हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

धर्म, सत्ता और स्त्री

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/31/2010 09:37:00 PM

रणेन्द्र

बात की शुरूआत माधवी की कथा से करता हूँ. महाभारत के उद्योगपर्व के 106वें अध्याय से 123वें अध्याय तक माधवी के आख्यान का वर्णन है. माधवी नहुष कुल में उत्पन्न चन्द्रवंश के पांचवें राजा ययाति की पुत्री थी. गालव ऋषि को अपने गुरू विश्वामित्र को गुरूदक्षिणा में श्यामकर्ण और चन्द्रप्रभायुक्त आठ सौ घोड़े देने थे. गालव राजा ययाति के पास पहुंचे. राजा के पास भी श्यामकर्ण घोड़े नहीं थे. उन्होंने अपनी बेटी माधवी ऋषि को दे दी ताकि उसे अन्य राजाओं को सौंप कर घोड़े प्राप्त करे.
ऋषि गालव ने माधवी को पहले अयोध्यापति हर्यश्व को दिया जिन्होंने माधवी से एक पुत्र उत्पन्न करके दो सौ घोड़े दिए. काशीराज दिवोदास और भोजराज उशीनर ने भी इसी प्रकार पुत्र उत्पन्न कर प्रत्येक ने गालव को दो-दो सौ घोड़े दिए.अन्त में छह सौ श्यामकर्ण घोड़े सहित गालव ने माधवी को गुरू विश्वामित्र को अर्पित किया. माधवी के गर्भ से विश्वामित्र को अष्टक नामक पुत्र की प्राप्ति हुई. माधवी तब राजा ययाति को वापस लोटा दी गई. यानी महाभारत काल तक स्त्री अपने मानवी स्वरूप से च्युत होकर वस्तु में तब्दील हो चुकी थी. अब वह एक शेयर या बांड थी जिसे बार-बार भुनाया जा सकता था. बन्धक रखा जा सकता था.
माधवी की कथा पौराणिक काल में स्त्री के अमानवीकरण का एक वीभत्स उदाहरण है किन्तु इस प्रक्रिया की शुरूआत तो उसी समय हो गई थी जब व्यक्तिगत सम्पत्ति की अवधारणा प्रकट हुई. पुरूष के मन में यह परिकल्पना जागी कि उसकी अर्जित की हुई पम्पत्ति, उसकी गौयें उसकी भूमि उसके ही पुत्र को उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हो. इस परिकल्पना ने मातृसत्ता को उलट दिया. यह परिवर्तन मानवजाति द्वारा महसूस किए गए सबसे निर्णायक परिवर्तनों में से एक था.
एंगेल्स का कथन है, 'मातृसत्ता का विनाश स्त्री जाति का विश्व ऐतिहासिक पराजय था. अब घर के अन्दर भी पुरूष ने अपना आधिपत्य जमा लिया. स्त्री अपने पद से वंचित कर दी गई, जकड़ दी गई, पुरूष की वासना की दासी, सन्तान उत्पन्न करने का यंत्र मात्र बन कर रह गई.'
(फ्रेडरिक एंगेल्स : परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति, पृ0 64)
वैयक्तिक सम्पत्ति के उत्तराधिकार ने ही विवाह नामक संस्था को जन्म दिया. साथ ही यह भी सच है कि स्त्री भी यौन सम्बन्धों की अराजकता से उब चुकी थी. मार्गन ने 'ऐन्शियेन्ट सोसायटी' एकल परिवार संस्था के विकास के चरणों का उल्लेख करते हुए समूह एवं गोत्र यौन सम्बन्धों का वर्णन किया है. समूह के सारे पुरूष सारी स्त्रियों से प्रजा उत्पन्न करते थे या एक गोत्र के सारे पुरूष दूसरे गोत्र की सारी स्त्रियों से प्रजा उत्पन्न करते थे. रक्त सम्बन्धों का बंधन विकसित नहीं हुआ था. प्रजापति ब्रह्मा का अपनी पुत्री सरस्वती से सम्बन्ध या दूसरी पुत्री शतरूपा से मनु, मारीच आदि सात पुत्रों को जन्म देने को या ऋषि अगस्त्य का अपनी पुत्री लोपमुद्रा से विवाह को इस परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है.
यह सही है कि परिवार नामक संस्था के विकास की दृष्टि से एकल विवाह पद्धति को अपनाना ऐ प्रगतिशील कदम था. किन्तु एंगेल्स का मानना है कि 'आगे की दिशा में प्रत्येक गति के साथ ही साथ एक सापेक्ष पश्चगति भी होती है, जिसमें एक समूह का कल्याण और विकास दूसरे समूह को दुख देकर और कुचल कर सम्पन्न होता है.' (वही, पृ0 73) एकल विवाहवादी परिवार सर्वसत्तावादी पितृसत्तात्मक समाज में परिवर्तित हो गया. घर के प्रबन्ध का सार्वजनिक चरित्र जाता रहा. अब वह समाज का सरोकार नहीं रहा. यह एक निजी काम बन गया. पत्नी को सार्वजनिक उत्पादन के क्षेत्र से निकाल दिया गया, वह घर की मुख्य दासी बन गई. सम्पत्ति केवल वैध उत्तराधिकारी को प्राप्त हो इसके लिए सतीत्व और पतिव्रता जैसे सिद्धांत गढ़े गए. दासियों के लिए गढ़े गए हथकड़ियां और बेड़ियां धीरे-धीरे कंगल और कड़ा में ढल गईं. अपने गोठ के पशुधन और स्त्रीधन को पहचान के लिए चिह्न सिन्दूर के रूप में सुहाग के प्रतीक बना दिए गए. गुलामी की कन्डिशनिंग के ये अद्‌भुत उदाहरण हैं. एकल विवाह में प्रारम्भ से ही यह माना जाता रहा कि यह बन्धन सिर्फ स्त्रियों के लिए है पुरूषों की मर्यादा का बन्धन भी उसने नहीं माना.
ममता की कथा से यह बात स्पष्ट होगी. देवगुरू वृहस्पति, (जिन्हें श्रीमद्‌भागवत्‌,नवम कन्ध, बीसवां अध्याय, 36-39 श्लोक ने साक्षात्‌ ब्रह्म ही माना है) के अग्रज ऋषि उतथ्य थे. उतथ्य की गर्भवती पत्नी थी ममता जिनसे वृहस्पति ने रमण की कामना की. ममता ने गर्भ की दुहाई देकर मना करना चाहा तब भी उसे शापित करते हुए वृहस्पति ने बलपूर्वक गर्भाधान किया. शाप के कारण उतथ्य पुत्र दीर्घतमा जन्मांध उत्पन्न हुए. वृहस्पति ने ममता से उत्पन्न अपने पुत्र का नाम भरद्वाज रख क्योंकि वह उनका औरस पुत्र था और उत्थ्य का भी क्षेत्रय था. अतः वह दोनों का पुत्र, द्वाज था. यहां क्षेत्रज शब्द को स्पष्ट किया जाए तो पत्नी अपने पति की क्षेत्र यानी खेती मात्र थी.
देवराज इन्द्र की कामान्धता पौराधिक कथाओं के प्रिय विषय रहे हैं किन्तु वपुष्टमा के मामले में सारी सीमाएं लांघ दी गईं. वपुष्टता काशीराज सुवर्णवर्मा की पुत्री थी, जिसका विवाह राजा परीक्षित पुत्र जनमेजय के साथ हुआ था. परीक्षित अर्जुन के पौत्र थे और अर्जुन इन्द्र के पुत्र. तब भी अवश्मेघ यज्ञ के अवसर पर इन्द्र ने वपुष्टमा के साथ सहवास किया. (महाभारत : आदिपर्व : 44.8.11)
तात्पर्य यह कि स्त्री मात्र भोग की एक वस्तु थी, एक रमणीय यंत्र मात्र. पुरूष के लिए कोई भी बंधन, धर्म, नैतिकता उसकी इच्छापूर्ति में बाधक नहीं बनी. पुरूष के इसी स्वैराचार का प्रगटीकरण कभी इमराना के अनपढ़ ससुर में, कभी महाविद्वान नटराजन में होता है, जो अनगिन दुर्घटनाओं के प्रतीक मात्र हैं. पौराणिक कथाओं में वह सवर्णमुद्राओं, गौओं के साथ दान दी जाती हुई दिखती है ओर अतिथियों को स्वागत रूप में भोग हेतु प्रस्तुत की जाती हुई भी. यथा : मित्रसह राजा ने अपनी प्रिय पत्नी मदयंती मुनि वशिष्ठ को अर्पित की और स्वर्गलोग को प्राप्त किया. (महाभारत : शान्ति पर्व : 234)
महाभारत के अनुशासन पर्व में सुदर्शन की कथा है जिसमें वह अपनी पत्नी ओघवती को गृहस्थाश्रम धम्र की मर्यादा समझाते हुए अतिथि को रमण के लिए प्रस्तुत होने की भी शिक्षा देता है.
प्लूटार्क ने लिखा है कि एथेंस नगर के दार्शिनिक सुकरात ने अपनी पत्नी झांटिप को अपने मित्र अल्कि वियाडिस को रमण हेतु सौंपा.
सामन्तकाल में स्त्री का घुटन अपने चरम पर पहुंचा. सामन्ती समाज की झूठी मर्यादा अपने विकृत रूप में कन्या शिशु हत्या के रूप में प्रकट हुई. अकड़ी हुई मूंझे और ऊंची पगड़ियां बेटी के लिए झुकने को तैयार नहीं थीं, अतएव कुल में बेटी ही नहीं चाहिए थी. कन्या शिशु की हत्या पहला उल्लेख 1789 में सर जोनाथन डंकन के लेख मे मिलता है. वे वाराणसी के आयुक्त थे. उनहोंने राजकुमार राजपूतों में कन्या शिशु की हत्या का विवरण दिया जो जन्मते ही घर के पिछवाड़े छोड़ दी जाती थी.
1846 में प्रथम पंजाब युद्ध भी समाप्ति के बाद विजयी सैनिकों ने जब गढ़े धन की खोज में घरों के आंगन एवं पिछवाड़े की जमीनों की खुदाई की, तो उन्हें हर घर में ढेरों शिशुओं के कंकाल मिले. वे उन घरों की कई पीढ़ियों की कल्या शिशुओं के कंकाल थे. जहां राजपूत कल्या शिशु हत्या की घिनौनी प्रथा का पालन चोरी-छिपे करते थे, वहीं सिख अपनी चार सौ वर्षो से चली आ रही इस परम्परा की चर्चा में गर्व महसूस करते थे. जनगणना के आंकड़े यह बताते हैं कि 18वीं सदी हो या 21वीं सदी इस दिशा में परिवर्तन नहीं हुआ है. 1901 की जनगणना में पंजाब में सारे भारत की तुलना में सबसे कम स्त्रियां पाई गई. वहां प्रति हजार पुरूषों पर मात्र 832 स्त्रियां थीं. 2001 की जनगणना में भी यह पल्लवित हो रहे हैं उसका यह चमकता हुआ उदाहरण है.
सिमोन द बोउवा ने अपनी पुस्तक 'द सेकेंड सेक्स' में स्त्री को 'अन्य' की संज्ञा दी थी. उनका मानना था कि वह मात्र ऑब्जेक्ट यानी कर्म है कर्त्ता नहीं. कर्त्ता, सब्जेक्ट पुरूष है. वे झल्ला कर पूछती हैं कि स्त्री क्या है, क्या गर्भ? किन्तु उपभोक्तावादी पूंजी ने तो उसे गर्भ भी नहीं रहने दिया केवल त्वचा या खाल में तब्दील कर दिया है. प्रसाधन उद्योग का यह तंत्र की त्वचा के मामले में एक नए नस्लवादी की भी रचना करता चलता है जहां सांवली या काली-भूरी त्वचा के लिए जगह नहीं है. सुधीश पचौरी के अनुसार, 'समूचा प्रसाधन तंत्र मूलतः एक खाल तंत्र में तब्दील हो गया है.'
पूंजीवादी समाज ने सामन्ती समाज की अंधेरे में घुटती असूर्यंपश्याओं को थोड़ी-सी आजादी तो दी है किन्तु अपनी शर्त पर वह रमणीय वस्तु अब भी है किन्तु रंगीन पैकिंग से सजी हुई, जिसकी रमणीयता का उपयोग धूर्तता से ब्लेड से लेकर कार तक के बेचने के लिए किया जा रहा है.
अलका सरावगी की चिन्ता व्यर्थ नहीं है कि 'स्त्री को आत्मविकास और बराबरी के लिए लड़ते हुए एक नजर इस बात पर रखनी चाहिए कि क्या यह बराबरी एक नया फ्रिज या वाशिंग मशीन खरीदने के लायक बनने के लिए तो नहीं है. यानी यह बराबरी वह उसी उपभोक्ता संस्कृति का पुर्जा बनने के लिए तो नहीं मांग रही है, जिसका पुर्जा पुरुष पहले से ही इस तरह बना हुआ है कि उसी जिंदगी कोल्हू के बैल से अधिक नहीं है?'
इकोफेमिनिज्म की चर्चा में वंदना शिवा इस बात का उल्लेख करती हैं कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने प्रकृति और स्त्री को एक साथ तबाह किया है. इसका विरोध भी स्त्री ही चिपको आनदोलन, नर्मदा आनदोलन में करती दिखती है. कोयलकारों, नेतरहाट फाररिंग रेंज, पचुआरा आन्दोलनों को भी इससे जोड़ा जा सकता है. उधर 21वीं सदी में भी लोकतांत्रिक सत्ता का सर्वोच्च प्रतीक संसद स्त्री को आधा नहीं एक-तिहाई हक देने में भी सकुचा रहा है.
पुरूष के वर्चस्ववादी सत्ता के मुक्त, स्वतंत्र, प्रतिभा से दमकती, आत्मविश्वास से लबालब व्यक्तित्व की स्त्री-जाति का स्वप्न अभी भी भविष्य के गर्भ में है. सच है कि इसके लिए गार्गी जैसे असीम साहस की आवश्यकता पडेग़ी जब जनक के दरबार में शास्त्रार्थ करते हुए पति याज्ञवलक्य ने धमकी दी थी कि वह अब प्रश्न नहीं पूछे अन्यथा उसके सिर के टुकड़े हो जाएंगे. गार्गी ने गीदड़ भभकी की परवाह न करते हुए प्रश्न पूछना जारी रखा और याज्ञवलक्य को अपना दर्शन प्रतिपादित करने पर मजबूर होना पड़ा. प्रतिभा से दपदपाती और स्वतंत्र व्यक्तित्व वाली स्त्री के उदय से विवाह नामक संस्था और उज्ज्वल होगी क्योंकि पत्नी के रूप में पुरूष को दासी नहीं, सखा प्राप्त होगी जिसकी लोहिया ने द्रौपदी-कृष्ण के सम्बन्धों में गौरव से चर्चा की है.
अन्त में मेरी कविता 'साइकिल सवार लड़की' की आखिरी पंक्तियों की चर्चा जिसमें यह स्वप्न है कि-
'नवादित सूर्य के प्याले में, कूंची डुबो कर
सुनहरा रंगेगी सारा आकाश
चांद को मुट्‌ठी से निचोड़
दूधिया कर देगी सातों समुन्द्र
सप्तर्षि के छत्ते से, शहद चुआ कर
मीठा बनाएगी नदियों का पानी
हरे होंगे सारे ठूंठ
पक्रो सपनों का लाल-लाल फल.'
इस लाल फल के पकनेकी प्रतीक्षा रहेगी.
पल प्रतिपल से साभार

राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/26/2010 05:58:00 PM

राष्ट्र, आधुनिकता, समुदाय और इतिहास लंबे समय से विवादग्रस्त विषय रहे हैं. प्रस्तुत लेख हिंदी समुदाय और उससे संबंधित इतिहास की पृष्ठभूमि की टोह में इन अवधारणाओं से पुनः दो-चार होते हुए इस संबंध में नई सोच को प्रस्तावित करता है। इस लेख की कई स्थापनाओं से बहस व असहमतियां हो सकती हैं. हम उन बहसों और असहमतियों को सार्थक चर्चा के लिए आमंत्रित करते हैं। -संपादक, हंस


प्रसन्न कुमार चौधरी

राष्ट्र, राष्ट्र-राज्य और राष्ट्रवाद
सन 1648. तीस साला (1618-1948) युरोपीय युद्ध का अंत वेस्टफेलिया की संधि में हुआ. इस युद्ध में एक ओर कैथोलिक झंडे तले पोप की अगुवाई में स्पेन और आस्ट्रिया का हैब्सबर्ग राजघराना था और उसके साथ कैथोलिक जर्मन राजकुंवर थे, तो दूसरी ओर जर्मन प्रोटेस्टेंट राज्यों के साथ बोहेमिया, डेनमार्क, स्वीडन और नीदरलैंड्‌स के प्रोटेस्टेंट राज्य थे, धर्म सुधार आन्दोलन की पृष्टभूमि में चले इस युद्ध का हृदयस्थल जर्मन क्षेत्र था. इस युद्ध की खास बात यह थी कि कैथोलिक फ्रांस प्राटेस्टेंट राज्यों के पक्ष में उतर आया था. फ्रांस के इस कदम के पीछे हैब्सबर्ग घराने के साथ उसकी प्रतिद्वंद्विता थी. वेस्टफेलिया की संधि ने जर्मनी के बंटवारे पर मुहर लगा दी थी. बाद में, नेपोलियन के पतन के बाद संपन्न वियेना कांग्रेस (1815 ई.) ने भी जर्मनी के बंटवारे को जारी रखा.

बहरहाल, इसी वेस्टफैलियन शांति से यूरोप में राष्ट्र-राज्यों वाली व्यवस्था अस्तित्व में आई. लेकिन इस 'शांति' को ऑरवियन डबलस्पीक के रूप में लिया जाना चाहिए. वेस्टफैलियन व्यवस्था ने राष्ट्र-राज्यों के बीच वर्चस्व के लिए, यूरोप में और उपनिवेशों में, युद्धों के एक नए सिलसिले का आगाज किया, जो अनेक छोटे-छोटे युद्धों, नेपोलियन के अभियानों, फ्रैंको-प्रशियन युद्ध (1870-71) से होते हुए बीसवीं सदी में दो विश्व-युद्धों तक, ओर उसके बाद भी, जारी रहा.

राष्ट्र-राज्यों के रूप में यूरोप के नए उदीयमान मध्यवर्ग (बुर्जुआ वर्ग) को आखिरकार संप्रभुता का वह माध्यम मिल गया था जिसके लिए वे लंबे समय से संघर्ष करते आ रहे थे. मजहबी सोपानों पर आधारित संप्रभुता का सामंती स्वरूप उनके विकास में बाधक था और उससे छुटकारा पाने के क्रम में संप्रभुता के कुछ संक्रमणकालीन रूप भी सामने आए-खासकर निरंकुश राजतंत्रों के शासन-काल में.

राष्ट्र-राज्यों के विकास की इसी प्रक्रिया में राष्ट्रवाद की विचाधारा अस्तित्व में आई. राष्ट्र को इस ऐसे समुदाय के रूप में परिभाषित किया गया जिसकी समान भाषा हो, एक खास भौगोलिक क्षेत्र में जिसके लोगों के बीच रक्त-संबंधों का एक जैविक नैरंतर्य हो, जीविकापार्जन की प्रक्रीया में एक समान ऐतिहासिक अनुभव हो, और इन सबके परिणामस्वरूप जिनका एक समान मनोवैज्ञानिक गठन हो. पंथ पर आधारित संप्रभुता का स्थान अब राष्ट्रीय संप्रभुता ने ले लिया.

राष्ट्रवाद ने यूरोप के नए पूंजीपति वर्ग को अपना घरेलू (राष्ट्रीय) बाजार संगठित और संरक्षित करने का तथा 'राष्ट्रीय हित' के लिए दूसरे देशों तथा उपनिवेशों पर अपना आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक वर्चस्व कायम करने का एक सशक्त वैचारिक आधार प्रदान कर दिया. राष्ट्र-राज्य के साथ-साथ एक अमूर्त राष्ट्र-जनता का भी निर्माण किया गया-एक ऐसी राष्ट्र-जनता जिसके हित के लिए, उसके गौरव और सम्मान के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने को तैयार रहती है. इस तरह राष्ट्र के अंदरूनी भेदों, टकरावों और संघर्षों को पृष्ठभूमि में धकेलकर इस वर्ग ने अपने वर्चस्व के हित में, देश और विदेश में, समय-समय पर अमूर्त राष्ट्र-जनता की मूर्त राष्ट्र-जनता के रूप में गोलबंदी की. नवजागरण, ज्ञानोदय और धर्म-सुधार के साथ-साथ राष्ट्र-राज्य भी आधुनिक युग का प्रतीक बन गया.

कुल मिलाकर, सामंतवाद के पराभव के साथ यूरोप में जिस नए, आधुनिक युग की शुरूआत हुई, उसकी शिनाख्त निम्नलिखित परिघटनाओं से की जाती है- नवजागरण, धर्म-सुधार, ज्ञानोदय, न्यूटोनियन (वैज्ञानिक) क्रांति, मैन्युफैक्चरिंग और आगे चलकर औधोगिक क्रांति, विश्व-व्यापार और उपनिवेशीकरण, बड़े पैमाने पर शहरीकरण और नागर जीवन, राष्ट्र-राज्य, सेक्युलर विचारधाराओं का उत्थान, हिंसात्मक जन क्रांति, गणतंत्रवाद, गद्य लेखन और खासकर उपन्यास विधा का विकास.

राष्ट्रवाद और यूरोप


राष्ट्रवाद की विचारधारा ने सर्वप्रथम यूरोप में ही वर्चस्व के लिए युद्धों के एक नए युग का सूत्रपात कर दिया. यूरोप के कमजोर राष्ट्रों को वर्चस्वशाली राष्ट्रों की बंदरबांट का शिकार बनना पड़ा.
    यूरोप का एक भी देश ऐसा न था, जहां दूसरी राष्ट्रीयता के लोग न बसे थे. उनमें से तो अधिकांश सैकड़ों वर्षों के इतिहास में उन राष्ट्रों के साथ इस तरह घुलमिल गए थे कि अपने मूल राष्ट्र-राज्यों में वापस जाने की बात वे सोच भी नहीं सकते थे. इतिहास में विभिन्न कारणों से आबादी का स्थानांतरण होता रहा है-खासकर, जीविकोपार्जन के लिए अधिक उपयुक्त स्थल की तलाश में, या फिर किसी शासकीय दमन से बचने के निमित. फलतः राष्ट्र-राज्यों के सीमाएं प्रायः संबंधित राष्ट्रीयताओं की स्वाभाविक सीमाओं से मेल नहीं खातीं. जर्मन और फ्रेंच भाषी अच्छी-खासी आबादी जर्मनी और फ्रांस के बाहर बसी थी. फ्रांस के ब्रितानी में केल्ट आबादी निवास करती थी. ब्रिटेन में हाइलैंड गेल्स और वेल्स आबादी थी जो निस्संदेह इंगलिश राष्ट्रीयता से भिन्न थी. स्विट्‌जरलैंड में अच्छी-खासी संख्या में जर्मन और फ्रेंच रहते थे. पोलैंड में मुख्य पोल आबादी के साथ उत्तरी (बाल्टीक) प्रदेशों में लिथुआनियन बसते थे, तो पूरब में 'व्हाइट रसियन्स' और दक्षिण में 'लिटिल रसियन्स' निवास करते थे.

    उपर्युक्त तथ्यों से यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्र-राज्य के सिद्धांत ने किस तरह यूरोप की तत्कालीन प्रमुख शक्तियों के हाथों विभिन्न देशों में हस्तक्षेप का शक्तिशाली हथियार सौंप दिया था. पैनस्लाविज्म के नाम पर, राष्ट्रीयताओं के उसूल की दुहाई देकर, रूस ने पूरे पूर्वी यूरोप में-सर्ब, क्रोट, रूथेनियन, स्लोवाक, चेक, और तुर्की, हंगरी और जर्मनी में कभी बसी स्लाव आबादी वाले क्षेत्रों में-अपने पंजे फैला द्यरखे थे. एक देश में बसे दूसरी राष्ट्रीयता के लोग वर्चस्व की लड़ाई के मोहरे बना दिए गए और इन 'राष्ट्रीय अल्पसंख्यकों' को शक की निगाह से देखा जाने लगा. यहां, इस छोटे आलेख में, तत्कालीन यूरोप की पूरी तस्वीर रखना तो संभव नहीं, तथापि उदाहरण के बतौर पोलैंड का संक्षिप्त जिक्र किया जा सकता है.

