हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भारत की क्षेत्रीय नीति में सुधार की जरूरत

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/25/2010 07:47:00 PM

प्रफुल्ल बिदवई

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बारे में, जो ऐसे देश हैं जहां अशांति फैली हुई है और जो भारत की सुरक्षा पर काफी बडा असर डाल सकते हैं. क्या भारत की कोई निश्चित और संगत नीति है? हाल में जो घटनाएं घटी हैं, उन्हें देखते हुए इस सवाल का ईमानदार जवाब होगा-नहीं. अपने पड़ोस के इस अहम हिस्से में, क्षेत्र के लोगों के हित में, स्थिरता लाने में मदद करने के लिहाज से भारत एक के बाद एक अवसर खोता चला गया है. अफगानिस्तान को लेकर इस्तांबुल और लंदन में जो सम्मेलन हुए थे, उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत हाशिए पर चला गया है.

अफगानिस्तान के नाटक में शामिल सभी अदाकार अब तालिबान के साथ सौदा करने, अपने नुकसानों में कमी करने और अपना पिंड छुडाने के फिराक में हैं. 'अच्छे तालिबान' और 'बुरे तालिबान' के बीच फर्क करने के खिलाफ भारत की दलील को किसी ने नहीं माना. चुनाव में अपनी विवादास्पद जीत के बाद राष्ट्रपति हमीद करजाई बहुत कमजोर पड़ ग़ए हैं. राजनीतिक तौर पर वे अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं और विधानमंडल द्वारा मना किए जाने के कारण उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले उम्मीदवारों को छोड़ देना पडा. अमरीकियों के उनके खिलाफ हो जाने के कारण वे परेशान हो गए हैं.

इस उम्मीद में कि अमरीकी सरकार की ''आतंक के खिलाफ विश्व स्तर पर लडा़ई'' बडे़ चरमपंथी खतरे पर काबू पा पाएगी, उसका पिछलग्गू बनने की बजाए यदि भारत ने 2001 से ही दृढ़तापूर्वक एक स्वतंत्र रुख अपनाया होता, तो अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन को कुछ संतुलित हिदायत देकर वह अफगानिस्तान के भविष्य को बेहतर बनाने में कुछ मदद कर सकता था. अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन ने सैनिक कार्रवाई का छोटा रास्ता अपनाया और वह लोगों के युध्द से नष्ट जीवन और बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण और विकास को बढा़वा देने और शासन की संस्थाओं की स्थापना के लिए पर्याप्त राहत और सहायता जुटाने में नाकाम रहा. भारत ने अफगानिस्तान को बेहतरीन असैनिक सहायता पहुंचाकर बहुत अच्छी साख बना ली है. इस सहायता का कार्यक्रम बेहद गरीब और पिछडे़ देश के हालात को समझते हुए कार्यान्वित किया गया है. इन हालात में शामिल हैं, खराब सडक़ें- जिसके लिए भारत में निर्मित ट्रक बहुत उपयुक्त हैं और कम से कम बिचौलियों और उपठेकेदारों को रख कर सहायता जुटाना. भारत ने अस्पतालों, स्कूलों और सड़कों का निर्माण भी किया है. लेकिन भारत ने जो रुख अपनाया है कि ''सभी तालिबान आतंकवादी हैं'' और इस बात पर जोर दिया गया है कि अमरीका अफगानिस्तान में बना रहे और पाकिस्तान पर दबाव डाले कि वह नवंबर, 2008 में मुंबई के हमलों के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करे और जिहादी आतंकवादी बुनियादी ढांचे को नष्ट कर दे, उससे वह अपनी अच्छी साख को प्रभाव में नहीं बदल पाया. ''अच्छे तालिबान और बुरे तालिबान'' के बीच फर्क के खिलाफ भारत का आग्रह, विद्रोही और अलगाववादी समूहों के बारे में उसके अनुभव अपने अनुभव के विपरित है. ये समूह अलग-अलग हद तक चरमपंथी हैं. इसके अलावा कुछ पश्तूनों और तालिबानों की पहचानें भी एक जैसी हैं जो यह महसूस करते हैं कि श्री करजई के शासन में उनके कबीले को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला. उनकी सहानुभूति तालिबान के साथ है, यद्यपि वे अंधाधुंध हिंसा और संगीत पर प्रतिबंध का समर्थन नहीं करते.

भारत को अफगानिस्तान के प्रति क्षेत्रीय दृष्टिकोण का समर्थन करना चाहिए. इसमें पाकिस्तान की भूमिका अहम है. अफगानिस्तान के स्थायित्व और पश्तूनों के प्रतिनिधित्व और कल्याण में पाकिस्तान का यथार्थ हित है. अफगानिस्तान में चरमपंथ पर लगाम लगाने में भारत का भी हित है क्योंकि उसके साथ हमारे सदियों पुराने संबंध हैं-गांधार सभ्यता से लेकर आधुनिक काल तक और ये संबंध संस्कृति, व्यापार, भाषा, संगीत और खानपान पर आधारित हैं. तार्किक दृष्टि से, न कि अयथार्थवादी दृष्टि से, देखा जाए, तो भारत और पाकिस्तान को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि उनके अपने-अपने और मिलेजुले हित अफगानिस्तान को मजबूत बनाने और उसके विकास में निहित हैं. इसके लिए सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और राष्ट्रपति हमीद करजई को आमंत्रित करके दिल्ली में एक क्षेत्रीय शिखर सम्मेलन आयोजित करें. लेकिन इतनी अच्छी पहलकदमी के लिए एक पूर्वशर्त है. भारत-पाकिस्तान के बीच वार्तालाप जल्द ही फिर शुरू किया जाना चाहिए. नवंबर, 2008 के बाद पाकिस्तान के साथ बातचीत करने से भारत का इनकार लंबी नाराजगी दिखाई देता है, न कि ऐसी परिपक्व कूटनीति, जो पाकिस्तान को, दोषियों को सजा देने और जिहादियों के खिलाफ कडी़ क़ार्रवाई करने के लिए प्रोत्साहित कर सके. पाकिस्तान के साथ दोनों देशों और उनके लोगों के लिए फौरी तौर पर प्रासंगिक मुद्दों पर चर्चा करने से इनकार करने पर भारत को कोई फायदा नहीं हुआ है.

भारत ने पाकिस्तानियों को जारी किए जाने वाली वीजाओं की संख्या में भारी कटौती की है जिससे सीमा पार आने-जाने वाले लोगों की संख्या में 80 प्रतिशत से भी ज्यादा कमी हुई है. इस कार्रवाई का शिकार बने हैं विभाजित परिवारों के साधारण लोग, या फिर सभ्य समाज के वे समूह जो शांति, जिहादी चरमपंथी के खिलाफ कडी़ कार्रवाई और दोनों देशों के बीच बेहतर आपसी मैत्री को बढा़वा देने के लिए सांस्कृतिक आदान-प्रदान के समर्थक हैं. इंडियन प्रीमियर लीग द्वारा पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों का बायकाट करने के बारे में लिया गया निर्णय खेल और सार्वजनिक शालीनता के प्रति घोर अपमान का सूचक है. इस प्रकार के बयानों से पाकिस्तान में भारत-विरोधी भावनाओं को बल मिल सकता है और शत्रुता और ज्यादा भड़क सकती है. भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत जितनी कम होगी, भारत सरकार अपने हितों की उतनी कम रक्षा कर पाएगी. दोनों देशों के बीच जितनी दूरी बढ़ती चली जाएगी, एक दूसरे के बीच की दुश्मनी भी उतनी ही बढ़ती जाएगी.

रास्ता सुधारने का समय अब आ गया है. भारत को आगामी सार्क गृहमंत्रियों के सम्मेलन से मिले मौके का फायदा उठाना चाहिए. इतना ही नहीं भारत को विदेश मंत्री स्तर की बातचीत के लिए भी कदम आगे बढाना चाहिए. ऐसा कोई कारण नहीं कि सियाचीन और सरक्रीक के मुद्दों को जल्द ही न सुलझाया जा सके. भारत यदि यह चाहता है कि पाकिस्तानी सरकार आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करे, तो उसके लिए सबसे बेहतर होगा कि वह बातचीत फिर से शुरू करे और पाकिस्तान को आश्वस्त करे कि भारत पाकिस्तान पर हावी नहीं होना चाहता और न ही वह उसे घेरना चाहता है या हाशिये पर धकेलना चाहता है.

एक दमनकारी होते राज्य में जनता का प्रतिरोध और साहित्य की जिम्मेदारियां

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/24/2010 12:13:00 PM

तद्भव का यह संपादकीय अपने आप में एक पूरी टिप्पणी है. हाशिया पर साभार.

इन दिनों राज्य के दमनकारी चरित्र को लेकर विचार मंथन की प्रक्रिया तीव्र हुई है। नक्सलवाद के सफाये के नाम पर बेकसूर और मुफलिस लोगों पर राज्य का कहर इसका ताजा और ज्वलंत उदाहरण है। यह एक दीर्घ श्रृंखला है। इसके अंतर्गत कश्मीर में आतंकवाद से मुकाबले की मुहिम के चलते वहां निर्दोषों को कत्ल, अत्याचार, बलात्कार तक का अंजाम भुगतना पड़ रहा है। बाटला मुठभेड़ हो या आजमगढ़ को आतंकवाद की नर्सरी घोषित करना, ये सब स्टेट के खूंखार की हद तक पहुंच चुकने के सबूत हैं। यहां हम गुजरात में हुए राज्य द्वारा प्रायोजित साम्प्रदायिक जनसंहार का जिक्र करना चाहेंगे और कर्नाटक तथा उड़ीसा की सरकारों को भी वाबस्ता करना चाहेंगे। तो क्या कहा जा सकता है कि इक्कीसवीं सदी में स्टेट ज्यादा हिंसक, शक्तिशाली और निरंकुश हुआ है? किसी नतीजे पर पहुंचने की हड़बड़ी न करते हुए तस्वीर को दूसरे कोण से भी देखना होगा...
राज्य को पहले से अधिक दमनकारी घोषित करने के पूर्व यह समझना होगा कि क्या आज उसके पास वाकई पहले की भांति अभेद्य और अथाह शक्तियां हैं? कहना न होगा कि अब इंदिरा गांधी के दौर की तरह स्टेट देश भर में आपातकाल लागू करने का फैसला शायद ही कर सके। आपातकाल सरीखी बड़ी दुर्घटना की बात छोड़ दें, मौजूदा दौर में केन्द्र सरकार के पास प्रांतीय सरकारों को बर्खास्त करने का कानूनी हक प्राप्त होने के बावजूद उसके इस्तेमाल का बल नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में उसने जब भी इस्तेमाल करने की ख्वाहिश दिखायी तो राष्ट्रपति और उच्चतम न्यायालय जैसे संवैधानिक केन्द्रों ने निरस्तीकरण का हौसला भी दिखाया है। नतीजन अब प्रांतों में जबरन राष्ट्रपति शासन लागू करने के उदाहरण नहीं मिलते हैं। इस कड़ी में यह भी जोड़ा जा सकता है कि जितने अधिक मंत्री, सांसद, विधायक, प्रशासक इस दौर में सजायाफ्ता हो रहे हैं उतना पहले कभी नहीं। चुनाव में बूथकैप्चरिंग के हादसों में भी काफी गिरावट आयी है। इन सकारात्मक लक्षणों के निर्माण में एक बड़ा कारण यह रहा है कि राज्य की विभिन्न महत्वपूर्ण एजेंसियों के बीच अपनी अपनी शक्ति और स्वायनता की चेतना विकसित हुई। इसके अतिरिक्त मीडिया, तकनीक, नागरिक जागरूकता की भूमिकाएं भी अहम सिद्ध हुइर्ं हैं। लेकिन यह भी कि सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत की कमी से भी स्टेट की मिथकीय ताकत की मुश्कें ढीली हुईं। फिर केन्द्रीय सरकार से इतर प्रांतों में भिन्न विचार व्यवहार वाली राजनीतिक सनाओं की उपस्थिति के तनाव ने भी राज्य के दमनकारी चरित्रा में संतुलन की निर्मित की।
उपर्युक्त विश्लेषण से लग सकता है कि इधर राज्य के अधिक दमनकारी हो जाने का विचार महज एक शोर है। हल्ला। लेकिन क्या सचमुच राज्य दिनोंदिन कमजोर या सहृदय होता जा रहा है? यदि यह सत्य है तो राज्य के बर्बर और हिंसक होने का मत गल्प है-एक चटपटा वृतांत? या दोनों अपने अपने ढंग से सच हैं कि दोनों अपने अपने ढंग से झूठ?

दरअसल राज्य के जन्मदिन से ही उसकी दमनकारी भूमिका भी अस्तित्व में आयी और उसी के साथ दमन के प्रतिरोध का भी आरम्भ हुआ। राजसना कितनी भी महाबली एवं जालिम हो, वह निर्विरोध कभी नहीं हुई। प्रतिपक्ष के पास यदि सीधी मुठभेड़ की क्षमता नहीं रही तो वह समाज के लोकगीतों, आख्यानों, लतीफों, गप्पों में छिप कर छापामार युद्ध करता रहा। असहमति और विरोध का ही असर था, राज्य ने समय समय पर अपने बेहतर अवतार की घोषणा की और दावा किया कि वह ज्यादा नरम, मानवीय, करुण और कमजोर हो गया है। लेकिन इसके बावजूद उसने अपना दमनकारी रवैया नहीं छोड़ा। दमन उसका कवच, हथियार और विचार तीनों बना रहा। इसीलिए नये समाज के निर्माण में सबसे महान ख्वाब यह देखा गया कि राज्य मिट चुका है, उसके बगैर मनुष्यता अपने सुंदरतम तथा सर्वोत्तम रूप में सव्यि है। जनता के बीच सभी हर किसी की जरूरतों, आकांक्षाओं का सम्मान करेंगे और सामाजिक क्रिया व्यापार में राज्य नामक मशीनरी नेस्तनाबूत हो चुकी होगी। बहरहाल यह सपनों के विध्वंस का दौर है, महान सपनों का सृजन करने वाली स्वप्नगर्भा परिस्थितियों की कोख के सूनी होने का समय है, इसलिए हम राज्यविहीन समाज की चर्चा को विराम देते हुए महज इतना कहना चाहते हैं कि राज्य का विरोध करने वाली शक्तियां हमेशा रही हैं और आज भी हैं।
अब हम राज्य का विरोध करने वाले एक अन्य पक्ष की तरफ ध्यान आकृष्ट करना चाहेंगे। अभी हाल में ही महत्वपूर्ण कथाकार राजू शर्मा का अप्रतिम उपन्यास 'विसर्जन' प्रकाशित होकर आया है। विसर्जन की सार्थकता और विलक्षणता का विश्लेषण करने का यहां अवसर नहीं है, यहां हम उसका सप्रयोजन एक अंश उद्धृत करना चाहते हैं। यह कथन उपन्यास के भीतर सबसे बड़े शक्तिकेन्द्र, खलनायक, विश्वविख्यात अर्थशास्त्री, पदमविभूषण पी.वी. द्वारा उच्चरित है : तुम्हारा राज्य और उसके अंग उत्तर आधुनिक समाज का कैदखाना हैं। राज्य का स्वरूप और नियमन इस युग की सृजन क्षमता की राह में कांटा है। इसे निकालना अब जरूरी हो गया है। समझ लो, यह इक्कीसवीं सदी का महाभारत है। इस देश में एक लाख सेनानी वो हैं जो डालर मिलिनेयर हैं। देश की दस फीसदी आय इनकी बदौलत है। कारोबार, उद्यम और सृजन के इंजन यही हैं। और मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि श्रीकृष्ण की तरह मैं इस सेना को मार्ग दिखा रहा हूं। और जो तुम सुन रहे हो वह इस युग की गीता है।' पृष्ठ - 443
इस बिन्दु पर राज्य के दमनकारी होने और अपेक्षाकृत उदार होने की गुत्थी सुलझती नजर आ रही है। हुआ यह है कि उत्तर आधुनिक समय में राज्य के चेहरे का जो उदारवादी हिस्सा है वह विसर्जन के पी.वी. के शब्दों में 'डालर मिलिनेयर' के लिए है। बीसवीं सदी और इक्कीसवीं सदी के मध्य एक फर्क यह भी है कि बीसवीं सदी में गरीब, शोषित मनुष्य के पक्ष में राज्य के खिलाफ संघर्ष छेड़ा गया, कुर्बानियां दी गयीं जबकि 'इक्कीसवीं सदी का महाभारत' पूंजीपति वर्ग के लिए सम्पन्न हो रहा है। यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि एक लाख डालर मिलिनियर लोगों की जो सेना है उसकी ताकत बाजार है इसलिए बाजार को जगमग बनाये रखने के लिए उक्त मिलिनियर वर्ग दबाव बनाता है कि राज्य 'उदार' हो। ऐसी स्थिति में प्रस्तुत की गयी राज्य की उदारता का लाभ मिलिनियर वर्ग और उस तबके को मिलता है जो अपनी व्यक्षमता के कारण बाजार में सम्माननीय होता है। यही वजह है कि सेना के प्यादों के रूप में देश भर में फैला मध्यवर्ग भी स्टेट को फूटी आंख पसंद नहीं करता। इतना नापसंद करता है कि मतदान में भागीदारी से भी गुरेज करता है। कितनी दिलचस्प स्थिति है कि राज्य की भर्त्सना करो और राज्य को अपने हित में इस्तेमाल करो।
जब संसार एकध्रुवीय व्यवस्था में समाया हुआ न था तब गैर समाजवादी सरकारों को भी लगता था कि खुलेआम वर्चस्वशाली वर्ग की हिमायत करने पर जनता उनके ताज उछाल सकती है, इसलिए राज्य अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए एक जनप्रिय चोला धारण करता था। अतः जनता के सम्मुख यदि राज्य और धनाढ्य वर्ग के बीच अपनी नजदीकी बताने का अवसर आता था तो वह राज्य की तरफ झुकी दिखती थी। क्योंकि जैसा भी हो, निजी के समानांतर राज्य सामूहिकता के रेशों से बनता है फलस्वरूप वह चाहे न चाहे, लोकतंत्रा में उसे जवाबदेह होना होता है। राज्य और उद्योगपतियों के बीच जनरुचि के संदर्भ में यह भी सच है कि आज भी समाजवाद के स्वप्न से गुजरे हुए मानस की बनावट राज्य के करीब ठहरती है। इसे एक रोचक उदाहरण से भी देखा जा सकता है। एक दिन मैंने अपने मोबाइल फोन में संरक्षित नम्बरों को देखने पर पाया कि चालीस से ऊपर की अवस्था वाले अधिसंख्य लेखकों (चार महानगरों को छोड़ दें) के फोन नम्बर भारत सरकार के उपक्रम बीएसएनएल के थे जबकि चालीस से कम अवस्था वाले अधिसंख्य रचनाकारों के फोन निजी कम्पनियों के थे।
भूमंडलीकरण के बाद निश्चय ही स्थितियां बदलने लगीं। जहां पहले राज्य अपनी लोकप्रियता और अस्तित्व रक्षा के लिए ही सही गरीबों के प्रति सदय और अमीरों के प्रति सख्त होने का यथार्थ या स्वांग प्रस्तुत करता था, वहीं भूमंडलीकृत विश्व में राज्य वंचित तबके के प्रति अपने दायित्वों को दरकिनार करके वर्चस्वशाली समुदाय के लिए निधड़क गलीचे बिछाने लगा। गरीबों, किसानों, मजदूरों को दी जा रही रियायतों को कम या खत्म करते हुए उद्योगपतियों को तोहफे देने की होड़ मच गयी। वस्तुतः अमीरों के लिए राज्य का यह तथाकथित लचीला और उदारवादी आचरण एक तरह से साधारणजन के लिए दमनकारी ही था। उसके हित, उसकी रियायतों को क्षतिग्रस्त करने के कारण वह दमनकारी था तो औद्योगिक घरानों को जनता को लूटने का स्वर्ण अवसर मुहैया कराने के कारण भी वह दमनकारी था। यह बहुत लुभावना और भयानक कारोबार था जिसमें राज्य विनम्र, दूरंदेशी और उदार दिखता था किन्तु वह उद्धत, चालू और निर्मम था। वह अपने फरेब पर मुग्ध और आश्वस्त था कि मामूली लोग हकीकत नहीं जान सकेंगे। इस स्थिति का सटीक उदाहरण था एनडीए के नेतृत्व वाली सरकार। इंडिया शाइनिंग की तोप लेकर वह चुनाव में जनता को भरमाने निकली थी लेकिन मुंह की खायी।
एनडीए सरकार की पराजय के बाद आप सना के मुद्दों और भाषा का अध्ययन करें तो सुर बदला हुआ दिखेगा। अभी स्वतंत्रता दिवस की 62वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम जो व्याख्यान था उसमें ग्रामीण क्षेत्र और गरीब आदमी के लिए काफी आहें कराहें थीं। उन्होंने 7 प्रतिशत कृषि विकास दर का लक्ष्य रखा, कुपोषण खत्म करने पर बल दिया। खाद्य सुरक्षा कानून बनाने, शीघ्र ही महिला विधेयक लाने, सूखे से निपटने के लिए हर तरह की मदद करने का आश्वासन परोसा। उन्होंने हरित क्रांति की वकालत की और कहा कि जमाखोरों पर सख्त कार्रवाई की जायेगी और अल्पसंख्यकों की भलाई पर जोर दिया जायेगा। इस कड़ी में इस सरकार द्वारा शपथग्रहण के बाद सौ दिन के भीतर वायदों के क्रियान्वयन के लक्ष्य को भी शामिल करें, थोड़ा और पीछे जाकर पिछले कार्यकाल की नरेगा और सूचना का अधिकार सरीखी योजनाओं का आकलन भी करें तो चकित होना पड़ता है कि राज्य सचमुच कल्याणकारी राज्य, जनतांत्रिक राज्य की दिशा में दौड़ लगा रहा है?
इसलिए क्या यह खुश होने, जश्न मनाने का समय है? नहीं, यह सोचने की घड़ी है। इतिहास गवाह है कि जब समाज में असंतोष तीव्र होता है, वह फूट फट पड़ने के सीमांतों को छूने लगता है तो वह वंतिकारी चरण में रूपांतरित न हो सके, इसलिए राज्य कल्याणकारी चोला पहन लेता है। दुनिया में समाजवाद के चरण जब बढ़ने लगे थे और समाजवाद दुनिया के सताये हुए, परेशान लोगों को अपनी मुक्ति का मार्ग लगने लगा था तब पूंजीवाद नियंत्रित राज्यों ने अपने अपने यहां अनेक कल्याणकारी घोषणाएं की थीं। मेहनतकश लोगों को सामाजिक सुरक्षा देने का इरादा जताया था। कह सकते हैं कि भलमनसाहत उसकी सद्बुद्धि के कारण नहीं रणनीति के कारण थी। हमारे देश में भी इधर राज्य अगर जनोन्मुखी दिखायी दे रहा है तो इसीलिए कि भूमंडलीकरण, चमक दमक, एक लाख डालर मिलेनियर लोगों के सेनानी होने की भ्रांतियों का गुब्बारा फूट चुका है। हाशिए पर पड़े समाज की तकलीफें सब्र और कराहों की जद से बाहर निकल कर चीख और गुस्से में बदलने लगी हैं। रिलायंस के आउटलेट्स को लूटने की, सेज के विरोध में प्रबल संघर्ष की घटनाओं को इससे जोड़ कर देखा जाना चाहिए।
यकीन करें लोक लुभावन फाहों से जैसे ही मामूली मनुष्य का गुस्सा, उसका आवेश थिर होगा, राज्य अपने 'स्वाभाविक' ड्रेस में पुनः प्रकट होगा।
आखिर में यह भी कहना है कि जिस दिन राज्य को लगता है कि उसके चोला बदलने के करतब को कोई वर्ग या समुदाय यथार्थ नहीं अभिनय व रणनीति मान रहा है, वास्तविकता को समझ गया है, वह अपने दमनात्मक हथियारों को खुलेआम पहटने और प्रयुक्त करने लगता है। इसी तर्क से आज जहां जहां सशक्त प्रतिरोध का स्वर बुलंद है, आक्रामक है और संगठित है, वहां राज्य निर्लज्ज रूप से दमनकारी है।
साहित्य की दुनिया में हमें राज्य की रणनीति, होशियारी को उजागर करना होगा। उसके दमन का प्रतिपक्ष बनना होगा। हमें राज्य की ताकत का शिकार बने उजड़े हुए, मिट रहे, बिछुड़े हुए, लथपथ लोगों के पक्ष में खड़ा होना होगा। जाहिर है कि यह छटाक भर संवेदना, आधा छटाक सरोकार और पांच किलो कलाकारी वाले लेखन के बूते का नहीं जिसका चलन आजकल कुछ ज्यादा हो गया है।

