भ्रष्टाचार पर फलने फूलने वाले साम्राज्यवादी विकास का नाटक
Posted by Reyaz-ul-haque on 4/29/2011 02:55:00 PMभ्रष्टाचार एक बार फिर बहस के केंद्र में है. शाइनिंग इंडिया में राज्य की हर नीति पर भ्रष्टाचार की एक कहानी मौजूद है. चाहे वह ग्रामीण विद्यालयों के लिए मिड डे मील योजना हो या कोई रक्षा सौदा या फिर स्पेक्ट्रम घोटाला. हम अन्ना हजारे के चार दिन के भव्य तमाशे के गवाह रहे. हमने खाते पीते मध्यम वर्ग के उत्साही समर्थन वाले 'सिविल सोसाइटी' द्वारा सहअभिनीत और हर एक रंग की संसदीय पार्टियों - एक इन्द्रधनुषीय गठबधन-द्वारा प्रशंसित 'नए गांधी' के 'ऐतिहासिक सत्याग्रह' को देखा. सनसनी से संचालित हमारे 24x7 रियलिटी टीवी चैनल जिन्हें अन्यथा न्यूज़ चैनल भी कहा जाता है, जंतर मंतर को तहरीर चौक की संज्ञा देने से खुद को नहीं रोक पाए. 'भारत माता' और गाँधी के चित्रों के आगे बैठे अन्ना हजारे की तस्वीरें हर घर के ड्राईंग रूम में प्राइम टाइम पर प्रसारित हो रहे थे. जल्दी ही 'शाइनिंग इंडिया' के हर छोटे बड़े शहर से अन्ना प्रेरित जनप्रदर्शनों की तस्वीरें आने लगी. नारा बहुत सरल था (या ऐसा लगा) : भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए जरुरत थी जन लोकपाल की. सुपर कॉप, न्यायकर्ता, कानून तीनों का संयोजन- जो भ्रष्टाचार मिटाने के लिए सबसे ऊपर होगा. चार दिन के प्रदर्शन के बाद अन्ना हजारे ने अपना सत्याग्रह समाप्त किया. जब सरकार ने मान लिया कि नया बिल 'सिविल सोसाइटी' के नेताओं के साथ विचार-विमर्श करने के बाद बनाया जायेगा. ईमानदारी का रस्मी प्रदर्शन (जो इस तमाशे की प्रमुख विशेषता थी) करते हुए मीडिया के सामने बताया गया कि चार दिन के प्रदर्शन पर कुल 82 लाख रूपये खर्च हुए.नेता-नौकरशाह-कारपोरेट गठबंधन द्वारा डकारे गए धन से शायद काफी कम. लेकिन अन्ना हजारे और उनके समर्थक, बड़ी आसानी से यह बताना भूल गए कि प्रदर्शन के प्रायोजक थे टाटा, इन्फ़ोसिस और अन्य कारपोरेट घराने. और बहुत सी चीजें आँखों के सामने नहीं आ पाईं. सिविल सोसाइटी के कुछ हलको में यह भी कहा जा रहा था कि भावुक अपील करते हुए और मिस कॉल कर अपने समर्थन दिखाने का आग्रह करते हुए SMS लाखों उपभोक्ताओं तक पहुँचाने के लिए बड़ी मोबाईल कंपनियों से 20 लाख रुपये का करार किया गया था.
भ्रष्टाचार की कथा: 'गणतंत्र' जितनी ही पुरानी
47 के बाद के पूरे इतिहास में हमने सभी संसदीय पार्टियों के बहुत से नेताओं को भ्रष्टाचार मिटाने के लम्बे चौड़े दावे करते हुए देखा है. 'नेहरुवादी समाजवाद' के ज़माने से उदारीकरण के दौर तक भाई भतीजावाद, सार्वजनिक धन की लूट खसोट, कमीशनखोरी या विदेशी अनुदान के दुरूपयोग के मामले इस देश की जनता के लिए कोई नई बात नहीं है. लेकिन उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण के इस दौर में भ्रष्टाचार की व्यापकता में कई गुना वृद्धि हुई है और उतनी ही वृद्धि हुई है अमीर और गरीब के बीच के अंतर में. इसके बावजूद भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई एक वास्तविक समस्या बनी हुई है. वह है बीमारी के बजाय उसके लक्षणों को दूर करने की कोशिश करना. ऐसा क्यों है?