    रूस, प्रशिया और आस्ट्रिया ने तीन बार (1772, 1793 और 1795 में) पोलैंड का आपस में बंटवारा किया. पोलैंड का यह बंटवारा जिस तरह संपन्न हुआ, वह भी कम दिलचस्प नहीं. अठारहवीं सदी फ्रेंच एनलाइटेनमेंट (ज्ञानोदय) की सदी भी थी. विदेरो, वाल्टेयर, रूसो और अन्य फ्रांसीसी विचारकों ने यूरोप में 'ज्ञानोदय' का जो आभामंडल तैयार कर रखा था, उससे रूस भी अछूता नहीं था. रूस की जारीना कैथरीन द्वितीय ने पोलैंड के विघटन के पक्ष में 'सेलिब्रिटी इंडोर्समेंट' की पूरी व्यवस्था कर रखी थी. थोड़े समय कि लिए ही सही, कैथरीन द्वितीय के दरबार को यूरोप के 'एनलाइटेंड' लोगों का मुख्यालय बना दिया गया-खासकर फ्रेंच विचारकों का. वह मास मीडिया का युग नहीं था, फिर भी जारीना ने यूरोपीय जनमत का पूरा ख्याल रखा. उसी दरबार में जारीना ने अपने राष्ट्रीयता के उसूल मजहबी सहिष्णुता और उदारवादी विचारों की घोषणा की. महारानी का जादू ऐसा चला कि खुद वाल्टेयरा और अन्य फ्रेंच विचारकों ने कैथरीन की प्रशंसा में कसीदे पढ़े, उदारवादी विचारों का हृदय-स्थल और मजहबी सहिष्णुता का अलमबरदार घोषित कर दिया.

    'ज्ञानोदय' द्वारा अनुमोदित राष्ट्रीयता के उसूल को रूस, प्रशिया और आस्ट्रिया द्वारा जो व्यावहारिक रूप दिया गया, उसका परिणाम हुआ पोलैंड का विघटन. पोलैंड के खात्मे के खिलाफ यूरोप में कहीं कोई आवाज नहीं उठी. उल्टे, लोग इस बात पर चकित थे कि रूस ने प्रशिया और आस्ट्रिया के इस भूभाग का इतना बड़ा टुकड़ा देकर कितनी दरियादिली दिखाई है.

    इस प्रसंग का समापन करने से पहले रूस की प्रगतिशील उदारता और मजहबी सहिष्णुता पर भी नजर दौड़ाई जा सकती है. यह सर्वविदित है कि तत्कालीन रूस में भूदास-प्रथा अपनी बर्बरताओं के साथ विद्यमान थी, रूस अपने आस-पड़ोस के देशों को हड़पता रहता था या हड़पने की फिराक में रहता था, ग्रीक ऑथोडॉक्स चर्च के अलावा रूस में किसी और मजहब पर पाबंदी थी और पंथद्रोह अपराध माना जाता था. यही रूस पोलैंड में मजहबी सहिष्णुता का हिमायती बन बैठा था. पोल रोमन कैथेलिक थे, लेकिन पूर्वी प्रांतों के 'लिटिल रसियन्स' ग्रीक मतावलंबी थे. ये ग्रीक मतावलंबी मुख्यतः भूदास थे और उनके स्वामी मूख्यतः रोमन कैथोलिक. इन्हीं 'उत्पीडीत ग्रीक मतावलंबी लिटिल रसियन्स' के हित में रूस ने हस्तक्षेप का दावा किया था. पोलैंड के अधिग्रहण के बाद ये भूदास पूनः अपने स्वामियों के हवाले कर दिए गए. ('दि कॉमनवेल्थ' के संपादक के नाम फ्रेडरिक एंगेल्स का पत्र : 31 मार्च, 1866.)

    प्रसंगवश, 1937 में हिटलर ने जब तत्कालीन चेकोस्लोवाकिया के जर्मन बहुल सुडेटनलैंड पर कब्जा कर लिया, तो ब्रिटेन ने कोई प्रतिरोध नहीं किया. ब्रिटिश प्रधानमंत्री नेविल चेम्बरलैन की इस कार्रवाई को इतिहास में नाजीवाद के प्रति तुष्टीकरण की संज्ञा दी जाती है. कहा जाता है कि नाजियों के विस्तार की दिशा को पूरब (सोवियत संघ) की ओर मोड़ देने के लिए ऐसा किया गया. बहरहाल, इस तुष्टीकरण का एक कारण खुद यूरोपीय राष्ट्रवाद था. इस राष्ट्रवादी नीति के तहत यूरोप के कई प्रभावशाली राष्ट्र-राज्य राष्ट्रीय समायोजन या पुनर्गठन के तहत ऐसी कार्रवाई करते रहते. ब्रिटेन खुद आयरलैंड को आजादी देने के बाद भी उसके उत्तरी हिस्से (अल्सटर) पर इसलिए कब्जा जमाए हुए था कि वह प्रोटेस्टेंट-बहुल क्षेत्र था, जबकि आयरलैंड की मुख्य आबादी रोमन कैथोलिक थी. इस प्रकार, नाजियो की कार्रवाई का विरोध करने का उनके पास कोई नैतिक आधार नहीं था.

यूरोप और शेष दुनिया

शेष दुनिया में यूरोप के वर्चस्वशाली राष्ट्र-राज्यों ने जो कहर ढ़ाया, उसका ब्यौरा कई खंडों में भी नहीं समा सकता. राष्ट्र के रूप में यूरोपीय देशों की 'आत्म-पहचान' के शेष दुनिया के अनेक जनों और देशों की पहचानों को रौंदने तथा मिटाने की प्रक्रिया से अभिन्न रूप से जुड़ी थी. यहां उसकी एक संक्षिप्त झलक ही प्रस्तुत की जा सकती है.

    1451 से 1600 ई. के बीच करीब पौने तीन लाख अफ्रीकी दासों को यूरोप और अमेरिका भेजा गया. सत्रहवीं सदी में (खासकर कैरेबियाई द्वीपसमूह. में ईख की खेती में बढ़ती मांगों को पूरा करने के लिए) यह संख्या बढ़कर करीब 13,41,000 तक जा पहुंची. अठारहवीं सदी में (1701 से 1810 ई. के बीच) साठ लाख से अधिक अफ्रिकी दासों को अफ्रीका से अमेरिका ले जाया गया. वेस्टइंडीज की उपन्यासकार जमैका किनकैड लिखती हैं कि क्रिस्टोफर कोलम्बस के पांव धरने के बारह साल के भीतर ही इस भूभाग में निवास करने वाले करीब दस लाख लोग मौत के गाल में समा चुके थे. 'अफ्रीका से अमेरिका की समुद्री यात्रा के दौरान जितने अफ्रीकियों को जहाज से समुद्र में फेंक दिया गया, उसे देखते हुए यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अटलांटिक महासागर अफ्रीका का ऑशवित्ज था.'

    यूरोपीय राष्ट्रों के बीच अफ्रीका की लूट और उसके औपनिवेशीकरण की प्रतिद्वंद्विता उन्नीसवीं सदी के अंत तक चलती रही. अफ्रीका में तब मौजूद कई साम्राज्यों-अशांति, घना और इदो साम्राज्यों की हस्ती मिटा दी गई. नाइजीरिया की हौसा, योरूबा और इगबो संस्कृतियां भी बर्बरतापूर्वक नई सभ्यता को भेंट चढ़ा ही गई. सोलहवीं सदी के आरंभ में एज्टेक साम्राज्य की राजधानी टेनोखटिटलान (मेक्सिको सिटी) एक भरा-पूरा महानगर था-स्पेन के सेविल या कारडोबा जैसा ही विशाल. सम्राट मोंटेजुमा द्वितीय के इस साम्राज्य की आबादी थी करीब डेढ़ करोड़. 1519 ई. में हरनांडो कोर्टेस की अगुआई में जब एक स्पेनी सैन्यदल यहां पहुंचा, तो वे जंगली लोगो की जगह अत्यंत खूबसूरत, मंदिरों तथा पिरामिंडों वाले महानगर को देखकर चकित रह गए. जलापूर्ति की जटिल प्रणाली से युक्त इस महानगर के बाजार में दुनिया भर में मिलने वाली लगभग सारी चीजें सजी थीं- और औसतन साठ हजार लोग वहां रोज खरीद-बिक्री के लिए जमा होते. इस डेढ़ करोड़ आबादी वाली सभ्यता की अपनी भाषा थी, अपना पंचांग था, अपनी उपासना-पद्धति थी और अपनी केंद्रीय सरकार थी. मोंटेजुमा द्वितीय के विशाल राजप्रासाद में पूरा स्पेनी सैन्यदल समा सका  था.

    'सभ्य' यूरोप के कोर्टेस ने 'बर्बर' अमेरिका के मोंटेजुमा को अपना सारा सोना सौंप देने या फिर जान से हाथ धोने की धमकी दी. मोंटेजुमा इस तरह का आदमी पहले कभी नहीं देखा था. थोड़े असमंजस के बाद उसने अपना सारा सोना कोर्टेस को सौंप दिया. लेकिन कोर्टेस ने अपना वायदा नहीं निभाया. उसने मोंटेजुमा को मार डाला और टेनोखटिटलान की घेराबंदी कर दी. सारे मार्ग बंद कर दिए गए. जलापूर्ति प्रणाली अवरूद्ध कर दी गई. अस्सी दिनों के भीतर इस महानगर के दो लाख चालीस हजार बाशिंदे भूख से तड़पकर मर गए. दो वर्षों के अंदर (1521 ई. तक) पूरा एज्टेक साम्राज्य (जिसके जड़ें ईसा से कई शताब्दी पूर्व तक फैली हुई थीं) धराशायी हो गया.
    करीब ग्यारह वर्षों बाद 1521 ई. में यही कहानी इंका साम्राज्य के साथ दुहराई गई. फ्रांसिस्को पिजारियो की अगुवाई में स्पेनी सेना ने इंका साम्राज्य का सारा सोना हथियाने बाद इंका राजा अताहुआल्पा को मौत के घाट उतार दिया. दो साल के भीतर स्पेनियों ने इंका साम्राज्य को भी नेस्तनाबूद कर दिया. (ओरी ब्रेफमैन और रॉड ए. बेकस्ट्रॉम, 'दि स्टारफिश एंड दि स्पाइडर', लंदन, 2006) भारत, चीन और एशिया के अन्य देशों के उदाहरण हम यहां छोड़ दे रहे हैं.
    लूट, फरेब, धोखधड़ी, जनसंहार और अकल्पनीय बर्बरता के जरिए 'सभ्य' यूरोप के शक्तिशाली राष्ट्र-राज्यों ने एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिका में अपनी विजय पताका फहराई.
   
राष्ट्रवाद की सैद्धांतिकी


राष्ट्र-राज्यों के विकास के साथ-साथ राष्ट्र तथा राष्ट्रीयता संबंधी सैद्धांतिकी का भी विकास हुआ. इस सैद्धांतिकी में यूरोप के लगभग सभी प्रमुख विचारकों ने अपना योगदान दिया. तथापि इस संदर्भ में जो नाम प्रमुखता से उद्‌धृत किए जाते रहे हैं, वे हैं : ज्यों बोदिन, गियामबातिस्ता विचो, योहान्त गॉटफ्राइड हर्डर, एमानुएल-जोसेफ सिएस,थॉमस हॉब्स, हेगेल, कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स, मैक्स वेबर, लेनिन, रोजा लक्जमर्ग आदि. इस सैद्धांतिकी के विभिन्न पक्षों पर चर्चा में प्रायः जे.एस. मिल, अंटोनियो ग्राम्शी, मिशेल फूको, थियोडोर अदोर्नो और बेनिडिक्ट एंडरसन आदि भी उद्‌धृत किए जाते हैं. चूंकि राष्ट्र यूरोप में आधुनिकता का अंदरूनी अंतरविरोध भी इस विमर्श में प्रतिबिंबित हुआ.
   इतिहास में जीविकोपार्जन की विभिन्न रूपों में पुनस्संगठन होता रहा है. शिकारी और फलसंग्राहक दौर में मातृसत्ताक और पितृसत्ताक जनों एवं आगे चलकर, जनों के संघ के रूप में आई. मानव समुदाय का आदिम रूप सामने आया. जनों की क्षेत्रीय संप्रभुता सरदारी-प्रथा (चीफडम) के रूप में अस्तित्व में आई. मानव समुदाय के इस रूप की विभिन्न भौगोलिक अंचलों में अपनी विशिष्टताएं भी रहीं. कृषि युग में कृषि-कर्म-जनित श्रम-विभाजनों पर आधारित जनपदीय समाज के रूप में, मानव समाज का पुर्नगठन हुआ, जिसकी मूल इकाई ग्राम थे. इस युग में भू-स्वामियों की संप्रभुता जनपदीय राजतांत्रिक प्रणाली और फिर साम्राज्य के रूप में सामने आई. विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में इस प्रणाली के भी विशिष्ट रूप विकसित हुए. रक्त-संबंधों पर आधारित जनों के सदस्यों का कृषि युग में राजा की प्रजा के रूप में रूपांतरण हुआ.

    विनिमय के युग में यूरोप के पूंजीवादी देशों में, मानव समुदाय का पुनस्संगठन राष्ट्रों के रूप में सामने आया और इस नए वर्ग की संप्रभुता राष्ट्र-राज्य, और इन राष्ट्र-राज्यों की औपनिवेशिक प्रणाली के रूप में फलीभूत हुआ. बहरहाल, मानव समुदाय का यह रूप यूरोप की विशिष्ट परिस्थियों की उपज था, जहां सामंती कृषि युग में रोमन चर्च संप्रभुता सर्वोपरि थी-मजहबी सोपानों पर आधारित जनपदीय राज्य तथा रजवाड़े चर्च की संप्रभुता के अधीन थे. (दरअसल जर्मनी के एकीकरण की दिशा मे उठाया गया पहला महत्वपूर्ण कदम 1834 ई. में कई जर्मन राज्यों द्वारा गठित 'कस्टमस यूनियन' था.)
   
इस प्रकार, राष्ट्र एक ऐतिहासिक उपज था. वह यूरोप मे, पूंजी के युग में, मानव समुदाय का एक विशिष्ट रूप था. लेकिन उसे मानव समुदाय के 'स्वाभाविक रूप' के बतौर पेश किया गया जैसे मानव जाति ने समुदाय के रूप में अपना अस्तित्व का स्वाभाविक रूप आखिरकार पा लिया था. इसे विशिष्ट युरोपीय रूप को भी सर्विक रूप देते हुए इन पूंजीवादी राष्ट्र-राज्यों ने इसे शेष दुनिया पर भी थोपने की कोशिश की. इस कोशिश, और पूंजीवादी-साम्राज्यवादी राष्ट्रों की प्रतिद्वंद्विता के परिणामस्वरूप अफ्रीका के कई देश-नाइजीरीया, कांगा, अंगोला, रूवांडा, बुरूंडी आदि लंबे समय तक रक्तपातपूर्ण गृहयुद्धों का शिकार बने जिनमें दसियों लाख आबादी मौत के घाट उतार दी गई. अन्य जगहों पर भी कमोवेश ऐसी ही स्थिति थी. भारत-पाक विभाजन, इजराइल-फिलिस्तीन समस्या आदि भी इसी का परिणाम था. अफ्रीका में निर्यात किया गया राष्ट्र-राज्य आज सोमालिया में दम तोड़ रहा है. अफगानिस्तान और इराक में 'राष्ट्र-निर्माण' का कहना ही क्या?

    अतः माइकल हार्ट और अंटोनियो नेग्री ने ठीक ही लक्षित किया है : सवाल यह नहीं है कि राष्ट्र. यह कल्पित समुदाय है अथवा नहीं, बल्कि यह है कि समुदाय के रूप में मल्पना का एकमात्र जकरया बन गया राष्ट्र. यह कल्पना की दरिद्रता थी-उसे बस एक खास रूप में सीमित कर देना था (माइकल हार्ट और अंटोनियो नेग्री, 'एम्पायर,' लंदन, 2001) विनिमय के युग में भी मानव-समुदाय देश-काल भिन्नताओं के कारण अलग-अलग रूप ले सकता है और उसे लेना चाहिए-इस संभावना को कल्पना के स्तर पर भी खारिज कर दिया गया.
   
उपर्युक्त सोच का स्वाभाविक परिणाम यह था कि यूरोप के कतिपय राष्ट्रवादी विचारकों की नजर में स्वतंत्रता के बाद भारत का बिखराव, उसका 'बाल्कनाइजेशन' तय माना गया. उनके अनुसार, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष में बनी भारत की विभिन्न राष्ट्रीयताओं की एकता स्वतंत्रता के बाद टिकने वाली नहीं थी. इसीलिए उन्हें उम्मीद थी कि स्वतंत्रता के कुछ दशकों बाद ही भारत में कई स्वाधीन राष्ट्र-राज्य बन जाएंगे.
   
बहरहाल, आजादी के करीब बासठ वर्षों बाद, कश्मीर घाटी और उत्तर-पूर्व के कुछ क्षेत्रों की छोड़कर, शेष भारत की एकता, अपनी तमाम विविधताओं के बावजूद और सुदृढ़ हुई है. दूसरी ओर यूरोप में 1648 ई. के बाद से ही शृरू राष्ट्र-राज्यों के बनने-बिगड़ने का दौर साढ़े तीन सौ साल बाद आज भी बदस्तूर जारी है. बीसवीं सदी के अंतिम दशक और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में सबसे ज्यादा नए राष्ट्र-राज्य यूरोप में ही बने हैं. कई पश्चिमी लेखक इसे यूरोप के 'बाल्कनाइजेशन' का दौर भी कहते हैं.

    1922 ई. में रूस के जो पूर्व-उपनिवेश 'स्वेच्छा से' सोवियत संघ में शामिल हुए थे, वे 1992 ई. के बाद (सोवियत संघ के पतन की स्थिति में) 'स्वेछा से' राष्ट्रो के आत्म-निर्णस के अधिकार का उपयोग करते हुए, रूस से नाता तोड़ बैठे. फलतः पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया में अनेक राष्ट्र-राज्यों का पुनरोदय हुआ-एस्टोनिया, लाटविया, लिथुआनिया, बेला रूस (बेला रूस को पहले भी संयुक्त राष्ट्र संघ में वोट का अधिकार प्राप्त था), उक्रेन, मोल्डाविया, जार्जिया, अजरवैजान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान. खुद रूसी फेडरेशन को भीषण रक्तपूर्ण चेचेन विद्रोह से निपटना पड़ा. इन राष्ट्र-राज्यों के पुनरोदय की पृष्ठभूमि में यह क्षेत्र अमेरिका-नाटो और रूस के बीच तनावपूर्ण राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का क्षेत्र बना हुआ है. जार्जिया के दो बागी प्रदेशों अबखाजिया तथा दक्षिण ओसेटिया को लेकर रूस-जार्जिया युद्ध में, और सर्बिया से स्वतंत्रता की घोषणा कर चुके कोसोवो में भी, यह खुलकर प्रकट हुआ. उक्रेन में भी गैलीसिया, बुकोविना और उप-कार्पेथियन क्षेत्र में बसी आबादी (जो मूल उक्रेनियन आबादी से भिन्न है) पृथक राष्ट्र-राज्य के लिए प्रयासरत है. उक्रेन का ट्रांसनीस्त्र क्षेत्र रूस के सैनिक पहरे में है.

    कम्युनिस्ट शासन की समाप्ति के बाद युगोस्लाविया कि भी सारे संघटक अब स्वाधीन राष्ट्र-राज्य बन चुके हैं-सार्बिया, मोंटेनीग्रो, क्रोएशिया, स्लोवेनिया, बोस्निया-हर्जेगोविना और मेसीडोनिया. इन राष्ट्र-राज्यों के गठन की प्रक्रिया अनेक जगहों पर, खासकर बोस्निया-हर्जेगोविना और कोसोवो में, काफी रक्तपातपूर्ण रही. स्वाधीन मेसीडोनिया और यूनान के मेसीडोनिया प्रदेश के एकीकरण की मांग के कारण मेसीडोनिया-यूनान संबंध भी तनवग्रस्त है. चेकोस्लोविया भी अब दो राष्ट्र-राज्यों-चेक और स्लोवाकिया में बंट चुका है.

    बहरहाल, यह प्रक्रिया सिर्फ पूर्व कम्युनिस्ट-शासित देशों तक ही सीमित नहीं हैं जैसा कि हम पहले. देख चुके हैं, यूरोप में राष्ट्र-राज्यों के स्वाधीन विकास ने अनेक राष्ट्रीय युद्धों और बीसवीं सदी में यूरोप की धरती पर दो-दो विश्वयुद्धों को जन्म दिया. 1950 के दशक में यूरोपीय आर्थिक समुदाय, और फिर यूरोपिय संघ के गठन का एक उद्देश्य नाजीवाद जैसी उग्र राष्ट्रीय प्रवृतियों पर अंकुश लगाना भी था. तथापि, यूरोपीय संघ के गठन ने भी राष्ट्रीयता-जनित आंदोलन को रोकने में कामयाबी हासिल नहीं की. उल्टे ऐसे आंदोलन को एक यूरोपीय मंच हासिल हो गया. छोटी-छोटी राष्ट्रीयताएं जहां अपने-अपने मूल राष्ट्र-राज्यों से पृथक होना चाहती हैं, वहीं वे यूरोपीय संघ तथा नाटो का सदस्य बने रहकर यूरोप के एकीकृत बाजार तथा अपनी सुरक्षा का लाभ भी उठाना चाहती हैं.

    यूरोपीय संघ का मुख्यालय बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में है. फ्रेंच-भाषी ब्रुसेल्स डच-भाषी फ्लेमिंग्स और फ्रेंच-भाषी वलूंस के बीच बढ़ती खाई अब विभाजन के कगार पर जा पहुंची है- फ्लेमिंग्स अब स्वाधीन फ्लैंडर्स की मांग की ओर बढ़ रहे हैं. स्पेन में बास्क पृथकतावादी आंदोलन काफी पुराना है. इटली के लोम्बार्डी में भी पृथकता की भावना बलवती हुई है.

1707 ई0 में 'एक्ट ऑफ यूनियन' के जरिए स्कॉटलैंड और इंगलैंड ने अपनी-अपनी पृथक संसदों की जगह पूरे ग्रेट ब्रिटेन के लिए संसद की स्थापना की थी. करीब तीन सौ साल बाद युनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) के स्कॉट अब स्कॉटलैंड की आजादी की दिशा में काफी आगे बढ़ चुके हैं.

राष्ट्र-राज्य अपने अंदरूनी अंतरविरोधों और सूचना-संचार क्रांति तथा ज्ञान-अर्थव्यवस्था-जनित वैश्वीकरण के दबावों के कारण आज अपनी प्रासंगिकता के प्रश्नों से जूझ रहा है. पश्चिम के ही कई विचारक (जिनमें 'एम्पायर' के लेखक भी शामिल हैं) राष्ट्र-राज्य को अप्रासंगिक मानने लगे हैं, या फिर उसकी भूमिका को गौण अथवा काफी सीमित मानते हैं. राष्ट्र-राज्यों के विश्व संगठन के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका पहले भी कोई खास सशक्त नहीं थी, अब और भी दयनीय हो गई है. एक ओर उसके पुनर्गठन की मांग जोर पकड़ रही है, वहीं जी-आठ, जी-बीस, शांघाई-पांच (शांघाई सहयोग संगठन) जैसे वैश्िवक और क्षेत्रीय संगठनों की सक्रियता बढ़ी है । आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, प्यावरण-संबंधी, आदि विभिन्न क्षेत्रों में वैश्विक, क्षेत्रीय तथा द्विपक्षीय सम्मेलनों, संघियों तथा संस्थाओं के जरिए नए शक्ति समीकरण बनाने के प्रयासों को साफ-साफ लक्षित किया जा कसता है. मानव समुदाय का पुनस्संगठन नए-नए रूपों में सामने आ रहा है और इंटरनेट उसका माध्यम बन रहा है. वर्ल्ड सोशल फोरम से लेकर इंटरनेट के चैट-रूम्स तक, जमीनी स्तर के विविध संगठनों से लेकर ब्लॉग्स, फाइल शेयरिंग साइट्‌स, यू ट्‌युब, विकीपीडिया, सेकंड लाइफ, ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर मूवमेंट तथा इनेवेशन कम्युनिटीज तक नए-नए समुदाय बन रहे हैं और वर्चुअल तथा रीयल का एक-दूसरे में रूपांतरण हो रहा है. (एरिक वॉन हिप्पेल, 'डिमोक्रेटाइजिंग इन्नोवेशन,' लंदन, 2005, ओरी ब्रेफमैन और रोडए, बेकस्ट्रॉम, वही,)

इन चंचल समूहों की एक खास लाक्षणिकता उनकी अंदरूनी संरचना में विविधता का होना है. आज किसी व्यक्ति, संस्था और राजनीतिक आंदोलन का एक प्रमुख यूएसपी (यूनिक सेलिंग प्रोपोजिशन) उसकी एकल राष्ट्रीयता नहीं, उसमें अंतर्निहित बहुलता अथवा विविधता है. पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में बराक ओबामा की ऐसी ही छवि आकर्षण का केंद्र बनी-केन्याई मूल के अफ्रीकी-अमेरिकन मुस्लिम पिता, श्वेत अमेरिकी क्रिश्चियन मां, इंडोनेशियाई सौतेली बहन, आदि.