आर्थिक संवृध्दि का मायाजाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/20/2010 12:05:00 PM

गिरीश मिश्र
पिछले कई हफ्तो से यह धुआंधार प्रचार चल रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था विश्वव्यापी अति मंदी के भंवर से लगभग बाहर आ गई है। उसकी संवृध्दि रफ्तार पकड़ने लगी है और वह दिन दूर नहीं जब वह दो अंकों में हो जाएगी तथा भारत विश्व की एक महाशक्ति बन जाएगा। साथ ही यह रेखांकित करने की कोशिश हो रही है कि भारत महाशक्ति बनने का लक्ष्य वर्षों पहले प्राप्त कर लेता यदि नेहरूवादी चिंतन और दृष्टिकोण आडे़ नहीं आए होते। नेहरू-इंदिरा युग में भारतीय अर्थव्यवस्था 3.5 प्रतिवर्ष की ''हिन्दू'' संवृध्दि दर के भंवर से बाहर नहीं आ सकी थी। दावा किया जाता है कि 1991 में नरसिंह राव के सत्तारूढ़ होते ही नेहरूवादी चक्रव्यूह टूटा और अर्थव्यवस्था उससे निकलकर आर्थिक सुधारों की सडक़ पर सरपट दौडने लगी। आर्थिक संवृध्दि दर दोगुनी से भी अधिक हो गई।
 यह उक्ति सर्वविदित है कि आमतौर से जो दिखता है वह कोई जरूरी नही है कि वास्तविकता के करीब है। अमित भादुडी़ ने अपनी प्रकाशित पुस्तक (द फेंस यू वेअर अफ्रेड टू सी, पेंगुइन, 2009)  में तथ्यों के आधार पर बतलाया है कि भारतीय अर्थ व्यवस्था प्रत्यक्षत: भले ही सेहतमंद लगे वस्तुत: वह एक गंभीर बीमारी से ग्रस्त है जो कैंसर की तरह देश की अर्थव्यवस्था और राज्य व्यवस्था पर हावी होने लगी है। वस्तुत: हम इतिहास के उन छलावे भरे गलियारों में से एक से होकर गुजर रहे हैं, जहां हम भ्रांति के शिकार है कि किसी भी कीमत पर हम संवृध्दि की उच्च दर प्राप्त कर लें तो हम देश और उसकी जनता को विकास से मार्ग पर ले जाएंगे। यह धारणा घर कर गई है कि संवृध्दि और विकास एक दूसरे से पर्याय है। यह दावा किया जा रहा है कि यदि येन- केन- प्रकोरण कुछ लंबे समय तक आर्थिक संवृध्दि की रफ्तार बनाई रखी गई तो आर्थिक विकास स्वत: प्राप्त हो जाएगा यानी वांछित आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलाव आ जाएगा। दूसरे शब्दों में विकास संवृध्दि का उप उत्पाद (बाई प्रोडक्ट) है।
 कहना न होगा कि उपरोक्त धारण तर्क एवं आर्थिक इतिहास से मिलने वाले तथ्यों एवं अनुभवों के विपरीत है। फिर भी देशी- विदेशी निहित स्वार्थ इसका ढिंढोरा पीट रहे हैं। प्रो. भादुडी़ के अनुसार इस प्रकार की भ्रामक धारणाओं के पीछे बडे़ क़ारोबारी हैं, जो पैसों के बल पर तथाकथित विशेषज्ञों को उन्हें सृजित करने लिए प्रेरित करते और मीडिया के जरिए मोहक शब्दों और तर्कों से सुसज्जित कर फैलाते है। इस क्रम में बडे़ क़ारोबारियों एवं राजनेताओं के बीच परस्पर गंठबंधन हो जाता है। यह अनायास नहीं है कि 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों के बीच करोड़पति उम्मीदवारों की संख्या 128 में बढ़कर 300 हो गई। उपर्युक्त भ्रामक धारण को प्रचारित करने में शिक्षित मध्यम वर्ग की भारी भूमिका होती है। आए दिन पत्र पत्रिकाओं एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया में वे उनके समर्थन में दलीले देते दिखते हैं।
 नेहरू के जमाने में सर्वोपरि महत्व देश की एकता और अखंडता को दिया जाता था। आर्थिक संवृध्दि के परिणामस्वरूप लोगों की वास्तविक आय में बढो़तरी के साथ-साथ दलितों, पिछडे़ वर्गों, आदिवासियों तथा अन्य शोषित- पीडि़त व्यक्तियों पर विशेष ध्यान दिया जाए जिससे उन्हें रोजगार के पर्याप्त अवसर मिलें और शिक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं प्राप्त हों। इसलिए आरक्षण पर जोर दिया गया। साथ ही पिछडे़ क्षेत्रों के आर्थिक विकास को तरजीह देने पर बल दिया गया। नेहरू का ख्याल था कि यदि समाज में व्याप्त असमानता को मिटाने तथा क्षेत्रीय असंतुलन को खत्म करने की ओर आर्थिक नीतियों की उन्मुख रखा जाय तो देश में एकता मजबूत तथा अलगाव वादी भावनाएं दूर होंगी। सभी नागरिक एवं क्षेत्रों का परस्पर जुडा़व बढेग़ा। स्पष्ट है कि राज्य की मजबूत सक्रिय भूमिका के बिना यह असंभव था। इसीलिए राजकीय क्षेत्र अर्थव्यवस्था में पनपा जो अधिकतम मुनाफे के लक्ष्य से ऊपर उठ कर काम करने लगा। बरौनी में तेल शोधक कारखाना और भिलाई में इस्पात कारखाना पिछडे़ इलाकों के विकास को सर्वोपरि रखकर लगाए गए।
नरसिंह राव सरकार के जमाने से जो आर्थिक सुधार कार्यक्रम चालू किए गए हैं, उनके तहत राज्य की आर्थिक भूमिका सिकुड़ती जा रही है। नेहरू-इंदिरा काल में 3.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की तथा कथित हिन्दु दर के बावजूद रोजगार के अवसर दो प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़े मगर 1990 के दशक के बाद आर्थिक संवृध्दि यानी (सकल राष्ट्रीय आय) की बढोतरी भले ही 7 प्रतिशत या उस से भी कम प्रति वर्ष बढे़ हैं। रोजगार के अवसर मिलने से आदमी का अपने पैरों पर खडा़ होने के साथ उसका राष्ट्र एवं समाज से जुडा़व बढ़ता है।  वह यह महसूस करता है कि वह अपनी क्षमता और कौशल का इस्तेमाल राष्ट्र के हित में तथा उसके निर्माण के लिए कर रहा है। जब उसे रोजगार नहीं प्राप्त होता तब हीन भाव उस पर हावी होने लगता है। नेहरू- इंदिरा काल में नियमित रोजगार के अवसर पैदा करने पर जोर था। परिणामस्वरूप संगठित क्षेत्र का विस्तार हो रहा था। मगर अब नजरिया बदल गया है। संगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढा़ने के बदले कम करने पर जोर है। कहना न होगा कि असंगठित क्षेत्र से ठेके पर या दैनिक मजदूरी देकर काम कराने में पूंजीपति फायदे में रहते हैं। मजदूरी की दर और काम के घंटों और स्थितियों के मामले में उनकी चलती है। श्रम कानून और श्रम विभाग आडे़ नहीं आते। किसी भी प्रकार के सवैतनिक अवकाश का प्रश्न ही नहीं उठता। यूनिफॉर्म तथा आवास की व्यवस्था नहीं करनी पडती।
 नेहरू के जमाने में घरेलू बाजार को ध्यान में रखकर ''क्या, कैसे और किनके लिए'' जैसे उत्पादन से जुडे प्रश्नों के उत्तर तलाशे जाते थे। आज स्थिति बदल गई है. अब उन्हीं वस्तुओं के उन्हीं प्रौद्योगिकियों से उन्हीं लोगों के लिए उत्पादन पर जोर है जिससे हमारा माल विदेशी बाजार में बिके। देश की अपनी जनता गौण हो गई है। हमारे अपने देशी बाजार के लिए जो वस्तुएं और सेवाएं उत्पन्न की जाती हैं उनको क्रयशक्ति सम्पन्न लोगों की ओर उन्मुख किया जाता है। यह अकारण नहीं है कि आम जन के लिए उपर्युक्त कपड़ों, जूतों आदि पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। चूंकि हमारा उत्पादन मुख्यतया विदेशी बाजार तथा देशी सम्भ्रांत लोगों पर विशेष ध्यान रखता है इसलिए श्रम उत्पादकता बढा़ने और मजदूरी संबंधी लागत कम करने पर जोर दिया जाता है।  दलीलें दी जाती हैं कि भूमंडलीकरण के वर्त्तमान युग में विदेशी प्रतिद्वंद्विता में इसके बिना ठहर पाना असंभव है। यही कारण है कि श्रमिकों को जब मन आए तब हटाने तथा उन्हें अनुशासित करने के नाम पर श्रम कानूनों में मालिकों के मनोनुकूल परिवर्तन करने की मांग तथा कथित विश्व प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों एवं विशेषज्ञों द्वारा लगातार उठाई जा रही है। याद होगा कि सेज की स्थापना करते समय श्रम कानूनों और श्रम संगठनों को उसकी सीमा रेखा से बाहर रखने की बात की गई थी क्योंकि तभी उनमें निवेश होगा और उनके मालों की उत्पादन लगात कम होगी तथा वे विश्व बाजार में टिक पाएंगे।
चूंकि हमारे यहां संवृध्दि का सम्मोहन लगातार बढ़ता जा रहा है इसलिए विदेशी निवेश के साथ ही सेवाओं के क्षेत्र और उसके बाद विनिर्माण के क्षेत्र पर जोर है। कृषि क्षेत्र जहां हमारी दो तिहाई जनसंख्या लगी है, काफी उपेक्षित होती जा रही है। राजकीय कृषि निवेश में अपेक्षित वृध्दि नहीं हो रही है। सकल घरेलू उत्पादन में कृषि क्षेत्र का सापेक्ष हिस्सा निरंतर घटता जा रहा है। परिणाम स्वरूप कृषि क्षेत्र में लगे लोगों की प्रति व्यक्ति वास्तविक औसत आय नही बढ़ रही है। गांवों से शहरों की और लागतार पयालन हो रहा है। परिणामस्वरूप शहरों में मलिन बस्तियों का प्रसार होता जा रहा है। समाज में आय और संपदा की दृष्टि से विषमता बढ़ रही है। एक ओर जहां फोर्ब्स पत्रिका
द्वारा प्रकाशित विश्व के बडे़ धनवानों की सूची में भारतीय की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है, वहीं बीस रूपये या उससे कम की दैनिक आय पर गुजारा करने वालों की तदाद में भी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। हर जगह धनी-गरीब के बीच अंतर में वृध्दि हो रही है। आर्थिक विषमता में वृध्दि और धनाढ्यों द्वारा अपने वैभव के प्रदर्शन के कारण अपराध विभिन्न रूपों में प्रकट हो रहा है। अपहरण की संख्या में खासी वृध्दि हुई है। आए दिन शराब पीकर यातायात के नियमों की धज्जी उडा़ पटरियों पर चलने या सोने वालों की जान जाना आम बात है। पांच लाख रूपए की गाडी़ वाले पांच कौडी़ के आदमी की भला क्यों परवाह करें? ऐसा नहीं है कि धनाढ्य सुखी हैं। उनके मुहल्लों में बाडे़ लग रहे हैं। चौकीदार खडे़ कर वे हर समय अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है। साफ है कि आर्थिक संवृध्दि से सबसे अधिक लाभान्वित होने वाले भी चिन्ता रहित सुखी जीवन व्यतीत नहीं कर पा रहे। फिर मधुमेह और ह्दय रोग में तेजी से बढोतरी आरामतलबी का परिणाम है।
समाज में आर्थिक विषम की बढोतरी का परिणाम माओवादी आंदोलन के विस्तार में तथा क्षेत्रीय असंतुलन में इजाफा का प्रकटीकरण तेलंगाना, विदर्भ गोरखालैंड आदि से जुडे़ अलगावादी आंदोलन में हो रहा है। पिछडे़ राज्यों से जीविका की खोज में आने वालों के प्रति महाराष्ट्र, असम, पंजाब आदि में जो भावनाएं देखी जा रही हैं, वे देश की अखंडता के लिए ठीक नहीं है।
नई आर्थिक नीतियां नवउदारवादी चिंतन पर आधारित हैं जिनका वर्तमान गढ़ शिकागो है। अगले पखवाडे़ हम देखेंगे कि उनकी रूपरेखा क्या है और वह नेहरूवादी दृष्टिकोण को क्यों अपदस्थ कर रहा है।

