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बीच सफ़हे की लड़ाई

भारत के दलित लेखन का मौजूदा परिदृश्य

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/07/2011 09:43:00 PM

भारतीय दलित आंदोलन का एक मुख्य स्वर दलित लेखन का है. दलित लेखकों की आत्मकथाओं ने साहित्य से उस वंचित और उत्पीड़ित तबके का परिचय कराया जिसे भारतीय जीवन का हिस्सा होते हुए भी अदृश्य बना दिया गया है। भारत के दलित लेखन पर आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी का यह आलेख. नया पथ के अप्रैल-जून 2009 अंक से साभार 

जैसे-जैसे दलित साहित्य लेखन और आंदोलन का विकास हो रहा है, वैसे-वैसे उसकी जटिलताएं, मुश्किलें और अंतर्विरोध उभर कर सामने आ रहे हैं। दलित रचनाकारों की जो युवा पीढ़ी इन दिनों सक्रिय है वह एक साथ तीन स्तरों पर बहस कर रही है। पहले स्तर पर जातिवादी-वर्चस्ववादी हैं। इनसे इनकी बहस की पुरानी भाषा, परंपरागत तर्क और अति परिचित तेवर नाकाफ़ी लग रहे हैं। इसलिए नयी भाषा, नये तर्क और नये तेवर इस्तेमाल किये जा रहे हैं। जातिवादियों की घेरेबंदी तितरफ़ा है। एक तरफ़ वे दलित बस्तियों, व्यक्तियों और स्त्रियों पर सीधे हमले कर रहे हैं, दूसरी तरफ 'प्रतिभा' की मनमाफ़िक अलंघ्य दीवार खड़ी कर दलितों को पुरानी स्थिति में स्थिर कर देना चाह रहे हैं और तीसरी तरफ़, साहित्य और कला की दुनिया में 'सौंदर्य' का तर्क देकर दलित लेखन को ही नकार रहे हैं। लेकिन, परिवर्तन का पहिया गतिमान है। दलित चुप नहीं हैं। वे प्रतिरोध, प्रत्याक्रमण और प्रत्याखयान कर रहे हैं। उनका प्रतिरोध नवनिर्माण के लिए, प्रत्याक्रमण मजबूरी में और प्रत्याख्यान अपने दोनों अर्थों अस्वीकार और उपेक्षा के साथ है।
दूसरे स्तर पर उनकी बहस उन लेखकों, चिंतकों, कार्यकर्ताओं से हो रही है जो अपने को क्रांतिकारी विचारधारा से जोड़ते हैं। उनका सीधा सा सवाल है आपकी प्राथमिकता में जाति का प्रश्न कहां है। सबका एक ही निष्कर्ष रहा वर्ग के चश्मे से वर्ण को ठीक-ठीक नहीं देखा जा सकता। जाति बनाये रखकर आप साम्यवादी समाज की दिशा में नहीं बढ़ सकते। जाति आधारित उत्पीड़न बना रहे और क्रांतिकारिता भी चलती रहे यह संभव नहीं। मार्क्स और आंबेडकर को मिलाकर मुक्ति की एक साझी ज़मीन तैयार की जा सकती है। मगर, मार्क्सवादी इसके लिए तैयार होंगे? फिर, अंबेडकरवादी ही यह ज़िम्मा क्यों लें?
