हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

हमरी अटरिया पे आओ संवरिया

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/31/2010 01:41:00 PM

कभी कभी कुछ गीत कितनी पुरानी यादों को छेड़ देते हैं. उस रात जब उमा (अचानक, जिसकी मैं अपेक्षा भी नहीं कर रहा था) ने यह गीत सुनाया तो हमें पटना के वे दिन याद आ गए, जब प्रभात खबर के दफ्तर के सामने अजय जी (जो तब प्रभात खबर के संपादक हुआ करते थे) के साथ फुटपाथ पर बैठ कर देर तक यह गीत गुनगुनाया करते थे. कभी यह गीत जब उन्हें अपने दफ्तर में याद आता तो वे टेबल पर थाप देकर गाते. इस गीत के साथ मैं उसी तरह बड़ा हुआ हूँ जैसे...

नहीं, ज्यादा इंतजार नहीं. बस अब ये गीत सुनिए.

बेगम अख्तर






शोभा गुर्टू


प्रेम एक राजनीतिक मसला है...

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/28/2010 03:06:00 PM

देवाशीष प्रसून

समगोत्रीय शादियों के ख़िलाफ़ खाप पंचायतों ने ख़ूब हो-हल्ला मचा रखा है। डंके के चोट पर उन दंपत्तियों की हत्या कर दी जा रही है, जो एक ही गोत्र होने के बावज़ूद अपने प्रेम को तवज्जो देते हुए परिवार बसाने का निर्णय लेते हुए शादी करते हैं। अंतर्जातीय विवाहों पर भी इन मनुवादियों का ऐतिहासिक प्रतिबंध रहा है। देश में लोकतंत्र की कथित रूप से बहाली के तिरसठ सालों के बाद भी इन सामंती मूल्यों का वर्चस्व हमारे समाज में क़ायम है। इसके पीछे इन कठमुल्लाओं और पोंगा पंडितों का शादी-विवाह के संबंध में दिया जाने वाला रूढ़िवादी तर्क यह है कि इस तरह के वैवाहिक रिश्ते भविष्य में इंसानों की नस्लें खराब करेंगी। सोचना होगा कि  इस तथाकथित वैज्ञानिक तर्क में कितना विज्ञान है और कितनी राजनीति? लेकिन एक बात तो सुस्पष्ट है कि अगर अपारंपरिक तरीकों से विवाह करने पर अगली नस्ल पर आनुवांशिक कुप्रभाव पड़ता है, जैसा कि ये लोग कहते हैं, तो एक दूसरी बात वैज्ञानिक तौर सिद्ध है कि प्रदूषित खान-पान, शराब-सिगरेट-तंबाकू का इस्तेमाल और रोजमर्रा में उपयोग किये जाने वाले अन्य अप्राकृतिक जीवन-व्यवहारों का भी आनुवांशिकी पर बुरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में इस प्रदूषित जीवन-स्थिति के लिए जिम्मेवार लोगों की हत्या क्यों नहीं होती, जैसे कि समगोत्रीय या अंतर्जातीय विवाह करने वाले दंपत्तियों की हत्या की जाती है? आजकल यह चर्चा और चिंता का मौजूँ मुद्दा है कि कृत्रिम तरीकों से उपजाये बीटी फल-सब्जियों से मानव आनुवांशिकी को सबसे ज्यादा खतरा है। अगर इन खापों को अपने नस्ल की आनुवांशिकी से इतना ही लगाव है तो बीटी फल-सब्जियों को उपजाने वालों का वही हश्र क्यों नहीं करते, जो उन प्रेमी युगलों का करते हैं, जिन्होने प्रेम को अपने जीवन में सबसे महत्वपूर्ण माना। लेकिन सच तो यह है कि खाप पंचायतों की परेशानी नस्लों की बिगड़ती आनुवांशिकी से नहीं है। क्योंकि कई बार यह भी  देखा गया है कि पारंपरिक दायरों में रह कर भी प्रेम-विवाहों को मान्यता नहीं मिल पाती है। दरअसल यह मामला स्त्री की आज़ादी, उसका अपने श्रम, शरीर और यौनिकता पर नियंत्रण की राजनीति का है।

असल में, जर्जर हो चुकी सनातनी परंपरा के झंडाबरदारों को इन संबंधों से दिक्कत इसलिए है कि इन प्रेम संबंधों के जरिए कोई स्त्री अपने जीवन और अपने श्रम के इस्तेमाल पर अपना स्वयं का दावा पेश करती है। वह कहती है कि हम आज़ाद हैं, यह तय करने को कि हम अपना जीवनसाथी किसे चुने। इन संबंधों से इशारा है कि तमाम तरह की उत्पादन-प्रक्रियाओं में स्त्रियाँ अपने श्रम का फैसला अब वह खुद लेंगी। यह आवाज़ है उन बेड़ियों के टूटने की, जिसने स्त्रियों के पुनरूत्पादक शक्तियों पर पुरूषों का एकाधिकार सदियों से बनाये रखा है। यह विद्रोह है पितृसत्ता से विरुद्ध। ऐसे में प्रेम-विवाह पितृसत्ता के खंभों को हिलाने वाला एक ऐसा भूचाल लाता है कि बौखलाये खाप-समर्थक प्रेमी-युगलों के खून के प्यासे हो जाते हैं।

हमारे देश में खाप पंचायत, संस्कारों के जरिए लोगों के दिल-ओ-दिमाग में बसता है। बचपन से ही यह संस्कार दिया जाता है कि अपने बड़ों का आदर और छोटों को दुलार व उनका देखभाल करना चाहिए, पर कोई प्रेम सरीखे समतामूलक रिश्तों का पाठ बच्चों को नहीं पढ़ाता। गो कि यह कोई नहीं सिखाता कि घर में पिता भी उतने ही बराबर और प्रेम के पात्र हैं, जितना कि एक छोटा बच्चा। बराबरी के संबंधों को बनने से लगातार रोका जाता है। बड़े गहराई से एक वर्चस्व-क्रम हमेशा खड़ा किया जाता है। मानता हूँ कि माता-पिता की जिम्मेवारी अधिक होती है, लेकिन अधिक जिम्मेवारी के चलते परिवार में उनकी शासकों-सी छवि का निर्माण करना, सूक्ष्म स्तर पर एक विषमता आधारित समाज का निर्माण करना है। भारत में सदियों से जीवित सामंती समाज के पैरोकारों ने प्रेम को अपने आदर्शवादी या भाववादी सोच-समझ के मुताबिक ही व्याख्यायित किया है। मसलन, बार-बार यह आदर्शवादी समझ बच्चों के दिमाग में डाली जाती है कि विपरीत लिंगों के बीच का स्वभाविक प्रेम भी दो बस आत्माओं के बीच पनपा एक बहुत पवित्र भाव मात्र है और इसका देह और यौनैच्छाओं से कोई संबंध नहीं है। मानव जीवन में यौन-व्यवहारों को वर्जनाओं के रूप में स्थापित करने में धर्म और परंपराओं ने एक लंबी साजिश रची है। जाहिर है कि मानव प्रकृति के विरुद्ध प्रेम के संबंध में इस तरह की सायास बनायी गई पवित्रावादी धारणाएं मनगढंत व अवैज्ञानिक हैं और इसका उद्देश्य सहज मानवीय व्यवहारों पर नियंत्रण करना है।

एक तरफ, हम हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान आदि इलाकों में दहशत का माहौल बनाने वाले खापों और चौधराहटों की बात करते हैं, लेकिन सच मानिये इस देश में हर घर में किसी न किसी रूप खाप अपना काम करता रहता है। कहीं, जाति के स्तर पर, तो कहीं आर्थिक हैसियत के आधार पर तो कहीं किसी अन्य सत्ता संबंध के मुताबिक प्रेम और वैवाहिक रिश्तों पर लगाम लगाया जाता है। युवा पत्रकार निरुपमा पाठक का ही मामला लें। वह पढ़ी लिखी थी, आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर थी। इन परिस्थितियों में अर्जित किए आत्म-विश्वास के चलते उसमें यह हौसला था वह अपनी मर्ज़ी से अपना जीवनसाथी चुन सकें और उसने समाज के रवायतों को जूती तले रखते हुए किया भी ऐसा ही। लेकिन, उसकी इस हिमाकत के चलते उसके बाप और भाई की तथाकथित इज़्ज़त को बड़ा धक्का लगा। फिर साज़िशों का एक सिलसिला चला। घरवालों ने अपना प्यार और संस्करों का हवाला देकर उसे घर बुलाया गया। भावुक होकर जब निरुपमा अपने पिता के घर एक-बार गयी तो फिर कभी लौट नहीं सकी। दोबारा उसे अपने प्रेमी से नहीं मिलने दिया गया। जब समझाइश काम नहीं आई तो उसको अपनी जान से ही हाथ धोना पड़ा। उसकी मौत ने हमारे सामने कई सवालों को एक बार फिर से खड़ा कर दिया है। इस घटना ने हमारे समाज के चेहरे पर से पारिवारिक प्रेम के आदर्शवादी नक़ाब को नोच कर फेंक दिया है और साबित हो गया है कि हम एक प्रेम विरोधी समाज में रहते हैं। साथ ही, यह साफ़ है कि मामला सिर्फ़ ऑनर किलिंग का नहीं है, बल्कि यह एक स्त्री का अपने जीवन पर अधिकार, उसकी स्वतंत्रता और उसके अपने ही श्रम और यौनिकता पर हक को बाधित करने का मसला है। यह पितृसता दारा जारी किया गया एक फतवा भी है कि अगर निरुपमा जैसी लड़कियाँ, अपने अधिकारों पर अपना दावा पेश करती हैं तो यह विषमतामूलक पुरूषवादी समाज के पुरोधाओं के नज़र में यह संस्कृति पर हुआ एक ऐसा हमला बन जायेगा, जिसकी पुरूषवादी दरिंदों ने नज़र में सज़ा मौत भी कम हो सकती है।

गौर से देखें तो इसी तरह के अप्राकृतिक और सत्‍ताशाली व दबंग ताक़तों द्वारा लादे हुए मानव व्यवहारों ने ही समाज में अन्याय और विषमता के काँटे बोये हैं। इससे ही स्त्रियों सहित हाशिये पर जीवन जी रहे दलितों और आदिवासियों जैसे तमाम लोगों का शोषण और उन पर अन्याय अनवरत जारी है। मानवीय गुणों में प्रेम है और स्वतंत्रता है, जो स्थापित सत्ताचक्र को बनाये रखने के लिए एक बड़ी मुश्किल चुनौति है। अतः समाज मानवीय गुणों का हर संभव दमन करता है।

परमाणु जवाबदेही विधेयक में छिपे सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/25/2010 07:06:00 AM

प्रफुल्ल बिदवई

क्या हमने भोपाल गैस त्रासदी से कोई सबक लिया है? क्या चौथाई सदी लंबी चोट, बदनामी और अपमान की उस स्थायी पीड़ा से हमने कुछ सीखा है जो दुनिया की सबसे भयावह रासायनिक दुर्घटना के पीड़ितों को भुगतनी पड़ी है? परमाणु दुर्घटना होने पर मुआवजा देने संबंधी असैन्य परमाणु जवाबदेही विधेयक को पास करवाने के लिए सरकार जिस तरह की तत्परता दिखा रही है उसे देखकर तो यही लगता है कि हमने कुछ नहीं सीखा. बल्कि सीखने की बजाय हमारा तंत्र इस तरह की आपदाओं की आशंका के प्रति लगातार इनकार की मुद्रा बनाए हुए है. सरकार दिखावा कर रही है कि उसे अपने नागरिकों की चिंता है और उसे किसी भी आपदा से निपटना अच्छी तरह आता है. इसी तरह का दिखावा 1984 में भी किया गया था जब भोपाल गैस पीड़ितों को उनके अधिकार  दिलाने की बात आई थी. लेकिन बाद में दोषी कंपनी के साथ मिलीभगत करके इन पीड़ितों को मामूली मुआवजा देकर टरका दिया गया.

इस विधेयक में गंभीर खामियां हैं. इसका मुख्य मकसद है किसी परमाणु संयंत्र में होने वाली दुर्घटना से होने वाले संभावित व्यापक नुकसान की जिम्मेदारी इसके डिजाइनरों, निर्माताओं और आपूर्तिकर्ताओं से हटाना. इसमें विदेशी परमाणु कंपनियों से कहीं ज्यादा मुआवजा सरकार को देना पड़ेगा. यानी भुगतेगी भी जनता और मुआवजे का पैसा भी उसी जनता की जेब से जाएगा. इस तरह देखा जाए तो यह विधेयक कानून, संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन के अधिकार और जवाबदेही के मूल सिद्धांतों और जनहित के खिलाफ जाता है. इसका सबसे आपत्तिजनक पहलू ही इसका बुनियादी पहलू है. यह विधेयक विनाशकारी दुर्घटना की क्षमता रखने वाले एक ऐसे उद्योग की जवाबदेही को सीमित करने की बात कहता है जो बेहद खतरनाक और दुर्घटना संभावित माना जाता है.

परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा उत्पादन का अकेला ऐसा तरीका है जिसमें विकिरण के जरिए व्यापक स्तर पर विनाश पैदा करने की क्षमता होती है. इसका घातक असर लंबे समय तक वातावरण में बना रहता है. अदृश्य होने की वजह से इसकी भयावहता और बढ़ जाती है. पिछले दिनों दिल्ली के एक कबाड़ बाजार में हुए कोबाल्ट-60 विकिरण हादसे से यह बात उजागर भी हो चुकी है. यह तर्क दिया जाता है कि बहुत विनाशकारी दुर्घटनाओं की संभावना कम होती है मगर दुर्घटना की हालत में इसके नतीजे कितने विनाशकारी होंगे इस पर ज्यादा चर्चा नहीं होती. 1986 में युक्रेन में हुए चेर्नोबिल हादसे को कौन भूल सकता है जहां परमाणु संयंत्र में हुए रेडियोएक्टिव रिसाव में 65,000 लोग विकिरणजनित कैंसर की भेंट चढ़ गए थे और आर्थिक नुकसान का आंकड़ा था 350 अरब डॉलर.

परमाणु दुर्घटना की जवाबदेही सीमित करना सैद्धांतिक रूप से भी गलत है. ऐसा करना दो मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन है- एहतियाती सुरक्षा का सिद्धांत और जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा भुगतान का सिद्धांत. पहला सिद्धांत कहता है कि इतने व्यापक पैमाने पर विनाश की क्षमता रखने वाली किसी ऐसी गतिविधि को इजाजत नहीं मिलनी चाहिए जिसके बारे में पूरी जानकारी न हो. दूसरा सिद्धांत कहता है कि जिन लोगों ने नुकसान किया है वे पीड़ितों को पूरा मुआवजा दें.