मुझे निष्कासित नहीं करने का कारण बताए प्रशासन

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/18/2010 01:21:00 PM

दिलीप
यह हिंदी विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं का दुर्भाग्य है कि उनके पास अपनी बात रखने का ज़्यादा विस्तृत आयाम विश्वविद्यालीय मंच के बजाए मीडिया मुहैया कराती है.  मैं इसे दुर्भाग्य इसलिए मान रहा हूँ क्योंकि मीडिया के जरिए यहाँ की सहमति-असहमति देश-दुनिया के लोग सुन तो लेते हैं लेकिन इसका समाधान कानूनी तौर पर अंततः विश्वविद्यालय प्रशासन के पास ही होता है. छात्रों के पास मीडिया है, विश्वविद्यालय के पास कानून है. विद्यार्थी मीडिया का इस्तेमाल जानता है, प्रशासन कानून का इस्तेमाल जानता है. प्रशासन राजनीतिक मामले में यहाँ के छात्रों से कहीं अधिक परिपक्व है. उनकी परिपक्वता का आधार तर्क नहीं है बल्कि वे कुछ काम शुरू से ही  शानदार फिनिसिंग के साथ करते रहे हैं. इनमें छात्र-छात्राओं को मुद्दे से भटकाना और उनके बीच अविश्वास की एक मोटी काली चादर खड़ी करना एक क्षेत्र ऐसा है जिसमें उन्होंने लगातार बड़ी सफ़लता हासिल किया है.  यहाँ मुद्दों की बाढ़ आती है. अब छात्रों को यह तय करना होता है कि वे किस मुद्दे को अपनी प्राथमिकता की शुरूआत में रखते हैं. बाहरी लोगों (मेरा मतलब यहाँ की स्थितयों को सिर्फ़ मीडिया से जानने वाले लोगों से है) को शायद यह पता न हो कि यहाँ विद्यार्थियों की कुल संख्या महज 300 के आंकड़े को छूते हैं. और यह भी कि इनमें से लगभग 100 विद्यार्थी शोध के सिलसिले में शहर से बाहर ही रहते हैं. अब यह आसानी से महसूसा जा सकता है कि  वर्तमान समय में छात्र राजनीति के अर्थ में जिस तरह नकारात्मकता भरा गया है उससे कई छात्र इस पचड़े से दूर रहना ही पसंद करेंगे. कुछ छात्रों के भीतर स्वाभाविक तौर पर प्रतिकार करने के गुण होते है लेकिन यह भी बहुत सच है कि यही वह समय होता है जब घर-परिवार और समाज की बड़ी अपेक्षाओं से वे दबे होते हैं. उनका अंतर्द्वन्द्व इन दो मुद्दों को लेकर तीक्ष्ण स्तर तक गुथता है जिनमें उसे कैरियर और विरोध को चुनना होता है. जाहिर है विरोध कैरियर का  विकल्प नहीं हो सकता. इन दो स्तरो के विद्यार्थियों को प्रशासन लगातार बहला-फुसलाकर और भविष्य के हसीन सपने (एम. फिल. और पीएचडी. मे नामांकन सहित कई तरह के विश्व्विद्यालयीय नौकरियों के सपने) दिखाकर- जिसमें डर के तत्त्व को चासनी के तौर पर लपेट दिया जाता है - अपने पक्ष में करने का हर संभव यत्न करता है. हालाकि कई विद्यार्थियों में प्रशासनिक जी हुजूरी के भी स्वाभाविक गुण पाए जाते है जिसके कारण इनके मद में प्रशासन को अधिक ऊर्जा खर्च नहीं करना पड़ता. अब बच गए बेचारे विरोध को अपना वर्तमान और भविष्य समझने वाले स्टूडेंट (जिनके बारे में देश भर में यह भ्रामक प्रचार है कि ये पढ़ने में निहायत ही बेवकूफ़ टाइप के होते है). इन्हें देश भर में अपने बारे में मौजूद भ्रांतियां भी तोड़नी है और विरोध को भी लगातार जारी रखना है. हिंदी विश्वविद्यालय के  प्रशासनिक हित के आड़े इस हिसाब से कुल कितने कमिटेड विद्यार्थी आते है, जबकि उनकी कुल संख्या उतनी ही है जितनी ऊपर बताई जा चुकी है, यह एक सवाल है? प्रशासन का यह गणित बहुत ठोस है. 
    बावजूद इन तमाम तथ्यों के, जिनमें से ज़्यादातर प्रशासनिक पक्ष में ही झुके हुए है, प्रशासन कुछ और स्तर पर सक्रिय है. मसलन यहाँ शिक्षकों के यूनियन है. ग़ैर शैक्षणिक कर्मचारियों के यूनियन है लेकिन छात्र यूनियन और चुनाव को लेकर यहाँ अब तक कुलपति अपनी असहमति जाहिर करते रहे है. आखिर वे कौन से कारण है जो छात्र संघ के गठन नहीं करने को लेकर उनकी इस राय को पुख्ता करते हैं? शायद छात्रों की एकजुटता के संभावित खतरे.
    अभी अनिल चमड़िया के मामले को लेकर लगातार बहस चल ही रही है कि इसी बीच बड़ी सतर्कता के साथ एक और बड़ा मुद्दा छात्रों को थमा दिया गया. मोहल्ला पर अभी-अभी पीएचडी के छात्र अनिल के डिग्री त्यागने संबंधी एक चिट्ठी को सार्वजनिक किया गया था. डिग्री त्यागने संबंधी मुद्दे पर 22 छात्र-छात्राओं के बीच सहमति थी. यह विश्वविद्यालय पर एक बड़े दबाव का कारण बन सकती थी. इसको दुरूस्त करने और अनिल चमड़िया के जाने के बाद छात्रों में जन्में असंतोष को एक अलग दिशा में मोड़ देने के लिए गुरूवार (दिनांक 18.02.2010) को  अनिल को छः महीने के लिए रेस्टीकेट करने का पत्र भेज दिया गया. इस दौरान अनिल दिल्ली से वर्धा आ रही रेलगाड़ी में थे. अनिल शुरू से बोलने वाले छात्र के तौर पर जाने जाते है. वह ख़तरनाक साबित हो रहे थे. विश्वविद्यालय में और ख़ास तौर पर जनसंचार विभाग में उसने कई सवाल उठाए जिसके जवाब देने में प्रशासन असहज महसूस करता रहा. यह बारीक राजनीति है जिसमें एक छात्र द्वारा डिग्री त्यागने का आधिकारिक इस्तेमाल किए जाने से पहले ही उसे निष्कासित कर दिया गया. काम भी हो गया और इज़्ज़्त भी सुरक्षित रह गई. अब कुछ छात्रों का ध्यान भी मूल मुद्दा अनिल चमड़िया से भटक कर शोध छात्र अनिल के निष्कासन पर टंग जाएगी. बहुत खूब विभुति जी.
      अब जरा अनिल पर लगे आरोप के बारे में जान लिया जाए. पिछले छमाही में हमारा बैच ’जनसंपर्क’ पर सेमिनार प्रस्तुत कर रहा था. अनिल सेमिनार में बैठना चाह रहे थे. सहायक प्रोफेसर अख़्तर आलम ने उसको कक्षा में आने से रोक दिया. उनका कहना था कि जब तक विभागाध्यक्ष से वह अंदर आने की अनुमति नहीं ले लेता उसको अंदर नहीं आने दिया जाएगा. अनिल ने प्रतिवाद किया. अंत में अख़्तर आलम ने मुझसे पूछा कि क्या कोई सीनियर विद्यार्थी दूसरे बैच के सेमिनार में बैठ सकते हैं?  मैंने जवाब दिया कि हाँ बैठ सकते हैं और अब तक बैठते आए हैं. यह विश्वविद्यालय में पहला मौका था जब किसी विद्यार्थी को सेमिनार में आने से यह कहकर रोका गया कि इसके लिए विभागाध्यक्ष की अनुमति ज़रूरी है. अख़्तर आलम के  पास फैसला लेने का क्या इतना साहस नहीं था कि वे या तो सीधे रोक सके या फिर अंदर आने दें?  दरअसल कमज़ोर व्यक्ति की कमज़ोरी वक़्त-बे-वक़्त साफ नमूदार हो जाती है. अख़्तर आलम विभागाध्यक्ष ’चोर गुरू’  अनिल राय अंकित के बहुत ही खा़स हैं. विभाग की अनियमितताओं पर सवाल उठाने वाले छात्रों को परेशान करने के लिए यह एक स्पष्ट योजना का हिस्सा थी जिसके तहत अनिल को न सिर्फ़ रोका गया बल्कि इस घटना के बाद उल्टे अख्तर आलम ने यह शिकायत की कि अनिल ने उन्हें बेइज़्ज़्त किया है. अनिल पर तीन सदस्यीय जाँच कमेटी बैठा दी गई जिसका निर्णय वर्तमान रूप में आया है. जाँच कमेटी में शामिल आत्मप्रकाश श्रीवास्तव- जिसके जातिवादी रंग के बारे में पाठक राहुल कांबले के मामले में परिचित हो चुके हैं- अनिल राय अंकित के बेहद घनिष्ट मित्र में से हैं जो उनके दफ़्तर में प्रतिदिन कम से कम 2-3 घंटे समय निकाल कर ज़रूर बैठते हैं. विभूति नारायण राय के कुलपति नियुक्त होने से पहले आत्मप्रकाश श्रीवास्तव यहाँ के कार्यकारी कुलपति हुआ करते थे और यही वह दौर है जबसे अनिल उनकी नज़र में चढे हुए थे. उनका कार्यकाल भीषण अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के लिए भारतीय विश्वविद्यालय के इतिहास में एक मज़बूत उदाहरण हो सकता है.
    दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में गठित तीन सदस्यीय समिति ने वहाँ मौजूद छात्रों से घटना के बारे में पू्छने तक की जहमत नहीं उठाई. मेरे बैच के किसी भी छात्र-छात्राओं से इस संबंध में कभी भी संपर्क नहीं किया गया. तो इसका मतलब यह हुआ कि कमेटी ने एकतरफा अख़्तर आलम के शिकायत पर फैसला लिया है. फिर कमेटी का नाटक क्यों? अनिल को निकाले जाने को मैं सिर्फ़ इसी मामले तक सीमित करके नहीं देख रहा हूँ बल्कि यह ’चुनो और वार करो’ की नीति पर आधारित है जिसमें एक-एक विद्यार्थियों से निपटने की योजना अंतर्निहित है. विश्वविद्यालय प्रशासन से मैं यह जवाब चाहता हूँ कि क्या मेरे (और मेरे जैसे अन्य सभी जो इस संघर्ष में शामिल हैं) संघर्ष में कहीं कमी है कि मुझे अब तक निष्कासित नहीं किया गया? मैं चाहता हूँ कि मुझे भी वह चिट्ठी मिले.

आदिवासियों का शिकार बंद करे सरकार

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/17/2010 01:43:00 PM

भारत के किसी अखबार का शायद यह पहला संपादकीय है, जिसमें साफ-साफ शब्दों में सरकार से ऑपरेशन ग्रीन हंट को रोके जाने की मांग की गई है और माओवादियों से एक ईमानदार बातचीत शुरू करने का आह्वान किया गया है. डेक्कन हेराल्ड के इस संपादकीय को पढ़वाने के लिए भाई दिलीप मंडल का आभार. पेश है हाशिया पर इसका मेरे द्वारा किया गया अनुवाद.

माओवादियों से बातचीत के प्रस्ताव में ईमानदारी होनी चाहिए

गृह मंत्री पी चिदंबरम द्वारा पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखंड और बिहार के अधिकारियों के साथ माओवादियों के खिलाफ एक अंतरराज्यीय सुरक्षा अभियान शुरू करने के बारे में की गई बैठक के एक हफ्ते के भीतर ही माओवादियों ने यह साफ संदेश दे दिया है कि सरकार के ऐसे अभियानों का क्या नतीजा होनेवाला है. उन्होंने प बंगाल के मेदिनीपुर जिले में संयुक्त बलों के एक कैंप पर हमला किया और 24 जवानों की हत्या कर दी. अनेक सैनिक अब भी लापता हैं. कहा जा रहा है कि इस सुनियोजित हमले में दर्जनों माओवादियों ने भाग लिया और सुरक्षा बलों को घंटों उलझाए रखने में सफल रहे. सरकार द्वारा ऑपरेशन ग्रीन हंट को शुरु किए दो माह बीत चुके हैं लेकिन माओवादी इलाकों में नागरिकों के खिलाफ इस तरह की भयावह हिंसा छेड़ने के बावजूद इस ऑपरेशन की उपलब्धि बहुत कम रही है. अनेक जगहों पर तो आदिवासी जनता को युद्ध का सामना करने के लिए छोड़ कर माओवादी जंगलों में पैठ गए हैं.
अगर सरकार यह उम्मीद कर रही थी कि ऑपरेशन ग्रीन हंट माओवादियों को हथियार डालने पर मजबूर कर देगा, तो वह गलत थी. माओवादियों ने लगातार इसके संकेत दिए हैं कि सरकार अपनी ताकत के प्रदर्शन के जरिए उन्हें झुका नहीं सकती. बल्कि सोमवार को बंगाल में हुआ हमला दिखाता है वे नए तेवर के साथ हमले कर रहे हैं.

सरकार और माओवादी नेता दोनों कह रहे हैं कि वे बातचीत के लिए तैयार हैं. लेकिन सरकार चाहती है कि माओवादी पहले हिंसा छोड़ें जबकि माओवादी बिना किसी शर्त के बात करने पर जोर डाल रहे हैं. वे चाहते हैं कि ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद हो. दोनों फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं और दूसरे पक्ष से उस बात की अपेक्षा कर रहे हैं, जिसे वे खुद नहीं करना चाहते.
अगर माओवादी सरकार की शर्तों के साथ बातचीत को लेकर संदेह कर रहे हैं तो इसकी वजह यह है कि अतीत में सरकार ने युद्ध विराम का इस्तेमाल माओवादी नेताओं को, जब वे बाहर आए तो दबोचने के लिए किया है. उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश में उनका यह अनुभव रहा है. सरकार को माओवादियों को यह भरोसा दिलाना होगा कि बातचीत का उद्देश्य समाधान की एक ईमानदार तलाश होगा.
बातचीत के पहले और उसके दौरान हिंसा पर विराम माहौल को सुधारने में मदद करेगा. बातचीत के लिए यह एक अच्छा कदम है, लेकिन यह उसके लिए एक जरूरी शर्त नहीं है. कुछ लोग एक ऐसे  मौके पर अभियान को रोकने का विरोध कर रहे हैं, उनका कहना है कि इसके जरिए अब तक हासिल किए गए फायदों के बेकार हो जाने का खतरा पैदा हो जाएगा. लेकिन ऐसा सोचना अदूरदर्शिता है. सरकार को निश्चित तौर पर एक दीर्घकालिक नजरिया अपनाना होगा और इसके लिए जरूरी है कि वह ऑपरेशन ग्रीन हंट को रोके और बातचीत शुरू करे. विद्रोहियों से यह उम्मीद करना कि वे बातचीत से पहले अपनी ताकत को त्याग दें, यह अवास्तविक है.

प्रोपेगेंडा, बिकी हुई खबरें, मीडियाः एक अदृश्य सत्ता

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/15/2010 10:10:00 PM

हमारे समय में चेतना की धार को कुंद करने वाले शब्दों को उसके सही और वास्तविक मायनों में व्याख्यायित करने वाले प्रख्यात पत्रकार जॉन पिल्गर ने यह व्याख्यान (यहां एक वीडियो भी है) शिकागो में पिछली जुलाई में दिया था। इस व्याख्यान में वे विस्तार से बताते हैं कि कैसे प्रोपेगेण्डा हमारे जीवन की दिशा को प्रबलता से प्रभावित कर रहा है। इतना ही नहीं प्रोपेगेण्डा आज एक अद्रृश्य सत्ता का भी प्रतिनिधित्व करता है। अनिल का अनुवाद.इसे हमारे समय में बिकी हुई खबरों पर चली बहस के संदर्भ में पढ़िए और सोचिए कि हमारे देश में इसका प्रतिरोध कितना नाकाफी और वैचारिक रूप से कितना अधूरा है.

इस बातचीत का शीर्षक है आज़ादी; अगली बार, जो कि मेरी पुस्तक का भी शीर्षक है और यह पुस्तक पत्रकारिता का भेष धर कर किए जाने वाले दुष्प्रचार अभियान अर्थात प्रोपेगेंडा की असलियत तथा इससे रोकथाम के बारे में है। अतः मैने सोचा कि आज मुझे पत्रकारिता के बारे में, पत्रकारिता द्वारा युद्ध के बारे में, प्रोपेगेंडा और चुप्पी तथा इस चुप्पी को तोड़ने के बारे में बात करनी चाहिए। जनसंपर्क के तथाकथित जनक एडवर्ड बर्न्स ने एक अदृश्य सरकार के बारे में लिखा है जो हमारे देश में शासन करने वाली वास्तविक सत्ता होती है. वे पत्रकारिता, मीडिया को संबोधित कर रहे थे। यह क़रीब अस्सी साल पहले की बात है, जबकि कार्पोरेट पत्रकारिता की खोज हुए ज्यादा लंबा समय नहीं हुआ था। यह एक इतिहास है जिसके बारे में कुछ पत्रकार बताते हैं या जानते हैं और इसकी शुरुआत कार्पोरेट विज्ञापन के उद्‍भव से हुई। जब कुछ निगमों ने प्रेस का अधिग्रहण करना शुरू कर दिया तो कुछ लोग जिसे "पेशेवर पत्रकारिता" कहते हैं, उसकी खोज हुई। बडे़ विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करने के लिए नए कारपोरेट प्रेस को सर्वमान्य, स्थापित सत्ताओं का स्तंभ- वस्तुनिष्ठ, निष्पक्ष तथा संतुलित दिखना था। पत्रकारिता का पहला स्कूल खोला गया और पेशेवर पत्रकारों के बीच उदारवादी निरपेक्षता के मिथकशास्त्रों की घुट्टियां पिलाई जाने लगीं। अभिव्यक्‍ति की आज़ादी के अधिकार को नई मीडिया तथा बडे़ निगमों के साथ जोड़ दिया गया और यह सब, जैसा कि राबर्ट मैक्चेसनी ने कहा है कि 'पूरी तरह से बकवास' है।  

जनता जो चीज़ नहीं जानती थी वह यह कि पेशेवर होने के लिए पत्रकारों को यह आश्वासन देना होता है कि जो समाचार और दृष्टिकोण वह देंगे वह आधिकारिक स्त्रोतों से ही संचालित और निर्देशित होंगे और यह आज भी नहीं बदला है। आप किसी भी दिन का न्यूयार्क टाईम्स उठाइए और राजनीतिक खबरों- विदेशी और घरेलू दोनों, के स्रोतों की जाँच करिए, आप पाएंगें कि वे सरकारों तथा अन्य स्थापित स्रोतों से ही निर्देशित हैं। पेशेवर पत्रकारिता का यही मूलभूत सार है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि स्वतंत्र पत्रकारिता इससे कोई अलग थी या इसे छोड़ दिया जाए लेकिन फिर भी यह इससे बेहतर अपवाद थी। इराक पर आक्रमण में न्यूयार्क टाईम्स की जुडिथ मिलर ने जो भूमिका निभाई उसके बारे में सोचिए। हाँ, उसके काम का पर्दाफ़ाश हो गया लेकिन यह सिर्फ़ झूठ आधारित आक्रमण को प्रोत्साहित करने में शक्तिशाली भूमिका निभाने के बाद ही हो सका। फिर भी मिलर द्वारा आधिकारिक स्रोतों तथा निहित क्षुद्र स्वार्थों का रट्टा लगाना न्यूयार्क टाइम्स के कई अन्य प्रसिद्ध रिपोर्टरों, जैसे प्रतिष्ठित रिपोर्टर डब्ल्यू एच लारेंस जिसने अगस्त 1945 में हिरोशिमा पर गिराए गए अणुबमों के वास्तविक प्रभावों को कवर करने में मदद की थी, से कोई अलग नहीं था। 'हिरोशिमा की बर्बादी में रेडियोएक्टिविटी नहीं'  इस रिपोर्ट का शीर्षक था और यह झूठ थी।

गौर कीजिए कि कैसे इस अदृश्य सरकार की शक्ति बढ़ती गई। 1983 में प्रमुख वैश्विक मीडिया के मालिक/धारक पचास निगमें थीं जिसमें से अधिकतर अमरीकी थे। 2002 में घट कर सिर्फ़ नौ निगम रह गए। आज तकरीबन पाँच ही हैं। रूपर्ट मर्डोक का अनुमान है कि अगले कुछ सालों में मात्र तीन मीडिया खिलाड़ी ही शेष बचे रहेंगे और उसकी कंपनी उनमें से एक होगी। सत्ता का यह केंद्रीकरण संयुक्त राज्य में शायद उसी तरह नहीं है। बीबीसी ने घोषणा की है कि वह अपने प्रसारण को संयुक्त राज्य में फैला रही है क्योंकि उसका मानना है कि अमरीकन मौलिक, वस्तुनिष्ठ तथा निरपेक्ष पत्रकारिता चाहते हैं जिसके लिए बीबीसी प्रसिद्ध है। उन्होंने बीबीसी अमरीका प्रारंभ किया है। आपने विज्ञापन देखा ही होगा।

बीबीसी 1922 में, अमरीका में कार्पोरेट प्रेस के शुरु होने के थोडा़ पहले, शुरू हुआ। इसके संस्थापक जॉन रीथ थे जिनका मानना था कि निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता पेशेवर होने के मूलभूत सार हैं। उसी साल ब्रिटिश हुकूमत को घेर लिया गया था। श्रमिक संगठनों ने आम हड़ताल का आह्वान किया था तथा टोरियों को डर हो गया कि क्रांति होने जा रही है। तब नवीन बीबीसी उनके बचाव में आया। उच्च गोपनीयता में लार्ड रीथ ने टोरी प्रधानमंत्री स्टानले बाल्डविन के लिए यूनियन विरोधी भाषण लिखा और जब तक हड़ताल ख़त्म नहीं हो गई, लेबर नेताओं को अपना पक्ष रखने की अनुमति देने से इनकार करते हुए उन भाषणों को राष्ट्र के नाम प्रसारित करते रहे।

अतः एक मिसाल कायम की गई। निष्पक्षता एक निश्चित सिद्धांत था: एक ऐसा सिद्धांत जिसे स्थापित सत्ता को ख़तरा महसूस होते ही बर्खास्त कर दिया गया। और यह सिद्धांत तब से संभाल कर रखा लिया गया है।

बीबीसी समाचार में सामान्यतः दो शब्द 'भूल' (मिस्टेक) और ’मूर्खतापूर्ण ग़लती’ (ब्लंडर) प्रमुखता से इस्तेमाल किए जाते हैं। वह भी 'असफल' के साथ जो कम से कम यह दिखाता है कि अगर सुरक्षाविहीन इराक पर जानबूझकर, सुनियोजित, बिना भड़काए, गैरकानूनी आक्रमण सफल हो जाता तो वह बिल्कुल सही होता। जब भी मैं इन शब्दों को सुनता हूं तो न सोचे जा सकने वाले को भी सामान्य करने के बारे में एडवर्ड हरमन के अद्भुत लेख की याद आ जाती है। जिसके लिए मीडिया घिसी पिटी उक्‍तियों का प्रयोग करता है तथा सोची तक न जा सकने वाली बात को सामान्य बनाने का काम करता है। युद्ध के विनाश को, विशाल आबादी की यातनाओं को, आक्रमण से क्षत विक्षत बच्चों को, उन सब को जिसे मैने देखा है।

शीत युद्ध के दौरान रूसी पत्रकारों के अमरीका भ्रमण पर मेरी अपनी एक पसंदीदा रिपोर्ट है। भ्रमण के अंतिम दिनों में उनके मेजबान ने अपनी शेखी बघारने के लिए उनसे कुछ पूछा था। ”मैं आपको बताता हूं”, प्रवक्‍ता ने कहा,"कि सभी अखबारों को पढ़कर तथा रोज़-ब-रोज़ टेलीविजन देखते हुए हमें यह जानकर आश्‍चर्य हुआ कि सभी बडे़ मुद्दों पर लगभग सभी की राय एक जैसी हैं। अपने देश में इन समाचारों को पाने के लिए हम गुलागों में पत्रकार भेजते हैं, हम उनकी उंगलियों के नाख़ून तक जाँचते हैं। यहां आपको वो कुछ नहीं करना पड़ेगा। इसका भेद क्या है?"     