    राष्ट्रवाद के पराभव का एक और लक्षण क्षुद्र प्रतीकों में उसका सिमटना है. लहसुन, फ्रेंच फ्राइ आदि राष्ट्रवाद के प्रतीक बना दिए गए हैं. ब्रिटेन की महारानी जब इटली के दौरे पर गईं, तो वहां उन्होने खाने में लहसुन नहीं लेने की घाषणा की. ब्रिटेन में भारतीय करी के बढ़ते क्रेज के बरअक्स महारानी का यह कदम ब्रिटिश राष्ट्रवाद का प्रतीक माना गया-नो गार्लिक नेशलिज्म! इराक के मामले में सहयोग नहीं करने के कारण कुछ अमेरिकियों ने फ्रेंच फ्राइ का बहिष्कार कर फ्रांस के प्रति अपना राष्ट्रवादी रोष प्रकट किया.

    राष्ट्र-राज्यों के पतन की स्थिति में विश्व के कई अंचलों में अराजक दलों के रूप में हथियारबंद गिरोहों, युद्ध-सरदारों और आतंकवादी समूहों का बोलबाला बढ़ा है. (अमेरिका काफी पहले से ही विश्व के कुछ हिस्सों में अपने 'राष्ट्रीय हितों' का कार्यान्वयन भाड़े के गिरोहों का 'आउटसोर्स' करता रहा है.) ये 'नन-स्टेट एकटर्स' किसी क्षेत्र की अनसुलझी समस्याओं के साथ जुड़कर कहीं-कहीं राष्ट्र-राज्य के अस्तित्व को ही खतरे में डाल रहे हैं.
    राष्ट्र, राष्ट्र-राज्य और राष्ट्रवाद की विश्व में अब भी महतवपूर्ण भूमिका बनी हुई है, लेकिन यूरोप की जिन विशिष्ट स्थितियों में उनका उत्थान हुआ, लगता है, उसका एक चक्र अब पूरा होने वाला है.

यूरोप में राष्ट्रवाद को चुनौती


यूरोप में राष्ट्रवादी विचारधारा को आरंभ से ही चुनौती मिलनी शुरू हो गई थी. कहने की जरूरत नहीं कि यूरोप के बुर्जुआ आंदोलन में हमेशा एक रैडिकल पक्ष भी रहा जिसका सामाजिक आधार सामान्य मेहनतकश समूह थे-कारीगर, छोटे व्यवसायी, मजदूर, गरीब किसान, शहरी मध्यवर्ग का निचला हिस्सा आदि. ये समूह तब विभिन्न गुप्त सम्प्रदायों, क्रांतिकारी तथा कम्युनिस्ट दलों और रैडिकल राजनीतिक आंदोलन में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कर रहे थे. इंगलैंड मे लेवलर्स के पीछे डिगर्स थे,जर्मनी में मार्टिन लूथर (1483-1546) के पीछे थॉमस मुंजर (1498-1525) थे, धर्म सुधार आंदोलन के दौरान स्विट्‌जरलैंड, जर्मनी और नीदरलैंड्‌स में एनोबैपटिस्ट थे, तो फ्रांस में जेकोबिंस और फ्रांक्वा नोएल बेब्यूफ (1760-1797) थे. इसक अलावा, फ्रीमेजन्स तथा क्वेकर जैस संप्रदाय थे. आगे चलकर चार्टिस्ट, कम्युनिस्ट और समाजवादी-जनवादी दल सामने आए. इन आंदोलनों ने लोकप्रिय संप्रभुता की अवधारण को बल पहुंचाया, राष्ट्र की एकरूपता को चुनौती दी और कालक्रम में राष्ट्रों के जनतांत्रीकरण का मार्ग प्रशस्ता किया. तथापि जनतांत्रिक संस्थाओं का विकास बीसवीं सदी के प्रथम अर्धांश तक जारी रहा-यहां तक कि सार्विक वयस्क मताधिकार भी बीसवीं सदी में आकर ही फलीभूत हुआ.

    इसके अलावा, यूरोप में ही राष्ट्रवादी विचारों के समानांतर ऐसी विचार प्रणालियां भी सामने आई, जिनमें राष्ट्र को गौण महत्व ही दिया गया. अधिक से अधिक उसे एक संक्रमणकालीन भूमिका ही प्रदान की गई. राष्ट्र को मानव समुदाय का स्वाभाविक रूप मानने के बजाय पंथ-समुदायों को, वर्ग को, या फिर सभ्यतामूलक समाजों को मानव समुदाय का अग्रणी रूप माना गया. ये सारी श्रेणियां राष्ट्रोपरि श्रेणियां थीं. राष्ट्र-चेतना या सभ्यतामूलक चेतना को अधिक तरजीह दी गई. उत्पादक शक्ति और उत्पादन-संबंध के बीच के अंतरविरोध के आधार पर मानव समाज के इतिहास का निरूपण करते हुए मार्क्सवादी वर्गीय अस्मिता और वर्गीय अंतर्राष्ट्रीयतावाद पर जोर देते हैं. टॉयनबी इतिहास के अपने अध्ययन में मानव समाज की कुल इक्कीस प्रजातियों (स्पीसीज) की खोज करते हैं, जिनमें कुछ मृत हो गई. शेष 'एपरेंटेशन-एंड-एफिलिएशन' के जरिए नए-नए रूपों में अवतरित होती रहीं. जीवित प्रजातियों में उन्होंने (1) पश्चिमी क्रिश्चियन समाज, (2) ऑर्थोडॉक्स क्रिश्चियन समाज, (3) इस्लामी समाज, (4) हिन्दू समाज और (5) फार ईस्टर्न समाज का जिक्र किया है. उनके अनुसार, फार ईस्टर्न समाज (जो खुद सिनिक समाज का उत्तराधिकारी था) दो भागों में बंट गया-मुख्य भाग के रूप में चीनी समाज और शेष कोरियाई-जापानी समाज. इस प्रकार वे राष्ट्र की जगह मानव समाज की इन प्रजातियों को अधिक महत्व देते हैं. हंटिंग्स की सभ्यताओं से संबंधित थीसिस दरअसल टॉयनबी की प्रस्थापनाओं का ही सरलीकृत रूप है. बहरहाल, यहां इन सारी चीजों की पड़ताल में जाना संभव नहीं. उग्र राष्ट्रवाद पर अंकुश लगाने के लिए जहां अंतरराष्ट्रीय संगठन बने, उनमें समय-समय पर राष्ट्रवाद-जन्य दरारें भी पड़ती रहीं.

इन सबसे आगे बढ़कर, खुद यूरोप में आधुनिकता के मानक समझे जाने वाले सभी संघटक तत्वों (नवजागरण, धर्म-सुधार, ज्ञानोदय आदि) की आलोचनात्मक समीक्षा की गई.
यहां उन सारे विमर्शों का सार-संक्षेप देना भी संभव नहीं. इटली, जो यूरोपीय नवजागरण का केंद्र था, के ही एक विचार बेनेदितो क्रोचे (1866-1852) का एक उद्धरण नमूने के तौर पर पेश हैः 'नवजागरण का आंदोलन एक कुलीनवर्गीय आंदोलन बना रहा और उसका प्रभाव अभिजन-मंडलों तक सीमित रहा. इटली में अभिजन-मंडल ही इस आंदोलन की जननी और धाय दोनों था. वह दरबारी मंडलों ने नीचे नहीं उतरा... दूसरी तरफ धर्म-सुधार आंदोलन में सामर्थ्य थी कि वह जनता के बीच पहुंच सके. लेकिन उसने इसकी कीमत अपने अंतरंग विकास के नाश के रूप में और अपने जीवंत जीवन-तत्वों के मंद और प्रायः अवरूद्ध परिपक्वता के द्वारा चुकाई. ...लूथर... साहित्य और अध्ययन के प्रति उपेक्षा और दुश्मनी का नजरिया अपनाते हैं. इसकी वजह से इरैजमस को यह कहने का साहस हुआ कि जहां भी लूथरवार का राज है, वहां सात्यि की मृत्यु हो जाती है.निश्चित रूप से जर्मन प्रोटेस्टेंटवाद लगभग दो सदियों तक अध्ययन समीक्षा और दर्शन के क्षेत्र में बहुत कुछ अनुर्वर ही रहा...' (प्रसंगवश, ग्राम्शी की वैचारिक यात्रा एक हद तक क्रोचे की आलोचनात्म्क समीक्षा के जरिए ही आगे बढ़ती है.)
उत्तर-आधुनिक विमर्श दरअसल यूरोप की उसी विचार-यात्रा का एक पड़ाव है. यूरोप का अपना आत्मानुसंधान है, उसे उस वैचारिक भंवर से बाहर निकाल लाने की कोशिश जिससे उसका बच पाना काफी होता जा रहा था. चूंकि यह यूरोप (और 'पश्चिम') के समक्ष उत्पन्न वैचारिक चुनौती की उपज है, इसीलिए यह गैर-पश्चिमी देशों का, जिनका ऐतिहासिक अनुभव भिन्न रहा है और जिनकी समृद्ध वैचारिक परंपरा रही है, मार्गदर्शक नहीं हो सकता. आधिक से अधिक हम उनका संदर्भ के रूप में ही इस्तेमाल कर सकते हैं. उत्तर-आधुनिकता की आलोचनात्मक समीक्षा के पूरे क्षेत्र (स्पेस) पर पुनः यूरोप अथवा पश्चिम के वैचारिक वर्चस्व को कायम रखने का एक प्रयास भी है. हम जो (यूरोपीय अर्थो में) आधुनिक नहीं हैं, उत्तर-आधुनिकता भला हमारा मार्गदर्शन कैसे कर सकती है?

कुल मिलाकर, एक खास ऐतिहासिक अवस्था में यूरोप में पनपा राष्ट्रवाद भारतीय समाज के मूल्यांकन का वैचारिक आधार प्रदान नहीं करता. अगर कोई उसे आधार मानकर भारतीय समाज को समझने का प्रयास करेगा, तो वह विभिन्न यूरोपीय चिंतकों की भांति गलत निष्कर्ष पर ही पहुंचेगा.


गैर-पश्चिमी देशों में राष्ट्रवादी विमर्श

राष्ट्रवाद समेत आधुनिकता के विभिन्न पहलुओं की आलोचना का एक बड़ा साहित्य उपनिवेशों, अर्ध-उपनिवेशों और अन्य उत्पीड़ित देशों में मिलता है. इन देशों के प्रबुद्ध लोगों के लिए यूरोप एक विचित्र स्थिति उपस्थित करता रहा. सच है कि यूरोप का कोई एक चित्र, कोई एक पाठ, कोई एक भाष्य नहीं हो सकता था. एक ही साथ, एक ही समय में यूरोप बहुत कुछ था-दादावादी कोलाज की तरह सब कुछ एक जगह. (ओरहान पामुक, 'अदर कलर्स,' लंदन, 2007) नवजागरण भी सच था और बर्बर औपनिवेशीकरण भी, ज्ञानोदय भी सच था और दास व्यापार भी, सुधार आंदोलन भी सच था और उपनिवेशों में जबरन धर्मांतरण भी. औद्योगिक क्रांति भी सच थी, और उपनिवेशों की खुली लूट के जरिए किया गया आदिम संचय भी.
यूरोप (और पश्चिम) सचमुच सम्मोहनकारी था. उसके पास दांते थे, मिल्टन थे, सर्वातीज, शेक्पीयर और गोएठे थे. माइकल एंजेलो और टिशियान थे, राफेल और रेम्ब्रां थे, और सर्वोपति, उसके पासलियोनार्डो दा विंची थे. यूरोप के पास कोपरनिकस थे, गेलीलियो और न्यूटन थे, लिबनीज और कारडानो थे, जेम्स वाट, एडिसन, बेल और फैरेडे थे. बेकन थे, देकार्त्त थे, हाब्स थे, कांट, सिप्नोजा और हेगेल थे. एडम स्मिथ, रिकोर्डो, सिसमोंडी और कार्ल मार्क्स थे. रूसो, दिदेरो बौर वाल्तेयर थे. उसके पास इंगलैंड की क्रॉमवेलियन (1648) और गौरवशाली क्रांति (1688) थी, अमेरिकी स्वातंत्र्य-युद्ध (1776) और फ्रांसीसी राज्य क्रांति (1789) थी. जीवन के हर क्षेत्र में उसके पास आधुनिक मानक थे. यूरोप यूं ही हर नए विचार, नए विज्ञान, नई तकनीक, नए समाज और नई राजनीतिक संस्थाओं का प्रस्थान-बिंदु नहीं बन गया था.

और यही यूरोप शेष दुनिया के लिए सचमुच दुःस्वप्न भी था. जहां-जहां उसके फेमिश्ड रोड कदम पड़े, वह जमीन लहूलुहान हो उठी. जली हुई धरती-बेन ओकरी की 'दि'.

'स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा' के यूरोप ने शेष दुनिया में परतंत्रता, विषमता और नस्लभेद की रक्तरंजित मुहिम छेड़ रखी थी. उसके कई महान साहित्यकार, दार्शनिक, वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ उसकी इस मुहिम के उत्साही समर्थक थे. दुनिया को 'अंधकार से निकालने' और 'सभ्य बनाने' के अभियान में अगुवाई करने वाले उनके राजनयिक, सैन्य अधिकारी, विचारक और पुरोहित झूठ, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, नशीले पदार्थों के व्यापार, सोना-चांदी तथा कलाकृतियों की लूट में सानी नहीं रखते थे. थॉमस जेफरन ने अपनी 'नोट्‌स ऑन दि स्टेट ऑफ वर्जीनिया' में लिखा, 'ईश्वर न्यायप्रिय है, इसका ख्याल आते ही, अपने देश के बारे में सोचकर मेरी तो कंपकंपी छूट जाती है.'

वे एक ही साथ महान थे और मक्कार भी, चमत्कारी भी थे और चालबाज भी, ईश्वर भी थे और शैतान भी. पश्चिम के इसी पाखंड पर मार्क ट्वेन ने लिखा था, 'हमारे देश में तीन वर्णनातीत अनमोल चीजें हैं : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अंतरात्मा की स्वतंत्रता और इन दोनों स्वतंत्रताओं पर कभी अमल न करने की चतुराई.'
सच है कि शेष दुनिया के समाजों की अपनी बर्बरताएं थीं, अपनी क्रूरताएं थीं. क्या ये समाज अपनी बर्बरताओं से मुक्ति के लिए यूरोप के आईने में अपना भावी चेहरा देख सकते थे? क्या यूरोप उन्हें अपनी क्रूर सामाजिक रूढ़ियों और संस्थाओं से मुक्त कर स्वतंत्रता, समानता और प्रगति की एक नई दुनिया का साक्षात करा सकता था? ये समाज बार-बार यूरोप के आईने में झांकने की कोशिश करते. लेकिन आईना टूट जाता, टूटे जाईने में उन्हें अपना चेहरा टूटा-फूटा, बदरंग, स्किजोफ्रेनिक नजर आता. (जेम्स ज्वॉयस, यूलीसिस') केन केसी ('बन फ्ल्यू ओवर दि कक्कूज नेस्ट') द्वारा एक भिन्न संदर्भ में प्रयुक्त शब्द-समूह भी हम यहां ले सकते हैं : 'साइको-सिरामिक्स-द क्रैक्ड पॉट्‌स ऑफ मैनकाइंड.'

बहरहाल, यूरोप अथवा पश्चिम की इस चुनौती से निपटने के लिए उत्पीड़ित देशों में वैचारिक विमर्श की एक भिन्न परंपरा मिलती है. दादाभाई नौरोजी, महादेव गोविंद राणडे, महात्मा गांधी, सन यात सेन, रवींद्रनाथ ठाकुर, जवाहर लाल नेहरू, माओ त्से तुंग, लू शुन, रजनी पाम-दत्त, प्रेमचंद, एम.एन. राय से लेकर ऐमी सीजैर ('डिस्कोर्स ऑन कोलोनियलिज्म,' 1950), फ्रांज फैनन ('ब्लैक स्किन, व्हाइट मास्कस,' 1952; 'दि रेचेड ऑफ दि अर्थ,' 1961), अल्बर्ड मेंम्मी (दि कोलोनाइजर एंड दि कोलोनाइज्ड,' 1965), क्वामें एनक्रूमा ('कनसिएन्सिज्म,' 1970) एडवर्ड सईद ('ओरिएंटलिज्म,' 1978; 'कल्चर एंड इम्पीरियलिज्म,' 1993), चिनुआ अचेबे ('थिंग्स फॉल एपार्ट'), एनगुनी वा थियोंगो('डिकोलोनाइजिंग दि माइंड : दि पोलिटिक्स ऑफ लैंग्वेज इन अफ्रीकन लिटरेचर'), आदि विमर्श की एक लंबी परंपरा रही है, जिसकी एक झलक देना भी यहां संभव नहीं. इस विमर्श में ज्यां पॉल सार्त्र, मिशेल फूको, फ्रैंकफुर्ट स्कूल के विचारक अदोर्नो और मैक्स होर्खइमर एवं अन्य उत्तर-आधुनिक दार्शनिक भी प्रायः उद्‌धृत किए जाते हैं.

ऐमी सीजैर यह दिखलाते हैं कि किस तरह उपनिवेशवाद खुद औपनिवेशिक ताकतों को 'डिसिविलाइज' करता हैः यातना, हिंसा, नस्लीय घृणा और अनैतिकता तथाकथित सभ्य राष्ट्रों के लिए बोझ बनती जाती है और उपनिवेश के स्वामियों को बर्बरता के गर्त्त में डुबोती जाती है. इसका अंतिम परिणाम खुद यूरोप की अधोगति है. 'यूरोप का बचना नामुमकिन है.' उन्होंने लिखा कि किस तरह अपनी श्रेष्ठता के दंभ में, दुनिया को सभ्य बनाने में मदमत्त यूरोप एक 'बर्बर अन्य' की सृष्टि करता है. 'बर्बर नीग्रो का विचार एक यूरोपीय आविष्कार है- नेग्रीट्‌युड इस बर्बर नीग्रो को उखाड़ फेंकने का चमत्काराी हथियार साबित हुआ है.'

फ्रांज फैनन ('दि रेचेड ऑफ दि अर्थ') बताते हैं कि यूरोप खुद तीसरी दुनिया की सृष्टि है. उपनिवेशों और अन्य उत्पीड़ितदेशों के बौद्धिक समुदाय का एक हिस्सा न सिर्फ उन दिनों पश्चिम में प्रचलित विभिन्न विचाशाखाओं से गहरे रूप में प्रभावित था और उन्हीं की रोशनी में, उन्हीं के नक्शेकदम पर अपने समाज की भावी तस्वीर देखता था, बल्कि उसकी नजर में मानवजाति में जो भी उदात्त है, वरेण्य है, उन सब का मूर्त्तिमान रूप था यूरोप. वह भी यूरोप यूरोप होना चाहता था, उसे जीना चाहता था. रोजमर्रे की आदतों से लेकर, टेबल मैनर्स और यौन आचरण तक में इस तबके के जेहन में हमेशा 'यूरोप में लोग जैसा  कहते हैं, वैसा ही करने' की बात घूमती रहती. उनके मन में यूरोप की एक परी-कथा सरीखी छवि थी. यूरोप के वे लेखक भी उनके आदर्श थे जो उनहें 'जाहिल और असभ्य' मानते. (ओरहान पामुक, वही) तुर्की के संबंध में ओरहान पामुक ने इस प्रवृति का दिलचस्प विवरण दिया है. 1947 में फ्रेंच लेखक आंद्रे जिद को नोबेल पुरस्कार दिए जाने से आधुनिक तुर्की साहित्य के महान रचनाकार अहमत हमदी तानपिनार कितने आह्लादित थे, जबकि जिद तुर्कों के प्रति काफी हिकारत का भाव रखते थे. तानपिनार के (और खुद पामुक और हम जैसे कइयों के) आदर्श लेखक थे दोस्तोएव्स्की. दोस्तोएव्स्की पैनस्लाविज्म के उत्साही समर्थक थे और 1877-78 में रूस-ऑटोमन युद्ध शुरू होने पर उन्होंने कैथेड्रल जाकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से रूसियों की जीत के लिए प्रार्थना की थी. (तुर्की में यह रिवाज था कि दोस्तोएव्स्की के प्रसिद्ध उपन्यास 'ब्रदर्स करामाजोव'  के तुर्की अनुवादों में, युद्ध के उन्माद में तुर्की के बारे में कहे गए उनके शब्दों को हटा दिया जाता.) बहरहाल, यूरोप के प्रति तुर्की लेखकों के द्वैतभाव को पामुक ने खुद इन शब्दों मे व्यक्त किया है, 'मेरे जैसे व्यक्ति के लिए मात्र भविष्य की एक दृष्टि के रूप में यूरोप दिलचस्प था-और एक खतरे के रूप में. ...एक भविष्य, लेकिन एक स्मृति कभी नहीं.'
    इसी प्रसंग में गालिब (1797-1869) की चर्चा यहां बेमानी नहीं होगी. 'घर में था क्या कि तिरा गम उसे गारत करता/वो जो रखते थे हम इक हसरत-ए-ता'मीर सो है'-गालिब के इस द्रोर के संदर्भ में अली सरदार जाफरी (1958) में लिखते हैं, ''...अंग्रेजी के लाए हुए विज्ञान ने उसे इतना प्रभावित किया कि जब गदर से कई वर्ष पहले सर सैय्यद अहमद खां ने अबुल फजल की 'आईन-ए-अकबरी' का परिशोधन किया और गालिब से उसकी समीक्षा लिखने की इच्छा प्रकट की तो गालिब ने गजल के रूपकों के सारे आवरण अलग रखकर स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि आंखें खोलकर साहिबान-ए-इंग्लिस्तान को देखो कि ये अपने कला-कौशल में अगलों से आगे बढ़ गए हैं. उन्होंने हवा और लहरों को बेकार कर के आब और धुएं की शक्ति से अपनी नावें सागर में तेरा दी हैं. यह बिना मिजराब के संगीत उत्पन्न कर रहे हैं और उनके जादू से शब्द चिड़ियों की तरह उड़ते हैं, हवा में आग लग जाती है और फिर बिना दीप के नगर आलोकित हो जाते हैं. इस विधान के आगे बाकी सारे विधान जीर्ण हो चुके हैं. जब मोतियों का खजाना सामने हो तो पुराने खलियानों से दाने चुनने की क्या आवश्यकता है. यह कहने के बाद गालिब ने जो निष्कर्ष निकाला है वह महत्वपूर्ण है. आईन-ए-अकबरी के अच्छा होने में क्या संदेह है, लेकिन उदार सृष्टि को कृपण नहीं समझना चाहिए क्योंकि गुणों का अंत नहीं है. खूब से खूबतर का क्रम जारी रहता है. इसलिए मृतकोपासना शुभ कार्य नहीं है.''

    इतने सारे विरोधाभासी यथार्थों को एक साथ एक ही समय ढोते इन मुल्कों के साहित्यकारों को भी अपनी अभिव्यक्ति के लिए नए शिल्प ढूंढने पड़े. कोई अतियथार्थवाद के सहारे आत्मा की अतल गहराइयों में उतरने, 'चमत्कार के लिए सदैव तत्पर रहने' (सुजेन सीजेर) की कोशिश करता है. कोई इन असंख्य विरोधाभासों को जादुई यथार्थ की दुनिया में पकड़ने की जद्दोजहद करता है. तो कोई अपने चेतन प्रवाह से उसके साथ होकर उसे महसूस करना चाहता है. पामुक कहते हैं कि इस विकट स्थिति से निपटने में उन्हें 'बोर्खेसियन माइंडफ्रेम' से मदद मिली. 'बोर्खेस और कैल्विनो ने मुझे मुक्त किया.' (पामुक, वही.)