1947 के बाद भारतीय राज्य द्वारा अपनाए गए विकास के रास्ते को देखे बिना भ्रष्टाचार के बारे में विचार करना नादानी होगा. और यह नोट करना गलत न होगा कि चाहे वह 'नेहरूवादी समाजवाद, का दौर रहा हो या आज का नवउदारवादी दौर, भारतीय शासक वर्ग के लिए विकास का अर्थ पूरी तरह पूँजी पर आधारित रहा है. शहरी केंद्र अपने मॉलों, फ्लाईओवरों, एक्सप्रेस हाइवे, आयातित कारों, फ्लडलाइटों से जगमगाते स्टेडियमों, डे नाईट मैचों, आधुनिक सुविधासंपन्न एयरपोर्टों, मोटे बटुओं वाले नवाचारीउपभोक्ताओं, के साथ विकास का प्रदर्शन करते हैं. यह आम धारणा है कि ग्रामीण इलाकों में कम पूँजी होने के कारण कम विकास है. सच्चाई यह है कि ग्रामीण इलाकों से उगाही जा रही व्यापक अधिशेष अनुत्पादक गतिविधियों में खपाया जाता है और उसका बहुत कम हिस्सा वापस खेती में लगाया जाता है. इस तरह विकास और पूँजी, वर्ग/जाति/क्षेत्र के सन्दर्भ से परे एक दूसरे का पर्याय बन गए हैं. जहाँ पूँजी की मौजूदगी का अर्थ है विकास की मौजूदगी और इसके विपरीत भी.
आज तक 'शाइनिंग इंडिया' तकनीकी सहायता के लिए साम्राज्यवादी पश्चिम पर बुरी तरह निर्भर है. दलाल पूंजीपति जिसने राज्य प्रदत्त सब्सिडी को आधार बना कर बाज़ार पर अपना नियंत्रण और एकाधिकार कायम कर लिया है, वास्तव में पश्चिमी तकनीक पर आधारित विकास के लिए बाज़ार का थानेदार बन गया है. यही दलाल पूंजीपति सामंती भूस्वामी वर्ग के साथ मिलकर साम्राज्यवादी बाज़ार के लिए जरुरी विकास और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कायम रखता है. इस तरह पहले दिन से ही अर्थव्यवस्था पैसे से पैसा बनाने वाली सूदखोर परजीवी पूँजी पर आधारित रही है. जो व्यापक जनता के वास्तविक विकास के खिलाफ थी. दलाल पूँजी के हित में मुनाफे को बढ़ाते रहना प्राथमिक बन गया और सभी सामाजिक सम्बन्ध इसके अधीन ही गए. आश्चर्य नहीं कि इससे भ्रष्टाचार फला फूला और अमीर और गरीब में संपत्ति की चरम विषमताएं पैदा हुईं. व्यापक खेतिहर अर्थव्यवस्था से वसूला गया भारी अधिशेष वेतनभोगी शहरी मध्यम/उच्च मध्यम वर्गीय उपभोक्ता की क्रयशक्ति बढाने में खर्च किया गया है. चाहे वह कोई अफसर हो या सिलिकोन वैली का आधुनिक अधिकारी. गाँव के स्तर पर इसका प्रतिबिम्बन भ्रष्टाचार के विभिन्न नामों के साथ चलन में हुआ. और यह सामुदायिक जीवन का हिस्सा बन गया. नए ज़माने के फ्लैगशिप कार्यक्रमों जैसे मनरेगा और बीपीएल राशन कार्डों के द्वारा उपभोक्ताओं के एक नए संस्तर का निर्माण हुआ. सुदूर बस्तर के मुरिया आदिवासियों के लिए जंगलों में महुआ ख़ुशी का प्रतीक था. भ्रष्टाचार वन विभाग के अधिकारी/ठेकेदार के रूप में उसके बीच में आ घुसा.
