हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बनते हुए

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/30/2010 08:34:00 PM

उपन्यासकार, कार्यकर्ता, पत्रकार और आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा? 

अरुंधति राय ने इस बातचीत में भारत के केंद्र में स्थित जंगलों में माओवादी क्रांतिकारियों से मिलने और बात करने के लिए किए गए की गई यात्रा के बारे में बताया है. राय यहां लारा को प्रतिरोध और संघर्ष, युद्ध और उपनिवेशवाद के बारे में बता रही हैं. वे बता रही हैं कि आप गोलियों से एक विचारधारा की हत्या नहीं कर सकते और किस तरह हम सभी आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन गए हैं. इस वीडियो को हमने जीआरआई टीवी से लिया है.





पढ़िए अरुंधति कोः बंदूक की नली से निकलता ग्राम स्वराज

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/26/2010 01:01:00 PM




आनेवाले दशकों में शायद इसे एक क्लासिक की तरह पढ़ा जाएगा. इन बेहद खतरनाक- और उतने ही शानदार- दिनों के बारे में एक विस्तृत लेखाजोखा. पिछले एक दशक से अरुंधति के लेखन में शोकगीतात्मक स्वर बना हुआ था, पहली बार वे इससे बाहर आई हैं और पहली बार उनकी किसी रचना में इतना उल्लास, इतना उत्साह, इतनी ऊर्जा और इतनी गरमाहट है. जैसा अपने एक ताजा साक्षात्कार में खुद अरुंधति ही कहती हैं, यह यात्रा वृत्तांत सिर्फ ऑपरेशन ग्रीन हंट या राजकीय दमन या अत्याचारों के बारे में नहीं है. यह जनता के विश्वव्यापी प्रतिरोध आंदोलनों और हर तरह के - हिंसक या अहिंसक - संघर्षों में से एक का आत्मीय ब्योरा है. इसे लिखते हुए अरुंधति ने अपने कुछ पुराने आग्रहों, विचारों और धारणाओं को छोड़ा ही नहीं है, बल्कि उसके ठीक उलट विचारों की हिमायत करती नजर आती हैं. एसा क्यों है, इसकी वजह भी अरुंधति ने यहां बताई है. थोड़ी संजीदगी के साथ पढ़ने पर पाठक की जिंदगी को बदल कर रख देने की क्षमतावाले इस आलेख में अरुंधति जिस तरह इतिहास और वर्तमान, जीवित लोगों और एतिहासिक हस्तियों के बीच आई-गई हैं, वह अनोखे अनुभवों से भर देनेवाला है. बेशक, इसमें अरुंधति शैली के आंकड़ों और तथ्यों की बेहद कमी खलती है, लेकिन शायद यह पूरा आलेख ही अपने आप में एक बड़ा तथ्य और आंकड़ा है. इसके पहले वे अपने लेखों में जगह-जगह पाठक को नए तथ्यों और उनके प्रस्तुतिकरण में नएपन की वजह से चौंकाती रही हैं (बकौल नोम चोम्स्की), लेकिन इस बार इस पूरी रचना के एक-एक वाक्य से चौंकाती हैं- हमारे सामने अपने ही समाज और समय के एक नये चेहरे से हम रू-ब-रू होते हैं.
हम इससे सहमत हो सकते हैं. इससे असहमत भी हो सकते हैं. लेकिन इसे पढ़े बिना कुछ भी नहीं हो सकते.



बंदूक की नली से निकलता ग्राम स्वराज

अरुंधति राय, दंडकारण्य से लौटकर
अनुवादः अभिषेक श्रीवास्तव

दंतेवाड़ा को समझाने के कई तरीके हो सकते हैं। यह एक विरोधाभास है। भारत के हृदय में बसा हुआ राज्यों की सीमा पर एक शहर। यही युद्ध का केन्द्र है। आज यह सिर के बल खड़ा है। भीतर से यह पूरी तरह उघड़ा पड़ा है।