गोपनीय क्या है? यह सवाल अक्सर ही समाचार कक्षों, मीडिया अध्ययन के संस्थानों, पत्र पत्रिकाओं में पूछा जाता है। और इस सवाल का जवाब लाखों लोगों की जिंदगी के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। पिछले साल 24 अगस्त को न्यूयार्क टाइम्स ने अपने संपादकीय में घोषणा की कि “आज जो हम जानते हैं अगर पहले जानते होते तो व्यापक सार्वजनिक विरोध से इराक पर आक्रमण को रोक दिया जाता”। इस परिप्रेक्ष्य में इस आश्चर्यजनक प्रतिपादन का कहना था कि पत्रकारों ने अपना काम न करके, बुश एवं उसके गैंग के झूठ को किसी तरह चुनौती देने तथा उसे उजागर करने के बदले में उसे स्वीकार करते हुए, प्रसारित करते हुए तथा उसकी हाँ मे हाँ मिलाकर जनता को धोखा दिया है, छला है। टाईम्स ने जो नहीं कहा वह यह कि उसके पास ही वह समाचार पत्र है और बाकी की मीडिया ने अगर झूठ उजागर किया होता तो आज लाखों लोग जिंदा होते। अभी कई वरिष्ठ स्थापित पत्रकारों का भी यही मानना है। उनमें से कुछ -- इस बारे में वे मुझसे बोलते हैं-- मात्र कुछ ही सार्वजनिक तौर पर कुछ बोल सकेंगे।

विडंबना की बात है कि जब मैने सर्वसत्तावादी समाजों की रिपोर्टिंग की तब मैने यह समझना शुरू किया  कि तथाकथित स्वतंत्र समाजों में सेंसरशिप कैसे काम करती है। 1970 के दशक में मैं चेकोस्लोवाकिया पर गुप्त ढंग से फ़िल्म बना रहा था, तब वहां स्तालिनवादी तानाशाही थी। मैने विद्रोही समूह चार्टर 77 के सदस्यों का साक्षात्कार लिया जिसमें उपन्यासकार ज्देनर उरबनेक भी थे। उन्होंने मुझे बताया कि "एक परिप्रेक्ष्य में, तानाशाही में भी हम, आप पश्‍चिमी लोगों से ज्यादा भाग्यशाली हैं। हम समाचार पत्रों में जो कुछ भी पढ़ते हैं और टेलीविजन पर जो कुछ भी देखते हैं उसमें किसी पर भी विश्‍वास नहीं करते, क्यूंकि हम उसके प्रोपेगेंडा के पीछे देखने तथा पंक्‍तियों के बीच पढ़ना सीख गए हैं। और आपके जैसे ही हम यह जानते हैं कि वास्तविक सच हमेशा दबा दिया जाता है”।

वंदना शिवा इसे 'दोयम दर्जे का ज्ञान' कहती हैं। महान आयरिश कारीगर क्लाड कोकबर्न ठीक ही
कहते हैं जब वो लिखते हैं कि "जब तक आधिकारिक तौर पर इनकार नहीं किया जाता तब तक कुछ भी नहीं मानना चाहिए"।
                  
एक बहुत पुरानी उक्‍ति है कि युद्ध में 'सच' सबसे पहले घायल होता है। नहीं ऐसा नहीं है। पत्रकारिता सबसे पहले दुर्घटनाग्रस्त होती है। जब वियतनाम युद्ध समाप्त हो गया तब 'इनकांऊटर' पत्रिका ने युद्ध को कवर करने वाले प्रसिद्ध संवाददाता राबर्ट इलीगंट का एक आलेख छापा था। "आधुनिक इतिहास में पहली बार हुआ है कि, उन्होंने लिखा, "युद्ध के परिणाम का निर्धारण लडा़ई के मैदान में नहीं बल्कि मुद्रित पन्नों पर, और सबसे ऊपर टेलीविजन के पर्दे पर हुआ"। उन्होंने युद्ध में पराजय के लिए उन पत्रकारों को जिम्मेदार ठहराया जिन्होंने अपनी रिपोर्टिंग में युद्ध का विरोध किया। राबर्ट इलीगंट का दृष्टिकोण वाशिंगटन के लिए 'महाज्ञान की प्राप्ति' था और अभी भी है। इराक में, पेंटागन ने गडे़ हुए पत्रकारों को खोज निकाला क्योंकि उसका मानना था कि आलोचनात्मक रिपोर्टिंग ने वियतनाम में उसे हराया था।  

बिल्कुल विपरीत ही सच था। सैगन में, युवा रिपोर्टर के रूप में मेरे पहले दिन प्रमुख समाचार पत्रों तथा टेलीविजन कंपनियों के महकमे में मुझे बुलाया गया। वहां मैने पाया कि दीवार में बोर्ड टँगे हुए थे जिनमें कुछ वीभत्स तस्वीरें लगी हैं। इनमें से अधिकतर वियतनामियों के शरीर थे और कुछ में अमरीकी सैनिक किसी का अंडकोष या कान उमेंठ रहे हैं। एक दफ्तर में एक आदमी की तस्वीर थी जिसे यातना दी जा रही है। यातना देने वाले आदमी के ऊपर गुब्बारेनुमा कोष्ठक में लिखा था "वह तुम्हें प्रेस से बात करना सिखायेगा"। इनमें से एक भी तस्वीरें कभी भी प्रकाशित नहीं हुईं। मैने पूछा क्यों? तो मुझे बताया गया कि जनता इन्हें कभी स्वीकार नहीं करेगी। और उन्हें प्रकाशित करना वस्तुनिष्ठ या निष्पक्ष नहीं होगा। पहले पहल तो मैनें इस सतही तर्क को स्वीकार कर लिया। मैं खुद भी जर्मनी और जापान के बीच अच्छे युद्ध की कहानियों के बीच पला बढा़ था, कि एक नैतिक स्नान से एंग्लों अमरीकी दुनिया को सभी पापों से मुक्‍ति मिल गई थी। लेकिन वियतनाम में जब मैं लंबे समय तक रुका तो मैंने महसूस किया कि हमारे अत्याचार कोई अलग नहीं थे, यह कोई सन्मार्ग से विचलन नहीं था बल्कि युद्ध अपने आप में एक अत्याचार था। यह एक बडी़ बात थी, और यह बिरले (कदाचित) ही समाचार बन पाया। हलांकि सेना की रणनीति तथा उसके प्रभावों के बारे में कुछ बढि़या पत्रकारों ने सवाल किया था। लेकिन 'आक्रमण' शब्द का प्रयोग कभी नहीं किया गया। नीरस शब्द 'शामिल होना" (इन्वाल्वड) प्रयोग में किया गया। अमरीका वियतनाम में घिर (फंस गया) है। अपने उद्‍देश्यों में सुस्पष्ट, एक भयानक दैत्य, जो एशिया के दलदल में फ़ंस गया है, का गल्प निरंतर दोहराया गया। यह डेनियल इल्सबर्ग तथा सेमूर हर्ष जैसे सीटी फूंककर चेतावनी देने वालों पर छोड़ दिया गया था, जिन्होंने माय लाय नरसंहार को गर्त में पहुंचाया, कि वे घर लौटकर विध्वंसक सच के बारे में बताएं। वियतनाम में 16 मार्च 1968 को जिस दिन माय लाय नरसंहार हुआ था, उस दिन 649 रिपोर्टर मौजूद थे और उनमें से किसी एक ने भी इसकी रिपोर्टिंग नहीं की।

वियतनाम और इराक दोनों जगह, सुविचारित नीतियों तथा तौर तरीकों से नरसंहारों को अंजाम दिया गया। वियतनाम में, लाखों लोगों की जबरन बेदखली तथा निर्बाध गोलाबारी क्षेत्र (फ़्री फायर जोन) का निर्माण करके तथा इराक में अमरीकी दबाव के तहत 1990 से ही मध्ययुगीन नाकेबंदी के द्वारा, संयुक्‍त राष्ट्र बाल कोष के अनुसार, पांच साल से कम के करीब पाँच लाख बच्चों को मार दिया गया। वियतनाम और इराक दोनों जगह नागरिकों के खिलाफ़ सुनियोजित परीक्षण के बतौर प्रतिबंधित औजारों का इस्तेमाल किया गया। एजेंट औरेंज ने वियतनाम में अनुवांशिकी और पर्यावर्णीय व्यवस्था को बदल दिया। फौज ने इसे आपरेशन 'हेड्स' कहा। कांग्रेस को जब यह पता चला इसका नाम बदल कर दोस्ताना आपरेशन रैंच हैंड्स रख दिया गया और कुछ भी नहीं बदला। यही ज्यादा ध्यान देने की बात है कि इराक युद्ध में कांग्रेस ने कैसी प्रतिक्रिया जाहिर किया है। डेमोक्रेटों ने इसे थोडा़ धिक्कारा, इसे दुबारा ब्रांड बनाया और इसका विस्तार किया। वियतनाम युद्ध पर बनने वाली हालीवुड की फिल्में पत्रकारिता का ही एक विस्तार थीं। सोचे तक न जा सकने वाले का सामान्यीकरण। हां, कुछ फ़िल्में फौज की रणनीति के बारे में आलोचनात्मक रुख लिए हुए थीं लेकिन वे सभी, आक्रमणकारियों की चिंताओं पर अपने आप को केंद्रित करने के लिए सावधान थीं। इनमें से कुछ शुरुआती कुछ फिल्में अब क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं, इनमें से सबसे पहली है 'डीरहंटर', जिसका संदेश था कि अमरीका पीडित हुआ है, अमरीका को मार पडी़ है, अमरीकन लड़कों ने प्राच्य बर्बरताओं के खिलाफ अपना बेहतरीन कौशल दिखाया है। इसका संदेश सबसे ज्यादा घातक है क्योंकि डीरहंटर बहुत कुशलतापूर्वक बनाई तथा अभिनीत की गई है। मुझे कहना चाहिए कि यही एक मात्र ऐसी फिल्म है जिसके विरोध में मैं जोर से चीख़ने के लिए मजबूर हो गया। ओलीवर स्टोन की फिल्म प्लाटून को युद्धविरोधी माना जाता है, और इसमें बतौर मानव वियतनामियों की झलकियां दिखाई हैं लेकिन इसने भी अंततः इसी बात को प्रोत्साहित किया कि अमरीकी आक्रमणकारी 'शिकार' बने।

इस आलेख को लिखते बैठते वक्‍त मैने ग्रीन बैरेट्स का जिक्र करने के बारे में नही सोचा था। जब तक कि अगले दिन मैने पढा़ कि जान वायन अब तक सबसे प्रभावी फिल्म बनी हुई है। ग्रीन बैरेट्स अभिनीत फिल्म जान वायन मैने मोंटगोमरी अलबामा में 1968 के एक शनिवार की रात में देखा था। (उस वक्‍त मैं वहां के तत्कालीन कुख्यात गवर्नर जनरल जार्ज वैलेस का साक्षात्कार लेने गया था।) मैं अभी अभी वियतनाम से लौटा था और मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह इतनी वाहियात फिल्म है। अतः मैं जोर जोर से हंसने लगा, और हंसता ही गया, हंसता ही गया। और तब तक जब तक कि मेरे चारों ओर के ठंड वातावरण ने मुझे जकड़ नहीं लिया। मेरे सहयोगी, जो दक्षिण में एक उन्मुक्‍त घुमक्कड़ थे, ने कहा "चलो यहां के इस नरक से बाहर निकलें और यहां से ऐसे भागें जैसे नरक से"।

होटल लौटने के रास्ते भर हमारा पीछा किया गया। लेकिन मुझे इसमें संदेह है कि हमारा पीछा करने वाले लोग यह जानते होंगे कि उनके हीरो जान वायन ने झूठ बोला था इसलिए उसने द्वितीय विश्‍वयुद्ध की लडा़ई में भाग नहीं लिया था। और फिर वायन के छद्‍म रोल मॉडल ने  हजारों अमरीकियों को, जार्ज बुश और डिक चेनी के प्रसिद्ध अपवादों को छोड़कर, मौत के मुँह में धकेल दिया।    

पिछले साल, साहित्य का नोबेल पुरस्कार स्वीकार करते हुए नाटककार हेराल्ड पिंटर नें ऐतिहासिक वक्‍तव्य दिया। उन्होंने पूछा "क्यों", मैं उन्हें उदृधत करता हूं, "स्तालिनकालीन रूस में व्यवस्थित बर्बरताएं, व्यापक अत्याचार, स्वतंत्र विचारों का निर्मम दमन पश्चिम में सभी  लोगों को अच्छी तरह ज्ञात हो सका जबकि अमरीकी राज्य के अपराध मुश्किल से सतही तौर पर तरह दर्ज हुए हैं और अभी तक प्रमाणित नहीं हो सके हैं। और अभी भी पूरी दुनिया में अनगिनत मनुष्यों की भयावह मौत तथा यातना निरंकुश अमरीकी सत्ता के ही कारण हो रही है। 'लेकिन, पिंटर कहते हैं, आप इसे नहीं जानते। यह कभी घटित ही नहीं हुआ। कभी कुछ नही हुआ। यहां तक कि जब सब कुछ हो रहा था तब भी कुछ घटित नहीं हुआ। यह मायने ही नहीं रखता। इसका कोई मतलब नहीं है"। पिंटर के शब्द और ज्यादा आवेगमयी थे। बीबीसी ने ब्रिटेन के सबसे चर्चित नाटककार के इस भाषण को नज़रअंदाज कर दिया।  

मैने कंबोडिया के बारे में कई वृतचित्रों का निर्माण किया है। इनमें से पहली इयर ज़ीरो: द साइलेंट डेथ आफ कंबोडिया थी। इसमें अमरीकी बमबारी के बारे में विस्तार से बताया गया है जो पोल पोट के उदय का प्रमुख कारक थी। निक्सन और किसिंजर ने जो शुरु किया पोल पोट ने उसका अंत किया। सीआईए की रपटों तक में इस बारे में कोई संदेह नहीं है। इयर ज़ीरो को मैने सार्वजनिक प्रसारण सेवा के लिए प्रस्तावित किया गया था और वाशिंगटन लाया था। सार्वजनिक प्रसारण सेवा के जिन अधिकारियों ने इसे देखा वे भौंचक्के रह गए। वे आपस में कुछ फुसफुसाए। उन्होंने मुझे बाहर इंतज़ार करने को कहा। अंततः उनमें से एक प्रकट हुआ और कहा "जान हम आपके फिल्म की तारीफ़ करते हैं। लेकिन संयुक्‍त राज्य ने पोल पोट के लिए मार्ग प्रशस्त किया यह सुनकर हम हैरान हैं" मैने कहा "आपको साक्ष्यों पर कोई आपत्ति है?" और मैने सीआईए के कई दस्तावेजों को उदृधत किया। "अरे, नहीं" उसने जबाव दिया। "लेकिन हमने इसे पत्रकारों की निर्णायक समिति के आगे पेश करने को सोचा है"।

अब यह शब्द "पत्रकार न्यायाधीश" जॉर्ज ऑरवेल द्वारा शायद खोज लिया गया है। वास्तव में उन्होंने तीन में से एक पत्रकार को खोजने का प्रबंध कर लिया गया जिसे पोल पोट द्वारा कंबोडिया निमंत्रित किया गया था। और निश्चित तौर पर उसने इस फिल्म को अपना ठेंगा दिखा दिया होगा। सार्वजनिक प्रसारण सेवा से मुझे फिर दुबारा कभी कुछ सुनने को नहीं मिला। इयर ज़ीरो को तकरीबन साठ देशों में प्रसारित किया गया और यह दुनिया भर में देखी जाने वाली डाक्यूमेंट्री में से एक है। संयुक्‍त राज्य में इसे कभी नहीं दिखाया गया। कंबोडिया पर बनाई गई मेरी पाँच फिल्मों में से, एक को न्यूयार्क सार्वजनिक प्रसारण केंद्र के एक स्टेशन डब्ल्यू नेट  पर दिखाया गया। मुझे लगता है कि इसे भोर में दिखाया गया था। इस एक मात्र प्रदर्शन के आधार पर, जबकि अधिकांश लोग सो रहे थे, इसे एक पुरस्कार दे दिया गया। क्या अद्भुत विडंबना है। यह एक पुरस्कार की पात्रता थी, श्रोताओं की नहीं।

