हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सामाजिक न्याय और लोकतंत्र के विरुद्ध है विदेशी शिक्षण संस्थान अधिनियम

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/30/2010 06:08:00 PM

एक सपना बेचा जा रहा है- देश में रह कर विदेशी विश्वविद्यालयों से पढ़ाई और डिग्रियों का सपना. इससे उच्च मध्यवर्ग का एक हिस्सा खुश है और उसके साथ ही दूसरे तबके भी यह उम्मीद पाले हुए हैं कि उनके दिन सुधरेंगे. जो काम यह सरकार नहीं कर पाई, उसे विदेशी विश्वविद्यालय पूरा करेंगे. वे उच्च शिक्षा से वंचित रह गए बाकी के 89 प्रतिशत छात्रों को पढ़ाएंगे. लेकिन जमीनी सच्चाइयां बताती हैं कि यह झूठ है और विदेशी विश्वविद्यालयों को कमाई करने और भारतीय छात्रों को लूटने की इजाजत देने के लिए इस सपने की ओट ली जा रही है. निजी क्षेत्र के लिए दरवाजे खोलते समय एसे ही दावे हर बार किए गए- भूख से बाजार बचाएगा, किसानों को बाजार अमीर बनाएगा, बीमारों की सेहत बाजार सुधारेगा, बच्चों को बाजार पढ़ाएगा. इस कह कर सार्वजनिक वितरण प्रणाली खत्म कर दी गई, किसानों को दी जा रही रियायतें बंद कर दी गईं, स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च में भारी कटौती हुई और सरकारी शिक्षा व्यवस्था को आपराधिक प्रयोगों की प्रयोगशाला बना दिया गया. और नतीजा? भूख से पीड़ित और मर रहे लोगों की संख्या बढ़ रही है. खेती बरबाद हो रही है और किसान आत्महत्या कर रहे हैं. साधारण इलाज से ठीक हो सकनेवाली बीमारियों से भी लाखों लोग (बच्चों समेत) हर साल मर रहे हैं. 6-15 साल के 20 प्रतिशत बच्चे अब भी स्कूल से बाहर हैं औऱ जो स्कूल जाते हैं, उन्हें निम्नस्तरीय शिक्षा हासिल हो रही है. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे दावे का भी यही हश्र होगा, यह तह है. इसके जो लक्ष्य बताए जा रहे हैं, वे कभी पूरे नहीं हो सकेंगे. लेकिन इसके साथ ही, हम सामाजिक रूप इसकी जो कीमत चुकाने जा रहे हैं और दशकों के संघर्षों के बाद हासिल किए गए अधिकारों को भी (जो वैसे अब भी पूरी तरह लागू नहीं किए जा रहे हैं) खोने जा रहे हैं. दिलीप मंडल की यह आंख खोलती रिपोर्ट, आज के जनसत्ता से साभार.


भारत में विदेशी शिक्षण संस्थानों के आने का रास्ता साफ होने वाला है। विदेशी शिक्षण संस्थान (प्रवेश एवं संचालन विनियमन) विधेयक 2010 लोकसभा में पेश किया जा चुका है और अब यह विधेयक मानव संसाधन विकास मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति के पास विचार के लिए भेजा गया है। संसदीय समिति की और से समाचार पत्रों में 16 जून को विज्ञापन देकर व्यक्तियों और संस्थाओं से यह कहा गया है कि वे 15 दिनों के अंदर इस विधेयक पर अपनी राय दे सकते हैं।

इस विधेयक में दो ऐसी बातें हैं, जिसपर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है। सबसे महत्वपूर्ण और चौंकाने वाली बात यह है कि इस विधेयक में विदेशी शिक्षण संस्थानों पर आरक्षण लागू करने की शर्त नहीं लगाई गई है। यानी ये शिक्षण संस्थान दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और शारीरिक रूप से असमर्थ छात्रों को किसी भी तरह का आरक्षण देने को बाध्य नहीं होंगे। विधेयक की दूसरी बड़ी खामी यह है कि विदेशी संस्थान कितनी फीस लेंगे, इस बारे में उन पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई है। विदेशी शिक्षण संस्थानों पर फीस के मामले में पाबंदी सिर्फ इतनी है कि वे इसका जिक्र अपने प्रोस्पेक्टस यानी विवरणिका में करेंगे और बताएंगे कि अगर छात्र ने बीच में पढ़ाई छोड़ दी तो फीस का कितना हिस्सा वापस होगा।

सबसे पहले अगर आरक्षण की बात करें तो इस कानून के पास होने के बाद विदेशी शिक्षण संस्थान देश में शिक्षा के एकमात्र ऐसे संस्थान होंगे जो आरक्षण के दायरे से बाहर होंगे। भारत में उच्च शिक्षा का हर संस्थान (अल्पसंख्यक संस्थानों को छोड़कर) आरक्षण के प्रावधानों को मानने के लिए बाध्य है। संसद और विधानसभा इसके लिए कानून बना सकती हैं जिसे सरकारी और गैर सरकारी दोनों तरह के शिक्षा संस्थानों पर लागू किया जा सकता है। यह सरकारी आदेश या अदालत का फैसला नहीं है। यह एक संवैधानिक व्यवस्था है। भारतीय लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था- संसद ने संविधान में 93वां संशोधन करके यह व्यवस्था दी कि राज्य यानी संसद या विधानसभाएं किसी भी शिक्षा संस्थान (चाहे सरकार उसे पैसे देती हो या नहीं) में दाखिले के लिए सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान कर सकती हैं। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15 (4) के बाद एक नया खंड 15 (5) जोड़ा गया। इस संशोधन से सिर्फ अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को बाहर रखा गया है।

इस संविधान संशोधन की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि पी ए इनामदार और अन्य बनाम महाराष्ट्र सरकार और अन्य केस में सुप्रीम कोर्ट के 11 जजों की पीठ ने 2005 में यह आदेश दिया था कि संसद या विधानसभाएं उन शिक्षाण संस्थानों पर आरक्षण लागू नहीं सकतीं, जो सरकार से पैसे नहीं लेतीं। इस आदेश के दायरे में अल्पसंख्यक और अन्य सभी तरह के शिक्षण संस्थानों को रखा गया। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद से ज्यादातर गैर-सरकारी शिक्षण संस्थान आरक्षण के दायरे से बाहर हो गए थे। इस वजह से तत्कालीन सरकार को संविधान में संशोधन करना पड़ा। इस संविधान संशोधन में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों यानी ओबीसी के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था करने का प्रावधान है।

इसी संविधान संशोधन के बाद केंद्र सरकार ने अपने उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की नई व्यवस्था लागू करने के लिए कानून पास किया। केंद्रीय शिक्षण संस्थान (दाखिले में आरक्षण) कानून, 2006 के तहत केंद्र सरकार के उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति के लिए 15 फीसदी, अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 फीसदी और पिछड़ी जातियों के लिए 27 फीसदी आरक्षण दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस कानून को दी गई चुनौतियों को खारिज कर दिया है। यह बात महत्वपूर्ण है कि केंद्रीय शिक्षण संस्थान (दाखिले में आरक्षण) कानून, 2006 को लेकर देश की संसद में आम राय थी। देश की राय को जानने के लिए संसद से ज्यादा प्रामाणिक और विश्वसनीय संस्था और कोई नहीं है। इसलिए कहा जा सकता है कि देश की भावना ऐसे कानून के पक्ष में है।

इस पृष्ठभूमि में देखें तो विदेशी शिक्षण संस्थानों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखना 93वें संविधान संशोधन कानून, 2005 का उल्लंघन है। संविधान में संशोधन किए बगैर किसी संविधान संशोधन को बदला नहीं जा सकता है। 93वां संविधान संशोधन स्पष्ट रूप से कहता है कि संसद और विधानसभा अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को छोड़कर तमाम शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू कर सकती है। अगर वर्तमान सरकार चाहती है कि कुछ (मौजूदा संदर्भ में विदेशी) शिक्षण संस्थानों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा जाए, तो इसके लिए संविधान में संशोधन करना होगा। संविधान की धारा 15 (5) में संशोधन किए बगैर सरकार विदेशी शिक्षण संस्थानों को आरक्षण के दायरे से बाहर नहीं रख सकती।
यह विषय भारत के संघीय ढांचे के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि 93वें संविधान संशोधन के तहत विधानसभाओं को यह अधिकार प्राप्त है कि वे सरकारी मदद न लेने वाले शिक्षण संस्थानों में भी आरक्षण लागू कर सकती हैं। विदेशी शिक्षण संस्थान (प्रवेश एवं संचालन विनियमन) विधेयक 2010 की वजह से राज्य सरकारों का यह अधिकार कम हो जाएगा। इस तरह से केंद्र सरकार का यह अधिनियम भारत के संघीय ढांचे के विरुद्ध है। केंद्र सरकार एक सामान्य कानून लाकर राज्य सरकारों के अधिकारों को कम नहीं कर सकती है क्योंकि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का विषय है। केंद्र सरकार को या तो इस अधिनियम में संशोधन करना चाहिए और इसमें अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान करना चाहिए या फिर यह अधिनियम वापस लेना चाहिए। 

केंद्र सरकार का यह कानून अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़े वर्गों (अल्पसंख्यकों समेत) के हितों के विरुद्ध है। इस तरह देश में शिक्षा के कुछ ऐसे केंद्र बन जाएंगे, जो भारतीय संविधान में वर्णित विशेष अवसर के सिद्धांत की अवहेलना करेंगे, क्योंकि संसद में पारित एक कानून उन्हें इसकी इजाजत देगा। साथ ही, विदेशी शिक्षण संस्थान (प्रवेश एवं संचालन विनियमन) विधेयक 2010 में विदेशी शिक्षण संस्थानों की परिभाषा भी ऐसी बनाई गई है कि देश के कई शिक्षण संस्थान या उनके कुछ हिस्से विदेशी शिक्षण संस्थान कहलाने लगेंगे। इस अधिनियम के खंड (1) (1) (ई) में विदेशी संस्थानों की परिभाषा बताई गई है। इसके तहत जो विदेशी संस्थान भारतीय संस्थान के साथ मिलकर या साझीदारी से चलेंगे, वे भी विदेशी शिक्षण संस्थान माने जाएंगे। विदेशी शिक्षण संस्थानों को मिलने वाली छूट (मिसाल के तौर पर आरक्षण लागू न होना) को देखते हुए कई भारतीय शिक्षण संस्थान इसी मकसद से विदेशी शिक्षण संस्थानों के साथ साझीदारी कर सकते हैं। अधिनियम के तहत सरकारी संस्थानों को भी ऐसी साझीदारी करने से रोका नहीं गया है। अधिनियम में इस बात की व्याख्या नहीं की गई है कि किस तरह के भारतीय संस्थान विदेशी संस्थानों के साथ तालमेल कर सकते हैं और किन संस्थानों पर इसके लिए रोक है। इस मामले को खुला रखने का मतलब है कि सरकारी संस्थान भी विदेशी संस्थानों के साथ तालमेल कर सकते हैं। इस तरह एक ऐसा सिलसिला शुरू हो सकता है जो भारत में शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान को खत्म कर देगा।

सरकार और खासकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय की नीयत पर संदेह इसलिए भी होता है क्योंकि हाल ही में कैबिनेट ने एक ऐसा कानून पारित किया है जिससे केंद्र सरकार के शिक्षण संस्थानों को ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए तीन साल की और मोहलत मिल जाएगी। उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण लागू करते समय केंद्र सरकार ने तीन साल की मोहलत दी थी, क्योंकि कुछ शिक्षण संस्थान एक साथ 27 फीसदी फीसदी आरक्षण लागू करने में असमर्थता जता रहे थे। इस प्रावधान के लागू हुए तीन साल बीत गए हैं। कुछ शिक्षण संस्थानों ने तीन साल की समय-सीमा में भी आरक्षण लागू नहीं किया है। ऐसे शिक्षण संस्थानों के संचालकों पर केंद्रीय शिक्षण संस्थान (दाखिले में आरक्षण) कानून, 2006 के उल्लंघन के आरोप में कार्रवाई की जानी चाहिए। लेकिन ऐसा न करके उन्हें ओबीसी आरक्षण को तीन साल तक और लंबित करने का वैधानिक अधिकार दिया जा रहा है। समय सीमा में आरक्षण लागू न करने पर कार्रवाई न करने से सभी शिक्षण संस्थानों को गलत संदेश भी जाएगा। लेकिन सरकार को इसकी परवाह नहीं है। सरकार ने आरक्षण लागू न करने ना को दंडनीय क्यों नहीं बनाया है, यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए। संवैधानिक प्रावधानों का पालन न करने वालों पर कार्रवाई करने की कोई व्यवस्था होनी चाहिए।

यह सच है कि वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकारें निजी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण लागू करने से परहेज करती हैं। लेकिन ऐसा करने का कानूनी अधिकार उसके पास है। विदेशी शिक्षण संस्थान अधिनियम राज्य और केंद्र सरकारों को इस अधिकार से वंचित करने का रास्ता साफ कर देगा क्योंकि कोई निजी शिक्षण संस्थान नए कानून का हवाला देकर कोर्ट से यह मांग कर सकता है कि विदेशी शिक्षण संस्थानों की तरह उन्हें भी आरक्षण लागू न करने की छूट दी जाए। आरक्षण के सवाल पर अदालतों का आम तौर पर जो रूख रहा है, उसे देखते हुए निजी शिक्षण संस्थानों की यह बात मान ली जाए, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट पी ए इनामदार केस में यह कह चुकी है कि निजी शिक्षण संस्थानों पर आरक्षण लागू करने की बाध्यता नहीं होनी चाहिए।

इसी तरह अभी केंद्र और राज्य सरकारों को निजी शिक्षण संस्थानों की फीस को नियंत्रित करने का अधिकार है, जिसका वह अक्सर इस्तेमाल नहीं करती। लेकिन नया अधिनियम उसके हाथ से यह अधिकार भी छीन लेगा। भारत जैसे गरीब देश में सरकारों को फीस के नियंत्रण की दिशा में सक्रिय होना चाहिए। लेकिन सरकार ऐसा करने की जगह अपने हाथ काट लेना चाहती है। विदेशी संस्थानों के भारत में आने के बाद देश में शिक्षा के कुछ अभिजन टापू बन जाने का खतरा बढ़ जाएगा क्योंकि ये संस्थान न तो आरक्षण लागू करेंगे न ही फीस के मामले में किसी के नियंत्रण में होंगे और वे यह सब कानूनी तौर पर करेंगे। भारत में शिक्षा के क्षेत्र में विस्तार की असीम संभावनाएं हैं। बड़ी संख्या में युवाओं को उच्च शिक्षा के अवसर मिलने चाहिए और इसके लिए बड़ी संख्या में शिक्षण संस्थान खुलने चाहिए। लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में विस्तार के नाम पर समता और समानता की संवैधानिक व्यवस्थाओं की धज्जियां उड़ाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। लोककल्याणकारी राज्यों में स्वास्थ्य और शिक्षा की मुख्य जिम्मेदारी सरकार की होती है। इसकी अनदेखी करके भारत लोककल्याणकारी राज्य नहीं बना रह सकता।

बुद्धदेव व चिदंबरम क्या लालगढ़ को लालमोहन टुडु बना देना चाहते हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/30/2010 12:35:00 PM

महाश्वेता देवी

लालगढ़ में जब ऑपरेशन ग्रीन हंट का एक वर्ष पूरा हो रहा था, ठीक उसी समय केंद्र और राज्य के सशस्त्र पुलिस बलों ने कथित रूप से आठ माओवादियों को तथाकथित मुठभेड़ में मार गिराया। सुरक्षा जवानों द्वारा मरनेवाले युवक-युवतियों की लाशें बांस में टांगकर ले जाते हुए तस्‍वीरें छपी हैं। इस तरह मरे मवेशियों को ही बांस में बांधकर-लटकाकर ले जाते हुए मैंने अब तक देखा है। उसी तरह मनुष्यों को देखा।

इसी का नाम लालगढ़ है? गत 15 जून को लालगढ़ अंचल के पिड़ाकाटा से केंद्र और राज्य की संयुक्त सशस्त्र वाहिनी ने सेंट्रल सिरामिक की सीनियर साइंटिस्ट निशा विश्वास, प्रो कनिष्क चौधरी और लेखक मानिक मंडल को गैरकानूनी ढंग से काफी देर तक रोके रखा और अंततः झूठे मामलों में गिरफ्तार कर उन्हें जेल में डाल दिया गया। ये बुद्धिजीवी संख्या में तीन थे, सो धारा 144 के उल्लंघन का आरोप भी उन पर नहीं लगता। फिर उन्हें क्यों गिरफ्तार किया गया? इसी तरह छत्रधर महतो, सुख शांति बास्के, राजा सरखेल और प्रसून चटर्जी को भी गिरफ्तार किया गया था।

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सिंगूर और नंदीग्राम की तरह लालगढ़ में जन-विरोधी काम किया, इसीलिए उनके खिलाफ हम सड़क पर उतरे और ‘परिवर्तन चाहिए’ का नारा दिया था। उस नारे के कारण निश्चित ही ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को मदद मिली है। ऐसे में, मैं पूछना चाहती हूं कि लालगढ़ में सुरक्षा बलों के आचरण की निंदा ममता बनर्जी क्यों नहीं कर रही हैं?