इन सिद्धांतों और संपूर्ण जवाबदेही की धारणा का जिक्र सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर अपने फैसलों में भी किया है. इनका जिक्र धारा 21 (जीवन का अधिकार), 47 और 48ए (जन स्वास्थ्य उन्नति और पर्यावरणीय संरक्षण) में है. 1996 में कोर्ट ने कहा था: 'एक बार कोई गतिविधि, जिससे जोखिम जुड़ा हो, शुरू होने के बाद इसे शुरू करने वाला व्यक्ति ही इसके अच्छे या बुरे के लिए जिम्मेदार होगा. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसने जरूरी उपाय कर रखे थे.'

परमाणु जवाबदेही विधेयक में इन सिद्धांतों की अनदेखी की गई है. इसमें मनमाने ढंग से उत्तरदायित्व संबंधी धन की सीमा बेहद कम  (2,300 करोड़ रुपए) निर्धारित की गई है. इसमें भी संचालकों की जिम्मेदारी की सीमा सिर्फ 500 करोड़ रुपए है. बाकी का जो अंतर है उसे सरकार वहन करेगी यानी आप और हम, वे लोग जो इस दुर्घटना के लिए रत्तीमात्र भी जिम्मेदार नहीं हैं.

यह विधेयक परमाणु आपूर्तिकर्ताओं और डिजाइनरों को जवाबदेही के शिकंजे से बच निकलने की छूट देता है. अपने उत्पाद की जवाबदेही के तहत भविष्य में उनके उपकरण (रिएक्टर) से किसी भी तरह के नुकसान की हालत में - मसलन डिजाइन या निर्माण संबंधी खामी उजागर होने पर - उन्हें हर्जाना भुगतना चाहिए. यह पूरी तरह से नाइंसाफी होगी यदि निर्माण या फिर डिजाइन संबंधी किसी खामी के चलते हुई दुर्घटना के बावजूद सारी जिम्मेदारी संचालक के सिर पर हो. संचालक यानी सरकार जो इन रिएक्टरों को परमाणु विद्युत निगम के तहत संचालित करेगी. इस कानून का उतना ही घृणित एक पक्ष और है. यह जवाबदेही की अवधि सिर्फ 10 साल तक सीमित करने की बात करता है जबकि किसी विकिरण दुर्घटना के प्रभावों का असर (कैंसर, जेनेटिक विकार आदि) 20 साल बाद देखने को मिलता है.

स्पष्ट रूप से इस बिल का खाका परमाणु कंपनियों को उनकी जनता के प्रति जवाबदेही से मुक्त करने के लिए रचा गया है. और इसकी जड़ें 1960 के दशक में हुए दो सम्मेलनों में जुड़ी हैं - धनी देशों (ओईसीडी) द्वारा प्रायोजित 1960 का पेरिस सम्मेलन और 1963 का वियना सम्मेलन. यह ऐसा दौर था जब लोगों के अंदर ये उम्मीदें बनाई जा रही थीं कि ऊर्जा का भविष्य परमाणु ऊर्जा में ही छिपा हुआ है जो सुरक्षित, सस्ती और पर्याप्त होगी. लेकिन उम्मीदें उम्मीदें ही रह गईं. जितना दावा किया जा रहा था परमाणु ऊर्जा उत्पादन में उसके दस फीसदी भी बढ़ोतरी नहीं हुई. अमेरिका जो कभी दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा देश हुआ करता था उसने अपने यहां 1973 के बाद से एक भी नए संयंत्र की इजाजत नहीं दी है. वैश्विक ऊर्जा उत्पादन में परमाणु ऊर्जा का योगदान लगातार कम होता जा रहा है जबकि पूर्ण रूप से सुरक्षित, हर तरह के प्रदूषण से मुक्त सौर और पवन ऊर्जा उत्पादन की दर सालाना 20 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है.

दुनिया के इतिहास में परमाणु ऊर्जा सबसे बड़ी औद्योगिक विफलता साबित हुई है. अमेरिकी ऊर्जा विशेषज्ञ एमरी लोविंस के मुताबिक दुनिया भर में इसमें खरबों डॉलर का नुकसान हो चुका है. परमाणु ऊर्जा जैसी विनाशकारी तकनीक को सब्सिडी देना 1960 में भी गलत था. आज भी यह हास्यास्पद है जबकि यह तकनीक 60 साल पुरानी हो चली है और शायद अपनी क्षमता का पूरा दोहन कर चुकी है. रेडियोएक्टिव कचरे को निपटाने का कोई सुरक्षित तरीका नहीं है जो अगले हजारों साल तक विनाश पहुंचाने की क्षमता रखता है. कल्पना कीजिए किसी परमाणु संयंत्र के बंद होने के 100 साल बाद उसके कचरा भंडार में रिसाव हो जाता है. तब कौन जिम्मेदार होगा? विधेयक के मुताबिक खुद जनता जिम्मेदार होगी.

लेकिन यूपीए सरकार 1997 के कंवेंशन ऑन सप्लीमेंटरी कंपनसेशन (सीएससी) फॉर न्यूक्लियर डैमेज नामक अंतरराष्ट्रीय संधि से इस तरह चिपकी हुई है जैसे यह बड़े पैमाने पर स्वीकार्य हो. जबकि असलियत यह है कि सिर्फ 13 देशों ने इस संधि पर दस्तखत किए हैं और अब तक यह अमल में नहीं आ पाई है. इसे प्रायोजित करने वाली अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी आईएईए खुद एक निष्पक्ष संस्था नहीं है. इसका मकसद ही परमाणु ऊर्जा का प्रसार करना है.

इस विधेयक का औचित्य सिद्ध करने के लिए सरकार के पास एक ही दलील है कि जवाबदेही को सीमित किए बिना कोई भी विदेशी उद्योगपति भारत में निवेश नहीं करेगा. लेकिन इस दलील से सवाल उठता है कि क्या हमें परमाणु ऊर्जा की जरूरत है भी, और है तो हम इसके लिए कितनी बड़ी कीमत चुकाने को तैयार हैं? यह विधेयक भारतीय और अमेरिकी उद्योगपतियों के दबाव के सामने घुटने टेकने जैसा है. अमेरिकी अधिकारी और औद्योगिक समूह इसके पक्ष में जबर्दस्त लामबंदी कर रहे हैं. परमाणु ऊर्जा समझौते के बाद उन्हें इसका फायदा जो चाहिए. विधेयक को खारिज कर हम इस धोखे से बच सकते हैं. (तहलका से साभार)

कृषि संकटः आपदा के घुमड़ते बादल

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/24/2010 08:59:00 AM

बढ़ती हुई महंगाई उस आपदा का सिर्फ एक संकेत है, जिससे खेती जूझ रही है. दरअसल भारतीय कृषि क्षेत्र बुरी तरह से चरमरा रहा है. संकट से पार पाने के लिए नजरिए में बड़े बदलावों की जरूरत है. लेकिन कृषि मंत्री शरद पवार आपदा की इस आहट को सुनने के लिए तैयार नहीं. तहलका के अजित साही और राना अय्यूब की रिपोर्ट. साभार

सरकारी नीतियों से लेकर अखबार की सुर्खियों तक तरजीह पाने वाली इस देश की शहरी आबादी को खेत-खलिहान से जुड़ी किसी बात से तब तक कोई खास लेना-देना नहीं होता जब तक या तो सब्जियों के दाम आसमान न छूने लगें या फिर चीनी या दाल जैसी रोजमर्रा की चीज अचानक ही बहुत महंगी न हो जाए. शहरी मध्यवर्ग में ऐसे लोग गिने-चुने ही होंगे जो रबी या खरीफ के बीच का फर्क बता सकते हों. कृषि विज्ञानियों, अर्थशास्त्रियों और कार्यकर्ताओं को छोड़कर ज्यादातर लोग डब्ल्यूटीओ, नकदी फसलों, समर्थन मूल्य, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, खाद्य संप्रभुता और मोनोकल्चर या एकलसंस्कृति जैसे शब्दों पर गौर करने की जहमत नहीं उठाते. दस साल पहले तक सैकड़ों में सीमित किसान आत्महत्याओं का आंकड़ा आज दो लाख के करीब पहुंच चुका है. मगर किसी की इसमें कोई दिलचस्पी ही नहीं.

देखा जाए तो इस तरह की उपेक्षा दिखाकर हम अपने और अपने बच्चों के लिए एक बड़ा जोखिम मोल ले रहे हैं. यह कहने वाले जानकारों की संख्या लगातार बढ़ रही है कि भारत में खेती चौपट होने की दिशा में कदम बढ़ा रही है. अगर हमने इसे लेकर अपना बुनियादी नजरिया और नीतियां नहीं बदलीं तो वह दिन दूर नहीं जब अनाज की कमी और उसकी ऊंची कीमतों के चलते देश में व्यापक भुखमरी की स्थिति पैदा हो जाएगी. साथ ही करोड़ों किसानों के लिए जीना दूभर हो जाएगा.

अगर आपको अब भी यह बड़ी खबर नहीं लगती तो पढ़िए कि सरकार के कृषि प्रबंधन के आलोचक और कृषि विशेषज्ञ सुमन सहाय क्या कहती हैं, ‘दस साल पहले जब मैंने झारखंड में काम करना शुरू किया था तो वहां कोई नक्सलवाद नहीं था. मैं इन नाराज नौजवानों में से कइयों को जानती हूं. ऐसा नहीं है कि वे सरकार को उखाड़ फेंकना चाहते हैं. वे तो बस खेती करना चाहते हैं. मगर उनमें से ज्यादातर ने मान लिया है कि उनकी सुनने वाला कोई नहीं, सरकार ने उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया है.’

झारखंड के किसानों के पास आज फसलों को देने के लिए पानी नहीं है. पिछली बार बुआई के मौसम में सरकारी बीज भंडारों से बीज मिलने में तीन महीने लग गए. तब तक बुआई के लिए बहुत देर हो चुकी थी. वहां शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिलेगा जिसे खेती से यह उम्मीद हो कि इससे साल भर तक उसके परिवार का पेट भर जाएगा. सहाय कहती हैं, ‘यहां तक कि जिन किसानों के पास दस-दस एकड़ जमीनें हैं वे भी खेती करने की बजाय शहर जाकर रिक्शा चलाने या फिर किसी दफ्तर में चपरासी की नौकरी करना पसंद करते हैं.’

भारत में खेती के क्षेत्र में तेज गिरावट की शुरुआत तो 1990 के दशक में ही हो गई थी लेकिन पिछले छह साल के दौरान जिस एक व्यक्ति के रहते इसकी सबसे ज्यादा दुर्दशा हुई वे हैं केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार. देश के सबसे कद्दावर नेताओं में से एक पवार खुद एक किसान के बेटे हैं जिन्होंने महाराष्ट्र की सहकारी चीनी मिलों की जमीन पर अपनी राजनीति की मजबूत इमारत खड़ी की. उनके बारे में कहा जाता है कि वे न सिर्फ भारतीय बल्कि दुनिया भर की खेती का चलता-फिरता ज्ञानकोष हैं. 2004 की गर्मियों में जब उन्होंने इस मंत्रालय की कमान संभाली थी तो कइयों को उम्मीद थी कि पवार अपने इस व्यापक ज्ञान का उपयोग कर कृषि क्षेत्र की नीतियों में सुधार लाएंगे ताकि किसानों को गरीबी के दलदल से बाहर निकाला जा सके. लोगों को यह भरोसा था कि वे आयात को बढ़ाए बिना खाद्य भंडारों का बेहतर प्रबंधन करके कीमतों को नीचे रखेंगे.

मगर पिछले छह साल से पवार की अगुवाई वाले कृषि मंत्रालय ने लगातार ऐसी नीतियां बनाई हैं कि न तो गरीब किसानों की मुसीबतें कम हुई हैं और न अनाज का प्रबंधन बेहतर हुआ है. इसकी बजाय उनका मंत्रालय मांग और आपूर्ति की बाजारवादी अर्थव्यवस्था, बड़े कॉरपोरेट घरानों, आयात में बढ़ोतरी और पानी व दूसरे संसाधन खाने वाली चावल, गेहूं और गन्ना जैसी फसलों के पक्ष में खड़ा नजर आया है. विडंबना देखिए कि मीडिया में उनकी चर्चा कृषि से ज्यादा क्रिकेट के क्षेत्र में उनके प्रबंध कौशल के चलते होती रही है. वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर कहते हैं, ‘खेती की अपनी व्यापक समझ का इस्तेमाल पवार ने प्रबंधन की बजाय मनमानी के लिए किया.’

परिणाम तो बुरा होना ही था. इस साल फरवरी से इस महीने तक खाद्य पदार्थों की कीमतों ने जबर्दस्त छलांग लगाई तो पवार ने कृषि मंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झड़ने की भरसक कोशिश की. ऐसा करने में वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी इसके लिए बराबरी का जिम्मेदार बताने की हद तक चले गए. हालांकि फौरन ही उन्होंने यह साफ करने की कोशिश की कि उनके बयान को गलत तरीके से समझ गया है. एक दिन लोकसभा में उनके भाषण के दौरान समूचे विपक्ष ने बीच में ही वॉकआउट कर दिया.

अक्सर अविचलित रहने वाला यह शख्स लड़खड़ाने लगा है यह तब साफ जाहिर हो गया जब उन्होंने कांग्रेस पार्टी को अपने उस प्रवक्ता को हटाने पर मजबूर कर दिया जिन्होंने देश की कृषि नीतियों के लिए उन्हें कोसते हुए कैमरे के सामने ही असंसदीय भाषा का इस्तेमाल कर डाला. हटाए गए प्रवक्ता सत्यव्रत चतुर्वेदी और पवार दोनों से जब इस बारे में बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

हालांकि पवार अपनी नीतियों का बचाव करते हैं (देखें इंटरव्यू). वे कहते हैं कि उनकी बनाई नीतियों की वजह से 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) के पहले दो वर्षों में भारतीय कृषि क्षेत्र में 3.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई जबकि 1990 के दशक के दौरान यह ज्यादातर दो प्रतिशत के आसपास घूमती रही थी. पवार किसानों को दिए जा रहे ऋणों में भारी बढ़ोतरी का भी हवाला देते हैं. कृषि क्षेत्र पर उनका जोर है यह बताने के लिए वे राष्ट्रीय कृषि विकास योजना सहित कई योजनाएं शुरू किए जाने का हवाला भी देते हैं.