अन्ना हजारे मॉडल:उपमहाद्वीप में साम्राज्यवाद की छाया
विकास का यह मॉडल ब्रेटन वुड्स संस्थाओं के आशीर्वाद से 'कैचिंग अप विद द वेस्ट' के नारे के साथ शुरू हुआ. जिन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवादकि जरूरतों के मुताबिक विकासशील और अभी अभी प्रत्यक्ष औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुएदेशों के 'तीव्र विकास' की बात की. भारत जैसे अर्ध उपनिवेशों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण बनाये रखने के लिए 'विकास' के अर्थशास्त्र को सभी समस्याओं के समाधान की तरह पेश कियागया. भारतीय उपमहाद्वीप में पहले पहल इन नीतियों को साम्राज्यवादी पूँजी को आमंत्रित करने के लिए सरकार से सरकार को मदद के नाम पर पेश किया गया. ठीक इसी कारण से सत्तर के दशक में विकास में राज्य के हस्तक्षेप का लाइसेंस राज को ख़त्म करने के नाम पर विरोध किया गया. और जैसे जैसे साम्राज्यवाद का संकट हमारे हालिया समय कि दूसरी महामंदी बनाने की तरफ बढ़ता गया. विषाक्त पूँजी के वैश्विक फैलाव के फलस्वरूप पैदा हुए संकट ने वाशिंगटन के उन्ही प्रतिपादकों को राज्य की भूमिका को फिर से मानने के लिए मजबूर किया. अलबत्ता नवउदारवाद को हानि पहुंचाए बिना. पश्चिम द्वारा यही मार्ग लातिन अमेरिका और अफ्रीका में भी प्रसारित किया गया. और आज हम भारतीय उपमहाद्वीप में अपने सामने एक नाटक होता हुआ देख रहे हैं- अन्ना हजारे का उनके 'शक्तिशाली' सत्याग्रह के जरिये भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध.
और वस्तुतः पश्चिम के विकास प्रबंधकों की तरह ही यह कोरपोरेट सेक्टर है जिसकी आतंक के खिलाफ युद्ध, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ युद्ध के साथ-साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में रूचि है. क्योंकि वे विकास के नाम पर जनता के धन के बड़े पैमाने पर हो रही लूट के खिलाफ वास्तविक जन असंतोष से डरते हैं. दलाल पूंजीपति यह किसी से भी ज्यादा जानते हैं कि पिछले बीस सालों में उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की मोटी हेडलाइन के नीचे कार्यक्षमता, उद्यमशीलता, प्रतियोगिताऔर संवृद्धि के नाम पर दरअसल और कुछ नहीं वरन अतिशय घोटाले थे - एनरॉन-दाभोल बिजली घोटाला, बोफोर्स, लॉटरी, स्टाम्प पेपर, पीडीएस अनाज घोटाला, सत्यम, मनरेगा, आदर्श, सतना भूमि घोटाला, ताबूत घोटाला, IPL घोटाला, एयर इंडिया, राडिया टेप, 2G स्पेक्ट्रम घोटाला इत्यादि. इन सबके बाद विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा बहुराष्ट्रीय निगमों से किये गए सैकड़ों करारनामों की अनकही कहानियां. असके अलावा विपक्ष की सांठगांठ से केंद्र की संप्रग सरकार ने स्विस बैंक में ले जाये गए धन की अब तक उपलब्ध जानकारी को भी जनता से छिपाया है. जनता के धन से खरबों रुपयों की लूट के इन सभी मामलों में कारपोरेट जगत राजनेताओं और नौकरशाहों के साथ शामिल रहा है. टाटा इन्फ़ोसिस और एस्सार जैसे कंपनियों द्वारा अन्ना हजारे के सत्याग्रह को दिए गए उदार दान का कारण समझ में आता है. यही कारपोरेट क्षेत्र अपनी फिक्की जैसी संस्थाओं के माध्यम से सरकार को छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों में अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे आदिवासियों के खिलाफ सलवा जुडूम जैसे निजी सैन्य गिरोहों को संगठित करने की रणनीति को आगे बढाने का सुझाव और धन देता है. कहानी का दूसरा भाग उन्हीं कारपोरेट द्वारा जनता में मौजूद असंतोष का इस्तेमाल करते हुए अन्ना हजारे के सत्याग्रह तमाशे को प्रायोजित करने से समाप्त होता है.