लालगढ़ को औद्योगिक समूह और बुद्धदेव के ‘हैप्पी हंटिंग ग्राउंड’ बनाये जाने की अनुमति वहां के निवासी कभी नहीं देंगे। बुद्धदेव ने वहां ‘सेज’ बनाना चाहा और केंद्र सरकार ने उसकी सहर्ष अनुमति दी। ‘सेज’ के लिए ही 352.86 किलोमीटर क्षेत्र में फैले डेढ़ लाख से ज्यादा की आबादी वाले लालगढ़ में ऐसी स्थितियां बनायी जा रही हैं कि आदिवासी खुद ही वह अंचल छोड़कर चले जाएं। माकपा की हर्मद वाहिनी व राज्य पुलिस और केंद्र के अर्द्धसैनिक बल लालगढ़ को सबक सिखाने में लगे हैं। लालगढ़ में 29 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है और 35 प्रतिशत दलितों की। समाज के इस सबसे कमजोर तबके को लंगड़ी मारने को शासन-प्रशासन सदैव तत्पर रहता है।

सिर्फ लालगढ़ ही नहीं, पूरे देश के आदिवासी इलाके पेयजल, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी नागरिक सुविधाओं से वंचित हैं। उन्हें न बीपीएल कार्ड मिलता है, न राशन कार्ड, न इंदिरा आवास योजना का कोई लाभ मिलता है, न ही जवाहर रोजगार योजना का। सौ दिन के रोजगार की योजना का कोई लाभ लालगढ़ के आदिवासियों को क्यों नहीं मिलता? मैंने लालगढ़ से लेकर झारग्राम, पुरुलिया में 1977-80 के दौरान देखा था कि वहां कितने घने जंगल थे। वाम शासन के तैंतीस साल के राज में अधिकतर जंगल छिन्‍न भिन्‍न हो गये। संरक्षित जंगल इलाकों में ठेकेदारों से वन-विनाश कराया गया। जो जंगल बचा रह गया, उन पर भी जंगलपुत्रों का अधिकार नहीं रह गया। अरण्यजीवी अरण्य को मां मानते हैं। जंगल से ही लकड़ी, पत्ते, फल, मधु आदि संग्रह कर वे सदियों से जीवन-यापन करते आ रहे थे।

लेकिन अब माओवादियों का भय दिखाकर जंगलपुत्रों को जंगल में ही प्रवेश नहीं करने दिया जाता। इधर साल भर से लालगढ़ पर जो बर्बर अत्याचार हो रहा है, वैसा बंगाल ने निकट अतीत में कभी नहीं देखा। हाल में मारे गये कथित माओवादियों में तीन युवतियां थीं। उनकी लाशें बांस पर लटकाकर ले जाने का अधिकार सुरक्षा बलों को किसने दिया? मैं पूछना चाहती हूं कि बुद्धदेव और चिदंबरम की अशुभ जोड़ी आखिर क्या प्रमाणित करना चाहती है? बुद्धदेव व चिदंबरम क्या लालगढ़ को लालमोहन टुडु बना देना चाहते हैं? लालमोहन टुडु की तरह 56 आदिवासियों को लालगढ़ में सुरक्षा बलों और माकपा की हर्मद वाहिनी ने मार गिराया।

इस खून-खराबे के लिए मैं गृह मंत्री पी चिदंबरम को दोषी मानती हूं। वह कॉरपोरेट घरानों की तरफदारी कर रहे हैं। वह लालगढ़वासियों से इसीलिए वार्ता नहीं करना चाहते, क्योंकि तब कॉरपोरेट घराने के साथ हुए करार का उन्हें खुलासा करना पड़ेगा। इसलिए मैं वार्ता के पक्ष में हूं। लालगढ़ में माकपा की सशस्त्र वाहिनी और पुलिस वाहिनी की बर्बरता अब असह्य हो उठी है। इसीलिए लालगढ़ से अविलंब सुरक्षा बलों को हटाना चाहिए और यूएपीए नामक काला कानून तत्काल रद्द किया जाना चाहिए। बुद्धदेव और चिदंबरम को फौरन लालगढ़वासियों से बातचीत करनी चाहिए। दूसरा कोई तरीका नहीं है। मैं यह भी मानती हूं कि लालगढ़ में जो बर्बरता चल रही है, उसके खिलाफ समवेत प्रतिवाद होना चाहिए।

मैं लालगढ़ को लेकर तत्काल पदयात्रा निकाले जाने का आह्वान करती हूं। मैं यह देखकर विस्मित हूं कि जिन्होंने मेरे साथ मिलकर ‘परिवर्तन चाहिए’ का नारा दिया था, वे भी लालगढ़ के सवाल पर प्रतिवाद नहीं कर रहे। ममता बनर्जी क्यों खामोश हैं? इससे जनता में गलत संदेश जा रहा है। हर क्षेत्र में बुद्धदेव विफल रहे, इसीलिए उनकी सरकार के परिवर्तन की मांग हमने की थी।

ममता से बंगाल की जनता को बड़ी उम्मीदें हैं। कहीं-कहीं वह उम्मीदों पर खरा भी उतर रही हैं। रेल बस्तियों के बाशिंदों को वह निःशुल्क मकान बनाकर दे रही हैं। पंचायतों की तरह कई पालिकाओं पर भी उनकी पार्टी का बोर्ड बना है। ममता को हर जगह कड़ी निगरानी रखनी होगी कि काम ठीक ढंग से हो रहा है या नहीं? उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि बुद्धदेव ने जनता को लंगड़ी मारी, तो जनता क्या जवाब दे रही है? ममता की पार्टी में भी यदि जनता कोई खामी देखेगी, तो उसकी आलोचना सहने के लिए उन्हें तैयार रहना चाहिए। खामी किसी की हो, उसका नतीजा उन्हें भोगना ही होगा। (अमर उजाला से साभार)

नफरत की राजनीति और सर्वे की सांप्रदायिकता

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/28/2010 07:24:00 PM

 अजय प्रकाश

दिल्ली स्थित सर्वे कंपनी ‘मार्केटिंग एंड डेवेलपमेंट रिसर्च एसोशिएट्स’(एमडीआरए)मौलवियों और मुस्लिम युवा धार्मिक नेताओं से एक सर्वे कर रही है.सर्वे कंपनी ने पूछने के लिए जो सवाल तय किये हैं उनमें से बहुतेरे आपत्तिजनक, खतरनाक और षडयंत्रकारी हैं. सवालों की प्रकृति और क्रम जाहिर करता है कि सर्वे कंपनी के पीछे जो ताकत लगी है उसने मुस्लिम धार्मिक नेताओं की राय पहले खुद ही तय कर ली है और मकसद देश में सांप्रदायिक भावना को और तीखा करना है. नमूने के तौर पर तीन सवालों का क्रम देखिए-


  1. क्या आप सोचते हैं कि पाकिस्तानी आतंकवादी आमिर अजमल कसाब को फांसी देना उचित था या कुछ ज्यादा ही कठोर है?
  2. क्या आप और आपके दोस्त सोचते हैं कि मुंबई केस में कसाब को स्पष्ट सुनवाई मिली है या यह पक्षपातपूर्ण था?
  3. क्या आप सोचते हैं कि मुंबई आतंकवाद के लिए कसाब की फांसी की सजा पर दुबारा से सुनवाई करके आजीवन कारावास में बदल दिया जाये, वापस पाकिस्तान भेज दिया जाये या फांसी की सजा को बरकरार रखना चाहिए?

एमडीआरए सर्वे कंपनी द्वारा पुछवाये जा रहे इन नमूना सवालों पर गौर करें तो चिंता और कोफ्त दोनों होती है. साथ ही देश के खुफिया विभाग की मुस्तैदी पर भी सवाल उठता है कि आखिर वह कहां है जब समाज में एक नये ढंग के विष फैलाने की तैयारी एक निजी कंपनी कर रही है?

MDRA Survey Questions


इन सवालों पर कोई मौलवी या मुस्लिम धर्मगुरु जवाब दे इससे ज्यादा जरूरी है कि सर्वे करने वालों से पूछा जाये कि कसाब से संबंधित प्रश्न आखिर क्यों किया जा रहा है, जबकि मुंबई की एक अदालत ने इस मामले में स्पष्ट फांसी का फैसला अभियुक्त को सुना दिया. तो फिर क्या कंपनी को संदेह है कि धार्मिक नेता अदालत के फैसले के कुछ उलट जवाब देंगे? अगर नहीं तो इन्हीं को इन सवालों के लिए विशेष तौर पर क्यों चुना गया? वहीं कंपनी के मालिकान क्या इस बात से अनभिज्ञ हैं कि एक स्तर पर कोर्ट की यह अवमानना भी है.

दूसरी महत्वपूर्ण बात और इस मामले को प्रकाश में लाने वाले दिल्ली स्थित भारतीय मुस्लिम सांस्कृतिक केंद्र के प्रवक्ता वदूद साजिद बताते हैं-‘कसाब एक आतंकी है जो हमारे मुल्क में दहशतगर्दी का नुमांइदा है. दूसरा वह हमारा कोई रिश्तेदार तो लगता नहीं. रिश्तेदार होने पर किसी की सहानुभूति हो सकती है, मगर एक विदेशी के मामले में ऐसे सवाल वह भी सिर्फ मुस्लिम धार्मिक गुरूओं से, संदेह को गहरा करता है.’

सर्वे कंपनी की नियत पर संदेह को लेकर हम अपनी तरफ से कुछ और कहें उससे पहले उनके द्वारा पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण सवाल यहां चस्पा कर देना ठीक समझते हैं जो देशभर के मुस्लिम धार्मिक गुरूओं और मुस्लिम युवा धार्मिक नेताओं से पूछे जाने हैं. सवालों की सूची इसलिए भी जरूरी है कि खुली बहस में आसानी हो, इस चिंता में आपकी भागीदारी हो सके और ऐसे होने वाले हर धार्मिक-सामाजिक षड्यंत्र के खिलाफ हम ताकत के साथ खड़े हो सकें.

बस इन प्रश्नों के साथ कुछ टिप्पणियों की इजाजत चाहेंगे जिससे हमें संदर्भ को समझने में आसानी हो. ध्यान रहे कि सर्वे टीम ने ज्यादातर प्रश्नों के जवाब के विकल्प हां, ना, नहीं कह सकते और नहीं जानते की शैली में सुझाया है.
प्रश्न इस प्रकार से हैं-

1. न्यायमूर्ति राजेंद्र सच्चर कमेटी रिपोर्ट के बारे में आपकी क्या राय है? क्या यह मुसलमानों की मदद कर रही है या नुकसान कर रही है?
टिप्पणी- जब लागू ही नहीं हुई तो मदद या नुकसान कैसे करेगी. सवाल यह बनता था कि लागू क्यों नहीं हो रही है?


2. आपके समुदाय में धार्मिक नेताओं के प्रशंसक घट रहे हैं, पहले जैसे ही हैं या पहले से बेहतर हैं?
टिप्पणी- धार्मिक गुरु इसी की रोटी खाता है इसलिए कम तो आंकेगा नहीं.बढ़ाकर आंका तो खुफिया और मीडिया के एक तबके की मान्यता को बल मिलेगा जो यह मानते हैं कि मुस्लिम समाज धार्मिक दायरे से ही संचालित होता है. ऐसे में  पुरातनपंथी, धार्मिक कट्टर और अपने में डूबे रहने वाले हैं, कहना और आसान हो जायेगा और  मुल्क के मुकाबले धर्म वहां सर्वोपरि है, का फ़तवा देने में भी आसानी होगी.

3. आपकी राय में आज मुस्लिम युवा धर्म तथा धर्म गुरुओं से प्रेरित होते हैं या बाजारी ताकतें जिसमें इंटरनेट और टीवी शामिल हैं, प्रभावित कर रहे हैं?
टिप्पणी-यह भी उनके रोटी से जुड़ा सवाल है. दूसरा कि इसका जवाब सर्वे कंपनी के पास होना चाहिए, धार्मिक गुरूओं के पास ऐसे सर्वे का कोई ढांचा नहीं होता.


4. पूरे देश और देश से बाहर मुस्लिम नेताओं से संपर्क के लिए आप इंटरनेट का इस्तेमाल ज्यादा कर रहे हैं या नहीं?

टिप्पणी-कई बम विस्फोटों में जो मुस्लिम पकड़े गये हैं उन पर यह आरोप है कि वे विदेशी आकाओं से इंटरनेट के जरिये संपर्क करते थे। ऐसे में इस सवाल का क्या मायने हो सकता है?


4ए. आपकी राय में समुदाय सामाजिक मामलों में राजनीतिक  नेताओं से ज्यादा प्रभावित है या धार्मिक नेताओं से?

टिप्पणी- इस  प्रश्न का  बेहतर जवाब जनता  दे सकती है.

5. आपकी राय में हिंसा, गैर कानूनी गतिविधियां और आतंकवादी गतिविधियां क्यों बढ़ रही हैं, इस प्रवृति को क्यों बढ़ावा मिल रहा है?

टिप्पणी- सभी जानते हैं कि यह सरकारी नीतियों की देन है, लेकिन मुस्लिम धार्मिक नेता इस बात को जैसे ही बोलेगा तो वैमनस्य की ताकतें ओसामा से लेकर हूजी के नेटवर्क से उसे कैसे जोड़ेंगी? यह तथ्य हम सभी को पिछले अनुभवों से बखूबी पता है.

 6. क्या आप सोचते हैं कि युवा मुस्लिम को राजनीति में ज्यादा भाग लेना चाहिए या धर्म के प्रचार में सक्रिय रहना चाहिए या दोनों में?

टिप्पणी- यह भी रोटी से जुड़ा सवाल है इसलिए जवाब सर्वे कंपनी को भी पता है और मकसद सबको.

 7. मुस्लिम युवाओं की नकारात्मक छवि हर तरफ क्यों फैल रही है. इसके लिए कौन और कौन सी बातें जिम्मेदार हैं, क्या आप कुछ ऐसी बातें बता सकते हैं?
टिप्पणी- इसका सर्वे कब हुआ है कि मुस्लिम युवाओं की छवि नकारात्मक है.दूसरे बात यह कि अगर सवालकर्ता यह मान चुका है कि छवि नकारात्मक है तो उससे बेहतर जवाब और कौन दे सकता है.