मगर जानकारों का मानना है कि पवार की नीतियों ने भारतीय कृषि को अस्थिर और खतरनाक दिशा में धकेलना शुरू कर दिया है जिससे गरीबी और भुखमरी जैसी समस्याओं का दायरा बढ़ा है. खाद्य नीति विश्लेषक देविंदर शर्मा कहते हैं, ‘खाद्य आयात का मतलब है बेरोजगारी का आयात.’ शर्मा वर्तमान कृषि संकट का ठीकरा पश्चिम, कारोबार, नकदी फसलों और आयात की तरफ झुकी कृषि नीतियों पर फोड़ते हैं. वे कहते हैं कि 1960 के दशक में हरित क्रांति के बाद से मंत्रियों, नौकरशाहों, वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों ने भारतीय कृषि की घोर उपेक्षा की है.

जब पवार ने 2004 में कृषि मंत्री का पदभार संभाला था तो साफ तौर पर कई चीजों की दरकार थी. फर्टिलाइजरों और कीटनाशकों की कीमतें आसमान छू रही थीं, उनपर लगाम लगाने की जरूरत थी. कृषि पैदावार के दाम बढ़ने का नाम नहीं ले रहे थे जिससे किसानों की उपज से होने वाली आमदनी लगातार कम हो रही थी. 2004 में ही एक आधिकारिक सर्वे हुआ था जिसमें यह बात जाहिर हुई थी कि एक किसान की औसत आमदनी 2,200 रुपए महीने से भी कम है. इसपर भी ध्यान देने की जरूरत थी.

किसान अपनी उपज बेचने के लिए संघर्ष कर रहे थे, इसके बावजूद पवार ने तिलहन से लेकर कपास जैसी फसलों तक पर आयात शुल्क में भारी कटौती का समर्थन किया. यह बड़ी हैरत की बात थी. तहलका से बात करते हुए पवार तर्क देते हैं कि अगर वे अब आयात शुल्क में बढ़ोतरी करते हैं तो दूसरे देश भी भारतीय कृषि उत्पादों पर भविष्य में आयात शुल्क बढ़ा सकते हैं. यानी जो गड़बड़ हुई है उसे चलते रहने देना होगा. उसे सही करना एक नई गड़बड़ को जन्म देगा.

महाराष्ट्र में शेतकरी कामगार पार्टी के वरिष्ठ नेता एनडी पाटिल गुस्से में कहते हैं, ‘हमारे कपास किसान आत्महत्या कर रहे हैं और हम 10 प्रतिशत के आयात शुल्क पर कपास का आयात कर रहे हैं.’ पाटिल के मुताबिक डब्ल्यूटीओ के तहत भारत आयातित कपास पर 150 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगा सकता है. शर्मा के मुताबिक आयातित कपास पर कम आयात शुल्क हास्यास्पद है क्योंकि अमेरिका और यूरोपीय संघ अपने किसानों को भारी सब्सिडी देते हैं. इसमें नकद रकम देना भी शामिल है. शर्मा कहते हैं, ‘उन्हें घर में बैठे-बैठे चेक मिल जाते हैं. हमारे किसानों को भी मिलने चाहिए.’ सुमन सहाय को याद है कि जब वे जर्मनी में रहती थीं तो किस तरह उनके पड़ोसी एक किसान परिवार ने नकद सब्सिडी पाने के लिए अपनी गाएं अपने आप को ही बेच दी थीं.

पवार की नीतियों की आलोचना न करने वाले लोग भी आयात को लेकर उनके तर्क को पचा नहीं पाते. महाराष्ट्र के नासिक कस्बे में रहने वाले कृषि नीति शोधकर्ता मिलिंद मुरुगकर पूछते हैं, ‘हमारे पास लाखों टन गेहूं गोदामों में है फिर भी हम 15 रुपए किलो की दर पर गेहूं आयात कर रहे हैं. क्यों?’ मुरुगकर कहते हैं कि उन्हें यह समझ में नहीं आता कि आखिर पवार देश में मौजूद अनाज का भंडार क्यों नहीं खोलते.

अनुभवी कृषि अर्थशास्त्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री वाईके अलघ आयात शुल्क घटाए जाने पर सावधान करते हैं. हाल ही में उन्होंने आयात शुल्कों पर एक दिशा तय करने के लिए बनाई गई एक समिति के निष्कर्ष सरकार को सौंपे हैं. इस समिति की अगुवाई भी अलघ ने ही की थी. वे बताते हैं, ‘हमने कहा कि सरकार को सक्षम किसान के खर्चे की भरपाई करनी चाहिए. कम शुल्कों पर आयात की इजाजत देने का मतलब यह है कि आप विदेशी किसानों को सब्सिडी दे रहे हैं. एक साल तो तिलहन पर आयात शुल्क खत्म ही कर दिया गया. यानी हम तब मलेशियाई और अमेरिकी किसानों को सब्सिडी दे रहे थे.’

उधर, सिंचाई के मोर्चे पर भी पवार की निष्क्रियता समझ से परे है. हैरत की बात है कि चार दशक पहले हरित क्रांति के बाद से आज तक सरकार की नीतियां सिर्फ उसी 40 फीसदी खेती की जमीन की तरफ झुकी रही हैं जो मुट्ठी भर राज्यों में है और जिसे ट्यूबवेलों और नहरों के जरिए व्यापक सिंचाई की सुविधा दी जा रही है. बाकी 60 फीसदी हिस्से की तरफ न के बराबर ध्यान दिया गया है. यह भूमि पूरी तरह से इंद्रदेव की कृपा के हवाले रही है और इसीलिए इसमें ऐसी फसलें उगाई जाती हैं जो सूखे मौसम की मार झेल सकें. मसलन तिलहन, दालें, ज्वार-बाजरा जैसा मोटा अनाज इत्यादि. अगर सरकार ने इन अनाजों की खेती को प्रोत्साहन दिया होता तो न सिर्फ लाखों किसानों की आजीविका चलती बल्कि देश के करोड़ों गरीब भूखों को सस्ता अन्न मिलता जिनका 80 फीसदी हिस्सा इसी शुष्क जमीन पर रहता है.

शुष्क भूमि के प्रति सरकार की यह उपेक्षा अक्षम्य है. दिल्ली स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटी से जुड़े विपुल मुद्गल कहते हैं कि हरित क्रांति वाले इलाकों को सरकार औसतन 1.3 लाख रुपए प्रति एकड़ सब्सिडी देती है. इनमें पवार की कर्मस्थली प. महाराष्ट्र के वे इलाके भी शामिल हैं जो गन्ना उगाते हैं और जमकर पानी खर्च करते हैं. इसकी तुलना में शुष्क भूमि वाले इलाकों में सब्सिडी के लाभ का यह आंकड़ा महज पांच हजार रु प्रति हेक्टेयर (तकरीबन ढाई एकड़) है. मुद्गल कहते हैं, ‘किसी ने भी इन इलाकों के लिए एक अलग सिंचाई नीति बनाने के बारे में नहीं सोचा.’ वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने 2010 के बजट में इसकी पहल की है. चार करोड़ रुपए का खर्च रखकर. मगर मुद्गल कहते हैं कि यह राशि ऊंट के मुंह में जीरे जितनी भी नहीं है.

योजना आयोग के सदस्य मिहिर शाह कहते हैं कि भारतीय कृषि को बर्बाद होने से बचाने की मुहिम में जल प्रबंधन एक बड़ी भूमिका निभाएगा. शाह ने प्रधानमंत्री के कहने पर आयोग का सदस्य बनने से पहले दो दशक मध्य प्रदेश के गांवों में बिताए हैं. 1998 में उन्होंने भारत के शुष्क भूमि वाले इलाकों पर एक किताब लिखी थी जिसमें यह बताया गया था कि कैसे हरित क्रांति ने हर जगह एक ही समाधान पेश किया कि पानी चाहिए तो ट्यूबवेल खोद डालो, जिससे स्थितियां खराब होती चली गईं.

तहलका से बात करते हुए शाह बताते हैं कि भारत की शुष्क भूमि में से ज्यादातर उन चट्टानों से बनी है जो लाखों साल पहले तब अस्तित्व में आईं थीं, जब अफ्रीका से भारतीय उपमहाद्वीप टूटकर अलग हो गया था और कई भयानक ज्वालामुखी विस्फोट हुए थे. ऐसी शुष्क जमीन में भूमिगत जल हजारों साल के दौरान चट्टानों के बीच में बनी खोखली जगहों में इकट्ठा हो गया था. शाह कहते हैं, ‘महाराष्ट्र के सूखे इलाकों में गन्ना उगाना पारिस्थितिकी और पानी के स्तर के प्रबंधन के बुनियादी सिद्धांतों का मखौल उड़ाना है. पिछले तीस साल में हमने उस पानी का ज्यादातर हिस्सा इस्तेमाल कर लिया है और अब बहुत कम पानी बचा है.’

खेती को लेकर हर तरफ इसी उपेक्षा का आलम है. जून में जब हर तरफ गर्मी के चलते पानी की कमी होती है तो पंजाब में चावल उगाया जाता है. यह घमंड नहीं तो और क्या है. ऐसी गतिविधियों के चलते हर जगह भूमिगत जल का स्तर खतरनाक तरीके से नीचे तक चला गया है. शाह कहते हैं कि भारत को सिंगापुर जैसे देशों से सीख लेनी चाहिए जहां पुनर्शोधित पानी का खूब उपयोग हो रहा है. यहां तक कि सेमीकंडक्टर निर्माण जैसे उन उद्योगों में भी जिनमें उच्च गुणवत्ता वाले पानी की जरूरत होती है. वे कहते हैं, ‘देखा जाए तो जरूरत इस बात की है कि स्थानीय लोगों को जल का समुचित प्रबंधन करना सिखाया जाए.’

यह सभी जानते हैं कि पवार की पूरी राजनीति महाराष्ट्र की ताकतवर शुगर लॉबी के इर्द-गिर्द घूमती है जो गन्ना उगाने वालों और चीनी उत्पादक सहकारी संस्थाओं से मिलकर बनती है. बांबे हाई कोर्ट के पूर्व जज बीजी कोलसे पाटिल, जिन्होंने समाजसेवा के लिए वक्त से पहले ही अपनी नौकरी छोड़ दी, पवार की काफी आलोचना करते हुए आरोप लगाते हैं कि कृषि मंत्री खेती को लेकर राजनीति कर रहे हैं और जमाखोरी के जरिए कृत्रिम कमी पैदा करने वाले व्यापारियों के साथ उनकी मिलीभगत है.

जैसा कि पाटिल तल्ख स्वर में कहते हैं, ‘कई व्यापारियों ने मुङो बताया है कि पवार उनसे सरकारी दर से ज्यादा दाम पर गन्ना खरीदने को कहते हैं ताकि कमी पैदा हो जाए. उसके बाद व्यापारी इसे सरकार को कहीं ज्यादा दाम पर बेचते हैं.’ पवार की राजनीतिक, कृषि संबंधी और कारोबारी गतिविधियों पर सालों से नजदीकी निगाह रखने वाले पाटिल का दावा है कि अपनी कठपुतली हुकूमत के जरिए वे महाराष्ट्र की करीब 200 चीनी कोऑपरेटिवों की कमान अपने हाथ में रखते हैं. वे कहते हैं, ‘उन्होंने इनमें से कई कोऑपरेटिवों को बीमार इकाई घोषित करवा दिया था जिससे वे भारी कर्ज की पात्र हो गईं. यह पैसा पवार या उनके आदमियों को मिल गया.’ पवार ने हमेशा इन आरोपों को नकारा है.

पवार के एक और तीखे आलोचक हैं बालासाहेब विखे पाटिल. पाटिल आठ बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं और वाजपेयी सरकार में उद्योग मंत्री हुआ करते थे. पवार ने चालीस साल पहले कोआ¬परेटिव कारोबार की बारीकियां विखे पाटिल द्वारा संचालित एक कोऑपरेटिव में ही सीखी थीं. विखे पाटिल को हैरानी है कि एक तरफ तो पवार इतनी सारी चीनी कोऑपरेटिवों को बीमारू इकाई घोषित करवा रहे हैं और दूसरी तरफ वे पुणो में दो चीनी कारखाने शुरू कर रहे हैं. नासिक में तहलका से बात करते हुए विखे पाटिल कहते हैं, ‘अगर कोऑपरेटिव बीमार हैं तो कंपनियां तरक्की कैसे करेंगी?’ वे यह भी कहते हैं कि शुष्क जमीन पर होने वाली फसलों में पवार की दिलचस्पी सिर्फ उन फैक्टरियों को सब्सिडी देने में है जो ज्वार और बाजरे से शराब बनाती हैं. वे कहते हैं, ‘ये हैं पवार की किसान समर्थक नीतियां.’

या फिर जमीन का ही उदाहरण लीजिए जो दशकों से हो रही खूब खेती और कीटनाशकों और खाद के जमकर इस्तेमाल से बर्बाद हो चुकी है. एकलसंस्कृति यानी सिर्फ एक या दो फसलें उगाने की परंपरा भी भारतीय कृषि के लिए बेहद विनाशकारी साबित हुई है. पहले परंपरा यह थी कि किसान बदल-बदलकर फसलें उगाते थे जिससे जमीन हमेशा उपजाऊ बनी रहती थी. लेकिन अब बार-बार एक ही फसल उगाए जाने से जमीन की उर्वरता काफी कम हो गई है. तहलका से बात करते हुए पवार भी एकलसंस्कृति वाली इस खेती पर अफसोस जताते हैं.

लेकिन खेती को लेकर उनका नजरिया यही है कि वही उगाओ जो बाजार चाहता है न कि पेट. और इससे एकलसंस्कृति को ही और बढ़ावा मिलता है क्योंकि नकदी फसलें बाजार की मांग पूरी करने के लिए उगाई जाती हैं न कि पेट भरने के लिए. यही वजह है कि पवार ने अंगूरों की खेती पर जमकर जोर दिया है जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे दामों पर बिकने वाली शराब बनती है. पवार की इस बात के लिए भी काफी आलोचना हुई है कि पूर्वी महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में हजारों किसानों ने खुदकुशी कर ली मगर वे कभी उनके परिवारों का हाल तक जानने नहीं गए. सिवाय एक बार तब जब जून, 2006 में उन्हें जबर्दस्ती प्रधानमंत्री के साथ वहां जाना पड़ा था. मैगसेसे पुरस्कार विजेता और वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ तल्खी के साथ कहते हैं, ‘पवार बयान जारी कर रहे थे कि आत्महत्याएं कम हो गई हैं. वास्तव में महाराष्ट्र में हमेशा सबसे बुरी स्थिति रहती है.’ उस साल स्वतंत्रता दिवस भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा था कि किसानों की व्यथा का उनके दिल पर गहरा असर हुआ है. साईनाथ इस बात को याद करते हुए कहते हैं, ‘उस समय पवार श्रीलंका दौरे पर जा रही भारतीय टीम की सुरक्षा की बात कर रहे थे.’