तीसरे स्तर पर यह बहस स्वयं अपने से पूर्ववर्ती पीढ़ी के दलित लेखकों से है। पहली पीढ़ी के दलित लेखकों ने जो रणनीतियां बनायीं, जो व्याख्याएं तैयार कीं, जिन रचना-प्रविधियों को आविष्कृत किया, उन पर पुनर्विचार का वक़्त आ गया है। उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए लेकिन कमियों, चूकों को बहस के बीच लाना ज़रूरी है। नयी राह इसी से खुलेगी। जब वर्चस्ववादियों के हमलों का स्वरूप बदल गया हो तो पुरानी रणनीति काम नहीं करेगी। नयी पीढ़ी का दलित रचनाकार इसे बहुत शिद्दत से महसूस कर रहा है।
दलित लेखकों की पूर्ववर्ती पीढ़ी में आक्रोश और आक्रमकता भरपूर है। यह उस अवसर विशेष की मांग थी। इसके अभाव में न तो उनकी बात सुनी जाती और न ही दलित लेखन को कोई पहचान मिलती। लेकिन, नयी पीढ़ी के दलित लेखकों ने उनमें जो कमी रेखांकित की वह थी लोक राग की। दलित समुदाय के दमन और दुर्दशा का चित्रण ज़रूरी है लेकिन उसकी जीवनी-शक्ति पर चुप्पी क्यों? उसके दुखों और चीत्कारों को शब्द दिये गये परंतु उल्लास और आनंद के क्षणों की उपेक्षा क्यों की गयी? कन्नड़ के युवा दलित लेखक मोगल्ली गणेश कहते हैं कि इस उपेक्षा ने दलित लेखन को एक लंबा शिकायती पत्र बना दिया (कथादेश, अप्रैल, 2006 पृ. 60)। दलितों का अपना सांस्कृतिक जीवन-नृत्य, गीत, क़िस्से, चित्रकला, मूर्ति शिल्प, वाद्यकला पर्याप्त समृद्ध और सवर्ण लोक से कुछ लिये बिना ही बहुत-कुछ स्वायत्त है। इस सांस्कृतिक जीवन से गहरी रागात्मकता ही दलित सौंदर्य बोध के निर्माण का आधार होगी। मराठी के वरिष्ठ दलित लेखक गंगाधर पानतावणे का कहना है : 'जब हमने साहित्य-रचना शुरू की तब हमारा ज़ोर निषेध पर था। जब एक समाज पुराने बंधनों को तोड़कर नये दौर में पदार्पण करता है तो शुरू में उसकी आवाज़ बहुत तेज़ हुआ करती है। दबा हुआ पानी बहुत ज़ोर से निकलता है। इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि हिंदू समाज के प्रति ज़ोरदार विद्रोह हो। उसे नकारा जाये। हमारा प्रोटेस्ट 'इन हयुमैनिटी' के खि़ालाफ़ था, अछूतपन के खि़लाफ़ था। हमने पुराने मूल्यों को नकारा। दूसरे दौर में हम इस प्रश्न की ओर मुड़े कि ऐसा हुआ कैसे? हम इस गुलामी में क्यों रहे? आज (तीसरे दौर में) यह साहित्य प्रशांत जल की तरह चिंतन की मुद्रा में है।' (कथादेश, जुलाई 2008, पृ. 63) पानतावणे जी का यह विश्लेषण समझने के लिए हम दलित आत्मकथनों का उदाहरण ले सकते हैं। प्र. ई. सोन कांबले का आत्मकथन आठवणींचे पक्षी (यादों के पंछी, मूल मराठी, 1979) या शरणकुमार लिंबाले का अक्करमाशी (1984) झकझोर देने वाली गुस्सैल अभिव्यक्ति है। जबकि नये दौर में लिखी गयी आयदान (उर्मिला पवार, 2003) सर्जनात्मक सौंदर्यबोध और लोक राग की ऊष्मा लिये हुए है। हिंदी में मोहनदास नैमिशराय की अपने-अपने पिंजरे (1995) से तुलसीराम की आत्मकथा मुर्दहिया का अंतर साफ़ तौर से देखा जा सकता है। मुर्दहिया अभी 'तद्‌भव' पत्रिका में धारावाहिक रूप से छप रही है। उसके चार अंश आ चुके हैं। अपने-अपने पिंजरे में जहां आक्रोश समन्वित विवरण है वहीं मुर्दहिया में गहन लोक-संपृक्ति।