दंतेवाड़ा में पुलिस सादे कपड़े पहनती है और बागी पहनते हैं वर्दी। जेल अधीक्षक जेल में है, और कैदी आजाद (दो साल पहले शहर की पुरानी जेल से करीब 300 कैदी भाग निकले थे)। जिन महिलाओं का बलात्कार हुआ है, वे पुलिस हिरासत में हैं। बलात्कारी बाजार में खड़े भाषण दे रहे हैं।
इंद्रावती नदी के किनारे का इलाका माओवादियों द्वारा नियंत्रित है। पुलिस इस इलाके को 'पाकिस्तान' कहती है। यहां गांव खाली हैं, लेकिन जंगल लोगों से अटे पड़े हैं। जिन बच्चों को स्कूलों में होना चाहिए था, वे जंगलों में भागे फिर रहे हैं। जंगल के खूबसूरत गांवों में कंक्रीट की बनी स्कूली इमारतें या तो उड़ा दी गई हैं और उनका मलबा बचा हुआ है। या फिर इनमें पुलिस वाले भरे हुए हैं। इस जंगल में जो युद्ध करवट ले रहा है, भारतसरकार को उस पर गर्व भी है और कुछ संकोच भी। ऑपरेशन ग्रीनहंट भारत के गृहमंत्री (और इस युद्ध के सीईओ) पी. चिदंबरम के लिए अगर गर्वोक्ति है, तो एक इनकार भी। वह कहते हैं कि ऐसा कोई युद्ध नहीं चल रहा, यह सिर्फ मीडिया द्वारा गढ़ा गया है। और इसके बावजूद ढेर सारा पैसा इस युद्ध में झोंका जा रहा है, दसियों हजार सैन्य टुकड़ियों को तैनात कर दिया गया है। भले ही, युद्ध भूमि मध्य भारत के जंगल हैं तो क्या हुआ, इसके गंभीर नतीजे हम सभी के लिए होंगे।
एक उदार चेतन मस्तिष्क के लिए यह मान लेना आसान है कि यह युद्ध भारत सरकार और उन माओवादियों के बीच है जो चुनावों को ढोंग और संसद को सुअरबाड़ा कहते हैं; जिन्होंने भारतीय राजसत्ता को उखाड़ फेंकने की अपनी मंशा खुलेआम जाहिर कर दी है। उनके लिए यह भुला देना आसान है और सुविधाजनक भी, कि मध्य भारत के आदिवासियों के प्रतिरोध का इतिहास माओ से भी सदियों पुराना है (यही सचाई भी है, क्योंकि यदि उन्होंने प्रतिरोध नहीं किया होता, तो वे बचे ही नहीं होते)। हो, उरांव, कोल, संथाल, मुंडा, गोंड आदिवासियों ने एक नहीं, कई बार विद्रोह किया है, कभीअंग्रेजों के खिलाफ तो कभी जमींदारों और सूदखोरों के खिलाफ। इनकी बगावत को बर्बर तरीकों से कुचल दिया गया, हजारों आदिवासियों को मार दिया गया, इसके बावजूद इन लोगों को जीता नहीं जा सका। यहां तक कि आजादी के बाद पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में हुए पहले जनउभार- जिसे हम माओवादी कह सकते हैं- के केन्द्र में भी आदिवासी ही थे (जहां से नक्सलवादी नाम का शब्द पैदा हुआ, आजकल जिसे माओवादी के पर्याय के रूप में इस्तेमाल किया जाता है)। तब से लेकर अब तक नक्सली राजनीति अभिन्न रूप से आदिवासी उभार के साथ जुड़ी हुई है, जो हमें जितना नक्सलवादियों के बारे में बताती है, उतना ही वह आदिवासियों से भी सरोकार रखती है।
बगावत की यह विरासत अपने पीछे ऐसे असंतुष्ट और रुष्ट लोगों को छोड़ गई है जिन्हें जान-बूझ कर भारत सरकार ने हाशिए पर धकेल दिया है और अलग-थलग छोड़े हुए है। भारतीय लोकतंत्र का नैतिक दस्तावेज यानी भारत का संविधान संसद द्वारा 1950 में अपनाया गया था। आदिवासियों के लिए यह एक त्रासदी का दिन था। संविधान ने औपनिवेशिक नीति को सही ठहराते हुए आदिवासी इलाकों का जिम्मा भारतीय राजसत्ता के हाथमें दे दिया। रातों-रात समूची आदिवासी आबादी अपनी ही जमीन पर गैर-कानूनी प्रवासियों में तब्दील हो गई। इस संविधान ने वनोत्पादों पर आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों को ही अस्वीकार कर दिया और इस तरह उनकी समूची जीवन पद्धति को आपराधिक करार दिया। वोट देने के अधिकार के बदले संविधान ने उनके आजीविका और आत्मसम्मान के अधिकार को ही छीन लिया।
सरकार ने पहले तो उनसे सब कुछ छीन लिया और उन्हें गरीबी के कुएं में धकेल दिया। इसके बाद वह उनकी गरीबी को उन्हीं के खिलाफ इस्तेमाल करने में लग गई। हर बार जब उसे बड़ी आबादी को विस्थापित करने की जरूरत पड़ती- बांधों, सिंचाई परियोजनाओं, खनन आदि के लिए- तो सरकार अचानक 'आदिवासियों को मुखयधारा में लाने' या उन्हें 'आधुनिक विकास का फल देने' की बात करने लग जाती। इसका नतीजा यह हुआ है कि भारत की 'प्रगति' के शरणार्थी यानी आंतरिक रूप से विस्थापित करोड़ों लोगों (बड़े बांधों से अकेले तीन करोड़ से ज्यादा विस्थापित) में अधिसंखय आदिवासी लोग ही हैं। जाहिर है जब यह सरकार आदिवासियों के कल्याण की बात शुरू करे, तो वह चिंता करने का वक्त होता है।
इस कड़ीमें सबसे हालिया चिंता के स्वर गृहमंत्री पी चिदंबरम की ओर से आए हैं। उन्होंने कहा है कि वह नहीं चाहते कि आदिवासी 'संग्रहालयी संस्कृति' का हिस्सा रहें। जब वह एक कॉरपोरेट वकील के अपने करियर में तमाम प्रमुख खनन कंपनियों के हितों को आवाज दे रहे थे, तब तो आदिवासियों का कल्याण उनकी प्राथमिकताओं में ऐसे नहीं आता था। इसलिए जरूरी है कि उनकी इस नई उत्तेजना के आधार को टटोला जाए।
पिछले तकरीबन पांच साल के दौरान छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने कॉरपोरेट घरानों के साथ कई खरब डॉलर के सैंकड़ों समझौतों पर दस्तखत किए हैं। स्टील प्लांट, स्पंज आयरन फैक्टरी, पावर प्लांट, एल्युमिनियम रिफाइनरी, बांधों और खदानों के लिए किए गए ये सारे समझौते गोपनीय हैं। इन्हें हरे नोटों में बदलने के लिए बेहद जरूरी है कि आदिवासियों को इन इलाकों से खत्म कर दिया जाए।
यह युद्ध, इसी के लिए है।
मेरे निकलने से एक दिन पहले मेरी मां ने कॉल किया। वह ऊंघते हुए बोली- ''मैं सोच रही थी, कि इस देश को एक अदद क्रांति की जरूरत है।''
रायपुर से दंतेवाड़ा तक का सफर करीब दस घंटे का है। इसमें उनइलाकों से होकर गुजरना पड़ता है जिन्हें 'माओवादी संक्रमित' कहा जाता है। ऐसे शब्द बेवजह नहीं बनाए गए। संक्रमण/संक्रमित जैसे शब्द बीमारी या कीटों के लिए इस्तेमाल में आते हैं। और बीमारियों को दूर किया ही जाना चाहिए। कीटों को खत्म करना ही पड़ता है। ठीक वैसे ही माओवादियों को साफ किया ही जाना होगा। बड़े चुपके से और अदृश्य तरीकों से नरसंहार की यह भाषा हमारी शब्दावली का हिस्सा बन चुकी है।
राजमार्ग को सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षा बलों ने दोनों ओर जंगलों की एक संकरी पट्‌टी को घेरा हुआ है। इसके पार 'दादा लोगों' का राज है यानी भाइयों का, कॉमरेडों का राज।
रायपुर के बाहरी इलाके में एक विशाल बिलबोर्ड पर वेदांता के कैंसर अस्पताल का विज्ञापन लगा है (वही कंपनी जिसमें कभी हमारे गृह मंत्री नौकरी करते थे)। उड़ीसा में, जहां वेदांता बॉक्साइट का खनन कर रही है, वह एक विश्वविद्यालय भी बना रही है। ऐसे ही चुपके से और अदृश्य तरीकों से खनन निगम हमारी कल्पनाओं में प्रवेश कर जाते हैं ऐसी उदार ताकतों के रूप में, जो वास्तव में हमारा खयाल रखते हों। कर्नाटक की हालिया लोकायुक्त रिपोर्ट के मुताबिक एक निजीकंपनी द्वारा खोदे गए एक टन लौह अयस्क के लिए सरकार को 27 रुपये की रॉयल्टी मिलती है और खनन कंपनी 5000 रुपये बनाती है। बॉक्साइट और अल्युमीनियम के क्षेत्र में तो हालत और भी बुरी है। ये अरबों डॉलर की दिनदहाड़े लूट की दास्तानें हैं। इतना तो चुनावों, सरकारों, जजों, अखबारों, टीवी चैनलों, एनजीओ और अनुदान एजेंसियों को खरीद लेने के लिए काफी है। ऐसे में यहां-वहां एकाध कैंसर अस्पताल बनवा देने में क्या जाता है?
मुझे याद नहीं कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा दस्तखत किए गए समझौतों की लंबी फेहरिस्त में वेदांता का नाम है या नहीं। लेकिन इतना तो शक होता ही है कि अगर यहां एक कैंसर अस्पताल है, तो पास में ही कहीं बॉक्साइट का कोई पहाड़ भी होगा।
हम कांकेर से गुजरते हैं, जो अपने जंगल युद्धकौशल और प्रति उग्रवाद प्रशिक्षण कॉलेज के लिए जाना जाता है। इसे ब्रिगेडियर बी. के. पंवार चलाते हैं, जो इस युद्ध के एक और प्यादे के रूप में भ्रष्ट पुलिसवालों को जंगल कमांडो में तब्दील करने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। युद्धकौशल प्रशिक्षण स्कूल का उद्‌देश पत्थरों पर रंगा हुआ है, ''एक गुरिल्ला से लड़ने के लिए गुरिल्ला बनो।''
काफीदेर हो चुकी थी। जगदलपुर सो चुका था, बस कुछेक होर्डिंगें जगमगा रही थीं जिनमें राहुल गांधी लोगों से यूथ कांग्रेस में आने का आह्‌वान करते दिख रहे थे। हाल के कुछ महीनों में वह दो बार बस्तर जा चुके हैं, लेकिन युद्ध के बारे में शायद उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा है। जनता के इस राजकुमार के लिए इस मसले पर कुछ भी कहना उसे मुश्किल में डाल सकता है। शायद उनके मीडिया प्रबंधकों ने ही उन्हें ऐसा करने से रोका होगा। राहुल गांधी का प्रचार अभियान इतनी सतर्कता से चलाया जा रहा है कि बलात्कार, हत्याओं, गांवों को जलाने और हजारों लोगों को उनके घरों से खदेड़ने के लिए जिम्मेदार सरकार प्रायोजित सेना सलवा जुड़ुम के कर्ताधर्ता कांग्रेसी विधायक महेंद्र कर्मा का नाम बीच में कहीं नहीं आ पाता।
मां दंतेश्वरी के मंदिर पर मैं समय से पहले ही पहुंच चुकी थी। मुझे नहीं पता था कि मुझे यहां क्या कहना है। उसने बताया कि उसका नाम मंगतू है। जल्द ही मैं जान गई कि जिस दंडकारण्य में मैं प्रवेश करने जा रही थी, वह ऐसे लोगों से अटा पड़ा था जिनके कई नाम थे और जिनकी पहचान अस्पष्ट थी। यह विचार मेरे लिए राहत से कम नहीं था, कि कुछदेर के लिए दूसरा बन जाना और अपनी पहचान से अलग होना कितना खूबसूरत होता होगा।
मंदिर से कुछ ही दूरी पर एक बस स्टैंड था। हम वहां पैदल पहुंचे। वहां पहले से ही काफी भीड़ थी। काफी तेजी से यहां चीजें बदलीं। बाइक पर दो व्यक्ति थे। कोई संवाद नहीं- बस आंखों में ही नमस्ते बंदगी हुई, हमने बाइक पर अपना वजन संभाला और चल दिए। मुझे कोई आइडिया नहीं था कि हम कहां जा रहे थे। रास्ते में पुलिस अधीक्षक का आवास पड़ा। मैं पिछली बार के अपने दौरे में इधर आई थी, सो मुझे पहचानने में दिक्कत नहीं हुई। वह स्पष्टवादी व्यक्ति था। उसने कहा था, ''देखिए मैडम, साफ-साफ कहूं तो यह समस्या पुलिस या सेना से हल नहीं होने वाली। इन आदिवासियों की दिक्कत यह है कि वे लालच नाम की चीज नहीं समझते। जब तक वे लालच को नहीं समझेंगे और खुद लालची नहीं बनेंगे, हमारे लिए कोई भी उम्मीद करना बेकार है। मैंने अपने अधिकारी से कहा है कि सुरक्षा बलों को हटा कर उसकी जगह हर घर में एक टीवी लगवा दीजिए। सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा।''
कुछ ही देर में हम चौड़े पाट वाली एक नदी के रेतीले किनारों पर पहुंच गए। यह बरसाती नदी थी। इसलिए अभी वहबची नहीं थी। चारों ओर रेत के बीच एक पतली सी धारा थी जिसमें टखने भर पानी था और उसे पार करना काफी आसान था। उस पार था 'पाकिस्तान'। उस एसपी ने मुझसे कहा था, ''मैडम, हमारे सिपाही उधर लोगों को जान से मार देते हैं।'' मुझे याद है कि हम जैसे ही उस पार जाने लगे, एक पुलिसवाले की राइफल का निशाना हमारी ओर ही था। इतने खुले में उन्हें पहचान पाना मुश्किल नहीं था। मंगतू को हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं भी उसी के पीछे हो ली।
उस पार हमारा इंतजार कर रहा था चंदू, जिसकी हलकी हरी शर्ट पर लिखा था हॉर्लिक्स! 'आंतरिक सुरक्षा का यह खतरा' कुछ उम्रदराज था। उसकी मुस्कराहट काफी प्यारी थी। उसके पास एक साइकिल थी, एक जेरी कैन जिसमें उबला पानी और मेरे लिए कई पैकेट ग्लूकोज के बिस्कुट, जो पार्टी ने भिजवाए थे। हमने अपनी सांस थाम कर चलना शुरू किया। उसकी साइकिल हमारा ध्यान बंटा रही थी। हालांकि रास्ता ऐसा था जिस पर साइकिल चलाना संभव नहीं था। पहाड़ों और पथरीले रास्तों पर चढ़ते-उतरते हम चलते गए। जब साइकिल चलाना मुश्किल हो जाता, तो चंदू उसे अपने सिर पर ऐसे उठा लेता जैसे कि उसका कोई वजन ही न हो।सूरज ढलते ही उनके कंधों पर लटके बैग बांग देने लगे। उनमें मुर्गे भरे थे जिन्हें बेचने वे बाजार ले गए थे, लेकिन बेच नहीं पाए थे।
अब कुत्तों के भौंकने की आवाजें आने लगी थीं। मैं कह नहीं सकती कि वे कितनी दूर थे। अब रास्ता मैदानी हो रहा था। मैंने नजरें चुरा कर आकाश की ओर देखा। खुला आकाश मुझे मदहोश करता है। मुझे उम्मीद थी कि हमारी मंजिल जल्द ही आने वाली है। चंदू ने कहा, हां। जल्दी यानी एक घंटे से भी ज्यादा। अब मुझे ढेर सारे पेड़ों की कतारे नजर आने लगी थीं। हम पहुंच चुके थे।
गांव काफी बड़ा था और मकान एक-दूसरे से काफी दूर बने थे। हम जिस घर में गए, वह काफी खूबसूरत था। आग जल रही थी, जिसके चारों ओर लोग बैठे थे। बाहर अंधेरे में उससे भी ज्यादा लोग थे। पता नहीं, कितने। उन्होंने अभिवादन किया, कॉमरेड लाल सलाम। मैंने भी जवाब दिया, लाल सलाम। मैं थक कर चूर हो चुकी थी। उस घर की महिला ने मुझे भीतर बुलाया। उसने मुझे खाने को रेड राइस के साथ हरी फलियों में पकी हुई चिकेन करी दी। जबर्दस्त खाना। उसकी बच्ची मेरे पास में ही सोई हुई थी और उसके चांदी के कड़े धधकती हुई आगमें चमक रहे थे।
हम सवेरे पांच बजे उठ गए। छह बजे तक हम निकल पड़े। एकाध घंटे के बाद एक और नदी हमने पार की। रास्ते में कुछ खूबसूरत गांव पड़े। हर गांव पर इमली के पेड़ों की छाया थी, इतने विशाल और विनम्र जैसे कि उन गांवों पर झुका हुआ हो कोई ईश्वर। यह थी बस्तर की मीठी इमली। ग्यारह बजते-बजते सूरज चढ़ चुका था। अब चलना सजा हो रहा था। दोपहर के खाने के लिए हम एक गांव में रुकते हैं। करीब दो बजे हम फिर से चल पड़ते हैं। इस गांव में हम दीदी से मिलने जा रहे हैं, दीदी यानी बहन कॉमरेड, जो हमें बताएंगी कि आगे क्या करना है। चंदू को नहीं पता कि आगे का सफर कैसा होगा। यहां सूचनाओं के भी स्तर होते हैं। हर व्यक्ति को हर चीज जानना जरूरी नहीं होता। जब हम वहां पहुंचते हैं तो दीदी नहंी मिलती। उसकी कोई खबर नहीं है। पहली बार मैं देखती हूं कि चंदू के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। मैं और भी चिंतित हो जाती हूं। मैं नहीं जानती कि लोग यहां एक-दूसरे से कैसे संपर्क करते हैं, अगर कुछ गड़बड़ हुई तो फिर क्या?
हम एक पुराने स्कूल के बाहर डेरा डालते हैं। यह गांव से कुछ दूर है। आखिर गांवों के सारे सरकारी स्कूलकंक्रीट के क्यों होते हैं जिनमें खिड़कियां स्टील शटर की तरह और दरवाजे भी स्टील के होते हैं, स्लाइड करने वाले? इन्हें भी गांव के घरों जैसा मिट्‌टी और फूस से क्यों नहीं बनाया जाता? ताकि इनका इस्तेमाल बैरक और बंकर की तरह भी हो सके। चंदू बताता है, ''अबूझमाड़ के गांवों में स्कूल ऐसे ही होते हैं...''। एक लकड़ी से वह जमीन पर स्कूल के भवन का नक्शा खींचता है- एक दूसरे से जुड़ी तीन अष्टकोणीय आकृतियां- बिल्कुल मधुमक्खी के छत्ते की तरह। वह बताता है, ''ताकि वे यहां से हर दिशा में गोली चला सकें।'' अपनी बात को समझाने के लिए वह बिल्कुल क्रिकेट के ग्राफिक की तरह तीर बनाता है। इन स्कूलों में कोई शिक्षक नहीं। चंदू बताता है कि वे सभी भाग गए। मैंने पूछा, 'कहीं तुम लोगों ने तो उन्हें नहीं खदेड़ दिया?' 'ना, हम सिर्फ पुलिस को खदेड़ते हैं।' वह पूछता है, 'जब शिक्षकों को घर बैठे ही तनखवाह मिल जाती है, तो वे यहां आने की जहमत क्यों उठाएंगे?' बात तो सही है!