यह भी सब जानते हैं कि अपने पूर्व संसदीय क्षेत्र बारामती, जहां से अब उनकी बेटी सुप्रिया सुले संसद में आई हैं, को पवार ने कृषि क्षेत्र का एक शानदार मॉडल बना दिया है. कृषि क्षेत्र पर नजदीकी से नजर रखने वालीं नई दिल्ली स्थित पत्रकार भवदीप कंग कहती हैं कि पवार कृषि क्षेत्र को हमेशा बारामती के चश्मे से देखते हैं. उन्हें लगता है कि किसानों की खुशहाली, सिंचाई, ज्यादा उत्पादन, फसल के बाद होने वाले प्रबंधन और कृषि प्रसंस्करण की सुविधाओं से आती है. इसका एक उदाहरण दुग्ध कोऑपरेटिव हैं. वे कहती हैं, ‘दुधारू पशु खरीदने के लिए कर्ज से लेकर, दूध संग्रह केंद्रों और फिर वहां से शीतल संयंत्र और ब्रिटैनिया फैक्ट्री तक व्यवस्था में कोई खामी नहीं है.’ भारत से यूरोपीय संघ को जितने अंगूरों का निर्यात होता है उनका 80 फीसदी हिस्सा महाराष्ट्र से आता है. बारामती में भारत की वाइन बनाने वाली पहली फैक्ट्री भी है. अंगूर की एक प्रजाति को तो वहां शरद सीडलेस नाम ही दे दिया गया है.

इसमें कोई शक नहीं कि पवार का यह मॉडल, जिसे कृषि उत्पादन का वैज्ञानिक प्रबंधन भी कहा जाता है, बारामती में बहुत सफल रहा है. इसने बारामती को सूखाग्रस्त और निम्न आय वाले इलाके से बदलकर भारत के सबसे खुशहाल, सिंचित और औद्योगिक इलाकों में से एक बना दिया है. मगर बारामती एक छोटा-सा उदाहरण है जिसका पवार ने कुछ स्पष्ट वजहों से ख्याल रखा है और यह मॉडल पूरे देश में लागू करना बहुत मुश्किल है. ऐसे में सवाल उठता है कि फिर क्या किया जाए?

देविंदर शर्मा इसका जवाब देते हुए कहते हैं, ‘नई खेती.’ वे बताते हैं कि आंध्र प्रदेश के 23 में से 21 जिलों में यह हो रही है. वहां तीन लाख किसानों ने इसे अपनाया है. वे न खाद का इस्तेमाल करते हैं न कीटनाशकों का. शर्मा कहते हैं, ‘उत्पादन में कोई गिरावट नहीं आई है और फसलों में कीड़े लगने की समस्या भी कम हो गई है.’ पिछले साल वहां सभी किसानों ने अपनी आय में बढ़ोतरी की बात कही. यही नहीं, अपने ही पैसे से किसान एक स्वसहायता समूह भी शुरू कर चुके हैं. शर्मा कहते हैं, ‘क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि उसके खाते में पांच हजार करोड़ रुपए की रकम है?’

गैरसरकारी संगठनों द्वारा शुरू किए गए इस प्रोजेक्ट, जिसे कम्यूनिटी मैनेज्ड सस्टेनेबल एग्रीकल्चर नाम दिया गया है, को आंध्र प्रदेश सरकार ने अधिग्रहीत कर लिया है. अब तो विश्व बैंक ने भी इसे समर्थन देना शुरू कर दिया है. शर्मा कहते हैं, ‘यह नई खेती प्राकृतिक संसाधनों का नाश नहीं करती. न ही इससे भूमि के स्वास्थ्य, जलस्तर या आजीविका का विनाश होता है. यह ग्लोबल वार्मिग में और गरमी नहीं जोड़ती.’ लेकिन पवार को इस नई खेती में कोई दिलचस्पी नहीं. शायद इसलिए क्योंकि यह नई खेती जीडीपी में कुछ नहीं जोड़ती. क्योंकि इसमें बड़ा कारोबार शामिल नहीं है. क्योंकि यह बाजार के लिए नहीं बल्कि पेट के लिए है.

हर किसी को चाहिए अपने-अपने नायक

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/24/2010 08:46:00 AM

दिलीप मंडल
दिल्ली की सबसे ऊंची इमारत का नाम जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नाम पर रखा गया है। ये इमारत दिल्ली नगर निगम की है और इस समय दिल्ली नगर निगम में भारतीय जनता पार्टी का बहुमत है। इसलिए माना जा सकता है कि बीजेपी जिन लोगों से प्रेरणा लेती है और जिन्हें महान मानती है, उनके नाम पर किसी सरकारी इमारत का नाम रखने का उसे अधिकार है। इस बात पर न तो कांग्रेस ने सवाल उठाया है न ही वामपंथी दलों ने और न ही सपा, बसपा या राजद ने। सभी राजनीतिक पार्टियां इस राजनीतिक संस्कृति को मानती हैं कि सत्ता में होने के दौरान वे किसी सरकारी योजना या भवन, पार्क, सड़क, हवाई अड्डे या किसी भी संस्थान का नाम अपनी पसंद के किसी शख्स के नाम पर रख सकती हैं। इस मामले में राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति है। इसलिए जिस जनसंघ की विचारधारा और परंपरा से सेकुलर दलों को इतना परहेज है, उसके संस्थापक के नाम पर किसी सरकारी इमारत का नाम रखे जाने को लेकर कहीं किसी तरह का विवाद नहीं है।
इस मामले में एकमात्र व्यतिक्रम या अपवाद या विवाद आंबेडकर और कांशीराम की स्मृति में बनाए गए पार्क और स्थल हैं। इस देश में हर दिन किसी न किसी नेता की स्मृति में कहीं न कहीं कोई शिलान्यास, कोई उद्घाटन या नामकरण होता है, लेकिन विवाद सिर्फ तभी होता है जब किसी दलित या वंचित नायक के नाम पर कोई काम किया जाता हो। ऐसा भी नहीं है कि विवाद सिर्फ तभी होता है, जब बहुजन समाज पार्टी किसी दलित नायक के नाम पर कोई काम करती है। कांग्रेस के शासनकाल में मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम भीमराव आंबेडकर के नाम पर रखे जाने को लेकर कई दशकों तक हंगामा चला और कई बार विरोध ने हिंसा का रूप भी ले लिया। लगभग दो दशक तक नामांतर और नामांतर विरोधी  आंदोलन और हिंसा तथा आत्मदाह की घटनाओं के बाद जाकर 1994 में मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम बाबा साहब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय रखा जा सका। नामांतर विरोधी आंदोलन को लगभग सभी बड़े राजनीतिक दलों का खुला या प्रछन्न समर्थन हासिल था।
नामांतर आंदोलन के बाद देश में इस तरह का सबसे बड़ा विवाद उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के शासन काल में बनाए जा रहे स्मारकों को लेकर है। इस विवाद में विरोधियों के पास मुख्य रूप में ये तर्क हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे गरीब और पिछड़े राज्य में सरकार इतनी बड़ी रकम स्मारकों पर क्यों खर्च कर रही है। दूसरा तर्क ये दिया जाता है कि बहुजन समाज पार्टी सिर्फ अपनी विचारधारा के नायकों के नाम पर स्मारक क्यों बनवा रही है। यह आरोप भी लगाया जाता है बहुजन समाज पार्टी ये सब राजनीतिक फायदे के लिए कर रही है। ये सारे तर्क बेहद खोखले हैं। अगर इन्हें दूसरे दलों की सरकारों पर लागू करके देखा जाए, तो इनका खोखलापन साफ नजर आता है। राजघाट, गांधी स्मृति, शांति वन, वीर भूमि, शक्ति स्थल, तीनमूर्ति भवन, इंदिरा गांधी स्मृति, दीन दयाल उपाध्याय पार्क आदि-आदि हजारों स्मारकों पर आने वाले खर्च की अनदेखी करके ही बहुजन समाज पार्टी सरकार पर इस मामले में फिजूलखर्ची का आरोप लगाया जा सकता है। 
कांग्रेस ने अपने पार्टी से जुड़े नायकों के नाम पर जो कुछ किया है, उस पर आए खर्च की बराबरी बहुजन समाज पार्टी शायद कभी नहीं कर पाएगी। इस देश में जितने गांधी पार्क और नेहरू पार्क हैं, उतने फुले, आंबेडकर और कांशीराम पार्क बीएसपी अगले कई दशक में नहीं बना पाएगी। ये बराबरी का मुकाबला नहीं है। बीजेपी भी अपने नायकों की प्रतिमाएं और स्मारक खड़े करने में पीछे नहीं है और ये सब सरकारी खर्च पर ही होता है। हेडगेवार, गोलवलकर, विनायक दामोदर सावरकर, दीनदयाल उपाध्याय और श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नाम को चिरस्थायी बनाने की बीजेपी ने भी कम कोशिश नहीं की है। यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर केंद्र सरकार का एक सूचना प्राद्योगिकी संस्थान ग्वालियर में है और हिमाचल प्रदेश में भी वाजपेयी के नाम पर एक माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट है। अपने नायकों को स्थापित करने में कांग्रेस और बीजेपी की तुलना में समाजवादी पार्टी, आरजेडी, बीएसपी जैसी पार्टियां काफी पीछे हैं। देश के ज्यादातर सरकारी अस्पतालों, पार्कों, सड़कों, शिक्षा संस्थानों, पुलों, संग्रहालयों, चिड़ियाघरों पर कांग्रेस के नेताओं के नाम हैं और इस गढ़ में बीजेपी ने थोड़ी-बहुत सेंधमारी की है। ये संयोग हो सकता है कांग्रेस और बीजेपी जिन नायकों के नामों को चिरस्थायी बनाने के लिए उनके नाम पर कुछ करती है, उनमें लगभग सभी सवर्ण जातियों के हैं। जबकि बीएसपी ने जिन महापुरुषों के नाम पर स्मारक बनाए हैं, वे सभी अवर्ण हैं। सिर्फ इस एक बात को छोड़ दें तो कांग्रेस, बीजेपी और बीएसपी में कोई फर्क नहीं है।
कुछ लोगों को इस बात पर एतराज हो सकता है कि गांधी और नेहरू जैसे नेताओं को खास जाति या पार्टी से जोड़कर बताया जा रहा है। यहां सवाल उठता है कि आंबेडकर जैसे विद्वान और संविधान निर्माता को दलित नेता के खांचे में फिट किया जाता है और उनके स्मारकों की अनदेखी की जाती है(दिल्ली में जिस मकान में रहने के दौरान उनका देहांत हुआ, उसके बारे में कितने लोग जानते हैं और इसकी तुलना गांधी स्मृति या तीन मूर्ति भवन से करके देखें) तो जाति के प्रश्न की अनदेखी कैसे की जा सकती है। एक विश्वविद्यालय का नाम आंबेडकर के नाम पर रखने के सरकार के फैसले को अगर दो दशक तक इसलिए लंबित रखा जाता हो कि कुछ लोग इसके खिलाफ हैं, तो इसकी जाति के अलावा और किस आधार पर व्याख्या हो सकती है? जाति भारतीय समाज की एक हकीकत है और जिसने जाति की प्रताड़ना या भेदभाव नहीं झेला है, वही कह सकता है कि भारत में जाति का असर नहीं है। जाति का अस्तित्व और उसके प्रभाव को संविधान भी मानता है और कानून भी। जो जाति को नहीं मानते, उन्हें भी कोई न कोई जाति अपना मानती है।
ऐसे में सवाल सिर्फ इतना है कि गांधी, नेहरू, इंदिरा गांधी, हेडगेवार और श्यामाप्रसाद मुखर्जी की स्मृति को जिंदा रखने में अगर कोई बुराई नहीं है तो फुले, शाहूजी महाराज, आंबेडकर, कांशीराम की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए प्रयास करने में कोई दोष कैसे निकाला जा सकता है? पिछड़ी और दलित जातियों के मुसलमानों के नायकों की भी स्थापना होनी चाहिए। बल्कि ये वे काम हैं, जो स्थगित थे और उन्हें अब पूरा किया जाना चाहिए। आखिर हर किसी को अपने नायक चाहिए। महाविमर्श के अंत के बाद अब कोई नायक हर किसी का नायक नहीं है। आज दलित और वंचित अपने नायकों की स्थापना कर रहे हैं। देश के लिए ये शुभ है। इससे घबराना नहीं चाहिए।         

'जो इनसान हैं वे हमारा समर्थन करेंगे, राक्षस नहीं': टिकैत

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/23/2010 10:48:00 AM

बालियान खाप के चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत, रेयाज उल हक को बता रहे हैं कि सगोत्र में शादी की इजाजत देना उनकी नस्ल पर हमला है. इस बातचीत के कुछ अंश तहलका में प्रकाशित हुए हैं.
अब तो केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि वह हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन करने की मांग पर गौर नहीं करेगी. खाप पंचायतें अब क्या करेंगी?

सरकार ने तो बोल दिया है, लेकिन जनता न तो चुप बैठेगी न भय खाएगी. जो आदमी मान-सम्मान, प्रतिष्ठा और मर्यादा के साथ जिंदगी जीना चाहे उसे जीने दिया जाए, हम यह चाहते हैं. सरकार को या किसी को भी जनता को एसा करने से रोकने का क्या अधिकार है? इस देश में गरीब और असहाय लोगों की प्रतिष्ठा को ही सब लूटना चाहते हैं. 'द्वार बंद होंगे नादार (गरीब) के लिए, द्वार खुलेंगे दिलदार के लिए'. आदमी इज्जत के लिए ही तो सबकुछ करता है. चाहे कोई भी इनसान हो, इज्जत से रहना चाहता है.

लेकिन समाज बदलता भी तो है. प्रतिष्ठा और मर्यादा के पुराने मानक हमेशा नहीं बने रहते. आप इस बदलाव को क्यों रोकना चाहते हैं?

तबदीली तो होती है, बहुत होती है. हमारे यहां भी बहुत तबदीली हुई. हमारी संस्कृति खत्म हो गई. हमारी देशी गाएं अब नहीं रहीं. हमारी जमीन बंजर हो गई. बस इनसान की नस्ल बची हुई है, उस पर भी धावा बोल दिया गया. अपनी नस्ल को भूल कर और उसे खत्म कर के कोई कैसे रह सकता है? और यह सारी बुराई रेडियो-टीवी ने पैदा की है.

रेडियो-टीवी ने क्या असर डाला है?

बहुत ही खराब. जहां बहन-भाई का भी रिश्ता सुरक्षित नहीं बना रहेगा, वहां इज्जत कैसे बचेगी? महर्षि दयानंद ने कहा था- सात पीढ़ियों को छोड़ कर रिश्ता होना चाहिए. लेकिन राजनीतिक पचड़ा इन बातों को बरबाद कर रहा है. हमारा मानना है कि इनसान का जीवन इनसान की तरह होना चाहिए. पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश के इलाकों में लोग इन नियमों का उल्लंघन बरदाश्त नहीं करेंगे.