जिस तरह नरसंहारक नरेंद्र मोदी दलाल पूँजी का प्रिय चहेता है, अन्ना हजारे में हम उसका सामंती प्रतिरूप देख सकते हैं. कारपोरेट समर्थित अन्ना का मोदी द्वारा समर्थन प्राप्त करना स्वाभाविक ही था. और बाबा रामदेव, स्वामी अग्निवेश और श्रीश्री रविशंकर जैसी 'ईश्वरीय विभूतियाँ' भी इसमें शामिल हो गईं. इससे हमें विहिप को नब्बे के दशक में बिडला के द्वारा हिन्दू साम्प्रदायिकता के प्रचार-प्रसार के लिए वित्तपोषित आधुनिक सुविधाओं से पूर्ण वाहन मुहैया कराये जाने की याद आती है जिसे बाद में आडवानी कि 'रथ यात्रा' के लिए भी प्रयोग किया गया. और महाराष्ट्र के रालेगांव सीधी में अन्ना हजारे के 'आदर्श गाँव' में हमें ब्राह्मणवादी रामराज्य के दर्शन होते हैं जो पूरी तरह वर्ण व्यवस्था के नियमों पर आधारित है. महिलाएं, मुस्लिम और दलित इस 'आदर्श गाँव' में हाशिए पर हैं जिनकी कोई अहमियत नहीं है. इस समय जब कारपोरेट की साख जनता के सामने पूरी तरह ख़त्म होती जा रही है सबसे आसान रास्ता है सामंती-दलाल गठजोड़ को मजबूत करना. जिसका उदहारण अन्ना हजारे के सत्याग्रह तमाशे में दिखा. जन लोकपाल की बात करना दरअसल उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण कि नीतियों को जारी रखने के लिए इस गठबंधन का इस्तेमाल करना है. हजारे द्वारा प्रस्तावित जनलोकपाल विधेयक में लोक पाल का चुनाव करने के लिए बनाये जाने वाले निर्वाचक मंडल का विचार सारतः कुलीनवादी अल्पतंत्र को आगे बढ़ाता है. परजीवी मध्यम वर्ग के भौतिक आधार -जो उदारीकरण के दौर में फला फूला है- ने एक सुन्दर और शक्तिशाली न भी कहें तो ईमानदार और कुशल तानाशाह के लिए उन्माद पैदा किया है. जो व्यापक उत्पीडित जनसमुदाय की कीमत पर भी समस्याओं को हल कर सकता है. इस प्रकार हम भारतीय राजनीति के फासीवादीकरण की एक बड़ी योजना को देखते हैं. इसी परिप्रेक्ष्य में संसदीय वाम और 'सिविल सोसाइटी' का इस 'मध्यवर्गीय क्रांति' में बह जाना उल्लेखनीय है. जिसकी बेचैनी एक स्वनामधन्य वामपंथी अकादमिक की राय में झलकती है जब वह कि अन्ना के सत्याग्रह को समर्थन की जरुरत बताते हुए कहते हैं कि इसके असफल होने पर उपमहाद्वीप कि जनता के पास केवल एक विकल्प माओवादी आन्दोलन रह जाएगा. अब यह उपमहाद्वीप के लोगों पर है कि वे शासक वर्ग कि इस दोमुंही रणनीति को समझें और सभी प्रकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक समझौताविहीन संघर्ष चलायें, वह संघर्ष जो साथ ही साथ वर्ग, जाति, लिंग व धर्म के आधार पर होने वाले शोषण को समाप्त करेगा.
भ्रष्टाचार की कथा: 'गणतंत्र' जितनी ही पुरानी
47 के बाद के पूरे इतिहास में हमने सभी संसदीय पार्टियों के बहुत से नेताओं को भ्रष्टाचार मिटाने के लम्बे चौड़े दावे करते हुए देखा है. 'नेहरुवादी समाजवाद' के ज़माने से उदारीकरण के दौर तक भाई भतीजावाद, सार्वजनिक धन की लूट खसोट, कमीशनखोरी या विदेशी अनुदान के दुरूपयोग के मामले इस देश की जनता के लिए कोई नई बात नहीं है. लेकिन उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण के इस दौर में भ्रष्टाचार की व्यापकता में कई गुना वृद्धि हुई है और उतनी ही वृद्धि हुई है अमीर और गरीब के बीच के अंतर में. इसके बावजूद भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई एक वास्तविक समस्या बनी हुई है. वह है बीमारी के बजाय उसके लक्षणों को दूर करने की कोशिश करना. ऐसा क्यों है?