8. कुछ के अनुसार न्यूज मीडिया और विदेशी एजेंसी शिक्षित युवा मुस्लिम को गैर कानूनी गतिविधियों के लिए भर्ती कर रही हैं, क्या इस पर आप विश्वास करते हैं या इस तरह की घटना आपको पता है?

9. क्या इस तरह की गतिविधियां हर तरफ हैं?

टिप्पणी- सर्वेधारी को यह सवाल पहले उन ‘कुछ’ से पूछना चाहिए जिसकी जानकारी सर्वे करने वालों के पास पहले से है. उसके बाद मौलवी के पास समय गंवाने की बजाय सीधे खुफिया आधिकारियों को जानकारी मुहैय्या कराना चाहिए जो करोड़ों खर्च करने के बाद भी मकसद में सफल नहीं हो पा रहे हैं.

10. क्या आप देवबंद द्वारा हाल ही जारी फतवे का समर्थन करते हैं जिसमें उन्होंने मुस्लिम महिलाओं का पुरुषों के साथ काम करने का विरोध किया था,या आप इसे मुस्लिम समाज के विकास में नुकसानदेह मानते हैं?
टिप्पणी -सवाल ही झूठा है, क्योंकि देश जानता है देवबंद ने ऐसे किसी बयान से इनकार किया है.

11. भारत 21 मई के दिन आतंकवाद के खिलाफ (आतंकवादी निरोधी दिन) मनाता है. आपकी राय में इसको मनाने का क्या कारण है?
टिप्पणी- फर्ज करें अगर जवाब यह हुआ कि इससे देश की सुरक्षा होगी, तब तो सुभान अल्लाह. अन्यथा इसके अलावा मौलवी जो भी जवाब देगा जैसे यह खानापूर्ति है, इससे कुछ नहीं होता आदि,तो उसकी व्याख्या कैसी होगी इसको जानने के लिए जवाब की नहीं,बल्कि मुल्क में मुसलमानों ने ऐसे भ्रम फैलाने वालों के नाते जो भुगता है उस पर एक बार निगाह डालने की दरकार है.


12. क्या आप सोचते हैं कि बिना सबूत के भारत में मुसलमानों को हिंसा और आतंक के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है?
टिप्पणी- पिछले वर्षों से लेकर अब तक आतंक के नाम पर जो गिरफ्तारियां हुई हैं और उसके बाद आरोपितों में कुछ बाइज्जत छूटते रहे हैं उस आधार पर तो यह कहा जा सकता है, मगर इस कहने के साथ जो दूसरा जवाब जुड़ता है वह यह कि सरकार यानी संविधान की कार्यवाहियों पर मुस्लिम धर्मगुरुओं का विश्वास नहीं है. ऐसे में यह परिणाम तपाक से निकाला जा सकता है कि जब गुरुओं का विश्वास नहीं है तो समुदाय क्यों करे, जबकि समुदाय तो मौलवियों की ही बातों को तवज्जो देता है.


13. क्या आप कुछ लोगों के विचार से सहमत हैं कि वैश्विकी जिहाद का भारत में कोई स्थान नहीं है या आपके विचार इससे भिन्न हैं?

14. कुछ लोगों का कहना है कि आइएसआइ (पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी) जैसी एजेंसी हाल में युवाओं को भारत में आतंकवादी गतिविधियों के लिए भर्ती कर रही है, क्या आप इस बात से सहमत हैं?

टिप्पणी- अब तो हद हो गयी. सवाल पढ़कर लगता है कि एमडीआरए एक सर्वे कंपनी की बजाय सांप्रदायिक मुहिम का हिस्सा है. एमडीआरए वालो वो जो ‘कुछ’ मुखबिर तुम्हारे जानने वाले हैं उनसे मिली जानकारी को गृह मंत्रालय से साझा क्यों नहीं करते कि देश आइएसआइ के आतंकी चंगुल से चैन की सांस ले सके.और अगर जानकारी के बावजूद (जैसा कि सर्वे के सवालों से जाहिर है) नहीं बताते हो तो, देश आइएसआइ से बड़ा आतंकी तुम्हारी कंपनी को मानता है, जो सरकार को सुझाव देने की बजाय मौलवियों से सवाल कर देश की सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं.


बहरहाल इन प्रश्नों के अलावा दस और सवाल जो सर्वे कंपनी ने मौलवियों और मुस्लिम युवा धार्मिक नेताओं से पूछे हैं,उन प्रश्नों की सूची देखने के लिए आप रिपोर्ट के साथ चस्पां की तस्वीरों को देख सकते हैं.

अब जरा एमडीआरए के सर्वे इतिहास पर नजर डालें तो इसकी वेबसाइट देखकर पता चलता है कि यह कंपनी मूलतः बाजारू मसलों पर सर्वे का काम करती है जिसके कई सर्वे अंग्रेजी पत्रिका ‘आउटलुक’में प्रकाशित हुए हैं. कंपनी के बाकी सर्वे के सच-झूठ में जाना एक लंबा काम है,इसलिए फिलहाल मोहरे के तौर पर अलग तेलंगाना राज्य की मांग, महिला आरक्षण पर मुस्लिम महिलाओं की राय और नक्सलवाद के मसले पर एमडीआरए के सर्वे को देखते हैं जो आउटलुक अंग्रेजी पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं.

पत्रिका के जिस मार्च अंक में अरूंधति राय का दंतेवाड़ा से लौटने के बाद लिखा लेख  छपा है उसी में महिला आरक्षण को लेकर मुस्लिम महिलाओं की राय छपी है.पत्रिका और एमडीआरए के संयुक्त सर्वे ने दावा किया है कि 68 फीसदी मुस्लिम महिलाएं महिला आरक्षण के पक्ष में हैं. कई रंगों और बड़े अक्षरों में सजे इस प्रतिशत से जब हम हकीकत में उतरते हैं तो कहीं एक तरफ प्रतिशत के अक्षरों के मुकाबले बड़ी हीन स्थिति में सच पड़ा होता है। पता चलता है कि इस विशाल प्रतिशत का खेल मात्र  518 महानगरीय महिलाओं के बीच दो दिन में खेला गया है जो महिला मुस्लिम आबादी का हजारवां हिस्सा भी नहीं है.

सर्वे खेल का दूसरा मामला नक्सलवाद को लेकर है जो इसी पत्रिका में प्रकाशित हुआ है.लंबी दूरी की एक ट्रेन, एक समय में जितनी आबादी लेकर चलती है उससे लगभग एक चौथाई यानी 519 लोगों से राय लेकर पत्रिका और एमडीआरए ने दावा किया कि प्रधानमंत्री की राय यानी ‘नक्सलवाद आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है’,पर अस्सी फीसदी से ज्यादा लोग सहमत हैं.यानी बेकारी,महंगाई और बुनियादी सुविधाओं से महरूम जनता के लिए माओवाद ही सबसे बड़ा खतरा है.

तीसरा उदाहरण अलग तेलंगाना राज्य की मांग का है. तेलंगाना राज्य की मांग के सर्वे के लिए कंपनी ने हैदराबाद शहर को चुना है जिसमें छः सौ से अधिक लोगों को सर्वे में शामिल किया गया है.पहली बात तो यह है कि सर्वे में तेलंगाना क्षेत्र में आने वाले किसी एक जिले को क्यों नहीं शामिल किया गया? दूसरी बात यह कि करोंड़ों की मांग  को समझने के लिए कुछ सौ से जानकारी के आधार पर करोड़ों की राय कैसे बतायी जा सकती है, आखिर यह कौन सा लोकतंत्र है?

बहरहाल,अभी मौजूं सवाल सर्वे कंपनी एमडीआरए से ये है कि  मौलवियों और युवा धार्मिक नेताओं के हो रहे इस षड्यंत्रकारी सर्वे का असली मकसद क्या है?


कंपनी के शातिरी के खिलाफ निम्न पते, ईमेल, फ़ोन पर विरोध दर्ज कराएँ.

Corporate Office:

MDRA, 34-B, Community Centre, Saket, New Delhi-110 017
Phone +91-11-26522244/55; Fax: +91-11-26968282
Email: info@mdraonline.com

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अभी तो शब्दों को उँगली पकड़ चलने का अभ्यास करा रहा हूँ

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/25/2010 07:32:00 PM

हम इन्हें पहचानते हैं. इससे पहले उनकी शानदार कविताएं पढ़ चुके हैं. उनके साथ हम कुछ संबल देती कविताओं से संवाद करते हैं, हम उनके जरिए जानते हैं कि जंगल में सपने देखना कितना खतरनाक है, लेकिन यह सारी दुनिया की सांसों और सपनों के लिए कितना जरूरी है, उनकी कविताएं हमें बताती हैं कि शब्दों नहीं, सिर्फ जमीन पर हो रहे बदलाव ही हमें आश्वस्त कर सकते हैं. उनकी हर कविता की तरह यह भी रणेंद्र की कविता है, जहां एक-एक शब्द निरंतर युद्ध है

अभी तो
रणेन्द्र

शब्द सहेजने की कला
अर्थ की चमक, ध्वनि का सौन्दर्य
पंक्तियों में उनकी सही समुचित जगह
अष्टावक्र व्याकरण की दुरूह साधना
शास्त्रीय भाषा बरतने का शऊर
इस जीवन में तो कठिन

जीवन ही ठीक से जान लूँ अबकी बार

जीवन जिनके सबसे खालिस, सबसे सच्चे, पाक-साफ, अनछुए
श्रमजल में पल-पल नहा कर निखरते
अभी तो,
उनकी ही जगह
इन पंक्तियों में तलाशने को व्यग्र हूँ

अभी तो,
हत्यारे की हंसी से झरते हरसिंगार
की मादकता से मताए मीडिया के
आठों पहर शोर से गूँजता दिगन्त
हमें सूई की नोंक भर अवकाश देना नहीं चाहता

अभी तो,
राजपथ की
एक-एक ईंच सौन्दर्य सहेजने
और बरतने की अद्‌भुत दमक से
चौंधियायी हुई हैं हमारी आँखें

अभी तो,
राजधानी के लाल सुर्ख होंठों के लरजने भर से
असंख्य जीवन, पंक्तियों से दूर छिटके जा रहे हैं

अभी तो,
जंगलों, पहाड़ों और खेतों को
एक आभासी कुरूक्षेत्र बनाने की तैयारी जोर पकड़ रही है

अभी तो,
राजपरिवारों और सुखयात क्षत्रिय कुलकों के नहीं
वही भूमिहीन, लघु-सीमान्त किसानों के बेटों को
अलग-अलग रंग की वर्दियाँ पहना कर
एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है
लहू जो बह रहा है
उससे बस चन्द जोड़े होंठ टहटह हो रहे हैं

अभी तो,
बस्तर की इन्द्रावती नदी पार कर गोदावरी की ओर बढ़ती
लम्बी सरल विरल काली रेखा है
जिसमें मुरिया, महारा, भैतरा, गड़बा, कोंड, गोंड
और महाश्वेता की हजारों-हजार द्रौपदी संताल हैं


अभी तो,
जीवन सहेजने का हाहाकार है
बूढ़े सास-ससुर और चिरई-चुनमुन शिशुओं पर
फटे आँचल की छाँह है
जिसका एक टुकड़ा पति की छेद हुई छाती में
फँस कर छूट गया है

अभी तो,
तीन दिन-तीन रात अनवरत चलने से
तुम्बे से सूज गए पैरों की चीत्कार है
परसों दोपहर को निगले गए
मड़ुए की रोटी की रिक्तता है
फटी गमछी और मैली धोती के टुकड़े
बूढ़ों की फटी बिवाइयों के बहते खून रोकने में असमर्थ हैं
निढ़ाल होती देह है
किन्तु पिछुआती बारूदी गंध
गोदावरी पार ठेले जा रही है

अभी तो,
कविता से क्या-क्या उम्मीदे लगाये बैठा हूँ
वह गेहूँ की मोटी पुष्ट रोटी क्यों नही हो सकती
लथपथ तलवों के लिए मलहम
सूजे पैरों के लिए गर्म सरसों का तेल
और संजीवनी बूटी

अभी तो,
चाहता हूँ कविता द्रौपदी संताल की
घायल छातियों में लहूका सोता बन कर उतरे
और दूध की धार भी
ताकि नन्हे शिशु तो हुलस सकें

लेकिन सौन्दर्य के साधक, कलावन्त, विलायतपलट
सहेजना और बरतना ज्यादा बेहतर जानते हैं
सुचिन्तित-सुव्यवस्थित है शास्त्रीयता की परम्परा
अबाध रही है इतिहास में उनकी आवाजाही

अभी तो,
हमारी मासूम कोशिश है
कुचैले शब्दों की ढ़ाल ले
इतिहास के आभिजात्य पन्नों में
बेधड़क दाखिल हो जाएँ
द्रौपदी संताल, सीके जानू, सत्यभामा शउरा
इरोम शर्मिला, दयामनी बारला और ... और ...

गोरे पन्ने थोड़े सँवला जाएँ

अभी तो,
शब्दों को
रक्तरंजित पदचिन्हों पर थरथराते पैर रख
उँगली पकड़ चलने का अभ्यास करा रहा हूँ

बीडी शर्मा की राष्ट्रपति के नाम चिट्ठी

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/24/2010 01:55:00 PM

डाक्टर बी डी शर्मा
पूर्व आयुक्त - अनुसूचित जाति-जनजाति
 ए-11 नंगली रजापुर
निजामुद्दीन पूर्व
नई दिल्ली-110013
दूरभाष-011-24353997


17 मई 2010

सेवा में,
राष्ट्रपति, भारत सरकार
नई दिल्ली

महामहिम,


विषय- जनजातीय इलाकों में शांति-स्थापना

1.       विदित हो कि आदिवासी मामलों से अपने आजीवन जुड़ाव के आधार पर (जिसकी
शुरुआत सन् 1968 में बस्तर से तब हुई जब वहां संकट के दिन थे और फिर अनुसूचित जाति-जनजाति
का अंतिम आयुक्त (साल 1986-1991) रहने की सांविधानिक जिम्मेदारी) मैं आपको यह पत्र एक
ऐसे संकटपूर्ण समय में लिख रहा हूं जब आदिवासी जनता के मामले में सांविधानिक व्यवस्था लगभग
ढहने की स्थिति में है, आबादी का यह हिस्सा लगभग युद्ध की सी स्थिति में फंसा हुआ है और
उस पर हमले हो रहे हैं।

2.       इस पत्र के माध्यम से मैं आपसे सीधा संवाद स्थापित कर रहा हूं क्योंकि जनता (और
इसमें आदिवासी जनता भी शामिल है) आपको और राज्यपाल को भारत के सांविधानिक प्रधान के
रूप में देखती है. संबद्ध राज्य संविधान की रक्षा-संरक्षा के क्रम में अपने दायित्वों का
निर्वहन करते हुए इस बाबत शपथ उठाते हैं। अनुच्छेद 78 के अन्तर्गत राष्ट्रपति के रूप में आपके
कई अधिकार और कर्तव्य हैं जिसमें एक बात यह भी कही गई है कि मंत्रिमंडल और प्रशासन की
सारी चर्चा की आपको जानकारी दी जाएगी और यह भी कि आप मंत्रिमंडल के समक्ष मामलों
को विचारार्थ भेजेंगे।