मेरा मानना है कि हेराल्ड पिंटर का विद्रोही सच था कि उन्होंने फ़ासीवाद और साम्र्याजवाद के बीच संबंध बनाया तथा इतिहास के लिए लडा़ई को व्याख्यायित किया जिसकी रिपोर्ट शायद कभी दर्ज़ नहीं की गई। मीडिया युग की यह एक व्यापक चुप्पी है। और प्रोपेगेंडा का यही गुप्‍त उद‍‍गम स्थल है, एक विस्तृत फलक का प्रोपेगेंडा जिससे मैं हमेशा अचंभित हो जाता हूं कि कई अमरीकन उससे कहीं ज्यादा इसे जानते और समझते हैं जितना वे करते हैं। हम एक व्यवस्था के बारे में बात कर रहे हैं, निश्चित तौर पर किसी व्यक्‍ति के बारे में नहीं। और फिर भी अधिकांश लोग यही सोचते हैं कि समस्या जॉर्ज बुश और और उसका गैंग है। और हां, बुश और उसके गैंग सबसे प्रमुख हैं,  लेकिन इसके पहले जो कुछ हो चुका है ये लोग उसकी चरम सीमा से ज्यादा कुछ नहीं हैं। मेरे जीवन काल में,  रिपब्लिकनों की तुलना में उदार डेमोक्रेटों द्वारा ज्यादा युद्ध शुरू किए गये हैं। इस सच को नज़रअंदाज़ करना इस बात की गारंटी है कि प्रोपेगेंडा तंत्र तथा युद्ध निर्माण करने वाली व्यवस्था जारी रहेगी। हमारे यहां डेमोक्रेटिक पार्टी की शाखा है जो ब्रिटेन में दस सालों से सरकार चला रही है। ब्लेयर, जो घोषित तौर पर उदारपंथी है, ने ब्रिटेन को आधुनिक युग के किसी भी प्रधानमंत्री से कई बार ज्यादा, युद्ध में झोंका है। हां उसका वर्तमान साझीदार जार्ज बुश है लेकिन बीसवीं सदी के अंत का सबसे हिंसक राष्ट्रपति क्लिंटन उसकी पहली पसंद था। ब्लेयर का उत्तराधिकारी गार्डन ब्राउन भी क्लिंटन और बुश का भक्‍त है। एक दिन ब्राउन ने कहा कि "ब्रिटेन को ब्रिटिश साम्राज्य के लिए माफी मांगने के दिन अब लद गए। हमें उत्सव मनाना चाहिए”।

ब्लेयर और क्लिंटन की ही तरह ब्राउन भी उदारवादी सच को मानता है कि इतिहास के लिए युद्ध को जीता जा चुका है; कि ब्रिटिश साम्राज्य की अधीनता में भारत में अकाल, भुखमरी से लाखों लोग जो मारे गए हैं उसे भुला दिया जाना चाहिए। जैसे अमरीकी साम्राज्य में जो लाखों लोग मारे जा रहे हैं, उन्हें भुला दिया जाएगा। और ब्लेयर  जैसे उसका उत्तराधिकारी भी आश्वस्त है कि पेशेवर पत्रकारिता उसके पक्ष में है, अधिकतर पत्रकार ऐसे विचारधारा के प्रतिनिधिक संरक्षक हैं, इसे मानते हैं, भले इसे वे महसूस करें या न करें, जो अपने आपको गैर विचारधारात्मक कहती है, जो अपने आपको प्राकृतिक तौर पर केंद्रिय तथा जो आधुनिक जीवन का प्रमुख आधार ठहराती है। यह बहुत ही अच्छा है कि अभी भी हम सबसे शक्तिशाली तथा ख़तरनाक विचारधारा को जानते हैं जिसका खुले तौर पर अंत हो चुका है। वह है उदारवाद। मैं उदारवाद के गुणों से इंकार नहीं कर रहा हूं, इससे बहुत दूर हूं। हम सभी उसके लाभार्थी हैं। लेकिन अगर हम उसके खतरों से, खुले तौर पर अंत हो चुकी परियोजनाओं से तथा इसके प्रोपेगेंडा की सभी उपभोक्‍ता शक्‍तियों से इंकार करते हैं तब हम सच्चे लोकतंत्र के अपने अधिकार से इंकार कर रहे हैं। क्योंकि उदरवाद और सच्चा लोकतंत्र (जनवाद) एक ही नहीं हैं। उदारवाद १९वीं शतब्दी में अभिजात्य लोगों के संरक्षण से प्रारंभ हुआ था। और जनवाद कभी भी अभिजात्य लोगों के हाथों में नहीं सौपा जा सकता। इसके लिए हमेशा लडा़ई लडी़ गई है। और संघर्ष किया गया है।

युद्ध विरोधी गठबंधन, युनाइटेड फ़ार पीस एंड जस्टिस की एक वरिष्ठ अधिकारी ने अभी हाल में ही कहा, और मैं उन्हें उदृधत कर रहा हूं, कि "डेमोक्रेटिक यथार्थ की राजनीति का प्रयोग कर रहे हैं।" उनका उदारवादी ऐतिहासिक यथार्थ वियतनाम था। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति जानसन ने वियतनाम से सैन्य दलों की वापसी तभी शुरू किया जबकि डेमोक्रेटिक कांग्रेस ने युद्ध के ख़िलाफ़ मतदान प्रारंभ किया। जो हुआ यह नहीं था। वियतनाम से चार साल के लंबे समय के बाद सैनिकों का हटना शुरू हुआ। और इस दौरान संयुक्‍त राज्य ने वियतनाम, कम्बोडिया और लाओस में पिछले कई वर्षों में मारे गए लोगों से कहीं  ज्यादा लोगों को बमों से मार गिराया। और यही सब इराक में भी हो रहा है। पिछले वर्षों में बमबारी दुगुनी हो गई है। और अभी तक इसकी रिपोर्ट कहीं नहीं आई है। और इस बमबारी की शुरुआत किसने की? क्लिंटन ने इसे शुरू किया। १९९० के दशक के दौरान क्लिंटन ने इराक के उन इलाकों पर बमों की बरसात की जिसे शिष्ट/नरम शब्दों में उडा़न रहित क्षेत्र (फ़्री फायर ज़ोन) कहा जाता था। इसी काल में उसने इराक की मध्ययुगीन नाकेबंदी की जिसे 'आर्थिक प्रतिबंध' कहा गया, जिसमें, मैने पहले भी जिक्र किया है कि पाँच लाख बच्चों की दर्ज मौतों के अलावा लाखों लोगों को मार दिया गया। इनमें से किसी एक भी नरसंहार के बारे में तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया में लगभग कुछ नहीं बताया गया  है। पिछले साल जॉन हापकिंस सार्वजनिक स्वास्थ्य विद्यापीठ नें अपने एक अध्ययन में बताया है कि इराक पर आक्रमण के बाद से छः लाख पचपन हज़ार इराकियों की मौत आक्रमण के प्रत्यक्ष परिणामों के कारण हुई हैं। आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि ब्लेयर सरकार इन आंकडों के बारे में जानती थी कि ये विश्वसनीय हैं। इस  रिपोर्ट के लेखक लेस राबर्ट ने कहा कि ये आंकडें फ़ोर्डम विश्‍वविद्यालय द्वारा कराए गए रुवांडा नरसंहार के बारे में कराए गए अध्ययन के आंकडों के बराबर हैं। रॉबर्ट के दिल दहला देने वाले रहस्योद्‍घाटन पर मीडिया  मौन बनी रही। एक पूरी पीढी़ की संगठित हत्या के बारे में क्या कुछ अच्छा हो सकता है, हेराल्ड पिंटर के शब्दों में कहें तो "कुछ हुआ ही नहीं। यह कोई मामला नहीं है"।

अपने आप को वामपंथी कहने वाले कई लोगों ने बुश के अफगानिस्तान पर आक्रमण का समर्थन किया। इस तथ्य को नजर अंदाज कर दिया गया कि सीआईए ने ओसामा बिन लादेन का समर्थन किया था। क्लिंटन प्रशासन ने तालिबानियों को गुप्‍त तरीके से प्रोत्साहित किया था, यहां तक कि उन्हें सीआईए में उच्च स्तरीय समझाइश दी गई थी, यह सब संयुक्‍त राज्य में सामान्यतः अनजान बना हुआ है। अफगानिस्तान में एक तेल पाइपलाईन के निर्माण में बडी़ तेल कंपनी यूनोकल के साथ तालिबानियों ने गुप्‍त भगीदारी की थी। और क्लिंटन प्रशासन के एक अधिकारी से कहा गया कि "महिलाओं के साथ तालिबानी दुर्व्यवहार कर रहे हैं” तो उसने कहा कि "हम ऐसे में भी उनके साथ रह रहे हैं”। इसके स्पष्ट प्रमाण हैं कि बुश ने तालिबान पर हमला करने का जो निर्णय लिया वह ९/११ का परिणाम नहीं था। बल्कि यह दो महीने पहले जुलाई २००१ में ही तय हो चुका था। सार्वजनिक तौर पर यह सब संयुक्‍त राज्य में सामान्यतः लोगों की जानकारी में नहीं है। जैसे अफ़गानिस्तान में मारे गए नागरिकों की गणना के बारे में लोगों को कुछ मालूम नहीं है। मेरी जानकारी में, मुख्यधारा मे सिर्फ़ एक रिपोर्टर, लंदन में गार्डियन के जोनाथन स्टील ने अफगानिस्तान में नागरिकों की मौत की जाँच किया है और उनका अनुमान है कि २०००० नागरिक मारे गए हैं और यह तीन  साल पहले की बात है।

फिलिस्तीन की चिरस्थायी त्रासदी, तथाकथित वाम की गहरी चुप्पियों तथा आज्ञानुकूलिता की बडी़ भूमिका के कारण जारी है। हमास को लगातार इजरायल के विध्वंस के लिए तैयार तलवार के रूप में व्याख्यायित किया जा रहा है। आप द न्यूयार्क टाइम्स, एशोसिएट प्रेस, बोस्टन ग्लोब को ही लीजिए। वे सभी इस उक्‍ति को स्तरीय घोषणा के बतौर इस्तेमाल करते हैं। और जबकि यह ग़लत है। हमास ने दस साल के लिए युद्ध विराम की घोषणा की है जिसकी रिपोर्टिंग लगभग नहीं की गई है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि हमास में पिछले वर्षों में एक ऐतिहासिक विचारधारात्मक परिवर्तन (शिफ़्टिंग) हुआ है जो, जिसे इजराइल का यथार्थ कहते हैं उसे  मान्यता प्रदान करता है, लगभग अज्ञात है। और फिलिस्तीन के विध्वंस के लिए इजरायल जैसी तलवार है
वह अकथनीय ही है।

फिलिस्तीन की रिपोर्टिंग पर ग्लास्गो विश्‍वविद्यालय द्वारा आंखें खोल देने वाले अध्ययन किए गई हैं। उन्होंने ब्रिटेन में टी।वी। समाचार देखने वाले युवाओं का साक्षात्कार लिया। ९० प्रतिशत से ज्यादा लोगों का सोचना था कि फिलिस्तीनी अवैधानिक ढंग से बसे हुए हैं। डैनी स्चेक्टर के प्रसिद्ध मुहावरे के अनुसार "वे ज्यादा देखते हैं, बहुत कम वे जानते हैं”।

वर्तमान में सबसे भयानक चुप्पी परमाणु शस्त्रों तथा शीत युद्ध की वापसी पर है। रूसी स्पष्टतः समझते हैं कि पूर्वी यूरोप में तथाकथित अमरीकी सुरक्षा ढाल उन्हें नष्ट करने तथा नीचा दिखाने के लिए बनाई गई है। फिर  भी यहां पहले पन्नों में यही होता है कि पुतिन एक नया शीत युद्ध प्रारंभ कर रहे हैं। और पूरी तरह से विकसित नई अमरीकी परमाणु व्यवस्था, जिसे भरोसेमंद शस्त्रों की बदली (रेलिएबल वीपन्स रिप्लेसमेंट) कहते  हैं, जो लंबे समय से स्थगित महत्वाकांक्षा -- कृत्रिम युद्ध तथा परमाणु युद्ध के बीच की दूरियों को पाटने के लिए, बनाई (डिजाईन) गई है उसके बारे में चुप्पी है।

इस बीच ईरान को निशाना बनाया जा रहा है, जिसमें मीडिया लगभग वही भूमिका निभा रही है जैसी कि इराक पर आक्रमण के पूर्व निभा रही थी। और देखिए कि डेमोक्रेटों के लिए, बराक ओबामा कैसे विदेशी संबंधों के आयोग, वाशिंगटन पर राज्य करने के लिए पुराने उदारवादियों के लिए प्रोपेगेंडा रचने वाले प्रमुख अंग, का स्वर बन गया है। ओबामा लिखता है कि वह सैनिकों की वापसी चाहता है, "हम लंबे समय से प्रतिवादी इरान और सीरिया के खिलाफ़ सैन्य शक्‍ति द्वारा आक्रमण नहीं करेंगे।” उदारवादी ओबामा से यह सुनिए, "पिछली शताब्दी में महान खतरों के क्षण में हमारे नेताओं ने दिखाया कि अमरीका ने अपने कार्यों तथा उदाहरणों द्वारा  दुनिया का नेतृत्व किया तथा उँचा उठाया, कि हम लाखों लोगों की चहेती आज़ादी के लिए, उनके क्षेत्र की सीमाओं से आगे जाकर लडे़ और उनके पक्ष में खडे़ हुए।”

प्रोपोगेडा की यही गांठ है, अगर आप चाहते हैं तो आपको बहका सके, जिसमें उसने हर अमरीकी के जीवन को और हमारे जैसे कईयों को, जो अमरीकी नहीं हैं, लपेटा है। दक्षिण से वाम तक, धर्मनिरपेक्ष से ईश्वर को पूजने वाले तक बहुत कम लोग जो जानते हैं वह यह कि संयुक्‍त राज्य के प्रशासन ने पचासों सरकारों को उखाड़ फेंका है। और उनमें से अधिकतर लोकतांत्रिक थीं। इस प्रकिया में तीस देशों पर आक्रमण तथा बमबारी की गई जिसमें अनगिनत जानें गईं। बुश का प्रहार बहुत खुला हुआ है, और यह निर्णायक है, लेकिन जिस क्षण हम डेमोक्रेटों से लाखों लोगों द्वारा चहेती आज़ादी के लिए लड़ने तथा उनके पक्ष में खडे़ होने की बकवाद तथा उनके  कुटिल आह्वान को स्वीकार करते हैं, इतिहास की लडा़ई में हार जाते हैं, और हम खुद भी मौन रह जाते हैं।

    
तो हमें क्या करना चाहिए? जब कभी मैं सभाओं में मैं जाता हूं अक्सर यह सवाल पूछा जाता है, और अपने आप में मजेदार बात ये कि इस सम्मेलन जैसी ज्यादा जानकारी वाली सभाओं में भी यही सवाल पूछा  जाता है। मेरा अपना अनुभव है कि तथाकथित तीसरे देशों की जनता शायद ही  इस तरह के प्रश्न पूछती है क्योंकि वे जानते हैं कि क्या करना है। और कुछ अपनी स्वतंत्रता तथा अपने जीवन का मूल्य चुकाते है। लेकिन वे जानते हैं कि  क्या करना चाहिए। यह एक ऐसा प्रश्‍न है कि कई डेमोक्रेटिक वामपंथियों को  इसका अभी भी जवाब देना है।

अभी भी वास्वविक स्वतंत्र सूचनाएं सभी के लिए प्रमुख शक्‍ति बनी हुई है। और मेरा मानना है कि हमें इस विश्‍वास कि मीडिया जनता की आवाज़ है, जनता के  लिए बोलती है, के जाल में नहीं फंसना चाहिए। यह स्तालिनवादी चेकोस्लोवाकिया में सच नहीं था और  संयु‍क्‍त राज्य में यह सच नहीं है।

अपने पूरे जीवन भर मैं एक पत्रकार ही रहा हूं। मैं नहीं जानता कि जनता की चेतना कभी भी इतना तेजी से बढी़ थी जितना कि आज बढ़ रही है। हलांकि इसका आकार तथा इसकी दिशा बहुत स्पष्ट नहीं है। क्योंकि,  पहला तो, लोगों में राजनीतिक विकल्पों के बारे में गहरा संदेह है और दूसरा कि डेमोक्रेटिक पार्टी चुनाव में भाग लेने वाले वामपंथियों को पथभ्रष्‍ट करने तथा उन्हें आपस में विभाजित करने में सफल हो गई है। फिर भी जनता की बढ़ती आलोचनात्मक जागरुकता ज्यादा महत्वपूर्ण है जबकि आप देख सकते हैं लोग बडे़ पैमाने पर सिद्धांतविहीनता, जीवन जीने के सर्वोत्तम रास्ते के मिथकशास्त्र, को अपना रहे हैं तथा वर्तमान में डर से विनिर्मित स्थितियों में जी रहे हैं।

पिछले साल, न्यूयार्क टाइम्स अपने संपादकीय में स्पष्‍ट/साफ़ ढंग से सामने क्यों आया? इसलिए नहीं कि  यह बुश के युद्ध का विरोध करता है -- ईरान के कवरेज को देखिए। वह संपादकीय एक बमुश्किल स्वीकृति थी कि जनता मीडिया की प्रछन्न भूमिका को समझना शुरू कर रही है तथा लोग "पंक्‍तियों के बीच" पढ़ना  सीख रहे हैं।

अगर ईरान पर आक्रमण किया तो प्रतिक्रिया तथा उथल पुथल का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। राष्ट्रीय सुरक्षा तथा घरेलू सुरक्षा के लिए राष्ट्रपति को मिले दिशानिर्देश, बुश का आपातकाल में  ही सरकार को सभी पहलुओं की शक्‍ति देते हैं। यह असंभव नहीं है कि संविधान को ही बर्खास्त कर दिया जाए -- सैकडों हज़ारों तथाकथित आतंकवादियों तथा दुश्मनों का मुकाबला करने तथा उनकी धर पकड़ करने वाले कानूनों को पहले ही किताबों में बंद कर दिया गया है। मुझ लगता है कि जनता इन खतरों को समझ रही  है, जिन्होंने ९/११ के बाद लंबा रास्ता तय किया है तथा सद्दाम हुसैन तथा अलकायदा के बीच रिश्तों के प्रोपेगेंडा के बाद तो एक बहुत लंबा रास्ता तय किया है। इसलिए इन्होंने पिछले साल नवंबर में डेमोक्रेट्स लोगों को सिर्फ धोखा खाने के लिए वोट दिया। लेकिन उन्हें सच चाहिए और पत्रकार को सच का एजेंट होना चाहिए,  सत्ता का दरबारी नहीं।

मेरा मानना है कि पांचवा स्तंभ संभव है, जनआंदोलन के सहयोगी कारपोरेट मीडिया को खंड खंड करेंगे, जवाब देंगे तथा रास्ता दिखाएंगे। प्रत्येक विश्‍वविद्यालयों में, मीडिया अध्ययन के हरेक कॉलेजों में, हर समाचार कक्षों  में, पत्रकारिता के शिक्षकों, खुद पत्रकारों को वाहियात वस्तुनिष्ठता के नाम पर जारी खून ख़राबे के दौर में अपनी निभाई जा रही भूमिका के बारे में प्रश्‍न करने की ज़रूरत है। खुद मीडिया में इस तरह का आंदोलन एक  पेरोस्त्रोइका (खुलापन) का अग्रदूत होगा जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते। यह सब संभव है। चुप्पियां तोडी़ जा सकती हैं।

ब्रिटेन के "राष्ट्रीय पत्रकार संघ (नेशनल यूनियन आफ  जर्नलिस्ट) ने एक जबर्दस्त विद्रोह लाया है और इजरायल  का बहिष्कार करने का आह्वान किया है। मीडियालेन्स डाट ऑर्ग नामक वेबसाइट ने अकेले बीबीसी को जिम्मेदार होने को कहा है। संयुक्‍त राज्य में स्वतंत्र विद्रोही स्पिरिट की वेबसाइटें दुनिया भर में खूब लोकप्रिय हो रही हैं। टाम फीले की इंटरनेशनल क्लीयरिंग हाऊस से लेकर माइक अल्बर्ट की जेडनेट, कांऊटरपंच आनलाइन तथा पियर के बेहतरीन कार्यों तक, मैं सभी का जिक्र कर सकता हूं। इराक पर सबसे बेहतरीन रिपोर्टिंग डार जमैल की साहसी पत्रकारिता है तथा जोय वाइल्डिंग जैसे नागरिक पत्रकार जिन्होंने फलूजा शहर से फलूजा की नाकेबंदी की रिपोर्टिंग की है, वेब पर ही आईं हैं।