    भारत के आरंभिक विचारकों पर इंगलिश उपयोगितावाद और पिता-पुत्र (जेम्स तथा जॉन स्टुअर्ट) मिल का अच्छा-खासा प्रभाव था. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में बंगाल के कुछ बौद्धिक हल्कों में फ्रांसीसी पोजिटिविज्म (ऑगस्ट कोम्टे) भी लोकप्रिय हुआ-बावजूद इसके कि इंगलैंड के तत्कालीन प्रभावशाली चिंतकों (जॉन स्टुअर्ट मिल, हर्बर्ट स्पेंसर और टी. एच. हक्सले) ने इसकी भर्त्सना की थी. ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन के प्रभावशाली जमींदार संरक्षक जोगेंद्रनाथ घोष इन प्रोजिस्टिविस्टों के प्रमुख व्यक्ति थे बंकिम चंद्र चटर्जी-उन्होंने अपने उपन्यास 'देवी चौधरानी' (1884), अपने निबंध 'चित्तशुद्धि' (1885) और अपनी एक अन्य रचना 'धर्मतत्व' (1888) में कोम्टे का उद्‌धृत भी किया था. भारतीय राश्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे अध्यक्ष उमेश चंद्र बनर्जी भी कुछ समय तक इन लोगो के साथ जुड़े. इस आंदोलन के पिता-तुल्य रिचर्ड कांग्रीव ने 1857 की अपनी एक रचना 'इंडिया' में भारत में ब्रिटिश आधिपत्य अविलंब समाप्त करने का प्रस्ताव किया था. बहरहाल, ये पोजिटिविस्ट्‌स सामाजिक मामलों में अत्यंत रूढ़िवादी थे. जोगेंद्रनाथ घोश के अनुसार, ब्राह्मणों तथा अभिजातों की प्रभुता और उनके प्रति श्रद्धा समाप्त होने, और हमारे लोकप्रिय नेताओं द्वारा समानता, प्रतिद्वंद्विता तथा परिवर्तन का प्रचार करने के कारण हमारे समाज की 'शानदार एकजुटता' तेजी से नष्ट हो रही है. 1896 ई. में कोलकाता से प्रकाशित अपनी रचना 'दि पोलिटिकल साइड ऑफ ब्राह्मणिज्म' में वे स्थिरता तथा कुलीन-ब्राह्मण नेतृत्व बरकरार रखने पर जोर देते हैं, और समाज के सबसे निचले पायदान पर स्थित करोडो़ मूक लोगों को नियंत्रित करने के एकमात्र उपाय के रूप में पश्चिमीकरण के हिमायती कांग्रेसी नेताओं से संसदीय रास्ते का परित्याग करने तथा पुनरूत्थानवादियों से सहयोग करने का आह्‌वान करते हैं. (वैसे, कोम्टे के पोजिटिविज्म में जनतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अभिजातवर्गीय बेरूखी अंतर्निहित थी.) (सब्यसाची भट्टाचार्य, 'पोजिटिविज्म इन दि नाइनटींथ सेंचुरी बेंगाल,' इंडियन सोसाइटी : हिस्टोरिकल प्रोविंग्स,' नई दिल्ली, 1974) जो लोग उन्हीं दिनों ज्योतिबा फुले के अंग्रेजी राज के पक्ष में दिए गए बयानों को उद्‌धृत करते हैं, उन्हें भारतीय रूढ़िवादियों के उपर्युक्त बयानों पर भी अवश्य गौर करना चाहिए.

    बाद कि दौर में भारत के बौद्धिक समुदाय पर फेबियन समाजवाद, अराजकतावाद, मार्क्सवाद-लेनिनवाद, सामाजिक जनवाद और नाजीवाद का भी प्रभाव परिलक्षित हुआ. औपनिवेशिक स्थिति में भारत कि चिंतन परंपरा पर भी गंभीर मंथन हुआ. इस संदर्भ में जिन दो व्यक्तियों ने बौद्धिक जगत पर सबसे गंभीर असर डाला, वे थे स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद. विभिन्न पंथों तथा जातियों में चले सुधार आंदोलन और वैचारिक हलचलों का ब्यौरा देना यहां संभव नहीं.
    1978 में देंग शियाओं फेंग के आर्थिक सुधारों के बाद, चीन में भी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक अध्ययनों के एक नए अध्याय का सूत्रपात हुआ. इन राष्ट्रीय अध्ययनों (गुओच्च्यू) में 'पश्चिम' का प्रश्न एक बार फिर चीन के बौद्धिक हलकों में जोर-शोर से उठा.1988 में एक हिट टेलिविजन धारावाहिक 'हे शांग' (रिवर एलेजी) का प्रसारण किया गया. इसमें पीली नदी का बतौर रूपक इस्तेमाल करते हुए परंपरागत चीनी सभ्यता के पिछडे़पन और उसकी बर्बरता का मार्मिक चित्रण किया गया था. वहीं दूसरी ओर पश्चिमी सभ्यता के 'नीले सागर' की स्तुति की गई, जिसकी मुक्तिदायिनी लहरों पर अब चीनी लोक गणराज्य की नैया को सवार होना था. जाहिर है, इस सीरियल की आलोचना भी हुई (और इसका संबंध चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव झाओ जियांग से जोड़ा गया. 4 जून 1989 की घटना के बाद झाओ को पदमुक्त कर नजरबंद कर दिया गया था).

    बहरहाल, पश्चिमी देशों से प्रगाढ़ होते रिश्तों की पुष्ठभूमि में चीन के शीर्ष नेता अब पश्चिम की उन्नत संस्कृति के साथ खुद को जोड़ने और उसे बतौर अपना प्रेरणास्त्रोत बताने में पीछे नहीं रहे. पूर्व राष्ट्रपति जियांग जेमिन ने बताया कि तीस और चालीस के दशक में अपनी युवावस्था के दिनों में शंघाई में जिन तीन फिल्मों ने उन पर गहरी छाप छोड़ी और जिन्हें वे आज भी पसंद करते, वे थे- 'गॉन विद द विंड,' 'ग्रीन बैंक ऑन अ स्प्रिंग मॉनिंग' (एक ब्रॉडवे म्यूजिकल), और (चोपिन परआधारित) 'अ सांग टू रिसेम्बर.' (चाओ-हुआ वांग, संपादक, 'वन चाइना, मेनी पाथ्स,' न्यूयार्क, 2003)

    अस्सी के दशक के मध्य में फ्रेडरिक जेमसन के सौजन्य से चीन में उत्तर-आधुनिकता का प्रवेश हुआ और बीजिंग विश्वविद्यालय के कुछ तेज-तर्रार युवा स्नातक इसके मुरीद भी हुए. एक दशक बाद, जब झाओ यिवू, जेन श्याओं मिंग, आदि ने इसे चीनी परिस्थितियों में लागू करने की कोशिश की, तो शीघ्र ही उनका इससे मोहभंग भी हो गया. जेमसन उत्तर-आधुनिकता को 'प्रौढ़ पूंजीवाद के सांस्कृतिक तर्क' के रूप में परिभाशित करते थे. 'मास कल्चर' की उनकी तीखी आलोचना इन चीनी बुद्धिजीवियों को रास नहीं आई. चीन में पूंजीवाद अभी परवान ही चढ़ रहा था और 'सांस्कृतिक क्रांति के काले दिनों' के वे 'मास कल्चर' के उत्साही समर्थक थे क्योंकि इससे वे 'लोकप्रिय स्वतंत्रता' का नया अवसर देख रहे थे.

    बीजिंग विश्वविद्यालय में चीनी साहित्य के पूर्व प्रोफेसर कियान लीकुन ने पश्चिम के प्रति द्वैतभाव को हेमलेट और क्विक्जोट के बिंबों में प्रकट करते हुए चीनी बुद्धिजीवियों द्वारा 'क्विक्जोट की भावना से हेमलेट की चुनौती' स्वीकार करने की जरूरत पर बल दिया. शंघाई विश्वविद्यालय में सांस्कृतिक अध्ययन विभाग तथा ईस्ट चायना नार्मल युनिवर्सिटी में चीनी साहित्य के प्रोफेसर वांग श्याओमिंग ने 'सांस्कृतिक अध्ययनों के लिए एक घोषणापत्र' में चीन की विषम स्थिति का विवरण देते हुए लिखा है, ''फिलहाल चीन अनेक पश्चिमी तकनीकों, प्रबंधकीय व्यवहारों, सांस्कृतिक उत्पादों और मूल्यों का आयात कर रहा है, लेकिन वह कोरिया या जापान की तरह पश्चिमी शैली का आधुनिक समाज बनने की खातिर अपनी व्यवस्थाओं में आसानी से परिवर्तन कर पाएगा, इसमें मुझे संदेह है. ...चीन किसी नियंत्रण को चुनौती देते एक महाकाय प्राण की तरह है, बीसवीं सदी के इतिहास में सामाजिक परिवर्तन का सबसे कठिन और अभूतपूर्व विषय है.' (चाओहुआ वांग, वही)।
    बहरहाल, यूरोपीय (और पश्चिमी) वैचारिकी एवं गैर-पश्चिमी वैचारिकी के विस्तार में जाना यहां संभव नहीं, तथापि इन दोनों धाराओं के बीच एक महत्वपूर्ण फर्क को यहां रेखांकित किया जा सकता है. यह फर्क मूलतः विचार-दृष्टि का है.
साभारः- हंस (अगस्त, 2010)

विभूति-कालिया: एक पितृसत्तात्मक पटकथा

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/22/2010 08:58:00 PM

नया ज्ञानोदय में छपे विभूति के इंटरव्यू के बाद काफी कुछ हुआ है, कहा गया है, लिखा गया है. लेकिन साथ में, काफी कुछ नहीं भी कहा गया है, काफी कुछ नहीं भी लिखा गया है और जो होना चाहिए वह अब तक नहीं हुआ है. यह महज गलत शब्दों का चयन या बदजुबानी नहीं है, जैसा कि इसे कई बार साबित करने की कोशिश की गई है. साथ ही यह सिर्फ बिक जाने की मानसिकता भी नहीं है. इसकी गहरी वजहें हैं. यह टिप्पणी बाजार, इस व्यवस्था के पितृसत्तात्मक आधारों, सामंतवाद के साथ उपनिवेशवाद की संगत और महिलाओं के साथ-साथ समाज के सभी उत्पीड़ित वर्गों की मुक्ति के संघर्षों से कट कर जी रहे और साथ में कुछ हद तक सुविधाभोगी हुए एक तबके के हितों के आपस में गठजोड़ का एक (एकमात्र नहीं, सिर्फ एक) उदाहरण भर है. इसलिए हैरत नहीं कि दलितों, स्त्रियों और आदिवासियों के पक्ष में हो रहे लेखन की मलामत करते हुए इसी ज्ञानोदय में कुछ समय पहले लिखे गए संपादकीय पर किसी का ध्यान नहीं गया था. कितना गहरा रिश्ता है आपस में इन सबका. एक व्यवस्था आदिवासियों को विस्थापित करती है, उनके संघर्षों को कुचलने के लिए सेना उतारती है. उसका एक तबका दलितों पर लगातार अत्याचार करता है. उसका एक दूसरा तबका महिलाओं को अपनी विजय के तमगे के रूप में इस्तेमाल करता है और एक संपादक (जिसके पीछे लेखकों और दूसरे बुद्धिजीवियों की एक बड़ी जमात है) उन सबके समर्थन में लिखे जा रहे को हिकारत से खारिज कर देता है. विभूति प्रसंग में हम हाशिया पर ईपीडब्ल्यू के ताजा संपादकीय का अनिल द्वारा किया गया अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं.


एक पितृसत्तात्मक पटकथा

हिंदी में महिला लेखकों के प्रति संरक्षणवादी और मर्दवादी यौन नजरिए को साहित्यिक आलोचना के रूप में प्रचलित करने की कोशिश हो रही है। 

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (मगांअंहिंवि) के कुलपति विभूति नारायण राय ने महिला हिंदी उपन्यासकारों पर दिए गए अपने घृणित बयान के लिए खेद व्यक्त करते हुए माफ़ी मांग ली है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के भूतपूर्व अधिकारी रहे राय ने नया ज्ञानोदय पत्रिका (भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित) को दिए अपने साक्षात्कार में कहा था कि पिछले कुछ वर्षों से नारीवादी विमर्श मुख्यतः देह तक केंद्रित हो गया है और कई लेखिकाओं में यह प्रमाणित करने की होड़ लगी है  उनमें से कौन सबसे बड़ी छिनाल (व्यभिचारी महिला, वेश्या) हैं। एक मशहूर हिंदी लेखिका की आत्मकथा का हवाला देते हुए, राय ने अतुलनीय ढंग से कहा कि अति-प्रचारित लेखन को असल में कितनी बिस्तरों में कितनी बार का दर्ज़ा दे देना चाहिए।
यह एक बहसतलब बिंदु है कि मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल सहित कई हल्कों में अपनी टिप्पणी की व्यापक निंदा के चलते राय ने माफ़ी मांगी है। अपने बचाव में वे जो पहले कह रहे थे उससे स्पष्ट है कि माफ़ीनामा उनके वक्तव्य पर आई प्रतिक्रियाओं के चलते, निश्चित तौर पर दबाव में, (ख़ासतौर से, मानव संसाधन विकास मंत्री के, जिनके क्षेत्राधिकार में यह विश्वविद्यालय है) जबरन दिया गया है न कि आत्मनिरीक्षण के बाद और नज़रिए में एक वास्तविक बदलाव की बदौलत। कुलपति ने शुरू में कहा कि महान हिंदी लेखक मुंशी प्रेमचंद ने कई बार छिनाल शब्द का इस्तेमाल किया है, कि उनका (राय का) मतलब वास्तव में यह है कि महिलाओं के अन्य मुद्दे नज़रअंदाज़ किए जा रहे हैं और कि बतौर लेखक उन्हें इन मुद्दों पर टिप्पणी करने की आज़ादी है।
हालांकि यह किसी एक व्यक्ति, चाहे वह जिस किसी भी पद में आसीन हो, की टिप्पणी मात्र से संबंधित एक मुद्दा नहीं है। यहां एक वृहद और ज़्यादा परेशान करने वाले मुद्दे– साहित्यिक दुनिया में लैंगिक क्षुद्रताओं और दुराग्रह का है। हिंदी की पहुंच और हिंदी साहित्य का बाज़ार विशाल है और कई भारतीय भाषाओं के मुक़ाबले इसके प्रकाशन और विक्रय का नेटवर्क विस्तृत और विकसित है। महिला लेखकों में महादेवी वर्मा, कृष्णा सोबती, चित्रा मुद्गल, मृणाल पाण्डेय, शिवानी, मन्नू भंडारी, अलका सरावगी और मैत्रेयी पुष्पा समेत कई अन्य के योगदान बहुत प्रशंसनीय हैं। इन लेखिकाओं को निश्चित तौर पर न तो उनकी लेखन शैली और न ही विषय-वस्तु के लिहाज़ से एक दूसरे के खांचे में बिठाया जा सकता। लेकिन जैसा कि अन्य महिला लेखिकाओं के साथ है, हिंदी में महिला साहित्य एक ख़ास ज़ाती संकीर्णता के रोग का शिकार है। प्रमुखतः पुरुष प्रधान आलोचकीय सत्ता-स्थापनाएं, महिला लेखिकाओं को साहित्य में उनके योगदान के बजाय उनके जेंडर द्वारा लेखन की ख़ासियतों को दर्ज़ करने में ख़ुद को आसान पाती हैं।  
अधिकतर दूसरे साहित्यिक सत्ता स्थापनाओं की तरह हिंदी साहित्य की दुनिया में भी गॉडफ़ादर्स हैं जो सत्ता में रहते हुए अपने इर्द गिर्द मंडलियां जमा करते हैं और आश्रय (संरक्षण देने, पालने) की रेवड़ियां बांटते हैं। बहुधा महिला लेखक पाती हैं कि वे ऐसी मंडलियों से दुश्मनी मोल लेने के ख़तरे नहीं उठा सकतीं। एक बड़े फलक में प्रभावी आलोचना और शायद बहुसंख्य पाठक भी ऐसी लेखिकाओं के लेखन से राहत पा लेते हैं जो सुधारवादी झालरों के साथ सिर्फ़ तथाकथित “महिला मुद्दों” में जुटी होती हैं। यहां तक कि जब वे बहुसंख्यक भारतीय महिलाओं की ज़िंदगी में हंसी ख़ुशी देने वाली स्पष्ट रोशनी की घोर कमी के अनगिनत बारीक़ पहलुओं — पसंद करने,या उनकी ज़िंदगी जीने के तरीक़ों, या उनके जीवनसाथी चुनने — के बारे में लिखती हैं तो आलोचना उन्हें आसानी से बर्दाश्त कर लेती है। 
लेकिन जब उनका लेखन यौन संबंधों या स्त्री यौनिकता पर महिलाओं के परिप्रेक्ष्य को छूता है तो उन्हें (आलोचकों को) असहजता चुभने लगती है और वे उसे ख़ारिज़ करने पर (अमान्य क़रार कर देने पर) तुल जाते हैं। 1980 में, हिंदी साहित्य संसार मृदुला गर्ग के ख़िलाफ़ लगाए गए अश्लीलता के आरोपों से हिल गया था जिनके उपन्यास चितकोबरा में एक नायिका है जिसके लिए यौन-कार्य बहुत उबाऊ और मशीनी होता है जिससे वो दूसरे मुद्दों की ओर अपना दिमाग़ घुमाती है। इस लेखन के लिए मृदुला गर्ग को यहां तक कि गिरफ़्तार कर लिया गया था। बाद में आरोप ख़ारिज़ कर दिए गए। दूसरी ओर कुछ लेखिकाओं ने चिंता और नाराज़गी जताई है कि कुछ प्रकाशन घरानों ने उन महिलाओं के लेखन को प्रकाशित करने से इंकार किया है जिन्हें वे व्याख्यायित करते हैं कि वह “पर्याप्त साहसी नहीं” है अर्थात वह बाज़ार को उत्तेजित करने के लिए पर्याप्त सनसनीख़ेज़ नहीं है। लेकिन तब ये लक्षण हिंदी साहित्य के लिए प्रधान नहीं हैं।
राय की मान्यता कि नारीवादी विमर्श देह तक ही नहीं केंद्रित रहना चाहिए बल्कि इसमें अन्य मुद्दों और दलितों और आदिवासियों को भी शामिल किया जाना चाहिए, एक उद्दंडता भरा चटखारा है जिसका सारा लेन-देन पितृसत्तात्मक अंधेपन के साथ साथ जाति और अन्य सामाजिक मुद्दों के बारे में सूक्ष्म सामाजिक-सुधारवादी समझदारी पर टिका है। यह साहित्यिक उत्पादन या आलोचना के लिए एक सुचिंतित दृष्टिकोण की तरह नहीं प्रकट हुआ है। बतौर एक लेखक और कुलपति, राय को साहित्यिक आलोचना को अभिव्यक्त करने का हक़ है। तथापि उनका वक्तव्य एक पितृसत्तात्मक पटकथा के मुताबिक महिलाओं के लेखन को नियंत्रित करने की कुटिल और छिछोरी प्रवृत्तियों को उजागर और प्रस्तुत करता है। यह साहित्य आलोचना की (प्रमुखतः पुरुषों के वर्चस्व वाली) दुनिया के सरलीकृत नज़रिये के रोग का सूचक है। राय की टिप्पणी, इससे भी अधिक एक दृष्टांत है जिसे चिंता का एक कारण ज़रूर  होना चाहिए। 

इराकः एक देश के बारे में दो कविताएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/19/2010 03:18:00 PM

अमेरिकी सेना ने इराक को छोड़ दिया है. जैसा कि भारत के बारे में कहा जाता है, बहुत से लोग अब इराक के बारे में भी कहेंगे कि वह  विदेशी कब्जे से आजाद हो गया है. लेकिन हम जानते हैं और इराकी भी जानते हैं कि आजादी उनके लिए अब भी एक सपने और संघर्ष का नाम है. अमेरिकी या किसी भी विदेशी सेना के निकल जाने से कुछ नहीं होता, इस दौरान वहां जिस तरह की सत्ता संरचना को स्थापित किया गया है, जिस तरह का शासक वर्ग वहां सत्ता पर काबिज है, वह अब इस सेना द्वारा छोड़ी गई जिम्मेदारियों को पूरा करेगा. इराकी संसाधनों की लूट जारी रहेगी, वह साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुनाफे की चरागाह बना रहेगा. इराक की जनता की दुर्दशा और बदतर हालत में कोई कमी नहीं आएगी. लेकिन जाहिर है कि इसी के साथ इराकी जनता का शानदार और अपराजेय प्रतिरोध भी जारी रहेगा और पूरी दुनिया उसके साथ अपनी उम्मीदों को जोड़े रखने में अपनी सार्थकता तलाशेगी. पेश हैं फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश और छात्र राजनीति में साक्रिय अंजनी कुमार की कविताएं. रविवार और कारवां से साभार. दरवेश की कविता का अनुवाद अनिल जनविजय ने किया है.

एक आदमी के बारे में
महमूद दरवेश
 
उन्होंने उसके मुँह पर जंज़ीरें कस दीं
मौत की चट्टान से बांध दिया उसे
और कहा- तुम हत्यारे हो

उन्होंने उससे भोजन, कपड़े और अण्डे छीन लिए
फेंक दिया उसे मृत्यु-कक्ष में
और कहा- चोर हो तुम

उसे हर जगह से भगाया उन्होंने
प्यारी छोटी लड़की को छीन लिया
और कहा- शरणार्थी हो तुम, शरणार्थी

अपनी जलती आँखों
और रक्तिम हाथों को बताओ
रात जाएगी
कोई क़ैद, कोई जंज़ीर नहीं रहेगी
नीरो मर गया था रोम नहीं
वह लड़ा था अपनी आँखों से

एक सूखी हुई गेहूँ की बाली के बीज़
भर देंगे खेतों को
करोड़ों-करोड़ हरी बालियों से


इराक मेरा देश नहीं है 
अंजनी कुमार
 
इराक मेरा देश नहीं है
और फल्‍लुजाह मेरा शहर नहीं है।
अमेरिकी हमले में मारे गये लोगों की सूची मे
मेरा नाम नहीं है।
गुएन्‍तमाओं के यातनागृहों में
चल रही पूछताछ के दौरान
हजार वॉट की रौशनी में नहीं पिघली मेरी आंख
और न ही सर्द संगीनों तले
घुट गयी मेरी सांस ... ।

जिन्‍हें नंगा किया गया सरे बाजार
वे मेरे कुछ नहीं लगते थे
शक् के आधार पर
जिनमें सिर में मार दी गयी गोली
वे भी मेरे भाई बंधु नहीं थे।

बारूद के धुंए के बीच तड़पता
नजफ या बगदाद का बाशिंदा नहीं हूं मैं।
धमाकों से बिखर गयी जिनकी देह
भूख और बीमारी की गोद में सो गयो जो बच्‍चे
मलबे में तब्‍दील घरों में जो खोज रहे हैं जीवन का नया सूत्र
इनमें से कोई भी मैं नहीं हूं मैं।
दजला फरात ने जिन इन्‍सानों को जन्‍मा
उन तहजीवी विरासत को ले जाने वालों में
मेरा नाम नहीं है।

आज़ादी के जुगजुओं के देश का नाम है इराक
जिनकी कबू‍लियत में गुलामी काफिराना शब्‍द है
और लहू इतिहास की इबादत का सबसे खूबसूरत लफ्ज,
इराक के नाम पर कंधे उचका देने वालों में
मेरा नाम नहीं है।

वैदिक हिंसा और शांति के वारिस
नागरिकों की सूची में
आजादी एक निरीह शब्‍द है
और इराक दुष्‍टता का प्रतीक,
.............
इन नागरिकों की सूची में
मेरा नाम नहीं है।

जाति जनगणना: बायोमैट्रिक के नाम पर धोखा

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/18/2010 05:20:00 PM


केंद्रीय मंत्रियों के समूह ने जाति गणना को कहने को तो हरी झंडी दे दी है, लेकिन वास्तविकता यह है कि मंत्रियों के समूह ने इस काम को बुरी तरह से फंसा दिया है। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के नेतृत्व में मंत्रियों के समूह का जो फॉर्मूला दिया है, उसके आधार पर जाति की गणना अगले पांच साल तक जारी ही रहेगी (यह समय बढ़ सकता है) और जो आंकड़े आएंगे, उसमें देश की लगभग आधी आबादी को शामिल नहीं किया जाएगा। साथ ही आंकड़ों के नाम पर सिर्फ जातियों की संख्या आएगी। न तो जातियों और जाति समूहों की शैक्षणिक स्थित का पता चलेगा और न ही सामाजिक-आर्थिक हैसियत का। मंत्रियों के समूह की इस बारे में की गई सिफारिश पर बहस आवश्यक है क्योंकि इसे लेकर अभी काफी उलझन बाकी है।

ओबीसी गिनती का प्रस्ताव औंधे मुंह गिरा

मंत्रियों के समूह ने उचित फैसला किया है कि जाति की गणना के दौरान सिर्फ ओबीसी की गिनती नहीं की जाएगी, बल्कि सभी जातियों के आंकड़े जुटाए जाएंगे। वामपंथी दलों ने ओबीसी गिनती के लिए प्रस्ताव दिया था।[i] कुछ समाजशास्त्री भी चाहते थे कि सभी जातियों की गिनती न करके सिर्फ ओबीसी की गिनती कर ली जाए क्योंकि सवर्ण समुदायों के लिए सरकार की ओर से कोई कार्यक्रम या योजना नहीं है। उनका सुझाव था कि सिर्फ अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी की गिनती करा ली जाए।[ii]