3.       खास तौर पर संविधान की पांचवी अनुसूची के अनुच्छेद 3 में कहा गया है- "ऐसे
प्रत्येक राज्य का राज्यपाल जिसमें अनुसूचित क्षेत्र हैं, प्रतिवर्ष या जब राष्ट्रपति अपेक्षा
करे, उस राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के प्रशासन के संबंध में राष्ट्रपति को प्रतिवेदन
देगा और *संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार राज्य को उक्त क्षेत्रों के प्रशासन के बारे
में निर्देश देने तक होगा।"
*           इस संदर्भ में गौरतलब है कि कोई भी फलदायी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई
है। आदिवासी मामलों की परामर्श-परिषद (पांचवी अनुसूची के अनुच्छेद 4) ने कोई
प्रभावी परामर्श नहीं दिया।

4.      विधि के अन्तर्गत राज्यपाल इस बात को सुनिश्चित कर सकता हैं कि संसद या
राज्यों द्वारा बनाया गया  कोई भी कानून आदिवासी मामलों में संकेतित दायरे में अमल में ना
लाया जाय। मौजूदा स्थिति यह है कि भू-अर्जन और सरकारी आदेशों के जरिए आदिवासी का
निर्मन दोहन और दमन हो रहा है। बावजूद इसके, कोई कार्रवाई नहीं की जा रही।

5.       दरहकीकत, अगर गृहमंत्रालय के मंतव्य को मानें तो आदिवासी संघीय सरकार की
जिम्मेदारी हैं ही नहीं। गृहमंत्रालय के अनुसार तो संघीय सरकार की जिम्मेदारी केवल राज्य
सरकारों की मदद करना है। ऐसा कैसे हो सकता है? *संघ की कार्यपालिका की शक्ति का
विस्तार पांचवी अनुसूची के विधान के अन्तर्गत समस्त अनुसूचित क्षेत्रों तक किया गया है*।
इसके अतिरिक्त  विधान यह भी है कि ‘ संघ अपनी कार्यपालिका की शक्ति के अन्तर्गत
राज्यों को अनुसूचित इलाके के प्रशासन के बारे में निर्देश देगा ’

6.       आदिवासी जनता के इतिहास के इस निर्णायक मोड़ पर मैं यह कहने से अपने को रोक
नहीं सकता कि केंद्र सरकार आदिवासी जनता के मामले में अपने सांविधानिक दायित्वों का
पालन नहीं करने की दोषी है। उसका दोष यह है कि उसने सन् साठ के दशक की स्थिति को जब
आदिवासी इलाकों में छिटपुट विद्रोह हुए थे आज के ’युद्ध की सी स्थिति’ तक पहुंचने दिया।
संविधान लागू होने के साथ ही आदिवासी मामलों  के  प्रशासन के संदर्भ में एक नाराजगी
भीतर ही भीतर पनप रही थी मगर सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। साठ सालों में केंद्र
सरकार ने इस संदर्भ में एक भी निर्देश राज्यों को जारी नहीं किया। राष्ट्र के प्रधान के रुप
में इस निर्णायक समय में आपको सुनिश्चित करना चाहिए कि केंद्र सरकार भौतिक, आर्थिक और
भावनात्मक रुप से तहस-नहस, धराशायी और वंचित आदिवासियों के प्रति यह मानकर कि उनकी
यह क्षति अपूरणीय है खेद व्यक्त करते हुए अपनी सांविधानिक जिम्मेदारी निभाये। आदिवासियों
की इस अपूरणीय क्षति और वंचना समता और न्याय के मूल्यों से संचालित इस राष्ट्र के उज्ज्वल
माथे पर कलंक की तरह है।

7.    मैं आपका ध्यान देश के एक बड़े इलाके में तकरीबन युद्ध की सी स्थिति में फंसी आदिवासी
जनता के संदर्भ में कुछेक महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर आकर्षित करना चाहता हूं। आपके एक सुयोग्य
पूर्ववर्ती राष्ट्रपति श्री के आर नारायणन ने 26 जनवरी 2001 को राष्ट्र के नाम अपने
संदेश  में बड़े जतन से उन महनीय कानूनों की तरफ ध्यान दिलाया था जिन्हें आदिवासी क्षेत्रों
की रक्षा के लिए बनाया गया है और जिन कानूनों को अदालतों ने भी अपने फैसलें देते समय
आधारभूत माना है। श्री नारायणन ने गहरा अफसोस जाहिर करते हुए कहा था कि विकास की
विडंबनाओं को ठीक-ठीक नहीं समझा गया है। उन्होंने बड़े मार्मिक स्वर में कहा था कि, ‘
*कहीं ऐसा ना हो कि आगामी पीढियां कहें कि भारतीय गणतंत्र को वन-बहुल धरती और उस
धरती पर सदियों से आबाद वनवासी जनता का विनाश करके बनाया गया।.’
*
8.       कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो अपने देश के सत्ताधारी अभिजन अक्सर आदिवासियों
को गरीब बताकर यह कहते हैं कि उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल करना है। यह दरअसल
आदिवासी जीवन मूल्यों के प्रति इनकी निर्मम संवेदनहीनता और समझ के अभाव का सूचक है।
ऐसा कह कर वे उन सहज लोगों के मर्मस्थान पर आघात करते हैं जिन्हें अपनी इज्जत जान से भी
ज्यादा प्यारी है। ध्यान रहे कि आदिवासी गरीब नहीं है। आदिवासी जनता को उसके ही देस
में, उस देस में जहां धरती माता ने अपनी इस प्रिय संतान के लिए प्रकृति का भरपूर खजाना
लुटाया है,  दायवंचित किया गया है। अपनी जीवंत विविधता पर गर्व करने वाली भारतीय
सभ्यता के जगमग ताज में आदिवासी जनता सबसे रुपहला रत्न है।

9.       यही नहीं, आदिवासी जनता ’.इस धरती पर सर्वाधिक लोकतांत्रिक मिजाज की
जनता’  है। राष्ट्रनिर्माताओं ने इसी कारण उनकी रक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की। पांचवी
अनुसूची को 'संविधान के भीतर संविधान' की संज्ञा दी जाती है। फिर भी, इस समुदाय
का संविधान अंगीकार करने के साथ ही तकरीबन अपराधीकरण कर दिया गया। पुराने चले आ
रहे औपनिवेशिक कानूनों ने उन इलाकों को भी अपनी जद में ले लिया जिसे संविधान अंगीकार
किए जाने से पहले अपवर्जित क्षेत्र (एक्सक्लूडेड एरिया) कहा जाता था। औपनिवेशिक कानूनों में
समुदाय, समुदाय के रीति-रिवाज और गाँव-गणराज्य के अलिखित नियमों के लिए तनिक भी जगह
नहीं रही। ऐसी विसंगति से उबारने के लिए ही राज्यपालों को असीमित शक्तियां दी गई हैं
लेकिन वे आज भी इस बात से अनजान हैं कि इस संदर्भ में उनके हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहने से
आदिवासी जनता के जीवन पर कितना विध्वंसक प्रभाव पड़ा है।

10.     *पेसा* यानी प्राविजन ऑव पंचायत (एक्सटेंशन टू द शिड्यूल्ड एरिया - 1996 )
नाम का अधिनियम एक त्राणदाता की तरह सामने आया। इस कानून की रचना आदिवासियों के
साथ हुए उपरोक्त ऐतिहासिक अन्याय के खात्मे के लिए किया गया था। पूरे देश में इस कानून ने
आदिवासियों को आंदोलित किया।  इस कानून को लेकर आदिवासियों के बीच यह मान्यता बनी
कि इसके सहारे उनकी गरिमा की रखवाली होगी और उनकी स्वशासन की परंपरा जारी रहेगी।
इस भाव को आदिवासी जनता ने 'मावा नाटे मावा राज' (हमारे गांव में हमारा राज) के
नारे में व्यक्त किया। बहरहाल आदिवासी जनता के इस मनोभाव से सत्तापक्ष ने कोई सरोकार
नहीं रखा। इसका एक कारण रहा सत्ताधारी अभिजन का पेसा कानून की मूल भावना से
अलगाव। यह कानून कमोबेश हर राज्य में अपने अमल की राह देखता रहा।

11.     आदिवासी जनता के लिए अपने देश में सहानुभूति की कमी नहीं रही है। नेहरु युग के
पंचशील में इसके तत्व थे। फिर कुछ अनोखे सांविधानिक प्रावधान किए गए जिसमें आदिवासी
मामलों को राष्ट्रीय हित के सवालों के रूप में दलगत संकीर्णताओं से ऊपर माना गया। साल
1974 के ट्रायबल सब प्लान में  आदिवासी इलाकों में विकास के मद्देनजर शोषण की समाप्ति के
प्रति पुरजोर प्रतिबद्धता जाहिर की गई। फिर साल 1996 के पेसा कानून में आदिवासी इलाके
के लिए गाँव-गणराज्य की परिकल्पना साकार की गई और वनाधिकार कानून (साल 2006) के
तहत आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय के खात्मे का वादा किया गया। तो भी, इन
प्रतिबद्धताओं का सबसे दुखद पहलू यह है कि आदिवासियों के साथ किए गए वादों की लंबी
फेहरिश्त में कोई भी वादा ऐसा नहीं रहा जिसे तोड़ा नहीं गया, कई मामलों में तो वादों को
तोड़ने की हद हो गई। मैं तोड़े गए वादों की एक फेहरिश्त भी इस सूची के साथ संलग्न कर रहा
हूं।

12.     वादे टूटते रहे और प्रशासन स्वयं शिकारी बन गया तथा सत्तापक्ष के शीर्षस्थ आंखे
मूंदे रहे। ऐसी स्थिति में वे विस्थापन के कारण उजड़ने वाले आदिवासियों की गिनती तक भी
नहीं जुटा सके। इस क्रम में बेचैनी बढ़ी और बलवे लगातार बढते गए। जंगल में रहने वाले जिन
लोगों पर अंग्रेज तक जीत हासिल नहीं कर पाये थे उनके लिए यह राह चुनना स्वाभाविक था।
तथाकथित विकास कार्यक्रमों के जरिए आदिवासियों को अपने साथ मिलाने की जुगत एक फांस
साबित हुई। ये कार्यक्रम समता के मूल्यों का एक तरह से माखौल थे। गैरबराबरी के खिलाफ
विद्रोह का झंडा उठाने वाले युवाजनों का एक हिस्सा आदिवासियों का साथी बना। साल
1998 में मुझसे इन सहज-साधारण लोगों (आदिवासियों) ने कहा था- आसपास दादा (माओवादी)
लोगों के आ जाने से हमें कम से कम दारोगा, पटवारी और फॉरेस्ट गार्ड के अत्याचारों से छुट्टी
मिली है। फिर भी सत्तापक्ष इस बात पर डटा रहा कि आदिवासी इलाकों में नक्सलवाद की
समस्या सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या है। उसने अपनी इस रटंत में बदलाव की जरुरत नहीं
समझी।

13.     निष्कर्ष रुप में मेरी विनती है कि आप निम्नलिखित बातों पर तुरंत ध्यान दें-
(क)  केंद्र सरकार से कहें कि वह आदिवासी जनता के प्रति अपनी विशेष जिम्मेदारी की बात
सार्वजनिक रूप से व्यक्त करे।
(ख)    आदिवासी इलाकों में  तत्काल शांति बहाली का प्रस्ताव करें
 (ग)    निरंतर पर्यवेक्षण, पुनरावलोकन और कार्रवाई के लिए उपर तक जवाबदेही का एक
ढांचा खड़ा किया जाय जिस तक पीडितों की सीधी पहुंच हो।
(घ)    एक साल  के अंदर-अंदर उन सारे वायदों का पालन हो जो आदिवासी जनता के साथ
किए गए और जिन्हें राज्य ने तोड़ा है ।
(च)  पेसा कानून के अन्तर्गत स्थानीय जनता की मंजूरी के प्रावधान का पालन दिखाने के लिए
जिन मामलों में बलपूर्वक, धोखे-छल या फिर किसी अन्य जुगत से  स्थानीय जनता की मंजूरी
हासिल की गई और फैसले लिए गए उन फैसलों को पलटा जाये और उनकी जांच हो।
(छ)    मौजूदा बिगड़े हालात के समग्र समाधान के लिए लिए व्यापक योजना बने और,
(ज)    उन इलाकों में से कुछ का आप दौरा करें जहां सांविधानिक व्यवस्था पर जबर्दस्त संकट
आन पड़ा है।.


सादर,
आपका विश्वासी
बी डी शर्मा


प्रति,

1.श्री मनमोहन सिंह जी ,
प्रधानमंत्री, भारत सरकार
साऊथ ब्लॉक नई दिल्ली

2.श्री प्रणब मुखर्जी
वित्तमंत्री, भारत सरकार
नार्थ ब्लॉक नई दिल्ली

3.  श्री वीरप्पा मोईली
विधि और न्यायमंत्री, भारत सरकार
शास्त्रीभवन, नई दिल्ली

4.  श्री पी चिदंबरम्
गृहमंत्री, भारत सरकार
नार्थ ब्लॉक, नई दिल्ली

5   श्री कांतिलाल भूरिया
मंत्री आदिवासी मामले, भारत सरकार
शास्त्रीभवन, नई दिल्ली

6.  डाक्टर सी पी जोशी
ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री,भारत सरकार
शास्त्रीभवन, नई दिल्ली

7 श्री जयराम रमेश
वन एवम् पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार
पर्यावरण भवन, लोदी रोड, नई दिल्ली

हिंदी में पढ़िए, विद्रोह के केंद्र में दिन और रातें

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/23/2010 04:10:00 PM


जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता और ईपीडब्ल्यू के सलाहकार संपादक गौतम नवलखा तथा स्वीडिश पत्रकार जॉन मिर्डल कुछ समय पहले भारत में माओवाद के प्रभाव वाले इलाकों में गए थे, जिसके दौरान उन्होंने भाकपा माओवादी के महासचिव गणपति से भी मुलाकात की थी. इस यात्रा से लौटने के बाद गौतम ने यह लंबा आलेख लिखा है, जिसमें वे न सिर्फ ऑपरेशन ग्रीन हंट के निहितार्थों की गहराई से पड़ताल करते हैं, बल्कि माओवादी आंदोलन, उसकी वजहों, भाकपा माओवादी के काम करने की शैली, उसके उद्देश्यों और नीतियों के बारे में भी विस्तार से बताते हैं. पेश है हाशिया पर इस लंबे आलेख का हिंदी अनुवाद.


जब माओवादियों के खिलाफ हर तरह के अपशब्द और कुत्साप्रचार का इस्तेमाल किया जाता है तो झूठ और अर्धसत्य को भी पंख लग जाते हैं और इसकी चीरफाड़ के बहाने उनका दानवीकरण किया जाता है। बुद्धिजीवी समुदाय तथ्य का सामना करने से बचता है। फिर भी हम यथार्थ को उसके असली रूप में जानने का प्रयास करते हैं और कुछ मूलभूत सवालों का उत्तर तलाश करते हैं- यह युद्ध क्यों? जिन्हें भारत की आन्तरिक सुरक्षा के लिए 'सबसे बड़ा खतरा' समझा जाता है, वे लोग कौन हैं? उनकी राजनीति क्या है? वे हिंसा को क्यों जायज़ ठहराते हैं? वे अपने 'जनयुद्ध', अपने राजनीतिक लक्ष्य और अपने बारे में किस तरह की धारणा रखते हैं? अपने मजबूत जंगली क्षेत्रों से बाहर की दुनिया में छलांग लगाने के बारे में वे क्या सोचते है?