आप प्रेम विवाह के इतने खिलाफ क्यों हैं?

लाज-लिहाज तो इसमें कुछ रह ही नहीं जाता. शादी मां-बाप की रजामंदी से हो, परिवार की रजामंदी से हो तो सब ठीक रहता है.

लेकिन लोगों को अपनी मरजी से जीने और साथी चुनने का अधिकार तो है?

अधिकार तो जरूर है. पशुओं से भी बदतर जिंदगी बना लो इनसान की, इसका अधिकार तो है आपको. लेकिन हम इसे बरदाश्त नहीं करेंगे कि हमारे रिवाजों और मर्यादा पर इस तरह हमला किया जाए.

और मर्यादा के ये पुराने मानक इतने महत्वपूर्ण हैं कि इनके लिए हत्या तक जायज है?

लज्जा, मान, धर्म रक्षा और प्राण रक्षा के लिए तो युधिष्ठिर तक ने कहा था कि झूठ बोलना जायज है. हम अपनी मर्यादा की रक्षा करना चाहते हैं और इसके लिए हम 23 तारीख (मई) को महापंचायत में बैठ रहे हैं जींद में. इसके बाद दिल्ली की लड़ाई होगी.

आपकी इस लड़ाई में कितने लोग आपके साथ आएंगे? कितने समर्थन की उम्मीद कर रहे हैं आप?

मुझे नहीं पता. मुझे कुछ पता नहीं.

नवीन जिंदल और ओम प्रकाश चौटाला ने विवाह अधिनियम में संशोधन की मांग का समर्थन किया है. और कौन-कौन से लोग आपके साथ हैं?

इनसान तो इसका समर्थन करेंगे. जो राक्षस हैं, वही हमारी इन मांगों का विरोध करेंगे. इस माहौल में कोई भी हो, चाहे गूजर हो, ठाकुर हो, वाल्मीकि हो, ब्राह्मण हो या हरिजन हो- एेसी शादियों को कोई भी मंजूर नहीं करेगा. कोई भी इसे बरदाश्त करने को तैयार नहीं है. इतने सब लोग एक साथ हैं.

किसी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी ने अब तक आपको समर्थन नहीं दिया है. कोई पार्टी आपके संपर्क में है? आप किससे उम्मीद कर रहे हैं?

पार्टी की बात नहीं है. यह राजनीतिक मुद्दा नहीं है. यह एक सामाजिक मुद्दा है और इसमें सब साथ आएंगे. वैसे हम किसी (पार्टी) के समर्थन के भरोसे नहीं बैठे हैं. हम आजाद हैं और सरकार को हमारी सुननी पड़ेगी.

लेकिन अब तक तो सरकार आपसे सहमत नहीं दिखती. अगर उसने नहीं सुना तो आपकी आगे की रणनीति क्या होगी?

वह नहीं मानेगी तो हम देखेंगे. हमारी क्षमता है लड़ाई लड़ने की और हम लड़ेंगे. मरते दम तक लड़ेंगे. (प्रधानमंत्री) मनमोहन सिंह का भी तो कोई गोत्र है. (हरियाणा के मुख्यमंत्री) हुड्डा का भी तो गोत्र है. क्या वे इसे मान लेंगे कि गोत्र में शादी करना जायज है?

देश के उन इलाकों में भी जहां गोत्र में शादी पर रोक रही है, अब यह उतना संवेदनशील मामला नहीं रह गया है. वहां से एसी कोई मांग नहीं उठी है. फिर खाप पंचायतें इसे लेकर इतनी संवेदनशील क्यों हैं?

तमिलनाडू और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में तो भांजी के साथ शादी जायज है. हम उसके खिलाफ नहीं हैं. हमारा कहना है कि जहां जैसा चलन है वहां वैसा चलने दो. जहां नहीं है, वहां नई बात नहीं चल सकती. बिना काम के किसी बात को छेड़ना, कान को छेड़ना और मशीन के किसी पुरजे को छेड़ना नुकसानदायक है.

महिला आरक्षण और राजनीति के क्षेत्र में व्यभिचार

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/23/2010 08:40:00 AM


दिलीप मंडल
राजनीति के क्षेत्र में महिला आरक्षण का उप-उत्पाद (बाइ प्रोडक्ट) नेताओं के यौन भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी की शक्ल में नजर आ सकता है। भारतीय राजनीति में यौन भ्रष्टाचार का पक्ष अक्सर दबा दिया जाता है, जबकि राजनीति का यह एक अभिन्न अंग रहा है। इसकी सार्वजनिक चर्चा अक्सर नहीं होती, लेकिन इसके बारे में सभी जानते हैं। इसे भारतीय राजनीति का सर्वज्ञात रहस्य भी कहा जा सकता है। ये ऐसा कदाचार है जो मोहल्ला और पंचायत स्तर से लेकर राजनीति के शिखर पर मौजूद है।
भारत में सत्ता यानी पावर के साथ हरम और भरे पूरे रनिवास की अवधारणा पुरानी है और भारतीय राजनीति कम से कम इस मायने में समय के साथ नहीं बदली है। लोगों की मानसिकता ऐसी बना दी गई है प्रभावशाली लोगों के यौन कदाचार को बुरा भी नहीं माना जाता और नेताओं के कई स्त्रियों के साथ यौन संबंधों को उनके शक्तिशाली होने के प्रमाण के तौर पर देखा जाता है। एकनिष्ठता की भारतीय अवधारणा महिलाओं पर तो लागू होती है पर पुरुषों पर लागू नहीं होती। हिंदू धर्म की किताबें बताती हैं कि –पत्नी को दुश्चरित्र पति का त्याग नहीं करना चाहिए, प्रत्युत अपने पातिव्रत धर्म का पालन करते हुए उसको समझाना चाहिए।[i] हिंदू संस्कृति व्यभिचार का किस हद तक समर्थन करती है, इसे जानने के लिए ये प्रश्नोत्तर पढ़ें:-
प्रश्न- यदि कोई विवाहिता स्त्री से बलात्कार करे और गर्भ रह जाए तो क्या करना चाहिए?
उत्तर- जहां तक बन पड़े स्त्री के लिए चुप रहना ही बढ़िया है। पति को पता चल जाए तो उसको भी चुप रहना चाहिए। दोनों के चुप रहने में ही फायदा है।[ii]
पश्चिमी समाजों के मुकाबले भारतीय समाज में अनैतिक होने की कई गुना ज्यादा छूट है। यहां की सनातनी शास्त्रीय परंपराओं में बेटी, बहन, गुरुपत्नी आदि के साथ रिश्ते बनाने की मान्यता रही है। हिंदू धर्मग्रंथों को पढ़ें तो कभी किसी महिला को खीर खिलाने से बच्चा पैदा हो जाता है तो किसी के पसीने की बूंद मुंह में गिरने से गर्भ ठहर जाता है, तो किसी का दर्शन ही कोई महिला गर्भवती होने का कारण बन जाता है। संतानों के लिए यज्ञ कराने का मतलब आप सहज ही समझ सकते हैं। आजकल भी बाबा लोग बेऔलाद दंपतियों को संतान दिलाने के लिए स्पेशल पूजा कराते रहते हैं। ऐसे अनैतिक किस्सों से उत्तर वैदिक धर्मग्रंथ भरे पड़े हैं। खजुराहो से लेकर कोणार्क और देश भर के सैकड़ों मंदिर इन अनौतिक कहानियों के गवाह हैं। यूरोप या अमेरिका जैसी नैतिकता अगर भारतीय समाज के प्रभुवर्ग में होती, तो कई नेताओं को राजनीति छोड़नी पड़ती। यूरोपीय और अमेरिकी देशो में यौन विचलन के लिए नेताओं को सत्ता गंवानी पडी है, लेकिन भारत में एक नारायणदत्त तिवारी को छोड़कर ऐसी कोई और मिसाल नहीं मिलती। हमारे देश के प्रभुवर्ग में यौन शुचिता को लेकर आग्रह नहीं है। दुखद ये है कि आम जन में भी ऐसा आग्रह नहीं है।
ऐसे भारतीय समाज और राजनीति में अगर महिला आरक्षण लागू होता है तो यह यौन कदाचार को बढ़ावा देने का एक और माध्यम बन सकता है। आखिर इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि भारत में राजनीतिक दलों का स्वरूप पुरुष प्रधान है और महिला आरक्षण लागू होने के बाद भी ये बदलने वाला नहीं है? अगर राजनीतिक दलों में नैतिकता होती और वे सचमुच महिलाओं का भला चाहते तो पार्टी की संरचना में महिलाओं को स्थान दे सकते थे। इसके लिए न तो कानून बनाने की जरूरत है और न ही संविधान को बदलने की। पुरुष प्रधान राजनीतिक संरचना में जब आरक्षण की वजह से बड़ी संख्या में महिलाओं को टिकट देने की बारी आएगी, तो इसके खतरे समझे जा सकते हैं। महिलाओं का सशक्तिकरण अगर नीचे से होता, तो उनके शोषण के खतरे कम होते। किसी महिला का सशक्त होना उसे यौन संबंधों की दृष्टि से भी स्वतंत्र बनाता है। लेकिन महिला आरक्षण के समर्थन ये नहीं मानते कि पहले महिलाओं को आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक रूप से समर्थ बनाया जाए। ऐसा होने के बाद महिला आरक्षण की जरूरत ही क्यों होगी?
साथ ही महिलाओं का आर्थिक रूप से समर्थ बनाए बगैर उन्हें बेहद खर्चीले चुनाव में झोंक देना भी उन्हें पुरुष सत्ता की शरण में जाने को बाध्य करेगा। जिस देश में संपत्ति में महिलाओं की नाम मात्र की हिस्सेदारी हो वहां महिला उम्मीदवार करोड़ों का चुनाव खर्च कहां से निकालेंगी। राजनीति में पैसा अब कितना महत्वपूर्ण हो गया है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस समय देश की लोकसभा में 306 करोड़पति सांसद हैं जबकि राज्यसभा में 54 % सासंद करोड़पति हैं।[iii] बड़े राजनीतिक दलों के लिए लोकसभा चुनाव लड़ने का औसत खर्च प्रति सीट चार करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच गया है। ऐसे में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के बिना उनका राजनीतिक सशक्तिकरण स्वाभाविक रूप से कैसे मुमकिन है? इसलिए सबसे पहले तो ये जरूरी है कि उत्तराधिकार में महिलाओं को वास्तविक अर्थों में बराबरी दी जाए, क्योंकि कागजी बराबरी का कोई मतलब नहीं है। जमीन और घरों के सभी पट्टों और रजिस्ट्री में महिलाओं के नाम होने को अनिवार्य बनाया जाए।
बहरहाल, इस बात को लेकर कोई सदेह नहीं हो सकता कि महिला आरक्षण विधेयक, महिला सशक्तिकरण को ऊपर से थोपने का जरिया है। इसे स्वाभाविक प्रक्रिया तभी कहा जाएगा जब देश में महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक  और शैक्षणिक स्थिति बदले और इसका असर संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या की शक्ल में नजर आए। जिस देश में जमीन के मालिकों में सिर्फ 9.5 फीसदी महिलाएं हों[iv], उस समाज के एक हिस्से में महिलाओं के राजनीतिक आरक्षण को लेकर जो उत्साह और उल्लास का भाव नजर आ रहा है, वह आश्चर्यजनक है। जमीन के मालिकाने का ये आंकड़ा भी सिर्फ कागज पर ही है क्योंकि महिलाएं बेशक जमीन का इस्तेमाल कर लें, लेकिन ग्रामीण भारत में ऐसे मौके बिरले ही आते हैं जब कोई महिला अपनी मर्जी से जमीन बेच पाती हो। अगर कोई महिला पैत्रिक संपत्ति पर दावा करे और इसके लिए अदालत जाए, तो उसे भद्र महिला नहीं माना जाता। [v]
जो लोग, नेता और बुद्धिजीवी महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए इतने उद्धत और उत्साहित हैं, वे अपने परिवारों में संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर भी यही उत्साह दिखाते, तो समाज में कमजोर तबकों और वंचितों को भी रास्ता दिख जाता। इस तरह समाज में व्यापक तौर पर महिलाओं की हालत बेहतर होने का रास्ता खुलता। यह बहुत गंभीर सवाल है कि कोचिंग सेंटरों में बेटों को भेजने के लिए जो उत्साह समाज में दिखता है, वो बेटियों के मामले में नजर क्यों नहीं आता? महिलाओं को राजनीतिक आरक्षण देने से पहले, ऐसे कई सवाल हल होने चाहिए क्योंकि इन सवालों का संदर्भ और असर कुछ महिलाओं के संसद और विधानसभाओं में पहुंचने की तुलना में कई गुना बड़ा है। दशकों से सीबीएससी और बारहवीं के तमाम बोर्ड इम्तहानों में लड़कों से बेहतर रिजल्ट लाने वाली लड़कियां आईआईटी, आईआईएम, और देश की तमाम और शिखर संस्थाओं और कोर्स में क्यों नजर नहीं आतीं, इसका जवाब मांगा जाना चाहिए। अगर समाज में प्रचलित पुत्र-मोह इसमें बाधक है तो सरकार इन शिक्षा संस्थाओं में आरक्षण का प्रावधान लाकर सकारात्मक हस्तक्षेप कर सकती है।
महिलाओं की स्थिति अगर आज भी बुरी है, तो इसके कारणों की शिनाख्त होनी चाहिए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने महिला आरक्षण विधेयक पर राज्य सभा में चर्चा के दौरान ये माना कि विकास प्रक्रिया का लाभ उठाने में महिलाओं को दिक्कत होती है। परिवारों में उनके साथ भेदभाव होता है, मारपीट होती है। शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा के मामले में उनके साथ पक्षपात किया जाता है।[vi] अब इस बात की चर्चा होनी चाहिए कि समाज ही नहीं, लोकतांत्रिक देश का कानून भी किस तरह महिलाओं को वंचित बनाए रखने में भूमिका निभाता है। हिंदुओं के उत्तराधिकार से जुड़े कानून महिलाओं के खिलाफ झुके हुए हैं। कॉरपोरेट जगत में चेयरमैन और प्रेसिडेंट जैसे शिखर पदों पर महिलाएं लगभग अनुपस्थित हैं। कई उद्योगपति परिवारों में पुत्र न होने पर संपत्ति भतीजे या भांजे या दामाद को या फिर दत्तक पुत्र को स्थानांतरित कर दी गई। आम भारतीय परिवारों में भी ऐसा होना बेहद आम है। लेकिन इस चलन को बदला जाए, इसकी कोई कोशिश नहीं की जाती। मठों और आश्रमों की अकूत संपत्ति पर महिलाओं का भी अधिकार हो, इसकी कोई पहल धार्मिक नेतृत्व, समाज या सरकार की तरफ से आज तक नहीं हुई है।
देश में महिलाओं की साक्षरता दर कम है[vii] और स्कूलों में लड़कियों का ड्रॉपआउट रेट ज्यादा है, लेकिन ऐसी समस्याओं को अब तक ठीक नहीं किया जा सका है। शिशु मृत्यु के मामले में आंकड़े लड़कियों के खिलाफ झुके हुए हैं, जबकि वैश्विक आंकड़ा और चिकित्सा विज्ञान के मुताबिक बालकों की तुलना में बालिकाओं में जीवनी शक्ति ज्यादा होती है। महिलाओं के प्रति समाज के नजरिए का ही असर है कि इस देश में प्रति 1000 पुरुष 933 महिलाएं हें।[viii] महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में लाने से पहले ऐसे सैकड़ों कार्यभार हो सकते हैं, जिन्हें भारत की राजसत्ता और भारतीय समाज को पूरा करना चाहिए। नौकरशाही में महिलाओं की पर्याप्त उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए यूपीएससी को तमाम नियुक्तियों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करनी चाहिए। शैक्षणिक पदों पर भी महिलाएं अच्छी संख्या में नजर आएं, इसके लिए शिक्षा विभागों और यूजीसी को आरक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए। महिलाओं के इस तरह के सशक्तिकरण और आरक्षण का विरोध कोई भी राजनीतिक दल नहीं करेगा और इस तरह की आम सहमति बनाने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए। महिला सशक्तिकरण के कई रास्ते हैं। महिला आरक्षण विधेयक अगर उनमें से एक होता तो शायद इसे लेकर संदेह पैदा नहीं होता। लेकिन अब ये विधेयक और इसे लेकर राजनीतिक दलों की नीयत संदेह के घेरे में है।
महिला आरक्षण से महिलाओं का भला कैसे होगा?
सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं का सशक्तिकरण किए बगैर अगर ढेर सारी महिलाएं सांसद और विधानसभाओं में आ भी जाती हैं, तो इससे महिलाओं की हालत कैसे बदलेगी, ये सरकार या महिला आरक्षण के बता नहीं रहे हैं। संसद और विधानसभाओं में दलितों और आदिवासियों को आरक्षण तो संविधान लागू होने के साथ ही हासिल है। लेकिन क्या दलितों और आदिवासियों की विधायिका में उपस्थिति से इन समुदायों का कोई भला हो पाया है? सवर्ण हिंदुओं और दलितों के बीच हुए पूना पैक्ट के आधार पर दिए गए इस आरक्षण का आगे चलकर खुद आंबेडकर ने विरोध किया था और इसे निरर्थक करार दिया था।[ix]  कई दलित संगठन ये मांग कर रहे हैं कि ये आरक्षण खत्म किया जाए और ऐसी व्यवस्था की जाए कि ये समुदाय अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करें। पूना पैक्ट की बहस में आंबेडकर यही पक्ष रख रहे थे। अभी जो व्यववस्था देश में चल रही है, उसमें दलित और आदिवासी नेता संसद और विधानसभाओं में रिजर्वेशन की वजह से चुनकर आ तो जाते हैं, लेकिन वो अपने समुदायों के मुद्दे उठाने में समर्थ नहीं हैं। वर्तमान व्यवस्था के तहत किसी दलित या आदिवासी नेता का चुना जाना दलितों या आदिवासियों की मर्जी से नहीं होता। चुने जाने के लिए अक्सर वे किसी दल पर निर्भर होते हैं, और उनका चुना जाना किस न किसी सामाजिक-राजनीतिक समीकरण का नतीजा होता है। किसी भी आरक्षित चुनाव क्षेत्र में गैर-दलित मतदाता किसी दलित नेता का चुनाव कर सकते हैं।[x]
भारतीय लोकतंत्र में विधायी मामलों में सांसद या विधायक की व्यक्तिगत राय का कोई मतलब नहीं होता। कानून बनाने और संसद या विधानसभा के अंदर नेताओं का अन्य कार्य व्यवहार व्यक्तिगत नहीं, दलगत स्तर पर तय होता है। दलबदल निरोधक कानून[xi] और ह्विप की सख्ती के बीच कोई सांसद या विधायक अपने मन या विचार से कोई विधायी कदम नहीं उठा सकता। दलित और आदिवासी सांसद/विधायक अपने समुदायों के लिए अपने मन या विचार से कुछ नहीं कर सकते और महिलाएं भी इस नाते कुछ अलग नहीं कर पाएंगी कि वे महिला आरक्षण विधेयक की वजह से चुनकर आ गई हैं।  इस तर्क में दम नहीं है कि महिला सांसद और विधायक महिलाओं के हित में कानून बनाएंगी क्योंकि इस तर्क का विस्तार ये होना चाहिए कि दलित और आदिवासी सांसद/विधायक दलित और आदिवासी हितों के लिए कानून बनाएंगे। हम सब जानते हैं कि हकीकत ऐसी नहीं है।
फिर क्यों दिया जा रहा है महिलाओं को आरक्षण
महिला आरक्षण विधेयक कोई सामान्य विधेयक नहीं है। इसका संदर्भ और इसका असर बेहद गहरा है। आजादी के बाद से भारतीय विधायिका यानी कानून बनाने वाली संस्थाओं के स्वरूप में बदलाव लाने की ये सबसे बड़ी कोशिश है। ये विधेयक भारतीय संविधान को बुनियादी रूप से बदलने में सक्षम है। इसलिए इस मुद्दे पर आम सहमति की भेड़चाल को तोड़ने और गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। महिला आरक्षण पर मीडिया और राजनीतिक विमर्श में जिस तरह से आम सहमति की क्षद्म खड़ा किया जा रहा है उसे मीडिया विश्लेषकों की भाषा में मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट[xii] कहते हैं। इस विधेयक के दूरगामी असर को देखते हुए ये आवश्यक है कि असहमति के खतरे उठाए जाएं, क्योंकि इस बात का जोखिम  है कि भारतीय लोकतंत्र ने सामाजिक विविधता के क्षेत्र में पिछले साठ साल में जो थोड़ी-बहुत उपलब्धि हासिल की है, उसे इस विधेयक के जरिए बेअसर किया जा सकता है। आखिर इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि महिला सशक्तिकरण के लिए उन संस्थाओं (लोकसभा और विधानसभाओं) को चुना गया है, जो सामाजिक विविधता का सबसे बड़ा मंच बन गए हैं। 