आक्रोश यहां चिंतन में घुलमिल गया है और लोक का अंतरतम आत्मगत रूप में लेखक के भरोसे की रोशनी से जगमगा उठा है। इस आत्मकथन को पढ़ते हुए लग रहा है कि प्रस्तुत विधा में अभी बहुत संभावनाएं हैं। ज़रूरत उस लेखकीय अंतर्दृष्टि की है जो इन संभावनाओं को टटोल सके। तेलुगु दलित कवि शिवसागर ने दलित कविता के 'मोनोटनस', बनने की आशंका जतायी थी (तेलुगु साहित्य में दलित दस्तक, नवलेखन प्रकाशन, हजारीबाग, प्रसं 2001, पृ. 194)। इस मोनोटनी को दो तरह से तोड़ा जा सकता है नये प्रश्नों, सरोकारों को शामिल करके तथा दलित समुदाय का सम्यक अवगाहन व चित्रण करके। दलित रचनाकारों ने दोनों स्तरों पर काम किया है। नये सवालों, नयी चिंताओं को साहित्य में प्रवेश मिला है और दूसरी ओर, दलित समाज का संपूर्ण चित्र भी उभरने लगा है। तुलसी राम का लेखन इसी का उदाहरण है। लेकिन 'संपूर्ण चित्र' पर बल देने में एक साजिश भी देखी जा सकती है। जिस लोकराग या गहन संपृक्ति की बात की गयी उसी से यह चित्र संपूर्ण बनता है। वैचारिक तल्ख़ी को अपने भीतर समोती, उसे मुखर होने से रोकती लोकरंग में डूबी भाषा अपनी सर्वजनात्मकता में पाठकों की संख्या में विस्तार करती, उन्हें आविष्ट करती, बांधती है लेकिन टीसती-चिलकती निर्भ्रांत लक्ष्योन्मुखता में बाधा भी पैदा करती है। अभी-अभी प्रकाशित ओमप्रकाश वाल्मीकि के काव्य संग्रह, अब और नहीं...(राधाकृष्ण प्रकाशन, 2009) की एक कविता 'अच्छा ही हुआ' की कुछ पंक्तियां हैं :
मरते-मरते मेरा बाप
थमा गया
मेरे हाथ में कलम
झाडू़ की जगह
कालग्रस्त अंधेरों की सिसकियां
और मुक्ति का घोषणा-पत्र
लिखने के लिए।
यह दलित कवि का दायित्व-बोध है, जो उसे कालग्रस्त अंधेरों की सिसकियों के अतिरिक्त कुछ दूसरा सुनने-सुनाने से बरजता है। इन 'सिसकियों' पर लिखना उनके लिए बेहद असुविधाजनक है जो दलित-समाज से नहीं आयी हैं। वे अनजाने या जान बूझकर उन चीज़ों को उछालने या प्रशंसा करने में लग जाते हैं जो उन्हें सहूलियत जैसी लगती हैं। पंजाबी दलित लेखक बलबीर माधोपुरी की आत्मकथा 'छांग्या रूक्ख' की भूमिका में (ग़ैर दलित) वरिष्ठ पंजाबी लेखक सतिन्दर सिंह नूर ने यही किया है। अपनी पूरी प्रस्तावना में वे आत्मकथा की रचनात्मक भाषा, लय, बिंब काव्यत्व की तारीफ़ करते रहे लेकिन सिख समाज के अंदरूनी घोर जातिवाद पर एक शब्द भी नहीं कहा। (विगत, 24 मई 2009) । विएना में रविदास पंथ के (डेरा सचखंड) संत निरंजनदास पर जानलेवा हमले और संत रामानंद की हत्या के बाद दलित सिखों ने जो उग्र प्रदर्शन किये उससे यह सचाई सबके सामने आ चुकी है। सम्मोहनकारी कथात्मकता, जादुई काव्यात्मकता में छिपी इसी आशंका को भांप कर कि आलोचक रचना के शिल्प, भाषिक गठन, लोकरंग को ले उड़ेंगे, ओमप्रकाश वाल्मीकि अपनी एक अन्य कविता में कहते हैं: 'बहुत कोशिशों के बाद भी नहीं सुना सका मैं। गांव देहात के क़िस्से। कथावाचक की तरह। हालांकि अभी भी ज़िंदा है। मेरा देहातीपन। खुदा हुआ है। रेशे-रेशे पर। गांव-देहात का आड़ा-तिरछा। ऊबड़-खाबड़ नक़्शा। मटमैली लकीरों में।... करता हूं कोशिश। भूल जाने की। जंग खाये दिनों की। वीभत्स यादों की। जो शूल सी गड़ी है। सीने में। पसीना और लहू। दाहकता भूलकर। हो गये हैं रंगहीन।' (पूर्वोक्त पृ. 71-72)
दलित साहित्य में इधर जिन नये विषयों पर फ़ोकस किया गया है उनमें दो प्रमुख हैं पहला दलित स्त्री का सवाल, दूसरा भूमंडलीकरण का मुद्‌दा। दलित स्त्री के सवाल को प्रमुखता मिलने की शुरुआत तब हुई जब स्वयं दलित स्त्रियों ने लिखना आरंभ किया, एक्टिविस्ट के रूप में सक्रिय हुईं। दलित स्त्रियों पर अंदर-बाहर सब तरफ़ से हमले हुए। सारी क़ायनात उनके ख़िलाफ़ खड़ी हो गयी। ग़ैर दलितों ने तो उनकी भरसक उपेक्षा की। दलित लेखकों के लिए वे तब तक रास्ते पर थीं जब तक जाति के विरुद्ध बोल रहीं थीं, लेकिन पितृसत्ता पर उंगली रखते ही आलोचना के केंद्र में आ गयीं। आरोप लगाया गया कि इस प्रवृत्ति से व्यापक दलित एकता टूटेगी, 'मूल लक्ष्य' से ध्यान हटेगा। दलित स्त्रियों ने इस आलोचना की ज्य़ादा परवाह नहीं की और पितृसत्ता को उन्होंने बहस का विषय बना दिया। उन्हें एक स्वतंत्र कैटेगरी के रूप में भी मान्यता मिलनी शुरू हुई। प्रमुख दलित लेखिकाओं में मराठी की बेबी कांबले, कुमुद पावड़े, ज्योति लांजेवार, प्रज्ञा लोखंडे तथा सुलभा पटोले; तेलुगु की चल्लापल्ली स्वरूपारानी, दारिशे शशि निर्मला, जाजुला गौरी, विनोदिनी, विजयश्री; तमिल की बामा, पी. शिवकामी, सुगिर्त रानी; गुजराती की ऊषा मकवाणा, प्रियंका कल्पित, दक्षा दामोदरा; बांग्ला की मंजूबाला, कल्याणी ठाकुर, सुषमा मैत्रा सरकार, सुजाता विस्वास; उड़िया की अंजूबला जेना, स्मृतिप्रभा जेना; हिंदी की सुशीला टाकभौरे, कुसुम मेघवाल, विमल थोरात, रजनी तिलक, रजतरानी मीनू, अनिता भारती आदि ने पितृसत्तात्मक जातिवादी समाज का अछूता सच उजागर किया है। रजनी तिलक अपनी एक कविता में कहती हैं : 'सखी, चुप रहने की कहानी है। हमारे परिवार। चुप रहो, झुकती रहो। त्याग करो और घुट-घुट कर मरती रहो। ... उत्पीड़न के बल पर टिका है घर-बार। चुप्पी टूटी तो बिखरा हमारा संसार'' (अन्यथा , जून, 2008, पृ. 176)। नवोदित रचनाकार पूनम तुसामड़ अपनी एक कविता में उस परिवेश को प्रस्तुत करती हैं जिसमें एक स्त्री दलित स्त्री रहने को बाध्य है : 'मेरे सोने से पहले। और जागने पर यकायक। क्यूं कस जाता है शिकंजा चारों ओर। शायद। कोई चक्रव्यूह-सा। जिसे चाहकर भी मैं। तोड़ नहीं पाती हूं। न जाने कौन-सा डर। समा जाता है मन में। वह डर भी मेरा नहीं है। वह भी मिला है विरासत में...'(बयान, जनवरी 2009, पृ. 27)। परिवर्तन का संकेत देते हुए सुशीला टाकभौरे खुले आसमान वाली छत की नहीं, पूरे आसमान की मांग कर रही हैं (हमारे हिस्से का सूरज, शरद प्रकाशन, नागपूर, 2005)। अब जबकि दलित स्त्री के स्वर को सुनने और विश्लेषण करने का समय है उसे अनसुना करने, विकृत करने तथा हतोत्सहित करने का षड्‌यंत्र चल रहा है। और इस अभियान में दोनों पक्षों के लोग शामिल हैं। हम उदाहरण के तौर पर मूर्धन्य आलोचक नामवर सिंह का कथन देख सकते हैं: 'स्त्री लेखन में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति है पर उसमें भी दलित स्त्रियों द्वारा लिखा हुआ ऐसा कुछ महत्वपूर्ण नहीं है। मै। समझता हूं कि यह सतही चीज़ है' (तद्‌भव, अंक 18, पृ. 121)। ऐसे बयान, अगर कोई उन्हें गंभीरता से ले, मनोबल तोड़ने वाले होते हैं। यह सही है कि दलित स्त्रियों का लेखन सुरुचि-संपन्नों के मुताबिक़ नहीं हो रहा। हो भी नहीं सकता। इस लेखन की चिंता ही बद्ध संस्कारों को तोड़ने की है। सुशीला टाकभौरे की एक कविता सनातन कथा-परंपरा को कुछ यों देखती है : 'सुनो विक्रम। कब से लादे हो। तुम। कंधों पर। कथाओं का बेताल। आदर्श, प्रेम, राजा, न्याय के अतिरिक्त। बहुत क़िस्से हैं। ज़रा अपनी नज़र से भी देखो। निर्णय देने से अधिक कठिन है। कथा को दिशा देना। अब तुम सुनाओ कथा बेताल को। सवार होकर कंधों पर। और पूछो सवाल। अधिकतम कितना मूल्य है। किसी निरीह महिला को। सरेआम नंगा करने का?। दलित इंसानों को। बेबसी की अंतिम सीमा तक। पहुंचा देने का?'(पूर्वोक्त, पृ. 79)
भूमंडलीकरण के सवाल को दलित लेखन में एक समय तक ज्य़ादा महत्त्व नहीं दिया गया। इस समाज की अंदरूनी समस्याएं ही इतनी विकराल और असामधेय सी हैं कि अलग ध्यान न जाना स्वाभाविक लगता है। लेकिन, कालांतर में समस्याओं की परस्पर सम्बद्धता समझी जाने लगी है। गुजराती दलित चिंतक और रचनाकार हरीश मंगलम ने लिखा, 'वर्ण-व्यवस्था ख़त्म करना महत्त्वपूर्ण अवश्य है, किंतु वही एकमात्र प्रश्न नहीं है। आज राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो नये डरावने सवाल हमारे समक्ष खड़े हो रहे है, उन्हें भी दृष्टि में रखना पड़ेगा।' (प्रतिध्वनि, नवभारत प्रकाशन, दिल्ली, 2008,पृ. 29) भूमंडलीकरण यही डरावना सवाल है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां जिस तरह अपने पांव पसार रही हैं, राष्ट्र को अपनी गिरफ़्त में ले रही हैं उसमें सबसे अधिक घाटा दलितों को ही होने वाला है। इस देश के  वर्चस्ववादियों की आर्थिक एकाधिकारवादियों से बनती-संवरती सांठ-गांठ क्रमशः समझ में आने लगी है। भूमंडलीकरण को मीडिया के रथ पर बैठाकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दिग्विजय अभियान किसकी गरदन से होता हुआ गुज़रेगा, अब यह रहस्य का विषय नहीं है। नवोदित गुजराती दलित कवि सत्यम बरोट बताते हैं:
वैश्वीकरण यानी
अमेरिका में बैठे-बैठे
प्रमुख वहां से फूंक मारता है
और भारत के
आखिरी गांव के
आखिरी कोने में
जलता
अंतिम चूल्हा
बुझ जाता है।
(दलित कविता का विद्रोही स्वर, सं. विमल थोरात)
दलित लेखन का नया दौर पविर्तनकामियों को आश्वस्त करते हुए बेहतर भविष्य के लिए चल रहे संघर्ष में साझेदारी का आहवान करता है।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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