माओवादियों को दानव के रूप में दिखाए जाने की प्रक्रिया के खिलाफ उन्हें मानव के रूप में जानने समझने और माओवादियों के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी लेने की इच्छा (सिर्फ किताबों, दस्तावेजों, बातचीत के जरिएही नहीं बल्कि उनके बीच जाकर और उनसे मुलाकात करके ) विगत कई वर्षों से मेरे दिमाग में निर्मित हो रही थी। दो बार मैं इस यात्रा के काफी करीब पहुंच गया था। पहली बार मुझे दो नवजवान पत्रकारों ने धोखा दे दिया और नियत समय और स्थान पर नहीं आए। दूसरी बार बहुत कम समय की नोटिस पर मैं अपने आप को तैयार नहीं कर सका। यह तीसरा अवसर था और मैं इसे गंवाना नहीं चाहता था। कुल मिलाकर यह यात्रा सम्पन्न हुयी और मैंने स्वीडेन के लेखक जॉन मिर्डल के साथ जनवरी 2010 में सीपीआई माओवादियों के गुरिल्ला जोन (जहां वे अपनी जनताना सरकार या जन सरकार चलाते हैं ) में दो सप्ताह गुजारे। इस दौरान हमने देखा, सुना, पढ़ा और काफी बहसें की। यद्यपि 'गुरिल्ला जोन' अभी भी सरकार और विद्राहियों के बीच संघर्ष और इस पर नियंत्रण की लड़ाई में फंसा है लेकिन यह भी सच है कि इस क्षेत्र से भारतीय राज्य को पीछे हटना पड़ा है और अब वह अपने प्राधिकार को पुनः स्थापित करने के लिए सैन्य शक्ति का इस्तेमाल कर रहा है।



पूरी पोस्ट यहां पढ़िए

यहां, ब्लॉगर  की सीमा उजागर हुई. इतनी लंबी पोस्ट (और वह भी एंडनोट्स के साथ) ब्लॉगर पर पोस्ट ही नहीं हो पा रही थी, जबकि यह वर्डप्रेस पर झट से पोस्ट हो गई. 

क्या हमारा लोकतंत्र आदिवासियों को न्याय देगा?

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/23/2010 01:00:00 PM

ऑपरेशन ग्रीन हंट की आंच भले दिल्ली-मुंबई में बैठे लोगों तक नहीं पहुंच रही हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह आग किसी को झुलसा नहीं रही. देश के संसाधनों और जमीन को छीन कर देशी-विदेशी कंपनियों के हवाले करने के लिए और इसका विरोध करनेवाली जनता का प्रतिरोध तोड़ने के लिए चलाए जा रहे इस ऑपरेशन ने किसी तरह देश के सबसे गरीब लोगों के जीवन को नारकीय बना दिया है और किस तरह यह लोकतंत्र की चमकदार लेकिन भ्रामक बातों की कलई खोल रहा है, ग्लैडसन डुंगडुंग की यह खोजपरक रिपोर्ट. मूलतः अंगरेजी में प्रकाशित.

13 जून 2010 को झारखंड के 12 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की यात्रा सूर्योदय से पहले ही शुरू हो गयी थी। हमने सुना था कि लातेहार के बरवाडीह प्रखंड के लादी गांव की एक खरवार आदिवासी महिला, पुलिस और माओवादियों के बीच हुई मुठभेड़ की शिकार हो गयी। उस महिला का नाम जसिंता था। वह सिर्फ 25 साल की थी। गांव में अपने पति और तीन छोटे-छोटे बच्चों के साथ खुशहाल जिंदगी बिता रही थी इसलिए हम घटना की हकीकत जानना चाहते थे। हम जानना चाहते थे कि क्या वह माओवादी थी?

सबसे महत्वपूर्ण बात जो हम जानना चाहते थे, वह यह था कि किस परिस्थिति में सरकारी बंदूक ने उससे जीने का हक छीन लिया और सूर्योदय से पहले ही उसके तीन छोटे-छोटे बच्चों के जीवन को अंधेरे में डाल दिया गया? हम यह भी जानना चाहते थे कि इस अपराध के बाद राज्य की क्या भूमिका है? और निश्चित तौर पर हम यह भी जानना चाहते थे कि क्या जसिंता के तीन बच्चे हमारे बहादुर जवानों के बच्चों के तरह ही मासूम हैं?

सूर्योदय होते ही हमारे फैक्‍ट फाइडिंग मिशन का चारपहिया घूमना शुरू हो गया। जेठ की दोपहरी में हमलोग चिदंबरम के ‘रेड कॉरिडोर’ में घूमते रहे। शायद यहां के आदिवासियों ने ‘रेड कॉरिडोर’ का नाम भी नहीं सुना होगा और निश्चित तौर पर वे इस क्षेत्र को ‘रेड कॉरिडोर’ की जगह ‘आदिवासी कॉरिडोर’ कहना पसंद करेंगे। जो भी हो, इतना घूमने के बाद भी हम लोगों ने माओवादियों को नहीं देखा। लेकिन हमने जला हुआ जंगल, पेड़ और पतियां देखी। माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन चलाते समय अर्द्धसैनिक बलों ने हजारों एकड़ जंगल को जला दिया है। शायद वे माओवादियों का शिकार तो नहीं कर पाये होंगे, लेकिन उन्होंन खुबसूरत पौधे, जड़ी-बूटी, जंगली जानवर, पक्षी और निरीह कीट-फतंगों को जलाकर राख कर दिया है। उन्होंने जंगली जानवर, पक्षी और हजारों कीट-फतंगों का घर जला डाला है। अगर यही काम यहां के आदिवासी करते तो निश्चित तौर पर वन विभाग उनके खिलाफ वन संरक्षण अधिनियम 1980 और वन्यजीवन संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत कार्रवाई करता।

सात घंटे की थकान भरी लंबी यात्रा के बाद हमलोग लादी गांव पहुंचे। जो लातेहार जिला मुख्यालय से 60 किलोमीटर और बरवाडीह प्रखंड मुख्यालय से 22 किलोमीटर की दूरी पर जंगल के बीच में स्थित है। लादी गांव दरअसल खरवार बहुल गांव है। इस गांव में 83 परिवार रहते हैं, जिसमें 58 परिवार खेरवार, दो परिवार उरांव, 11 परिवार पराहिया, 10 परिवार कोरवा, एक परिवार लोहरा और एक परिवार साव है। इस गांव की जनसंख्या लगभग 400 है। गांव की अर्थव्यवस्था कृषि और वन पर आधारित है, जो पूरी तरह मानसून पर निर्भर करती है। यहां के खरवार समुदाय की दूसरा महत्वपूर्ण पारंपरिक पेशा पत्थर तोड़ना है, जिससे प्रति परिवार को रोज लगभग 80 रुपये तक की आमदनी होती है। यद्यपि गांव के लोग अपने कामों में व्यस्त थे लेकिन गांव में पूरा सन्‍नाटा पसरा हुआ था। ऐसा महसूस हो रहा था कि पूरा गांव खाली है। गांव में किसी के चेहरा पर मुस्कान नहीं थी। उनके चेहरे पर सिर्फ शोक, डर, भय, अनिश्चितता और क्रोध झलक रहा था।

हमलोग 28 वर्षीय जयराम सिंह के घर गये, जिसकी पत्नी जसिंता की गोली लगने से 27 अप्रैल को मौत हो गयी थी। हम मिट्टी, लकड़ी और खपड़े से बने एक सुंदर लाल रंग से सुसज्जित घर में घुसे। घर का वातावरण शोक, पीड़ा और क्रोध से भरा पड़ा था। परिवार के सदस्य चुप थे लेकिन शोक, दुःख, पीड़ा, भय और क्रोध उनके चेहरे पर झलक रही थी। हमें खटिया पर बैठने को कहा गया। कुछ समय के बाद जयराम सिंह अपने दो बच्चे – पांच साल की अमृता और तीन साल के सूचित के साथ हमारे सामने आया। जयराम बोलने की स्थिति में नहीं था। वह अभी भी अपनी पत्नी को खोने की पीड़ा से उबर नहीं पाया था। जब भी कोई उसे उस घटना के बारे में पूछता, वह रोने लगता। वह वन विभाग का एक अस्थायी कार्मचारी है, जिसकी वजह से जब उसके घर में घटना घटी, तब वह गारू नाम की जगह पर ड्यूटी पर बजा रहा था।

जयराम ने हमें बताया कि उसके तीन बच्चे भी हैं। हमने उनके दो बच्चों को देखा, जिनके चहरे पर निराशा छायी हुई थी। हम एक और बच्ची को भी देखना चाहते थे, जो सिर्फ एक साल की है। उसका नाम विभा कुमारी है। वह दूधपीती बच्ची है। मां के मारे जाने के बाद वह अपनी दादी की गोद में ही खेलती रहती है। तीनों बच्चे और उनके पिता की हम तस्वीर लेना चाहते थे, इसलिए हमने विभा को भी हमारे पास लाने को कहा। लेकिन वह हमें देखते ही रोने लगी। वह अपने पिता की गोद में बैठने के बाद भी रोती रही। शायद उसे यह लग रहा होगा कि हम उसे उसके परिवार से छीनने के लिए आये हैं, जिस तरह से उसे उसकी मां को छीन लिया गया। मैं उसको देख कर व्‍यथित था। मैंने उसे रोते हुए देखा। वह चुप ही नहीं होना चाहती थी। राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर उसका सुनहरा बचपन छीन लिया गया था।

जयराम सिंह का छोटा भाई विश्राम सिंह, जो घटना के समय घर में मौजूद था, ने हमें घटना के बारे में बताया कि 27 अप्रैल को ‘मिट्टी के लाल घर’ में क्या हुआ था। शाम के लगभग साढ़े सात बज रहे थे। गांव के सभी लोग खाना खाने के बाद सोने की तैयारी में जुटे थे। उसी समय गांव में गोली चलने की आवाज सुनाई दी। कुछ समय के बाद पुलिस ने ग्राम प्रधान कामेश्वर सिंह के घर को घेर लिया। उसके बाद पुलिस वालों ने चिल्‍ला कर कहा कि घर से बाहर निकलो, नहीं तो घर में आग लगा देंगे। इस बात को सुनकर कामेश्‍वर सिंह का परिवार घबरा कर घर से बाहर निकला। कामेश्‍वर सिंह और उसके बड़े बेटे जयराम सिंह वन विभाग में अस्थायी कार्मचारी हैं, जिसकी वजह से वे घर पर नहीं थे। पुलिस की आवाज सुनकर कामेश्‍वर सिंह का छोटा बेटा विश्राम सिंह (18) दरवाजा खोलकर बाहर निकला। बाहर निकलते ही जवानों ने उसे पकड़कर पीठ के पीछे दोनों हाथ बांध कर उस पर बंदूक तान दिया।

उसके बाद पुलिस के जवान ने विश्राम सिंह की भाभी जसिंता से कहा कि घर के अंदर और कौन है? इस पर उन्होंने उनके चरवाहा पुरन सिंह (62) के अंदर सोने की बात कही। पुलिस ने उसे उठाकर बाहर लाने को कहा। जब जसिंता चरवाहा को लेकर बाहर आ रही थी, तो पुलिस ने उसके ऊपर गोली दाग दी। गोली उसके सीने में लगी और वह वहीं ढेर हो गयी। पुलिस ने फिर गोली चलायी, जो पुरन सिंह के हाथ में लगी। वह घायल हो गया। लाश देखकर परिवार के सदस्य रोने-चिल्‍लाने लगे तो पुलिस ने कहा कि चुप रहो, नहीं तो सबको गोली मार देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि तुम लोग माओवादियों को खाना खिलाते हो, इसलिए तुम्हारे साथ ऐसा हो रहा है। घटना के बाद पुलिस तुरंत लाश, घायल पूरन सिंह समेत पूरे परिवार को उठाकर ले गयी और परिवार वालों को धमकी देते हुए कहा कि लोगों को यही बताना है कि जसिंता मुठभेड़ में मारी गयी और प्रदर्शन वगैरह नहीं करना है।

गांव वालों को यह पता नहीं था कि लाश कहां है, इसलिए उन्होंने 28 अप्रैल 2010 को महुआटांड-डालटेनगंज मुख्य सड़क को जाम कर दिया। इसके बाद सदर अस्पताल, लातेहार में लाश का पोस्टमॉर्टम होने के बाद पुलिस ने विश्राम सिंह से सादा कागज पर हस्ताक्षर करवाने के बाद लाश को अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को सौंप दिया। विश्राम सिंह चार हजार रुपये पर भाड़ा में लेकर गाड़ी से लाश को गांव लाया। उसके बाद बरवाडीह के सीओ ने पारिवारिक लाभ योजना के तहत परिवार को 10 हजार रुपये दिया। 30 अप्रैल 2010 को मृतक के परिजन और गांव वाले जसिंता की हत्या के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने के लिए बरवाडीह थाना गये लेकिन वहां के थाना प्रभारी रतनलाल साहा ने मुकदमा दर्ज नहीं किया। सिर्फ डायरी में सूचना दर्ज की और उन्हें डरा-धमका कर घर वापस भेज दिया।

लेकिन गांव वालों के लगातार विरोध के बाद प्रशासन को मृतक के परिजनों को मुआवजे के रूप में तीन लाख रुपये देने की घोषणा करनी पड़ी। पुलिस ने परिजनों को मुआवजा राशि देने के लिए एक स्थानीय पत्रकार मनोज विश्वकर्मा को मध्यस्‍थता के काम में लगाया। 14 मई 2010 को मनोज विश्वकर्मा मृतक के पति जयराम सिंह को लेकर बरवाडीह थाना गया। थाना प्रभारी वीरेंद्र राम ने जयराम सिंह को एक सादा कागज पर हस्तक्षर कर 90 हजार रुपये का चेक लेने को कहा। जब जयराम सिंह ने सादा कागज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया तो थाना प्रभारी ने उसे खाली हाथ गांव वापस भेज दिया। यह हस्यास्पद ही है कि एक तरफ जयराम सिंह से उसकी पत्नी छीन ली गयी, उसके छोटे-छोटे बच्चों को रोते-बिलखते छोड़ दिया गया और उनके मिलने वाले मुआवजा को भी हड़पने का पूरा प्रयास चल रहा है। नीचे से ऊपर तक दौड़ने के बावजूद गुनहगारों को दंडित नहीं किया गया है।

ग्रामप्रधान कामेश्‍वर सिंह का चरवाहा पूरन सिंह इस गोली कांड में विकलांग हो गया है और अभी भी लातेहार सदर अस्‍पताल में इलाज करा रहा है। वहां सशस्त्र बल की निगरानी में उसे रखा गया है। लातेहार के सिविल सर्जन अरुण तिग्गा को यह जानकारी ही नहीं थी कि पूरन सिंह किस तरह का मरीज है। पूरन सिंह की बातों से भी स्पष्ट है कि यह घटना मुठभेड़ का परिणाम नहीं है। लेकिन बरवाडीह थाने की पुलिस ने इसे मुठभेड़ करार देने के लिए रातदिन एक कर दिया है। पुलिस के अनुसार जसिंता की हत्या माओवादियों की गोली से हुई है।

मृतक के घर का मुआयना करने से स्पष्ट है कि उसके घर में घुसने के लिए एक ही तरफ से दरवाजा है। घर की दीवार में लगी दो गोलियों के निशान हैं, जो प्रवेश द्वार की ओर से चलायी गयी है। मुठभेड़ की स्थिति में घर के अंदर से माओवादियों द्वारा दरवाजे की तरह गोली चलायी गयी होती। जसिंता देवी के मारे जाने के बाद पुलिस घर के अंदर घुसी और छानबीन किया, लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला। अगर घर के अंदर माओवादी होते तो उन्हें पुलिस पकड़ लेती क्योंकि घर में दूसरा दरवाजा नहीं होने की वजह से उनके भागने की कोई संभावना नहीं बनती है। घटना स्थल का मुआयना करने, मृतक के परिजन, चरवाहा और ग्रामीणों की बात से यह स्पष्ट है कि जसिंता की हत्या मुठभेड़ में नहीं बल्कि पुलिस द्वारा की गयी हत्या है। लेकिन बरवाडीह की पुलिस यह कतई मानने को तैयार नहीं है। पुलिस ने हत्या के खिलाफ मुकदमा तो दर्ज नहीं ही किया लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी परिजनों को नहीं दिया। जयराम सिंह के पास उसकी पत्नी की हत्या से संबंधित कोई कागज नहीं है। यहां आज भी पुलिस अत्याचार जारी है। थाना जाने पर दहाड़ना, गांव वालों को प्रताड़ित करना, किसी भी समय घरों में घुसना, मार-पीट गाली-गलौज करना और किसी को भी पकड़कर ले जाना।

इस हत्याकांड के बाद जयराम सिंह एक पिता के साथ-साथ मां की भूमिका भी अदा कर रहा है। उसकी सबसे छोटी बेटी विभा गाय के दूध से जिंदा है। वह सिर्फ इतना कहता है कि उसको न्याय चाहिए। वह अपनी पत्नी के हत्यारों को दंडित करवाना चाहता है। उसके तीन बच्चे हैं, इसलिए वह सरकार से 5 लाख रुपये मुआवजा, एक सरकारी नौकरी और उनके बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा की मांग कर रहा है। लेकिन उसकी पीड़ा को सुनने वाला कोई नहीं है। यह भी एक बड़ा सवाल है कि जब हमारे बहादुर जवान मारे जाते हैं, तो उस पर मीडिया में बहस का दौर चलता है लेकिन विभा, सूचित और अमृता के लिए मीडिया के लोग बहस क्यों नहीं कर रहे हैं? क्यों वो खुबसूरत चेहरे टेलेविजन चैनलों में निर्दोष आदिवासियों के बच्चों के अधिकारों की बात नहीं करते हैं जब वे सुरक्षा बलों की गोलियों से अनाथ बना लिये जाते हैं? क्या ये बच्चे निर्दोष नहीं हैं? क्यों लोग उन निरीह आदिवासियों की बातों पर विश्वास नहीं करते हैं, जो रोज सुरक्षा बलों की गोली, अत्याचार और अन्याय के शिकार हो रहे हैं? क्यों यह परिस्थिति बनी हुई है कि लोगों के अधिकारों को छीनने वाले सुरक्षाकर्मियों की बातों पर ही हमेशा भरोसा किया जाता है? क्या यही लोकतंत्र है?