वह बताता है कि यह हमारा 'नया इलाका' है। पार्टी हाल ही में यहां आई है।
तब तक करीब 20 युवा लड़के और लड़कियां आ जाते हैं। सभी किशोरवय के या 20 से30 के बीच में हैं। चंदू बताता है कि यह गांव की मिलिशिया है। माओवादी सैन्य क्रम की सबसे निचली कतार। मैंने पहले कभी ऐसी कोई सेना नहीं देखी। ये साड़ी और लुंगी में हैं, कुछ हरे रंग के कपड़े पहने हैं। सभी के पास भरमार है यानी मजल लोडिंग राइफल। कुछ के पास चाकू, कुल्हाड़ी, तीर-कमान भी है। एक के पास जिंदा मोर्टार भी है जिसे तीन फुट की जीआई पाइप से बनाया गया है। इसमें बारूद भरी है। यह चलने पर बहुत तेज आवाज करती है, लेकिन इसका इस्तेमाल एक ही बार किया जा सकता है। वे बताते हैं कि इसके बावजूद पुलिस इससे डरती है। ऐसा लगता नहीं कि इन लोगों के दिमाग में युद्ध के बारे में खयालात चलते होंगे, शायद इसलिए कि यह इलाका सलवा जुड़ुम के दायरे से बाहर है। इन्होंने दिन भर का काम पूरा कर लिया है। वे कुछ घरों के चारों ओर बाड़ लगा रहे थे ताकि खेतों में बकरियों को घुसने से रोका जा सके। इनमें काफी उत्सुकता और उत्साह है। लड़कियां यहां लड़कों के साथ काफी सहज और आत्मविश्वास में दिखती हैं। और इन चीजों को पकड़ने में मैं बहुत तेज हूं। मुझे यह देखकर अच्छा लगता है। चंदू बताता है कि इनका काम गश्त लगाना है औरचार-पांच गांवों की सुरक्षा करना है, खेतों की रक्षा करना है, उनके घरों की मरम्मत करना और कुओं को साफ करना है- यानी जो भी जरूरत पड़े उसे पूरा करना है।
दीदी अब तक नहीं आई। अब क्या किया जाए? कुछ नहीं। इंतजार कीजिए और तब तक सब्जियां काटने और छीलने में मदद कीजिए।
रात के खाने के बाद सभी कतार में चल देते हैं। हम सब कुछ साथ लेकर बढ़ते हैं- चावल, सब्जियां, हांडी और बरतन। हम स्कूल परिसर को छोड़ चुके हैं। आधे घंटे से भी कम समय में हम एक सुरक्षित छांव में पहुंच जाते हैं। यहां हमें सोना है। निस्तब्ध शांति है। मिनट भर के भीतर हर कोई अपनी झिल्ली (नीली प्लास्टिक की चादर, जिसके बगैर क्रांति संभव नहीं) बिछा चुका है। चंदू और मंगतू एक में ही काम चला लेते हैं और मुझे एक अलग झिल्ली दी जाती है। मेरे लिए सबसे अच्छी जगह वे खोज निकालते हैं सोने के लिए, एक पत्थर के किनारे। चंदू ने दीदी को संदेश भेज दिया है। यदि उसे वह मिल गया, तो सवेरे वह यहां आ जाएगी। बशर्ते संदेश उस तक पहुंचे।
अब तक मैं जितने कमरों में सोयी हूं, यह सबसे खूबसूरत कमरा है। हजार स्टार वाले होटल में मेरा निजी सुइट। और मैं घिरीहूं इन अद्‌भुत, खूबसूरत बच्चों से, जिनके हाथों में हथियार हैं। ये सभी निश्चित तौर पर माओवादी ही हैं। तो क्या ये मरने जा रहे हैं? क्या जंगल युद्धकौशल प्रशिक्षण स्कूल इन्हीं को मारने के लिए बनाया गया है? ये सारे हेलीकॉप्टर गनशिप, थर्मल इमेजिंग और लेजर रेंज फाइंडर क्या इन्हीं के लिए हैं?
सब सो चुके हैं, सिवाय इन संतरियों के, जो डेढ़ घंटे की पाली में सोते हैं। मेरी नजर तारों पर जाती है। जब मैं बच्ची थी, तो मीनाचल नदी के किनारे सूरज ढलते ही शुरू होने वाली झींगुरों की आवाज को मैं तारों की पुकार समझती थी, जैसे वे टिमटिमाने की तैयारी कर रहे हों। मुझे भरोसा नहीं हो रहा कि आखिर इस जगह से मुझे कितना प्यार हो गया है। दुनिया में इससे प्यारी और कोई जगह शायद नहीं होगी, जहां मैं होना चाहूंगी। आज रात मुझे क्या होना चाहिए? तारों की चादर के नीचे, कामरेड राहेल? खैर, दीदी कल आ जाएंगी।
वे दोपहर से पहले आ पहुंचे। कुछ दूरी पर मैं उन्हें देख पा रही हूं। करीब 15 थे, सभी हरी वर्दी में, हमारी ओर दौड़ कर आते हुए। जिस तरह से वे दौड़ रहे थे, मैं उन्हें देख कर समझ सकती थी कि वे मजबूत लोगहैं। जन मुक्ति गुरिल्ला सेना के लोग। वही, जिनके लिए थर्मल इमेजिंग और लेजर निर्देशित रायफलें हैं, जिनके लिए जंगल युद्धकौशल प्रशिक्षण स्कूल बनाया गया है।
कैंप तक पहुंचने में कुछ घंटे और लगेंगे। पहुंचते-पहुंचते अंधेरा हो चुका है। यहां संतरियों और गश्ती सैनिकों के कई स्तर हैं। शायद दो कतारों में करीब सौ कामरेड होंगे। सभी के पास हथियार हैं। और चेहरों पर मुस्कान। वे गाना शुरू करते हैं, 'लाल लाल सलाम, लाल लाल सलाम, आने वाले साथियों को लाल लाल सलाम। वे काफी मीठा गाते हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी नदी या महकते हुए जंगल पर यह कोई लोकगीत हो। गीत के साथ अभिवादन, हाथ मिलाना और बंधी मुटि्‌ठयां। सभी एक-दूसरे का अभिवादन करते हुए कहते हैं- लाल सलाम, लाल सलाम।
कैंप के नाम पर यहां 15 वर्ग फुट में बिछी हुई नीली झिल्ली के अलावा कुछ नहीं दिखता। छत भी झिल्ली की ही है। रात में मेरा कमरा यही होगा। शायद इतने दिनों तक पैदल चलने के बदले यह मेरा पुरस्कार था, या फिर आगे जो पड़ने वाला है, उसके बदले मुझे बहलाया जा रहा था। हो सकता है दोनों ही बातें रही हों। खैर, शायद इस सफर में यह आखिरी रातथी जब मेरे सिर पर छत थी। रात के खाने पर मुझे मिलती हैं कॉमरेड नर्मदा- क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन की प्रमुख (इनके सिर पर ईनाम है); पीएलजीए की कॉमरेड सरोजा जो अपनी एसएलआर जितनी ही लंबी हैं; कॉमरेड मासे (गोंडी भाषा में इसका अर्थ होता है काली लड़की), जिनके सिर पर भी ईनाम घोषित है; तकनीक पारंगत कॉमरेड रूपी; कॉमरेड राजू, जो उस डिवीजन के प्रमुख हैं जिसमें हम लोग चल रहे थे; और कॉमरेड वेणु (या कॉमरेड मुरली, सोनू, सुशील- आप उन्हें जो कहना चाहें), जो सबसे वरिष्ठ हैं। हो सकता है केंद्रीय कमेटी में हों, पोलित ब्यूरो में भी हो सकते हैं। मुझे बताया नहीं जाता। मैं पूछती भी नहीं। हमारे बीच में गोंडी, हलबी, तेलुगु, पंजाबी और मलयालम में बात हो रही है। सिर्फ मासे अंग्रेजी बोलती है। (इसीलिए हम तय करते हैं कि हम हिंदी में ही बात करेंगे)। कॉमरेड मासे लंबी है, शांत है और ऐसा लगता है कि संवाद में शामिल होने में उसे काफी दिक्कत हो रही हो। लेकिन जिस तरह से उसने मुझे गले लगाया, मैं निश्चित तौर पर कह सकती हूं कि वह आदमी को पहचानना जानती है। जंगल में किताबें न मिलना उसे बहुत अखरताहै। जब उसे मुझ पर पूरा भरोसा हो जाएगा, शायद तब वह मुझे अपनी पूरी कहानी बताएगी।
जैसा कि इस जंगल में अकसर होता है, बुरी खबर अचानक आई एक दौड़ते हुए व्यक्ति के साथ, जिसके पास बिस्कुट थे और छोटे-छोटे मुड़े हुए कागज के टुकड़ों पर कुछ लिखा हुआ था। ये टुकड़े एक बैग में ऐसे भरे थे जैसे चिप्स हों। हर जगह की खबर। ओंगनार गांव में पुलिस ने पांच लोगों को मार दिया है। इनमें चार मिलिशिया के हैं और एक आम ग्रामीण। संथु पोट्‌टाई (25), फूलो वाड्‌डे (22), कांडे पोट्‌टाई (22), रामोली वाड्‌डे (20), दलसाई कोराम (22)। हो सकता है ये सभी वे बच्चे हों जो पिछली रात तारों से नहाई हमारी डॉर्मिटरी का हिस्सा थे।
फिर अच्छी खबर आती है कुछ लोगों के झुंड के साथ, जिसमें एक मोटा युवक भी है। वह भी उन्हीं के कपड़ों में है, लेकिन वे नए हैं। सभी उसके कपड़ों की बड़ाई करते हैं कि वे कितने फिट हो रहे हैं। वह शर्माता भी है और खुश भी होता है। वह एक डॉक्टर है जो अभी-अभी जंगल में कॉमरेडों के साथ रह कर काम करने आया है। पिछली बार दंडकारण्य में जब कोई डॉक्टर आया था, तो इस बात को बरसोंबीत गए।
मुुझे कॉमरेड कमला से मिलवाया जाता है। मुझे हिदायत दी जाती है कि मैं उसे बिना साथ लिए अपनी झिल्ली से पांच फीट दूर भी न जाऊं। क्योंकि अंधेरे में कोई भी रास्ता भूल कर गुम हो सकता है। (मैं उसे जगाती ही नहीं, बिल्कुल लट्‌ठ की तरह पड़ी रहती हूं)। सुबह कमला मुझे पॉलीथिन का बना एक पीला पैकेट देती है जिसका एक कोना फटा हुआ था। यह अबिस गोल्ड रिफाइंड सोया तेल का पैकेट था, जो अब शौच में मेरे मग के रूप में काम आने वाला था। क्रांति की राह में कुछ भी बरबाद नहीं जाता।
(अब भी कॉमरेड कमला के बारे में मैं लगातार, रोजाना सोचती रहती हूं। वह सतरह बरस की है। उसके पीछे एक देसी पिस्तौल लटकी रहती है। और उसकी मुस्कान तो गजब है। फिर भी अगर पुलिस से कभी सामना हो गया, तो वे उसे मार डालेंगे। वे पहले शायद उसकी इज्जत लूटेंगे। उससे कोई सवाल नहीं किया जाएगा। क्योंकि वह 'आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा' है)।
दंडकारण्य को अंग्रेज गोंडवाना कहते थे, यानी गोंडो की धरती। आज इस जंगल से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमाएं जुड़ती हैं। समस्याग्रस्त लोगों को अलग-अलग प्रशासनिकइकाइयों में बांटना तो पुरानी तरकीब है। लेकिन ये माओवादी और गोंड राजकीय सीमाओं जैसी चीजों पर बहुत ध्यान नहीं देते। उनके दिमाग में तो अलग नक्शा चल रहा होता है। और जंगल के जीवों की तरह उनके रास्ते भी अलग होते हैं। इनके लिए सड़कें चलने के लिए नहंी बनीं। वे तो सिर्फ पार करने के लिए हैं, और धीरे-धीरे ऐसा चलन बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि वहां सेना तैनात होती है। कोया ओर दोरला जनजातियों में बंटे गोंड यहां बहुसंखय हैं, हालांकि दूसरे आदिवासी समुदायों की भी यहां रिहाइश है। गैर-आदिवासी बसावट सिर्फ जंगलों के किनारे सड़कों और बाजारों के पास है।
पीडब्ल्यूजी के लोग दंडकारण्य में आने वाले पहले प्रचारक नहीं थे। प्रसिद्ध गांधीवादी बाबा आम्टे ने 1975 में वरोरा में कुष्ठ आश्रम और अस्पताल खोला था। अबूझमाड़ के सुदूर गांवों में रामकृष्ण मिशन ने ग्रामीण स्कूल खोलने शुरू किए थे। उत्तरी बस्तर में बाबा बिहारी दास ने 'आदिवासियों को वापस हिंदू बनाने' के लिए एक आक्रामक अभियान शुरू किया था, जिसके तहत आदिवासी संस्कृति को नष्ट कर उनमें हिंदू धर्म की सबसे बड़ी नेमत जाति को उनके भीतर प्रवेश करायाजाना था। शुरू में जिन्होंने धर्म बदला- गांवों के मुखिया और बड़े जमींदार- सलवा जुड़ुम के संस्थापक महेंद्र कर्मा जैसे लोग, उन्हें द्विज ब्राह्‌मण की उपाधि दी गई। (जाहिर तौर पर यह एक घपला ही था, क्योंकि कोई भी ब्राह्‌मण नहीं बन सकता। ऐसा ही होता तो हम अब तक ब्राह्‌मणों के देश बन चुके होते)। लेकिन इस नकली हिंदूवाद को आदिवासियों के लिए पर्याप्त माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे हर नकली चीज- बिस्कुट, साबुन, माचिस और तेल- जो गांवों के बाजारों में मिलती है। हिंदुत्व के इस अभियान ने भूमि रिकॉर्ड में गांवों के नामों को बदल दिया। अब इन गांवों के दो नाम हैं, एक जनता का दिया नाम और दूसरा सरकारी नाम। मसलन, इन्नार गांव को चिन्नारी बना दिया गया। मतदाता सूची में आदिवासियों के नाम बदल कर हिंदू नाम बना दिए गए। (मासा कर्मा बन गए महेंद्र कर्मा)। जिन्होंने हिंदू बनना स्वीकार नहीं किया, उन्हें 'कटवा' कह दिया गया (यानी अछूत), जो बाद में माओवादियों के स्वाभाविक समर्थक बन गए।
पीडब्ल्यूजी ने अपना काम सबसे पहले दक्षिणी बस्तर और गढ़चिरौली में शुरू किया। कॉमरेड वेणु उन शुरुआती महीनों के बारे में विस्तार सेबताते हैं: कि गांव वाले कैसे उनसे भय खाते थे और अपने घरों में इन्हें घुसने नहीं देते। कोई उन्हें खाना-पानी नहीं देता। पुलिस ने अफवाह फैला दी थी कि वे चोर हैं। डर कर महिलाओं ने अपने जेवर लकड़ी के चूल्हे की राख में छुपा दिए। बड़े पैमाने पर इनका दमन किया गया। नवंबर 1980 में पुलिस ने गढ़चिरौली में एक गांव की सभा पर गोलीबारी की जिसमें तकरीबन समूचा स्क्वाड ही मारा गया। यह दंडकारण्य की पहली 'फर्जी मुठभेड़' थी। यह बहुत बड़ा झटका था जिसके चलते कॉमरेड गोदावरी के उस पार अदीलाबाद लौट गए। लेकिन 1981 में वे फिर लौटे। उन्होंने इस बार आदिवासियों को तेंदू पत्ता के दाम बढ़ाने के मुद्‌दे पर संगठित करना शुरू किया। उस वक्त व्यापारी 50 पत्तों के एक बंडल का तीन पैसा देते थे। इस किस्म की राजनीति से बिल्कुल अनजान लोगों को इस मुद्‌दे पर संगठित कर के हड़ताल आयोजित करवाना अपने आप में एक बड़ा काम था। आखिरकार हड़ताल कामयाब हुई और मजदूरी को बढ़ा कर छह पैसे बंडल कर दिया गया। लेकिन पार्टी की असली कामयाबी एकता की ताकत का प्रदर्शन था कि कैसे राजनीतिक सौदेबाजी करने का यह एक नया तरीका हो सकता है। आज तमामहड़तालों और प्रदर्शनों के सिलसिले के बाद एक बंडल की मजदूरी एक रुपया मिलती है। (मौजूदा दरों पर इसकी संभावना कम ही लगती है, लेकिन तेंदू पत्तों का कारोबार सैंकड़ों करोड़ रुपये का होता है)। हर सीजन में सरकार ठेके देती है और ठेकेदारों को एक निश्चित मात्रा में तेंदू पत्ता इकट्‌ठा करने की मंजूरी देती है- जो 1500 से 5000 मानक बोरे के बीच हो सकती है। हर मानक बोरे में करीब 1000 बंडल होते हैं (यह पता करने का कोई तरीका नहीं कि ठेकेदार इससे ज्यादा बंडल न निकालते हों)। बाजार में आते ही तेंदू पत्ता किलो में बिकने लगता है। बंडल को मानक बोरों और फिर किलो में बदलने वाली गणित पर पूरी तरह ठेकेदारों का नियंत्रण होता है और उनके पास इसमें हेर-फेर करने की पर्याप्त गुंजाइश रहती है। मामूली आकलन के हिसाब से भी एक ठेकेदार के पास हर मानक बोरे पर 1100 रुपये बचते हैं, वो भी पार्टी को हर बोरे पर 120 रुपये का कमीशन देने के बाद। इस हिसाब से एक छोटा ठेकेदार (1500 बोरे) एक सीजन में करीब 16 लाख रुपये बना लेता है और बड़ा ठेकेदार (5000 बोरे) कम से कम 55 लाख रुपये। वास्तविक राशि इसकी कई गुना हो सकती है। इस पूरेकारोबार में 'आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक' लोगों को सिर्फ इतना मिल पाता है कि वे अगले सीजन तक जिंदा रह सकें।
अचानक इस बातचीत में सबकी हंसी से खलल पड़ता है। पीएलजीए का एक कॉमरेड निलेश काफी तेजी से खाना पकाने वाली जगह की और दौड़ता हुआ आ रहा था। वह रह-रह कर खुद को मार भी रहा था। वह पास आया तो मैंने देखा कि उसके ऊपर लाल चींटियों का पत्ते वाला एक घोंसला था। चींटिया उसके पूरे शरीर पर रेंग गई थीं और हाथ व गले में काट रही थीं। निलेश खुद भी हंस रहा था। कॉमरेड वेणु ने पूछा, ''क्या आपने कभी चींटियों की चटनी खाई है?'' मैं लाल चीटियों से खूब वाकिफ हूं, केरल में बीते अपने बचपन से ही। उन्होंने मुझे काटा भी है, लेकिन मैंने कभी उन्हें चखा नहीं।
निलेश बीजापुर से है, जो सलवा जुड़ुम का केंद्र है। उसका छोटा भाई सलवा जुड़ुम में चला गया। उसे एसपीओ बना दिया गया है। वह अपनी मां के साथ बसागुड़ा कैंप में रहता है। उसके पिता ने साथ जाने से मना कर दिया। वह गांव में ही रुक गए। बाद में जब मुझे निलेश से बात करने का मौका मिला, तो मैंने पूछा कि उसका भाई सलवा जुड़ुम केसाथ क्यों चला गया। ''वह बहुत छोटा था। उसे लोगों को लूटने और घरों को जलाने का जब मौका मिला तों उसे बहुत मजा आने लगा। वह सनक गया। अब वह फंस चुका है। वह कभी गांव वापस नहीं आ सकता। उसे माफ नहीं किया जाएगा। और यह बात वह जानता है।''