वेनेजुएला में, ग्रेग विल्पर्ट की जाँच रिपोर्ट अब ह्‍यूगो शावेज को निशाना बनाने के लिए उग्र प्रोपेगेंडा ज्यादा बन गई है, कोई ग़लती मत कर बैठियेगा, यह वेनेजुएला में बहुमत की अभिव्यक्‍ति की आज़ादी पर  खतरा है। भ्रष्ट आरसीटीवी की ओर से पश्चिम में वेनेजुएला के खिलाफ अभियान के पीछे का झूठ है। बाकी के हम लोगों के लिए यह एक चुनौती है कि इस विध्वंसक/पथभ्रष्‍ट जानकारी की गोपनीयता का भंडाफॊड़  करें तथा इसे साधारण लोगों के बीच में ले जाएं।

यह सब हमें जल्द ही करना होगा। उदारवादी लोकतंत्र अब कार्पोरेट तानाशाही का आकार ग्रहण कर रहा है। यह एक ऐतिहासिक विचलन (शिफ्ट) है तथा मीडिया को इसका मुखौटा बनने की अनुमति बिल्कुल नहीं देनी चाहिए।

बल्कि इसे लोकप्रिय, ज्वलंत मुद्दा बनाकर सीधी कार्यवाही का विषय बनाना चाहिए। महान सचेतक टाम पेन  ने चेतावनी दी थी कि ’अगर अधिकांश लोग सच तथा सच के विचारों से इनकार करने लेगेंगे तो भयंकर  तूफानों का दौर होगा, जिसे वह 'शब्दों का बास्तील' कहते हैं। अभी वही समय है।

अभय कथा अर्थात बिहार गाथा

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/13/2010 08:02:00 AM

अभय कथा अर्थात बिहार गाथा

गिरीश मिश्र

बिहार देश के उन राज्यों मे है जिनका अतीत काफी गौरवशाली रहा है। रामायण और महाभारत आख्यानों के कई महत्वपूर्ण चरित्र बिहार के थे। उदाहरण के लिए सीता बिहार में जनमी थीं, विश्वामित्र का आश्रम वर्तमान बक्सर में था जहां राम और लक्ष्मण की शिक्षा दीक्षा हुई थी जरासंध राजगृह का था जिसके लगातार आक्रमणों से पस्त होकर कृष्ण रणछोड बन द्वारका गए जैन धर्म और बौध्द धर्म तथा बहुत बाद मे खालसा पंथका प्रादुर्भाव बिहार की भूमि से जुडा था. लिच्छवी गणराज्य हो या अजातशत्रु का राज या फिर मौर्य एवं गुप्त साम सब बिहार में उपजे के कौटिल्य का अर्थशास्त्र या वाराह मिहित की वृहत संहिता दोनों की रचना पाटलिपुत्र में हुई थी। तत्कालीन समय में ज्ञान विज्ञान में बिहार अन्य सबसे कही आगे था। नालन्दा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों की ख्याति देश विदेश में थी।

मध्यकाल में शेरशाह सुरी ने दिल्ली पर अपना शासन जमाया था तथा अंग्रेजों के शासनकाल में वहाबी हो या कुवर सिंह विदेशी शान की जडें हिला दी थी। सरदार भगत सिंह के अनेक संगी साथी बिहार के थे जिनमें से कुछ ने लाहौर षडयत्र के मुखबिर फणीन्द्र घोष को मौत की नींद सुला दी थी गांधी जी का प्रथम किसान आंदोलन 1917 में बिहार क चम्पारन में ही सफलता पूर्वक चला था उसके बाद के स्वामी सहजानन्द के किसान आन्दोलन तथा 1942 के भारत छोडाे संघर्ष की लोग अब तक नहीं भूल है इस शानदार अतीत के बावजूद आजादी के बाद के छ: दशकों के दौरान प्रगति के मार्ग पर पिछडता ही जा रहा है। राज्य में पर्याप्त नए निवेश की कौन कहे, बडी तेजी से विनिवेश हो रहा है चीनी, जूट, सीमेंट, और कागज उद्योग समाप्त प्राय है इंजीनियरिंग उद्योग और उर्वरक कारखाने में कब को ताला लग चुका है खेती की हालत गभ्मीर है अनमने ढंग से जमींदारी उन्मूलन के बाद भूमि सुधार ठप हो गया भले ही कानून बने और दाले किए गए। हाल ही में आई डी बद्योपाध्याय आयोग की रिपोर्ट ने जानुजी लेडेजिस्की पी एस अजू सुनील सेन गुप्त हनुमंत राव आदि विशेषज्ञों के पहले आए निष्कर्षो का समर्थन करते हुए भूमि सुधार कार्यक्रमों के कार्यान्वयन ही पोल खोल दी है। नतीजतन कृषि क्षेत्र बदहाल है। गांवों से बड़ी संख्या में लोगों का शहरों और अन्य राज्यों की ओर पलायन हो रहा है बडे भूस्वामी उद्यमी और दूरदर्शी नहीं बल्कि परजीवी हैं बिहारी औद्योगिक उद्यनिता अब भी जन्म नहीं ले सकी है, पढ लिखकर लोग नौकरियों विशेषकर सरकारी क्षेत्र की ओर भागते है जहां वेतन के अतरिक्त ऊपर वार कमाई के अवसर भरपूर होते हैं। अमेरिका के शिकागों विश्वविद्यालय से कभी जुड़ी समाज शास्त्री कुसुमनायर ने अपनी एक चर्चित पुस्तक में राज्य में भूस्वामी नौकर शाह राजनेता की लगभग अजेय तिकडी क़ो राज्य की बदहाली और अवनति के लिए जिम्मेदार ठहराया था आज भी विभिन्न राजनीतिक रंगों की सरकारों के आने जाने के बावजूदों यह तिकडी राज्य पर काबिज ही नही ं बल्कि कहीं अधिक शक्तिशाली है। इस तिकडी क़े दबे दबे का परिणाम है कि राज्य से एक ओर नौजवानों का पलयान हो रहा है तो दूसरी ओर अपरहरण रंगदारी हत्या लूटपाट भ्रष्टचार आधिक की घटनाओं मे ंलगातार वृध्दि के साथ ही नक्सलवादी आंदोलन तेजी से बढ रहा है। विश्वविद्यालय हो या स्कूल या फिर अस्पताल सबकी हालत दयनीय है बिजली के दर्शन यत्र- तत्र तब कुछ समय के लिए होते है। सडक़ की स्थिति कुछ सुधरी है मगर विशेष नहीं। बाढ़ और सूखा हर साल अपने समय पर आते ही है। पिछले 62-63 वर्षो के दौरान राज्य की आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थितियों का ऐसा कोई विवेचना नही मिलता जो आम पाठक के प्रशनों के उत्तर देकर उसके जिज्ञासु मन को शान्त कर सके। बिहार में हिन्दी के साहित्यकार है परन्तु किसी ने यह नही बताया है कि क्यों कभी प्रशंसित रहे हिन्दी साहित्य सम्मेलन, राष्ट्रभाषा परिषद और काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान चर्चा में नहीं रह गए है तथा अनुग्रह नारायण सिन्हा शोध संस्थान बारात घर बन कर रहा गया है। पटना विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाज के पूर्व अध्यक्ष प्रो. रमेशचन्द्र सिंहा ने अपने हाल ही में प्रकाशित उपन्यास ''अभय कथा'' सारांश प्रकाशन में एक तरह में स्वातंत्र्योत्तर बिहार की दशा और दिशा को तथ्यों और तर्कों के आधार पर बडे रोचक ढंग से प्रस्तुत किया हो । यहां वह टिप्पणी बरबस याद आ जाती है कि फ्रंासीसी क्रान्ति के बाद की स्थिति को जानने के लिए विद्वानों की उबाऊ और नीरस कृतियों को देखने बदले बाल्जाक के उपन्यासों को पढना अच्छा रहेगा। इस छोटे से लेख में इस महत्वपूर्ण कृति का पूर्ण रूपेण विवेचना असंभव है फिर भी उसकी कुछ झलकियां प्रस्तुत कर पाठकों को उसे ध्याान पूर्वक पढने के लिए उकसाया जरूर जा सकता है।

पहले ही अध्याय में सिंहा ने पटना विश्वविद्यालय के एक प्रतिनिधिक विभाग का बडा ही सटीक चित्रण किया है- ््''फोकस और ढाट- बाट में उस दुबले पतले स्मार्ट अध्यक्ष का पूरे कैंपस में मुकाबला करने वाला दूसरा कोई नहीं था। फालतू के शोध करना और कराना उसके फोकस का सबसे असरदार अंदाज था जिसकी वजह से उसे सारे मुल्क में शोहरत हासिल थी और पैसे के साथ साथ वह पद प्रतिष्ठा भी हथियाता फिरता था। हर कमेटी कमीशन का मेंबर होना कभी चंडीगढ तो कभी मद्रास फुदकत रहना शोध के नाम पर लाखों की रकम ले आना ओर उसे हजम करके डकार तक न लेना उसका ही कश्रिमा माना जाता। उसका माया जाल इताना गहरा और विशाल था कि जिसे चहाता उसे किसी कालेज या यूनिवर्सिटी में रखवा देता। पी एच डी की डिग्री उसकी इनायत होती। विभाग के आधे से अधिक टीचर उसके ही बहाल किए हुए थे, जिनमें खूबसूरत महिलाओं की संख्या काफी थी''

नेपाल से लंबी सीमा लगने के कारण बिहारर् वत्तमान भूमंडलीकरण के पहले तस्करी का केंद्र था। भांति-भांति के विदेशी माल आते और देशभर में वितरित होते थे इस में काफी कुछ स्थानीय तौर पर निर्मित होता था इस धंधे में लगा घासीराम बडा धर्मात्मा था। ''ललाट पर हमेशा चंदन का टीका करते की जेब में हमेशा तुलसी की माला'' लोग उसे महात्मा कह कर पुकारते थे और उसके भव्य मकान में कीर्तन अविराम चलता है। बुध्दिमान लोग बताते है कि कीर्तन के दर्शनयान महात्मा जी के घर में हिंदुस्तान के बने कपडाें और दूसरी दूसरी चीजों पर ''मेड इन चाइना''''मेड इन यू एस ए'' बगैरह विदेशी ठप्पे तडातड लगाए जाते है। सब जानते हैं कि आधुनिक उद्योग धंधों के अभाव में येन केन प्रकारेण सरकारी पैसों को लूटना एक बडा कारोबार है । राजनेता- अफसर- ठेकेदारों को तिकडी ऌसमें लगी रहती है। कहना न होगा कि ठेकों के अवाटंन में गुण्डागर्दी का बोल बाला रहता है। यह धंधा कैसे चलता है इसका वर्णन सिन्हा ने विस्तार से किया है। हरधन गोप जो पहले चोर ओर बदमास था एक पुलिस अधिकारी की प्रेरणा से पहले छोटा और फिर बडा ठेकेदार बन गया। कागज पर या फिर घटि या सामानों को लगाकर निर्माण करने लगा तथा मंत्री और अफसर की जेब भरते हुए पांच साल लगते न लगते उसने लाखों रूपए बना लिए। कदम कुआं में मकान पुनराईचक में मकान नाला रोड पर होटल कार बगैरह अब वैसी चीज न थी जिसके बास्ते उसे कोई रश्क हा।े हरधन से हरधन जी और अब हरधन बाबू कहलाने लगा। एक से एक तोदियल मंत्री एक से ऐ अडियल हाकिम एक से एक कडियल पुलिस कोतवाल उसके दोस्त या संबंधी होने का गुमान पालने लगे।

आजादी के कुछ ही वर्षो बाद स्वतंत्रता सेनानी और उनके आदर्शो को धक्का मार कर बाहर कर दिया गया और अवांछित लोग बडी तादाद में सत्तारूढ़ हो गए। उपन्यास का एक मशहूर इतिहास पात्र कहता है- ''आंनद बाबू मुल्क गोया बडे ख़तरनाक दौर से गुजर रहा है। आज हां जम्हूरियत का दामन थामकर ऐसे ऐसे लोग हुकूमत पर काबिज हो रहे है जिनको जेलखाने की सीखचों के पीछे होना चाहिए था। जिन्हें चपरासी होने की भी सलाहियत नहीं है वे जम्हूरियत और सोशल जस्ट्रिस के नाम पर मिनिस्टर चीफ मिनिस्टर हो रहे हैं। ये लोग केवल अपना उल्लू सीधा करना जानते हैं। इन्हें मुल्क और अवाम और कानून से क्या वास्ता? तकलीफ ज्यादा तब होती है जब सोचता हॅूं िक जिस आजादी की वजह से ये लोग आज हुकूमत कर रहे है, वह बडी क़ुरबानियों से हासिल हुई है । हैरत इस बात पर है कि सन 47 से ही सच्चे और त्यागी सिपाहियों को दरकिनार करते जाने का सिलसिला शुरू हो गया था और सन् 62-63 आते आते कांग्रेसी हुकूमत पर गलत लोगों का कब्जा हो गया।''

उपन्यास में हिन्दू-मुस्लिम समस्या के बारे में बहुत कुछ है और हिन्दू सम्प्रदायवादियों के इस दावे का तथ्यात्मक खंडन किया गया है कि अतीत में हिन्दू से मुसलमान हो जाने के पीछे कई वजहें थीं। इस्लाम एक ऐसा मजहब है जिसमें कोई खास उलझनवाली या बारीक फिलसफाई बात नहीं है। बडा सीधा-सादा और दुनियावी मजहब है यह। इसमें सबसे बडी चीज यह है कि यहां जात-पात का कोई झमेला नहीं है और इस्लाम कबूल करने वालों के साथ कोई भेदभाव नहीं होता। सभी खुदा के बंदे है और सभी एक साथ उसकी इबादत करते हैं। ये सब बातें हिन्दुओं के निचले तबकों के लोगों गोया बेहद जंची, क्योंकि जात की वजह से वे बेहिसाब सताए हुए थे।

उपन्यास का नायक अभय एक पढा-लिखा, खाते-पीते परिवार का नौजवान है। वह क्यों नक्सली बन जाता है और वहां क्या कुछ देखता-सुनता है, इस उपन्यास में दर्ज है। कहना न होगा कि जिन्हे बिहार और उसकी समस्याओं को जानने-समझने और हल करने में दिलचस्पी है उनके लिए यह कृति सहायक होगी। नक्सलवादी आंदोलन पुलिस के जरिए नहीं दबाया जा सकता। उसके समाजिक- आर्थिक जडाे को तलाशना और समझना पडेग़ा तभी उससे मुकाबला किया जा सकता है। लोग कतिपय मजबूरियों के कारण ही उसमें जाते हैं। वे मजबूरियां क्या है, यह सिन्हा अपने उपन्यास में बतलाते हैं।

विभूति की तानाशाही के खिलाफ छात्र ने छोड़ी पीएचडी

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/12/2010 07:50:00 PM

श्रीमान विभूति नारायण राय,
कुलपति, महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय

सर, मैं बहुत निराशा के साथ ये कह रहा हूं कि आपके द्वारा अनिल चमड़िया सर को टर्मिनेट किये जाने पर हिंदूवादियों और प्रतिक्रियावादियों की एक बड़ी जीत हुई है। इस प्रक्रिया में सर्वाधिक अफसोसनाक बात यह है कि इसमें न सिर्फ ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत’ के साथ भद्दा सलूक किया गया है बल्कि आपकी भूमिका बेहद संदिग्ध है। एकदम शुरू से ही अनिल चमड़िया के पीछे प्रतिक्रियावादियों की एक लॉबी सक्रिय थी, जिसके जाल में फंसने से आप अपने आप को नहीं बचा सके।

मैं व्यक्‍तिगत तौर पर यह नहीं मान पा रहा हूं कि आपने इस मामले में कोई ‘ईमानदार’ भूमिका निभायी है। अनिल चमड़िया को हटाने के क्रम में अकादमिक जगत के गंभीरतम भ्रष्‍टाचार के आरोपों का सामना कर रहे अनिल कुमार राय ‘अंकित’ को बचाने और अंततः उन्हें स्थापित करने के लिए आप हरसंभव स्तर पर सत्ता के दुरुपयोग और निरंकुशता दिखाने में जरा भी नहीं हिचके।

जैसा कि आप भी जानते हैं, एकदम प्रारंभ से ही कई छात्र-छात्राओं सहित मैं भी विभाग में स्थापित फर्जी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता रहा हूं। आप यह भी जानते हैं कि विभागाध्यक्ष के पद पर होते हुए अनिल कुमार राय ने कैसे अटेंडेंस शीट तथा कक्षा लेने में हेरफेर की। अपने निरंकुश और फूहड़ निर्णयों को साकार करने के लिए उन छात्र-छात्राओं को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर प्रताड़ित किया, जिन्होंने विभागाध्यक्ष के बतौर उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने की कोशिश की। अनिल कुमार राय अंकित ने अपनी वैधानिकता बचाने के लिए कुछ छात्रों का एक क्षुद्र गुट बनाया। अपना मुंह बचाने के लिए इन लड़कों का इस्तेमाल किया और यह दिखाने की कोशिश की कि सब कुछ ठीक चल रहा है और जो गलत है, वह कुछ ‘अराजक’, और ‘विरोधी’ तत्त्वों का ‘षडयंत्र’ है। अफसोस कि इन मनगढ़ंत बातों की हिस्टीरिया के चक्कर से आप अपने आप को नहीं बचा सके।

इन स्थितियों के विश्‍लेषण के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि विश्‍वविद्यालय के कुलपति के बतौर गंभीर अकादमिक वातावरण बनाने, पढ़ाई-लिखाई की संस्कृति का विकास करने में आपको कोई वास्तविक दिलचस्पी नहीं है। आप खुद को चापलूसों, भ्रष्‍टाचारियों और प्रतिक्रियावादियों के हाथों में खेलने से नहीं रोक पा रहे हैं। आप कुलपति के बतौर, कहते कुछ और करते कुछ और ही हैं। इस बात से आप भी सहमत होंगे कि हिंदी में स्वस्थ, चिंतनपरक अकादमिक माहौल बनाना मुश्किल है। इसके लिए सजातीय, परिवारवाद तथा भाई-भतीजावाद की संकीर्णताओं सहित दोहरा जीवन जीने की सुविधाभोगिता को त्यागने के कष्‍ट उठाने पड़ेंगे।

आप हर तरह के संसाधन, पहुंच और ताकत से लैस हैं। फिर आपकी पुलिसिया घुड़कियां अधिकतर लोगों में घिग्घी बांध देती हैं। आप विश्‍वविद्यालय को जैसे चाहें, वैसे चलाने में समर्थ हैं। इसीलिए आपने अनिल चमड़िया (आपके शब्दों में, हमारे ’प्रिय गुरु) को अलग-थलग करने की हरसंभव कोशिशें कीं, उनके बारे में झूठे प्रचार को आपने हवा दी। ऐसे कई उदाहरण मैं गिना सकता हूं, लेकिन फिलहाल उनका जिक्र नहीं कर रहा हूं।

जबकि पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था को अकूत मुनाफे का सौदा बना दिया गया है, सारे विश्‍वविद्यालय परिसरों में लोकतंत्र को कुचलकर ‘दमनतंत्र’ की स्थापना की जा चुकी है, ऐसे में इस विश्‍वविद्यालय में अपने आगमन से बनी गतिशील और चेतना-संपन्न संस्कृति के विकास की बची-खुची उम्मीद को आपने स्वयं ख़ारिज कर दिया है।

जब तक आप इन तथ्यों की सच्चाई से इनकार करते रहेंगे और विभाग में अनिल कुमार राय अंकित की बहाली बरकरार रखेंगे, मैं अपने पीएचडी पाठ्यक्रम को त्यागने की घोषणा कर रहा हूं। अगर इस पर आप मुझ पर ‘विश्‍वविद्यालय विरोधी’ का ठप्पा लगाने की सोच रहे हैं, तो आपको यह बताना मैं अपना फर्ज समझता हूं कि कई छात्र-छात्राएं ऐसी घोषणा करने को तैयार हैं।

अनिल
पी एच डी, जनसंचार, महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय

किसानों की आत्महत्याः एक 12 साल लंबी दारूण कथा

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/11/2010 04:50:00 AM


कुछ लोगों के लिए किसानी मुनाफे का धंधा हो सकती है, लेकिन देश की बहुसंख्यक आबादी के लिए यह घाटे का सौदा बना दी गई है. न सिर्फ घाटे का सौदा, बल्कि मौत का सौदा भी. और यह सिर्फ इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि खेती से महज कुछ लोगों का मुनाफा सुनिश्चित रहे. यही वजह है कि खेतिहरों के कर्जे की माफी का फायदा भी आम खेतिहरों को नहीं मिला बल्कि बड़े किसानों को मिला. हाशिया पर तभी इसकी आशंका जतायी गयी थी. किसानों की हालिया आत्महत्याओं और इस पूरे सिलसिले पर पी साइनाथ की रिपोर्ट. इसका अनुवाद किया है हमारे साथी मनीष शांडिल्य ने. मूल लेख यहां पढ़ें.