मिट्टी के लाल घर की पीड़ा, विभा का रोना-बिलखना और पुलिस अधिकारी का वही रौब। यह सब कुछ देखने और सुनने के बाद हम लोग रेड कॉरिडोर से वापस आ गये। लेकिन हमारा कंधा खरवार आदिवासियों के दुःख, पीड़ा और अन्याय को देखकर बोझिल हो गया था। पुलिस जवानों के अमानवीय कृत्‍य देखकर हमारा सिर शर्म से झुक गया था और विभा की रुलाई ने हमें अत्‍यधिक सोचने को मजबूर कर दिया। मैं मां-बाप को खोने का दुःख, दर्द और पीड़ा को समझ सकता हूं। लेकिन यहां बात बहुत ही अलग है। जब मेरे माता-पिता की हत्या हुई थी, उस समय मैं उस दुःख, दर्द और पीड़ा को समझने और सहने लायक था। लेकिन जसिंता के बच्चे बहुत छोटे हैं। विशेष तौर पर विभा के बारे में क्या कहा जा सकता है। उसको तो यह भी पता नहीं है कि उसकी मां कहां गयी, उसके साथ क्या हुआ ओर क्यों हुआ?

विभा अभी भी अपनी मां के आने की बाट जोहती है। वह सिर्फ मां की खोज में रोती है। दूध पीने की चाहत मे बिलखती है और मां की गोद में सोने के लिए तरसती है। क्या वह हमारे देश के बहादुर जवानों के बच्चों की तरह मासूम नही है? क्या हम सोच सकते हैं कि उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी, जब वह यह जान जाएगी कि हमारे बहादुर जवानों ने उसकी मां को घर में घुसकर गोली मार दी? उसका गुस्सा किस हद तक बढ़ जाएगा, जब वह यह जान जाएगी कि उसके मां के हत्यारे सरकार से सहायता मिलने वाली राशि को भी गटकना चाहते थे? क्या उसके क्रोध की सीमा नहीं टूट जाएगी, जब वह यह जान जाएगी कि उसकी मां के हत्यारों ने उसके परिवार और गांववालों पर माओवादी का कलंक लगा कर उन पर जम कर अत्याचार किया? क्या हम अपने बहादुर जवानों को उनके किये की सजा देंगे या विभा, सूचित और अमृता जैसे हजारों निर्दोष बच्‍चों को रोते, विलखते व तड़पते छोड़कर उनकी कब्रों पर शांति की खोज करेंगे? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारा लोकतंत्र आदिवासियों को न्याय देगा? क्या वे अपने अधिकार का स्वाद चखेंगे? क्या उनके साथ कभी इंसान सा व्यवहार किया जाएगा? विभा का लगातार रोना हमें खतरे की घंटी से आगाह तो कर ही रहा है, साथ ही एक नयी दिशा की ओर इशारा भी कर रहा है, लेकिन क्या हम उसे समझना चाहते हैं?

बुद्धिजीवियों की यह भाषा नयी नहीं

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/23/2010 12:41:00 PM

अनिल चमड़िया

आखिर अरुंधती ने दंतेवाड़ा के जंगल से लौटकर ऐसा क्या लिखा और कहा कि उसे माओवादी हिंसा समर्थक और राष्ट्रद्रोही कहा जाने लगा? क्या उनका एहसास, “मेरे निकलने से एक दिन पहले मेरी मां ने कॉल किया। वह उंघते हुए बोली – मैं सोच रही थी कि देश को एक अदद क्रांति की जरूरत है…” बेमानी है? लेखक क्या करता है? पूरी ताकत से हर क्षण के अपने एहसास की ऐसी तस्वीर बनाना चाहता है कि किसी रंग की कोई सतह तक नहीं छूट पाये। वह एक विरोधाभासी स्थिति की तस्वीर उतारता है। जंगल के लोगों के साथ रहकर अरुंधती की बनायी वे तस्वीरें चुभती हैं? और साथ में जंगलों में जवान लड़कियों व लड़कों के कंधे पर बंदूक? अरुंधती की तस्वीरों के ज्यादा चुभने के कारण हैं। उनकी पृष्ठभूमि से जो प्रतिनिधि चेहरा बनता है और जिस समाज की वे तस्वीर उतारती हैं, उनके बीच एक खाई दिखती है। वह वीभत्सता के खून से भरी होती है। गांधी कहते थे कि एक आम भारतीय और एक खास के बीच पांच हजार गुना कमाई का फर्क है। माओवादी कहते हैं कि आजादी, लोकतंत्र, गांधीवाद, अहिंसा, संविधान, चुनाव, संसद, मीडिया, न्यायालय… इन सबकी मौजूदगी में एक आम भारतीय और दूसरे भारतीय के बीच एक लाख गुना से ज्यादा का फर्क पहुंच गया है। अरुंधती इसे लिखती हैं और अपने जो सूत्र बुनती हैं, वे सीधे चोट करते हैं। आदिवासियों का 99 प्रतिशत हिस्सा माओवादी नहीं है लेकिन माओवादियों में 99 प्रतिशत आदिवासी हैं। जितने तीखे और गहरे नजरिये से लेखक स्थितियों को देखता है, उसकी चोट उतनी ही परेशान करती है। वही हिम्मत कर सकता है कि चलो कुछ कहने के लिए मुझे जेल में डाल दो।

अरुंधती के माओवादियों और आदिवासियों के रिश्तों पर लिखने की सबसे तीखी प्रतिक्रिया अंग्रेजी के बुद्धिजीवियों ने की है। और उन्होंने, जो भारतीय भाषाओं में लगभग अंग्रेजी की तरह ही लिखते व सोचते हैं। भाषा का प्रश्न बड़ा प्रश्न है। क्या यही बात हिंदी और पंजाबी या दूसरी भाषाओं में लिखी जाती, तो इतनी तीखी प्रतिक्रिया होती? हिंदी में पिछले दिनों दो किताबें आयीं। तेलुगु में पी शंकर की लिखी हिंदी में पारनंदि निर्मला द्वारा अनूदित “यह जंगल हमारा है” शीर्षक से। अरुंधती के लिखे में तो इसकी झलक भर है। अरुंधती कथात्मक शैली में बताती है कि इन जंगलों में 1980 के आसपास माओवादियों के आने से पहले किस किस तरह के संगठन, संस्था और लोग आये। तेलुगु की किताब बताती है कि भूमि से वंचित हुए, स्वतंत्रता को खोने वाले, जंगल पर अधिकार को भी खोने वाले, यहां तक कि एक साधारण मनुष्य को मिलने वाले सम्मान भी खोने वाले, लूटखसोट करने वालों के औजार मात्र बन गये उन आदिवासियों के लिए एक मात्र क्रांतिकारी (माओवादी) ही सहारा बनकर खड़े हुए। 262 पृष्ठों में फैली कहानियां लोक और तंत्र को दो हिस्से में स्थापित करती हैं।

दूसरी किताब पंजाबी में आयी, जिसका हिंदी में अनुवाद महेंदर ने जंगलनामा के नाम से किया। जैसे अरुंधती जंगलों में गयी। पंजाबी लेखक सतनाम भी बैलाडिला शहर से जंगल में घुसा और कई दिनों तक रहा। अरुंधती लिखती हैं, “पीएलजीए का एक कॉमरेड नीलेश काफी तेजी से खाना पकाने वाली जगह की ओर दौड़ता हुआ आ रहा था। वह पास आया, तो मैंने देखा कि उसके ऊपर लाल चीटियों का पत्ते वाला एक घोंसला था। चीटिंयां उसके पूरे शरीर पर दौड़ रही थी और हाथ व गले में काट रही थी। नीलेश खुद भी हंस रहा था। कामरेड वेणु ने पूछा, क्या आपने कभी चीटियों की चटनी खायी है?” सतनाम पंजाबी में न केवल ऐसी उनकी जीवन दशा लिखते हैं बल्कि 160 पेज में जंगलनामा पूरा करते हैं, तो वहां अरुंधती और उसकी मां गूंजती सुनाई देती है। लेकिन पंजाबी में लिखे और हिंदी में अनूदित बेबाक बयानों पर प्रतिक्रिया बिरादराना राजनीतिक जमात में ही हुई। अभी हिंदी की जनपक्षधर चेतना इस समय को अंग्रेजी के सहारे अपने को व्यक्त करने के अवसर के रूप में देख रही है। इसीलिए अंग्रेजी में जो ऐसी बातें आती हैं, उसे हिंदी का बेचैन मन अपनी भाषा देने लगता है। सुना नहीं गया कि हिंदी की कोई जनपक्षधर सामग्री का अंग्रेजी मन अनुवाद करने के लिए बेचैन हो गया हो। अरुंधती अंग्रेजी में वही लिख रही हैं, जो हिंदी और पंजाबी की जमीनी चेतना महसूस कर रही है।

दरअसल सत्ता संरचना तब चौकन्नी हो जाती है कि उसकी बड़ी आधार भूमि में कोई सुगबुगाहट होने लगे। पी चिंदबरम बार बार कहते हैं कि माओवादियों से निपटने में सबसे ज्यादा आड़े बुद्धिजीवी आ रहे हैं। उन्हें आदिवासियों से निपटने में क्या वक्त लग सकता है? अब तक की पूरी सत्ता संरचना उनसे निपटती रही है और मध्यवर्ग को उनके हालात की खबर तक नहीं लगी। बुद्धिजीवी हथियार लेकर जंगलों में नहीं जा रहे हैं। एकाध बुद्धिजीवी केवल वहां के हालात का बयान कर रहे हैं, तो परेशानी बढ़ रही है। अगर अरुंधती भी दंतेवाड़ा से लौटकर कहती कि आदिवासियों से निपटने का सबसे अच्छा तरीका उनके घरों में टीवी सेट लगवा देना है, तो कौन कितना खुश होता। अरुंधती के आसपास का लेखक आदिवासी इलाकों में घूमकर दो तरह से अपनी बात कह सकता है। एक तो तरीका ये हो सकता है, जिसमें ये बताया जाए कि सैकड़ों वर्षों से आदिवासियों की बदतर स्थिति के बने रहने के क्या क्या कारण हैं। कारण बताये जाते हैं, तो लेखक को हिंसा का समर्थक बताये जाने का खतरा नहीं होता है। लेकिन कोई लेखक आदिवासियों के हाथों में बंदूक दिखने की पृष्टभूमि जाहिर करता है, तो उसे हिंसा समर्थक मान लिया जाता है। यदि किसी ने झूठ बोला और आपने उसे झूठा कहा तो उसे असंसदीय मान लिया जाता है और जब कहा जाए कि वह सच नहीं बोल रहा है, तो उसे शिष्ट और संसदीय भाषा मान लिया जाता है। क्या लेखक को इसी तरह आदिवासियों के हालात और उनके भीतर नफरत व गुस्से की आग को व्यक्त करने के लिए संसदीय भाषा की खोज करने की बाध्यता होनी चाहिए?

इंदिरा गांधी को भी नक्सलबाड़ी में आदिवासी किसानों के विद्रोह ने ज्यादा चिंतित नहीं किया। उनकी चिंता प्रतिभावान युवाओं की आदिवासी किसानों के साथ साझेदारी थी। सत्ता प्रतिभावानों के लोभी बने रहने में ही अपनी बेहतरी समझती है। दरअसल बुद्धिजीवियों का अपना एक इतिहास है। “द बंगाली प्रेस” में उल्लेख है कि संथालों ने 1855 में विद्रोह कर दिया। व्यापारियों, महाजनों के शोषण, पुलिस और राजस्व अधिकारियों के अत्याचार, जमींदारों द्वारा जमीनें छिनना, आदिवासी महिलाओं के साथ बदसलूकी आदि इसके कारण थे। संथालों को ये एहसास हो गया कि सरकार उनकी शिकायतें सुनने के बजाय उनका दमन और शोषण करने वालों को ही संरक्षण दे रही है तो उन्‍होंने खुद की सरकार बनाने का ऐलान कर दिया। अंग्रेज सरकार ने सेना लगा दी। तब बुद्धिजीवियों ने एक भाषा तैयार की। वह संथालों के खिलाफ सरकारी कार्रवाइयों के पक्ष में थे और आदिवासियों की बुरी स्थिति के लिए चिंता प्रकट कर रहे थे। तब से यह भाषा बूढ़ा बुद्धिजीवी समाज बोल रहा है। इससे इतर देशद्रोही और हिंसा का समर्थक हो जाता है। लोकतंत्र की यात्रा ऐसे ही कानून बनाने की दहलीज पर पहुंच चुकी हैं।

भूमकालः साथियों के साथ एक सफर

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/11/2010 12:49:00 PM

हाशिया पर हमने आउटलुक में प्रकाशित अरुंधति रॉय की चर्चित रिपोर्ट का अभिषेक श्रीवास्तव द्वारा हिंदी में संक्षिप्त अनुवाद पोस्ट किया था. इस रिपोर्ट ने देश और दुनिया में माओवाद और सामाजिक रूपांतरण में हिंसा के उपयोग पर एक नई बहस को जन्म दिया था. इस विवाद में भारत के गृह मंत्री से लेकर अनेक बुद्धिजीवी भी शामिल हुए. यह विवाद अब भी थमा नहीं है. पेश है, पहली बार इस रिपोर्ट का पूरा हिंदी अनुवाद. यह अनुवाद नीलाभ ने किया है, जिन्होंने अरुंधति के मशहूर उपन्यास गॉड ऑफ स्माल थिंग्स  का अनुवाद किया था. यह रिपोर्ट बहुत लंबी है, इसलिए यहां इसका पीडीफ वर्जन पोस्ट किया जा रहा है, ताकि आप इसे डाउनलोड करके पढ़ सकें.