हम इतिहास के अपने सबक पर लौट आए। कॉमरेड वेणु ने बताया कि पार्टी का अगला बड़ा संघर्ष बल्लारपुर पेपर मिल्स के खिलाफ था। सरकार ने थापर कंपनी को काफी रियायती दरों पर 1.5 लाख टन बांस निकालने का ठेका 45 साल के लिए दे दिया था (बॉक्साइट की तुलना में यह छोटा धंधा है, फिर भी इस इलाके में पर्याप्त है)। आदिवासियों को एक बंडल के लिए 10 पैसे मिल रहे थे- एक बंडल में बांस के 20 तने होते हैं (थापर इससे कितना मुनाफा कमा रहा था, यह बताने के लोभ में मैं नहीं पड़ना चाहती)। लंबे समय तक चले आंदोलन, हड़ताल, फिर पेपर मिल के अधिकारियों के साथ सबके सामने खुली बातचीत के बाद दाम को बढ़ा कर तीस पैसे कर दिया गया। आदिवासियों के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी। दूसरी राजनीतिक पार्टियों ने वादे तो किए थे, लेकिन पूरे करने के कोई संकेत नहीं दिए। इसके बाद लोग पीडब्ल्यूजी के पासउसमें शामिल होने के लिए आने लगे।
सात स्क्वाड की टीम ने काफी लंबा रास्ता अब तय कर लिया था। इसका प्रभाव अब 60,000 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र, हजारों गांवों और लाखों लोगों के बीच था।
लेकिन वन विभाग का खात्मा पुलिस के आने का सबब बन गया था। अब खून-खराबे का सिलसिला चल निकला। पुलिस की फर्जी मुठभेड़, पीडब्ल्यूजी का घेराव। जमीन के पुनर्वितरण के बाद दूसरी जिम्मेदारियां भी आ गईं: सिंचाई, खेती की पैदावार और आबादी बढ़ने की समस्या, जिसके चलते जंगल भूमि साफ होती जा रही थी। इसके बाद 'जन कार्रवाई' और 'सैन्य कार्रवाई' को अलग करने का फैसला लिया गया।
लोहंडीगुड़ा, जहां महज पांच घंटे में गाड़ी चला कर दंतेवाड़ा से पहुंचा जा सकता है, कभी भी नक्सली इलाका नहीं था। लेकिन आज है। कॉमरेड जूरी उसी इलाके में काम करती है। मैं चींटियों की चटनी खा रही थी, तब वह मेरे बगल में ही बैठी थी। वह बताती है कि उन्होंने वहां तब जाने का फैसला किया जब गांवों की दीवारों पर लोग रंगने लगे, नक्सली आओ, हमें बचाओ। कुछ ही महीने पहले ग्राम पंचायत अध्यक्ष विमल मेश्राम को सरे बाजार गोली मार दी गई थी। जूरी कहती है, ''वहटाटा का आदमी था। वह लोगों पर जमीन देकर मुआवजा लेने का जबरन दबाव बना रहा था। ठीक ही हुआ कि वह खत्म हो गया। हमारा भी एक कॉमरेड हालांकि चला गया। उन्होंने उसे गोली मार दी। आप और चपोली लेंगी?'' वह सिर्फ 20 बरस की है। ''हम टाटा को वहां नहीं आने देंगे। लोग नहीं चाहते कि वे आएं।'' जूरी पीएलजीए की नहीं है। वह पार्टी की सांस्कृतिक इकाई चेतना नाट्‌य मंच में है। वह गाती है। गीत भी लिखती है। अबूझमाड़ की रहने वाली है। (उसने कॉमरेड माधव से ब्याह किया है। माधव जब मंच की टुकड़ी के साथ गाते हुए उसके गांव आए थे, तो उसे उनसे प्रेम हो गया था)।
मुझे लगा कि अब कुछ कहना चाहिए। हिंसा की व्यर्थता के बारे में, या फिर जान से मार देने के संक्षिप्त फैसलों पर। लेकिन मैं उन्हें क्या करने को कहती? कि वे अदालत में जाएं? या दिल्ली में जंतर-मंतर पर धरना करें? रैली निकालें? या फिर आमरण अनशन पर बैठ जाएं? अजीब हास्यास्पद बात होती। नई आर्थिक नीति के प्रचारकों से- जिनके लिए यह कहना काफी आसान होता है कि ''देयर इज नो आल्टरनेटिव''- पूछा जाना चाहिए कि वे एक वैकल्पिक प्रतिरोध नीति भी सुझाएं। बिल्कुल इन लोगों के हिसाब से,जो इस जंगल के हिसाब से फिट बैठती हो। अभी, इसी वक्त। आखिर ये लोग किस पार्टी को वोट दें? इस देश की किस लोकतांत्रिक सस्था के पास ये गुहार लगाएं? आखिर ऐसा कौन सा दरवाजा बचा है जो नर्मदा बचाओ आंदोलन ने बड़े बांधों के खिलाफ अपने बरसों से चल रहे संघर्ष के दौरान ना खटखटाया हो?
अब अंधेरा हो चुका था। कैंप में काफी चहल-पहल थी, लेकिन मैं कुछ नहीं देख पा रही थी। बस कुछ प्रकाश बिंदु हरकत करते से दिख रहे थे। कह पाना मुश्किल है कि वे तारे थे, पतंगे या फिर माओवादी। अचानक नन्हा मंगतू प्रकट होता है। मुझे पता चलता है कि वह यंग कम्युनिस्ट्‌स मोबाइल स्कूल की पहली पीढ़ी का सदस्य है, जिन्हें साम्यवाद के बुनियादी सिद्धांतों को पढ़ना, लिखना और समझना सिखाया जा रहा है (जिसको लेकर हमारा कॉरपोरेट मीडिया भौंकता रहता है, ''युवा मस्तिष्कों का सैद्धांतीकरण''। जो टीवी विज्ञापन बच्चों के कुछ सोचने-समझने के काबिल होने से पहले ही उनका ब्रेनवॉश कर देते हैं, उसे सैद्धांतीकरण के रूप में नहीं देखा जाता)। किशोर कम्युनिस्टों को न तो बंदूक रखने दी जाती है और न ही वर्दी पहननी होती है। लेकिन वे पीएलजीए के दस्तोंके साथ अपनी आंखों में तारों की चमक लिए बिल्कुल किसी रॉक बैंड की तरह चलते रहते हैं।
हमारे चलने से पहले कॉमरेड वेणु पास आते हैं, ''तो ठीक है कॉमरेड, मैं इजाजत चाहूंगा।'' मुझे एकबारगी झटका लगता है। एक गर्म टोपी और चप्पलों में वह एक छोटे से कीड़े की भांति लग रहे थे, अपने तीन महिला और तीन पुरुष गार्डों से घिरे हुए। सभी हथियारों से लैस थे। उन्होंने कहा, ''कॉमरेड हम आपके बहुत आभारी हैं कि आप इतनी दूर से यहां तक आईं।'' एक बार फिर हम हाथ मिलाते हैं और भिंची मुटि्‌ठयां लहराती हैं- ''कॉमरेड, लाल सलाम।'' वह जंगलों में कहीं गुम हो जाते हैं। उनके पास इन जंगलों की चाबी है। एक पल में ऐसा लगता है कि जैसे वे यहां कभी थे ही नहीं। मैं कुछ देर के लिए असहाय सी हो गई थी, लेकिन मेरे पास सुनने के लिए उनकी घंटों की रिकॉर्डिंग है। और जैसे-जैसे ये दिन हफ्‌तों में बदलते जाएंगे, मैं ऐसे तमाम लोगों से मिलूंगी जो उस खांचे में रंग और शब्द भरेंगे जो उन्होंने मेरे लिए बनाया है। अब हम उल्टी दिशा में चलने लगे। कॉमरेड राजू, जिनके शरीर से एक मील दूर से ही आयोडेक्स महक रहा था, मुस्कुराकर कहते हैं, ''मेरे घुटने तो गए। अब तो मैं मुट्‌ठी भर पेनकिलर लेकर ही चल पाऊंगा।''
कॉमरेड राजू बिल्कुल सही हिंदी बोलते हैं और मनोरंजक किस्से एकदम मारक तरीके से सुनाते हैं। वे रायपुर में 18 साल तक वकालत कर चुके हैं। वह और उनकी पत्नी दोनों ही पार्टी में थे और पार्टी के शहरी नेटवर्क का हिस्सा थे। 2007 के अंत में रायपुर नेटवर्क का एक अहम व्यक्ति गिरफ्‌तार हो गया, उसे प्रताड़ित किया गया और अंत में मुखबिर बना दिया गया। उसे पुलिस ने एक बंद वाहन में बैठाकर रायपुर का चक्कर लगवाया और पुराने साथियों की निशानदेही करने को कहा। कॉमरेड मालती इन्हीं में से एक थीं। 22 जनवरी 2008 को उन्हें कई अन्य के साथ गिरफ्‌तार किया गया। उनके खिलाफ आरोप है कि उन्होंने सलवा जुडुम में किए गए अत्याचार के वीडियो वाली सीडी कई सांसदों को भेजी थी। उनका मामला कभी-कभार ही सुनवाई के लिए आता है क्योंकि पुलिस जानती है कि मुकदमा कमजोर है। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम के तहत पुलिस के पास उन्हें बगैर जमानत के बरसों तक अंदर रखने की छूट मिली हुई है। कॉमरेड राजू कहते हैं, ''अब सरकार ने छत्तीसगढ़ पुलिस कीतमाम टुकड़ियां तैनात कर दी हैं ताकि बेचारे सांसदों की उन्हें भेजी गई चिटि्‌ठयों से सुरक्षा की जा सके।'' वह नहीं पकड़ा गया क्योंकि उस वक्त वह एक बैठक में दंडकारण्य आया हुआ था। तब से वह यहीं है। उसके दो छोटे बच्चे जो घर पर अकेले रह गए थे, पुलिस ने उनसे बहुत पूछताछ की। आखिरकार, ये बच्चे एक अंकल के साथ रहने चले गए और समूची गृहस्थी ही उठ गई। कॉमरेड राजू को कुछ ही हफ्‌तों पहले पहली बार अपने बच्चों की खबर मिली। आखिर, उनके पास अपनी हंसी को बचाए रखने की ताकत और क्षमता कहां से आती है? जितना इन्होंने झेला है, उसके बाद भी ये क्यों लगातार आगे बढ़ पा रहे हैं? जाहिर है, पार्टी के लिए उनका प्यार, आस्था और एक उम्मीद इसके पीछे है। मेरा बार-बार तमाम निजी तरीकों से और कहीं ज्यादा गहराई में इस तथ्य से साक्षात्कार होता है। अब हम सब एक साथ चल रहे हैं जहां मैं हूं और साथ हैं एक सौ ''विवेकहीन रूप से हिंसक'' खून के प्यासे अतिवादी। कैंप छोड़ने से पहले मैंने एक नजर चारों ओर देखा था। एक भी निशान नहीं था इस बात का कि यहां करीब सौ लोगों ने डेरा डाला था, सिवाय राख के जहां आग जलाई गई थी। मुझे इससेना पर सहज भरोसा नहीं होता। जहां तक उपभोग का सवाल है, यह किसी भी गांधीवादी से ज्यादा गांधीवादी है और जलवायु परिवर्तन पर उपदेश देने वालों के मुकाबले कार्बन उत्सर्जन के मामले में सबसे आदर्श। लेकिन, फिलहाल तो विनाशकारी कामों में भी यह गांधीवादी रणनीति ही अपनाती है। मसलन, किसी पुलिस वाहन को जलाने से पहले उसके एक-एक हिस्से को तोड़ कर अलग कर लिया जाता है। स्टीयरिंग को सीधा करके भरमार बना ली जाती है, रेक्सीन को फाड़ कर हथियार रखने वाला पाउच और बैटरी को सोलर चार्जिंग में इस्तेमाल किया जाता है (अब हाईकमान से निर्देश आए हैं कि कब्जाए गए वाहनों को जलाया न जाए बल्कि दफना दिया जाए, ताकि जब जरूरत पड़े उन्हें दुरुस्त किया जा सके)।
अब हम घुप्प अंधेरे और मुर्दा शांति में चले जा रहे हैं। अकेली मैं हूं जो टॉर्च का इस्तेमाल कर रही हूं, वह भी नीचे की ओर ताकि हद से हद उसकी रोशनी में मुझे कॉमरेड कमला के पैर दिखते रह सकें और मैं जान सकूं कि मुझे कहां कदम रखना है। वह मुझसे 10 गुना ज्यादा वजन उठा रही है। अपना बैकपैक, राइफल, सिर पर रसद का एक भारी बैग, खाना पकाने वाला एक बर्तन और दोनों कंधोंपर सब्जियों से भरे हुए झोले। उसके सिर पर रखा बैग जबरदस्त तरीके से संतुलित है और वह उन्हें बगैर हाथ लगाए ढलानों और फिसलनदार पथरीले रास्तों पर उतर सकती है। यह एक चमत्कार है। हम काफी लंबा चल चुके हैं। मैं इतिहास के अपने सबक की आभारी हूं क्योंकि उन तमाम चीजों के अलावा जो उससे मुझे मिलीं, कम से कम पूरे एक दिन मेरे पैरों को पूरा आराम मिला। जंगल में रात में पैदल चलना शायद सबसे खूबसूरत चीज है।
और अब मैं हर रात यही करने जा रही हूं।
नया दिन। नई जगह। महुआ के विशाल पेड़ों तले उसिर गांव के बाहरी इलाके में हमने कैंप किया है। महुआ में अभी-अभी फूल आने शुरू हुए हैं और जंगल की छाती पर उसके मटमैले हरे ये फूल गहनों की तरह चू रहे हैं। हवा में इसकी मादकता घुली हुई है जो सिर पर चढ़ रही है। हम भाटपाल स्कूल के बच्चों का इंतजार कर रहे हैं। ओंगनार की मुठभेड़ के बाद इसे बंद कर दिया गया था और अब यह पुलिस कैंप बन चुका है। बच्चों को घर भेज दिया गया। यही हाल नेलवाड़, मूंजमेट्‌टा, एडका, वेदोमकोट और धनोरा का है।
भाटपाल स्कूल के बच्चे नहीं आते।
मोस्ट वांटेड कॉमरेड नीति और कॉमरेडविनोद हमें एक लंबी सैर पर ले जाते हैं जहां वे हमें स्थानीय जनताना सरकार द्वारा बनाए गए जल संग्रहण के ढांचे और सिंचाई तालाब दिखाते हैं। कॉमरेड नीति तमाम कृषि समस्याओं के बारे में बताती हैं। यहां सिर्फ दो फीसदी जमीन सिंचित है। दस साल पहले तक तो अबूझमाड़ में जुताई के बारे में सुना तक नहीं गया था। दूसरी ओर, गढ़चिरौली में संकर बीज और रासायनिक कीटनाशक तक घुस आए हैं। कॉमरेड विनोद कहते हैं, ''हमें अपने कृषि विभाग में तत्काल मदद की जरूरत है। हमें ऐसे लोग चाहिए जो बीज, जैविक खाद आदि के बारे में जानते हों। जरा सी मदद से हम बहुत कुछ कर ले जाएंगे।''
जनताना सरकार के इस इलाके के प्रमुख किसान हैं कॉमरेड रामू। वह काफी गर्व से अपने खेत दिखाते हैं जहां चावल, बैंगन, गोंगुरा, प्याज, कोलराबी उगाए गए हैं। इसके बाद उतने ही गर्व से वह हमें बहुत विशाल, लेकिन पूरी तरह सूखा हुआ एक सिंचाई तालाब दिखाते हैं। ये क्या है? ''इसमें बरसात में भी पानी नहीं होता। दरअसल, यह गलत जगह खोदा गया है।'' यह कहते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है, ''यह हमारा नहीं है, इसे लूटी सरकार ने खोदा है।'' यहां दो समानांतरसरकारें हैं। जनताना सरकार और लूटी सरकार यानी लुटेरों की सरकार।
मुझे कॉमरेड वेणु याद आते हैं: वे हमें सिर्फ इसलिए नहीं कुचलना चाहते कि उन्हें खनिज चाहिए, बल्कि इसलिए कि हम दुनिया को एक वैकल्पिक मॉडल दे रहे हैं।
हालांकि अब तक यह कायदे से विकल्प नहीं बन सका है- बंदूक के साथ ग्राम स्वराज का विचार। यहां जबरदस्त भुखमरी है, ढेरों बीमारियां हैं। इसके बावजूद इसने विकल्प की संभावनाएं तो पैदा की ही हैं। पूरी दुनिया के लिए नहीं, न अलास्का के लिए, न ही नई दिल्ली के लिए और शायद समूचे छत्तीसगढ़ के लिए भी नहीं- सिर्फ अपने लिए। दंडकारण्य के लिए। और यह दुनिया का सबसे गूढ़ और गोपनीय रहस्य है। इसने अपने विनाश के एक विकल्प की नींव रखी है। इसने इतिहास को झुठलाया है। तमाम कठिनाइयों के बावजूद इसने अपने वजूद का एक खाका तैयार कर ही लिया। और आज इसे जरूरत है सहयोग की। इस जगह को डॉक्टर चाहिए, शिक्षक चाहिए, किसान चाहिए।
यहां युद्ध नहीं चाहिए।
लेकिन अगर इसे इन सबकी जगह सिर्फ युद्ध मिलता है, तो यह पलट कर मारेगा।
अगले कुछ दिनों के दौरान मेरी मुलाकात केएएमएस के नेताओं से होती है। जनताना सरकार के कई पदाधिकारी,दंडकारण्य आदिवासी किसान-मजदूर संगठन के सदस्यों समेत मैं मारे गए लोगों के परिवारों से भी मिलती हूं। और उन आम लोगों से भी, जो इतने भीषण समय में जीवन को संभालने की जद्‌दोजहद में लगे हैं।
इस शांत से दिखने वाले जंगल में जीवन का पूरी तरह सैन्यकरण हो चुका है। लोगों को कॉर्डन एंड सर्च, फायरिंग, एडवांस, रिट्रीट, एक्शन जैसे शब्द आते हैं। अपनी फसले काटने के लिए उन्हें पीएलजीए की जरूरत पड़ती है ताकि उसका संतरी गश्त दे सके। बाजार तक जाना तो एक फौजी कार्रवाई जैसा है। सारे बाजार मुखबिरों से भरे हुए हैं जिन्हें पुलिस ने पैसा देकर खरीद लिया है। मुझे बताया जाता है कि नारायणपुर में तो एक 'मुखबिर मोहल्ला' ही है जहां कम से कम 4000 मुखबिर रहते हैं। आदमी तो खैर अब बाजार जा ही नहीं पाते। महिलाएं जाती हैं, लेकिन उन पर कड़ी नजर रहती है। वे जरा सा भी ज्यादा खरीदारी कर लें, तो पुलिस तुरंत आरोप लगाती है कि वे नक्सलियों के लिए खरीद रही हैं। दवा की दुकानों को साफ निर्देश हैं कि लोगों को बेहद कम मात्रा में दवाइयां दी जाएं। जन वितरण प्रणाली के तहत राशन की चीनी, चावल और मिट्‌टी का तेल पुलिसस्टेशनों के आसपास या उनके भीतर भंडारित किया जाता है जिससे उसे खरीदना लोगों के लिए तकरीबन असंभव होता है।
आखिरी रात हम एक खड़ी चढ़ाई वाले पहाड़ के नीचे रुके। सवेरे हमें इसे पार कर सड़क पर निकलना था जहां से एक मोटरसाइकिल मुझे ले जाएगी। पहली बार जब मैं इस जंगल में घुसी थी, तब से लेकर अब तक यह जंगल बदल चुका है। अब चिरौंजी, कपास और आम  में बौर आने लगे हैं।
कुडुर गांव के लोगों ने हमारे लिए कैंप में ताजा पकड़ी हुई मछली से भरा एक बड़ा सा मटका भिजवाया है। और साथ में मेरे लिए उन 71 किस्म के फलों, सब्जियों, दालों और कीड़ों के नामों और उनके बाजार दाम की एक सूची भी, जो उन्हें जंगल में मिलते हैं या जिन्हें वे उगाते हैं। यह सिर्फ एक सूची है, लेकिन यह एक दुनिया का नक्शा भी है।
हम जंगल पोस्ट तक पहुंचते हैं। फिर से दो बिस्कुट! कॉमरेड नर्मदा की ओर से एक कविता और एक पिचका हुआ फूल मुझे भेंट किया जाता है! और एक प्यारा-सा खत मासे की ओर से (कौन है वह? क्या मैं कभी जान पाऊंगी?)।
कॉमरेड सुखदेव पूछते हैं कि क्या वह मेरे आईपॉड में से एक गीत अपने कम्प्यूटर में डाल सकते हैं। हमसुनते हैं फैज अहमद फैज का लिखा शेर इकबाल बानो की आवाज में, जो उन्होंने जिया-उल-हक की जुल्मतों के चरम दौर में लाहौर के एक मशहूर कंसर्ट में गाया था-
जब अहल-ए-सफ़ा-मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तखत गिराए जाएंगे
हम देखेंगे।