जाति गणना के बदले ओबीसी गणना की बात करने वाले लोग जाति के आंकड़ों को सिर्फ आरक्षण और सरकारी योजनाओं के साथ जोड़कर देखते हैं, जो बहुत ही संकीर्ण विचार है। जाति भारत में एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहचान है और इससे जुड़े समाजशास्त्रीय आंकड़ों का व्यापक महत्व है। इसी नजरिए इस देश में धर्म (जिसके आधार पर देश टूट चुका है) और भाषा (जिसकी वजह से हुए दंगों में हजारों लोग मारे गए हैं) के आधार पर हर जनगणना में गिनती होती है। अगर समाजशास्त्रीय आंकड़े जुटाने का लक्ष्य न हो तो जनगणना के नाम पर सिर्फ स्त्री और पुरुष का आंकड़ा जुटा लेना चाहिए।

जाति गणना और बायोमैट्रिक की धांधली

जाति गणना पर मंत्रियों के समूह ने जो फॉर्मूला बनाया है उसमें एक गंभीर खामी यह है कि इसमें जाति की गिनती को जनगणना कार्य से बाहर कर दिया गया है। मंत्रियों के समूह ने फैसला किया है कि जाति की गणना नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर के तहत बायोमैट्रिक ब्यौरा जुटाने के क्रम में कर ली जाएगी।[iii] बायोमैट्रिक ब्यौरा यूनिक आइडेंटिटी नंबर के लिए इकट्ठा किया जाना है। यानी जब लोग अपना यूआईडी नंबर के लिए जानकारी दर्ज कराने के लिए आएंगे तो उनसे उनकी जाति पूछ ली जाएगी। यह एक आश्चर्यजनक फैसला है। धर्म, भाषा, शैक्षणिक स्तर, आर्थिक स्तर से लेकर मकान पक्का है या कच्चा तक की सारी जानकारी जनगणना की प्रक्रिया के तहत जुटाई जाती है और ऐसा ही 2011 की जनगणना में भी किया जाएगा, लेकिन जाति की गिनती को जनगणना की जगह यूनिक आईडेंटिफिकेशन नंबर की बायोमैट्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की बात की जा रही है।

यहां एक समस्या यह है कि बायोमैट्रिक डाटा कलेक्शन करने के लिए यूनिक आईडेंटिफिकेशन अथॉरिटी (जिसके मुखिया नंदन निलेकणी हैं, जिन्हें सरकार ने कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा दिया है) को पांच साल का समय दिया गया है। साथ ही पांच साल में देश में सिर्फ 60 करोड़ आईडेंटिटी नंबर दिए जाएंगे। इस बात में जिसको भी शक हो वह यूनिक आईडेंटिफिकेशन अथॉरिटी की सरकारी वेबसाइट – http://uidai.gov.in/ पर जाकर इन दोनों बातों को चेक कर सकता है कि बायोमैट्रिक डाटा कितने साल में इकट्ठा किया जाएगा और कितने लोगों का बायोमैट्रिक डाटा जुटाया जाएगा। इंटरनेट पर इस सरकारी साइट को खोलते ही सबसे पहले पेज पर ही ये दोनों बातें आपको दिख जाएंगी।

यानी प्रणव मुखर्जी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रियों के समूह ने जब बायोमैट्रिक दौर में जाति की गणना कराने की सिफारिश की थी, तो उन्हें यह मालूम था कि इस तरह जाति गणना का काम पांच साल या ससे भी ज्यादा समय में कराया जाएगा और इसमें भी देश के लगभग 120 करोड़ लोगों में सिर्फ 60 करोड़ लोगों के आंकड़े ही आएंगे।[iv] मंत्रियों के समूह ने देश के बहुजनों के साथ इतनी बड़ी धोखाधड़ी करने का साहस दिखाया, यह गौर करने लायक बात है। पांच साल बाद आए आकंड़ों का लेखा जोखा करने, अलग अलग जाति समूहों का आंकड़ा तैयार करने में अगर कुछ साल और लगा दिए गए, तो अगली जनगणना तक भी जाति के आंकड़े नहीं आ पाएंगे।

बायोमैट्रिक में गिनती यानी एससी/एसटी/ओबीसी की घटी हुई संख्या

15 साल में जिस देश में सभी मतदाताओं का मतदाता पहचान पत्र नहीं बना, उस देश में बायोमैट्रिक नंबर कितने साल में दिए जाएंगे, इसका अंदाजा भी आप लगा सकते हैं। मतदाता पहचान पत्र में तो सिर्फ मतदाता की फोटो ली जाती है जबकि बायोमैट्रिक नंबर के लिए तो फोटो के साथ ही अंगूठे का और आंख का डिजिटल निशान लिया जाएगा। इस काम के लिए कोई आपके घर नहीं आएगा बल्कि जगह जगह कैंप लगाकर यह काम किया जाएगा। इसमें कई लोग छूट जाएंगे जिनके लिए बारा बार कैंप लगाए जाएंगे। दर्जनों बार कैंप लगने के बावजूद अभी तक वोटर आईडी कार्ड का काम पूरा नहीं हुआ है। यह तब है जबकि वोटर आईडेंटिटी कार्ड बनवाने में राजनीतिक पार्टियां दिलचस्पी लेती हैं। बायोमैट्रिक नंबर दिलाने में पार्टियों की कोई दिलचस्पी नहीं होगी।

सरकार ने यूनिक आईडेंटिफिकेशन अथॉरिटी की सरकारी वेबसाइट पर साफ लिखा है कि यह नंबर लेना जरूरी नहीं है।[v] यानी कोई न चाहे तो यह नंबर नहीं लेगा। बहुत सारे लोग इसका कोई और महत्व न देखकर इसे नहीं लेंगे। ऐसे में जाति की गणना से काफी लोग बाहर रह जाएंगे। जबकि जनगणना के कर्मचारी हर गांव, बस्ती के हर घर में जाकर जानकारी लेते हैं और इसमें लोगों के छूट जाने की आशंका काफी कम होती है।

बायोमैट्रिक के नाम पर जिस तरह की गड़बड़ी हो रही है और उसे देखते हुए कोई सरकार कल यह फैसला कर सकती है कि आईडेंटिटी नंबर नहीं दिए जाएंगे। इस तरह जाति गणना का काम फंस जाएगा। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि देश में लाखों लोग घुमंतू जातियों के हैं। इन लोगों का बायोमैट्रिक आंकड़ा लेना संभव नहीं है। साथ ही शहरों में अस्थायी कामकाज के लिए आने वालों गरीबों का भी बायोमैट्रिक आंकड़ा लेना आसान नहीं हैं। इस तरह आबादी का एक बड़ा हिस्सा यूनिक आईडेंटिफिकेशन नंबर के लिए बायोमैट्रिक आंकड़ा देने की गतिविधि में शामिल नहीं हो पाएगा और उस तरह उनकी जाति का हिसाब नहीं लगाया जाएगा। आप समझ सकते हैं कि इनमें से ज्यादातर लोग अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों से हैं। इस तरह स्पष्ट है कि बायोमैट्रिक के साथ जाति गणना कराने से एससी/एसटी/ओबीसी समूहों की संख्या घटकर आएगी।

बायोमैट्रिक के नाम पर बहुत बड़ी साजिश

ताज्जुब की बात है कि 9 फरवरी से लेकर 28 फरवरी 2011 के बीच जब देश भर में जनगणना होगी और धर्म और भाषा से लेकर तमाम तरह के आंकड़े जुटाए जाएंगे तब जाति पूछ लेने में क्या दिक्कत है? जनगणना से जाति गणना के काम को बाहर करना एक बहुत बड़ी साजिश है, जिसका पर्दाफाश करना जरूरी है। 1871 से 1931 तक जनगणना विभाग जाति गणना का काम करता था और उस समय तो सरकारी कर्मचारी भी कम थे और कंप्यूटर भी नहीं थे। सवा सौ साल पहले अगर जनगणना के साथ जाति की गिनती होती थी, तो नए समय में इस काम को करने में क्या दिक्कत है।

यहां यह बात भी गौर करने लायक है कि 1931 की जनगणना अभी भी जाति की गिनती से मामले में देश का एकमात्र आधिकारिक दस्तावेज है और मंडल कमीशन से लेकर तमाम सरकारी नीतियों में इसी जनगणना के आंकड़े को आधार माना जाता है। 1931 की जनगणना के तरीकों को लेकर किसी भी तरह का विवाद नहीं है और न ही किसी कोर्ट ने कभी इस पर सवाल उठाया है। जाहिर है कि 1931 में जिस तरह जाति की गिनती जनगणना के साथ हुई थी, वह 2011 में भी संभव है। अब चूंकि कंप्यूटर और दूसरे उपकरण आ गए हैं, इसलिए इस काम को ज्यादा असरदार तरीके से किया जा सकता है। जाहिर है जनगणना के साथ जाति गणना न कराना एक साजिश के अलावा कुछ नहीं है। इसका मकसद सिर्फ इतना है कि किसी भी तरह से ऐसा बंदोबस्त किया जाए कि जाति के आंकड़े सामने न आएं।

बायोमैट्रिक यानी आर्थिक-शैक्षणिक आंकड़े नहीं

बायोमैट्रिक ब्यौरा जुटाने के साथ जाति गणना को जोड़ने में और भी कई दिक्कतें हैं। इसकी एक बड़ी दिक्कत के बारे में केंद्रीय गृह सचिव जी. के. पिल्लई कैबिनेट नोट में लिख चुके हैं। बायोमैट्रिक आंकड़ा संकलन के साथ जाति की गिनती करने से जातियों से जुड़े सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक तथ्य और आंकड़े सामने नहीं आएंगे। जनगणना के फॉर्म में ये सारी जानकारियां होती हैं, जबकि बायोमैट्रिक डाटा संग्रह के साथ यह काम संभव नहीं है। बायोमैट्रिक आंकड़ा जुटाते समय लोगों से जो जानकारियां ली जाएंगी वे इस प्रकार हैं – नाम, जन्म की तारीख, लिंग, पिता/माता, पति/पत्नी या अभिभावक का नाम, पता, आपकी तस्वीर, दसों अंगुलियों के निशान और आंख की पुतली का डिजिटल ब्यौरा।[vi]

सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक आंकड़ों के बिना हासिल जाति के आंकड़े दरअसल सिर्फ जातियों की संख्या बताएंगे, जिनका कोई अर्थ नहीं होगा। सिर्फ जातियों की संख्या जानने से अलग अलग जाति और जाति समूहों की हैसियत के बारे में तुलनात्मक अध्ययन संभव नहीं होगा। यानी जिन आंकड़ों के अभाव की बात सुप्रीम कोर्ट और योजना आयोग ने कई बार की है, वे आंकड़े बायोमैट्रिक के साथ की गई जाति गणना से नहीं जुटाए जा सकेंगे।

जाति जनगणना का लक्ष्य सिर्फ जातियों की संख्या जानना नहीं होना चाहिए। न ही जाति की गणना को सिर्फ आरक्षण और आरक्षण के प्रतिशत के विवाद से जोड़कर देखा जाना चाहिए। जनगणना समाज को बेहतर तरीके से समझने और संसाधनों तथा अवसरों के बंटवारे में अलग अलग सामाजिक समूहो की स्थिति को जानने का जरिया होना चाहिए। जनगणना में जाति को शामिल करने से हर तरह के सामाजिक, शैक्षणिक और सामाजिक आंकड़े सामने आएंगे। इन आंकड़ों का तुलनात्मक अधघ्ययन भी संभव हो पाएगा। सरकार इन आंकड़ों के आधार पर विकास के लिए बेहतर योजनाएं और नीतियां बना सकती हैं। अगर ओबीसी की किसी जाति की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति बेहतर हो गई है, इसका पता भी जातियों से जुड़े तमाम आंकड़ों के आधार पर ही चलेगा। इन आंकड़ों से जातिवाद के कई झगड़ों का अंत हो जाएगा और नीतियां बनाने का आधार अनुमान नहीं तथ्य होंगे।

बायोमैट्रिक डाटा संग्रह के साथ जाति की गणना कराने में एक बड़ी दिक्कत यह भी है कि पहचान पत्र बनाने वाली एजेंसी को जनगणना का कोई अनुभव नहीं है, न ही उसके पास इसके लिए संसाधन या ढांचा है। जनगणना का काम जनगणना विभाग ही सुचारू रूप से कर सकता है। जनगणना के दौरान जाति की गणना करने से जनगणना विभाग इसकी निगरानी कर पाएगा। बायोमैट्रिक आंकड़ा संकलन के दौरान यह व्यवस्था नहीं होगी।[vii] इसे देखते हुए जाति गणना के काम को जनगणना विभाग के अलावा किसी और एजेंसी के हवाले करने का कोई कारण नहीं है।

बायोमैट्रिक: एक अवैज्ञानिक तरीका

साथ ही नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर के लिए 15 साल से ज्यादा उम्र वालों की ही बायोमैट्रिक सूचना ली जाएगी। परिवार के बाकी लोगों के बारे में इन्हीं से पूछकर कॉलम भरने का समाधान गृह मंत्रालय दे रहा है, जो अवैज्ञानिक तरीका है।[viii] बायोमैट्रिक और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर का काम अभी प्रायोगिक स्तर पर है। इसे लेकर विवाद भी बहुत हैं। इसलिए यूनिक आईडेंटिफिकेशन नंबर और बायोमैट्रिक डाटा संग्रह के साथ जाति की गणना जैसे महत्वपूर्ण कार्य को शामिल करना सही नहीं है।

[i] सीपीएम नेता सीताराम येचुरी का 12 अगस्त, 2010 को दिया गया बयान http://in.news.yahoo.com/43/20100812/818/tnl-caste-census-should-ensure-scientifi_1.html

[ii] योगेंद्र यादव का द हिंदू अखबार में 14 मई को छपा लेख http://beta.thehindu.com/opinion/op-ed/article430140.ece?homepage=true

[iii] समाचार पत्रों में छपी रिपोर्ट, यहां देखिए टाइम्स ऑफ इंडिया का लिंक http://timesofindia.indiatimes.com/india/GoM-clears-caste-query-in-census-at-biometric-stage/articleshow/6295048.cms

[iv] यूनिक आईडेंटिफिकेशन अथॉरिटी की सरकारी वेबसाइट का होमपेज

[v] http://uidai.gov.in/ देखें इस साइट का FAQs सेक्शन, पूछा गया सवाल है – Will getting a UID be compulsory?

[vi] http://uidai.gov.in/

[vii] भारत के पूर्व रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त डॉ. एम विजयनउन्नी, कास्ट सेंसस: /टुअर्ड्स एन इनक्लूसिव इंडिया, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोशल एक्सक्लूशन एंड इनक्लूसिव पॉलिसी, नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी का प्रकाशन, पेज- 39

[viii] केंद्रीय गृह सचिव जी. के. पिल्लई का मंत्रियों के समूह की बैठक में सौंपा गया नोट

वेदांतः हिदुत्व और साम्राज्यवादी मंसूबों का विध्वंसक मिश्रण

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/12/2010 05:55:00 PM

वेदांत सिर्फ एक कंपनी नहीं है, वह साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था के हमारे देश में हुए विस्तार का एक अनिवार्य चरित्र और स्वरूप भी है. यह वही कंपनी है, जिसके निदेशक मंडल में कभी पी चिदंबरम हुआ करते थे, और जिस पद पर से इस्तीफा देकर वे वित्तमंत्री बने. वेदांत ने जिस तरह से एक अर्धऔपनिवेशिक देश में हिंदुत्ववाद और साम्राज्यवाद का मिश्रण पेश किया है, वह एक अनिवार्य शोध का विषय है, जिस पर रोजर मूडी का यह लेख भी प्रकाश डालता है. इस कंपनी के काम करने के तरीके पर रोहित पोद्दार की किताब वेदांताज बिलियंस को भारत में  चिदंबरम के नेतृत्ववाले गृह मंत्रालय ने प्रतिबंधित कर दिया है. आइए पढ़ें. 




मुँह में राम...
विभिन्न देशों के कानून और पर्यावरण नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन करने में वेदांत रिसोर्सेज़ की एक अलग पहचान है. कहने को तो यह कम्पनी एक पब्लिक कम्पनी है मगर इसमें वर्चस्व खुले तौर पर केवल एक व्यक्ति, उसके परिवार और इष्ट मित्रों का ही है. इस कम्पनी को इस बात पर भी नाज़ है कि वह हिन्दुत्व और नव-उदार रूढ़िवादिता में समन्वय स्थापित करती है. परेशानी की बात यह है कि इसका चेहरा जानुस (एक रोमन मिथकीय पात्र जिसके दो विपरीत दिशाओं में जुड़े सिर थे और वह कोई भी दरवाज़ा खोल सकता था) की तरह है जिससे अधिकांश भारतीयों को कोई समस्या नहीं होती.

मुझसे कभी-कभी पूछा जाता है कि मैंने अपने 25 वर्षों के सारी दुनिया के उद्योगों के अध्ययन में किस खनन कम्पनी को सबसे 'घटिया' पाया है.1 कुछ समय पहले तक मेरा जवाब हुआ करता था कि ''इनमें से कोई भी कलंक से मुक्त नहीं है और सभी एक जैसे बुरे हैं. ''

लेकिन पिछले 2 वर्षों में मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि एक कम्पनी जरूर है जो अपने समकालीनों से एकदम अलग दिखाई पड़ती है. न केवल उस पर लगाये गये आरोपों की संख्या या उनकी सीमा तक बल्कि विभिन्न देशों के कानून और पर्यावरण नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन करने में भी उसका कोई सानी नहीं है. यह एक 'भारतीय' कम्पनी है, भले ही उसकी नाम इंग्लैण्ड में दर्ज है लेकिन इस पर सिर्फ एक आदमी, उसके परिवार और ताकतवर दोस्तों के एक कसे हुए समूह का आधिपत्य है. यह कोई बहुत आश्चर्यजनक बात नहीं है. स्विट्‌ज़रलैण्ड की ग्लेनकोर धातुओं का व्यापार करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनी है जिसके पास खनन से जुड़े बहुत से प्रतिष्ठानों का मालिकाना है. इस कम्पनी का निदेशक बोर्ड तक नहीं है और इसकी पूरी अर्थव्यवस्था सात तालों के भीतर बन्द रहती है. इस कम्पनी का कार्पोरेट मुखौटा एक्सस्ट्राटा लंदन में स्थित है.2

लेकिन इस तरह के संदिग्ध चरित्र वाले स्थिर सहयोगी से जो चीज़ वेदांत रिसोर्सेज़ को अलग करती है वह है उसकी वह रफ्तार जिससे कम्पनी ने अपने प्रभावी मालिक अनिल अग्रवाल के लिए सिर्फ तीन साल के अन्दर अकूत सम्पत्ति अर्जित कर ली है और जिसके दम पर वह लंदन स्टॉक एक्सचेंज में चौथी सबसे ताकतवर खनन कम्पनी के तौर पर निबन्धित हुई है. इसके अलावा जिस आश्चर्यजनक तरीके से इसके अमरीकी और यूरोपीय वित्त पोषकों ने इस कम्पनी के प्रति अपने सारे शुरुआती सन्देहों को ताक पर रख दिया और उसके उद्‌गम, निष्ठा और ईमानदारी की परवाह किये बगैर इस एकदम बाहरी संस्था को ब्रिटिश फाइनेन्शियल सर्विसेज़ ऑथोरिटी की मिली भगत से दुनिया के सबसे चलायमान पूंजी बाजार की गोद में आराम से बैठने की जगह दिलवा दी वह भी कम दिलचस्प नहीं है.

टाटा, जिन्दल और अम्बानी कहीं अब जाकर विदेशों में खनिजों के क्षेत्र में आपसी सहयोग की कोशिश कर रहे हैं. (ध्यान दें कि टाटा ने 2007 में इंग्लैण्ड डच स्टील कम्पनी-कोरस का अधिग्रहण किया, जिन्दल ने 2006 में बोलिविया की विशाल मुटुन-लौह अयस्क डिपॉज़िट को हासिल किया और एस्सार स्टील ने इस साल मध्य अप्रैल में कनाडा की तीसरी सबसे बड़ी कम्पनी अलगोमा का मालिकाना हासिल किया). लेकिन अग्रवाल आज से 10 साल पहले से आस्ट्रेलिया की तांबा खदानों में, मध्य एशिया में सोना और मैक्सिको, रूस तथा बर्मा में दूसरे उपक्रमों की खोज-बीन में मशगूल थे. 'भारत' के विश्व-स्तरीय विस्तार में उनसे बेहतर रुतबा सिर्फ़ लक्ष्मी मित्तल का है. लेकिन अग्रवाल और मित्तल दोनों ही वास्तव में इंग्लैण्ड में बसे अनिवासी भारतीय हैं. उस पार की हरियाली अब धीरे-धीरे भूरे रंग में बदल रही है.3

लक्ष्मी मित्तल अभी तक किसी स्कैण्डल में नहीं फंसे हैं मगर अग्रवाल और उनके चट्टे-बट्टे लम्बे समय से संदेहों की दलदल में हाथ पैर मार रहे हैं. जिस समय मैं यह लेख लिख रहा हूँ उस समय वेदांत की एक इकाई स्टरलाइट गोल्ड पर अर्मेनिया में जुर्म के कई इल्जाम लग रहे हैं जिनमें सरकार द्वारा निर्धारित सीमा से ज्य़ादा सोने का खनन, जान-बूझ कर अपने (खनिज) संसाधनों की कीमत कम आंक कर बताना तथा खदान से निकले हुए कचरे का उचित निस्तारण न करना शामिल है.4 पिछले साल ज़ाम्बिया में वेदांत पर आरोप लगा था कि उसने 2 साल वहाँ की सबसे बड़ी ताँबा खदान, केसीएम, खरीदी थी और उसके ज़हरीले कचरे को निस्तारित करने के लिए जान-बूझ कर ख़राब पाइप लाइन का निर्माण किया. उसने वहाँ ज़ाम्बिया सरकार की आधिकारिक अनुमति लिए बिना ही ज़ाम्बिया के सबसे महत्वपूर्ण ताँबे के स्मेल्टर पर काम शुरू कर रखा है.5 भारत में भी वेदांत ने तूतीकोरिन में तमिलनाडु राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के समुचित निर्देशों के बिना ताँबे के एक विशाल स्मेल्टर का विस्तार किया और वह भी तब जबकि उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित हैज़ार्ड्‌स वेस्ट मॉनिटरिंग सब-कमेटी (ख़तरनाक अपशिष्ट के अनुश्रवण के लिए गठित उप-समिति) ने इस बात की हिदायत दी थी कि कम्पनी ऐसा करने से बाज़ आये (कृपया आगे भी देखें). इसने उड़ीसा में लांजीगढ़ में एक बड़ी अल्युमिनियम रिफ़ाइनरी पर भी काम चालू रखा था बावजूद इसके कि उच्चतम न्यायालय की एक दूसरी उप-समिति ने सितम्बर 2005 में यह कहते हुए इसकी निन्दा की थी कि कम्पनी ने संरक्षित वनों का नाश किया है, इसलिए वह गैऱ-कानूनी तरीके से काम कर रही है. इसके अलावा, इस साल जनवरी में दिल्ली स्थित वीवी गिरी इन्स्टीट्यूट (श्रम मंत्रालय से सम्बद्ध) ने अपने एक शोध में पाया कि कम्पनी ने 2001 में, जब उसने सरकारी कम्पनी बाल्को का मालिकाना हासिल किया तब उसने कामगारों के साथ जितने भी करार किये थे प्रायः उनमें से किसी का भी पालन नहीं किया.6 अगले ही महीने उड़ीसा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने झारसुगुड़ा में बन रहे कम्पनी के अल्युमिनियम स्मेल्टर का काम बन्द कर देने को कहा क्योंकि इसे अल्युमिना लांजीगढ़ की गैऱ-कानूनी रिफ़ाइनरी से मिलने वाला था. सिर्फ़ 6 महीने पहले उड़ीसा के एक मशहूर मानवाधिकार एक्टिविस्ट प्रफुल्ल सामन्त राय द्वारा दिये गये फोटो के सबूतों के आधार पर लंदन स्थित 'विक्षुब्ध शेयर धारकों' ने कम्पनी और उसके दूसरे शेयर-धारकों को खुल कर समझाया था कि इस तरह का निर्माण गैऱ-कानूनी है.7 इसके बावजूद, वन और पर्यावरण मंत्रालय ने 10 दिन बाद इस भ्रष्टाचारी कम्पनी को जल्दी-जल्दी में पिछली तारीख से पर्यावरणीय अनापत्ति देकर बड़े आराम से पीठ ठोंक दी. यह सिर्फ़ एक मिसाल है कि हमारे देश के निर्णय-क्षमता वाले लोग, अग्रवाल की गुप्त-गोष्ठी और उसके चट्टे-बट्टे किस तरह से एक-दूसरे से मिले हुए हैं.