2006-08 के बीच महाराष्ट्र में 12,493 किसानों ने आत्महत्या की. किसानों की आत्महत्या का यह आंकड़ा 1997-1999 के दौरान दर्ज किये गये आंकड़ों से 85 प्रतिशत अधिक है. 1997-1999 के दौरान 6,745 किसानों ने आत्महत्या की थी. किसी भी राज्य में तीन वर्षों के किसी भी अंतराल में इतनी बड़े पैमाने पर आत्महत्याएं नहीं की गयी थीं.
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार 2008 के ऋण माफी वाला साल देश में 16,196 किसानों की आत्महत्याओं का गवाह बना. 2007 की तुलना में ऋण माफी वाले साल आत्महत्याओं के आंकड़े में सिर्फ 436 की ही गिरावट दर्ज हुई. किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों पर गहराई से काम करने वाले अर्थशास्त्री प्रोफेसर के. नागराज कहते हैं, ''इन आंकड़ों को लेकर कहीं से भी आश्वस्त होने की कोई गुंजाइश नहीं है और न ही इन आंकड़ों पर खुद अपनी पीठ ही थपथपाई जा सकती है.'' 1990 के दशक के उत्तरार्ध में जो सिलसिला शुरू हुआ था और 2002 के बाद जो और बदतर हो गया, उसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं आया था. निराशाजनक सच्चाई यह है कि तेजी से घटती कृषक आबादी के भीतर किसान काफी बड़ी संखया में अब भी आत्महत्याएं कर रहे हैं.
अभी हाल के 1991 और 2001 की जनगणना के बीच लगभग 80 लाख किसानों ने खेती छोड़ दी. लगभग एक साल बाद 2011 की जनगणना हमें यह बतायेगी कि बीते दशक में और कितने किसानों ने खेती छोड़ी. इस आंकड़े के 80 लाख से कम रहने की संभावना नहीं है. आने वाले जनगणना के आंकड़े पिछले आंकड़ों को भी शायद बौना साबित कर सकते हैं क्योंकि 2001 के बाद खेती से पलायन संभवतः तेज ही हुआ है. राज्यवार कृषि आत्महत्या अनुपात - प्रति 10 लाख किसानों पर आत्महत्या करने वाले किसानों की संखया - अब भी 2001 के पुराने आंकड़े पर ही आंकी जाती हैं. इस कारण 2011 की जनगणना किसानों की अधिक प्रामाणिक गिनती के साथ संभवतः वर्तमान परिस्थितियों की और भयावह तस्वीर ही प्रस्तुत करे.
भारत में कुल आत्महत्या के एक हिस्से के रूप में किसानों की आत्महत्याओं पर ध्यान केंद्रित करना गुमराह करता है. कुछ इस तरह, ''अहा! यह प्रतिशत तो नीचे आ रहा है.'' यह बकवास है. पहली बात तो यह कि एक बढ़ती हुई आबादी में आत्महत्या की कुल संख्या (सभी समूहों में, सिर्फ किसानों में ही नहीं) बढ़ रही है. लेकिन किसानों की घटती आबादी के बावजूद उनकी आत्महत्याएं बढ़ रही है. दूसरा यह कि, एक अखिल भारतीय तस्वीर इस संकट की भयावहता को छुपा लेता है. तबाही 5 बड़े राज्यों (महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़) में केंद्रित है. 2003-08 के दौरान जितने किसानों ने आत्महत्या की थी, उनमें से दो तिहाई किसान इन्हीं 05 बड़े राज्यों से थे. इन 05 बड़े राज्यों में किसानों की आत्महत्याओं का प्रतिशत बढ़ गया है. इससे भी बदतर स्थिति यह है कि इन राज्यों में कुल अखिल भारतीय आत्महत्या (सभी श्रेणियों) का प्रतिशत भी बढ़ा है. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे गरीब राज्य बीते कुछ वर्षों में इस संकट से बहुत बुरी तरह से प्रभावित रहे हैं.
1997-2002 के बीच देश के 5 बड़े राज्यों में होने वाली 12 आत्महत्याओं में से लगभग 1 आत्महत्या किसानों की होती थी. यह अनुपात 2003-08 की अवधि के बीच बढ़ा और इन राज्यों में होने वाली 10 आत्महत्याओं में से लगभग एक हिस्सा किसानों की आबादी का हो गया.
एनसीआरबी के पास अब 12 साल के दौरान किये गये किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा है. वास्तव में, किसानों से संबंधित आंकड़े 1995 के बाद से एक स्वतंत्र आंकड़े के रूप में दर्ज किये जाने लगे, लेकिन कुछ राज्य पहले दो वर्षों में यह आंकड़ा जुटाने में विफल रहे. इसलिए 1997 एक अधिक विश्वसनीय आधार वर्ष है क्योंकि इसी साल से सभी राज्य किसानों की आत्महत्या से संबंधित आंकड़े उपलब्ध करा रहे हैं. एनसीआरबी ने पिछले सभी वर्षों के ''भारत में आकस्मिक मृत्यु और आत्महत्याएं'' के रपटों को अपनी वेबसाइट पर रखकर ऐसे आंकड़ों का आसानी से उपयोग सुनिश्चित कर दिया है.
1997 से 2008 के बीच की 12 साल की अवधि हमें किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों की तुलना करने का मौका देती है. हम यह पता लगा सकते हैं कि 1997-2002 के पहले 6 वर्षों के मुकाबले अगले 6 वर्षों 2003-2008 की अवधि में किस तेजी से किसानों की आत्महत्या दर में वृद्धि हुई. 12 साल का यह पूरा समय ही किसानों के लिए काफी बुरा गुजरा, लेकिन बाद के छह साल निश्चित ही ज्यादा बुरे थे.
किसी एक साल की आत्महत्या में गिरावट या वृद्धि के अध्ययन की 'प्रवृत्ति' भ्रामक है. वर्ष 1997-2008 के बीच के 3 या 6 साल के अंतराल का अध्ययन करना ज्यादा बेहतर है. उदाहरण के लिए, 2005में महाराष्ट्र के किसानों की आत्महत्या की संख्या में गिरावट देखी गयी थी, लेकिन अगला ही साल इस मामले में सबसे भयावह साबित हुई. 2006 के बाद से राज्य में कई पहल हुए हैं. मनमोहन सिंह की विदर्भ यात्रा उस साल क्षेत्र के छह संकट ग्रस्त जिलों के लिए 3,750 करोड़ रुपए का ''प्रधानमंत्री राहत पैकेज'' भी अपने साथ लायी थी. यह पैकेज तत्कालीन मुखयमंत्री विलासराव देशमुख के 1,075 करोड़ रुपए के ''मुखयमंत्री राहत पैकेज'' की घोषणा के बाद मिला था. इसके बाद महाराष्ट्र को किसानों को दिये गये 70,000 करोड़ रुपये के केन्द्रीय कर्ज माफी में अपने हिस्से के करीब 9,000 करोड़ मिले. इस कर्ज माफी का लाभ जिन किसानों को नहीं मिल सकता था, उनको राहत देने के लिए राज्य सरकार ने इस केन्द्रीय कर्ज माफी में 6,200 करोड़ रुपए जोड़े. पांच एकड़ से अधिक जमीन पर मालिकाना होने के कारण जिन गरीब किसानों को कर्ज माफी की परिधि से बाहर रखा गया था, उनके साथ एकमुश्त बंदोबस्ती (ओटीएस) करने के लिए राज्य सरकार ने कर्ज माफी की राशि में अतिरिक्त 500 करोड़ रुपए जोड़े.
कुल मिलाकर, 2006, 2007 और 2008 में महाराष्ट्र में इस कृषि संकट का सामना करने के लिए 20,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि उपलब्ध कराई गयी. (और इसमें चीनी मिल मालकों द्वारा उदारतापूर्वक किये गये विशाल दान को शामिल नहीं किया गया है.) फिर भी, खेती संबंधी आंकड़ों की गणना शुरू होने के बाद से ये तीन साल किसी भी समय में किसी भी राज्य के लिए सबसे ज्यादा बुरे साबित हुए. 2006-08 में, महाराष्ट्र में 12, 493 किसानों ने आत्महत्या की. यह पिछले 2002-2005 के सबसे खराब वर्षां से लगभग 600 अधिक था और 1997-1999 की तीन वर्ष की अवधि के दौरान दर्ज किये गये 6,745 आत्महत्याओं से 85 प्रतिशत ज्यादा था. संयोग से, सबसे ज्यादा बुरे इन छह वर्षां में एक ही सरकार सत्ता में थी. इसके अलावा, आत्महत्याओं की संखया एक सिकुड़ते कृषि आबादी में बढ़ रही है. 2001 तक महाराष्ट्र की 42 प्रतिशत जनसंख्या पहले से ही शहरी आबादी में तब्दील हो चुकी थी. इसका कृषक आधार निश्चित रूप से नहीं बढ़ा है.
तो क्या कर्ज माफी बेकार था? कर्ज माफी का विचार एक बुरी सोच नहीं थी. और यह एक सही हस्तक्षेप था. लेकिन इस संबंध में उठाये गये विशेष कदम गलत दिशा में और गुमराह करने वाले थे. लेकिन तर्क यह भी दिया जा सकता है कि कर्ज माफी कम से कम कुछ किसानों के लिए तो राहत लाया, नहीं तो 2008 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संखया भयावह रूप से बढ़ सकती थी. कर्ज माफी किसानों के लिए एक स्वागत योग्य कदम था, लेकिन इसकी संरचना त्रुटिपूर्ण थी. इस एक बिंदु को प्रमुखता से इस पत्रिका में उठाया गया (ओह, क्या एक प्यारी छूट, 10 मार्च, 2008). यह कर्ज माफी सिर्फ बैंक ऋण से ही संबंधित थी और इसमें साहूकार से लिये गये कर्जों की अनदेखी की गयी थी. इस कारण केवल उन्हीं किसानों को ही लाभ हुआ जिनकी संस्थागत ऋण तक पहुंच थी. आंध्र प्रदेश में बंटाई पर खेती करने वाले और विदर्भ एवं दूसरी जगहों में गरीब किसानों को मुखय रूप से साहूकारों से ही कर्ज मिलता है. ऐसे में वास्तव में, केरल के किसानों, जहां हर किसान का अपना एक बैंक खाता है, को अधिक लाभ होने की संभावना थी. (केरल एक राज्य था जहां साहूकारों से मिलने वाले कर्ज के मुद्दे को संबोधित किया जाना था.)
2008 की कर्ज माफी की परिधि से पांच एकड़ से अधिक जमीन रखने वाले किसानों को बाहर रखा गया, इसमें सिंचित और असिंचित भूमि के बीच कोई फर्क नहीं किया गया था. इस फैसले ने आठ या 10 एकड़ की जोतवाली कम उपजाऊ और सूखी जमीन पर संघर्ष कर रहे किसानों को बर्बाद कर दिया. दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल के किसानों, जिनमें बड़ी संख्या 5 एकड़ की सीमा के नीचे आने वाले छोटे किसानों थी, को इस कर्ज माफी का कहीं ज्यादा लाभ मिला.
हरेक आत्महत्या के एक नहीं कई कारण हैं. लेकिन जब आपके सामने ऐसे करीब 2,00,000 कारण मौजूद हों, तो उनमें से कुछ अहम लेकिन समान कारणों को सूचीबद्ध करना बुद्धिमानी होगी. जैसा कि डा. नागराज बार-बार बताते हैं कि आत्महत्याएं ऐसे क्षेत्रों में केंद्रित दिखाई देती हैं, जहां कृषि का बड़े पैमाने पर व्यावसायीकरण हुआ है और जहां किसान कर्ज के बोझ तले बहुत अधिक दबे हैं. नकदी फसल उगाने वाले किसान खाद्य फसल उगाने वाले किसानों की तुलना में कहीं अधिक संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं. फिर भी संकट के मूल बुनियादी कारण अब तक अछूते ही हैं. जिनमें प्रमुख हैं : खेती को लूटने वाला कृषि के व्यावसायीकरण की प्रक्रिया, कृषि क्षेत्र में निवेश में भारी गिरावट, खेती में काम आने वाले सामानों के आसमान छूती कीमतों के समय में बैंक ऋण की वापसी, खेती की लागत में विस्फोटक वृद्धि और इसके साथ ही खेती से होने वाली आय में भारी कमी, इससे जुड़े सभी जोखिमों को जानते हुए भी खाद्य फसल से नकदी फसल की खेती की ओर लाखों किसानों का स्थानांतरण, कृषि के हर बड़े क्षेत्र, विशेष रूप से बीज, पर बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा, बढ़ता जल संकट और संसाधनों के निजीकरण की ओर उठाये गये कदम. इस संकट के सभी मूल कारणों को दूर किये बगैर सरकार सिर्फ एक कर्ज माफी के सहारे ही संकट को समाप्त करने की कोशिश कर रही थी.
2007 के अंतिम महीनों में द हिंदू (12-15 नवम्बर) ने डा. नागराज द्वारा किये गये एनसीआरबी के आंकड़ों के अध्ययन से उभरते नतीजों पर यह लेख प्रकाशित किया था कि 1997 और 2005 के बीच लगभग 1.5 लाख किसानों ने निराशा में अपना जीवन समाप्त कर लिया. इसके कुछ दिनों बाद ही केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने संसद में इन आत्महत्याओं (राज्य सभा-तारांकित प्रश्न संखया 238, 30 नवम्बर, 2007) की पुष्टि एनसीआरबी के आंकड़ों का ही हवाला देते हुए की थी. यह त्रासद है कि 27 महीने बाद, उसी अखबार की मुख्य खबर यह बनी कि यह संख्या लगभग 2 लाख पर पहुंच गयी है. यह संकट किसी भी मायने में दूर नहीं हुआ है. अपने शिकार का मजाक उड़ा रहा है, अपने आलोचकों पर ताने कस रहा है. और दिखावटी बदलावों से यह दूर भी नहीं होगा.

श्री विभूति नारायण राय, कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के नाम एक पत्र

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/10/2010 12:23:00 PM

श्री विभूति नारायण राय, कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के नाम एक पत्र


दिल्ली 9 फरवरी 2010

प्रिय विभूतिजी
अभिवादन !

उम्मीद है, स्वस्थ होंगे .

लम्बे समय से इस उधेड़बुन में था कि चन्द बातें आप तक किस तरह संप्रेषित करूं ? व्यक्तिगत मुलाकात संभव नहीं दिख रही थी, सोचा पत्र के जरिए ही अपनी बात लिख दूं. और यह एक ऐसा पत्र हो, जो सिर्फ हमारे आप के बीच न रहे बल्कि जिसे बाकी लोग भी पढ़ सकें, जान सकें. इसकी वजह यही है कि पत्र में जिन सरोकारों को मैं रखना चाहता हूं, उनका ताल्लुक हमारे आपसी संबंधों से जुड़े किसी मसले से नहीं है.

आप को याद होगा कि महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर आप की नियुक्ति होने पर मेरे बधाई सन्देश का आपने उसी आत्मीय अन्दाज़ में जवाब दिया था. उन्हीं दिनों उत्तर प्रदेश की पुलिस द्वारा एक मानवाधिकार कार्यकर्ता की अनुचित गिरफ्तारी के मसले को जब मैंने आप के साथ सांझा किया तब आपने अपने स्तर पर उस मामले की खोज-ख़बर लेने की कोशिश की थी. हमारे आपसी संबंधों की इसी सांर्द्रता का नतीजा था कि आप के संपादन के अंतर्गत सांप्रदायिकता के ज्वलंत मसले पर केन्द्रित एक किताब में भी अपने आलेख को भेजना मैंने जरूरी समझा. इतना ही नहीं कुछ माह पहले जब मुझे बात रखने के लिए आप के विश्वविद्यालय का निमंत्रण मिला तब मैंने भी इसे सहर्ष स्वीकार किया.

यह अलग बात है कि वर्धा की अपनी दो दिनी यात्रा में मेरी आप से मुलाक़ात संभव नहीं हो सकी. संभवतः आप प्रशासनिक कामों में अत्यधिक व्यस्त थे. आज लगता है कि अगर मुलाक़ात हो पाती तो मैं उन संकेतों को आप के साथ शेअर करता -जो विश्वविद्यालय समुदाय के तमाम सदस्यों से औपचारिक एवं अनौपचारिक चर्चा के दौरान मुझे मिल रहे थे- और फिर इस किस्म के पत्र की आवश्यकता निश्चित ही नहीं पड़ती.

मैं यह जानकर आश्चर्यचकित था कि विश्वविद्यालय में अपने पदभार ग्रहण करने के बाद अध्यापकों एवं विद्यार्थियों की किसी सभा में आप ने छात्रों के छात्रसंघ बनाने के मसले के प्रति अपनी असहमति जाहिर की थी और यह साफ कर दिया था कि आप इसकी अनुमति नहीं देंगे.

यह बात भी मेरे आकलन से परे थी कि सामाजिक तौर पर उत्पीड़ित तबके से आने वाले एक छात्र- सन्तोष बघेल को विभाग में सीट की उपलब्धता के बावजूद शोध में प्रवेश लेने के लिए भी आंदोलन का सहारा लेना पड़ा था और अंततः प्रशासन ने उसे प्रवेश दे दिया था. विश्वविद्यालय की आयोजित एक गोष्ठी में जिसमें मुझे बीज वक्तव्य देना था, उसकी सदारत कर रहे महानुभाव की ‘लेखकीय प्रतिभा’ के बारे में भी लोगों ने मुझे सूचना दी, जिसका लुब्बेलुआब यही था कि अपने विभाग के पाठयक्रम के लिए कई जरूरी किताबों के ‘रचयिता’ उपरोक्त सज्जन पर वाड्मयचैर्य अर्थात प्लेगिएरिजम के आरोप लगे हैं. कुछ चैनलों ने भी उनके इस ‘हुनर’ पर स्टोरी दिखायी थी.