पाकिस्तान में इस गीत को सुनने वाले पचास हजार श्रोताओं के मुंह से इसके बाद बस एक ही आवाज निकली थीः इंकलाब जिंदाबाद! इंकलाब जिंदाबाद!
इतने सालों बाद यही नारा इस जंगल में गूंज रहा है। अजीब बात है। रिश्ते भी कैसे-कैसे बन जाते हैं।

(यह लेख आउटलुक अंग्रेजी में छपे अरुंधति रॉय के लेख वॉकिंग विद द कॉमरेड्‌स का संपादित और अनूदित अंश है. साभार प्रस्तुति)

शोकगीत नहीं, उल्लास का उत्सवः पढ़िए अरुंधति को

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/25/2010 04:34:00 PM

आनेवाले दशकों में शायद इसे एक क्लासिक की तरह पढ़ा जाएगा. इन बेहद खतरनाक- और उतने ही शानदार- दिनों के बारे में एक विस्तृत लेखाजोखा. पिछले एक दशक से अरुंधति के लेखन में शोकगीतात्मक स्वर बना हुआ था, पहली बार वे इससे बाहर आई हैं और पहली बार उनकी किसी रचना में इतना उल्लास, इतना उत्साह, इतनी ऊर्जा और इतनी गरमाहट है. जैसा अपने एक ताजा साक्षात्कार में खुद अरुंधति ही कहती हैं, यह यात्रा वृत्तांत सिर्फ ऑपरेशन ग्रीन हंट या राजकीय दमन या अत्याचारों के बारे में नहीं है. यह जनता के विश्वव्यापी प्रतिरोध आंदोलनों और हर तरह के - हिंसक या अहिंसक - संघर्षों में से एक का आत्मीय ब्योरा है. इसे लिखते हुए अरुंधति ने अपने कुछ पुराने आग्रहों, विचारों और धारणाओं को छोड़ा ही नहीं है, बल्कि उसके ठीक उलट विचारों की हिमायत करती नजर आती हैं. एसा क्यों है, इसकी वजह भी अरुंधति ने यहां बताई है. थोड़ी संजीदगी के साथ पढ़ने पर पाठक की जिंदगी को बदल कर रख देने की क्षमतावाले इस आलेख में अरुंधति जिस तरह इतिहास और वर्तमान, जीवित लोगों और एतिहासिक हस्तियों के बीच आई-गई हैं, वह अनोखे अनुभवों से भर देनेवाला है. बेशक, इसमें अरुंधति शैली के आंकड़ों और तथ्यों की बेहद कमी खलती है, लेकिन शायद यह पूरा आलेख ही अपने आप में एक बड़ा तथ्य और आंकड़ा है. इसके पहले वे अपने लेखों में जगह-जगह पाठक को नए तथ्यों और उनके प्रस्तुतिकरण में नएपन की वजह से चौंकाती रही हैं (बकौल नोम चोम्स्की), लेकिन इस बार इस पूरी रचना के एक-एक वाक्य से चौंकाती हैं- हमारे सामने अपने ही समाज और समय के एक नये चेहरे से हम रू-ब-रू होते हैं.

हम इससे सहमत हो सकते हैं. इससे असहमत भी हो सकते हैं. लेकिन उसके पहले इसे पढ़ना जरूरी है.

(अनुवाद इस यात्रा वृत्तांत का अब तक हो नहीं पाया है कहीं. इसलिए अंगरेजी में ही पढ़ा जाए अभी).

आइए, अब इसे पढ़ें

महज एक बच्चे की ताली पर: एक बहस जिसका जवाब प्रभाष जी ने नहीं दिया

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/22/2010 04:56:00 PM


यह लेख प्रभाष जोशी के लेख 'काले धंधे के रक्षक' के छपने के तुरंत बाद लिखा गया था, लेकिन प्रभाष जी की जिद थी कि वे इंटरनेट पर आयी बातों का जबाव नहीं देंगे। प्रिंट में आये तभी बोलेंगे।  इसलिए इसे उस समय इंटरनेट के लिए नहीं दिया गया. जब जनसत्ता ने इसे नहीं छापा तो इसे हंस के लिए दिया गया। राजेंद्र जी ने इसे हंस के अगले अंक में छापने के लिए कहा था। पर, उसके कुछ ही समय बाद प्रभाष जी का निधन हो गया।  और उनके निधन पर बहाए गए आंसुओं में यह लेख और पूरे बहस भी तिरोहित कर दी गयी. 'ब्राह्मण' के संपादक प्रतापनारायण मिश्र हों, बाल गंगाधर तिलक हों या जनसत्‍ता के संस्‍थापक संपादक प्रभाष जोशी - इन सबकी धारा एक रही है, जो निरंतर प्रवाहमान है-आज भी। इसलिए प्रभाष जी के निधन से उन विचारों का भी निधन नहीं हो गया है। उनका उत्‍तर, उनसे संघर्ष जरूरी है। जहां भी, जैसे भी, जितना भी हम कर सकें। इस संघर्ष के हिस्से के तौर पर, हाशिया पर यह आलेख...कई महीनों की देरी ज़रूर हुई है, लेकिन सवाल बरक़रार है. हालाँकि कुछ देरी हाशिया से भी हुई है, जिसके लिए हम माफी चाहते हैं. साथ में इस बहस से जुड़े कुछ लिंक भी दिए जा रहे हैं, ताकि पूरा मामला समझने में आसानी हो. 

प्रमोद रंजन

जनसत्‍ता के ३० अगस्त,२००९ अंक में प्रकाशित मेरे लेख 'विश्वास का धंधा' पर श्री प्रभाष जोशी ने नाराजगी जाहिर की थी. ६ सितंबर, २००९ को अपने कॉलम 'कागद कारे' में उन्होंने मुझे ऐसा बच्चा बताया, जिसने उनके अश्वमेध यज्ञ के घोड़े के पैरों में फच्चर फंसाने की कोशिश की है.

 श्री जोशी की वरिष्‍ठता का सम्मान करता रहा हूं. वह आधुनिक हिंदी पत्रकारिता के उन्नायकों में से एक हैं. अगर वह मुझे एवं मेरे कामों को नहीं जानते, और 'किसी प्रमोद रंजन'  कह कर संबोधित करते हैं तो कोई अचरज नहीं. उनकी वरिष्‍ठता के सामने मैं सचमुच बच्चा हूं. ये दोनों संबोधन मुझे अप्रिय नहीं लगे. किंतु उन्होंने मुझे 'रतौंधी से ग्रस्त', 'नयनसुख' और 'काले धंधे का रक्षक' भी कहा. आश्चर्य उनकी इस बौखलाहट पर है. आखिर, क्या कारण है कि पत्रकारिता में ऊंची जाति के हिंदुओं के वर्चस्व और उनके जाति-धर्म, मित्र धर्म के निर्वाह की बात उठते ही एक प्रमुख गांधीवादी के रूप में पहचान रखने वाले श्री जोशी रामनामी उतारकर परशुराम की भूमिका में आ गये? उन्होंने अपने लेख में कहा कि अगर मेरे 'पुण्य कार्य' में फच्चर फंसाया तो 'टिकोगे नहीं' ! 
---------------------------------- 

प्रमोद रंजन को प्रभाष जोशी का करारा जवाब (भडास मीडिया

---------------------------------- 


 कुछ वर्ष  पहले मेरे अग्रज मित्र श्री प्रेमकुमार मणि ने उन्हें कुटिल ब्राह्मणवादी बताया था. उस समय मैं इससे सहमत नहीं हो सका था और जिरह की थी कि श्री जोशी में जो किंचित प्रतिगामिता दिखती है वह गांधीवाद के कारण है न कि ब्राह्मणवाद के कारण. लेकिन श्री जोशी के इस लेख को कई बार गौर से पढ़ने के बाद मैं अपनी उस धारणा पर पुनर्विचार के लिए विवश हुआ हूं.

उन्होंने अपने लेख में धौंस भरी भाषा में पत्रकारिता में व्याप्त जातिवाद का संरक्षण ही नहीं किया बल्कि कई जगह तथ्यों में सयास, बारीकी से हेर-फेर की है. उन्होंने 'बहस को पटरी से' उतार देने की धमकी देते हुए तर्कों और तथ्यों की रोशनी में साफ चमकती चीजों को धुंधला करने की भी कोशिश की है. इस तरह उन्होंने अपने कथित उत्‍तर में मेरे लेख में आयी बातों से प्राय: कन्नी काट ली है. रोचक विरोधाभास यह भी है कि वह मेरे लेख की मुख्य बातों से असहमत होने का कोई तर्क तक नहीं तलाश पाये हैं.

 मैंने अपने लेख में कहा था कि 'अखबारों का चुनावी पैकेज बेचना बुरा है लेकिन उसे अधिक बुरा है पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म का निर्वाह'. श्री जोशी मेरी इन पंक्तियों को उद्धृत करते हुए गुस्से से कांप उठे, लेकिन इससे असहमति नहीं जता पाये हैं. इसी तरह, मैंने कहा था कि पैकेज के कारण पत्रकारिता की विश्वसनीयता बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई है. इस क्षरण से नुकसान दलित पिछड़ों की राजनीतिक ताकतों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की व्‍यक्तियों को भी हुआ है. मीडिया के ब्राह्मणवादी पूंजीवाद ने भी इन्हें उपेक्षित, अपमानित और दिग्भ्रमित किया है. श्री जोशी ने अपने लंबे लेख में इससे संबंधित हिस्सों को विस्तार से उद्धृत किया है और अंतत: कहा है कि 'मीडिया से दलित-पिछड़ों, वाम आंदोलनों आदि के सरोकार बाहर हुए तो सिर्फ इसलिए नहीं कि वहां घनघोर बाजारबाद और ब्राह्मणवादी पूंजीवाद आ गया है.' जाहिर है, वह मेरी इस बात से सहमत हैं कि मीडिया में 'ब्राह्मणवादी पूंजीवाद' है. लेकिन वह इससे आगे बढ़कर कहते हैं कि इन ताकतों के सरोकार इसलिए मीडिया के बाहर हो गये क्योंकि  सत्‍ता, धन लालसा और वंशवाद के कारण चौधरी चरण सिंह, मायावती, लालू प्रसाद, मुलायम सिंह, नीतीश कुमार, अजीत कुमार, चौटाला आदि ने पिछड़ों के हितों को बरबाद कर दिया. यानी, बकौल श्री जोशी मीडिया के ब्राह्मणवादी स्वरूप की इसमें कोई भूमिका नहीं है. उसने तो इन जैसों को महज 'जैसी करनी, वैसी भरनी' की कसौटी पर चढ़ा कर अपना 'सामाजिक धर्म'  निभाया है. इन राजनेताओं पर लगाये गये आरोप उचित हो सकते हैं, लेकिन यह मीडिया के सामाजिक सरोकारों को देखने का सतही ही नहीं 'शातिर' ढंग भी है. सवाल यह है कि - क्या मीडिया ने अपना यह कथित 'सामाजिक धर्म' प्रभुवर्गों के हितों की राजनीति करने वाली ताकतों के साथ भी निभाया है? अगर प्रभाष जोशी कहते हैं- हां, तो फिर उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि इन ताकतों के सरोकार मीडिया से बाहर क्यों नहीं हो गये? क्या श्री जोशी यह कहने का भी दु:साहस जुटा लेंगे कि ये ताकतें सत्‍ता, धन लिप्सा और वंशवाद से विरक्त रही हैं!

 मैंने अपने लेख में 'पैकेज के काले धंधे'  की भर्त्सना के लिए श्री जोशी के लेखकीय साहस की प्रशंसा की थी और इस ओर ध्यान दिलाया था कि इस मुद्दे पर बात करने वाले लोग जाति पर आधारित पत्रकारिता को नजरअंदाज कर देते हैं. इसी क्रम में मैंने एक सामाजिक प्रतीक का सहारा लेकर पैकेज के धंधे को 'ब्राह्मण पर बनिया की जीत' बताया था. माने यह ब्राह्मणवाद पर पूंजीवाद की विजय है. श्री जोशी ने मेरी इस बात को भी उद्धृत किया है. मैं यह देखकर सन्न रह गया उन्होंने इस संदर्भ को बड़ी चतुराई से इसे 'बनिया और दलित-पिछड़ा नवधनिक राजनेताओं का गठजोड़'  का परिणाम बताने की कोशिश की. वह कहते हैं ''देखते नहीं कि यह बनिये की ब्राह्मण पर विजय भर नहीं है..यह भ्रष्‍ट राजनेताओं और पत्रकारिता को काली कमाई का धंधा बनाने वाले मीडिया मालिकों की मिलीभगत है.'' श्री जोशी के लेख के अनुसार सत्‍ता और धन के पिपासु दलित-पिछड़े नेता हैं, जिनके कारण दलित-पिछड़ों के सरोकार मीडिया से बाहर हो गये हैं. वे अब 'पैसा फेंक, खबर छपवा'  रहे हैं. ध्यान दिया जाना चाहिए कि श्री जोशी चाहते तो इस कुकृत्य के लिए पूंजीवाद (बनिया) और नवधनिक राजनेताओं के साथ ब्राह्ममणवाद को भी जिम्मेदार ठहरा सकते थे. मैंने अपने लेख में कहा भी था कि 'पैकेज ने जातिजीवी संपादकों की मुट्ठी में कैद अखबारों के खिड़की-दरवाजे सभी जाति के धनकुबेरों के लिए खोले हैं'. लेकिन श्री जोशी ने इस पर चुप्पी साध ली. उनकी आतुरता इसके लिए थी कि ब्राह्मणवाद का सवाल न उठे. उस पर आंच न आए.