अनिल अग्रवाल की उत्तरोत्तर उड़ान
वेदांत रिसोर्सेज़ पीसीएल की लंदन स्टॉक एक्सचेंज में लॉन्चिंग दिसम्बर 2003 में इन्टरनेशनल पब्लिक ऑफ़रिंग (आईपीओ) के साथ हुई जिसमें एचएसबीसी, सिटीग्रुप, ऑस्ट्रेलिया की मैक्वायर बैंक, दॉइश बैंक, आईसीआई सिक्यूरिटीज़ (भारत), जेपी मॉर्गन कैज़ेनोवे का हाथ था. इन सबने मिल कर 1.3 करोड़ पाउण्ड के करीब राशि पर सम्मिलित फ़ीस के रूप में हाथ साफ़ किया.8 उनकी कोशिशों से नई कम्पनी को एक अरब डॉलर से अधिक की प्राथमिक बाज़ारी पूँजीकरण (इनीशियल मार्केट कैपिटलाइजे़शन) का लाभ हुआ. इंग्लैण्ड के एक्सचेंज में यह उस साल की दूसरी सबसे बड़ी पेशकश थी और किसी भी भारतीय पृष्ठभूमि वाली कम्पनी के लिए यह पहला मौका था. एबीएन ऐमरो, बर्कलेज़ कैपिटल और दॉइश बैंक द्वारा जारी किये गये 70 करोड़ डॉलर के बॉण्ड के दम पर इस कम्पनी ने 2.2 अरब अमरीकी डॉलर मूल्य की विस्तार की योजना बनाई. उसका लक्ष्य भारत का सबसे बड़ा ताँबे और अल्युमिनियम का उत्पादक बनना था (कुछ वर्षों तक इस कम्पनी ने देश में पैदा होने वाले जिंक और सीसे के अधिकांश भाग का उत्पादन किया था).

शहरों में रहने वाले बहुत से भारतीयों ने स्टरलाइट इण्डस्ट्रीज़ का नाम सुना होगा मगर (जैसा मुझे अपनी यात्राओं के दौरान पता लगा) इनमें से बहुतों को यह नहीं पता होगा कि स्टरलाइट पर वेदांत का 82  प्रतिशत नियंत्रण है. वास्तव में लन्दन में हुए निबन्धन ने अग्रवाल को विदेशी पूंजी हासिल करने का अभूतपूर्व अवसर प्रदान करने के साथ-साथ स्टरलाइट की भारतीय खदानों और उनसे सम्बद्ध शोधन इकाइयों की पूंजी को भी और अधिक बढ़ाने का मौका मुहैया करवाया. 2007 के प्रारम्भ में अनिल अग्रवाल और उनके परिवार के पास वेदांत का 54 प्रतिशत हिस्सा था और इस तरह से उसी अनुपात में उन्होंने कार्पोरेट मुनाफे का हिस्सा भी हथिया लिया.9

55 वर्ष पूर्व एक व्यापारी मारवाड़ी परिवार में पैदा हुए (मगर इस समय लंदन के फैशनपरस्त मेफेयर इलाके में सुखपूर्वक रहते हुए) अग्रवाल ने पिछले 3 दशकों में एक छोटी सी ताँबा उत्पादक इकाई को एक पारिवारिक होल्डिंग कम्पनी के रूप में संवर्धित किया था जो अब भारत सरकार की दो खनिज कम्पनियों, हिन्दुस्तान जिंक़ और बाल्को (भारत अल्युमिनियम कम्पनी) को नियंत्रित करती है. भारत के तीन खनिज समृद्ध राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ उनके व्यक्तिगत सम्बन्ध हैं, पी चिदम्बरम वेदांत कम्पनी के एक डायरेक्टर रह चुके हैं जिस पद को छोड़ कर वह भारत के ताकतवर वित्तमंत्री बने.

''मैं भारत के मानस को समझता हूँ.'' यह अग्रवाल ने 2005 के शुरू में सारी दुनिया के निवेशकों के सामने उनके ज्ञानवर्धन के लिए कहा था. वह निश्चित रूप से जानते हैं कि गोटी कैसे फिट की जाती है. जब वेदांत के अध्यक्ष माइकेल फाउल ने एकाएक उस साल मार्च में अपने पद से इस्तीपफ़ा दे दिया और उसके तुरन्त बाद ज्याँ पियरे रॉडियर, जो वेदांत के स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण समिति के अध्यक्ष थे, भी छोड़ कर चले गये तब अग्रवाल ने तुरन्त अपने आप को कम्पनी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया. यह इंग्लैण्ड के उस कार्पोरेट जगत के बेहतर गवर्नेंस नियमों के खिलापफ़ था जिसकी नाक-भौंह चढ़ जाती है अगर किसी कम्पनी का सबसे बड़ा शेयर धारक उसका मुखिया बन जाता है.10 अपने बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति को लेकर भी अग्रवाल पर छींटे पड़े. इंग्लैण्ड की निबन्धन संस्था की कम्पनी पर प्राथमिक शर्तों के अनुसार, जिस पर जेपी  मॉर्गन इन्वेस्टमेन्ट बैंक की भी मुहर थी, बोर्ड के अधिकांश निदेशक अग्रवाल परिवार और उनके ट्रस्ट के 'बाहर' के आदमी होने चाहियें. आजकल बोर्ड का केवल एक सदस्य ग़ैर-हिन्दुस्तानी है. तीन में से दो कार्यकारी निदेशक अग्रवाल हैं और तीसरे कुलदीप जौरा ने 2002 से स्टरलाइट के लिए काम किया है.11

नियमों की धज्जियाँ
विवाद अग्रवाल का पीछा 1990 के दशक के मध्य से ही कर रहे हैं. उन पर बार-बार आरोप लगे हैं कि उन्होंने राजनैतिक और न्यायिक स्तर पर घूस देने की पेशकश की है और भारत के दक्षिणपंथी हिन्दुत्व एजेण्डे की पैसे से मदद की है. उनके ख़िलाफ़ साबित तो कुछ नहीं हुआ है मगर इस साल शुरू में लोकसभा में भारत की राजनैतिक पार्टियों को दानदाता वेदांत फाउण्डेशन द्वारा चन्दा देने का प्रश्न उठाया गया था क्योंकि, जैसा लगता है, यह मामला देशी कानून का उल्लंघन है जो किसी भी विदेशी कम्पनी को ऐसा करने से निषेध करता है.12
इतना तो तय है कि 1998 में स्टरलाइट को वृहद रूप से खुद को फ़ायदा पहुँचाने वाले शेयर घोटाले का दोषी पाया गया था. परिणामतः बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के नियंत्रक, सिक्यूरिटी एण्ड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इण्डिया (सेबी) ने इसे 2 साल तक के लिए ट्रेडिंग करने से रोक दिया था (हालांकि इस आदेश को जल्दी ही सरकार द्वारा निरस्त कर दिया गया था जब सेबी द्वारा दिये गये नए सबूत को सरकार ने नहीं माना).13

तूतीकोरिन (तमिलनाडु) में कम्पनी की हरकतों से वहाँ के बाशिन्दों और कामगारों की हुई दुर्दशा एक दीर्घकालिक चिन्ता का विषय है. आस्ट्रेलिया के एक पुराने बन्द प्लांट से 1994 में खरीदे गये (अग्रवाल का कहना है कि यह माटी के मोल मिल गया था) इस स्मेल्टर को महाराष्ट्र सरकार ने बहुत ज्यादा ख़तरनाक बता कर खारिज कर दिया था और वही स्मेल्टर मन्नार की खाड़ी के स्पेशल बायो-स्पफीयर रिजर्व से 9 किलोमीटर दूर समुद्री सुरक्षा नियमों के ख़िलाफ़ बैठाया गया.

अपने पहले साल के कार्यकाल में इस स्मेल्टर को सरकारी आदेश से तीन बार बन्द किया गया मगर स्पष्ट रूप से असुरक्षित और ज़हरीले पदार्थों से छलकते हुए इस प्लांट को फिर खोलने की अनुमति दे दी गई. भारतीय उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित ख़तरनाक कचरों का अनुश्रवण (मॉनिटरिंग) करने वाली एक समिति जब सितम्बर 2004 में यह प्लांट देखने गई तब वह एक किनारे पर फॉस्फ़ो-जिप्सम के 'पहाड़' देख कर हैरान रह गई तो कारखाने के दूसरे किनारे पर ''हज़ारों टन आर्सेनिक से सने स्लैग'' देखने को मिले- सब खुले आसमान
के नीचे हवा और पानी के पूरे सम्पर्क में. न सिर्फ इस कचरे को तत्काल हटा देने वाले आदेश की वेदांत ने अनदेखी की बल्कि उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित एक अन्य विशेषज्ञ समिति जब अगले महीने वहाँ गई तो उसने देखा कि कम्पनी ने गैऱ-कानूनी ढंग से नये-नये उपकरण लाकर अपना विस्तार अपनी डिज़ाइन क्षमता से लगभग दुगुना कर लिया है जिसकी वजह से कचरा घटने के बजाय बढ़ गया है. बहुत से पर्यवेक्षकों और खुद मैंने इस स्मेल्टर तक की 2004 से 2006 के बीच कई यात्राएं कीं और सबका नतीजा एक ही था कि कम्पनी ने इन ख़तरनाक वस्तुओं की मात्रा को कम करने के लिए कुछ भी नहीं किया.14

इस बीच में अग्रवाल वेदांत के महत्वाकांक्षी बॉक्साइट खनन प्रयासों के साथ-साथ अल्युमिनियम की शोधन और स्मेल्टिंग क्षमता को आगे बढ़ाने के प्रयासों में उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में कोशिशें करते रहे. स्टरलाइट द्वारा 2001 में सरकार की कम्पनी बाल्को के अधिग्रहण पर उस साल एक बड़ा राजनैतिक विवाद उठ खड़ा हो गया था.15 यह पहला मौका नहीं था जब अग्रवाल ने भारत के एक बड़े अल्युमिनियम कारखाने को हथियाने की कोशिश की थी. उन्होंने इण्डैल को पाने के लिए इसके निवेशकों से शेयर लेने का प्रयास किया मगर पैसा नहीं चुका सके. 4 साल बाद दिल्ली उच्च न्यायालय को एक आदेश निर्गत कर उन्हें मजबूर करना पड़ा कि वह पैसा दिखायें. भारत की तीसरी सबसे बड़ी अल्युमिनियम कम्पनी बाल्को के 51 प्रतिशत हिस्से की आनन-फानन में बिक्री को कुछ लोगों ने सरकार के बीमार बही-खातों को 'बजट-पूर्व कलाबाजी' के रूप में देखा था. इस तरह के आरोप खुल कर लगाये गये कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में चल रही देश की सरकार ने जान-बूझ कर और सफलतापूर्वक बाल्को को अपनी शर्तों और अपने संसाधनों से आधुनिकीकरण नहीं करने दिया. जो भी रहा हो, कम्पनी की कीमत बहुत कम आँकी गई, कुछ अनुमानों के अनुसार स्टरलाइट ने जितना पैसा दिया उससे दस गुनी सम्पत्ति उसने हासिल की. इस रेवड़ी बंटने के सबसे पहले शिकार हुए बाल्को के कामगार जिन पर छंटनी और अन्य लाभों को गंवाने का खतरा मंडराने लगा. नवनिर्मित 'आदिवासी' छत्तीसगढ़ राज्य के सात हजार कामगार एक लम्बी हड़ताल पर चले गये और भारत अल्युमिनियम कर्मचारी संघ (सीटू से सम्बद्ध) के कार्यकारी अध्यक्ष एएम अन्सारी को स्टरलाइट प्रबन्धन ने 3 साल पहले किये गये दुर्व्यवहार का हवाला देकर नौकरी से बर्खास्त कर दिया.

जनवरी 2007 में वीवी गिरी इन्स्टीट्यूट की एक रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की गई कि वेदांत/बाल्को ने हस्तांतरण के समय अपने कर्मचारियों के साथ आतताइयों जैसा व्यवहार किया और रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कम्पनी ने निजीकरण अनुबन्ध के अधिकांश प्रावधानों का उल्लंघन किया.16 सर्वाधिक दबाव तथाकथित 'हरित धातु' के उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल की जो आवश्यकता पड़ती है, उस उच्च गुणवत्ता वाले सारी दुनिया में पाये जाने वाले बॉक्साइट का आठवाँ भाग भारत में ज़मीन के नीचे मौजूद है. लेकिन यह खनिज उन पहाड़ियों की चोटी पर मिलता है जो कम से कम 1000 मीटर उंची हैं जहाँ पहाड़ी ढलानों पर किनारे-किनारे केवल संकरे रास्तों और पगडण्डियों के जरिये ही पहुँचा जा सकता है. पिछले 20 वर्षों में जंगलों की भारी कटाई के बावजूद और पर्यटन तथा जंगल कटाई से बचते-बचाते ये इलाके अब भी इस उप-महाद्वीप के सबसे समृद्ध जैव-विविधता वाले क्षेत्र हैं. ये हज़ारों आदिवासियों, चीतों, हाथियों, भैंसों, हिरण और दुर्लभ औषधियों के घर-वास हैं. तमिलनाडु में यह शोला के जंगलों की शक्ल में बीहड़ों को ढकने का काम करते हैं.

मैंने वेदांत की प्रायः सभी बड़ी बॉक्साइट वाली खदानों के स्थानों को देखा है जो छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु में जगह-जगह पर फैली हुई हैं. बिना किसी अपवाद के मैंने यह पाया है कि यह कम्पनी छोटे से छोटे पर्यावरणीय मानकों का भी उल्लंघन करती है और अपने कामगारों का शोषण तो वह इस हद तक करती है जिसके आगे, अगर विश्वस्तरीय प्रतिष्ठानों की बात छोड़ दें, तो घरेलू भारतीय कम्पनियाँ भी उतना नीचे नहीं गिरती होंगी.

2005 में छत्तीसगढ़ में मैनपाट में वहाँ की सबसे बड़ी बॉक्साइट खदान में मैं लगभग 30 मजदूरों से मिला था जिनके सिर पर कोई हेलमेट नहीं था, उन्होंने साधारण कमीजें या साड़ियाँ पहन रखी थीं और चिलचिलाती धूप में लैटेराइट पत्थरों के ब्लास्टिंग के बीच काम करने को मजबूर थे. ब्लास्टिंग के बाद वह कुछ अंकुसी और हथौडे़ लेकर पत्थर तोड़ने के लिए आये ताकि वह इन्तज़ार कर रहे ट्रकों में हाथों से लदाई करने के पहले उनकी छंटाई कर सकें.

वेदांत के सारे खनिक ठेका मजदूर हैं. अगर मैनपाट में उनका दिन अच्छा है तो वह एक टन खनिज की डिलीवरी के बदले 60 रुपये प्रतिदिन से थोड़ा अधिक (महिलाओं के लिए यह राशि कम होती है) कमा सकते हैं. उनका घर क्या है, झोपड़ी है जो खदान के ढलानों पर टिकी हुई है, बिजली पानी से एकदम विहीन. एक आदिवासी युवती मती साहू ने मुझे बताया कि ''करीब 150 परिवारों के लिए एक हैण्ड पम्प है. कम्पनी की तरफ से कोई दवा-दारू नहीं मिलता है और अगर कोई घायल हो जाता है तो उसे हमीं लोगों को टैक्सी किराये पर लेकर नीचे जाना पड़ता है.'' थोड़ा अलग हट कर एक बेहतर बस्ती में गाँव वालों ने शिकायत की कि दिन-रात खदान से सिलिका भरी धूल वाली हवा उनके घरों में बहती है और दीवारों तथा फ़र्श पर जमा होती रहती है. छत्तीसगढ़ में कोरबा अल्युमिनियम संकुल के विस्तार के कारण बढ़ी भूख और उड़ीसा में लांजीगढ़ रिफ़ाइनरी की बॉक्साइट की जरूरतों को पूरा करने के लिए वेदांत ने कवर्धा जिले के बोदई-दलदली की 10 किलोमीटर लम्बी पहाड़ियों की लूटपाट शुरू कर दी है. ये पहाड़ियाँ कान्हा नेशनल पार्क के साथ उफँचा सिर कर के खड़ी हुई हैं जिनके जंगलों को रुडयार्ड किप्लिंग ने अपनी 'जंगल बुक' में अमर कर दिया था. पिछले साल एक अंग्रेज मानव विज्ञानी और उसके एक भारतीय सहकर्मी ने यहाँ के बॉक्साइट खनन का अध्ययन किया था और पाया कि यहाँ के हालात मैनपाट से कहीं ज्य़ादा बदतर हैं.

परियोजना की राह के रोड़े बनी बैगा आदिवासियों की दो बस्तियों को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया का पालन किये हुए उनके घरों समेत उजाड़ दिया गया और उन्हें मैदानों में गैऱ-आदिवासी बस्तियों के बीच लाकर छोड़ दिया गया. उन्हें उनकी मक्के, तिलहन, चने और सरसों की फ़सल को काटने तक की मोहलत नहीं दी गई. उनकी गाय, भैंस, बकरियाँ वगैरह सब वहीं छूट गईं और जितनी ज़मीन उनके पास हुआ करती थी अब उसकी आधे पर अपनी जिन्दगी बसर करने के लिए वे मजबूर हैं. वेदांत के पहले मैनेजर ने 2005 में मुझे बताया कि वेदांत ने यहाँ जो खैऱात बाँटी उसमें नया घर बनाने के लिए 2,500 रुपये, एक हैण्ड पम्प और एक नई सड़क शामिल थी. कुछ मुआवज़ा भी लोगों को दिया गया था लेकिन मैनेजर ने यह स्वीकार किया कि वह बहुत कम था. उन्होंने यह भी कहा कि, ''अगर सरकार हमें कुछ अतिरिक्त भुगतान करने के लिए कहती है तो हम करेंगे.'' लोगों के प्रति हुई नाइन्साफ़ी से साफ़ तौर पर परेशान मैनेजर ने कहा कि लोगों को और अधिक नहीं हटाया जाना चाहिए, कम से कम कुछ समय के लिए तो हरगिज़ नहीं. इसके कुछ दिनों बाद मैनेजर को ही हटा कर मैनपाट भेज दिया गया और इसी बीच में कुछ अन्य परिवारों को ज़बर्दस्ती उनकी ज़मीन से बेदखल कर दिया गया या पहाड़ों पर खदानों के किनारे ठेल दिया गया ताकि वे झूलते रहें. अब उनकी नींद हर सुबह खदानों के धमाके और धूल भरी बारिश से खुलती है.17

उधर दक्षिण में तमिलनाडु में शेवारोयाँ और कोल्लि पहाड़ियों में वेदांत की सब्सिडियरी माल्को में कामगारों के हालात थोड़े बेहतर हैं. यहाँ बड़े पत्थरों को तोड़ने का काम जेसीबी मशीनों से होता है मगर छंटाई का काम मजदूर करते हैं. इतनी-सी सुविधा को 'मांगलिक' मानते हुए कम्पनी इसे अर्धमशीनीकरण कहती है लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभाव जघन्य हैं. मैनपाट में भले ही नाम के लिए ही सही, कुछ वनीकरण पर काम हुआ था. यह एक अलग बात है कि पूरे पौधारोपण में बाहर से लाए हुए और जल्दी उगने वाले पेड़ लगाये गये थे, स्थानीय किस्मों के पौधे नहीं. इनको भी ऊपरी मिट्टी और खदान के अपशिष्ट को मिला कर जैसे-तैसे गक्के में लगा भर दिया. मगर यहाँ इन पहाड़ियों में वेदांत ने वह नौटंकी भी नहीं की, बस पहाड़ियों को व्यवस्थित तरीके से नंगा करते गये.

बादलों की पृष्ठभूमि में पहाड़ के ये अंश घाव की तरह दिखाई पड़ते थे. पहाड़ों की यह कटाई ऊपर से नीचे एकदम सीधी दिशा में चलती है. जैसे-जैसे पहाड़ को छीलते जाते हैं वैसे-वैसे उसका अपशिष्ट और खुदा हुआ माल किनारे से नीचे की ओर ठेल दिया जाता है. इसका जो परिणाम होता है उसे बहुत अच्छी तरह से एक पादरी अरुल आनन्दन ने मुझे और मेरे एक सहयोगी नित्यानन्द जयरामन को बताया. पादरी आदिवासियों द्वारा चलाये जा रहे एक कॉफी प्लांटेशन के प्रबन्धन का काम करते थे. ''हमारी एक पहाड़ी को वेदांत ने ऊपर से 200 फुट नीचे तक सीधे तराश दिया है. सामने वाली चोटी पर अब उन्होंने एक नई खदान का काम शुरू किया है. ब्लास्टिंग से घबरा कर बहुत से बाइसन वहाँ से भाग निकले हैं. कम्पनी ने कुछ पेड़-पौधे जरूर लगाये थे पर उनमें से अधिकांश मर चुके हैं.

सबसे बुरा जो हुआ वह यह कि जब पानी बरसता है तब हमारी ज़मीन पर बाढ़ आ जाती है मगर सूखे के मौसम में इसका उलटा होता है. पानी के हमारे जितने सदानीरा स्रोत थे वे सब सूख गये हैं.'' वेदांत की खदानों के निचले हिस्सों में खेती की कोशिश करने वाले ग्रामीण बार-बार एक ही बात दुहराते हैं. जब से यहाँ खनन का काम शुरू हुआ तभी से सारे सोते सूख गये और इसका कारण जानना कतई मुश्किल नहीं है. पहाड़ों के ऊपर जमे बॉक्साइट में एक अद्‌भुत विशिष्टता होती है. यह बरसात के मौसम में पानी का संग्रह कर लेता है और बाकी समय में धीरे-धीरे उसे पहाड़ी के ढलानों और तलहटी तक छोड़ता रहता है. वेदांत को यह बुनियादी जल-विज्ञान मालूम ही नहीं है. 'कम्पनी के सामाजिक दायित्व' का बखान करते हुए मालिकों का एक बयान देखने लायक है,'' बॉक्साइट पेड़-पौधों के विकास में सहायक नहीं होता (जबकि) खनन से वनीकरण में मदद मिलती है.'' इसके विपरीत कोल्लि पहाड़ियों का वर्षों से अध्ययन कर रहे प्रकृतिवादी डॉ मारिमुत्थु बड़ी शिद्दत से कहते हैं कि, ''इन पहाड़ियों में कभी हमारे भारत के विज्ञ वैद्यों सिद्धरों का निवास हुआ करता था और ये जगहें देश के सबसे बड़े भेषज (दवाओं में प्रयोग होने वाली वनस्पतियों) उद्यान के तौर पर मशहूर थीं. इन पहाड़ों की ऊपर की मिट्टी हटा कर इनकी खुदाई कर दीजिए, हमारे यह संसाधन हमेशा-हमेशा के लिए लुप्त हो जायेंगे.18

उड़ीसा की नियमगिरि पर्वतमाला वहाँ रहने वाले डोंगरिया कन्ध जन-जाति के लिए पूजनीय स्थान माना जाता है और वेदांत की सभी सबसे महत्वपूर्ण लक्षित खदानें इन्हीं पहाड़ियों में हैं (इत्तेफ़ाकन आज से करीब एक शताब्दी पहले जिस अंग्रेज भूगर्भशास्त्री ने समृद्ध खनिजों वाली इस जगह को खोज निकाला था उसने इस खनिज को 'खोण्डालाइट' नाम देकर यहाँ रहने वाली कन्ध जन-जाति के प्रति सम्मान प्रकट किया था. यहाँ का रास्ता उसे कन्ध लोगों ने ही बताया था). अगर इस परियोजना को उसकी डिज़ाइन क्षमता तक चलने दिया गया तो क़रीब 660 हेक्टेयर घने जंगल की बलि चढ़ जायेगी जो कुल आरक्षित क्षेत्र का 90 प्रतिशत है. इसकी वजह से लगभग 100 नाले, झरने, सोते सूख जायेंगे और उन नदियों पर खतरा पैदा हो जायेगा जिनको इन साधनों से पानी मिलता है. वंशधारा नदी पर इसका विशेष रूप से प्रभाव पड़ेगा क्योंकि उसके पानी से मैदानी इलाकों में सिंचाई होती है.