राजनीति के क्षेत्र में आई सामाजिक विविधता से कौन डरता है?

महिला आरक्षण विधेयक क्या समाज के कमजोर हिस्से के सशक्तिकरण का कानून है? महिला आरक्षण के जरिए सरकार विधायिका यानी कानून बनाने वाली संस्थाओं में जेंडर डायवर्सिटी यानी लैंगिक आधार पर विविधता लाना चाहती है। इसके लिए कानून बनाने (109वां संविधान संशोधन विधेयक) की प्रक्रिया चल पड़ी है। इसे लेकर कांग्रेस-बीजेपी और वामपंथी दलों के बीच नेतृत्व के स्तर पर जिस तरह की सहमति है, उसमें इस विधेयक के कानून बनने में कोई अड़चन नहीं है। लेकिन क्या विधायिका में जेंडर डायवर्सिटी लाने की ये कोशिश सोशल डायवर्सिटी (सामाजिक विविधता) को खत्म करके या कमजोर करके आगे बढ़ेगी? 

कांग्रेस-बीजेपी और वामपंथी दलों में महिलाओं के राजनीतिक आरक्षण को लेकर नजर आ रहे उत्साह का कारण क्या है? ये सवाल इसलिए भी पूछा जाना चाहिए क्योंकि इन दलों की आंतरिक संरचना में महिलाओं की स्थिति बुरी है। ये पार्टियां चुनावों में महिलाओं को टिकट नहीं देतीं। कैबिनेट में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं देतीं। राज्यसभा में चुनकर आने के लिए पार्टियों की इच्छा सबसे बड़ा मापदंड है। यदि ये दल महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण को लेकर गंभीर होते तो राज्यसभा में अच्छी संख्या में महिलाओं को पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता। लेकिन 2010 के राज्यसभा के आंकड़े बताते हैं कि इस सदन में सिर्फ 9 फीसदी महिलाएं हैं। कांग्रेस की 13 फीसदी, बीजेपी की 9 फीसदी, सीपीएम की 7 फीसदी और सीपीआई की शून्य फीसदी सांसद महिलाएं हैं।[xiii] महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में लाने के लिए इतनी बुरी तरह तत्पर दिख रही पार्टियां, राज्यसभा में उन्हें बेहतर प्रतिनिधित्व देने की कोशिश क्यों नहीं करतीं? इसके लिए तो किसी संविधान संशोधन या कानून पास करने की भी जरूरत नहीं है। किसी पार्टी को ऐसा करने से कोई रोक भी नहीं सकता। इसके लिए न मार्शल की जरूरत है न आम सहमति बनाने की। लोकसभा में चुनकर आने में महिलाओं को होने वाली कोई भी दिक्कत यहां लागू नहीं होती। लेकिन कांग्रेस-बीजेपी और वामपंथी दल राज्यसभा में 33 फीसदी महिलाओं को नहीं भेज रहे हैं।
जाहिर है कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर महिला आरक्षण विधेयक लाया तो जरूर गया है, लेकिन इसका मकसद कुछ और हो सकता है। कहीं इसका मकसद आजादी के बाद विधानसभाओं और लोकसभा की सामाजिक संरचना में आए बदलाव को खत्म करना तो नहीं हैं? ओबीसी जातियों का लोकसभा और विधानसभाओं में बड़े पैमाने पर आना साठ के दशक में शुरू हुआ और नब्बे के दशक के बाद ये प्रक्रिया एक तरह से पूरी हो गई। इसी दौरान इन सदनों में सवर्णों और खासकर ब्राह्मण सदस्यों की संख्या घटती चली गई। भारत का संविधान बनाने का दायित्व जिस संविधान सभा ने संभाला था, उसके 20 सदस्यीय कोर ग्रुप में 13 सदस्य ब्राह्मण थे।[xiv] 1951 में पहली लोकसभा के लिए चुने गए सांसदों में लगभग आधे ब्राह्रण थे। 2004 में यह संख्या घटकर 9.5 फीसदी रह गई।[xv] वहीं वर्तमान में ओबीसी सांसदों की संख्या 200 से ज्यादा है।[xvi]महिला आरक्षण विधेयक पर राज्यसभा में चर्चा के दौरान ये बताया गया कि पहली लोकसभा में ओबीसी सांसदों की संख्या 12 फीसदी थी, जो अब बढ़कर 30 फीसदी हो गई है।[xvii]
ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं कि लोकसभा और विधानसभाओं में पिछड़ी जातियों की बढ़ती उपस्थिति को महिला आरक्षण विधेयक के जरिए नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है। राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा के दौरान बहुजन समाज पार्टी के सतीश चंद्र मिश्र ने यह सवाल उठाया। सरकार और प्रमुख विपक्षी दलों की नीयत को लेकर संदेह व्यक्त किए जा रहे हैं। यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या इस बिल के पास होने के बाद पहले से ही कम संख्या में नौजूद मुस्लिम सांसदों और विधायकों की संख्या और कम हो जाएगी। 2001 की जनगणना के मुताबिक देश की आबादी में 13.4 फीसदी मुस्लिम हैं।[xviii] इतनी संख्या के हिसाब से लोकसभा में 72 मुस्लिम सांसद होने चाहिए। जबकि वर्तमान लोकसभा में सिर्फ 28 मुस्लिम सांसद हैं।

महिला आरक्षण से जुड़ा सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न है कि क्या ये कानून विधायिका यानी संसद और विधानमंडलों की सामाजिक विविधता को नष्ट करेगा। इसी की व्याख्या के क्रम में ये बातें आ रही है कि भारत की सामाजिक विविधता, जो आजादी के बाद शुरुआती लोकसभाओं में नजर नहीं आई थी और अगड़े जाति समूहों का वर्चस्व विधायिका पर था, वहां से देश अब काफी आगे बढ़ चुका है। इस समय महिला आरक्षण का विरोध जिन आधारों पर किया जा रहा है, उसका प्रमुख तर्क यही है कि महिला आरक्षण राजनीतिक क्षेत्र में दशकों के सामाजिक बदलाव और पिछड़ा उभार को फिर से नकार देगा और संसद का चरित्र एक बार फिर वैसा हो जाएगा, जैसा पिछड़ा उभार से पहले था। इस तर्क की अपनी कमजोरियां हैं और पंचायतों का अनुभव भी बताता है कि वोट के आधार पर जब चुनने या खारिज करने के फैसले होंगे तो उसमें संख्या का महत्व खत्म नहीं होगा। किसी सीट पर किसी जाति समूह या जातियों और धार्मिक समूहों का समीकरण अगर प्रभावशाली है तो उस सीट पर उस समीकरण का उम्मीदवार सिर्फ इसलिए नहीं हार जाएगा कि वो सीट महिलाओं के लिए रिजर्व हो गई है। लेकिन शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े समूहों को शुरुआती दौर में कुछ दिक्कतें जरूर आएंगी क्योंकि शैक्षणिक पिछड़ेपन की वजह से इन समूहों की महिलाओं को न सिर्फ चुने जाने में दिक्कत होगी बल्कि राजकाज के बाकी काम करने में भी उन्हें शुरू में कुछ  असुविधा हो सकती है।   

क्यों एक हो गई कांग्रेस, बीजेपी और वामपंथी पार्टियां

महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के दिन संसद भवन से एक रोचक तस्वीर आई। इस तस्वीर में बीजेपी नेता सुषमा स्वराज, नजमा हेपतुल्ला और सीपीएम नेता वृंदा कारात गले मिल रही हैं और साझा खुशी का खुलकर इजहार कर रही हैं। वैसे तो तीन महिला नेताओं के मिलकर खुश होने में किसी को भी एतराज क्यों होना चाहिए, लेकिन बीजेपी और सीपीएम की इस खुशी में अगर कांग्रेस भी शामिल हो जाए तो संदेह होना चाहिए कि आखिर हो क्या रहा है। ज्यादातर सवालों में मतभेद रखने वाले इन दलों के दिल आखिर महिला आरक्षण के मुद्दे पर एक साथ क्यों धड़क रहे हैं? महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर इन दलों के अपने रिकॉर्ड बेहद शर्मनाक हैं। राज्यसभा में सिर्फ 9 फीसदी महिला सासंदों का होना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि ये दल, मूल रूप से, महिला विरोधी हैं।