उन्होंने कई प्रसंगों में तथ्यों के साथ हेरा-फेरी करने की भी सयास कोशिश की. मैंने पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म के निर्वाह के उदाहरण के तौर पर कहा था कि बांका से लोकसभा चुनाव लड़ रहे श्री दिग्विजय सिंह के पक्ष में आयोजित जनसभा में पैकेज की बिक्री का विरोध करने वाले प्रभाष जोशी और हरिवंश भी गये थे. इस संदर्भ में श्री जोशी द्वारा दिया गया उत्‍तर जरा देखिए-'हरिवंश जेपी आंदोलन से कुछ पहले से मेरे मित्र हैं. बांका उनका मेरे साथ जाना भी कोई बड़ी बात नहीं है..उनकी सोहबत मुझे प्रिय और महत्वपूर्ण लगती है.'  सवाल यह था कि श्री हरिवंश को 'दिग्विजय सिंह` की 'सोहबत'  क्यों प्रिय और महत्वपूर्ण लगती है? यह सोहबत उनके किस धर्म के निर्वाह का संकेत करती है? और खुद श्री जोशी दिग्विजय सिंह के नामांकन के दौरान किस धर्म के तहत मंच से उद्घोष कर रहे थे कि यह 'दिग्विजय सिंह का नामांकन की नहीं, जीत की जनसभा है' ? मूल सवाल को इस तरह गोल कर दिया जाना अनायास नहीं है. प्रभाष जोशी, हरिवंश और रामबहादुर राय बतौर पत्रकार आपस में मित्र धर्म का निर्वाह कितना करते हैं, इस बात का न तो तात्कालिक संदर्भ था, न ही इस प्रसंग में कोई उपयोगिता. लेकिन उन्होंने आपस में मित्र धर्म नहीं निभाने की दुहाई देकर बहस को पटरी से उतारने की कोशिश की.

 उन्होंने मेरी पोल खोल देने वाले अंदाज में कहा कि वह चाहें तो बहस को पटरी से उतार सकते हैं. उनका संकेत इस ओर है कि मैं प्रभात खबर में बतौर पत्रकार काम कर चुका हूं और अब नमक हरामी कर रहा हूं.

श्री जोशी ने अपनी बात दिग्विजय सिंह के लिए 'मीडिया प्रबंधन' कर रहे पत्रकार की डायरी के हवाले से  शुरू की थी. यद्यपि उन पत्रकार ने सफागोई से अपनी डायरी लिखी है. मैं उनका प्रशंसक हूं कि उन्होंने मीडिया में पैसे के अलावा जाति, पद और परिचय के खेल को भी समझा और उसे बेबाकी से दर्ज किया. यह उल्लेखनीय बात है. लेकिन उनकी प्रशंसा का पुल बांधने वाले श्री जोश बता पाएंगे कि 'मीडिया प्रबंधन' के मायने क्या हैं? क्या यह मीडिया की कथित 'तटस्थता, नि पक्षता और स्वतंत्रता' को बरकार रखने का माध्यम है? 'मीडिया प्रबंधक' पत्रकार ने अपनी डायरी में यह भी साफ किया है कि वह बांका में रह कर दिग्विजय सिंह के लिए अखबारों के पैकेज खरीद रहे थे. उन्हें 'रिचार्ज'  करवा रहे थे. क्या यह बताने की जरूरत है कि रतौंधी ग्रस्त बच्चा कह कर मुझे कोसने वाले श्री जोशी इन तथ्यों को नजरअंदाज कर 'लोकसभा चुनाव जैसे नाजुक और निर्णायक मौके पर' अपने लेखों में दिग्विजय सिंह की प्रशंसा के पुल क्यों बांध रहे थे? जबकि वह मानते हैं कि पैकेज की परंपरा 'सबसे ज्यादा भ्रष्‍ट राजनेताओं के हित में' है. क्या उनकी नजर में भ्रष्‍टाचार का यह पैमाना ऊंची जाति, ऊंची शिक्षा और ऊंचे संपर्क वालों पर लागू नहीं होता?

प्रभात खबर और हिंदुस्तान ने (न कि सभी अखबारों ने. श्री जोशी ने इस मामले में भी मुझे गलत उद्धृत किया है) लोकसभा चुनाव के दौरान बिकी हुई खबरों के नीचे क्रमश: पीके मीडिया इनिशिएटिव और एचटी मीडिया इनिशिएटिव लिखा था. श्री जोशी इसे प्रभात खबर का 'अभियान' मानते हैं और चाहते हैं 'नयनसुख प्रमोद रंजन'  को इसके लिए प्रभात खबर की तारीफ करनी चाहिए. 'पीके मीडिया इनिशिएटिव'  का अनुवाद होगा 'एक मीडिया संस्थान के रूप में प्रभात खबर की पहल'. क्या मतलब है इस बात का? क्या मतदाता इन  शब्‍दों से समझ जाएगा कि यह खबर नहीं, विज्ञापन है? बिकी हुई खबर को, विज्ञापन को, कोई अखबार अपनी विशेष पहल बता रहा है और आप चाहते हैं लोगों को उसकी नियत पर भरोसा करना चाहिए?

मेरे जिस लेख पर श्री जोशी बिफरे हैं, उसके निष्‍कर्ष ठोस तथ्यों पर आधारित हैं. मैंने बिहार के मीडिया संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों की सामाजिक पृष्‍ठभूमि का सर्वेक्षण किया है तथा राजनीतिक समाचारों व प्रतिरोध आंदोलनों के बारे में प्रसारित होने वाली खबरों के कंटेंट और उनकी भाषा का गहनता से अध्ययन किया है. सामाजिक पृष्‍ठभूमि के सर्वे में विभिन्न जातियों के प्रतिनिधित्व के मामले में प्रभात खबर की स्थिति सबसे  शर्मनाक रही है. वहां 'फैसला लेने वाले' ऊपरी पांच पदों पर एक ही जाति के पत्रकार विराजमान हैं. और कोई रतौंधी का शिकार बच्चा भी इसे अनदेखा नहीं कर सकता कि ये सभी लोग अखबार के प्रधान संपादक की ही जाति के हैं. मेरा यह अध्ययन पिछले दिनों 'मीडिया में हिस्सेदारी' नामक पुस्तिका में प्रकाशित हुआ है. प्रसंगवश यह भी बता देना चाहता हूं कि सर्वेक्षण में पाया गया कि बिहार के मीडिया संस्थानों में 'फैसला लेने वाले पदों'  पर एक भी दलित, आदिवासी, पिछड़ा, समाजिक रूप से पिछड़े अल्पसंख्यक या महिला नहीं है.

एक पत्रकार द्वारा ब्राह्मणवाद की शिकायत करने पर उसे मनोरंजन का साधन बना डालने की गर्वपूर्ण स्वीकरोक्ति करने वाले प्रभाष जोशी कहते हैं कि उनके निर्देशन में 'जनसत्‍ता का पूरा स्टाफ संघ लोक सेवा अयोग से भी ज्यादा सख्त परीक्षा के बाद लिया गया था'. लेकिन उनके ही अनुसार इस सख्त परीक्षा में ब्राह्मण ही ज्यादा चुनकर आये थे क्योंकि 'जिस भाषा में जैसे लोग पत्रकारिता में निकल कर आएंगे, वैसे ही तो रखे जाएंगे'. तो, जोशी जिस प्रकार की पत्रकारिता कर रहे थे उसके लिए हिंदी भाषा में ज्यादा ब्राह्ममण आये और उनकी सोहबत में रहने वाले हरिवंश की पत्रकारिता के लिए ज्यादा राजपूत! 'हिंदी भाषा'  की समझदारी को तो दाद देनी चाहिए, जिसको जैसा चाहिए वह अपने-आप निकाल कर सामने परोस देती है! यहां यह भी याद रखना चाहिए कि संघ लोक सेवा आयोग की नौकरियों में वंचित तबकों के लिए आरक्षण होता है.

मीडिया खुद को जनतंत्र का चौथा खंभा कहता है तो उसमें भी जनतंत्र दिखना चाहिए या नहीं? भारत में जनतंत्र के लिए किये गये संघर्ष के दो पहलू रहे हैं. एक ओर गांधी, तिलक आदि की राजनीतिक जनतंत्र की मांग थी तो दूसरी ओर ज्योतिबा फुले और अंबेदकर आदि ने इस संघर्ष का विस्तार सामाजिक साम्राज्यवाद तक करते हुए लड़ाई लड़ी थी. राजनीतिक लोकतंत्र तो मिल गया लेकिन सामाजिक सम्राज्यवाद अभी भी कायम है. लेकिन सामाजिक सम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई में हाथ बंटाने की बात तो दूर, श्री जोशी तो कहते हैं कि 'हम कोई मंत्रीमंडल नहीं बना रहे थे, जो सबको प्रतिनिधित्व देते'. उनका यह वक्तव्य बताता है कि वह हमारे राजनीतिक लोकतंत्र को भी किस नजरिये से देखते हैं. इस वक्तव्य में क्या हम उसी ब्राह्ममणवाद को सिर चढ़ कर नाचते नहीं देखते, जिसके आवेश में १८९५ के पूना कांग्रेस में पंडित गंगाधर तिलक ने अछूतों के सवाल पर कांग्रेस का पांडाल में ही फूंक देने धमकी दी थी. यह कितनी खतरनाक बात है कि श्री जोशी को भारत के सर्वसमावेशी मंत्रीमंडल से अधिक पवित्र और महत्वपूर्ण एक ऐसे अखबार का न्यूज रूम दिखता है, जहां ऊपर से नीचे तक ब्राह्मण भरे हों.

मेरा सवाल था, और  है कि समाचार माध्यमों की आंतरिक संरचना में अधिकाधिक सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधित्व की जरूरत है या नहीं? यद्यपि श्री जोशी के इस लेख को पढ़ने के बाद मैं अपने अग्रज मित्र प्रेमकुमार मणि से सहमत हो चुका हूं और उनसे सकरात्‍मक उत्‍तर की उम्मीद पालने को अपना बचपना मानने को विवश हूं. वस्तुत: अपने इस लेख में श्री जोशी सप्रयास अर्जित गांधीवादी छवि छोड़कर असली रूप में उतर आए, वह भी उन्हीं के शब्दों में सिर्फ 'एक बच्चे की ताली पर'.

आदिवासियों की संघर्ष कथा

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/22/2010 04:44:00 PM

उनकी कहानियां हों, या कविताएँ या उपन्यास- रणेंद्र अपने लेखन में जनता के सरोकारों से अभिन्न रूप से जुड़े दिखते हैं. खास कर आदिवासी समुदाय की पीड़ा, उसका विस्थापन और उसका संघर्ष उनके लेखन में अधिक मुखर होता है.



उनका ताजा उपन्यास ग्लोबल गांव के देवता पढ़िए. सिर्फ सौ पन्नों में वे बेहद प्रभावी तरीके से ऑपरेशन ग्रीन हंट के दौर का यथार्थ पेश करते हैं. उनके ब्योरे में एक ओर देश के सबसे गरीब और उत्पीड़ित समुदाय का जीवन, उसकी उपेक्षा, उसके संसाधनों की लूट और उसका संघर्ष है तो दूसरी ओर राष्ट्रीय- बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में काम करनेवाली दमनकारी होती राजसत्ता है, जिसके साथ हैं- कन्या आश्रम चलाने वाला कामुक बाबा, जमींदार और कथित सभ्य समाज के लोग. उपन्यास इतने अपनेपन के साथ रचा गया है कि आप इसमें जीने लगते हैं. कई बार उपन्यास का स्वर नृतत्वशास्त्रीय भी हो गया है जो इसे विश्वसनीयता देता है.

उपन्यासकार असुरों के गांव में शिक्षक के रूप में जाता है, जहां आदिवासियों के बारे में उसकी सारी धारणाएं गलत साबित होती हैं. वह इस नए समाज के गरमाहट भरे रिश्तों और बहुरंगी जीवन में घुल-मिल जाता है. एक काल्पनिक राज्य कीकट प्रदेश के कोयलबीघा थाना में बसनेवाली असुर जनजाति की कहानी के बहाने उपन्यास में छत्तीसगढ़ से लेकर पश्चिम बंगाल तक के आदिवासियों की कहानी कही गई है. और इसी के साथ लेखक सचेत रूप से हमें यह भी बताता चलता है कि भारत में घट रही यह प्रक्रिया कोई अनूठी-अनजानी नहीं है, बल्कि इतिहास की तथाकथित सभ्य जातियों ने इसी तरह अपने यहां की आदिवासी जातियों का क्रूरता पूर्वक और निर्मम संहार करके अपनी सभ्यता की बुनियाद खड़ी की है.

खनिज की अपनी भूख के कारण ग्लोबल देवता यहां के असुर समाज को उनके आखिरी बसेरे से भी उजाड़ने पर तुले हैं. इस समाज में अंधविश्वासों से होने वाली हत्याओं से अधिक जानें खनिज कंपनियों द्वारा बॉक्साइट निकाल कर खुले छोड़े गए गड्ढों में पनपे मच्छरों के काटने से जाती हैं. इससे भी अधिक जानें कंपनियां आदिवासियों की जमीन हथियाने के लिए लेती हैं- और मरने वालों को नक्सली बता दिया जाता है. ऐसे में जब एक भेड़िया अभयारण्य के बहाने सरकार ने 37 गांवों को खाली कराके खनन कंपनी वेदांग को देने की कोशिश की तो आदिवासी अड़ गए. जिस सरकार ने कभी उनकी सुध नहीं ली वह भेड़ियों को बचाने के लिए उन्हें उजाड़ रही थी. जब प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखना भी काम न आया तो उन्होंने संघर्ष का रास्ता अपनाया. कंपनियों के दलाल बाबा शिवदास इसे तोड़ने में नाकाम रहे. उपन्यास में जंगल पार्टी का जिक्र है, जो आदिवासियों के अधिक संगठित (पर सरकार के लिए अवैध) प्रतिरोध का प्रतिनिधित्व करती है. साथियों की शहादतों के बावजूद उनका संघर्ष उपन्यास के अंतिम वाक्य में भी जारी रहता है. उपन्यास का आग्रह एनजीओवादी-धर्मांध राजनीति से बाहर आकर अपने संसाधनों की रक्षा के लिए संगठित होने का है.