1947 के बाद भारतीय राज्य द्वारा अपनाए गए विकास के रास्ते को देखे बिना भ्रष्टाचार के बारे में विचार करना नादानी होगा. और यह नोट करना गलत न होगा कि चाहे वह 'नेहरूवादी समाजवाद, का दौर रहा हो या आज का नवउदारवादी दौर, भारतीय शासक वर्ग के लिए विकास का अर्थ पूरी तरह पूँजी पर आधारित रहा है. शहरी केंद्र अपने मॉलों, फ्लाईओवरों, एक्सप्रेस हाइवे, आयातित कारों, फ्लडलाइटों से जगमगाते स्टेडियमों, डे नाईट मैचों, आधुनिक सुविधासंपन्न एयरपोर्टों, मोटे बटुओं वाले नवाचारीउपभोक्ताओं, के साथ विकास का प्रदर्शन करते हैं. यह आम धारणा है कि ग्रामीण इलाकों में कम पूँजी होने के कारण कम विकास है. सच्चाई यह है कि ग्रामीण इलाकों से उगाही जा रही व्यापक अधिशेष अनुत्पादक गतिविधियों में खपाया जाता है और उसका बहुत कम हिस्सा वापस खेती में लगाया जाता है. इस तरह विकास और पूँजी, वर्ग/जाति/क्षेत्र के सन्दर्भ से परे एक दूसरे का पर्याय बन गए हैं. जहाँ पूँजी की मौजूदगी का अर्थ है विकास की मौजूदगी और इसके विपरीत भी.
आज तक 'शाइनिंग इंडिया' तकनीकी सहायता के लिए साम्राज्यवादी पश्चिम पर बुरी तरह निर्भर है. दलाल पूंजीपति जिसने राज्य प्रदत्त सब्सिडी को आधार बना कर बाज़ार पर अपना नियंत्रण और एकाधिकार कायम कर लिया है, वास्तव में पश्चिमी तकनीक पर आधारित विकास के लिए बाज़ार का थानेदार बन गया है. यही दलाल पूंजीपति सामंती भूस्वामी वर्ग के साथ मिलकर साम्राज्यवादी बाज़ार के लिए जरुरी विकास और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कायम रखता है. इस तरह पहले दिन से ही अर्थव्यवस्था पैसे से पैसा बनाने वाली सूदखोर परजीवी पूँजी पर आधारित रही है. जो व्यापक जनता के वास्तविक विकास के खिलाफ थी. दलाल पूँजी के हित में मुनाफे को बढ़ाते रहना प्राथमिक बन गया और सभी सामाजिक सम्बन्ध इसके अधीन ही गए. आश्चर्य नहीं कि इससे भ्रष्टाचार फला फूला और अमीर और गरीब में संपत्ति की चरम विषमताएं पैदा हुईं. व्यापक खेतिहर अर्थव्यवस्था से वसूला गया भारी अधिशेष वेतनभोगी शहरी मध्यम/उच्च मध्यम वर्गीय उपभोक्ता की क्रयशक्ति बढाने में खर्च किया गया है. चाहे वह कोई अफसर हो या सिलिकोन वैली का आधुनिक अधिकारी. गाँव के स्तर पर इसका प्रतिबिम्बन भ्रष्टाचार के विभिन्न नामों के साथ चलन में हुआ. और यह सामुदायिक जीवन का हिस्सा बन गया. नए ज़माने के फ्लैगशिप कार्यक्रमों जैसे मनरेगा और बीपीएल राशन कार्डों के द्वारा उपभोक्ताओं के एक नए संस्तर का निर्माण हुआ. सुदूर बस्तर के मुरिया आदिवासियों के लिए जंगलों में महुआ ख़ुशी का प्रतीक था. भ्रष्टाचार वन विभाग के अधिकारी/ठेकेदार के रूप में उसके बीच में आ घुसा.
अन्ना हजारे मॉडल:उपमहाद्वीप में साम्राज्यवाद की छाया
विकास का यह मॉडल ब्रेटन वुड्स संस्थाओं के आशीर्वाद से 'कैचिंग अप विद द वेस्ट' के नारे के साथ शुरू हुआ. जिन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवादकि जरूरतों के मुताबिक विकासशील और अभी अभी प्रत्यक्ष औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुएदेशों के 'तीव्र विकास' की बात की. भारत जैसे अर्ध उपनिवेशों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण बनाये रखने के लिए 'विकास' के अर्थशास्त्र को सभी समस्याओं के समाधान की तरह पेश कियागया. भारतीय उपमहाद्वीप में पहले पहल इन नीतियों को साम्राज्यवादी पूँजी को आमंत्रित करने के लिए सरकार से सरकार को मदद के नाम पर पेश किया गया. ठीक इसी कारण से सत्तर के दशक में विकास में राज्य के हस्तक्षेप का लाइसेंस राज को ख़त्म करने के नाम पर विरोध किया गया. और जैसे जैसे साम्राज्यवाद का संकट हमारे हालिया समय कि दूसरी महामंदी बनाने की तरफ बढ़ता गया. विषाक्त पूँजी के वैश्विक फैलाव के फलस्वरूप पैदा हुए संकट ने वाशिंगटन के उन्ही प्रतिपादकों को राज्य की भूमिका को फिर से मानने के लिए मजबूर किया. अलबत्ता नवउदारवाद को हानि पहुंचाए बिना. पश्चिम द्वारा यही मार्ग लातिन अमेरिका और अफ्रीका में भी प्रसारित किया गया. और आज हम भारतीय उपमहाद्वीप में अपने सामने एक नाटक होता हुआ देख रहे हैं- अन्ना हजारे का उनके 'शक्तिशाली' सत्याग्रह के जरिये भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध.
और वस्तुतः पश्चिम के विकास प्रबंधकों की तरह ही यह कोरपोरेट सेक्टर है जिसकी आतंक के खिलाफ युद्ध, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ युद्ध के साथ-साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में रूचि है. क्योंकि वे विकास के नाम पर जनता के धन के बड़े पैमाने पर हो रही लूट के खिलाफ वास्तविक जन असंतोष से डरते हैं. दलाल पूंजीपति यह किसी से भी ज्यादा जानते हैं कि पिछले बीस सालों में उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की मोटी हेडलाइन के नीचे कार्यक्षमता, उद्यमशीलता, प्रतियोगिताऔर संवृद्धि के नाम पर दरअसल और कुछ नहीं वरन अतिशय घोटाले थे - एनरॉन-दाभोल बिजली घोटाला, बोफोर्स, लॉटरी, स्टाम्प पेपर, पीडीएस अनाज घोटाला, सत्यम, मनरेगा, आदर्श, सतना भूमि घोटाला, ताबूत घोटाला, IPL घोटाला, एयर इंडिया, राडिया टेप, 2G स्पेक्ट्रम घोटाला इत्यादि. इन सबके बाद विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा बहुराष्ट्रीय निगमों से किये गए सैकड़ों करारनामों की अनकही कहानियां. असके अलावा विपक्ष की सांठगांठ से केंद्र की संप्रग सरकार ने स्विस बैंक में ले जाये गए धन की अब तक उपलब्ध जानकारी को भी जनता से छिपाया है. जनता के धन से खरबों रुपयों की लूट के इन सभी मामलों में कारपोरेट जगत राजनेताओं और नौकरशाहों के साथ शामिल रहा है. टाटा इन्फ़ोसिस और एस्सार जैसे कंपनियों द्वारा अन्ना हजारे के सत्याग्रह को दिए गए उदार दान का कारण समझ में आता है. यही कारपोरेट क्षेत्र अपनी फिक्की जैसी संस्थाओं के माध्यम से सरकार को छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों में अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे आदिवासियों के खिलाफ सलवा जुडूम जैसे निजी सैन्य गिरोहों को संगठित करने की रणनीति को आगे बढाने का सुझाव और धन देता है. कहानी का दूसरा भाग उन्हीं कारपोरेट द्वारा जनता में मौजूद असंतोष का इस्तेमाल करते हुए अन्ना हजारे के सत्याग्रह तमाशे को प्रायोजित करने से समाप्त होता है.
जिस तरह नरसंहारक नरेंद्र मोदी दलाल पूँजी का प्रिय चहेता है, अन्ना हजारे में हम उसका सामंती प्रतिरूप देख सकते हैं. कारपोरेट समर्थित अन्ना का मोदी द्वारा समर्थन प्राप्त करना स्वाभाविक ही था. और बाबा रामदेव, स्वामी अग्निवेश और श्रीश्री रविशंकर जैसी 'ईश्वरीय विभूतियाँ' भी इसमें शामिल हो गईं. इससे हमें विहिप को नब्बे के दशक में बिडला के द्वारा हिन्दू साम्प्रदायिकता के प्रचार-प्रसार के लिए वित्तपोषित आधुनिक सुविधाओं से पूर्ण वाहन मुहैया कराये जाने की याद आती है जिसे बाद में आडवानी कि 'रथ यात्रा' के लिए भी प्रयोग किया गया. और महाराष्ट्र के रालेगांव सीधी में अन्ना हजारे के 'आदर्श गाँव' में हमें ब्राह्मणवादी रामराज्य के दर्शन होते हैं जो पूरी तरह वर्ण व्यवस्था के नियमों पर आधारित है. महिलाएं, मुस्लिम और दलित इस 'आदर्श गाँव' में हाशिए पर हैं जिनकी कोई अहमियत नहीं है. इस समय जब कारपोरेट की साख जनता के सामने पूरी तरह ख़त्म होती जा रही है सबसे आसान रास्ता है सामंती-दलाल गठजोड़ को मजबूत करना. जिसका उदहारण अन्ना हजारे के सत्याग्रह तमाशे में दिखा. जन लोकपाल की बात करना दरअसल उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण कि नीतियों को जारी रखने के लिए इस गठबंधन का इस्तेमाल करना है. हजारे द्वारा प्रस्तावित जनलोकपाल विधेयक में लोक पाल का चुनाव करने के लिए बनाये जाने वाले निर्वाचक मंडल का विचार सारतः कुलीनवादी अल्पतंत्र को आगे बढ़ाता है. परजीवी मध्यम वर्ग के भौतिक आधार -जो उदारीकरण के दौर में फला फूला है- ने एक सुन्दर और शक्तिशाली न भी कहें तो ईमानदार और कुशल तानाशाह के लिए उन्माद पैदा किया है. जो व्यापक उत्पीडित जनसमुदाय की कीमत पर भी समस्याओं को हल कर सकता है. इस प्रकार हम भारतीय राजनीति के फासीवादीकरण की एक बड़ी योजना को देखते हैं. इसी परिप्रेक्ष्य में संसदीय वाम और 'सिविल सोसाइटी' का इस 'मध्यवर्गीय क्रांति' में बह जाना उल्लेखनीय है. जिसकी बेचैनी एक स्वनामधन्य वामपंथी अकादमिक की राय में झलकती है जब वह कि अन्ना के सत्याग्रह को समर्थन की जरुरत बताते हुए कहते हैं कि इसके असफल होने पर उपमहाद्वीप कि जनता के पास केवल एक विकल्प माओवादी आन्दोलन रह जाएगा. अब यह उपमहाद्वीप के लोगों पर है कि वे शासक वर्ग कि इस दोमुंही रणनीति को समझें और सभी प्रकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक समझौताविहीन संघर्ष चलायें, वह संघर्ष जो साथ ही साथ वर्ग, जाति, लिंग व धर्म के आधार पर होने वाले शोषण को समाप्त करेगा.
(आरडीएफ के बयान का संपादित अंश)
| Posted in »


0 टिप्पणियां: Responses to “ भ्रष्टाचार पर फलने फूलने वाले साम्राज्यवादी विकास का नाटक ”