महिला आरक्षण का विधेयक लंबे समय से लंबित चला आ रहा है, लेकिन इस पर कभी विस्तार से बहस नहीं हुई। यहां तक कि राज्यसभा में इसे लगभग जबर्दस्ती पास कराया गया। इससे पहले सात सांसदों को पूरे बजट सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया क्योंकि उन्होंने एक दिन पहले महिला आरक्षण विधेयक की कॉपी फाड़ दी थी और सभापति के टेबल से कागज फेंक दिए थे। राज्यसभा के इतिहास में पहली बार मार्शल का इस्तेमाल करके सांसदों को सदन के बाहर फेंक दिया गया। जनहित के सैकड़ों अन्य मुद्दों पर न तो दलों के बीच ऐसी एकता दिखती है न ही ऐसा जोश। महिला आरक्षण विधेयक इस मामले में असामान्य है, कि इसने कांग्रेस, बीजेपी और वामपंथी दलों को एक कर दिया है। इस व्यापक एकता के सूत्र इन दलों के नेतृत्व की सामाजिक संरचना में छिपे हो सकते हैं।

इस समय भारतीय राजनीति में इन तीनों समूहों के शिखर पर सवर्ण हावी हैं। कांग्रेस में शिखर पर मौजूद तीन नेता- अध्यक्ष सोनिया गांधी (राजीव गांधी से शादी के बाद उन्हें ब्राह्मण मान लिया गया), प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और प्रणव मुखर्जी सवर्ण हैं। बीजेपी में अध्यक्ष नितिन गडकरी, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली, तीनों ब्राह्मण हैं। सीपीएम और सीपीआई के नेतृत्व में ब्राह्मण और सवर्ण वर्चस्व तो कभी सवालों के दायरे में भी नहीं रहा। कारात, येचुरी, पांधे, वर्धन, बुद्धदेव की पूरी कतार वामपंथी दलों के नेतृत्व में सामाजिक विविधता के अभाव का प्रमाण है। महिला आरक्षण पर इन तीनों दलों/समूहों के बीच एकता के सूत्र इन दलों के शिखर नेतृत्व की सामाजिक बनावट में तलाश किए जा सकते हैं।


   




[i] गृहस्थ में कैसे रहें(54वां पुन:प्रकाशन), स्वामी रामसुखदास, गीताप्रेस, पेज 72
[ii]  वही, पेज 92
[iii] नेशनल इलेक्शन वाच की रिपोर्ट
[iv]  संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन, जेंडर एंड लैंड राइट डाटाबेस (http://www.fao.org/gender/landrights/report/)
[v] वही
[vi] राज्यसभा में 9 मार्च, 2010 की कार्यवाही
[vii] 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत में साक्षरता दर 65.38% है जबकि महिलाओं की साक्षरता दर 54.16% ही है।
[viii] 2001 की जनगणना का आंकड़े, संयुक्त राष्ट्र ने सन 2000 में कहा था कि भारत में 4.4 करोड़ महिलाएं विलुप्त हो गई हैं।
[ix]पूना पैक्ट के फलस्वरूप अधिक सीटों की प्राप्ति हुई, पर ये सभी गुलामों द्वारा भरी गई हैं। यदि गुलामों की पलटन से कोई लाभ है, तो पूना पैक्ट को लाभप्रद कहा जा सकता है”- डॉ अंबेडकर (डा. हरिनारायण ठाकुर के बहुरि नहिं आवनापत्रिका के जुलाई-दिसंबर अंक में छपे आलेख से)
[x]  क्रिस्टोफ जेफरेलोट, डॉ. अंबेडकर एंड अनटचेबिलिटी, एनालाइजिंग एंड फाइटिंग कास्ट (2005)
[xi] संविधान की दसवीं अनुसूचि, (संविधान के 91वें संशोधन के बाद)
[xii] एचवर्ड एस हरमन, नोम चोमस्की (2008)
[xiii] नेशनल इलेक्शन वाच की रिपोर्ट, राज्यसभा के सांसदों की विश्लेषण, 2010
[xiv]आउटलुक, 4 जून, 2007 http://www.outlookindia.com/article.aspx?234779
[xv]आउटलुक, 4 जून 2007  http://www.outlookindia.com/article.aspx?234783
[xvii]  9 मार्च, 2010 को राज्यसभा में जेडी यू सांसद शिवानंद तिवारी का वक्तव्य, राज्यसभा की कार्यवाही से

संसद की बातें और युद्ध का सच

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/22/2010 08:26:00 AM

अनिल चमड़िया

लाल कृष्ण आडवाणी ने नवंबर 1999 में जब ये कहा कि आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करने के लिए सैनिक बलों की संख्या पर्याप्त नहीं है तो राज्यसभा में इस बाबत एक सवाल किया गया।तब सरकार ने जवाब दिया था कि इस समय जम्मू कश्मीर में मिलिटेंसी से प्रभावित जिलों की संख्या 12 है। इंसर्जेसी से प्रभावित उत्तर पूर्व के चार राज्यों के 44 जिले है। वाम उग्रवाद से पीड़ित आंध्र प्रदेश के 6 , बिहार के 10, मध्यप्रदेश के 7, महाराष्ट्र के तीन एवं उड़ीसा के 5 जिले प्रभावित हैं। इसके अलावा सबसे ज्यादा संख्या देश के विभिन्न राज्यों के 112 जिले साम्प्रदायिक स्तर पर संवेदनशील बताए गए थे। जातीय तनाव की चपेट में मात्र 24 जिलें थे। लेकिन 15 अगस्त 2006 को देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लाल किले की प्राचीर से आतंकवाद और नक्सलवाद को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में घोषित किया। महज छह वर्षों में नक्सलवाद का तेजी से इतना विकास कैसे हो गया ? कैसे मिटिलेंसी, इंसर्जेसी, वाम उग्रवाद आदि शब्द एक होकर आतंकवाद के पर्याप्य के रूप में माओवाद सामने आ गया ?

अजात शत्रु के बारे में पढ़ते हुए एक वाक्या आता हैं। उसे पिता को कैद में रखना था। लेकिन पिता को कैद में रखने के रूप में कोई फैसला लिया जाता तो लोगों के बीच उसका गलत संदेश जाता। लिहाजा राजा ने अपने फैसले की भाषा बदल दी। उसने फैसला किया कि वह अपने पिता को कड़ी सुरक्षा में रखना चाहता है और उसने उनके इर्द गिर्द सख्त पहरा बैठा दिया।उस पिता के लिए कैद और सुरक्षा शब्दों में क्या फर्क था?किसी फैसले की भाषा से राजनीतिक उद्देश्य समझ में नहीं आता है। उस फैसले के क्या परिणाम निकलने वाले है, उसके राजनीतिक उद्देश्यों को समझने के लिए उस पर गौर करना ही महत्वपूर्ण होता है। राज्यसभा में छोटे लोहिया के रूप में विख्यात जनेश्वर मिश्र ने 17 मई 2000 को सरकार से एक सीधा सवाल किया कि क्या नक्सलवाद को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए टास्क फोर्स के गठन के बाद से देश में नक्सलियों के प्रभाव और उसके कार्यक्षेत्र में तेजी से विस्तार हुआ है? दूसरा क्या झुठे मुठभेड़ के नाम पर नक्सलियों को मारने की घटनाओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई है?अब ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते हैं।अब सूचनाएं मांगी जाती है कि सरकार नक्सलवाद से निपटने के लिए क्या कर रही है। सरकार के पास जनेश्वर मिश्र के दूसरे प्रश्न का जवाब नहीं था। सीधा जवाब पहले प्रश्न का भी नहीं था। सरकार ने केवल इतना बताया कि 1998 में नक्सलवादी प्रभावित राज्यों के बीच पुलिस वालों की एक समन्वय समिति बनाई गई हैं। अब सवाल यहां ये पूछा जा सकता है कि क्या देश में नक्सलवाद से निपटने के नाम पर राज्यों को केन्द्र द्वारा पैसा मुहैया कराने का सिलसिला शुरू किया गया है या फिर नक्सलवाद को एक बड़े खतरे के रूप में पेश करने के लिए विनियोग किया जाता रहा है? यह सवाल जनेश्वर मिश्र के सवाल से जुड़कर ज्यादा महत्वपूर्ण और गौरतलब हो जाता है।

संविधान के मुताबिक कानून एवं व्यवस्था राज्य का विषय है। राज्यों की माली हालत खराब बिगड़ती चली गई है।कमजोर होते राज्यों को केन्द्र सरकार ने सुरक्षा के नाम पर राज्यों के कई तरह से राशि मुहैया कराती रही है। एक तो पुलिस बलों के आधुनिकीकरण के नाम पर राशि दी जाती रही है।दूसरे सुरक्षा संबंधी खर्चों की भरपायी योजना के तहत पचास प्रतिशत राशि मुहैया कराई जाती रही है। 1999-2000 में केन्द्र सरकार ने सुरक्षा संबंधी खर्चों की भरपायी योजना के तहत आंध्र प्रदेश को सबसे ज्यादा 30.46 करोड़ रूपये मुहैया कराया था। आज जिन आदिवासी प्रदेशों झारखंड , मध्यप्रदेश, उड़ीसा को माओवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित बताया जा रहा है उन राज्यों में तब की स्थिति क्या थी, ये यहां गौर तलब है। तब संयुक्त बिहार को 9 करोड़, मध्यप्रदेश को 5 करोड़ और उड़ीसा को 3.58 करोड़ रूपये इस मद में मुहैया कराए गए थे। उपर इन राज्यों में वाम उग्रवाद से प्रभावित जिलों की संख्या भी बतायी गई है।

संसद में सरकार ने 2010 तक माओवाद और नक्सलवाद की जो तस्वीर देश को बतायी है, उस पर भी गौर करें। सरकार ने पुलिस ढांचे के आधुनिकीकरण के लिए आंध्र प्रदेश को 2008-09 में 83.83 करोड़, बिहार16.24 करोड़, छत्तीसगढ़ को 41.72 करोड़, झारखंड़ को 50.95 करोड़, मध्यप्रदेश को 57.68 करोड़, महाराष्ट्र को 75.86 करोड़, उड़ीसा को 42.52 करोड़ यानी बाकी दो राज्यों उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल को कुल मिलाकर 515.05 करोड़ रूपये राशि मुहैया करायी है। सुरक्षा संबंधी खर्चों की भरपायी योजना के तहत उपरोक्त राज्यों को 10433.20 लाख रूपये की कार्य योजना को मंजूरी दी गई । एक तीसरा नया खर्चा और जुड़ा है। वाम उग्रवाद से निपटने के लिए कई तरह के ढांचे खड़े करने के लिए विशेष ढांचागत योजना के तहत राज्यों को राशि मुहैया करायी जा रही है। छत्तीसगढ़ के केवल वीजापुर और दंतेवाड़ा के लिए क्रमश- 1615 लाख और 1135 लाख रूपये दिए गए।बिहार के गया और औरंगाबाद के लिए 986 लाख और 619 लाख रूपये और झारखंड के चतरा जिले के लिए 960 लाख एवं पलामू के लिए 1420 लाख रूपये दिए गए। कुल 9999.92 लाख रूपये उपरोक्त राज्यों के अलावा आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश को सुरक्षा के ढांचे खड़े करने के लिए दिए गए। इसमें दो तरह की राशि शामिल है। राशि एक तो सहायता के नाम पर तो दूसरे कर्ज के रूप में होती है।राज्यों पर केन्द्र का कर्ज बढ़ता चला गया है।

नक्सलवाद के विस्तार को किस रूप में देखा जाए। सरकारी दस्तावेजों में नक्सलवाद का जो विस्तार पिछले पांच वर्षों के दौरान दिखाई देता है वह किस वजह से है? आखिर देश में ऐसी क्या परिस्थितियां पैदा हुई है कि इतनी तेजी के साथ नक्सलवाद का विस्तार दिखाई देता है।जब सारी दुनिया में वाम खासतौर से क्रांतिकारी वाम की समाप्ति की घोषणा की जा रही हो उस समय नक्सलवाद का इतनी तेजी से बढ़ते प्रभाव का दावा सरकार द्वारा किया जा रहा है ।खुद मनमोहन सिंह इस बात को दोहरा चुके हैं कि नक्सलवाद के प्रति बुद्दिजीवियों में आकर्षण खत्म हुआ है। बुद्दिजीवी किसी वाद के विस्तार के मापक है तो फिर नक्सलवाद का इस रूप में विस्तार उनके द्वारा क्यों बताया जा रहा है।

अमेरिका ने रीगन के कार्यकाल के दौरान 80 के दशक में राज्य पोषित आतंकवाद को दुनिया के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश करने की योजना बनाई थी। लेकिन वह आकार नहीं ले सकी।क्योंकि उस समय आतंकवाद के नाम पर निशाने की एक शक्ल तैयार नहीं की जा सकी थी।लगभग यही स्थिति भारत के संदर्भ में है।नई आर्थिक नीतियों के संभावित बुरे नतीजें जब सामने आने लगे तब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने नक्सलवाद को देखने के नजरिये में परिवर्तन लाना शुरू किया।उसने नक्सलवाद को केवल कानून एवं व्यवस्था की समस्या के रूप में स्थापित करने की कोशिश की।लेकिन अमेरिका उस समय आतंकवाद को एक इस्लामी आतंकवाद के रूप में खड़ा कर रहा था।कहा जाए कि भूमंडलीकरण का दौर शुरू होने के बाद बुश के जमाने में आतंकवाद को एक ठोस शक्ल दी गई।एनडीए ने उसी तर्ज पर मार्क्स-माओ और मुल्ला के रूप में विकसित कर आतंकवाद के सिक्के के दो पहलू के रूप में उसे पेश करने की कोशिश की थी।मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने प्रथम कार्यकाल में आर्थिक नीतियों के विस्तार की जो योजना तैयार की उसे आतंकवाद की समस्या से जोड़े बिना आगे बढ़ाना संभव नहीं था। देश के जिन अमीर इलाकों में कब्जा जमाने से उसका विस्तार हो सकता था वो बदकिस्मती से दुनिया के सबसे बदहाल आबादी आदिवासियों के पैर के नीचे था।लेकिन यह संभव नहीं था कि आदिवासियों को विकास के बाधक के रूप में खड़ा करके उनके खिलाफ अभियान चलाया जा सकें। उसे एक नए वैचारिक शक्ल में पेश करना जरूरी था। माओवाद इसका चेहरा बना और उसे सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया जाने लगा। दुनिया भर में भूमंडलीकरण के दौर में सत्ता का चरित्र बदला हैं और उसके तदानुरूप उसकी भाषा के अर्थ भी बदले हैं। यदि बुश जिस आतंकवाद को दुनिया के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया यह उनका आकलन नहीं था। बल्कि यह उनकी भूमंडलीकरण की परियोजना का एक हिस्सा था।जैसे जब शरद पवार मंहगाई के संदर्भ में इस तरह का बयान देते है कि वह कितने महीने तक बनी रह सकती है तो वह आकलन नहीं संदेश के रूप में होता है। संदेश उन आर्थिक वर्ग के लिए जो मंहगाई की व्यवस्था को सुदृढ़ कर और लाभ उठा सकें।इस तरह से संदेश देने की रणनीति का विकास हुआ है। विकास का जब संदेश दिया जाता है तो विकास से लाभ उठाने वालों के लिए वह और आक्रमक और संगठित होने का आह्वान होता है। मनमोहन सिंह ने जब नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया तो यह दमन के लिए प्रशिक्षित नौकरशाही के लिए संदेश के रूप में सामने आया। एक लंबा सिलसिला देखा जा सकता है जब सत्ता अपनी प्रशिक्षित मशीनरी के सामने अपने एजेंडे को पेश करने का इस तरह का तरीका विकसित किया है।