लेकिन अग्रवाल तो इस बात के लिए इतने निश्चिन्त थे कि परियोजना सारी कानूनी अड़चनों को पार कर लेगी. उन्होंने 2003 में आस्ट्रेलिया के एक बड़े इंजीनियरिंग समूह, वॉर्ली पारसन्स को नियुक्त कर दिया कि वह यथाशीघ्र एक अल्युमिना रिपफ़ाइनरी का निर्माण कर दें ताकि नियमगिरी से निकलने वाले बॉक्साइट का शोधन किया जा सके. साइट की सफाई और निर्माण कार्य परियोजना को वन तथा पर्यावरण मन्त्रालय द्वारा स्वीकृति मिलने के पहले ही शुरू कर दिया गया था. तब रिफ़ाइनरी के नज़दीक के गाँवों में रह रहे अधिकांश मांझीकन्ध परियोजना के विरोध में बग़ावत में उठ खड़े हो गये. यह आग तब और भी ज्य़ादा भड़की जब 2004 में उनके दो गाँवों को मिट्टट्ठी में मिला दिया गया. वहाँ के बाशिन्दों को पुलिस ने बर्बरतापूर्वक उठा कर एक कंक्रीट की कॉलोनी में डाल दिया. योजना के आलोचक इसे 'यातना शिविर' मानते हैं.

अगर भारत के पर्यावरणवादियों और आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोग न होते तो अब तक कम्पनी द्वारा इन पहाड़ियों की लूट-पाट शुरू हो चुकी होती. सितम्बर 2004 में भू-वैज्ञानिक डॉ श्रीधर राममूर्त्ति-निदेशक, अकैडेमी ऑफ माउन्टेन एन्विरॉनिक्स, उड़ीसा के पर्यावरणविद्‌ विश्वजीत महन्ती और अधिकार रक्षक-प्रचारक सामन्त राय ने मिल कर उच्चतम न्यायालय की सेन्ट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी को आवेदन किया कि वह कम्पनी के क्रिया-कलाप को बन्द करवाये. इसके प्रत्युत्तर में उस वर्ष के अन्त में दो विशेषज्ञों को लांजीगढ़ भेज कर वस्तुस्थिति की जानकारी मांगी गई. ये लोग इस नतीजे पर पहुँचे कि वेदांत ने उड़ीसा सरकार की मिली भगत से ग़ैर-कानूनी ढंग से संरक्षित वनों का विनाश किया है और बिना समुचित अनुमति के रिफ़ाइनरी का निर्माण चालू कर दिया है तथा वहाँ के बाशिन्दों को बिना किसी जन-सुनवाई के उनकी ज़मीन और घरों से हटा दिया है. जनवरी 2005 में सेन्ट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने स्पष्ट रूप से कहा कि वेदांत ने उड़ीसा सरकार की मदद से बेशक कानून को तोड़ा है.

पाँच महीने बाद उड़ीसा के पर्यावरण संरक्षण समूह (एनवॉयर्नमेन्ट प्रोटेक्शन ग्रुप) के एक अध्ययन में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आई कि पूरा का पूरा नियमगिरि खनिज डिपॉज़िट संरक्षित जंगल क्षेत्र के ऊपर स्थित है जो लुप्तप्राय और दुर्लभ वनस्पतियों और पशु-पक्षियों का आवास-स्थान है. यहाँ की जैव-विविधता का दक्षिण एशिया में कोई सानी नहीं है जिसमें 30 औषधियों वाले पौधे, कम से कम 15 किस्म के एपीफ़ाइट ऑर्किड्‌स,
20 जंगली सजावटी पौधे, दस से ज्यादा फ़सली पौधों के जंगली सम्बन्धी (इनमें से कुछ अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के अधीन संरक्षित हैं), चीते, हाथी, तेन्दुए, रीछ, मुसंग और दूसरे बहुत से जानवर भी यहाँ पाये जाते हैं जिनमें बहुत से जानवर इन्टरनेशनल यूनियन फॉर दि कंजर्वेशन ऑफ नेचर द्वारा दुर्लभ प्रजातियों का दर्जा पाये हुए हैं. यहाँ बहुत से दुर्लभ पक्षी भी मिलते हैं और पाये जाने वाले जानवरों में अद्‌भुत सुनहरी छिपकिली, जंगली सांप और एक दुर्लभ गेहुँअन सांप शामिल है.19

सेन्ट्रल एम्पावर्ड कमेटी की 'वेदांत मामले' की चौथी सुनवाई दिल्ली में 28 अप्रैल 2005 को हुई जिसमें कम्पनी के मुख्य वकील सीए सुन्दरम के माध्यम से कम्पनी ने यह दलील देने की कोशिश की कि लांजीगढ़ में उसका रिफ़ाइनरी का काम मामूली सा हुआ है. यह सफेद झूठ था क्योंकि सेन्ट्रल एम्पावर्ड कमेटी की दिसम्बर 2004 वाली रिपोर्ट में न केवल यह बात दर्ज़ थी वरन वेदांत की अपनी वार्षिक रिपोर्टों (2004 तथा 2005) में दिये गये बयान तथा फोटो और वॉर्ली पारसन के वेब साइट पर भी यह घोषणा की गई थी कि परियोजना का काम चुस्त मगर दुरुस्त तरीके से चल रहा है.

इस मुकाम पर आकर वेदांत ने पेशकश की कि रिफ़ाइनरी की साइट का कुछ हिस्सा अगर जंगल की ज़मीन है तो वह वहाँ से हट जायेगा. कम्पनी ने यह भी कहा कि नियमगिरि की पहाड़ियों से उसकी कोई अपेक्षा नहीं है. सुन्दरम के अनुसार अब यह उड़ीसा माइनिंग कार्पोरेशन पर निर्भर करता था कि वह कम्पनी के खनन परमिट वाली दरख़्वास्त पर आगे विचार करना चाहता है या नहीं. इससे ज्य़ादा कपटपूर्ण बात हो ही नहीं सकती थी.

सेन्ट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने पहले ही राज्य सरकार द्वारा गलत तरीके से खदान को स्थाई रूप से रिफ़ाइनरी से जोड़ कर दोनों को एक ही परियोजना बनाने और उसके लिए एक ही पर्यावरणीय प्रभाव के मूल्यांकन को स्वीकार किये जाने पर एतराज किया था. स्टरलाइट का एक मेमोरण्डम ऑफ अंडरस्टैंडिंग उड़ीसा माइनिंग कार्पोरेशन के साथ 1997 में पहले ही हो चुका था जिसका फिर जून 2003 में पुनर्नवीनीकरण हुआ था. इसके अनुसार वेदांत को प्रसिद्ध नियमगिरि खदान के लिए अधिकांश पूंजी और प्रबन्धन विशेषज्ञता मुहैया करनी थी और इसके बदले में इंग्लैण्ड की इस कम्पनी द्वारा उत्खनित माल को खरीदने का पहला हक इसी कम्पनी को दिया गया था.

2005 सितम्बर में सेन्ट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने वेदांत द्वारा नियमगिरि को लूटने की योजना पर एक निन्दात्मक रिपोर्ट प्रकाशित की.20 इसमें एक स्वर से स्पष्ट किया गया था कि नियमगिरि का उत्खनन नहीं होना चाहिए जबकि वेदांत से अभी तक ग़ैर-कानूनी ढंग से लांजीगढ़ रिपफ़ाइनरी के निर्माण के बारे में कोई जवाब आना बाकी था. लेकिन इस मसले पर कोई फैसला देने के पहले 2006 के प्रारम्भ में न्यायालय ने इसे फॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी के पास उसकी राय जानने के लिए और एक विस्तृत तकनीकी मूल्यांकन करने के लिए भेज दिया जिसे तीन महीने के अन्दर पूरा किया जाना था. इनमें से दो अध्ययन पूरे किये गये. पहला वाइल्ड लाइफ़ इन्स्टीट्यूट ऑफ इण्डिया-देहरादून ने वन्य जीवन पर प्रभाव के लिए किया और दूसरा सेन्ट्रल माइन प्लानिंग एण्ड डिज़ाइन इन्स्टीट्यूट (सीएमपीडीआई)-रांची ने खनन के तकनीकी पक्ष पर किया. वाइल्ड लाइफ़ इन्स्टीट्यूट की रिपोर्ट किसी तरह से लीक हो गई मगर इसमें कोई सन्देह नहीं था कि इस सम्मानित संस्था ने नियमगिरि के उत्खनन को सीधे शब्दों में ख़ारिज कर दिया.21 मगर फॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी ने अक्टूबर महीने में जंगल की ज़मीन को कुछ शर्तों के साथ परियोजना को हस्तान्तरित करने के लिए स्वीकृति दे दी.

ये सब रिपोर्टें अन्ततःन्यायालय को पिछले साल दिसम्बर में दे दी गईं जब वेदांत के एक वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि नियमगिरि पर खनन के बिना रिफ़ाइनरी चल ही नहीं सकती. वकील साहब ने जो कुछ भी बताया उसे परियोजना के आलोचक बहुत पहले से जानते थे. उन्होंने, सेन्ट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी के समक्ष और आम जानकारी देने के लिए, कम्पनी द्वारा दिये गये बयानों को गस्त्र-मस्त्र कर दिया था. अगस्त 2006 में हुई वार्षिक जनरल मीटिंग के बाद वेदांत ने कई बार यह बयान दिया है कि नियमगिरि पहाड़ियों से मिलने वाले बॉक्साइट के बिना भी वह अपनी रिफ़ाइनरी चला सकता है.

यह सब की जानकारी में है कि कम्पनी मध्य-2006 से काफ़ी मात्रा में आयातित खनिज लांजीगढ़ में इकट्ठा  कर रही है. इसी बीच न्यायालय ने तय किया है कि फॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी का गठन गलत तरीके से हुआ था क्योंकि इसमें स्वतंत्र सदस्य शामिल ही नहीं थे.22

यह लेख लिखने के समय तक नई फॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी ने अभी तक अपनी रिपोर्ट नहीं दी है.

उपसंहार : ''हमारा वेदांत''

दुनिया की किसी भी खनन कम्पनी ने इस तरह से अपने आपको प्रतिष्ठित नहीं किया जैसा कि वेदांत ने किया है. इसे एक ओर अपने भारतीय मूलपर नाज़ है और यह देश के औद्योगिक विकास में मदद करने के लिए कटिबद्ध है (इसने आणविक विद्युत केन्द्रों के निर्माण में रुचि दिखाई है, निजी कोयला खदानों के क्षेत्र में काम करना चाहती है, लौह अयस्क की खदानों को हासिल करना चाहती है,23 और कोलार की सोना खदानों के लिए बोली लगा रही है), वहीं इसने ऑस्ट्रेलिया, ज़ाम्बिया और अर्मेनिया में वर्तमान सेंधमारी के अलावा दुनिया की बहुत-सी जगहों पर अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए नज़रें गड़ा रखी हैं.

अनिल अग्रवाल यह दावा जरूर करते हैं कि उनके मुनाफ़ा कमाने से साथीभारतीयों को फ़ायदा पहुँचता है मगर हकीकत यह है कि उनका प्रक्षेपण एकदम उलटी दिशा में है.

दरअसल उनका पहला उद्देश्य अपने परिवार के ज़खीरे को बड़ा करना है और अपने विदेशी निवेशकों को उनका लाभांश पहुँचा देना है. अब तक किसी ने भी, लक्ष्मी मित्तल या टाटा बन्धुओं समेत, इतने व्यवस्थित और निन्दनीय तरीके से अपनी मातृ-भूमि को नंगा नहीं किया है, अपने कामगारों का इतना शोषण नहीं किया है, और न ही कभी निर्दयी लुटेरों की तरह उन समुदायों के अधिकारों का हनन किया है जिन्हें तथाकथित रूप से भारत के संविधान से सुरक्षा मिली हुई है. सच यह भी है कि पिछले 2 वर्षों में किसी भी खनन कम्पनी का आर्थिक रूप से इतना विकास नहीं हुआ है जितना इस कम्पनी का हुआ, जिसने अपने मुनाफ़े को इसी दौरान लगभग दोगुना कर दिया.

वेदांत को शुद्ध रूप से एक मानक की तरह भारतीय चमत्कार मानने को मन करता है और सचमुच इस निष्कर्ष पर पहुँचना ही होगा कि अग्रवाल ने जान-बूझ कर इस कम्पनी को इस तरह से गढ़ा है कि वह उच्चवर्णीय हिन्दुत्व का एक तार्किक विस्तार लगे, मगर प्रगट रूप में वह धर्मनिरपेक्ष दिखाई पड़े. उनका यह प्रस्ताव कि वह पुरी के पवित्र धाम के पास उड़ीसा में 'हार्वर्ड की तर्ज़ पर' एक वेदांत विश्वविद्यालय की स्थापना करेंगे, इसकी एक मिसाल है. इस विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए किसी 'योग्यता' की आवश्यकता नहीं होगी, (अर्थात इसमें मध्य वित्त वर्ग और सम्पन्न वर्ग के लोगों के लड़के-लड़कियों के लिए खास स्थान होगा और उनसे - अभिभावकों से- यह अपेक्षा रहेगी कि वे वेदांत के सभी सही-गलत कामों का समर्थन करते रहें). लेकिन इसके पहले कि इस दिव्य भवन की आधारशिला रखी जाए, वेदांत ने खुद आदिवासियों के मनुष्य और प्रकृति के बीच के सम्बन्धों की मनोभावना को निर्दयतापूर्वक निष्क्रिय कर दिया है और उनकी आध्यात्मिकता को ठिकाने लगा दिया है.

लांजीगढ़ रिफ़ाइनरी के निर्माण के लिए चौरस या उजाड़ कर दिये गये किसी भी क्षेत्र में अगर कोई जाये तो उसे हर गाँव में एक साइन बोर्ड लिखा मिलता है और उस पर स्पष्ट शब्दों में लिखा मिलता है कि यह 'हमारे वेदांत' का हिस्सा है.

यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है. अस्सी के दशक में सुनने में आया था कि मध्य-पूर्व में एक इस्लामिक मिनरल्स जैसी कोई कम्पनी वजूद में आई थी और ऑस्ट्रेलिया में वहाँ की आदिम जन-जातियों के एक समूह ने क्रिश्चियन मिनरल कम्पनी शुरू की थी. मगर इन लोगों ने अपने पंथ के मूल पर कोई परदा डालने की कोई कोशिश नहीं की थी और शायद इसीलिए उनका जीवन काल बहुत छोटा रहा क्योंकि आजकल के समय में कड़ी व्यापारिक स्पर्धा में यह सब टिक नहीं सकता. इसके विपरीत अग्रवाल उद्योग ने हिन्दुत्व और नव-उदार रूढ़िवादिता का मिश्रण करने में एक ज़बर्दस्त सफलता अर्जित की है भले ही यह सफलता बेतुकी क्यों न हो. परेशानी की बात यह है कि इसका चेहरा जीनस की तरह है जिससे अधिकांश भारतीयों को कोई समस्या नहीं होती, फिर चाहे वह अपनी खुद की ओर देख रहे हों या दुनिया के दूसरे लोगों को इसे दिखा रहे हों.

फुटनोट
1. वास्तव में जब मैं यह लेख लिख रहा था तब मुझसे डाउ जोन्स इंग्लैण्ड के एक खनन संवाददाता ने ठीक यही सवाल पूछा था.

2. ग्लेनकोर की स्थापना बदनाम माल विक्रेता मार्करिच और उसके साथ इन्वेस्टमेन्ट बैंक-क्रेडिट स्विस के बहुत से करार के उत्तराधिकार के लिए की गई थी. इस कम्पनी के पास एक्सस्ट्राटा के 40 प्रतिशत इक्विटी शेयर हैं जो दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी खनन कम्पनी है.

3. लक्ष्मी मित्तल को बहुत से भारतीय लोग ग़लती से स्थानीय उद्योगपति समझ बैठते हैं मगर उनके साथ ऐसा कुछ भी नहीं है. उनके नाम पर आधारित कम्पनी (आर्सेलर-मित्तल जो लक्जमबर्ग की सबसे बड़ी इस्पात बनाने वाली कम्पनी थी जिसे मित्तल ने पिछले साल खरीद लिया था) रॉटरडम में निबन्धित है. कई कोशिशों के बावजूद इन्हें आज तक भारत में किसी खदान या प्लांट को हासिल करने में सफलता प्राप्त नहीं हुई है.

4. देखें-Armenia may start prosecution of Vedanta-controlled Zod gold mine” by John Helmer, Mineweb, February 28, 2007. अग्रवाल द्वारा कम्पनी सम्बन्धी समस्याओं को नियंत्रित करने के बावजूद स्टरलाइट गोल्ड कुछ समय से घाटे में चल रही है. उन्होंने वायदा किया था कि इस खदान के नज़दीक ही एक नई मिल के लिए वह कम से कम 8 करोड़ अमरीकी डॉलर की व्यवस्था करेंगे मगर ऐसा हो नहीं सका. इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिये क्योंकि कोई भी निवेशक राजनीतिक रूप से अस्थिर अज़रबाइजान की सीमा से एकदम लगे हुए घाटे में चल रहे प्रकल्प में अपनी पूंजी फंसाना नहीं चाहेगा. इसके अलावा अग्रवाल ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वह परिवेश संरक्षित सेवन झील के पास, जो पवित्र माउन्ट अराफ़ात के पीछे अवस्थित है, एक रिफ़ाइनरी लगाने की तलाश में हैं. जब वह स्टरलाइट गोल्ड को वापस 2006 में वेदांत रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी में ले आये तब उनकी इंग्लैण्ड स्थित कम्पनी ने 6 करोड़ अमरीकी डॉलर अर्मेनियन कम्पनी को खरीदने के लिए दिये थे जिसमें आधे से ज्य़ादा अग्रवाल और उनके परिवार के सदस्यों ने हड़प लिये. यह एक चालबाज़ी भरी अन्दरूनी खरीद-फरोख्त थी जिस पर इंग्लैण्ड के फ़ाइनेन्शियल प्रेस ने कोई टिप्पणी करने की तकलीफ़ नहीं उठाई. इससे भी ज्य़ादा बुरी बात यह थी कि इस करार को उस 'जिम्मेदार' अकाउन्टैन्सी फर्म अर्न्स्ट एण्ड यंग की सहमति का ठप्पा भी लग गया (यह फर्म वेदांत की लेखा-परीक्षक है). ज़ॉड खदान प्रकल्प में अग्रवाल के प्रारम्भिक पार्टनर एक बदनाम हस्ती रॉबर्ट फ्रीडलैण्ड थे जिन्हें लोग 'टॉक्सिक बॉब' (जहरीले बॉब) के नाम से जानते थे. बॉब अमेरिका से 1992 में उस समय भाग निकले जब उनकी कोलोरैडो स्थित समिटविल सोना खदान के साइनाइड भरे लीच पैड से ज़हरीला कचरा निकल कर स्थानीय नदी-नालों में बहने लगा. फ्रीडलैण्ड को आपराधिक लापरवाही की सज़ा सुनाई गई लेकिन जेल जाने की कौन कहे वह कभी पूरे दिन के लिए अदालत में भी नहीं रहा.

5. देखें-Alastair Fraser and John Lungu, For Whom the Windfalls: Winners and Losers in the Privatization of Zambia’s Copper Mines, published by Civil Society Trade Network of Zambia, and the Catholic Centre for Justice Development and Peace, Zambia Episcopal Conference, Lusaka, March 2006. इस रिपोर्ट के अनुसार ''6 नवम्बर 2006 को पूरे चिन्गोला जिले (उत्तर ज़ाम्बिया) में पानी की किल्लत हो गई क्योंकि केसीएम प्लांट की खदानों से निकलने वाले अपशिष्ट के फैलने के कारण काफ्य़ू नदी का पानी प्रदूषित हो गया. पानी की आपूर्ति करने वाली दो कम्पनियाँ, जो चिन्गोला आवासीय क्षेत्र के 75,000 निवासियों को पानी की आपूर्ति करती हैं, उनको अपने प्लांट बन्द कर देने पड़े क्योंकि केसीएम प्लांट के टेलिंग लीच प्लान्ट से घोल ले जाने वाला एक पाइप फट गया और काफ्य़ू नदी का पानी एकाएक नीला हो गया. नदी के पानी में कचरा मिल जाने के कारण नदी के पानी में ताँबे की मात्रा स्वीकृत मानक से 1,000 प्रतिशत अधिक हो गई. मैंगनीज़ 77,000 प्रतिशत और कोबाल्ट की मात्रा इस पानी में10,000 प्रतिशत ज्य़ादा हो गई.''

''... काफ्य़ू नदी जैसे प्रदूषित पानी का खाने-पीने में उपयोग करना, नदी में मिलने वाली मछलियों का सेवन, या उसी प्रदूषित पानी से पेड़-पौधों की सिंचाई करने से स्वास्थ्य पर तात्कालिक या दीर्घकालिक दुष्प्रभाव पड़ने की काफ़ी सम्भावना है. जिस तरह के रासायनिक पदार्थ नदी के पानी में घुल गये हैं उनसे फेफड़े और दिल की बीमारियाँ या सांस की समस्याएं हो सकती हैं और जिगर तथा गुर्दे खराब हो सकते हैं. तात्कालिक प्रभाव यह हुआ है कि बड़ी संख्या में लोग पेचिश, आंख में संक्रमण और त्वचा में परेशानी महसूस कर रहे हैं. ये सब दूरगामी दुष्प्रभावों में प्रदूषण के प्राथमिक चिह्न हो सकते हैं. ज्य़ादा मात्रा में मैंगनीज़ से सम्पर्क के कारण 'मैगेनिज्म' नाम की बीमारी हो सकती है जो केन्द्रीय स्नायु प्रणाली की एक बीमारी है. इससे मानसिक और स्नायुविक प्रक्रियाओं पर बुरा असर पड़ सकता है. स्थानीय आबादी पर मस्तिष्क पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों में पीढ़ियों का अन्तर पड़ सकता है.''

ज़ाम्बिया की एवॉयर्नमेन्ट काउन्सिल का कहना था कि केसीएम द्वारा यह एक पर्यावरणीय लापरवाही की मिसाल है जिसके कारखाने में कई बार पाइप फटने की दुर्घटना हो चुकी है. कई बार तो ऐसा हुआ है कि बहुत जगह जनता को साल भर से अधिक समय के लिए प्रदूषित पानी मिला है. ईसीजेड के एक प्रवक्ता ने शिकायत की कि, ''केसीएम द्वारा पर्यावरणीय प्रबन्धन कम्पनियों के सामाजिक उतरदायित्व का यह एक स्पष्ट उदाहरण है.'' पूरी रिपोर्ट के लिए देखें- http://minewatchzambia.com/reports/report.pdf.

6. Impact of Privatization of labour : A study of BALCO Disinvestment, published by V. V. Giri National
Labour Institute, January 2007.

7.“Vedanta asked to stop construction” The Hindu, March 11, 2007.

8. वेदांत को बाजार में उतारने में मुख्य भूमिका किस शख़्स की थी, यह 2006 के मध्य तक U. K. Financial Times’ ने ज़ाहिर नहीं किया था. यह साहब थे इयान हन्नाम, तथाकथित 'जनता के सिपाही', जेपी मॉर्गन कैसेनोवा के कार्यकारी निदेशक, गल्फ़-एसएएस (स्पेशल एअर सर्विसेज़) के भूतपूर्व अपफ़सर जो इस विश्वस्तरीय निवेशक बैंक में कैपिटल मार्केट के अध्यक्ष हैं. हन्नाम ने दुनिया की सबसे बड़ी खनन कम्पनी बीएचपी बिल्लिटन की लन्दन में लिस्टिंग की व्यवस्था की थी और साथ हीकज़ाकमीज़, जो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी यूरेनियम कम्पनी है, की भी लिस्टिंग में उनका हाथ था. देखें-फाइनेन्शियल टाइम्स, जून-3/4, 2006.