बहरहाल, विगत तीन माह के कालखण्ड में पीड़ित छात्रों द्वारा प्रसारित सूचनाओं के माध्यम से तथा राष्ट्रीय मीडिया के एक हिस्से में विश्वविद्यालय के बारे में प्रकाशित रिपोर्टों से कई सारी बातें सार्वजनिक हो चुकी हैं. अनुसूचित जाति-जनजाति से संबंधित छात्रों के साथ कथित तौर पर जारी भेदभाव एवं उत्पीड़न सम्बन्धी ख़बरें भी प्रकाशित हो चुकी हैं.

6 दिसम्बर 2009 को डॉ. अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस पर आयोजित रैली में शामिल दलित प्रोफेसर लेल्ला कारूण्यकारा को मिले कारण बताओ नोटिस पर टाईम्स आफ इण्डिया भी लिख चुका है. उन तमाम बातों को मैं यहां दोहराना नहीं चाहता.

जनवरी माह की शुरूआत में मुझे यह भी पता चला कि हिन्दी जगत में प्रतिबद्ध पत्रकारिता के एक अहम हस्ताक्षर श्री अनिल चमड़िया- जिन्हें आप के विश्वविद्यालय में स्थायी प्रोफेसर के तौर पर कुछ माह पहले ही नियुक्त किया गया था- को अपने पद से हटाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन आमादा है.

फिर चंद दिनों के बाद यह भी सूचना सार्वजनिक हुई कि विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी परिषद की आकस्मिक बैठक करके उन्हें पद से मुक्त करने का फैसला लिया गया और उन्हें जो पत्र थमा दिया गया, उसमें उनकी नियुक्ति को ‘कैन्सिल’ करने की घोषणा की गयी.

मैं समझता हूं कि विश्वविद्यालय स्तर पर की जाने वाली नियुक्तियां बच्चों की गुड्डी-गुड्डा का खेल नहीं होता कि जब चाहें हम उसे समेट लें. निश्चित तौर पर उसके पहले पर्याप्त छानबीन की जाती होगी, मापदण्ड निर्धारित होते होंगे, योग्यता को परखा जाता होगा. यह बात समझ से परे है कि कुछ माह पहले आप ने जिस व्यक्ति को प्रोफेसर जैसे अहम पद पर नियुक्त किया, उन्हें सबसे सुयोग्य प्रत्याशी माना, वह रातों रात अयोग्य घोषित किया गया और उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया गया ?

कानून की सामान्य जानकारी रखनेवाला व्यक्ति भी बता सकता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन का यह कदम प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के खिलाफ है. और ऐसा मामला नज़ीर बना तो किसी भी व्यक्ति के स्थायी रोजगार की संकल्पना भी हवा हो जाएगी क्योंकि किसी भी दिन उपरोक्त व्यक्ति का नियोक्ता उसे पत्र थमा देगा कि उसकी नियुक्ति –‘कैन्सिल’.

यह जानी हुई बात है कि हिन्दी प्रदेश में ही नहीं बल्कि शेष हिन्दोस्तां में लोगों के बीच आप की शोहरत एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी की रही है, जिसने अपने आप को जोखिम में डाल कर भी साम्प्रदायिकता जैसे ज्वलंत मसले पर संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने की कोशिश की. ‘शहर में कर्फ्यू’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से या ‘वर्तमान साहित्य’ जैसी पत्रिका की नींव डालने के आप की कोशिशों से भी लोग भलीभांति वाकीफ हैं. संभवतः यही वजह है कि कई सारे लोग, जो कुलपति के तौर पर आप की कार्यप्रणाली से खिन्न हैं, वे मौन ओढ़े हुए हैं.

इसे इत्तेफाक ही समझें कि महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय अपनी स्थापना के समय से ही विवादों के घेरे में रहा है. चाहे जनाब अशोक वाजपेयी का कुलपति का दौर रहा हों या उसके बाद पदासीन हुए जनाब गोपीनाथन का कालखण्ड रहा हो, विवादों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा है. मेरी दिली ख्वाहिश है कि साढ़े तीन साल बाद जब आप पद भार से मुक्त हों तो आप का भी नाम इस फेहरिस्त में न जुड़े.

मैं पुरयकीं हूं कि आप मेरी इन चिंताओं पर गौर करेंगे और उचित कदम उठाएंगे.

आपका
सुभाष गाताडे

जातिवाद को बाजार बरकरार रखेगा और बेचेगा.

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/04/2010 07:19:00 PM

उचक्का नाम से आई अपनी आत्मकथा के जरिए लक्ष्मण गायकवाड़ ने हिंदी पाठकों के बीच अपनी पहचान बनाई. मूलत: मराठी मे लिखनेवाले गायकवाड़ एक और पुस्तक पथरकटवा भी हिंदू में अनूदित हो चुकी है. कभी राजनीति के जरिए दलितों की मुक्ति के लिए कोशिश करनेवाले गायकवाड़ का मानना है कि राजनीति अब पूंजी बनाने का साधन हो गई है और उससे नए राजे-महाराजे पैदा हो रहे हैं.  1947 के बाद से हर तरह की सुविधाओं से वंचित खानाबदोशों के अधिकारों के लिए वे अभी संघर्ष कर रहे हैं. वे चाहते हैं कि उन्हें नागरिकता मिले, राशन कार्ड दिए जाएं. उनका अपना एक गांव हो और वे आजादी से जी सकें. इस पर हाल में मराठी में उन्होंने एक किताब ‘हे स्वातंत्रे कोणा आचे’ (यह आजादी किसकी है) लिखी है. उनसे हुई मेरी इस अनौपचारिक बातचीत के कुछ अंश तहलका पर भी प्रकाशित हुए हैं.
आप ‘उचक्का’ के लेखक के रूप में जाने जाते हैं. जैसा कि उचक्का से ही हम जानते हैं, आपका जीवन बेहद संघर्षों से होकर गुजरा है. उचक्का के आने के बाद उसमें क्या बदलाव आए?
समाज ने उचक्का के आने के बाद मुङो बहुत प्यार दिया. समाज बदलाव चाहता है. समाज में हर तरह के लोग हैं. उनमें से गाली देनेवाले को गाली दो, जो अच्छे हैं, उन्हें प्यार करो. में अच्छे को अच्छा बोलूंगा, बुरे को बुरा. अगर एक कास्ट सर्टिफिकेट बनाने के लिए एक ब्राह्मण पैसा नहीं लेता है और दलित पैसा लेता है तो मैं उस दलित के खिलाफ लिखूंगा.

दलित साहित्य ने साहित्य में अपनी सशक्त दावेदारी पेश की है. इसने साहित्यिक बहसों की दिशा को मोड़ दिया है और एक केंद्रीय स्थान हासिल किया है. लेकिन अभी दलित साहित्य के सामने आपकी नजर में कौन-कौन से कार्यभार हैं?
दलित साहित्य में एकजुटता नहीं है. हमने दलित साहित्य को क्रांतिकारी बनाया है. हमने शब्दों को ताकत दी है. उसे अलग-अलग समय और समाजों में प्रवाह भी दिया है. लेकिन आज सबसे बड़ी जरूरत पूरे देश के दलित लेखन को एकताबद्ध होने की है, उसे एक जगह एक मंच पर लाए जाने की है. आपने सही कहा कि दलित लेखन के आने के बाद से बहुत बदलाव आया है. अब लोग साहित्य में दलित चेतना को न तो नजरअंदाज कर सकते हैं और न उससे बच सकते हैं.
लेकिन हमें एक और बात पर ध्यान देने की जरूरत है. अलग से दलित साहित्य का अस्तित्व मानना ठीक नहीं है. जब कोई गैर दलित या कोई ब्राह्मण कोई साहित्य लिखता है तो क्या उसे ब्राह्मण साहित्य कहा जाता है? तो फिर दलित साहित्य क्यों कहा जाए? सिर्फ साहित्य क्यों नहीं कहा जाए? दलित साहित्य, उच्च वर्ग का साहित्य या आदिवासी साहित्य जैसी कोई चीज नहीं होती. जो लेखन इनसान को उच्च मूल्यों से लैस करे, प्रगतिशील हो, वह साहित्य होता है. लेखन कभी दलित या आदिवासी नहीं होता. लेखन लेखन ही होता है. फिर भी चाहे जो माना जाए, आनेवाले दिनों में वही साहित्य बदलाव लाएगा, जिसे दलित साहित्य कहा जा रहा है.

यह सवाल अब भी लोग बार-बार उठाते रहते हैं कि दलित साहित्य क्या सिर्फ दलित ही लिख सकते हैं. आपके नजरिए में क्या यह सवाल सुलझ चुका है? या इसे सुलझाया जाना बाकी है? आप क्या सोचते हैं?
इतनी सरलता से एक लाइन में इसके बारे में नहीं कहा जा सकता. आप प्रेमचंद को ही लीजिए, या फिर टैगोर को लीजिए. इनके अलावा भी बहुत सारे लेखक हैं, जिन्होंने दलितों पर लिखा है. ये हमारे समाज के प्रमुख लेखक हैं. उन्होंने अपने लेखन में जाति के आधार पर टीका-टिप्पणी की है. वे पूरा न्याय नहीं कर पाए. एक दलित किस गंदगी में रहता है, क्यों रहता है, यह स्थिति कैसे बदलेगी, इसके बारे में वे नहीं लिखते. हो सकता है कि कोई दलितों पर लिखे और उसे मनोरंजन का साधन बना डाले. लेकिन लेखन को बदलाव का साधन बनाने की जरूरत है.

आपने अपने वक्तव्य में कहा कि दलितों में एक ब्राह्मण वर्ग पैदा हो रहा है.
हां, मेरा यह कहना है कि दलितों के बीच एक ब्राह्मण वर्ग तैयार हो रहा है. वह सभी सुविधाओं का लाभ उठा कर और ऊपर बढ़ता जा रहा है. उसे न तो अब नीचे आने की चाहत है और नीचेवालों की फिक्र. यहां तक कि आंबेदकर का नाम लेने में भी उसे हिचक होती है. इस प्रवृत्ति पर मैंने पथरकटवा में लिखा है. दलित ब्राह्मण ब्राह्मण से भी खराब होते हैं. वे तो अपने ही समाज का शोषण कर रहे हैं.

ऐसा क्यों होता है कि जिन स्थितियों से संघर्ष कर के वे ऊपर आ रहे हैं, उन्हें भूल जाना चाहते हैं?
इसकी जड़ें वर्ण व्यवस्था में ही हैं. जब तक समाज जातियों में बंटा रहेगा और कुछ उच्च जातियां और कुछ निम्म जातियां बनी रहेंगी, तब तक सब लोग ऊपर ही जाना चाहेंगे. ऊपर जाना अपने आप में बुरी बात नहीं है. यह तो अच्छा है कि सब ऊपर जाएं. लेकिन दिक्कत की बात यह है कि सिर्फ कुछ ही ऊपर बने हुए हैं. हमारा दलितों से कहना है कि आप ऊपर जाएं, लेकिन जो नीचे रह गए हैं, उन्हें भूलें नहीं. उन्हें अपने साथ रखें, उनके साथ रहें. लेकिन इसका उल्टा हो रहा है. दलित अधिकारी और पूंजीपति व्यवस्था के खिलाफ खड़े नहीं होते, लड़ते नहीं. इसलिए जो लोग समाज में ऊपर जा रहे हैं, उनका नीचे आना भी जरूरी है.

हवेलियों में फव्वारों के लिए पानी है, गन्ने के खेतों के लिए पानी है, लेकिन सूखे होठों के लिए पानी नहीं है, आपके द्वारा सुनाई गई एक कविता के इस अंश में जटिल भारतीय समाज का एक द्वंद्व भी दिखता है, जहां कई बार दलित और पिछड़े वर्ग एक दूसरे के सामने खड़े नजर आते हैं. जबकि पिछड़ा वर्ग भी दलित समुदाय से बहुत आगे नहीं है. आप इस द्वंद्व को कैसे देखते हैं.
पिछड़े और दलितों का दुख दर्द एक जैसा है. लेकिन वे इसे जानते नहीं हैं, इसलिए आपस में टकराव होते हैं. जब वे इससे अवगत होंगे कि उनके दुख एक जैसे हैं और उनके कारण भी एक ही जैसे हैं, जो फिर वे साथ आएंगे. लेखन की दुनिया में भी मैं कोशिश कर रहा हूं कि देश के स्तर पर दलित लेखक एक जगह आएं और फिर व्यापक एकता बने. हमारी कोई भी कोशिश जातिवाद को बढ़ाने के लिए नहीं उसे खत्म करने की दिशा में होनी चाहिए.

आप अश्वेत लेखन के बरअक्स दलित लेखन को किस तरह रखते हैं? दोनों में किसी दूरी और नजदीकी है?
मेरा मानना है कि दलित लेखन अश्वेत लेखन से आगे है. लेकिन इसमें भाषा एक बड़ा अवरोध है. लोग जान ही नहीं पाते हैं कि कहां क्या लिखा जा रहा है. अगर लोग जानेंगे तो सही बात पता लगेगी.

आप राजनीति में भी रहे. और अब आप इस राजनीतिक तंत्र की आलोचना कर रहे हैं. क्या अनुभव रहे आपके?
1991 में वीपी सिंह ने सोलापुर से मुझे जनता दल का टिकट दिया था. लेकिन तब राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस को लोगों का समर्थन बढ़ गया था. मैं हार गया. इसके बाद के भी कुछ अनुभवों से हमें समझ आया कि राजनीति हमारी जगह नहीं है. वे हमें बदनाम करने और बेचने का काम करते हैं. मैं किसी पार्टी का सदस्य कभी नहीं रहा. अभी दलितों के लिए राजनीति कर रहे जो मौजूदा दल हैं वे राजनीति में बने रहने के लिए जो जरूरी होता है करते हैं. वे अपनी सुविधा के हिसाब से कभी आपके नजदीक आएंगे और कभी दूर हो जाएंगे.
राजनीति पूंजी कमाने का साधन बन गई है. राजनीति के जरिए नए राजे-महाराजे बनने का काम चल रहा है. राजनीति के साथ जातिवाद के मिलने से जमींदारी प्रवृत्ति आई है.
अगर समाज का सही कल्याण चाहते हैं तो एक साथ आना पड़ेगा. अगर कोई ठीक काम कर रहा है तो उसके साथ आना होगा. इसके अलावा यह भी समझना होगा कि ऊंची जातियों ने दलितों को खिलौना बना लिया है.

जाति के उन्मूलन के लिए एक मान्यता यह भी है कि बाजार बढ़ेगा और वश्वीकरण की प्रक्रिया तेज होगी तो जाति खत्म हो जाएगी. आप क्या सोचते हैं? क्या बढ़ते हुए बाजार ने कुछ ऐसे संकेत दिए हैं जिससे इस नतीजे पर पहुंचा जा सके?
ऐसा कभी नहीं होगा. दुनिया की बात और है. भारत की बात और है. भारत में बाजार के विस्तार के बावजूद जातिवाद बरकरार रहेगा, क्योंकि यहां की परिस्थिति दूसरी है. ऐसी परिस्थिति में भाषाएं मर सकती हैं, लेकिन जाति नहीं मरनेवाली. यहां तो जन्म से ही यही सिखाया जाता है कि कुछ लोग जन्मजात बुरे होते हैं. कानून और पुलिस एकेडमी तक में यही सिखाया जाता है कि निचली जातियों के लोग चोर कैसे बनते हैं. क्या बाजार इस तंत्र को, ऊपर से नीचे तक स्थापित इस पूरे मकड़जाल को तोड़ सकता है?
नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता. जातिवाद को बाजार भी खत्म नहीं करेगा. वह उसे बरकरार रखेगा और बेचेगा. वह जातियों के हीरो पैदा करेगा और उन्हें बेचेगा. वह एक को ऊपर उठा कर उसका उत्थान सबको दिखाएगा, लेकिन बाकी को उसी पुरानी दशा में बनाए रखेगा, ताकि उस हीरो को बेचा जा सके. व्यापार बढ़ेगा, लेकिन जाति भी बनी रहेगी. यह हम पहले से देखते आ रहे हैं और आगे भी यही होगा. वश्वीकरण से इसमें कोई फायदा नहीं होनेवाला है. हालात और खराब ही होंगे.

आरक्षण का न्यायपालिका, अनेक शिक्षा संस्थानों में और दूसरी अन्य जगहों पर विरोध किया जाता है, जिसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि आरक्षण लागू करने से गुणवत्ता पर असर पड़ेगा. आप सामाजिक न्याय के सामने गुणवत्ता के प्रश्न को खड़ा करने को किस तरह देखते हैं?
यह गलत है. गुणवत्ता का सवाल लाने के पीछे छिपी मंशा को हम जान सकते हैं. अगर उन्हें इतनी चिंता है तो मेडिकल और इंजीनियरिंग में डोनेशन देकर जो लड़के एडमिशन लेते हैं और डिग्री हासिल करते हैं, उनके समय गुणवत्ता का सवाल कहां चला जाता है? अब तो हम अनेक जगहों पर यह देखते हैं कि एससी-एसटी-ओबीसी भी सामान्य श्रेणी के छात्रों जितने ही अंक लाते हैं. फिर गुणवत्ता की बात ही कहां उठती है. यह तो वास्तव में अब तक वंचित रहे समुदायों को आगे भी वंचित रखने की दलील है.


आपने दक्षिणपंथी राजनीति की बात की. गुजरात से लेकर उड़ीसा तक में तथा दूसरी जगहों पर भी दक्षिणपंथ ने आदिवासियों-दलितों का दंगों में इस्तेमाल किया. सांप्रदायिक राजनीति के साथ दलित-आदिवासी समुदाय की यह संगति थोड़ी अस्वाभाविक लगती है. लेकिन फिर भी यह हमारे समय में देखने में आ रही है. आप खुद ऐसे समुदाय से आते हैं, उसके बारे में लिखते रहे हैं. आप इस प्रक्रिया को कैसे देखते हैं?
फासीवादी दलितों-आदिवासियों को इसलिए अपने साथ लेते हैं, क्योंकि ये लड़ने में अच्छे लोग हैं. नंगे, भूख, बेरोजगार लोगों को यह समझ-बुझ कर कि आपकी समस्याओं पर बहस तो संसद में चल रही है, आपकी समस्याएं दूर होंगी, वे उन्हें अपने साथ लेते हैं. नंगे, भूखे लोगों को आसानी से उकसाया जा सकता है, क्योंकि तात्कालिक तौर पर जो उन्हें रोटी देगा, वे उधर जाएंगे. गुजरात में तो दलितों-आदिवासियों के बीच ढोल और त्रिशूल मुफ्त बांटे जाते हैं. उनसे कहा जाता है कि तुम लड़ो, हम तुम्हारे साथ हैं. राम ने हनुमान सेना बनाई थी. इन्होंने बजरंग सेना बनाई है. यह इनकी वानर सेना है. आप इसमें दक्षिणपंथी राजनीति की मानसिकता भी देख सकते हैं. कि वे दलितों-आदिवासियों को क्या समझते हैं. वे राम मंदिर के नाम पर लंका जलाने का काम दलितों-आदिवासियों से कराना चाहते हैं. इनसे को कहीं अच्छे नक्सलवादी हैं, जो गरीबों के हक की लड़ाई तो लड़ते हैं. वे कुछ बदलना चाहते हैं. लेकिन दक्षिणपंथी तो वर्ण व्यवस्था और धर्म को मजबूत कर समाज को सदियों पीछे धकेलने के लिए लड़ रहे हैं.

आगे क्या लिख रहे हैं? किन योजनाओं के बारे में सोच रहे है?
राजस्थान के ही सत्यनारायण गोयनका पर लिख रहा हूं. उन्होंने बुद्ध की प्रज्ञा, शील करुणा के लिए काम किया और वे दुनिया को विपश्यना सिखा रहे हैं. उन्हीं पर थोड़े विस्तार से काम करने की योजना है.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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