भारत के संदर्भ में इस बात का आकलन किया जा सकता है कि जिस समय मनमोहन सिंह ने नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश करने का सिलसिला शुरू किया उस समय उसे इस रूप में पेश करने के क्या ठोस आधार थे।उस समय गृह मंत्रालय के आंकड़े बता रहे थे कि 2005 में नक्सलवादी हिंसा की 1608, 2006 में 1509, 2007 में 1565 और 2008 में 1591 घटनाएं हुई।लेकिन इन संख्याओं के भीतर भी घुसने की कोशिश करनी चाहिए। मसलन जब बिहार में नक्सलवादी हिंसा को लेकर विधानसभा में बातचीत होती थी तो सरकार जो आंकडे पेश करती थी उसमें कपूर्री ठाकुर सरीखे नेता पूछा करते थे कि नक्सलवादी हिंसा में मारे गए दलितों की संख्या कितनी है।नक्सली के नाम पर मारे गए जवानों में कितनी संख्या पिछड़े व दलितों की है। बहरहाल कुल घटनाओं की मात्रा में कोई बड़ा अंतर नहीं दिखाई दे रहा था जिसके आधार पर नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया जाए।तब के गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने तो उस समय कहा कि कई राज्यों में नक्सलवादी हिंसा में कमी आई है।उन्होने बताया कि केवल झारखंड और छत्तीसगढ़ में स्थिति बदत्तर है।उन्होने तो यहां तक कहा कि नक्सलवाद के खतरे को देखने के अपने अपने नजरिये हो सकते हैं।संसद में सरकार कहती रही है कि नक्सलवादियों को बाहरी मुल्क से किसी तरह के हथियार वगैरह मिलने की खबर नहीं है। उनकी आय का बड़ा हिस्सा अपने इलाके में जमा किए जाने वाली लेवी से आता है।प्रचार तंत्र ने रेड कैरिडोर का हौवा जरूर तैयार किया हो लेकिन सरकार ने ये कई मौके पर स्पष्ट किया है कि उसे रेड कैरिडोर बनाने जैसी कोई जानकारी नहीं है।प्रधानमंत्री के खतरे वाले बयान से पहले संसद में देशभर में हथियार बंद नक्सलियों की संख्या लगभग नौ सौ बतायी गई थी। दंतेबाडा में 75 केन्द्रीय पुलिस के जवानों के मारे जाने के बाद पी चिंदबरम उस संख्या के बढ़कर 14-15 हजार होने की बात कह रहे हैं।नक्सलियों के पास हथियारों के संबंध में जो आंकड़े पेश किए गए थे वे देश के पांच सात बड़े जिलों में लाईसेंसधारी हथियारों से ज्यादा नहीं बताए गए है।तब क्या इस आधार पर नक्सलवाद को सुरक्षा के लिहाज से सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया जाना चाहिए था?दरअसल नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप पेश करने के पीछे भले कोई ठोस बात नहीं हो लेकिन नौ फीसदी की विकास दर को जिन इलाकों पर कब्जे के जरिये हासिल किया जा सकता था उसकी ठोस योजना थी और उसमें आने वाली बाधाओं का भी आकलन था।जब गृह मंत्री दो राज्यों के हालात बदत्तर बता रहे थे तो इसका अर्थ उन दोनों राज्यों के संपूर्ण हिस्से में भी बदत्तर हालात नहीं बता रहे थे।क्या देश के किसी वाद के कारण कुछेक जिलों में कानून एवं व्यवस्था की स्थिति बदत्तर होने के आधार पर उसे आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया जा सकता है।1999 में साम्प्रदायिकता से ग्रस्त जिलों की संख्या सबसे ज्यादा बताई गई है क्या उसे आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया गया ? देश में इस समय सबसे ज्यादा मौतें सड़कों पर होती है । एक लाख से ज्यादा लोग मारे जाते हैं। क्या इस आधार पर इसे इस समय की सबसे बड़ी समस्या के रूप में पेश किया जाना चाहिए।हिंसा और मौत खतरे का पैमाना नहीं होता है।किसी राजनीतिक व्यवस्था के लिए सबसे खतरनाक उसकी नीतियों और कार्यक्रमों को चुनौती देना होता है। भूमंलीकरण की नीतियों की वाहक राजनीतिक व्यवस्थाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती ये रही है कि वह कैसे विरोध की तमाम तरह की धाराओं का एक चेहरा तैयार कर दें।कैसे तमाम तरह के विरोधों को दबाने का एक नाम तैयार कर लें। माओवाद और आतंकवाद इसी दो तरह के प्रयासों के रूप में सबसे बड़े खतरे के रूप में सामने आया।

नक्सलवाद के सबसे बड़े खतरे के रूप में स्थापित होने के क्या अर्थ हो सकते हैं, इस प्रश्न पर लोकतंत्र के बारे में तनिक भी संवेदनशील रहने वाले लोगों को सोचना पड़ेगा। इन वर्षों में क्या हुआ है। सरकार का संसद में ही जवाब है कि सरकार ने वाम उग्रवाद से निपटने के लिए एक ऐसे नजरिये को स्वीकार किया है जिसमें कई बातें शामिल हैं। इसमें सुरक्षा, विकास और लोगों की समझ के पहलू शामिल हैं।लोगों की समझ का पहलू अब जुड़ा है। ऐसा पहली बार हुआ है कि गृह मंत्रालय गरीब इलाकों में माओवादियों को लेकर तरह तरह के विज्ञापन जारी कर रहा है। कई शहरों में बतौर विज्ञापन होर्डिंग लगाए गए हैं।यदि इन विज्ञापनों की सामग्री का विश्लेषण किया जाए तो सत्ता के वास्तविक चरित्र को और खोलकर सामने रखा जा सकता है।विज्ञापन ये नहीं होता है कि विकास के इतने बड़े दावे के बीच आदिवासियों के बीच अंग्रेजों के जमाने से भी बदत्तर बदहाली की स्थिति बनी हुई है। बहरहाल फिलहाल विज्ञापन विषय नहीं है। केन्द्र सरकार के अनुसार राज्य सरकारें अपने यहां नक्सलवाद से जुड़े कई पहलूओं पर सक्रिय रहती है और केन्द्र सरकार कई तरह से उन्हें मदद करती हैं। इसमें केन्द्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती, रिजर्व बटालियन की स्वीकृति , आतंकवाद विरोधी और काउंटर इंसर्जेंसी स्कूलों की स्थापना , राज्य की पुलिस की सेना द्वारा ट्रेनिंग के लिए रक्षा मंत्रालय से मदद, सामुदायिक पुलिस लोगों को कार्रवाई में उतारने के लिए मदद उपर उल्लेखित पुलिस के आधुनिकीकरण आदि स्कीमों के तहत दी जाने वाली राशि के अलावा है।यहां जिस सामुदायिक और नागरिकों को कार्रवाई में उतारने के लिए मदद देने की बात जो कहीं गई है उसके बारे में स्पष्ट कर लेना चाहिए। सरकार ने ही स्वीकार किया है कि देश के विभिन्न हिस्सों में उसने नागरिक सुऱक्षा समितियों के गठन में मदद करती है। देश के कई हिस्सों में ग्रामीण सुरक्षा समितियां सक्रिय है जिन्हें सरकारी फंड के अलावा हथियार और संरक्षण मिलता है।दूसरा छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ने बताया था कि केन्द्र के कहने पर ही उनके राज्य में विशेष पुलिस अधिकारी नियुक्त किए गए हैं।मुख्यमंत्री के मुताबिक अब उनकी बटालियन तैयार करने पर विचार किया जा रहा है। असंतोष से भरे इलाके में गरीब और जागरूक युवाओं को एक राजनौतिक जगह जमा होने से रोकने की सरकारी नीति के तहत कई तरह की योजनाएं चलती रहती है। एसपीओ यानी विशेष पुलिस अधिकारी, सुरक्षा समितियां उनमें एक हैं। स्थानीय युवाओं के एक हिस्से को सेना या अर्द्धसैनिक बलों में ले लिया जाता है।जैसे कश्मीर के दो हजार युवाओं को सेना में लेने का फैसला किया गया। असम में जिस समय असंतोष गहराया उस समय वहां के युवाओं को सेना में भर्ती करने का सिलसिला तेज किया गया। अभी आदिवासी इलाकों में ये सिलसिला तेज हुआ है। पुलिस और सेना में भर्ती के लिए लंबी लाइनें लग जाती है।आदिवासी बटालियन बनाने की प्रक्रिया तेज हुई है। देश में असंतोष से भरे राजनीतिक आंदोलनों के दौरान इस तरह की योजनाओं का एक लंबा सिलसिला हैं।लेकिन युवाओं की चाहें जितनी भर्ती सेना या पुलिस में कर ली जाए उससे समस्या के खिलाफ असंतोष के घनत्व को तो कमजोर किया जा सकता है लेकिन समस्याएं कैसे खत्म हो सकती है? वह तो राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक कार्यक्रमों के आधार पर ही हो सकती है।नई आर्थिक नीति और राजनीतिक सरोकार इसकी इजाजत नहीं देते हैं। लोकतंत्र में हासिल अधिकार इसका विरोध करने की इजाजत देते है।सैन्य ढांचा इसी लोकतंत्र से निपटने की दूरगामी योजना का हिस्सा है।

नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किए बिना आतंकवाद विरोधी ढांचे का निर्माण नहीं किया जा सकता। क्योंकि इसे आर्थिक,सामाजिक और राजनीतिक समस्या मानने के दृष्टिकोण के रहते ऐसा करना संभव नहीं हो सकता था।इस नजरिये के बिना विभिन्न तरह के राजनीतिक पर्दों में छिपे लोकतंत्र विरोधी तमाम शक्तियों को एकजूट नहीं किया जा सकता था। इसके बिना उस छोटे से बौद्धिक वर्ग पर भी हमले की स्थितियां तैयार नहीं की जा सकती है जो भूमंडलीकरण के तमाम दबावों के बावजूद अपनी संवेदनशीलता और सरोकारों को बचाए हुए है। इसीलिए देखा जा सकता है कि कल राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ से जुड़े संगठन बौद्धिक आतंकवाद के नाम पर लोकतांत्रिक समूहों पर हमला बोलते थे अब मनमोहन सिंह के स्वर में स्वर मिलाने वाले आर्थिकवादी गृहमंत्री पी चिंदबरम भी बौद्धिक वर्ग पर माओवाद के समर्थन के लिए सबसे जोरदार हमला बोलते हैं।जैसे सल्वा जुड़ुम में भाजपा और कांग्रेस साथ साथ हो गई। अमीर परस्त आर्थिकवादियों का राजनीतिक लक्ष्य एक ही होता है। गणतंत्र में राज्यों की ताकत को कमजोर नही किया जा सकता है।ये अब दावे के साथ कहा जा सकता है कि राज्यों के नाम कानून एवं व्यवस्था केवल एक विषय के रूप में रह गया है जैसे देश के नाम समाजवादी संविधान रह गया है।राज्य के नाम केवल विषय है , निपटने के लिए सारी योजनाएं केन्द्र की है। नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश करने में गरीब और राजनीतिक तौर पर कमजोर राज्यों के भीतर लालच की प्रवृति का बढ़ना स्वभाविक है। अमेरिका ने मुशर्रफ के कार्यकाल में पाकिस्तान को आतंकवाद के नाम तब तब बहुत पैसा दिया जब जब पाकिस्तान ने अपने यहां आतंकवादी घटनाओं में तेजी के साथ इजाफा दिखाया।सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश करने में लोकतंत्र की कार्रवाईयों पर चोट करने में सबसे ज्यादा आसानी होती है। देश के लोकतंत्र में पहली बार एक पुलिस अधिकारी रिबेरो ने साहस किया कि बुलेट का जवाब बुलेट से देंगे।लेकिन उस समय सवाल उठे तो उसने कई बार सफाई दी। उसकी झिझक आज एक शोर के रूप में सुनायी पड़ रही है। हर राज्य का पुलिस अधिकारी बुलेट का बुलेट से देने के लिए दहाड़ रहा है। पहले एक गिल थे जो धरना प्रदर्शन को आतंकवाद की शुरूआत मानते थे। अब देश के किसी भी हिस्से में घरना प्रदर्शन असंभव होता जा रहा है।राजनीतिक नेता लोकतंत्र में बातचीत की प्रक्रिया से इंकार कर रहे हैं।लोकतंत्र के सैन्यकरण की तरफ बढ़ने की प्रक्रिया और होती कैसी है? इसके अलावा कोई दूसरा रूप नहीं होता। मात्र दस वर्ष में नक्सलवाद के नाम पर पर युद्ध छेड़ने की बात सुनाई पड़ने लगी है।ठीक वैसे ही अमेरिका ने आतंकवाद की एक शक्ल तैयार करने के बाद उसके खिलाफ युद्द छेड़ने की घोषणा कर दी। युद्ध किसके खिलाफ हुए? अफगानिस्तान और इराक ने क्या बिगाड़ा था। क्या वकाई नक्सलवाद की विचारधारा में इतनी ताकत है कि उसके सामने सभी राजनीतिक धाराएं लगातार खुद को बौना महसूस कर रही है ? क्या भूमंडलीकरण में एक तरफ सभी सत्ताधारी धाराएं एक हो गई है और दूसरी तरफ विरोध का एक चेहरा तैयार कर लिया गया है? युद्ध के लिए हथियार बंद चेहरा चाहिए और नक्सलवाद व माओवाद बहाना है। सबसे सुंदर कहावत गढ़ी जा रही है कि सबसे कमजोर लेकिन सबसे अमीर लोगों को लूटने के लिए सबसे सुंदर बहाना क्या हो सकता है?कमजोर हिंसक नहीं हो सकता और अमीर होने का तो उसे एहसास भी नहीं। तब ऐसी कहावत का उत्तर क्या होगा? कमजोर और अमीर एक साथ होना इस समयका सबसे बड़ा खतरा हैं।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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