9. लन्दन स्टॉक एक्सचेंज में दिसम्बर 2003 में वेदांत की लिस्टिंग के ठीक पहले फाइनेन्शियल टाइम्स के पहेलियाँ बुझाने वाले स्तम्भकार 'लेक्स' ने स्वीकार किया था कि, ''(स्टरलाइट) की संरचना बड़ गूढ़ है और उसके कार्पोरेट गवर्नेंस का उतार-चढ़ाव का इतिहास रहा है.'' अब यह तो पता नहीं कि यह संरचना जान-बूझ कर इसलिए बनाई गई है कि अनिल अग्रवाल के संदिग्ध सम्पर्कों को भारत के आर्थिक अण्डरवर्ल्ड के उनसे भी ज्य़ादा संदिग्ध व्यक्तियों से सम्पर्क को छिपाया जा सके, लेकिन इतना तय है कि यह संरचना पारदर्शी नहीं है. उस समय तक स्टरलाइट की 'दुरूह संरचना' की जड़ में टि्‌वन स्टार होल्डिंग्स के नाम से एक दूसरी संस्था टैक्स रियायतों के स्वर्ग, मॉरिशस, में हुआ करती थी और माना जाता है कि उसी के पास स्टरलाइट उद्योग का अधिकांश मालिकाना था. टि्‌वन स्टार ने अपना पहला समुद्र पार कदम 1998 में रखा था जब उसने कनाडा की फर्स्ट डाइनेस्टी माइन्स में बड़े इक्विटी निवेश के लिए हामी भरी थी जिसका संस्थापक एक बहुत ही विवादास्पद आर्थिक निवेशक रॉबर्ट 'टॉक्सिक बॉब' फ्रीडलैण्ड हुआ करता था. टि्‌वन स्टार के जरिये स्टरलाइट कम्पनी फर्स्ट डाइनेस्टी में 75 लाख अमरीकी डॉलर निवेश करने के लिए राज़ी हो गई जिससे भारतीय कम्पनी को अपने तीन निर्देशक नियुक्त करने का अवसर प्राप्त हुआ और अन्ततः यह कनाडा स्थित कम्पनी का 43 प्रतिशत हिस्सा ले बैठी. अग्रवाल का मुख्य उद्देश्य किसी तरह स्टरलाइट को अर्मेनिया में फर्स्ट डाइनेस्टी के ज़ॉड स्वर्ण परियोजना में घुसाना था. अग्रवाल और उसके दो सहयोगी वास्तव में फर्स्ट डाइनेस्टी के बोर्ड के सदस्य भी थे और उसके तुरन्त बाद फर्स्ट डाइनेस्टी में टि्‌वन स्टार का निवेश पूरा हो गया.

टि्‌वन स्टार के बारे में फिर 2003 तक कुछ खास सुनने को नहीं मिला जब इस कम्पनी ने पुष्टि की कि होल्डिंग कम्पनी के पास स्टरलाइट का 55 प्रतिशत स्टॉक है और उसके साथ 7.13 प्रतिशत का मालिकाना स्टरलाइट की मद्रास अल्युमिनियम कम्पनी (माल्को) का था जिसका 80 प्रतिशत खुद टि्‌वन स्टार के कब्ज़े में था. तब अक्टूबर में, जब वेदांत की इंग्लैण्ड में निरीक्षण के लिए परेड चल रही थी उसके ठीक बाद, टि्‌वन स्टार कम्पनी ने यह घोषणा की कि वह स्टरलाइट में अपनी हिस्सेदारी 75 प्रतिशत करना चाहती है. भारतीय अधिकारियों ने इस बात पर चिन्ता व्यक्त की कि बाल्को और हिन्दुस्तान जिंक का हस्तान्तरण अब किसी दूसरे विदेशी मालिक को कर दिया जायेगा जबकि इस तरह के हस्तान्तरण को खास तौर पर उस समय ग़ैर-कानूनी चिह्नित किया गया था जब स्टरलाइट ने इन कम्पनियों का अधिग्रहण किया था. जब अधिकारी अपनी इस दुविधा से समझौता करने की कोशिश कर रहे थे उसी समय वित्त मंत्रालय की विदेशी निवेश इकाई ने स्पष्ट किया कि टि्‌वन स्टार के असली मालिक अग्रवाल थे ही नहीं बल्कि यह कोई विनोद शाह था. लन्दन में रहने वाले एक दूसरे अप्रवासी भारतीय शाह ने अपनी होल्डिंग कम्पनी वोल्कन इन्वेस्टमेन्ट लिमिटेड के माध्यम से टि्‌वन स्टार का शत प्रतिशत मालिकाना अपने हाथ में लिया हुआ था.

उस समय यह स्पष्ट नहीं था कि सेबी के 'सब्सटेन्शियल अक्वीजीशन ऑफ शेयर्स एण्ड टेक ओवर्स' नियमों का उल्लंघन हुआ था या नहीं. लेकिन यह निश्चित था कि वेदांत की लिस्टिंग के समय वोल्कन इन्वेस्टमेन्ट लिमिटेड (वापस?) अग्रवाल के हाथों में आ चुकी थी. अगस्त 2006 में, जैसा कि वेदांत की वार्षिक रिपोर्ट (30 सितम्बर 2006) की एक उप-संचिका में कहा गया है कि एक दूसरी अज्ञात सब्सिडियरीवेल्टर ट्रेडिंग ने टि्‌वन स्टार इन्टरनेशनल लिमिटेड के 100 प्रतिशत पर कब्ज़ा जमा लिया था.

10. ऐसा लगता है कि माइकेल फाउल ने वेदांत को खुशगवार माहौल में छोड़ा लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि वह कम्पनी छोड़ने के लिए एक बहुत अच्छे पैकेज की वजह से ही आकर्षित हुआ, रोडियर ने कभी यह नहीं बताया कि उसने इस्तीफ़ा क्यों दिया. एक तार्किक अनुमान यह हो सकता है कि इस स्वनामधन्य पेशेवर आदमी ने जो कि पहले फ्रेंन्च एटॉमिक एनेर्जी एजेन्सी में काम कर चुका था और फिर पिचिनी अल्युमिनियम के शीर्ष पद पर था, वेदांत पर अनिल अग्रवाल की मजबूत पकड़ के कारण उत्तरोत्तर परेशान रहा करता था. अग्रवाल की ज्य़ादा दखलअंदाजी भी उसे खलती थी.

11. देखें-वेदांत रिसोर्सेज़ पब्लिक लिमिटेड कम्पनी, वार्षिक रिपोर्ट-2006, पृष्ठ 50.

12. वास्तव में यह बात पिछले साल उड़ीसा स्थित पत्रकार और एक्टिविस्ट समरेन्द्र दास ने वेदांत की वार्षिक साधारण सभा में उठाई थी. जवाब में अग्रवाल ने वायदा किया था कि उनके 'दान-धर्म' का फायदा पाने वाले भारतीय राजनीतिज्ञों की सूची वह उपलब्ध करवा देंगे पर यह आज तक नहीं किया गया.

13. सेबी ने स्टरलाइट और दो भारतीय निजी कम्पनियों की अन्दरूनी खरीद-फरोख्त की तीव्र भर्त्सना की
थी. यह एक ऐसा फैसला था जिसके बारे में फ्रन्टलाइन के स्तम्भकार प्रफुल्ल बिदवई ने कहा कि ''यह स्टॉक मार्केट में कम्पनियों की अंधेरगर्दी के ख़िलापफ़ किसी संवैधानिक संस्था द्वारा किया गया सबसे बड़ा अभियोग पत्र है.'' स्टरलाइट पर 2 वर्षों के लिए बाजार से पैसा उठाने पर पाबन्दी लगा दी गई और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के 34 दलालों को भी इस स्कैम में हेरा-फेरी का दोषी पाया गया. कहा जाता है कि अनिल अग्रवाल ने शेयर के दामों में दग़ल फसल के लिए एक 'प्रमोटर' हर्षद मेहता के साथ षडयंत्र किया. 6 साल पहले 1992 में मेहता को स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया से रसीद 'गायब' हो जाने का हवाला देकर 5 अरब रुपये हजम करने का दोषी पाया गया था. लेकिन इतना होने के बावजूद बाद में उसे स्टॉक खाली करने का टिप देने और बाजार के रुझान बताने वाली वेबसाइट चालू करने से रोका नहीं जा सका. अखबारों में भी उसकी छद्म 'प्रबुद्धि’ का प्रसारण करने से नहीं रोका जा सका. मेहता ने अपनी संदेहजनक सेवाएं उन कम्पनियों को भी अर्पित करने की पेशकश की जिनकी माली हालत ख़स्ता थी. स्टरलाइट इस सूची में शामिल थी.

सेबी द्वारा की गई जांच-पड़ताल से पता लगा कि अप्रैल से लेकर जून 1998 के बीच जब स्टरलाइट ने इण्डिया अल्युमिनियम कम्पनी को हासिल करने की एक नाकाम कोशिश की थी तब उसका स्क्रिप प्राइस 41 प्रतिशत बढ़ गया था लेकिन उसका जो वास्तविक परिवर्तन मूल्य था उसका बोझ कम्पनी की पहुँच से बाहर था. मेहता के पास पैसा तो बड़ा सीमित था पर उसने अग्रणी कम्पनियों का एक बहुत बड़ा नेटवर्क बना रखा था. सामूहिक रूप से दमयन्ती ग्रुप के नाम से जाने वाले इस समूह ने शीघ्र ही स्टरलाइट के अच्छे खासे फ्रलोटिंग स्टॉक का अधिग्रहण कर लिया जिसमें 30,000 शेयर इसके मद्रास सहयोगी के माध्यम से कर्ज़ के रूप में मिले (देखें-बिज़नेस इण्डिया, मार्च 13, 2005). कर्ज़ की अदायगी में दिक्कतें आने पर दमयंती ग्रुप ने अपनी पोज़ीशन्स को एक स्टॉक एक्सचेंज से दूसरे एक्सचेंज में 'रोल' करना शुरू कर दिया. दलालों के बीच में यह हस्तांतरण क्रेडिट नोटों के माध्यम से होता था. पैसा पास में न होने की वजह से हर्षद मेहता आखिरकार दिवालिया हो गया. जब सेबी ने इन अग्रणी कम्पनियों की छानबीन शुरू की और उनका हर्षद मेहता से रिश्ता जानना शुरू किया तब उसके चट्टे-बट्टे ने उलटी-सीधी बातें बता कर जांचकर्ताओं को गुमराह करने की कोशिश की. अंततः सेबी ने टेलीफोन बिलों के सहारे, वकीलों को दी गई फ़ीस और दूसरे दलालों की जांच-पड़ताल करके कार्पोरेट के काले कारनामों पर से परदा हटाया. ब्यूरो को पता लगा कि कम्पनियों ने हर्षद मेहता को पैसा उधार दिया ताकि वह अपनी पोज़ीशन मजबूत कर सके, बाज़ार में एक अप्राकृतिक उछाल आये और अंततः सारे निवेशों की हवा निकल जाये. एक तरह से यह 'एनरॉन स्कैम' का एक प्राथमिक भारतीय प्रतिरूप था. मेहता की बाजार में हाथ की सफाई के पीछे उसकी तीन भारतीय कम्पनियों-बीपीए, वीडियोकॉन और स्टरलाइट से रब्त-जब्त था. यह तीनों कम्पनियाँ पूंजी बाजार से पैसा उठाने के लिए क्रमशः चार, तीन और दो वर्षों के लिए प्रतिबन्धित थीं. लेकिन सिक्यूरिटी अपैलैन्ट ट्राइब्यूनल में स्टरलाइट ने सफलतापूर्वक यह दलील रखी कि इस आदेश का कोई कानूनी औचित्य नहीं है और इस तरह से उस पर से प्रतिबन्ध हटा लिया गया. इस निमित्त सेबी ने स्टरलाइट के ख़िलाफ़ जो नए सबूत ट्राइब्यूनल के सामने रखे उसे दुर्भाग्यवश ट्राइब्यूनल ने नहीं माना. 2001 में मेहता की हृदय गति रुक जाने से मृत्यु हो गई.

14. तूतीकोरिन में 1994-95 के बीच वेदांत द्वारा किये गये उल्लंघनों की एक सिलसिलेवार रिपोर्ट अक्टूबर 2005 में एक जाने माने पर्यावरणीय पत्रकार नित्यानन्द जयरामन ने मद्रास स्थित ’दि अदर मीडिया के कारपोरेट अकाउन्टेबिलिटी डेस्क’ के लिए तैयार की थी. संक्षेप में जो अभियोग बनते हैं वे यहाँ नीचे दिये गये हैं,
  • संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा चिर्ति मन्नार की खाड़ी के स्पेशल बायोस्फियर रिज़र्व से स्मेल्टर केवल 14 किलोमीटर की दूरी पर था जबकि कानून यह कहता है कि सारे औद्योगिक प्रतिष्ठान यहाँ से कम से कम 25 किलोमीटर के पफासले पर होने चाहिए.
  • कम्पनी (उस समय स्टरलाइट) द्वारा काम शुरू करने के पहले न तो पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का कोई मूल्यांकन हुआ और न ही वैसा कोई अनुमोदन हुआ.
  • इस तरह का कोई कारखाना शुरू करने के पहले जन-सुनवाई का प्रावधान होता है. यह तब तक नहीं हुई जब तक 2003 में स्टरलाइट कम्पनी वेदांत के हाथ में नहीं चली गई मगर तब तक स्मेल्टर को काम करते हुए 7 साल बीत चुके थे. उस समय तक भी, प्लांट के विस्तार के लिए मुख्य इकाइयों की स्वीकृति नहीं मिली थी मगर कम्पनी ने अपने उत्पादन का जोविस्तार कर लिया हुआ था वह उसकी स्वीकृत कानूनी सीमा से चार गुने से भी ज्यादा था और उसके पास तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति भी नहीं थी.
  • सितम्बर 2004 में (जब वेदांत रिसोर्सेज़ प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी को टूटीकोरिन स्मेल्टर का अधिग्रहण किये हुए 9 महीने का समय बीत चुका था) भारत के उच्चतम न्यायालय की हैज़ार्डस वेस्ट्‌स मॉनिटरिंग कमेटी ने पाया कि कम्पनी अनापत्ति प्रमाण-पत्र की चार मुख्य शर्तों का उल्लंघन कर रही थी. साइट पर हजारों टन आर्सेनिक-प्रदूषित स्लैग का मौजूद रहना खास तौर पर चिन्ताजनक था. एक सप्ताह बाद कमेटी ने उच्चतम न्यायालय से सिफ़ारिश की कि तूतीकोरिन में वेदांत के विकास की पूरी प्रक्रिया को गैऱ-कानूनी करार कर दिया जाए.
  •  इसके बावजूद तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 2004 अप्रैल में वेदांत के विस्तार के लिए बीती तारीखों से अनुमति प्रदान कर दी.
  • एक माह बाद (मई 2005 में) हैजार्ड़स वेस्ट्‌स मॉनिटरिंग कमेटी ने तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सफाई मांगी कि ग़ैर-कानूनी कामों को करने के लिए अनुमति कैसे दी गई? आज तक इसका कोई सन्तोषजनक उत्तर बोर्ड की ओर से नहीं दिया गया है.

15. ''बाल्को करार आर्थिक रूप से असंगत, राजनैतिक दृष्टि से निन्दनीय, कानूनी तौर पर अमान्य और पर्यावरणीय लिहाज़ से गलत है...यह भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये मौलिक अधिकारों पर ऐतिहासिक समता फैसले का उल्लंघन है जिसमें कहा गया है कि आदिवासियों की जमीन पर केवल उन्हीं का अधिकार है....'' (प्रफुल्ल बिदवई, फ्रन्टलाइन मई 12.25, 2001).

16. वीवी गिरी रिपोर्ट के अनुसार कर्मचारियों पर 'दबाव' डाला गया कि वे स्वैच्छिक अवकाश योजना के तहत रिटायरमेन्ट ले लें. जिन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया उन्हें परेशान किया गया. वेदांत ने स्वैच्छिक अवकाश की जो रणनीति अपनाई थी उसका मकसद था ''उनके आत्म सम्मान को ठेस पहुँचा कर बेइज्जत करना और कम्पनी के प्रति उनकी निष्ठा पर शक करना.'' जिन लोगों ने स्वैच्छिक अवकाश लेने की पेशकश की उनके पैसों का भुगतान पाँच किस्तों में किया गया और हर भुगतान के बीच छः महीने का अन्तर रखा गया. 1,302 कर्मचारियों को स्वैच्छिक अवकाश मिला जिनमें से लगभग सभी को (1,281) पैसों का भुगतान देर से किया गया. स्वैच्छिक अवकाश स्वीकृत किये जाने के बावजूद कर्मचारियों के 25,000 से 50,000 रुपयों तक की राशि को कम्पनी ने अपने पास रखा. नई दिल्ली कार्यालय और बिधानबाग इकाई में काम कर रहे कर्मचारियों को बड़ी संख्या में कोरबा अल्युमिनियम कॉम्प्लेक्स भेज दिया गया और वहाँ उन्हें स्वैच्छिक अवकाश लेने पर मजबूर किया गया. अगर उन लोगों ने स्थानान्तरण के विरुद्ध आवाज उठाई तो ''उनकी तनख़्वाह और भत्ते रोक दिए गये जिनका भुगतान सात महीने बाद तक नहीं हुआ.'' ''स्कूलों में नामांकन में भी भारी गिरावट आई'' यहाँ तक कि जूनियर स्कूल तो बन्द हो गया और ''अब कम्पनी जूनियर स्कूल भवन को एक गोदाम के तौर पर इस्तेमाल कर रही है.'' (देखें-बाल्को के कर्मचारी स्वैच्छिक अवकाश लेने को बाध्य किये गये-अक्षय मुकुल, टाइम्स ऑफ इण्डिया, जनवरी 25, 2007). यह भी ध्यान देने की बात है कि 2005 में छत्तीसगढ़ के राजस्व मंत्री ने बाल्को पर यह इल्जाम लगाया था कि उसने ''सम्बद्ध संस्थाओं की अनुमति के बगैर'' कोरबा अल्युमिनियम कॉम्प्लेक्स के विस्तार के लिए 20,000 पेड़ों को काट दिया. वेदांत पर 2004 में यह भी इल्जाम लगा था कि जब उसके पास विस्तार कार्यों के लिए पूंजी जमा हो गई तब उसने गैऱ-कानूनी तरीके से गाँव वालों को मजबूर किया कि वह अपनी जगह-जमीन छोड़ कर हट जायें. (देखें-बाल्को पर जमीन हड़पने की बदनामी टेलिग्राफ, कोलकाता, जून 18, 2005, न्यू इण्डियन एक्सप्रेस जून 24, 2005, आइएएनएस-जुलाई 13 तथा जुलाई 25, 2005).

17. 2005 के मध्य में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह ने यह स्वीकार किया कि इस तरह से इतना जल्दी किया गया जबर-दखल मान्य नहीं है. ऐसा उन्होंने तब कहा जब 20 प्रभावित परिवारों ने गवाही दी कि 'नई खदान' ने उनके घरों और खेती को ''पूरी तरह से तबाह'' कर दिया है. कहा जाता है कि सिंह ने जिला कलक्टर को यह आदेश दिया कि इन परिवारों का यथाशीघ्र और समुचित पुनर्वास सुनिश्चित किया जाय, उन्हें जीवन निर्वाह के लिए वैकल्पिक जमीन और रहने के लिए घर की व्यवस्था की जाए और समुचित क्षतिपूर्ति दी जाए. भारत तथा इंग्लैण्ड की एक अध्ययन टीम जब मई 2006 में इस क्षेत्र के भ्रमण के लिए गई तो उसे नहीं लगा कि इस तरह के कोई कदम उठाये गये थे या वह लोग जो इस खदान के जीवन काल में भविष्य में हटाये जायेंगे, उनके लिए भी इस तरह की कोई योजना है.

18. उत्तरी तमिलनाडु में मेट्‌टूर में माल्को के समग्र अल्युमिनियम उपक्रमों में इस तरह के प्रदूषण फैलाने वाले कुख्यात उद्योगों की पर्यावरण पर दुष्प्रभाव की निहायत घटिया प्रदर्शनी देखने को मिलती है जिसमें असुरक्षित कोयला चालित कैप्टिव पॉवर प्लांट से निकले जहरीले पदार्थों का अपना विशिष्ट योगदान रहता है. वेदांत दावा करता है कि वह माल्को से निकलने वाले ''लाल कीचड़'' (कॉस्टिक सोडा अपशिष्ट) और फ्लाइ ऐश का उपयोग ईंटें बनाने में करता है. यह अपने आप में ही बड़ा सन्देहास्पद ''समाधान'' है और बहुत मुमकिन है कि ऐसा पूरी तरह कर पाने में वर्षों लग जायेंगे. इस बीच लाल कीचड़ बजबजाते हुए खेतों तक पहुँच जाता है, पानी के स्रोतों को प्रदूषित करता है और जानवरों की मृत्यु का कारण बनता है. रिफ़ाइनरी और विद्युत गृह से निकलने वाला धुआँ बहुत से स्थानीय निवासियों, खास कर दलितों, की जीवनधारा में जहर घोलता है. अप्रैल, 2005 में बहुत से ऐसे लोगों ने जो माल्को से प्रभावित थे इण्डियन पीपुल्स ट्राइब्यूनल ऑन एनवायर्नमेन्ट एण्ड ह्यूमन राइट्‌स द्वारा आयोजित जांच-पड़ताल के समक्ष अपना बयान दिया. इसका काम केमप्लास्ट सन्मार और मालको लिमिटेड में पर्यावरण की दुःस्थिति और मानवाधिकार उल्लंघन का अध्ययन करना था. बहुत से लोगों ने, इनमें कर्मचारी भी शामिल थे, बहुत सी ऐसी बीमारियाँ बताईं जिनसे इलाके के लोग त्रस्त थे. इनमें गम्भीर रूप से श्वास तंत्र की बीमारियाँ, त्वचा तथा आंख की बीमारी, पेट की गड़बड़ी, सीने और हाथ-पैरों में दर्द की शिकायतें आम थीं.

19. देखें-A Brief Report on Ecological and Biodiverstiy Importance of Nyamgiri Hill and Implications of Bauxite Mining, Environmental Protection Group, Orissa, June 2005

20. Central Empowered Committee report in IA No. 1324 regarding the alumina refinery plant being set up by m/s Vedanta Alumina Limited at Lanjigarh in Kalahandi district, Orissa; Delhi, September 21, 2005

21. देखें: Studies on impact of proposed Lanjigarh bauxite mining on biodiversity including wildlife and its habitat, Wildlife Institute of India, Dehra Dun, August 2006

22. Information from Forest Case Update, Delhi, December 2006

23. अप्रैल 2007 के आखिर में भारत के सबसे बड़े ताँबा निर्यातक सीसा गोआ के अधिग्रहण के मामले में वेदांत ने लक्ष्मी मित्तल की कम्पनी आर्सेलर मित्तल को पछाड़ दिया. दुनिया के दूसरे नम्बर की निर्यातक रियो टिन्टो करीब 2 महीने पहले इस दौड़ से हट गई थी. कोरस के हाल के अधिग्रहण में संसाधन प्रायः चुक जाने के बाद (और अब नये संसाधनों की तलाश के कारण) टाटा स्टील की गिनती आखिरी सम्भावित खरीदारों तक में नहीं थी. देखें (“Vedanta buys 51 percent of India’s Sesa Goa” by Mark Potter and Emi Emoto, The Scotsman, April 24, 2007.)
वेदांत का कहना है कि वह सीसा गोआ के अधिग्रहण के लिए आवश्यक संसाधन ''मौजूदा नगद संसाधनों और बैंक द्वारा आश्वस्त किये गये नये 1100 करोड़ अमरीकी डॉलर'' से करेगा. एक जाहिर सा और तुरन्त का प्रश्न यह उठता है कि ऐसी परिस्थिति में उड़ीसा में बॉक्साइट को अल्युमिनियम में परिवर्तित करने के लिए जो विस्तार करना होगा उसके लिए जरूरी पूंजी कहाँ से आयेगी (यह सच है कि गोआ के लौह अयस्क में अल्युमिना की खासी मात्रा है और वहाँ बॉक्साइट का भी खनन होता है). लेकिन निर्विवाद रूप से भारत की सबसे बड़ी और सर्वाधिक विविधिता वाली यह खनन कम्पनी जिसका लन्दन स्टॉक एक्सचेंज में मार्केट कैपिटलाइजेशन बढ़ कर 4100 करोड़ अमरीकी डॉलर हो गया है, ऐसा नहीं लगता है कि अतिरिक्त पूँजी जुटाने में इसे कोई दिक्कत होने वाली है क्योंकि यूरोप और अमेरिका के इसके पुराने बैंक सूत्र इस काम में उसकी मदद करेंगे.

रोजर मूडी लंदन में रहते हैं और वेब साइट www.minesandcommunities.org के प्रबन्ध सम्पादक हैं. वह एक अनुभवी अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्त्ता और अभियानी हैं जिन्होंने बहुत-सी यात्राएँ, ख़ास कर एशिया प्रशान्त क्षेत्र में की हैं. उनकी बहुत-सी कृतियों में बहुचर्चित ‘The Gulliver File : Mines, People and Land’—A Global Battleground (Mineswatch/WISE Glen Aplin/International Books, 1992), The Indigenous Voice : Vision and Realities (Zed Books 1988)  तथा The Risks We Run : Mining, Communities and Political Risk Insurance (International Books, Utrecht, 2005 शामिल हैं. उनकी नवीनतम पुस्तक Rocks and Hard Places : Globalisation of Mining (Zed Books) पिछले महीने प्रकाशित हुई है.

पैनोस साउथ एशिया द्वारा प्रकाशित पुस्तक बुलडोजर और महुआ के फूल से साभार. 
यहां इसके अनुवाद को थोड़ा बेहतर बनाने की कोशिश की गई है.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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