उपन्यास दिखाता है कि गरीबी खुद नहीं आती, संपन्न वर्गों द्वारा थोपी जाती है. उपन्यास के शुरू में एक ही इलाके के दो स्कूलों की तुलना की गई है. एक ओर जैसे-तैसे चलता प्राथमिक स्कूल है तो दूसरी ओर आलीशान भवनवाला स्कूल. पाथरपाट का यह स्कूल सौ से अधिक आदिवासी घरों को उजाड़कर बना था, लेकिन एक भी आदिवासी बच्चे को कभी इस स्कूल में नहीं लिया गया. वे बच्चे तो मांड़-भात खाकर अधपढ़-अनपढ़ मास्टरों से पढ़ रहे थे और बहुत हुआ तो क्लर्क बन सकते थे. यह बंटवारा इन समुदायों के भविष्यों का भी बंटवारा कर देता है और आदिवासियों को उन्हीं दीन-हीन स्थितियों में रहने को मजबूर करता है जिसमें वे सदियों से रहते आए हैं. आदिवासियों की लड़ाई वास्तव में इस बंटवारे के खिलाफ थी. उपन्यासकार भी इन्हीं मकई का घट्ठा खाकर खटने और लड़ने वालों के साथ उनकी हर लड़ाई में शामिल है.

रेयाज उल हक़

सेहत की आड़ में सेहत से खिलवाड़

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/18/2010 07:56:00 AM

कैंसर से बचाने के लिए हजारों गरीब बच्चियों को एक विवादित टीका लगाया जा रहा है और ऐसा करने के लिए सरकार, कंपनियां और गैरसरकारी संगठन नियम-कायदों की धज्जियां उड़ा रहे हैं. शांतनु गुहा रे और कुणाल मजूमदार की रिपोर्ट