भूमकालः साथियों के साथ एक सफर





Bhoomkal

कॉरपोरेट नेतृत्व में लोकतंत्र : विकास या विकास का आतंकवाद?

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/11/2010 12:18:00 PM


14 मई 2010 को पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के संघर्षरत साथियों पर धिनकिया ग्राम में गोलीचालन, की घटना हुई। 12 मई 2010 को कलिंग नगर में गोलीचालन, नियमगिरि एवं पोटका, झारखण्ड में दमनकारी कार्रवाई हुई। इसके खिलाफ जननेत्री दयामनी बरला के नेतृत्व में झारखण्ड के विभिन्न सांस्कृतिक व जनसंगठनों आंदोलन शुरू किया है। उड़ीसा सरकार और पोस्को कम्पनी के पुतला दहन से प्रारम्भ हुआ यह कार्यक्रम धीरे-धीरे व्यापक रूप ग्रहण कर रहा है। इसी परिप्रेक्ष्य में यह 24 मई 2010 को रांची में संवाददाता सम्मेलन में निम्नलिखित सामग्री जारी की गई है। इसे तैयार करने में अमित भादुड़ी़ की नई किताब ''द फेस यू वेयर अफ्रेड टू सी'' एवं वैकल्पिक सर्वे ग्रुप इंडियन पोलिटिकल इकॉनमी एसोसिएशन की ''वैकल्पिक आर्थिक वार्षिकी, भारत 2008-2009 से सहायता ली गई। अपने पाठकों के लिए हम इसे प्रस्तुत कर रहे हैं।


1991 ई0 से वित्तीय और उपभोक्तावादी पूँजीवाद को 'उदारवाद' का नाम देकर उसके प्रवेश को अबाधित किया गया। मार्गेट थैचर और निक्सन की सेल्फ रेगुलेटिंग मार्केट इकोनोमी के नाम पर ऐसे ''बाजारू पूँजीवाद'' को 'वैश्वीकरण' के नाम पर स्वीकार किया गया, जो हर तरह के राजकीय नियंत्रण से मुक्त हो।
इसमें आश्वासन यह दिया गया कि जितना ज्यादा 'पूँजी निवेश'  होगा उतना अधिक 'विकास दर' मिलेगा। जितना ज्यादा 'विकास-दर' मिलेगा उतनी ही गति से हमारा देश 'विकास' करेगा। देश की तेज गति के विकास से हमारी गरीबी, बेरोजगारी, बदहाली, कुपोषण, अशिक्षा आदि दूर हो जायेगी। इन वादों-आश्वासनों के साथ इस देश के राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों, चेम्बर ऑफ कॉमर्स, अर्थशास्त्रियों और मीडिया ने सम्मिलित रूप से 'विकास का राग' अलापना शुरू किया।
अर्थशास्त्री अमित भादुडी़ ने इसे एक आक्रामक नव पूँजीवादी 'आर्केस्ट' का नाम दिया है जिसे कॉरपोरेट, राजनीतिज्ञ, नौकरशाह, चेम्बर ऑफ कॉमर्स, लेवर यूनियनें और मीडिया मिल कर बजा रहे हैं, जिसकी धुन पर भारतीय मध्यवर्ग ता-ता थैय्या कर रहा है।
कॉरपोरेट पूंजी 1991 के वाद हमारे यहाँ 'विकास' कर रही है कि या 'विकास का आतंकवाद' फैला रही है उसे हम निम्न तथ्यों और ऑकडों के आईने में देखें :-
इस 'सेल्फ रेगुलेटिंग मार्केट इकॉनोमी' के चरण कमलों में रेड कार्पेट बिछाने के लिए हमारे 'नेशन-स्टेट' ने निम्न उपाय किये:-
  • 1992 के बाद लगातार औद्योगिक नीतियों को कॉरपोरेट हित में कमजोर किया गया।
  • 1992, 1996, 2001 और 2004 के बाद पूंजी निवेश को बढावा देने के लिए भूमि, राजस्व, खनन, श्रम आदि कानूनों को कॉरपोरेट हित के अनुकूल और जन-विरोधी बनाया गया।
  • केन्द्र और राज्य सरकारों ने पूँजी निवेश बढाने के लिए कई तरह कर (टैक्स) रियायतों की घोषणा की, यथा - भूमि के लिए बीमा किश्त भरने से मुक्ति, 100 के0वी0 तक मुफ्त बिजली, पानी टैक्स पर 30 से 40 प्रतिशत तक की छूट, केन्द्रीय शुल्क के भुगतान पर छूट, आयतित कच्चे माल पर शुल्क की छूट, व्यापारिक करों में 50 प्रतिशत तक की छूट।
इस प्रकार पल-पल बिस्तर पर बिछने को तैयार भारतीय लोकतंत्र के हर तंत्र का लाभ उठाकर कॉरपोरेट पूँजी ने भरपूर मुनाफा कमाया। वित्तीय वर्ष 2003-04 और 2006-07 के बीच बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कम्पनियों ने शुद्ध 300(तीन सौ) प्रतिशत का मुनाफा कमाया। यह इस अवधि में पूरी दुनिया के स्टॉक एक्सचेंज के मुनाफों में अधिकतम था।
इसके बदले में यह कारॅपोरेट पूँजी हिन्दुस्तानी गरीब अवाम को निम्न तीनप्रकार से और अधिक बदहाल करने पर तुली है :
  • रोजगार की वृद्धि दर को लगातार धीमा रखा गया ।
  • 1991 के पूर्व के दशक में हमारा सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 4 प्रतिशत रही थी किन्तु रोजगार वृद्धि दर 2 प्रतिशत थी। 1991 के बाद के दशक में जीडीपी वृद्धि दर 7 से 8 प्रतिशत औसत रही है किन्तु रोजगार बृद्धि दर मात्र 1 प्रतिशत रही है ।
  • सार्वजनिक ओर निजी संगठित क्षेत्र (आरगनइज्ड सेक्टर) में 1997 ई में 28.2 मिलियन श्रम शक्ति को रोजगार मिला हुआ था वह 2004 में घट कर  26.2 मिलियन रह गया।
  • निजी पूँजी अपनी इकाईयों में सार्वजनिक क्षेत्रों में घटते रोजगार के अवसर की क्षतिपूर्ति करने को एकदम उत्सुक नहीं है।
  • गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इन दशकों में सबसे ज्यादा पूँजी निवेश हुआ किन्तु रोजगार उपलव्घ कराने की गति सबसे धीमी बनी रही (7 जुलाई 2008, टाईम्स ऑफ इण्डिया)
यही पूंजी निवेश- निजी फैक्ट्री और विकास के गगनभेदी नारे की वास्तविकता है। इसका कारण यह कि कॉरपोरेट पूँजी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार की प्रतिस्पर्धा में अपने को कायम रखने के लिए 'लागत व्यय' में कटौती करती रहती है ।इस लागत व्यय में कटौती का सबसे आसान तरीका है 'मशीनीकरण' की गति को बढावा देना और मजदूरों-कर्मियों की छंटनीकरण या बी0आर0एस0 के बहाने लगातार संखया कम करना।
उदाहरण के लिए, पूना स्थित टाटा मोटर्स ने 1999 से 2004 ई. के बीच अपने श्रमिक कर्मियों की संखया 35,000 से घटा कर 21,000 कर दी किन्तु इसी अवधि में उसका उत्पादन 1,29,000 गाड़ियों से बढ़कर 3,12,000 हो गया।
इसी तरह, जमशेदपुर की टाटा स्टील ने 1999 से 2005 ई. के बीच अपनी श्रमशक्ति को घटा कर 85,000 से 44,000 कर दिया जबकि इसकी उत्पादन क्षमता इसी अवधि में बढ कर 1 से 5 मिलियन टन हो गई।
नतीजन रोजगार की तलाश असंगठित क्षेत्रों (कृषि-रिटेल मार्केट) में की जा रही हेै ।
61वें राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे के अनुसार हमारे 40 करोड श्रमशक्ति का सबसे ज्यादा बोझ कृषि पर है। वहॉ आज भी 11 करोड कृषि मजदूर है जबकि यह बाजारू पूँजीवाद कृषि में निवेश लगातार घटाते जा रही है।
दूसरा रोजगार देनेवाला सबसे बढा असंगठित क्षेत्र रिटेल मार्केट है किन्तु कारपोरेट पूँजी वहॉ भी लूट मचाने आ गई है।

गरीब हिन्दुस्तान को तबाह करने की दूसरी कॉरपोरेट नीति है कल्याणकारी कार्यक्रमों में आवंटन को स्थिर रखना या घटाते जाना :
  • आई0एम0एफ0 और वर्ल्ड बैंक के दवाब में भारत  सरकार 'सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों' (यथा स्वास्थ्य, शिक्षा, जनवितरण ग्रामीण रोजगार योजनाओं) का आवंटन सकल घरेलू उत्पाद का 2.2 प्रतिशत पर स्थिर रखे हुए है। इसका कारण मुद्रा की कमी बताई जाती है जो कि सच नही है।
  • सच यह है कि हमारी औसतन 7-8 प्रतिशत वृद्धि दर और विदेश विनियम रिजर्व फरवरी 2008 तक 283 मिलियन डालर तक भारत के बढते निर्यात के कारण नहीं हुआ बल्कि विदेशी संस्थागत निवेश के कारण हुआ है । इस विदेशी संस्थागत निवेश को वर्ल्ड बैंक और आई0एम0एफ0 से ही प्रोत्साहन-प्रेरणा मिलता है ।
  •  अतएव इस संस्थागत पूंजी निवेश में वर्ल्ड बैंक और आई0एम0एफ0 की केन्द्रीय भूमिका है।
  • यह विदेशी संस्थागत निवेश की पूंजी इतनी चंचल और अस्थिर है कि भारत सरकार इन्हें प्रेरित करनेवाले वर्ल्ड बैंक और आई0एम0एफ को नाराज नहीं कर सकती। नतीजन उनके दवाब  में वह अपनी 'कल्याणकारी राज्य' की भूमिका को संकुचित कर रही है और शिक्षा-स्वास्थ्य आदि में निजी पूँजी के प्रवेश को बढावा दे रही है। जिसका खामियाजा अन्ततः गरीब हिन्दुस्तानी उठा रहा है।
  • तीसरा सबसे विनाशकारीरास्ता कॉरपोरेट पूंजी अपना रही है जबरन भूमि अधिग्रहण का
  • जबरिया भूमि अधिग्रहण, कारपोरेट-नेतृत्व-विकास का सबसे मारक हथियार बना हुआ है। ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता द्वारा निर्मित 1894 ई. का 'भूमि अधिग्रहण अधिनियम' को आजाद भारत के सिपाहसलारों ने 1952, 1963 ओर 1984 में संशोधित कर और कठोर किया। 2006 में इसमें पुनः संशोधन किया गया अैार साथ में  पहली बार पुनर्वास और पुर्नस्थापन नीति भी बनी । किन्तु इस नीति को जमीन में उतारने को राज्य सरकारें इच्छुक नहीं दिखती।
  • दूसरी ओर वही राजसत्ता 'जनहित' में कारॅपोरेट पूंजी के लिए उडीसा, छत्तीसगढ, झारखंड, मध्यप्रदेश, बंगाल में भूमि छीनने को आतुर है। मुआवजे की दर बिना किसानों-जमीन मालिको सें बात किये एकतरफा तय की जाती है। जबरन अधिग्रहण हेतु सशस्त्र पुलिस बल तक उतारा जा रहा है ।
  • कथित कल्याणकारी राज्य, कॉरपोरेट की सेवा में इतना डूब गया है और इस कथित विकास के व्यक्तिगत लाभ में इतना अन्धा हो चुका है कि अपनी ही जनता पर बर्बर अत्याचार करने, दमनकारी नीति अपनाने और गोलियों से भूनने में भी नहीं हिचक रही है। चाहे वह कलिंगनगर हो याकुजंग-बलितुथा, नियमागिरि, पोटका या बस्तर। हर जगह यही कहानी दुहराई जा रही है।
    अभी 14 मई 2010 को बलिटुहा (उड़ीसा) में दक्षिण कोरियायी कम्पनी कोस्को के खिलाफ संधर्षरत पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के कार्यकर्ताओं पर गोली चलाई गई जिसमें नाथ स्वान (उम्र 32 वर्ष) एवं रमेश दास (उम्र 35 वर्ष) बुरी तरह घायल हैं। सशस्त्र पुलिस बल के लाठी चालन एवं अन्य दमनकारी रवैये से लगभग 100 स्त्री-पुरुष और बच्चे घायल हैं। चूंकि सशस्त्र बलों ने संघर्ष स्थल धिनकिया ग्राम को चारों ओर से घेर रखा है अतः इन घायलों को मेडिकल सुविधा भी उपलब्ध नहीं करवाई जा सकी।
    यह गोलीकांड 12 मई 2010 को कलिंग नगर में पुनः दोहराया गया। इसमें एक ग्रामीण शहीद हुआ। कलिंग नगर 02 जनवरी 2006 को अपने 14 आदिवासी ग्रामीणों की शहादत अभी तक भूला नहीं है। नियमागिरी पहाड़ीयों में छुपे तीन ट्रिलियन के बॉक्साइट के लिए वहाँ हजारों वर्ष से निवास कर रहे उन आदिवासियों को खदेड़ कर भगा दिया गया और वह बॉक्साइट स्टारलाइट कम्पनी को सौंप दी गई। ध्यातव्य है कि यह स्टारलाइट कम्पनी वेदान्ता कम्पनी की ही एक सिस्टर कन्सर्न है। वेदान्ता कम्पनी सेहमारे गृह मंत्री श्री पी. चिदम्बरम्‌ का संबंध जगजाहिर है।
    जिस 'विकास' का गलाफाडू 'नारा' कॉरपोरेट, राजनेता, नौकरशाह, चेम्बर्स और मीडिया लगा रहे हैं, उस 'विकास' का खोखलापन भारत सरकार के योजना आयोग की विभिन्न कमिटियों की रिपोर्ट से जगजाहिर हो रहा है :
  • गरीबी रेखा निर्धारण के लिए गठित सुरेश तेन्दुलकर कमिटि ने भी अपना प्रतिवेदन दिया है कि 1992-2000 को जो गरीबी रेखा 26.10 प्रतिशत पर थी वह अब बढ़ कर 37.20  प्रतिशत पर पहुॅच गई है।
  •  एन0सी0 सक्सेना कमिटि ने इसे 40 प्रतिशत से ज्यादा बताया था जिसे भारत सरकार ने स्वीकार नहीं किया।
  • यह आप ही तय करें कि यह कैसा अजूबा विकास है जिसमें सरकारी आकड़ों के अनुसार गरीबी 10 प्रतिशत बढ़ जाती हे और संगठित क्षेत्र में रोजगार दर 2 प्रतिशत से 1 प्रतिशत पर गिर जाता है।
  • सबसे ज्यादा रोजगार देनेवले कृषि क्षेत्र में निवेश दर लगातार घटती जा रही है। महाराष्ट्र और आन्ध्रप्रदेश के सम्पन्न और प्रगतिशील किसानों के लिए वैश्वीकृत बाजार की प्रतिस्पर्धा में, अमेरिकी किसानों को मिल रही कुल लागत व्यय की दो तिहाई अनुदान के कारण टिकना संभव नहीं रह गया और एक दशक मेंलगभग 1 लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली।
  •  सिंचित क्षेत्र में बढ़ोतरी नहीं हो रही। भारत सरकार की आंकड़े ही यह बता रहे हैं की सिंचाई पर निवेश घटता जा रहा है किन्तु दूसरी ओर छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में नदियां कॉरपोरेट घरानों के हाथों बेची जा रही है।
  • शिवनाथ नदी, कैलो, कुरकुट, शाबरी, खडून और मन्द नदियाँ बूट पालिसी यानी 'बिल्ड ओन ऑपरेट एन्ड ट्रासर्फर' नीति के तहत कॉरपोरेट पूंजी को दे दी गयी। इन नदियों के किनारे बसी आवादी इनके पानी से बंचित कर दी गयी।
अब आप ही तय करें कि यह बहुप्रचारित 'विकास' है या 'विकास का आतंकवाद'? यह कॉरपोरेट के नेतृत्व में चल रही भारतीय लोकतांत्रिक नाटक मंडली जिस तरह देश के गरीब आवाम के लिए छुपे और मीठे हत्यारे में तब्दील हो गई है उसके जबाव में प्रतिकार, प्रतिरोध, प्रतिशोध के अलावा और कोई रास्ता बचता है।
लिहाजा, हम आज इस देश में चल रहे विकास के आतंकवाद के खिलाफ अपनी आवाज बुलन्द करते हैं। पॉस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित करते हैं और ऐसे संघर्षों में अपने रक्त के आखिरी कतरे तक साथ देने की कसमें खाते हैं।

इप्टा, प्रलेस, जलेस, जसम, आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच, झाजपा और इंडिजिनस पीपुल्स फोरम की ओर से 24 मई 2010 को रांची में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में जारी।

बरबादी की वही पुरानी दास्तान: नहर का पानी खा गया खेती

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/08/2010 12:46:00 PM

रायबरेली से लौट कर रेयाज उल हक

अपनी फूस की झोंपड़ी में गरमी से परेशान छोटेलाल बात की शुरुआत आसान हो गई खेती के जिक्र से करते हैं. वे कहते हैं, ‘पानी की अब कोई कमी नहीं रही. नहर से पानी मिल जाता है तो धान के लिए पानी की दिक्कत नहीं रहती.’
पास बैठे रामसरूप यादव मानो एक जरूरी बात जोड़ते हैं, ‘अब बाढ़ का खतरा कम हो गया है.’
राजरानी इलाके में खर-पतवार के खत्म होने का श्रेय नहर को देती हैं.
लेकिन छोटेलाल ने बात अभी खत्म नहीं की है. उनका सुर भी अब थोड़ा बदल रहा है, ‘गेहूं की फसल लेकिन अब खराब हो गई है. राशन से गेहूं न मिले तो गेहूं के दर्शन नहीं होते. जिनके पास कार्ड नहीं हैं उनकी दशा और खराब है.’
धीरे-धीरे उनकी आवाज में नाराजगी बढ़ रही है, ‘पहले अच्छी फसल होती थी. नहर ने खेती बरबाद कर दी. सीलन से नहर के पासवाली जमीनें खराब हो गई हैं. पहले धान, गेहूं, अरहर, साग-सब्जी हो जाती थी, अब जैसे-तैसे धान ही हो पाता है. गेहूं तो होता ही नहीं.’
आखिर में छोटेलाल सबसे मतलब की बात पर आते हैं, ‘जब से शारदा आई है मेरी 15-16 बिस्वा जमीन बेकार पड़ी है. याद ही नहीं उसमें कब फसल बोई गई थी.’
वे शारदा सहायक नहर की बात कर रहे हैं, जो रायबरेली जिले में अमावां प्रखंड के उनके गांव खुदायगंज के दक्षिण से होकर गुजरती है.

पूरी रिपोर्ट पढ़िए रविवार पर

गिरीश मिश्र के लेखन में अज्ञान और उद्दंडता का मिश्रण दिखाई पड़ता है

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/04/2010 06:30:00 PM

सदानंद शाही के संपादन में निकलने वाली पत्रिका साखी के 20वें अंक में छपे अपने (मूलतः अंगरेजी में लिखे) पत्र में, अर्थशास्त्र के प्राध्यापक और आर्थिक इतिहासकार गिरीश मिश्र ने रामविलास शर्मा और मैनेजर पांडेय के कार्यों पर गंभीर टिप्पणियां की थीं. इस पर रविभूषण जी ने एक जवाब लिखा है, जिसे हम यहां पेश कर रहे हैं. यह लेख प्रभात खबर में संपादकीय पन्ने (अभिमत) पर भी छपा है. जल्दी ही मैनेजर पांडेय से एक बातचीत (बातचीत का मुद्दा यह पत्र नहीं है) भी हाशिया पर पेश करेंगे.

हिंदी आलोचना का नया बखेड़ा
हिंदी में विगत कुछ वर्षों से आलोचना के नाम पर कई लोग अगंभीर टिप्पणियां कर रहे हैं. फालतू और विवेकहीन टिप्पणी पर कोई 'बहस' नहीं हो सकती. कई वर्षों से अर्थशास्त्री गिरीश मिश्र का एकसूत्री अभियान विख्यात आलोचक रामविलास शर्मा की निंदा का है. उनके इस निंदा अभियान में हिंदी के कई अध्यापक, संपादक और आलोचक भी हैं. रामविलास शर्मा की स्थापनाओं से असहमत व्यक्तियों को तथ्य-तर्क के साथ अपने विचार प्रस्तुत करने चाहिए. संवाद और बहस की गुंजाइश बनी रहेगी.
अभी हिंदी की एक अनियतकालीन पत्रिका 'साखी' (अप्रैल 2010) के संपादक ने 'बहस' के लिए आलोचक पीएन सिंह को लिखा गया गिरीश मिश्र का पत्र प्रकाशित किया है. 'बहस' के लिए प्रकाशित इस पत्र का शीर्षक है 'हिंदी आलोचना में बचकाना मर्ज'. संपादक महोदय के अनुसार पत्र लेखक ने 'इस पत्र में हिंदी आलोचना के परिदृश्य पर चिंता प्रकट करते हुए कुछ महत्वपूर्ण और विवादास्पद सवाल उठाये हैं.' सच्चाई यह है कि इस पत्र में आलोचना से संबंधित एक भी सवाल नहीं है.
पत्र लेखक पीएन सिंह से 'पूरी तरह अजनबी' हैं. चार वर्ष पहले हिंदी के एक दैनिक समाचार पत्र में पीएन सिंह का एक लेख 'टकराव आलोचना के शिखर पर- नामवर का मैनेजरी पाठ' प्रकाशित हुआ था. इसी लेख ने पत्र लेखक को पत्र लिखने के लिए उकसाया. यह लेख प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पांडेय के इंटरव्यू की प्रतिक्रिया में था. चार वर्ष पहले गोरखपुर में जिस संवाददाता ने यह इंटरव्यू लिया था उसने उसे विकृत कर प्रकाशित किया. संवाददाता ने अपनी ओर से यह लिखा कि समकालीन आलोचना में नामवर सिंह की हैसियत क्या है. इस पर काफी हल्ला-हंगामा हुआ. गोरखपुर से बनारस तक. पीएन सिंह ने अपनी पत्रिका के संपादकीय में इस पर लिखा. मैनेजर पांडेय ने उन्हें यह बताया कि उस समय गोरखपुर में एक और दैनिक हिंदी पत्र के संवाददाता ने उनका इंटरव्यू लिया था, जिसे वे देखें. पीएन सिंह ने उस दूसरे इंटरव्यू को देखा-पढ़ा और अपनी पत्रिका में खेद भी प्रकट किया.
अब गिरीश मिश्र के पत्र को चार वर्ष बाद किस नीयत से प्रकाशित किया गया है? गिरीश मिश्र ने लिखा है, 'मैंने हिंदी भाषा और साहित्य का ज्ञान नहीं प्राप्त किया और न ही मैं डॉ नामवर सिंह के योगदान का मूल्यांकन करने में सक्षम हूं.' आलोचना उनके लिए 'हमला' है. नामवर सिंह की आलोचना करनेवाले हिंदी के लेखक उनके अनुसार 'हीन-भावना और ईर्ष्या से पीड़ित होते हैं.' और 'उनके लेखन में अज्ञान और उद्दंडता का मिश्रण दिखाई पड़ता है.' स्वयं उनके पत्र में 'अज्ञान और उद्दंडता का यह मिश्रण' वहां दिखाई देता है, जहां वे मैनेजर पांडेय और रामविलास शर्मा पर टिप्पणी करते हैं. वे किताब नहीं, उसकी 'फ्लैप टिप्पणी' पढ़ कर राय बनाते हैं. मैनेजर पांडेय की 'ताजा किताब' 'आलोचना की सामाजिकता' (2005) देख कर (पढ़ कर नहीं!) 'मुझे लगा कि उन्हें शुद्ध हिंदी लिखने भी नहीं आती और किताब की फ्लैप टिप्पणी से उनकी उद्दंडता की पुष्टि होती है.' 'फ्लैप टिप्पणी' पढ़ कर टिप्पणी करना आलोचना नहीं है. प्रकाशक 'फ्लैप टिप्पणी' लिखवाता है. गिरीश मिश्र 'रामविलास शर्मा के भक्तों' में से किसी का नाम नहीं लेते और उसकी संख्या वृद्धि की 'एक वजह नामवर सिंह की निंदा करने की आकांक्षा भी' मानते हैं.
वे 'एक वजह' पर अड़ कर अन्य कई वजहों की अनदेखी करते हैं. नामवर सिंह के महत्व और अवदान से भलीभांति अवगत लोगों की संख्या कम नहीं है. गिरीश मिश्र के जरिये नामवर सिंह को नहीं जाना जा सकता. डॉ राम विलास शर्मा के साहित्यिक लेखन से गिरीश मिश्र अपरिचित हैं. 'न तो उसे मैंने पढा़ है न अब मेरे पास इसका समय है.' इस ईमानदार कथन की प्रशंसा की जानी चाहिए, पर रामविलास शर्मा की 'कुछ साहित्येतर किताबें' पढ़ कर उन्होंने जो लिखा है, उसकी निंदा और भर्त्सना भी की जानी चाहिए. वे 'कुछ साहित्येतर किताबों' को 'निहायत लद्धड़' कहते हैं.
डॉ शर्मा के 'गांधी, अंबेडकर, लोहिया और आर्यों की उत्पत्ति संबंधी उनके लेखन में' 'गहरे अध्ययन' और मौलिक शोध' का अभाव देखते हैं. और 'मार्क्स की रचना' 'पूंजी' भाग दो के' रामविलास शर्मा द्वारा किये गये अनुवाद को 'भयावह' कहते हैं. उनके अनुसार डॉ शर्मा को क्लैसिकल अर्थशास्त्र का ज्ञान नहीं है और 'विशेष तौर पर मार्क्स के रवैये का भी नहीं. और अंत में उनका यह कथन है 'भारत में अंगरेजी राज का दो खंडों में किया गया अध्ययन उनकी अयोग्यता का प्रतीक है.' ऐसे फतवों से गिरीश मिश्र की योग्यता जाहिर होती है! पूरनचंद्र जोशी ने 'गांधी, अंबेडकर और लोहिया' ग्रंथ को 'भारतीय सामाजिक चिंतन का एक मार्गदर्शी मौलिक ग्रंथ' कहा है. इस पुस्तक को पढ़ने के बाद उन्होंने लिखा- 'आया था हंसी उडा़ने लेकिन ठहर गया वंदना करने'. वे रामविलास शर्मा को 'बहुआयामी प्रतिभावाले रेनेसां काल के मार्क्सवादी बुद्धिजीवी' कहते हैं. गिरीश मिश्र को यह पता नहीं है कि उन्होंने जिनको पत्र लिखा है, वे पीएन सिंह रामविलास शर्मा को 'भारतीय लूकाच' कहते हैं और गांधी, लोहिया संबंधी उनके अध्ययन को 'वर्तमान राजनीतिक सामाजिक विमर्श में एक गंभीर हस्तक्षेप मानते हैं. रामविलास शर्मा का अध्ययन, विवेचन और निष्कर्ष गिरीश मिश्र जैसे 'आर्थिक इतिहासकार' फूंक कर नहीं उडा़ सकते. बालजाक पर उन्होंने अपनी पुस्तक नामवर सिंह को समर्पित की है. इसके कई वर्ष पहले मैनेजर पांडेय ने अपनी पुस्तक 'साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका' (1989) डॉ नामवर सिंह को 'सादर समर्पित' की थी. उन्होंने 'नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि' लेख (1977) में नामवर की प्रमुख कृतियों की चर्चा की थी और चौबीस वर्ष बाद 2001 में 'नामवर के निमित्त' संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त किये हैं, जो इसी निबंध में प्रकाशित हैं. पीएन सिंह ने अपनी नयी पुस्तक का नाम रामविलास शर्मा की पुस्तक, 'गांधी, अंबेडकर और लोहिया' के नाम पर रख लिया है, जबकि उनकी पुस्तक इन तीनों पर केंद्रित नहीं है. वह समीक्षा संग्रह है.
'साखी' पत्रिका का संपादन वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने दिल्ली से आरंभ किया था. वे इसके प्रधान संपादक हैं. उनसे संपादक परामर्श नहीं करते. उनका पत्रिका से नाम मात्र का संबंध है. संपादक मंडल के पहले सदस्य पीएन सिंह हैं, जिन्होंने अपने नाम लिखे गये पत्र का प्रकाशन जरूरी समझा. दूसरे सदस्य अवधेश प्रधान ने संपादक को यह पत्र प्रकाशित करने से मना किया था. पत्र छपने पर अवधेश प्रधान ने संपादक मंडल से इस्तीफा दे दिया है. नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह का 'साखी' के इसी अंक में उन पर प्रकाशित एक लेख है. लेख के अंत में विजय प्रकाश सिंह ने हरिशंकर परसाई के व्यंग्य 'पहला सफेद बाल' की पंक्तियां उद्धृत की हैं- 'बडे़ आदमियों के दो तरह के पुत्र होते हैं- वे जो वास्तव में हैं, पर कहलाते नहीं हैं और वे जो कहलाते हैं, पर हैं नहीं... होने से कहलाना ज्यादा लाभदायक है.' विजय प्रकाश सिंह की चिंता और गिरीश मिश्र, पीएन सिंह एवं सदानंद शाही की चिंताएं एक नहीं हैं. विजय प्रकाश सिंह ने लिखा है 'अगर समझने का दावा करने वाले और 'कहलानेवाले' पुत्र उनकी घोषित पुस्तकों का काम लग कर पूरा करवा देते तो शायद पिताजी भी अपने अंतर्मन की बात कह पाते.'

माओवाद पर जारी बहसः ईपीडब्ल्यू से साभार

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/01/2010 07:29:00 PM


कुछ माह पहले मंछली रिव्यू की वेबसाइट पर बर्नार्ड डिमेलो का एक लंबा आलेख छपा था, जिसे बाद में इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली ने संपादित करके छापा, जिसके डिमेलो उप संपादक भी है. ईपीडब्ल्यू में प्रकाशित होने के बाद इस आलेख पर मॉन्ट्रियाल स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ क्यूबेक में प्राध्यापक परेश चक्रवर्ती ने लंबी टिप्पणी लिखी है, जिसे इस हफ्ते ईपीडब्ल्यू ने प्रकाशित किया है. साथ में डिमेलो का जवाब भी प्रकाशित किया गया है.
हाशिया के पाठकों के लिए पेश है तीनों आलेख (साथ में मंथली रिव्यू की वेबसाइट पर प्रकाशित मूल और असंपादित आलेख भी). इसे यहां भारत में माओवाद पर जारी बहस के सिलसिले में दिया जा रहा है.


मंथली रिव्यू वेबसाइट पर प्रकाशित डिमेलो का मूल आलेख
What is Maoism




ईपीडब्ल्यू में प्रकाशित डिमेलो का आलेख

What is Maoism





चक्रवर्ती की टिप्पणी

On What is Maoism




डिमेलो का जवाब

Did Lenin and Forsake Marx

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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