाला बदल दिया है और वे प्रतिपक्ष के साथ शामिल हो गए हैं तथा संभावित अगली सरकार का हिस्सा बन गए हैं। इस 'अंतरिम राष्ट्रीय शासन कौंसिल' के कुछ सदस्य पश्चिमी देशों से मांग कर रहे हैं कि वे इनकी मदद में हवाई हमले करें। यह एक प्रतिक्रियावादी मांग है जिसके पीछे साम्राज्यवाद का समर्थन निहित है। यह लीबियाई जनता के हित में नहीं हैं जिसने साम्राज्यवादी प्रभुत्व के अधीन काफी कष्ट झेले हैं। यहां यह बात भी ध्यान में रखने की है कि इस क्षेत्र की यह पहली उथल-पुथल की घटना है जिसने तेल के उत्पादन को प्रभावित किया है। समूचे अफ्रीका में लीबिया के पास तेल का सबसे बड़ा भंडार है और लीबिया यूरोप की तेल की जरूरतों के एक महत्वपूर्ण हिस्से की आपूर्ति करता है। इसलिए साम्राज्यवादी गणित को प्रभावित करने में यह भी एक कारक है। साम्राज्यवादी ताकतें 'मानवीय सरोकार' का बहाना लेकर संभावित सैनिक हस्तक्षेप को वैचारिक आधार देने में लगी हैं।
 
यहां एक बात और ध्यान देने की है कि लीबिया की स्थिति को देखें और मिस्र में जो संघर्ष चल रहा है इन दोनों में 'नेताविहीन' आंदोलनों की एक बात दिखायी दे रही है जो सही नहीं है। प्रगतिशील और रेडिकल तत्वों में से बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता रखते हैं। इसलिए यह मानना गलत होगा। मिस्र की ही तरह लीबिया में भी विभिन्न वर्ग और सामाजिक शक्तियां मैदान में है। वे अपने हितों और दृष्टिकोणों को सामने ला रहे हैं और अलग-अलग शक्तियां नेतृत्व पर कब्जा करके अपने अनुरूप आंदोलन को दिशा देने के प्रयास में लगी हैं। लीबिया में ही देखें कि पूर्वी भाग में वकीलों का एक समूह है जो चाहता है कि 1952 के पुराने संविधान को लागू कर दिया जाए।
 
फिर आंदोलन में डाक्टरों, विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों, छात्रों, युवकों, मजदूरों आदि का बहुत बड़ा हिस्सा सड़कों पर उतर आया है और इन्हीं के साथ प्रतिक्रियावादी कबीलाई नेता, भूतपूर्व मंत्री, सेना के अधिकारी भी शामिल हो गए हैं और नेतृत्व हथियाने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो गद्दाफी के साथ अपना पुराना हिसाब चुकता करना चाहते हैं। नौजवानों का एक समूह है जो नारे लगा रहा है कि 'कबीलावाद नहीं चलेगा'। इन सबके बीच साम्राज्यावादियों की भी छल-कपट जारी है।
 
इसलिए सवाल इस बात का नहीं है कि नेतृत्व है अथवा आंदोलन नेतृत्वविहीन है। नहीं, सवाल यह है कि किस तरह का नेतृत्व है? इसके लक्ष्य क्या हैं? इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए किन तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है? इतिहास ने बार-बार यह दिखाया है कि अगर क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट नेतृत्व नहीं हुआ तो जनता को पराजय का ही सामना करना पड़ता है। ऐसी हालत में जनता का वह बहुत बड़ा हिस्सा जो सबसे ज्यादा उत्पीड़ित और शोषित है और जिसे बुनियादी परिवर्तन की सबसे ज्यादा जरूरत है वह अलग-थलग पड़ जाती है और उसके साथ धोखा होता है।
 
इसलिए जो कुछ हो रहा है उससे हमें महत्वपूर्ण सबक लेने हैं। हमारे सामने आज बहुत बड़ी चुनौतियां हैं।
(समकालीन तीसरी दुनिया से साभार)

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ गद्दाफी, साम्राज्यवाद और लीबिया की जनता की मुक्ति का सवाल ”

  2. By Dr. O.P.Verma on October 21, 2011 at 8:02 AM

    http://bhadas.blogspot.com/2011/10/blog-post_21.html

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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