नागेश्वर और वेंकटम्मा से जब कोई सरिता के बारे में पूछता है तो वे कुछ नहीं कहते. बस दीवार पर टंगी एक फोटो की तरफ इशारा कर देते हैं. आप कुछ और कहें इससे पहले उनकी आंखों से आंसू झरने लगते हैं और फिर वे फफक-फकर रो पड़ते हैं.
यह भी पढ़ें
आंध्र प्रदेश में खम्मम जिले के अंजुपका गांव में रहने वाले नागेश्वर और वेंकटम्मा खेतिहर मजदूर हैं. सरिता उनकी बेटी थी. इस साल की 21 जनवरी का दिन वेंकटम्मा को भूलता नहीं. इस दिन उन्हें 13 साल की सरिता घर में बेहोश पड़ी मिली थी. पहले तो उन्होंने सोचा कि बेटी ने आत्महत्या करने के इरादे से कीड़े मारने की दवा पी ली है. मगर ऐसा था नहीं क्योंकि दवा की बोतल ज्यों-की-त्यों अलमारी में पड़ी थी. सरिता को तुरंत पास के स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया जहां सहायक स्टाफ और एक डॉक्टर की टीम ने इस बात की पुष्टि की कि मामला जहर का नहीं है. यहां से उसे 25 किमी दूर भद्राचलम के एक अस्पताल भेज दिया गया. रास्ते में उसे मिरगी का एक तेज दौरा पड़ा. अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टरों ने कहा कि सरिता की मौत पहले ही हो चुकी है. पोस्टमार्टम किया गया. मगर इसकी रिपोर्ट सरिता के मां-बाप को नहीं दी गई. इस इलाके में जन्म और मौतों का पंजीकरण करने वाले नल्लीपका स्वास्थ्य केंद्र में सरिता की मौत को खुदकुशी के रूप में दर्ज कर लिया गया. नागेश्वर और वेंकटम्मा ने यह मानने से इनकार कर दिया और इसका विरोध करते हुए अपनी बेटी का अंतिम संस्कार कर दिया.
सरिता की मौत गरीबी, लालच, लापरवाही और उपेक्षा के मेल की कहानी है. नागेश्वर कहते हैं, ‘मेरी बेटी ने आत्महत्या नहीं की थी. उसने जहर नहीं खाया था. उसे टीका लगाने के बाद दौरे पड़ने लगे थे. यह बात उसने भी हमें बताई थी और उसके हॉस्टल सुपरवाइजर ने भी. अस्पताल के  अधिकारी झूठ बोल रहे हैं.’ नरशापुरम जन स्वास्थ्य केंद्र, जहां सरिता को सबसे पहले ले जाया गया था, में तैनात डॉक्टर आर बालसुधा का कहना है, ‘जब सरिता को यहां लाया गया था तो वह जिंदा थी. उसने कोई जहर नहीं खाया था. उसे मिरगी के बेहद तेज दौरे पड़ रहे थे और वह बहुत बीमार थी.’
कुछ समय बाद सरिता के अभागे मां-बाप को पता चला कि भद्राचलम से 60 किमी दूर येरागट्टू गांव में पिछले साल 30 अगस्त को 13 साल की सोडी सयम्मा की मौत भी इसी तरह हुई थी. इसे भी डॉक्टरों ने आत्महत्या करार दिया था, मगर सयम्मा के मां-बाप का कहना था कि उनकी बेटी ने न तो जहर खाया था और न ही फांसी लगाई थी. दोनों ही मामलों में स्थानीय जन स्वास्थ्य केंद्रों ने लड़कियों के जहर न पीने की पुष्टि की थी और उन्हें भद्राचलम इलाके के अस्पताल के लिए रेफर किया था. दिलचस्प बात यह है कि इन्हीं स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए इन गांवों में ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) का टीका लगाया गया था.
यौन संबंध के जरिए फैलने वाला एचपीवी गर्भाशय कैंसर के कई ज्ञात कारणों में से एक है. जानी-मानी कंपनी मेर्क से जुड़ी एमएसडी नाम की एक कंपनी गार्डसिल नाम का टीका बनाती है. कंपनी दावा करती है कि मासिक चक्र शुरू होने से पहले अगर लड़कियों को यह टीका लगा दिया जाए तो इससे उनका गर्भाशय के कैंसर से बचाव हो जाता है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले दुनिया के सबसे बड़े गैर सरकारी संगठनों में से एक पाथ की भारतीय इकाई ने पिछले साल नौ जुलाई से एचपीवी टीका अभियान शुरू किया. शुरुआत में यह परियोजना नमूने के तौर पर आंध्र प्रदेश और गुजरात में चली. इसके तहत खम्मम जिले में 14,000 लड़कियों को गार्डसिल के तीन डोज दिए गए. इनमें एक बड़ा हिस्सा गरीब और आदिवासी परिवारों से आने वाली लड़कियों का था. जिले के जिन तीन क्षेत्रों को इस अभियान के लिए चुना गया वे थे थिरूमलयपलम (शहरी), कोठगुड़म (ग्रामीण) और भद्राचलम (आदिवासी).
मगर इस अभियान को लेकर कुछ गंभीर सवाल हैं. मसलन, क्या इस टीके को बनाने वालों या फिर उनके सहयोगियों ने इसके सारे संभावित दुष्प्रभावों, जिन्हें हम साइड इफेक्ट्स भी कहते हैं, की जानकारी सार्वजनिक की है? क्या इन नाबालिग लड़कियों के मां-बाप ने अपनी स्वीकृति सारी बातें जानने के बाद दी है? जिस आबादी को टीका लगना था उसका चुनाव किस आधार पर हुआ है? क्या किसी तरह के दुष्प्रभावों या उलटे असर की जानकारी देने के लिए कोई तंत्र बनाया गया है?
हैदराबाद स्थित सूत्र बताते हैं कि आंध्र प्रदेश के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डी नागेंद्र ने इस परियोजना पर पाथ और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के साथ काफी करीब से जुड़कर काम किया है. मंत्रालय का तर्क है कि तीनों इलाकों को गर्भाशय कैंसर की घटनाओं की बड़ी संख्या के कारण चुना गया.
मगर इस दावे को कई लोग खारिज करते हैं. सामा रिसोर्स ग्रुप फॉर विमन एंड हेल्थ नाम के संगठन से जुड़ी एनबी सरोजनी कहती हैं, ‘इस बात को साबित करने के लिए कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है. यह पूरी तरह झूठ है.’ इस संगठन ने दूसरे 80 संगठनों और डॉक्टरों के साथ मिलकर इस मुद्दे पर स्वास्थ्य मंत्रालय को एक ज्ञापन भेजा है.
उधर, पाथ का दावा है कि टीके से होने वाले साइड इफेक्ट्स न के बराबर हैं. संगठन के मुताबिक टीका लगाने के बाद बांह में होने वाले दर्द के अलावा इसका कोई और दुष्प्रभाव नहीं. जबकि अमेरिका स्थित जुडिशियल वॉच और वैक्सीन एडवर्स इवेंट्स रिपोर्टिग सिस्टम (वीएईआरएस) जैसे संगठन बताते हैं कि गार्डसिल से सेहत पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों की सूची लंबी है. इनमें खून का थक्का जमना, मिरगी और एलर्जी जैसी चीजें शामिल हैं.
खम्मम में सयम्मा और सरिता की मौत के अलावा भी ध्यान खींचने वाली दूसरी बातें हुई हैं. मसलन, टीके के बाद 120 छात्राओं में मिरगी के दौरे, एलर्जी, डायरिया, चक्कर आने और उल्टी की शिकायत जैसी कई समस्याएं पैदा हो गईं. इसकी खबरें पहले टीवी9 नाम के स्थानीय चैनल पर आनी शुरू  हुईं. नरशापुरम के स्वास्थ्य केंद्र में तैनात डॉ आर बालसुधा ने इसकी पुष्टि कीं. यह स्वास्थ्य केंद्र भद्राचलम ब्लॉक के उन चार स्वास्थ्य केंद्रों में से एक था जिसे 16 जुलाई, 2009 से 28 फरवरी, 2010 तक चले टीका अभियान के लिए चुना गया था. नल्लीपका स्वास्थ्य केंद्र से जुड़े डॉ. शेखर बताते हैं, ‘कइयों में समस्याएं पैदा हो गईं. मगर हमें पता नहीं कि क्या आगे जाकर वे गंभीर हुईं क्योंकि हम उन लड़कियों के संपर्क में नहीं हैं.’ इस स्वास्थ्य केंद्र में 2,400 लड़कियों को यह टीका लगाने का लक्ष्य था, मगर 27 फरवरी तक आंकड़ा 1,800 तक ही पहुंच सका था.
माकपा नेता वृंदा करात कहती हैं, ‘यह धोखाधड़ी का बहुत गंभीर मामला है. भारत को इस तरह के टीकाकरण पर सावधान रहने की जरूरत है. स्वास्थ्य मंत्रालय को विस्तार से जांच करनी चाहिए कि अभियान के लिए इन आदिवासी और कम पढ़ी-लिखी लड़कियों को ही क्यों चुना गया. यह गलत धारणा है कि आदिवासी लड़कियों की यौन सक्रियता अधिक होती है और इसलिए उन्हें इस अभियान का हिस्सा बनाना चाहिए.’ करात यह मुद्दा संसद में उठाने की भी योजना बना रही हैं. उधर, इस अभियान में हर अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देश के पालन का दावा करने वाला पाथ, मौतों और दुष्प्रभावों की खबर से हो रहे नुकसान को काबू करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाता नजर आ रहा है. संगठन के एक शीर्ष अधिकारी तहलका से कहते हैं, ‘हमें आंध्र प्रदेश सरकार के कल्याण विभाग द्वारा सिर्फ जिम्मा सौंपा गया था और हम वक्सीन लगाने की प्रक्रिया में शामिल नहीं थे. हम तकनीकी सहयोगी थे और हम तो बस राज्य सरकार की टीम के साथ गए.’ वे यह नहीं बताते कि उनके संगठन को इस परियोजना, जिसे पाथ-आईसीएमआर पोस्ट लाइसेंस्योर ऑबजर्वेशनल स्टडी ऑफ एचपीवी वैक्सीनेशन नाम दिया गया था और जिसमें बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का पैसा लगा था, के लिए कितने पैसे मिले.
पाथ के एक और अधिकारी कहते हैं, ‘अगर टीके से कोई समस्या है तो इसके बारे में एमएसडी ही बता सकती है, हम नहीं.’ ये अधिकारी आगे कहते हैं कि उनका संगठन इस साल खम्मम जिले में 18,000 और लड़कियों को यह टीका लगाने की योजना बना रहा है जिससे यह जानने में मदद मिलेगी कि क्या यह टीका, राष्ट्रीय टीकाकरण योजना में शामिल किया जा सकता है. पाथ के एक अन्य अधिकारी बताते हैं, ‘हमें पूरा यकीन है कि यह गर्भाशय के कैंसर को रोकने वाला सबसे कम जोखिम वाला टीका है और हम इसे समाज के सबसे कमजोर तबकों तक पहुंचाने में मदद करना चाहते हैं. हम गोपनीयता के प्रावधानों से बंधे हुए हैं और इस वजह से दुष्प्रभाव वाली किसी घटना के बारे में जानकारी नहीं दे सकते. हम यही कह सकते हैं कि हम इसकी काफी करीब से निगरानी कर रहे हैं और चिंता की कोई बात नहीं है. ऐसी घटनाओं को संदर्भ से हटाकर बताना इस समूचे जन स्वास्थ्य कार्यक्रम को जोखिम में डाल देगा.’
हैरत की बात यह है कि खम्मम के डिस्ट्रिक्ट इम्यूनिटी ऑफिसर डॉ. बी जयकुमार, जिनपर जिले में इस अभियान की जिम्मेदारी है, कहते हैं कि उन्हें बिल्कुल पता नहीं कि इस अभियान के लिए उनके इलाके का चुनाव आखिर हुआ क्यों. उनके पास न इसे साबित करता कोई आंकड़ा है कि यहां पर कैंसर के मामलों की संख्या बहुत ज्यादा है, न ही उनके या उनकी टीम के पास टीके का सही या गलत असर जांचने का कोई माध्यम है.
तो फिर सवाल उठता है कि टीके क्यों लगाए गए? जयकुमार कहते हैं, ‘मुझे इसकी वजहों की जानकारी नहीं है. परिवार कल्याण आयुक्त ने कहा कि यहां पर यह करना है.’ हम उनसे पूछते हैं कि क्या उनके जिले को एक मानव प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था तो वे कहते हैं, ‘ये परीक्षण अंतरराष्ट्रीय बाजार में किए जा चुके हैं.’ मगर खुद जयकुमार ने इस टीके पर कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का अध्ययन नहीं पढ़ा. वे कहते हैं कि यह सब राज्य सरकार का काम है, उनका नहीं.
अंतरराष्ट्रीय परीक्षणों का यह छलावा बहुत चिंताजनक है. यह कोई छिपी हुई बात नहीं कि गर्भाशय के कैंसर से बचाव का टीका बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत पर बहुत बड़ा दांव लगा रही हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में कैंसर से पीड़ित ज्यादातर महिलाओं में इस तरह का कैंसर पाया जाता है. हर घंटे आठ महिलाओं को गर्भाशय के कैंसर की वजह से जान गंवानी पड़ती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन का यह भी अनुमान है कि प्रति वर्ष एक करोड़ तीस लाख महिलाओं में कैंसर की बीमारी देखने में आती है और इनमें से 74,000 की मौत गर्भाशय के कैंसर से होती है. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इसका मतलब है कि दुनिया भर में इससे होने वाली मौतों में से एक-चौथाई से भी ज्यादा भारत में होती हैं. यही वजह है कि भारत में गर्भाशय के कैंसर से लड़ाई का बाजार तकरीबन बारह हजार करोड़ रुपए का है. अंतरराष्ट्रीय दवा कंपनियां इसकी उपेक्षा नहीं कर सकतीं. भारत में इस बाजार के बड़े खिलाड़ी दो हैं. मेर्क की भारतीय इकाई एमएसडी और ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन जो अपना एचपीवी टीका सेर्वेरिक्स नाम से बेचती है. आगे इस बाजार में होड़ और भी कड़ी होने की पूरी संभावना है. पाथ-आईसीएमआर अध्ययन का एक मकसद यह आकलन करना भी था कि अगर इस टीके को जन स्वास्थ्य कार्यक्रम में शामिल कर लिया जाए तो सरकारी खजाने पर कितना बोझ पड़ेगा.
भारत के लिए चिंता की बात यह भी है कि जून, 2006 के बाद से अमेरिका में गार्डसिल का टीका लगने के बाद 61 मौतों की घटनाएं हुई हैं. इसके बाद वहां के मीडिया में मेर्क के खिलाफ काफी शोर हुआ. सरकारी संगठन वीएईआरएस द्वारा दर्ज ऐसे मामलों की सूची में एक 11 साल की लड़की का मामला भी है जिसे मई, 2007 में गार्डसिल का एक टीका लगाया गया था और उसकी तीन दिन बाद ही गंभीर प्रतिक्रियात्मक एलर्जी से मौत हो गई. एक दूसरे मामले में टीका लगने के तीन हफ्ते बाद 12 साल की एक लड़की छह अक्टूबर, 2007 को नींद में ही चल बसी जबकि उसे कोई दूसरी बीमारी नहीं थी. एक और मामले में 20 साल की एक महिला की, 1 अप्रैल, 2008 को टीका लगने के चार दिन बाद ही मौत हो गई.
ब्रिटेन में जहां सेर्वेरिक्स का ज्यादा चलन है, पहली मौत सितंबर, 2009 में सुर्खियों में आई जब 14 साल की नैटली मॉर्टन की टीका लगने के बाद मौत हो गई. यूरोपियन मेडिसिंस एजेंसी भी जर्मनी और ऑस्ट्रिया में हुई उन मौतों का उल्लेख करती है जो कथित तौर पर गार्डसिल से हुई थीं. 2006 में इसकी स्वीकृति मिलने के बाद अमेरिका और यूरोप में गार्डसिल पर 70 से अधिक मौतों और हजारों मामलों में गंभीर समस्याएं पैदा होने का आरोप लगा है. अहम बात यह है कि तहलका को लिखे एक जवाब मेर्क ने खुद भी माना है कि 1 सितंबर, 2009 से गार्डसिल के टीके के बाद वीएईआरएस के पास इसके प्रतिकूल प्रभावों की पंद्रह हजार सैंतीस रिपोर्टें आई हैं जिनमें से 93 फीसदी को गंभीर नहीं माना गया है.
ये मौतें गार्डसिल की वजह से हुईं या नहीं, इसपर बहस की जा सकती है. मगर फिर भी इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि 2006 के बाद वीएईआरएस ने ही हजारों मामलों में इस टीके के प्रतिकूल प्रभावों की बात मानी है. इस तथ्य की पुष्टि यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने भी की है. इन प्रतिकूल प्रभावों में तंत्रिका तंत्र, सांस, रोग प्रतिरोधी तंत्र से संबंधित बीमारियां शामिल हैं.
तर्क यह भी दिया जा सकता है कि दुनिया भर में चार करोड़ महिलाओं को गार्डसिल का एचपीवी का टीका लग चुका है और इनमें 70 मौतों या कुछेक हजार प्रतिकूल प्रभावों के मामलों का इसके साथ जुड़ जाना, वह भी जब इस पर राय बंटी हो, कोई बड़ी बात नहीं है. मगर यहां फिर से सवाल इस बारे में ईमानदारी से बताए जाने, यह सब बताने के बाद अनुमति लेने और पर्याप्त निगरानी तंत्र का उठता है. हैदराबाद स्थित ग्राम्या रिसोर्स सेंटर फॉर विमन की डॉ. रुक्मिणी राव कहती हैं, ‘पश्चिमी देश एचपीवी टीके के खतरों के बारे में तभी जागरूक हुए क्योंकि वहां कड़ी निगरानी व्यवस्थाएं हैं जिसके जरिए दवा के प्रभावों का नियमित अध्ययन किया गया. मगर भारत में ऐसी व्यवस्था नहीं है.’ खम्मम में आदिवासियों के बीच काम कर रहे एक संगठन एएसडीएस से जुड़े एसवीआरवी प्रसाद कहते हैं, ‘मुझे समझ में नहीं आता कि उन्होंने इस टीके के लिए खम्मम को क्यों चुना. उन्होंने दिल्ली या हैदराबाद में यह प्रयोग क्यों नहीं किया?’ ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमन असोसिएशन की राज्य इकाई की अध्यक्ष पी ज्योति कहती हैं, ‘ग्रेटर हैदराबाद में कहीं ज्यादा लड़कियां हैं. खम्मम ही क्यों? इससे बहुत सवाल खड़े होते हैं. वे इसे गरीब लड़कियों पर इस्तेमाल करते हैं जो कम पढ़ी-लिखी हैं और जिन्हें टीके और इसके प्रतिकूल प्रभावों के बारे में ज्यादा पता नहीं है.’
आरोप और भी हैं. पाथ का दावा है कि टीका तभी असर करता है जब इसे मासिक चक्र शुरू होने से पहले लगाया जाए. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि टीके के लिए जो आयु वर्ग चुना गया था वही गलत था. भद्राचलम के आदिवासी इलाके में एक दशक तक काम करने वाले चिकित्सक एस प्रभाकर कहते हैं, ‘गर्भाशय का कैंसर सिर्फ प्रौढ़ महिलाओं के गर्भाशय को प्रभावित करता है तो फिर हम क्यों ऐसी लड़कियों को टीका लगा रहे हैं जिनके प्रजनांग अभी विकसित ही हो रहे हों.’
दूसरे सवाल असर और कीमत से जुड़े हैं. मसलन, क्या एचपीवी टीके हर तरह के गर्भाशय कैंसर को रोक सकते हैं? क्या सरकार इसका खर्च उठा सकती है? जवाब थोड़ा निराशाजनक है. गार्डसिल के एक इंजेक्शन की बाजार में कीमत 2,000 रु. है. इस तरह तीन इंजेक्शनों की कीमत 6 हजार रु. आएगी. इसके इतने महंगे होने और इसके असर के बारे में कोई निश्चितता नहीं होने के कारण राव की तरह अनेक लोगों का मानना है कि यह पूरा अभियान ही झांसा है. वे कहती हैं, ‘6,000 रु. खर्च करने के बाद भी लोगों को गर्भाशय की जांच या स्क्रीनिंग करानी होगी. इन लड़कियों या उनके मां-बाप में से कितनों को पता है कि टीके पर इतना खर्च करने से अधिक सस्ता है शरीर की जांच करवा लेना. टीका बहुत महंगा है और गर्भाशय के कैंसर को रोक पाएगा या नहीं, इस बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकते. फिर ऐसा टीका उस देश में कैसे चल सकता है जहां सरकार का सालाना प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य खर्च महज 10 डॉलर हो?’
यह भी गौर करने वाली बात है कि एचपीवी टीका गर्भाशय के कैंसर से जुड़े हर कारण के खिलाफ प्रभावी नहीं है. नई दिल्ली स्थित ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क के सदस्य डॉ गोपाल दाबाडे कहते हैं कि एचपीवी टीके कितना असर करेंगे यह अभी साबित नहीं हुआ है. मौजूदा गार्डसिल टीका गर्भाशय का कैंसर पैदा कर सकने वाले दो तरह के वायरसों एचपीवी 16 और 18 के संक्रमण को रोक सकता है. यह एचपीवी 6 और 11 के संक्रमण को भी रोक सकता है जो जननांगों में गांठ के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं. यह सही है कि दुनिया भर में 16 और 18 एचपीवी गर्भाशय के कैंसर के 70 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार हैं. लेकिन दाबाडे के शब्दों में ‘एचपीवी के अलावा और भी बहुत सारे कारक हैं जिनसे गर्भाशय का कैंसर हो सकता है. यह अनेक लोगों से यौन संबंध बनाने और साफ-सफाई न रखने के कारण भी हो सकता है. अलग-अलग इलाकों में इसकी अलग-अलग वजहें हो सकती हैं.’
करात इससे सहमति जताते हुए कहती हैं, ‘मुझे यह चिंता है कि वे टीके को गर्भाशय के कैंसर के समाधान के रूप में पेश कर रहे हैं. कोई पारदर्शिता नहीं बरती जा रही. एचपीवी तो उन वायरसों में से सिर्फ एक है जिनसे गर्भाशय का कैंसर होता है. बाकी का क्या?’
इन आलोचनाओं का असर भी दिखने लगा है. पिछले साल ग्लैक्सो ने भारी-भरकम विज्ञापनों के साथ एक अभियान शुरू किया था, जिसमें दावा किया गया था कि यह टीका रामबाण है. मेर्क भी ऐसा अभियान शुरू करने वाली थी. अभियान के चार महीनों के भीतर दवा नियंत्रक कार्यालय, जो सीधे स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत काम करता है, ने ग्लैक्सो को यह अभियान रोकने के निर्देश दिए.
हमेशा की तरह भारत में पारदर्शिता का अभाव सबसे बड़ी बाधा है. उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि आंध्र प्रदेश परिवार कल्याण विभाग से आदेश आने के बाद हजारों लड़कियों के माता-पिता के नाम सहमति पत्र भेजे गए गए. इन लड़कियों में से ज्यादातर सरकारी होस्टलों में रह रही थीं. सहमति पत्र में दावा किया गया कि खम्मम में मेर्क और वडोदरा, गुजरात में ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन द्वारा मुफ्त में मुहैया करवाया जा रहा यह टीका एचपीवी संक्रमण से बचाएगा. लेकिन इसमें टीके से होने वाले अनेक नुकसानों का जिक्र नहीं था. छात्राओं से कहा गया था कि वे सहमति पत्र पर अपने अभिभावकों के हस्ताक्षर करा लाएं. इसकी एक प्रति तहलका के पास भी है. इसमें लिखा गया है, ‘अगर आप यह टीका नहीं भी लेती हैं तो कोई बात नहीं. आपको इसके लिए कोई सजा नहीं दी जाएगी.’ सरकारी स्कूलों की अनेक लड़कियों और उनके माता-पिता के लिए यह संकेत ही काफी था.
यह मानना गलत होगा कि टीकाकरण इन दो जिलों तक ही सीमित रहेगा. अनेक गैर सरकारी संगठन ऐसे अभियान के लिए देश के ग्रामीण इलाकों में संभावित इलाकों की तलाश में जुट गए हैं. बिहार की राजधानी पटना से 145 किमी दूर गांव गदरौल का मामला लेते हैं, जिसका जिक्र अब तक कहीं नहीं हुआ है. पिछले दिसंबर में कुछ लोगों का एक दल बक्सर जिले में स्थित इस गांव में पहुंचा जिन्होंने गर्भाशय कैंसर से बचाव के टीकों से होने वालेफायदों पर 45 मिनट की एक कार्यशाला का आयोजन किया. इसमें जिस तरह की टीके की गुलाबी तसवीर पेश की गई, उसके बाद किसी श्रोता ने सवाल पूछने की जरूरत नहीं महसूस की. यह दल मई में फिर गांव में लौटने वाला है. पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के डॉ. भरत सिंह बताते हैं, ‘ग्रामीण बिहार में सबसे बड़ा मिथक यह है कि टीके किसी बीमारी को रोकने का सबसे सुरक्षित उपाय हैं. और बिहार को दोष क्यों दिया जाए? भारत में कुछ ही शहर होंगे जहां डेफिनिटिव स्क्रीनिंग सिस्टम होगा (जहां दवा के दुष्प्रभावों की जांच होती है).’ स्वास्थ्य सचिव के सुजाता राव जैसी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की अधिकारी कहती हैं कि ऐसे महंगे टीके को राष्ट्रीय प्रतिरक्षण कार्यक्रम में शामिल करने की कोई संभावना नहीं है. 2008 में उनके पूर्ववर्ती नरेश दयाल ने भी यही रुख अपनाया था.
लेकिन इसके साफ सबूत हैं कि सरकार के पास टीके के बारे में बहुत कम जानकारी है. दो हफ्ते पहले मीडिया के साथ बातचीत में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के महानिदेशक डॉ. वीएम कटोच का कहना था, ‘भारत में सात या आठ तरह के गर्भाशय कैंसर पाए गए हैं. दुर्भाग्य से हमारे पास वास्तविक आंकड़े नहीं हैं. इसलिए हम रोगग्रस्त इलाकों की गंभीरता के बारे में नहीं जानते. हमारे पास कुछ अस्पतालों से जुटाई बहुत थोड़ी जानकारी है. इसलिए टीका किसी खास व्यक्ति को कितना फायदा पहुंचाएगा, यह हम नहीं जानते.’ इस बारे में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से प्रतिक्रिया पाने के लिए की गई बार-बार कोशिशें बेकार रहीं.
डॉ. राव कहती हैं, ‘मैं इसी तरफ इशारा कर रही थी. भारत में ऐसे अभियानों का मतलब यही है कि वे यहां की भोली-भाली लड़कियों पर इसका प्रयोग करके नतीजे देखना चाहते हैं.’ दिल्ली स्थित राष्ट्रीय इंस्टिट्यूट ऑफ       साइंस टेक्नोलॉजी एंड डेवेलपमेंट स्टडीज की डॉ. वाई माधवी इससे सहमत हैं. वे इस टीके के असरकारक होने के संबंध में विस्तृत आंकड़ों के अभाव की ओर भी ध्यान दिलाती हैं. अब तक हुए अध्ययन दिखाते हैं कि टीका सिर्फ पांच वर्ष के लिए ही सुरक्षा देता है. वे कहती हैं, ‘चूंकि टीके द्वारा लंबे समय तक असर और सुरक्षा के बारे में कोई जानकारी नहीं है, इसलिए हम दावा नहीं कर सकते कि इससे 60-70 प्रतिशत सुरक्षा भी हासिल हो सकेगी.’
इससे कई सवाल उठते हैं. मसलन, अगर बचाव पांच साल के लिए ही होता है तो क्या इसके बाद किसी बूस्टर डोज (यानी फिर से टीका लगाने) की जरूरत होगी? अगर बूस्टर डोज की जरूरत होगी और यह भी नहीं पता कि कितनी बार तो टीके से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का पहलू किस तरह प्रभावित होगा? फिर इन बूस्टर डोजों के लिए पैसा कौन देगा? 2008 के लिए चिकित्सा विज्ञान का नोबेल सम्मान हाराल्ड हाउसन को यह खोज करने पर मिला था कि एचपीवी गर्भाशय कैंसर के लिए जिम्मेदार है. वे कहते हैं कि सबसे अच्छी स्थिति में भी एचपीवी टीकों को बूस्टर डोज की जरूरत होगी.
इस साल 20 फरवरी के अंक में चिकित्सा जगत की मशहूर पत्रिका लैंसेट में प्रकाशित एक लेख में एरिक जे सुबा और स्टेफान एस राब ने वियत-अमेरिकी सर्विकल कैंसर प्रिवेंशन प्रोजेक्ट के हवाले से कहा गया है कि जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि एचपीवी टीके गर्भाशय का कैंसर रोकने में प्रभावी हैं तब तक विकासशील देशों को अपने इन टीकों पर भारी-भरकम खर्च करने की बजाय अपने सीमित संसाधन गर्भाशय की जांच में लगाने चाहिए. सरोजिनी पूछती हैं कि क्या भारत में किसी ने यह लेख पढ़ा है?
लगता है कि किसी ने नहीं. उन्होंने भी नहीं, जिन्होंने भारी शोर-शराबे के साथ यह टीकाकरण कार्यक्रम शुरू किया है.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें