हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

विभूति नारायण राय और विश्वरंजन में क्या फर्क है

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/29/2010 07:10:00 PM

इस पोस्ट के ज़रिये हम मांग करते हैं अनिल चमडिया की फिर से बहाली की जाए, और उनसे माफी भी माँगी जाए. इसी जगह पर यह विचार भी करना चाहिए कि वीएन  राय और विश्वरंजन में क्या कोइ फर्क नहीं है?


वर्धा से जब कुछ छात्रों ने फोन किया कि अनिल चमड़‍िया सर को निकाल दिया गया है, तो वीएन राय की गतिविधियों को लेकर पहले जितना गुस्‍सा था – वो लगभग घृणा में बदल गया। सृजन और लोकतंत्र का नकाब पहन कर कोई आदमी इस हद तक घिनौना हो सकता है कि एक असहमत आदमी को अपने घमंड की बूटों तले कुचल डाले? मुझे किसी ने बताया कि जिस कार्यकारिणी समिति ने अनिल चमड़‍िया को निकालने के फैसले पर मुहर लगायी है, उसमें विष्‍णु नागर और कृष्‍ण कुमार भी थे। विष्‍णु नागर कवि हैं और कृष्‍ण कुमार शिक्षाविद। दोनों को मैं व्‍यक्तिगत रूप से जानता हूं और मेरी जानिब दोनों ही बेहतरीन इंसान हैं और अच्‍छे-जुझारू लोगों का भरपूर साथ देते हैं।


मैंने तुरत नागर जी को फोन किया, तो उन्‍होंने बताया कि नहीं मैं पहले ही कार्यकारिणी से इस्‍तीफा दे चुका हूं – लिहाजा मैं बैठक में नहीं था। (बाद में किस्‍सा पता चला कि कार्यकारिणी समिति में मृणाल पांडे हैं और हिंदुस्‍तान के दिनों में विष्‍णु नागर उनके मातहत हुआ करते थे। उन्‍होंने वीएन राय को कहलवाया कि मैं पसंद नहीं करूंगी कि मेरा मातहत कार्यकारिणी की बैठक में मेरे बराबर बैठे। यह संदेश नागर जी के पास गया, तो उन्‍होंने कार्यकारिणी समिति से अलग होने का फ़ैसला लिया।)

कृष्‍ण कुमार से बात नहीं हुई – लेकिन पता चला कि उन्‍होंने सहमति दी है। गंगा प्रसाद विमल से बात हुई तो उन्‍होंने बताया कि अनिल चमड़‍िया की पात्रता में कमी थी। यह अजीब विडंबना है कि अनिल चमड़‍िया जैसे संघर्ष और न्‍याय के प्रति कमिटेड शिक्षक-पत्रकार को पात्रता के आधार पर बर्खास्‍त करने का फ़ैसला ले लिया गया। वह भी कृष्‍ण कुमार जैसे शिक्षक के रहते हुए, जो पोथी से ज्‍यादा समाज और लेक्‍चर से ज्‍यादा लय और खेत-खलिहान को ज्ञान की राह बताते आये हैं।

मामला दरअसल जातिवाद का है और कुछ नहीं। अभी दो दिनों पहले हिंदुस्‍तान अखबार में छपे आलेख गणतंत्र में छिपे हैं लोकतंत्र के बीज के लेखक विभूति नारायण राय ने मं गां अं हिं विवि वर्धा के अपने अब तक कार्यकाल में जितनी भी नियुक्तियां की हैं, उनमें नब्‍बे फीसदी भूमिहार हैं। इस वक्‍त जब अनिल चमड़‍िया को निकाले जाने की खबर मिली है, उसी वक्‍त एक खबर यह भी आ रही है कि विभूति नारायण राय कवि आलोकधन्‍वा को विश्‍वविद्यालय का हिस्‍सा बना रहे हैं। यक़ीनन आलोकधन्‍वा एक बड़े और प्रभावशाली और विलक्षण कवि हैं – लेकिन विभूति नारायण राय की तरफ से उनके हिस्‍से का सच ये है कि आलोकधन्‍वा भूमिहार जाति से आते हैं। मुझे लगता है कि अनिल चमड़‍िया को निकाले जाने का मसला सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि न्‍याय से छेड़खानी का मसला है और इस एक मसले पर हिंदी समाज के सृजनधर्मियों-संस्‍कृतिकर्मियों को अपना प्रतिवाद दर्ज करना चाहिए। विभूति नारायण राय के प्रचारित उज्‍ज्‍वल चेहरे के पीछे छिपे जातिवादी, अन्‍यायी और दंभी आदमखोर को बेपर्दा करना चाहिए।
खैर… इसी मुद्दे पर सवालों की शक्‍ल में कुछ नोट्स पत्रकार दिलीप मंडल ने हमें भेजे हैं : अविनाश (मोहल्ला लाइव से साभार)

क्या अनिल चमड़िया का टर्मिनेशन अवैध है?


 दिलीप मंडल



पत्रकार, शिक्षक और सामाजिक आंदोलनों के कार्यकर्ता अनिल चमड़िया की महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पद से नियुक्ति रद्द किया जाना कई सवाल खड़े करता है।
सवाल 1 : क्या दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 13 जनवरी को हुई एक्जिक्यूटिव कौंसिल की बैठक के मीनिट्स (मीटिंग में हुई बातचीत का ब्यौरा) लिये गये थे?

सवाल 2 : क्या मीटिंग का ये ब्यौरा एक्जिक्यूटिव कौंसिल के सदस्यों को मंजूरी के लिए भेजा गया? नियमों के तहत ये जरूरी है ताकि बैठक में शामिल सदस्यों को इस बात की विधिवत जानकारी मिल सके कि बैठक में क्या फैसले किये गये?

सवाल 3 : क्या एक्जिक्यूटिव कौंसिल की बैठक में शामिल सभी सदस्यों ने मीटिंग का ब्यौरा अपनी मंजूरी या एतराज के साथ वापस कर दिया है?

(नोट – लगभग दो दशक की पत्रकारीय साख को दांव पर रखकर मैं ये कह रहा हूं कि मीटिंग में शामिल सभी सदस्यों ने मिनिट्स पर अपनी सहमति की मुहर नहीं लगायी है। कम से कम 28 जनवरी की रात 9.30 बजे तक की स्थिति तो यही है।)

सवाल 4 : एक्जिक्यूटिव कौंसिल विश्वविद्यालय से जुड़े फैसले करने वाली, सबसे बड़ी संस्था है। ऐसे में इसकी बैठक में शामिल सदस्यों द्वारा मीटिंग के ब्यौरे को मंजूर किए जाने से पहले क्या अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का आदेश विश्वविद्यालय जारी कर सकता है?

सवाल 5 : क्या ये विधि के विपरीत नहीं है? क्या ये एक्जिक्यूटिव कौंसिल को बाइपास करना नहीं है?

सवाल 6 : एक्जिक्यूटिव कौंसिल की बैठक में मौजूद सदस्यों द्वारा मिनिट्स को मंजूर किए बगैर विश्वविद्यालय प्रशासन ने क्या अनिल चमड़िया को निकालने का फैसला कर दिया और उसे तत्काल प्रभाव से लागू भी कर दिया?

सवाल 7: क्या विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले में किसी तरह की हड़बड़ी में है? अगर हां तो इसकी वजह क्या है?

सवाल 8 : प्रोफेसर चमड़िया की नियुक्ति का मामला जब सेलेक्शन कमेटी के सामने आया था, तो क्या विश्वविद्यालय प्रशासन को उन मानकों की जानकारी नहीं थी, जिसके आधार पर प्रोफेसर की नियुक्ति होती है? ऐसी हालत में एक्जिक्यूटिव कौंसिल के सामने क्या वाइस चांसलर ने अपनी गलती स्वीकार की?

सवाल 9 : क्या ऐसी ही और गलतियां भी की गयी हैं? क्या ऐसे सभी मामलों में वही फैसला किया गया जो अनिल चमड़िया के मामले में किया गया?

सवाल 10 : क्या विश्वविद्यालय में उन मानदंडों के आधार पर कोई नियुक्ति नहीं हुई है, जिस आधार पर अनिल चमड़िया की नियुक्ति हुई है?

नीति और नैतिकता से इतर ये कुछ ऐसे सवाल है, जिनका जवाब दिया जाना चाहिए, ताकि अकादमिक जगत में शुचिता कायम हो और अकादमिक स्वायत्तता कोरा शब्द बन कर न रह जाए।

भारतीय गणतंत्र और युवा

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/28/2010 07:17:00 PM

कोपेनहेगन में पर्यावरण पर चिंता, देश में मंहगाई पर चिंता , थ्री इडियट के मनोरंजन और ज्योति बसु के निधन से अचानक हम देश के 61वें गणतंत्र दिवस पर चले आये हैं। यदि नजर दौड़ायें, तो साफ हो जाता है कि खनिज संपदा से भरपूर इस देश में गणतंत्र के सभी मायने बेकार साबित हो रहे हैं। आजादी तो मिली , लेकिन यहां के लोग आज भी मूलभूत समस्याओं से दो-चार हो रहे हैं ,देश के गर्व, अपनी पहचान, उमंग, उत्साह के दिवस पर मात्र एक दिन का विभिन्न शासकीय स्तर पर कार्यक्रम, मीडिया में देशभक्ति पर हल्का-फुल्का शोरगुल। क्या करें आज के युवा पीढ़ी को इसके मायने और महत्व ठीक से नहीं पता। 15अगस्त को हम आजाद हुए और 26जनवरी को भारतीय संविधान में टांग दिए गए। कुछ लोगों के लिए यह स्वतंत्रता, स्वाधीनता और स्वशासन को आगे बढ़ाता एकदिवसीय शब्द सा हो गया है। बहरहाल असल मायने जो भी हो आज के हालात में उसके मायने और उपयोगिता बदलती जा रही है। असल में आज का युवा वर्ग ऐसे कार्यक्रम में आना नहीं चाहता । उसके लिए यह एक छुट्टी का दिन भर रह गया  है। गणतंत्र दिवस की भावना से कितने प्रतिशत लोग जुड़े हैं। पूर्व संध्या पर वह राष्ट्रपति का भाषण भी नहीं सुनता। परेड को प्राइवेट चैनल दिखाना नहीं चाहते और मस्ती में डूबा युवावर्ग राष्ट्रीय चैनल का बटन कम दबाता है। आजादी के बाद से 2010 तक के सफर में युवा वर्ग की संवेदना इस तरह से कुंद हुई है कि वो देश के लिए अपनी वह भावना नहीं रख पाता है जो हमारे देश में महान् राष्ट्रवादियों के दिल में बसती थी , अगर विश्लेषण किया जाये तो उसके कई कारण है राजनीतिक ,आर्थिक और सामाजिक। ज्ञान का जिस तरह से व्यावसायीकरण हुआ है, स्कूल-कॉलेजों में गणतंत्र दिवस की रौनक गायब होने लगी है। आज देश का युवा पढ़ने या नौकरी करने के लिए बाहर जाने के लिए आकुल -व्याकुल है। पढ़ने के लिए या नौकरी करने के लिए जब मौका मिले तब। ऐसी नयी युवा पीढ़ी के लिए गणतंत्र दिवस के नए मायने तलाशने होंगॆ। इतिहास के बारे में हमें यह पढ़ाया जाता है कि अंग्रेज भी ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में व्यवसाय करने के लिए भारत आये थे। अर्थात आर्थिक व्यवस्था के प्रसारक द्वारा ही राजनीति गुलामी का बीजारोपण हुआ था। मगर हम फिर भी सचेत नहीं कि दूसरी आर्थिक शक्तियां हमें गुलाम बनाने की ओर अग्रसर हो रही हैं। अब अधिकांश राजनीतिक शक्तियां व्यावसायिक घरानों के हाथों नियंत्रित होती हैं। लगता है कि मानो देश को कुछ चंद व्यावसायिक घराने चला रहे हों। कई फैसले तो इनके हितों को देखकर किए जाते हैं। आज दैनिक जीवन की मूलभूत भौतिक चीजों पर नियंत्रण व्यावसायिक घराने के हाथों में है। क्या इन नये महाराजाओं के लिए गणतंत्र दिवस का कोई महत्व है ? शायद नहीं । उनका बस एक ही उद्वेश्य है मुनाफा कमाना। इन्होंने समाज की हर महत्वपूर्ण चीजों पर अपना कब्जा कर लिया है और अब साझेदारी भी करने लगे हैं। ऐसे माहौल मे क्या गणतंत्र दिवस के नये मायनों की तालाश नहीं होनी चाहिए ? गणतंत्र दिवस में पुरानी बातों का राग अलापना एक डयूटी-सी लगती है जिसमें 50-.60 साल पहले की यादें शामिल हैं।  हमें अब राष्ट्र व गणतंत्र के नये पैमाने, नयी मंजिलें, नयी सोच, नयी चीजें समझनी और विकसित करनी होगी। हर नये युग में बहुत दिनों तक पुराने को बनाये रखना संभव नहीं। यहां अच्छे और बुरे की बेवजह की बहस में पड़ने से कोई फायदा नहीं है क्योंकि इतिहास सदैव अपने अंदर सब कुछ समेटते हुए आगे बढ़ता हुआ चला जाता है, रुकता नहीं। कुछ वर्षों पूर्व तक कर्ज को गलत घोषित करने वाले समाज में जब लोन सर्वाधिक प्रचलित हो तो लोगों को देश व स्वतंत्रता की नयी रेखाएं भी तय कर लेनी चाहिए।

किसे इडियट बना रहे हैं आमिर खान!

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/21/2010 05:45:00 PM

 पुण्य प्रसून वाजपेयी



हैलो, जी आमिर खान आपको इन्वाइट कर रहे हैं। इंटरव्यू देने के लिए। आप तो जानते हैं कि आमिर खान देश भ्रमण कर रहे हैं। जी.... '3 इडियट्स' को लेकर। हाँ, रविवार को वह चेन्नई में होंगे....तो आपको चेन्नई आना होगा। आप बीस दिसंबर यानी रविवार को चेन्नई पहुँच जाइए। वहीं आमिर खान से इंटरव्यू भी हो जाएगा। आमिर रविवार को तीन बजे तक चेन्नई पहुँचेंगे तो आपका इंटरव्यू चार बजे होगा। आप उससे पहले पहुँच जाएँ। और हाँ... आमिर




खान चाहते हैं कि इंटरव्यू के बाद आप तुरंत दिल्ली ना लौटें बल्कि रात में साथ डिनर लें और अगले दिन सुबह लौटें। तो आप कब पहुँचेंगे। अरे अभी आपने जानकारी दी... हम आपको कल बताते हैं, क्या हो सकता है। नहीं-नहीं आपको आना जरूर है, हम केवल पाँच जर्नलिस्ट्स को ही इन्वाइट कर रहे हैं और आमिर खासतौर से चाहते हैं कि आप चेन्नई जरूर आएँ। ठीक है कल बात करेंगे।.....तभी बताएँगे।


फोन पर बात खत्म हुई और दिमाग में '3 इडियट्स' को लेकर आमिर खान के देश भ्रमण से जुड़े न्यूज चैनलों पर रेंगने वाली तस्वीरें घुमड़ने लगीं। आमिर, जिसकी अपनी एक इमेज है। ऐसी इमेज जो बॉलीवुड में दूसरे नामी कलाकारों से उन्हें अलग करती है... जो सामाजिक सरोकार से भी जुड़ी है। मेधा पाटकर के आंदोलन को नैतिक साहस देने वाले आमिर खान बिना कोई मुखौटा लगाये पहुँचे थे। अच्छा लगा था। लेकिन जेहन में बड़ा सवाल यही था कि बनारस की गलियों में अपनी माँ के घर को ढूँढ़ते आमिर खान को चेहरा बदलने की जरूरत क्यों पड़ी। मुँह में पान। गंदे दाँत। शर्ट और हाफ स्वेटर......कांख में बाबू टाइप बैग को दबाये आमिर कुछ इस तरह आम लोगों के बीच घूम रहे थे, जैसे वह बनारसी हो गये या फिर बनारस की पहचान यही है। जबकि मध्य प्रदेश में चंदेरी के बुनकरों की बदहाली में उन्होंने करीना कपूर का तमगा जड़ बुनकरों की हालत में सुधार लाने के लिए लोकप्रिय डिजाइनर सव्यसाची मुखर्जी से भी संपर्क किया। कहा गया है कि आमिर बुनकरों के संकटों को समझ रहे हैं। वहीं कोलकाता में सौरभ गांगुली के घर के दरवाजे के बाहर किसी फितरती.....अफलातून......की तरह नजर आए आमिर। पंजाब में एक विवाह समारोह में दुल्हे के माँ-बाप के साथ एक ही थाली में टुकड़ों को बाँटते हुए हर्षोल्लास के साथ खुशी बाँटते नजर आये। बनारस के रिक्शे वाले की समझ हो या चंदेरी के बुनकर या फिर पंजाब के बरातियों की समझ.....सब यह मान रहे थे कि आमिर उनके बीच उनके हो गये। फिर आमिर को चेहरा बदलने की जरूरत क्यों पड़ी। क्या आमिर का नजरिया वर्ग-प्रांत के मुताबिक लोगों के बीच बदल जाता है। या फिर आमिर पहले मुखौटे से इस बात को अवगत कराते हैं कि मैं आपके बीच का सामान्य व्यक्ति हूं जो आप ही के प्रांत का है। लेकिन उसके बाद अपनी असल इमेज दिखाकर वह अचानक विशिष्ट हो जाते हैं। जैसे झटके में उनके रंग में रंगा व्यक्ति आमिर खान निकला। अगर आखिर में बताना ही है कि मैं आमिर खान हूँ तो फिर मुखौटा ओढ़ने की जरूरत क्यों।


कह सकते हैं यह '3 इडियट्स' के प्रचार का हिस्सा है और इसे इतने गंभीर रूप से नहीं देखना चाहिए। लेकिन यहीं से एक दूसरा सवाल भी पैदा होता है कि जो दबे-कुचले लोग हैं। जो व्यवस्था की नीतियों तले अपने हुनर को भी खो रहे हैं। जिनके सामने दो जून की रोटी का संकट पैदा हो चुका है। जिनके लिए सरकार के पास कोई नीति नहीं है और राजनीति में वोट बैंक के प्यादे बनकर यही लोकतंत्र के नारे को जिलाये हुए हैं तो क्या वाकई आमिर खान की पहल उनकी स्थिति बदल सकती है। या फिर आमिर की इमेज में इससे सामाजिक सरोकार के दो-चार तमगे और जुड़ जाएँगे। यह सारे सवाल जेहन में रेंग ही रहे थे कि मुंबई का नंबर फिर मोबाइल पर चमका। और आमिर खान के इंटरव्यू का निमंत्रण दोहराते हुए इस बार कई सुविधाओं भरे जवाब जो सवाल का पुट ज्यादा लिए हुए थे.....दूसरी तरफ से गूंजे। आपके रहने की व्यवस्था चेन्नई से डेढ़-दो-घंटे की रनिंग बाद फिशरमैन्स क्लब में की गयी है। यह बेहद खूबसूरत जगह पर है। चेन्नई से महाबलीपुरम की तरफ। आपके कैमरापर्सन की भी ठहरने की व्यवस्था हम कर देंगे। आप उनका नाम हमें बता दें। जिससे उनकी भी व्यवस्था हो जाये। मैं सोचने लगा जब 'आज तक' शुरू हुआ था तो एसपी सिंह अक्सर कहा करते थे कि कहीं किसी भी कार्यक्रम को कवर करने जाना है, तो कंपनी के पैसे से जाना है। किसी की सुविधा नहीं लेनी है। और नेताओं का मेहमान तो बिलकुल नहीं बनना है। इतना ही नहीं जब 'आज तक' न्यूज चैनल के रूप में सामने आया तो भी मैंने उस दौर में इंडिया टुडे के मैनेजिंग एडिटर और 'आज तक' के मालिक अरुण पुरी को भी मीटिंग में अक्सर कहते सुना कि किसी दूसरे का मेहमान बनकर उससे प्रभावित होते हुए न्यूज कवर करने का कोई मतलब नहीं है। इससे विश्वसनीयता खत्म होती है। और बाद में न्यूज हेड उदय सिंह बने तो उन्होंने भी इस लकीर को ही पकड़ा कि न्यूज कवर करना है तो अपने बूते। कहीं डिगना नहीं है। कहीं झुकना नहीं है। और विश्वसनीयता बरकरार रखनी है।

लेकिन फोन पर मुझे आमिर खान के साथ डिनर का न्यौता देकर लुभाया भी जा रहा था। लेकिन आप हमें क्यों बुला रहे है... हम कैसे '3 इडियट्स' का प्रचार कर सकते हैं। आपको प्रचार करने को कहाँ कह रहे हैं। आप जो चाहे सो आमिर खान से पूछ सकते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि आमिर जिस तर्ज पर बनारस से चेन्नई तक को नाप रहे हैं, उससे वहाँ के दर्द को भी '3 इडियट्स' में लपेट रहे हैं। सबकुछ प्रचार का हिस्सा है तो हम कैसे इसमें शरीक हो सकते हैं। यह आप कैसे कह सकते हैं... आमिर खान चंदेरी नहीं जाते तो कौन जानता वहां के बुनकरों की बदहाली। मेरा दिमाग ठनका... यानी आमिर चंदेरी गये तो ही देश जान रहा है चंदेरी के बुनकरों की बदहाली। क्या आप जानते हैं कि देश के पैंतीस लाख से ज्यादा बुनकर आर्थिक सुधार तले मजदूर बन गये। जो देश के अलग-अलग शहरों में अब निर्माण मजदूरी कर रहे हैं। सही कह रहे हैं आप चंदेरी का मामला सामने आया तो बाकी संकट भी आमिर उभारेंगे। मुझे भी लगा फिल्मों का नायक यूँ ही नहीं होता... सिल्वर स्क्रीन की आँखों से अगर देश को देखा जाये और प्रधानमंत्री किसी नायक सरीखा हो जाये या फिर नायक ही सर्वेसर्वा हो जाये तो शायद देश में कोई संकट ही ना रहे। मुझे याद आया जब बलराज साहनी, 'दो बीघा जमीन' फिल्म की शूटिंग कर रहे थे, तो उनसे पूछा गया कि किसानों की त्रासदी की तरफ क्या सरकार इस फिल्म के बाद ध्यान देगी? तो बलराज साहनी का जवाब था कि फिल्म उसी व्यवस्था के लिए गुदगुदी का काम करती है जो इस तरह की त्रासदी को पैदा करती है। इसलिए फिल्मों को समाधन ना मानें। यह महज मनोरंजन है। और मुझे चरित्र के दर्द को उभारने पर सुकून मिलता है। क्योंकि हम जिन सुविधाओं में रहते हैं उसके तले किसी दर्द से कराहते चरित्र को उसी दर्द के साथ जी लेना अदाकारी के साथ मानवीयता भी है।


बलराज साहनी से इतर अगर उत्पल दत्त की मानें तो मुंबई में वैसी ही फिल्म बनती है जैसे किसी जूते की फैक्ट्री में जूते। फिल्मकार और उसकी मार्केटिंग से जुड़े लोग कहते रहते हैं लोग ऐसी ही फिल्म चाहते हैं, जबकि हकीकत में लोगों को सांस्कृतिक पराभव के लिए परिचालित किया जाता है। कह सकते हैं कभी जो जगह साम्राज्यवादियों ने छोड़ी, सत्ताधारियों ने उस जगह को भरने का ही काम किया और फिल्मों के जरिए भी मुनाफे के उस खाली पडे़ तंत्र का सहारा फिल्मकारों ने ले लिया जिसे राज्य ने खाली छोड़ दिया। यानी सरोकार की परिभाषा झटके में बदल दी गयी। और धुआंधार प्रचारतंत्र ने जनता को सांस्कृतिक दिवालियेपन तक पहुँचा दिया। आमिर खान के तौर तरीके इस मायने में अलग हो सकते हैं कि वह फिल्म के प्रचार में ही सरोकार को मुनाफे में बदलना चाहते हैं। असल में तकनीक ने फिल्मों को सहारा सिर्फ फटाफट धंधा कर खुद को उद्योग में बदलने भर का नहीं दिया है, बल्कि न्यूज चैनलों से लेकर रेडियो जॉकी और इंटरनेट का एक ऐसा साम्राज्य भी दे दिया है जिसके आसरे धंधा चोखा भी हो जाए और मुनाफे का बंदरबांट कर हर कोई एक दूसरे की उपयोगिता से लेकर उसे जायज ठहराने में भी लगा रहे। यदि आमिर खान के इंटरव्यू के आमंत्रण से आगे का रास्ता है। यह रास्ता आपको रामगोपाल वर्मा की फिल्म 'रण' में नजर आ सकता है। फिल्म का नायक अमिताभ बच्चन न्यूज चैनलों के धंधे को समझता-समझाता दोनों है, लेकिन इस दौड़ में खुद भी धंधा कर निकल जाता है। मुश्किल यह है कि आमिर खान जिन सवालों को उठाते हुए अपनी फिल्म '3 इडियट्स' का प्रचार करते हैं, रामगोपाल वर्मा उन्हीं सवालों को उठाते हुए अमिताभ बच्चन के जरिए फिल्म ही बनाकर धंधा कर जाते हैं।


हर कोई कह सकता है कि खुले बाजार की थ्योरी तो यही कहती है कि जो चाहे अपना माल बेच लें... तरीका कोई भी अपना लें। लेकिन इसे महीन तरीके से समझने के लिए फिल्मों के बदलते रंग को समझना होगा जो वाकई सत्ताधारियों का अक्स है। नाच-गानों और फंतासियों के बीच नायक जब विलेन की जमकर मरम्मत करता है तो यह सिर्फ अच्छाई पर बुराई या पोयटिक जस्टिस भर का मसला नहीं होता बल्कि जीवन के लिए रोजमर्रा की समस्या पर पर्दा डालने तथा जनता को उसी परीलोक में झोंक देने की चाल भी होती है। जिसमें सारे अन्याय का इलाज है हीरो का मुक्का। जिसके लगते ही खलनायक का हृदय परिवर्तन होता है और वह गरीब-गुरबा की मदद करने लगता है। यही सवाल उठता है कि न्यूज चैनलों के धंधे को भी फिल्म 'रण' बताती है और '3 इडियट' का आमिर का प्रचार भी बुनकरो के सवाल को उठाता है। जबकि बुनकर का हुनर नायिका की गोरी चमड़ी पर भी ठहर नहीं पाता। समाधान क्या है यह रास्ता तुरंत बताना मुश्किल जरूर है क्योंकि मेरे दिमाग में यह भी चल रहा था कि आमिर का इंटरव्यू नकार कर मैं कौन सा तीर मार रहा हूँ जबकि मैं भी तो न्यूज चैनल का हिस्सा हूँ। जो माध्यम धंधे में लिप्त है। ऐसे में यह सवाल भी उठेंगे कि यह भी प्रचार का ही हिस्सा है... जाहिर है यह सही है। लेकिन मामला माध्यम को चुनना भी है। इसे कहने के लिए टीवी न्यूज चैनल पर कोई कार्यक्रम नहीं बनाया जा रहा है बल्कि लघु पत्रिका के जरिए अपनी बात को रखना है। शायद रास्ता यही है कि जनता को जीतकर वापस लाना जरूरी है। व्यवसायिक रूप से भ्रष्ट उन लोगों के विरुद्ध मानव मस्तिष्क के लिए अनवरत संघर्ष जरूरी है जो पूरे मीडिया को नियंत्रित करते हैं और अखबारों, रेडियो तथा टीवी के माध्यम से लगातार झूठ और धोखे की बमबारी करते रहते हैं। इन सबके ऊपर है सरकार, जिसके सदस्य खुलेआम मध्ययुगीन अंधविश्वासों का प्रसार करते हैं जिसे लोकतंत्र का नाम भी दिया जाता है। इसे तोड़ने में संघर्ष तीखा और लगातार का है। जिसके लिए जरूरी है फिल्मों को फैशनेबुल समझ कर देखने वाले दिवालिया मध्यम वर्गीय बुद्धिजीवियों के वोटरों में निवृत्त होने के बजाए वास्तविक जनता के पास जाया जाये। लेकिन तरीका '3 इडियट्स' या 'रण' का ना हो। जाहिर है इन सवालों के बीच मैं आमिर खान के इंटरव्यू के आमंत्रण पर क्या कहता...





दरअसल, आमिर के प्रचार की जिस रणनीति को अंगे्रजी के बिजनेस अखबार बेहतरीन मार्केटिंग करार दे रहे हैं, वो सीधे-सीधे लोगों की भावनाओं के साथ खेलना है। फिल्म के प्रचार के लिए लोगों की भावनाओं की संवेदनशीलता को धंधे में बदलकर मुनाफा कमाते हुए अलग राह पकड़ लेना नया शगल हो गया है। लेकिन, यहीं एक सवाल फिर जेहन में आता है कि यहाँ एक लकीर से ऊपर पहुँचते ही सब एक समान कैसे हो जाते हैं। चाहे वह फिल्म का नायक हो या किसी अखबार या न्यूज चैनल का संपादक या फिर प्रचार में आमिर के साथ खड़े सचिन तेंदुलकर। सोचा आमिर खान चेन्नई में क्या इंटरव्यू देते हैं और '3 इडियट्स' का कैसे प्रचार करते हैं, यह दूसरे न्यूज चैनलों को देखकर समझ ही लेंगे।

साहित्य, समाज और नागरिक चेतना के चंद सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/20/2010 02:54:00 PM


एक लोकतांत्रिक समाज का नागरिक होने के नाते हम नागरिक चेतना, सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों और लेखकीय दायित्व के भव्य सवालों के समक्ष खुद को पाते हैं। इसमें नागरिक कहां खड़ा है? लेखन क्या है? नागरिक चेतना और लेखन के आपसी सम्बंध क्या हैं? हमारे अपने समाज में लोकतन्त्र, लेखन और समाज के क्या रिश्ते हैं? उन्हें कैसा होना चाहिए? इन जटिल सवालों के सन्दर्भ में लेखक-संपादक पंकज बिष्ट का यह महत्वपूर्ण लेख। यह इस माह आजकल में प्रकाशित हुआ है। इसे लेखक की अनुमति से हाशिया पर साभार प्रस्तुत किया जा रहा है।




नागरिक चेतना और साहित्य पर बात करने से पहले नागरिक चेतना को समझ लेना आवश्यक है। नागरिक शब्द को अगर रूढ़ अर्थ में लें तो वह व्यक्ति को किसी एक राजनीतिक इकाई यानी राष्ट्र से जोड़ता है और इस तरह व्यक्ति की सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों को उसी इकाई तक सीमित कर देता है। इस सीमा में भी नागरिक होने का अर्थ एक ऐसा व्यक्ति होना है जो अपनी चेतना में आधुनिक, सहिष्णु और उदार है। वह जिस भूगोल और समाज में रहता है वह मात्रा उसकी जाति और धर्म के लोगों का बना नहीं होता बल्कि अपनी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और यहां तक कि भौगोलिक सीमा में कई गुना ज्यादा व्यापक और विशाल होता है - देश विशेष की सीमाओं तक पहुंचा हुआ। इस अर्थ में कि वह उस देश की, जो कि एक भौगोलिक, राजनीतिक और आर्थिक इकाई है, सारी विविधता का प्रतिनिधित्व करता है।


कहा चाहे जो भी जाए, रचना और रचनाकार को लेकर मिथ चाहे जितने भी हों, सच यह है कि लेखन कोई आध्यात्मिक या मोक्ष की तलाश में की जानेवाली एकांतिक तपस्या नहीं है। वैसे तो तथाकथित आध्यात्मिक गतिविधियां भी सामाजिक स्थितियों से सीधा संबंध रखती हैं या कहिए उनका परिणाम हैं, इस पर भी कम से कम लेखन, फिर चाहे वह कितना भी व्यक्तिवादी क्यों न हो, अंततः एक सामाजिक प्राणि के रूप में व्यक्ति और उसके अपने समाज से संबंधों की तलाश होता है। लेखन की अक्सर सांसारिकता से जो असहमति नजर आती है वह कुल मिला कर एक बेहतर नयी दुनिया की तलाश ही होती है। वृहत्तर अर्थों में साहित्य, जो है और जो होना चाहिए, उसके बीच का पुल है। इसलिए अगर रचनाकार समाज को जानेगा ही नहीं तो फिर वह किस समाज से असहमति जाहिर करेगा और किस के सपने का निर्माण करेगा!


दूसरे शब्दों में कहें तो जितना सक्रिय पाठकीय संसार होगा उतना ही जागरूक और सचेत लेखक और उसका लेखन होगा। साहित्य और समाज का संबंध अन्योन्याश्रित है। न तो साहित्य समाज को समझे बगैर उसे कुछ सिखा सकता है, न ही कोई सीख दे सकता है। दूसरी ओर यह भी उतना ही सच है कि कोई भी समाज साहित्य विहीन न होता है और न ही हो सकता है। साहित्य यानी रचनात्मकता मानवीय प्रकृति का अभिन्न अंग रही है जो कल्पनाशीलता की सक्रियता के माध्यम से विकास की प्रेरक शक्ति (मोटिवेटिंग फोर्स) के रूप में सदा विद्यमान नजर आती है। साहित्य को काफी हद तक सारे ज्ञान का प्रारंभिक बिंदु कहा जा सकता है क्यों कि मनुष्य की उत्सुकता, बेचैनी, रचनात्मकता, कल्पना और आकांक्षा इतने विस्तृत रूप में साहित्य में ही अभिव्यक्ति पाती है। निश्चय ही आज विज्ञान ने कल्पना के लिए बहुत जगह नहीं छोड़ी है पर रचनात्मकता का महत्व इस पर भी खत्म नहीं हो सका है क्योंकि मानवीय जीवन की संश्लिष्टता और जटिलता को कोई भी विज्ञान कभी व्याकख्यायित या सूत्रबद्ध शायद ही कर पाये।


साहित्य का अपने शाश्वत मूल्यों के कारण भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं को लांघ जाना एक सामान्य बात है, इस पर भी हर बड़ा रचनाकार कुल मिला कर समाज विशेष की ही देन होता है और उसी समाज विशेष की भाषा, संस्कृति, परंपराओं और इतिहास के दायरे में उसकी रचनात्मकता अभिव्यक्ति पाती है। इसलिए जिस साहित्य का अपने समाज से जितना आदान-प्रदान (इंटरेक्शन) हो रहा होगा वह साहित्य उतना ही जीवंत, संवेदनशील और प्रभावशाली होगा।


हम मौखिक साहित्य से कई गुना दूर आ चुके हैं। एक मायने में मौखिक परंपरा को श्रव्य और दृश्य के इलैक्ट्रॉनिक माध्यमों ने पूरी तरह से आत्मसात कर लिया है। इसलिए इनके विकास ने एक नई ही दिशा ले ली है। आज कुल मिला कर साहित्य की जो सबसे जीवंत सक्रियता नजर आती है वह लिखित या मुद्रित शब्द के रूप में ही है। इसलिए किसी भी समाज में साहित्य की स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि वह विकास की किस स्थिति में है। इसे जानना इसलिए भी जरूरी है कि साहित्य की लोकप्रियता या कहिए असर का संबंध उस समाज में शिक्षा, संस्कृति और आर्थिक विकास की दशा से भी है। अगर समाज में साहित्य के पठन-पाठन की परंपरा ही नहीं है तो उसका असर, फिर चाहे वह चेतना में हो या भौतिक स्तर पर, कितना होगा समझा जा सकता है।


दुर्भाग्य से हिंदी समाज की स्थिति इस संदर्भ में कोई सुखद नहीं है। इसके कारण कई हो सकते हैं पर सबसे बड़ा कारण है शिक्षा की स्थिति। आज भी हिंदी समाज भारत के सबसे कम शिक्षित समाजों में है जहां साक्षरता आधी से ज्यादा शायद ही हो। साहित्य की सबसे बड़ी शर्त शिक्षा है और शिक्षा का न होना ऐसी बड़ी अड़चन है जो समाज को साहित्य से दूर रखती है। साहित्य अपने माध्यम के तौर पर अभी भी अपने परंपरागत रूप यानी मुद्रित सामग्री के तौर पर ही सबसे ज्यादा स्वीकार्य है। बल्कि कहना चाहिए अपने लिखित रूप में ही प्रचलन में है। गोकि साहित्य के रूपांतरण के कुछ अन्य माध्यमों, जैसे कि कथा-फिल्में और टीवी धारावाहिकों, के दबदबे से इनकार नहीं किया जा सकता पर साहित्य के रूपांतरण का यह सिलसिला कोई बहुत नया नहीं है और कुल मिलाकर अपने मूल रूप में नाटकों के निकट है जिसमें प्रौद्योगिकी की भूमिका अहम हो गई है। नाटक साहित्य की एक विधा के तौर पर सदा से स्वीकार्य रहा है। पर ये माध्यम कविता की बात हो छोड़िये कहानियों और आगे चल कर उपन्यासों तक का पर्याय नहीं बन पाया है। असल में हर माध्यम अपनी सीमा स्वयं होता है और जो माध्यम जितना स्थूल होगा उस माध्यम की सीमाएं भी उतनी ही स्पष्ट होंगी। निश्चय ही चाक्षुष माध्यमों ने मुद्रित शब्द के वर्चस्व को चुनौती ही नहीं दी है बल्कि उसके लिए 'स्पेस' का संकट भी खड़ा किया है पर यह साहित्य के विकल्प के तौर पर नहीं हो सका है बल्कि उसके घटिया स्थानापन्न, मनोरंजन के सतही साधन, के तौर पर ही नजर आ रहा है। कुल मिला कर शब्द की विराट और चमत्कारिक/ मायावी शक्ति अतुलनीय है।


हां, यह जरूर है कि साहित्य के अब तक के सबसे बड़े माध्यम किताब के विकल्पों की तलाश लगातार जारी है। इन प्रयत्नों को ऑडियो तथा ई-बुक के रूप में देखा जा सकता है। ऑडियो-बुक (सुनी जा सकनेवाली किताब) तो साहित्य के मूल चरित्र से मेल न खा सकने के कारण (साहित्य और वह स्वरों के माध्यम से?) स्वयं ही असफल साबित हो चुकी है। पर ई-बुक, जो कि मूलतः साहित्य के परंपरागत माध्यम शब्द का ही प्रौद्योगिकीय सशक्तीकरण है, की सफलता की संभावना से दुनिया भर का पुस्तक व्यवसाय सचेत जरूर हो गया है। अगर ई-बुक सफल होगी या पुस्तक के विकल्प के रूप में कोई और उपकरण सफल होगा तो मात्रा इसलिए कि वह शब्द के मूल रूप से छेड़-छाड़ न कर उसके संप्रेषण और वितरण को पुष्ट कर उसे ज्यादा उपयोगी बनाने की कोशिश करेगा। इंटरनेट और इलैक्ट्रॉनिक की दुनिया के अन्य विकासों ने असल में पुस्तक के रूप में बदलाव को लगभग अनिवार्य कर दिया है और ई-बुक इसी का परिणाम है जिसने साहित्य के सबसे सशक्त माध्यम शब्द की उपस्थिति में सुधार कर उसे और सहज व सर्वव्यापी बना दिया है। ई-बुक शब्द का नहीं बल्कि शब्द के माध्यम - संयोजन, संग्रहण और वितरण - का विकल्प और विकास है। मात्र एक किताब का विकल्प नहीं बल्कि एक छोटा-मोटा पुस्तकालय है और इंटरनेट की सुविधा के कारण इसका असीमित विस्तार किया जा सकता है। मानव की अभिव्यक्ति की तलाश का सबसे पुरातन माध्यम होने के बावजूद शब्द अपनी प्रतीकात्मकता में कल्पना की जिन संभावनाओं से भरा होता है, उसका कोई विकल्प अब तक नहीं खोजा जा सकता है। जो भी हो यह इस बात का संकेत है कि शब्द की अनिवार्यता से साहित्य के लिए बच पाना शायद ही कभी संभव हो पायेगा।


पर दिक्कत यहां दूसरी है।


चाक्षुष माध्यम, जैसा कि कहा जा चुका है, कुल मिला कर आदमी के लिए मनोरंजन और आनंद का ज्यादा आसान और सतही माध्यम साबित होते हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि वे लोगों के पास समय नहीं छोड़ते। नतीजा यह है कि साहित्य चूंकि एकाग्रता, चेतना और कल्पना के स्तर पर कहीं अधिक सक्रियता की मांग करता है, इसलिए अच्छे साहित्य के रसास्वादन के लिए किसी व्यक्ति और समाज को परिष्करण की एक सतत प्रक्रिया से गुजरने की अनिवार्यता होती है। इसे मोटे तौर पर आप रुचि परिष्करण की प्रक्रिया मान सकते हैं, जो सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक विकास के घटकों से तो निर्धारित होती ही है, निजी स्तर पर भी पहल और सक्रियता की मांग करती है। तुलनात्मक रूप से कठिन, यह प्रक्रिया आम आदमी को साहित्य की अपेक्षा टीवी व फिल्म की ओर ज्यादा आसानी से खींच ले जाती है। जहां तक हिंदी समाज का सवाल है उसमें साहित्य का प्रभाव कभी भी बहुत व्यापक नहीं रहा है। जब, पिछली सदी के मध्य तक, चाक्षुष माध्यम इतने प्रबल नहीं हुए थे, साहित्य का महत्व तो था पर प्रभाव तब भी सीमित ही था। आज भी इस समाज में साक्षर होने की प्रक्रिया ही चल रही है। पर दुर्भाग्य से अब उसके पास साहित्य रसिक समाज में बदलने के लिए आवश्यक समय नहीं रहा है। इसका परिणाम यह है कि उसमें साहित्य के प्रति रुचि और साहित्य का उस पर प्रभाव घटा ही है। एक अशिक्षित या अर्धशिक्षित समाज में चाक्षुष माध्यमों की भूमिका कम से कम साहित्य के लिए कुल मिला कर घातक ही साबित होती है।


यह वह पृष्ठभूमि है जिसे समझे बगैर हम अपने समाज पर यानी 'नागरिक' पर साहित्य के असर का मूल्यांकन नहीं कर सकते।


कुल मिला कर साहित्य की भूमिका एक बेहतर विवेकवान और नैतिक रूप से सशक्त व्यक्ति बनाने की होती है। दूसरी ओर नागरिक होने का अर्थ ही एक ऐसा व्यक्ति होना है जो अपनी चेतना में आधुनिक, सहिष्णु और उदार है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, वह जिस समाज में रहता है वह मात्रा उसकी जाति और धर्म के लोगों का बना नहीं होता बल्कि अपनी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और यहां तक कि भौगोलिक सीमा में कई गुना ज्यादा व्यापक और विशाल होता है। इसीलिए किसी देश के निवासी को उस देश का नागरिक कहा जाता है।



असल में आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास मुश्किल से सौ साल पुराना है। पिछली सदी का लगभग आधा समय हिंदी साहित्य ने औपनिवेशिक दौर का सामना किया और तब वह अपनी सोच और चेतना में पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का प्रतिनिधित्व करता था। प्रेमचंद, प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, वृंदावनलाल वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, बालकृष्ण शर्मा नवीन और दिनकर ऐसे प्रमुख रचनाकार हैं जिनकी रचनाओं में औपनिवेशवाद का तीव्र और सीधा विरोध देखा जा सकता है। दूसरी ओर वे लेखक जिनकी रचनाओं में ऐसा सीधा विरोध नहीं है जैसे कि जैनेंद्र या फिर छायावादी कवि पंत, महादेवी और निराला इस पर भी इन की रचनाएं मूलतः मानवीय गरिमा और उसकी मुक्ति की चेतना का ही प्रसार करती हैं। अपने समाज के प्रति प्रेम, संस्कृति व इतिहास के प्रति सम्मान, समानता और शोषण का विरोध इन रचनाओं का मुखय संदेश है। जरूरी नहीं है कि साहित्य को सीधे-सीधे ही अपनी बात कहनी चाहिए। यह वैसे भी सदा से विवाद का विषय रहा है कि क्या साहित्य का काम जनता को वृहत्तर स्तर (मास लेवल) पर उत्प्रेरित (मोटिवेट) करना ही है जो उसे तात्कालिक स्थिति पर तीव्र प्रतिक्रिया करने को उकसाती है या उसमें गहरे विवेक और चेतना को जगाना है जो हर स्थिति में सही-गलत का फैसला करने में सहायक हो। संभवतः सांस्कृतिक स्तर पर यह स्थिति ज्यादा ऊंची कही जा सकती है। दूसरी ओर पत्रकारिता ने अपने दो सौ साल के इतिहास में आधुनिक जीवन में एक ऐसे माध्यम के तौर पर जगह बनाई है जो जन चेतना और जनआंदोलन के लिए ज्यादा प्रभावशाली साबित हुआ है। इसलिए कम से कम रचनात्मक साहित्य से अब सीधे-सीधे जन चेतना और मास मोबिलाइजेशन की अपेक्षा का न तो औचित्य रहा है, न ही जरूरत। आज इस काम को मास मीडिया - फिल्म, रेडियो, टेलीविजन आदि - ज्यादा बेहतर तरीके से अंजाम देने में सक्षम है।


साहित्य का सरोकार मूलतः आधारभूत और शाश्वत मानवीय मूल्यों, विवेक व चेतना से होता है। टॉलस्टाय का उपन्यास युद्ध और शांति युद्ध के विरोध का संदेश देता है तो अपराध और दंड मानवीय मन की जटिलता को अपनी पूरी संश्लिष्टता में समक्षने में मददगार साबित होता है। यही मूल्यवत्ता देश और काल की सीमा लांघ कर पूरी मानवता के लिए संदेश बन जाती है।


साहित्य और कलाओं की देश-काल को लांघने की यह शक्ति अक्सर उसे सामाजिक और राजनीतिक सत्ता केंद्रों के आमने-सामने खड़ा कर देती है। जैसे कि यामा द हेल पिट में चित्रित वेश्याओं के नारकीय जीवन का चित्राण तत्कालीन रूसी शासकों और समाज की भर्त्सना भी है। इसी तरह चार्ल्स डिकेंस के उपन्यासों मे चित्रित तत्कालीन ब्रिटिश समाज कोई बहुत 'सकारात्मक' रूप में हमारे सामने नहीं आता। अंकल टाम्स कैबिन में अमेरिका के घिनौने नस्लीय यथार्थ से आप रूबरू होते हैं। साफ है कि कोई भी शासक इस तरह की आलोचना सुनने को आसानी से तैयार नहीं होता। पर इससे कहीं ऊपर ये रचनाएं मूलतः इस बात की ओर इशारा करती हैं कि आदमी और आदमी में कोई अंतर नहीं है। आदमी के द्वारा आदमी का शोषण और दमन अनैतिक है। सामाजिक असमानता अक्षम्य है। हम जानते हैं कि इस तरह के यथार्थ और सत्य के सामने आने से निहित स्वार्थी और सत्ताधारी वर्ग के हितों को नुकसान पहुंचता है और इस तरह साहित्य और समाज का टकराव सामने आता है।


समकालीन रचनाओं को लें तो दक्षिण अफ्रीकी नोबेल पुरस्कार से सम्मानित श्वेत लेखिका नादिम गार्डिमर की रचनाओं में वहां के समाज में फैली या कहना चाहिए वहां के तत्कालीन गोरे (योरोपीय) शासकों में फैली रंगभेद की नीतियों और अश्वेतों के दमन का जो चित्रा उभरता है वह सत्ताधारियों के लिए बैचनी का कारण बनता है। केन्या के कवि-लेखक केन सारोवीवा जिन्हें अपने देश के पर्यावरण और देशवासियों की आजीविका की रक्षा करने के पक्ष में खड़े हो जाने पर फांसी दे दी गई थी या फिर घाना के न्युगूगी वांग थो का सत्ता का विरोध करने के लिए निष्कासन और जेल तथा इंडोनेशियाई लेखक प्रमोदय अनंत तोर का दो दशक तक अपने ही शासक वर्गों द्वारा जेल में डाले रखना साहित्य के सरोकारों को बतलाता है। इन सब के साहित्य में मूलतः वही घटक महत्वपूर्ण हैं जिनके लिए युद्ध और शांति या फॉर हूम द बैल टॉल्स, डेविड कॉपर फील्ड, नाना, अन्ना केरेनिना, प्लेग, क्राइम एंड पनिशमेंट, गोदान, गोरा, झूठा सच, मैला आंचल, हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड या और भी कोई रचना जानी जाती है। पर यह घटक कोई इतना समकालीन भी नहीं है। युद्ध और हिंसा आदिकालीन और सर्वव्यापी चिंताएं हैं। महाभारत और इलियड कमोबेश इसी एक चिंता के सरोकार की रचनाएं हैं।


समकालीनता साहित्य में किस तरह से अभिव्यक्त होती है इसे आजादी के बाद के हिंदी साहित्य से आसानी से समझा जा सकता है। इस दौर के रचनाकार की चिंताएं दूसरे रूप में अभिव्यक्त होती हैं। ये रचनाएं साहित्य की अपनी प्रतिबद्धताओं और सत्ताधारियों के अपने सरोकारों के बीच के टकराव को नये परिप्रेक्ष्य में अभिव्यक्ति देती हैं। इस मामले में यशपाल का उपन्यास झूठा सच विभाजन की विभीषिका को ही नहीं दर्शाता बल्कि उसकी अतार्किकता को भी रेखांकित करता है। रेणु का मैला आंचल आजादी के बाद भी स्थितियों में परिवर्तन न आने और ग्रामीण समाज की बेचैनी व बढ़ते राजनीतिक भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास राग दरबारी तो आजादी के बाद ग्रामीण समाज के विघटन, भ्रष्टाचार और पतन का दस्तावेज है। राग दरबारी ऐसा पहला उपन्यास है जो न्यायपालिका, शिक्षा की संस्थाओं और नौकरशाही में आ चुके भयावह पतन को पहली बार इतने बड़े पैमाने पर चित्रित करता है। सातवें और आठवें दशक की, और काफी हद तक आज की भी, हिंदी कविता सीधे-सीधे सत्ता से असहमति की कविता है। इसलिए जरूरी नहीं कि नागरिक चेतना पैदा करनेवाला साहित्य किसी सत्ता से, किसी समाज की परंपराओं और मान्यताओं से, फिर चाहे वे तात्कालिक हों या परंपरागत, सहमत हो ही।


साहित्य की राजनीतिक-सामाजिक संस्थानों से असहमति और टकराहट मूलतः एक बेहतर समाज और व्यवस्था की तलाश की ही प्रक्रिया है और उसका जाने-अनजाने सरोकार वृहत्तर मानवीय समाज है। जबकि सत्ता की प्रवृत्ति अक्सर यथास्थिति को बनाए रखना है जिससे कि उसे ज्यादा चुनौतियों का सामना न करना पड़े।


पर सत्ताओं को भी सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं किया जा सकता। असल में राजनीतिक सत्ताओं की जड़ें सामाजिक सत्ताओं में होती हैं और वहीं से वे ऊर्जा पाती हैं। ये सत्ताएं कई तरह से व्यक्ति और समाज के आगे बढ़ने में रुकावटें पैदा करती हैं। कहीं वे नस्लवाद के रूप में नजर आती हैं तो कहीं धार्मिक भेदभाव और घृणा के रूप में और कहीं जातिवादी या लैंगिक दमन के रूप में।


नस्लवाद का विरोध अगर टॉनी मोरिसन जैसे लेखकों ने किया है तो भारत में जातिवाद का विरोध पूरा एक आंदोलन लिए हुए है। धर्म के नाम पर जो टकराव हमें फिलस्तीनियों और यहूदियों में देखने को मिलता है वह कम भयावह नहीं है। महमूद दरवेश जैसे लेखकों ने उत्पीड़ित फिलिस्तीनी होने को अपनी रचनाओं में बखूबी अभिव्यक्त किया है।



लैंगिक भेदभाव आज दुनिया में एक बड़ा सवाल है। स्त्री-पुरुष की समानता का सवाल हमारे जैसे परंपरावादी समाज में काफी जटिलताएं लिए है। स्त्रियों के सामाजिक-आर्थिक अधिकारों के अलावा जीवन साथी चुनने की आजादी, इस बंधन से मुक्त होने की आजादी, जैसे सवालों को समकालीन साहित्य में लगातार अभिव्यक्ति मिली है। महादेवी वर्मा, कृष्णा सोबती, चंद्रकिरण सोनरेक्सा, मन्नू भंडारी से लेकर प्रभा खेतान तक न जाने कितनी ऐसी लेखिकाएं हैं जिनकी रचनाएं इस संघर्ष की अभिव्यक्ति हैं। पर मजे की बात यह है कि स्त्रियों के इस हक की लड़ाई में वे अकेली नहीं हैं। हिंदी का जितना भी लेखन है यानी पुरुषों का लिखा, वह मूलतः स्त्रियों के पक्ष में ही है। चाहें तो आप गुलेरी से लेकर प्रेमचंद, जैनेन्द्र, अज्ञेय, रघुवीर सहाय और मंगलेश डबराल तक किसी की रचना को देखें वे स्त्री स्वतंत्रता के पक्ष में नजर आयेगी।


इस लेख में अधिकांशतः हिंदी साहित्य के संदर्भ में नागरिक चेतना के सवालों को परखने की कोशिश की गई है पर इस मामले में हिंदी कोई अपवाद नहीं है। जो बातें हिंदी के संदर्भ में लागू होती हैं वही बातें अन्य भारतीय या दुनिया की अन्य भाषाओं के संदर्भ में भी यथावत देखी जा सकती हैं। स्त्री मुक्त के संदर्भ में बंगला के रवीन्द्रनाथ ठाकुर और शरत चंद्र चट्टोपाध्याय को कौन भूल सकता है। इसी तरह स्त्रियों के अधिकारों पर वर्जीनिया वुल्फ, सिमोन द'बोउवा तस्लीमा नसरीन की रचनाओं का जो महत्व है उससे हम परिचित हैं ही।


इस तरह से आर्थिक-सामाजिक दमन के हर सवाल पर साहित्य लगातार यह चेतना फैलाने में मदद करता है कि बिना समानता व भय तथा उत्पीड़न मुक्त समाज के दुनिया बेहतर नहीं हो सकती।


प्रतिबद्धताओं और सरोकारों की सीमाओं की इस पृष्ठभूमि के चलते सत्ता या व्यवस्था के संस्थानों और साहित्य के बीच टकराव की संभावना सदा बनी रहती है। सत्ता द्वारा इस स्थिति को स्वीकार न करना, बल्कि दंडित करने की कोशिश करना आम बात कही जा सकती है, पर साहित्य का सरोकार सत्ताधारियों की आंख मूंद कर प्रशंसा न होता है और न ही होना चाहिए। जब भी और जहां भी ऐसा होता है साहित्य अपनी प्रासंगिकता और रचनाकार अपनी गरिमा खो देता है। वैसे जो सत्ताएं जितनी तानाशाह और बर्बर होंगी उनमें टकराव और असहिष्णुता की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी। पाकिस्तान में फैज अहमद फैज का उत्पीड़न, बंग्लादेश में तस्लीमा नसरीन का उत्पीड़न और तुर्की में पामुक का उत्पीड़न इसकी विभिन्नता के उदाहरण हैं। पर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में जो उदारता, समक्षदारी, सहिष्णुता और प्रौढ़ता होती है उसमें साहित्य की असहमति को सदा सकारात्मक तरीके से लिया जाता है। बल्कि अक्सर उसकी तीव्र और आवेशमय असहमति और आलोचना को भी सहा जाता है। जो भी हो, सत्ता तानाशाह हो या फिर लोकतांत्रिक, साहित्य की अपनी भूमिका रहती है और जो साहित्य उसे नहीं निभाता अपने महत्तर उत्तरदायित्व से बचता है। इसलिए नागरिक चेतना का अगर कोई अर्थ साहित्य के संदर्भ में है तो यही है कि वह लोगों में ऐसी चेतना पैदा करे जो समानता, सहिष्णुता और शांति की दिशा में समाज को आगे ले जाने में सहायक हो।


अंत में हो सकता है शासक वर्ग के लिए या फिर राजनीतिक संदर्भों में नागरिकता का सवाल एक निश्चित राजनीतिक इकाई, यानी राष्ट्र और उसकी तात्कालिक सत्ता के संदर्भ में हो पर जहां तक साहित्य का सवाल है उसके लिए नागरिकता एक वृहत्तर, सर्वदेशीय और सर्वकालिक संदर्भ है। साहित्य की रचनाओं में हम इन्हीं मूल्यों के माध्यम से नये संसार और नए आदमी को रचने की कोशिश करते हैं।

...क्योंकि वह अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं है

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/18/2010 05:18:00 AM



नोबेल पुरस्कार ने शांति को लेकर ओबामा की वचनबद्धता को इतना मजबूत किया है कि अफगानियों के लिए उन्हों ने और अधिक सैनिक भेज दिए हैं. क्या है ये नोबेल की राजनीति और उसका अर्थशास्त्र, बता रहे हैं फिदेल कास्त्रो. अनुवाद साथी अभिषेक श्रीवास्तव का है.

एक नस्ली समाज में अफ्रीकी मूल का अमेरिकी होने के बावजूद चुनाव जीतने पर यदि ओबामा को नोबेल पुरस्कार दिया गया है, तो इसके स्वाभाविक हकदार एवो भी हैं, भले ही वह उसी देश के हैं, लेकिन उन्होंने अपने वादे रखे हैं।
ऐसा पहली बार हुआ है कि दोनों ही देशों में वहां की जातियताओं के दो सदस्यों ने राष्ट्रपति पद का चुनाव जीता है।
मैं कई बार कह चुका हूं कि ओबामा एक स्मार्ट व्यक्ति हैं और वह उसी सामाजिक और राजनीतिक तंत्र में पले-बढ़े हैं जिसमें वह आस्था रखते हैं। उनकी सदिच्छा है कि पांच करोड़ अमरीकियों को स्वास्थ्य सेवाएं मिलें, आसन्न संकट से अर्थव्यवस्था को बाहर निकाला जा सके तथा नरसंहार, युद्ध और शोषण के चलते बरबाद हो चुकी अमेरिका की छवि को सुधारा जा सके। वह अपने देश की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को बदलने के बारे में न तो सोचते हैं और न ही उनकी ऐसी कोई इच्छा है। जाहिर है वह ऐसा कर भी नहीं सकते।
शांति के लिए नोबेल पुरस्कार तीन अमरिकी राष्ट्रपतियों को मिल चुका है। इसके अलावा एक पूर्व राष्ट्रपति और एक राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को भी मिला है। पहला, 1901 में चुने गए रूजवेल्ट को मिला था जो 1898 में क्यूबा में अमेरिकी हस्तक्षेप के चलते हमारी आजादी को बचाने के लिए आए थे। उनके पास घुड़सवार तो थे, लेकिन घोड़े नदारद थे।
दूसरे सज्जन रहे, थाॅमस वुडरो विल्सन, जिन्होंने  दुनिया का बंटवारा करने के लिए अमेरिका को युद्ध में झोंक दिया। जर्मनी पर वर्सेल्स की  संधि के माध्यम से बेहद प्रतिकूल स्थितियां थोपने वाले विल्सन ने फासीवाद के उभार और द्वितीय विश्व युद्ध की नींव रखी।
तीसरे सज्जन हैं, बराक ओबामा। 
कार्टर वह पूर्व राष्ट्रपति थे जिन्हें कुछ साल पहले नोबेल मिला। निश्चित तौर पर वह उन कुछेक अमेरिकी राष्ट्रपतियों में ही रहे जो अपने दुश्मन की हत्या का आदेश नहीं दे सकता, जैसा कि अन्य करते रहे हैं। उन्होंने पनामा नहर लौटा दी, हवाना में यूएस इंट्रेस्ट सेक्शन खोला, भारी बजटीय घाटे से देश को बचाया और रीगन की तरह सैन्य औद्योगिक प्रतिष्ठान के लाभ हेतु पूंजी से खिलवाड़ को रोका।
राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जिन्हें नोबेल मिला वह हैं, अल गोर। जलवायु परिवर्तन के परिणामों पर वह सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे अमेरिकी नेता हैं। राष्ट्रपति पद के वह उम्मीदवार थे, लेकिन जाॅर्ज बुश के फर्जीवाड़े का शिकार बन गए।
इस पुरस्कार के लिए चुनाव को लेकर लोगों का नजरिया काफी बंटा हुआ है। कई लोग इस अनपेक्षित परिणाम में अंतर्निहित जाहिर विरोधाभासों पर नैतिक दृष्टिकोण से सवाल उठा रहे हैं।
यदि किसी किए हुए काम के बदले यह पुरस्कार दिया जाता, तो शायद ये लोग ज्यादा संतुष्ट होते। नोबेल शांति पुरस्कार हालंाकि हमेशा ऐसे लोगों को नहीं दिया गया जो उसके लायक रहे। अक्सर यह असंतुष्ट और अराजक या इससे भी बदत्तर व्यक्तियों को दिया गया है। लेश वालेसा ने यह खबर सुनते ही कहा, ‘कौन? ओबामा? ये तो काफी जल्दी है। उन्हें तो कुछ करने का समय ही नहीं मिला।’
हमारे प्रेस में और क्यूबाडिबेट में भी कुछ ईमानदार क्रांतिकारी साथियों ने अपनी आलोचना प्रस्तुत की है। इनमें से एक ने लिखा, ‘जिस हफ्ते ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया, उसी हफ्ते अमेरिकी सीनेट ने अपने इतिहास में सबसे बड़ा सैन्य बजट पारित किया- 626 अरब डाॅलर।’ एक अन्य पत्रकार ने टीवी पर कहा, ‘ओबामा ने आखिर किया क्या है कि उन्हें यह पुरस्कार मिले?’ एक और पत्रकार ने पूछा, ‘लेकिन अफगान युद्ध और लगातार बरसाए जा रहे बमों का क्या?’ जाहिर है कि ये सारे विचार सचाई पर आधारित हैं।
रोम में फिल्मकार माइकल मूर ने एक दिलचस्प टिप्पणी की, ‘बधाई हो राष्ट्रपति ओबामा आपको नोबेल शांति पुरस्कार के लिए; अब कृपया इसके लायक बनकर दिखाएं।’
मुझे लगता है कि ओबामा मूर की टिप्पणी से सहमत होंगे। वह इतने समझदार हैं कि इस मामले और परिस्थिति को समझ सकें। वह जानते हैं कि इस पुरस्कार के लायक अभी वह नहीं हैं। उसी दिन सवेरे उन्होंने कहा था कि उन्हें लगता है कि वह इतनी सारी प्रेरक हस्तियों के बीच खड़े होने के काबिल नहीं हैं, जिन्हें आज तक सम्मानित किया गया है।
कहा जाता है कि जो कमेटी नोबेल पुरस्कार देती है, उसमें पांच लोग होते हैं और सभी स्वीडिश संसद के सदस्य हैं। एक प्रवक्ता ने कहा कि ओबामा के नाम पर सर्वसहमति थी। पता नहीं पुरस्कार विजेता से इस बारे में बात की गई थी या नहीं, या कि उन्हें कोई पूर्व नोटिस देने से पहले ऐसा कोई फैसला लियसा जा सकता है क्या!
ओबामा को इस पुरस्कार की पहले से जानकारी थी या नहीं, इसके आधार पर हमारे नैतिकतावादी फैसले में अंतर आ सकता है। यही बात पुरस्कार देने वालों के बारे में भी कही जा सकती है।
यदि एक नोबेल पारदर्शिता पुरस्कार भी गठित कर दिया जाता, तो ठीक होता।
बोलीविया एक ऐसा देश है जहां तेल और गैस के भारी भंडार हैं और जहां प्राकृतिक लीथियम का बड़ा भंडार है, जो आज काफी मांग में है।
अपने छठें जन्मदिन से पहले एवो मोरालेस, जो कि एक लोकप्रिय किसान नेता है, अपने पिता के साथ एंडीज की पहाड़ियों में टहलने निकले थे। वह 15 दिनों तक चल कर उस बाजार तक पहुंचे जहां उन्हें बेच दिया गया ताकि उनके समुदाय के लिए भोजन खरीदा जा सके। इस अनुभव के बारे में मैंने एवो से एक सवाल पूछा था, जिसका जवाब उन्होंने कुछ यूं दिया था कि ‘उन्होंने हजार सितारा होटल के नीचे पनाह ली थी’; तारों से भरे निरभ्र आकाश का विवरण देने के लिए इससे खूबसूरत शब्द और क्या हो सकते हैं!
उनके बचपन के उन कठिन दिनों में उनके समुदाय के किसानों के पास सिर्फ एक काम हुआ करता था! वे अर्जेंटीना के जूजी प्रांत में गन्ने काटते थे, जहां एमारा समुदाय के कुछ लोग कटाई के सीजन में काम करने नियमित जाया करते थे।
एवो ने जिस जगह पर स्पानी की शिक्षा ली थी, वह ला हिगेरा से बहुत दूर नहीं थी, जहां 9 अक्टूबर 1967 को चे ग्वारा की हत्या कर दी गई थी। इसी महीने की 26 तारीख को 1959 में एवो पैदा हुए थे। वह एक कमरे में अपने माता-पिता और भाई-बहनों के साथ रहते और उनका स्कूल यहां से करीब सवा तीन मील की दूरी पर था।
एवो हर कहीं पहुंच जाते थे, जहां उन्हें कोई अध्यापक मिलता था। अपनी इसी भागदौड़ से उन्हें तीन नैतिक शिक्षाएं मिलीं- झूठ मत बोलो, चोरी मत करो और कमज़ोर मत बनो।
तेरह बरस की उम्र में उनके पिता ने उन्हें सीनियर हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए सेन पेद्रो दे उरोरो भेजा। उनके जीवनीकारों में एक ने बताया है कि भौतिक विज्ञान और गणित के मुकाबले वह भूगोल, इतिहास और दर्शन में ज्यादा कुशाग्र थे। सबसे जरूरी बात यह थी कि स्कूल के पैसे चुकाने के लिए एवो भोर में दो बजे उठ जाते और बेकर, निर्माण मजदूर या जो भी  मिलता, वह काम करते थे। दोपहर में वह स्कूल जाते। उनके सहपाठी उनकी काफी बड़ाई करते और उनकी मदद करते थे। बचपन में ही वह अच्छे संगीतकार बन गए थे और उरोरो के एक प्रतिष्ठित बैंड में ट्रम्पेट बजाने लगे थे।
युवावस्था में वह अपने समुदाय की साॅकर टीम के कप्तान बने।
लेकिन एमारा समुदाय के इस गरीब शख्स  के लिए विश्वविद्यालय की पढ़ाई दूर की कौड़ी थी।
पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सेना की सेवा की और पहाड़ों की चोटियों पर अपने समुदाय में वापस आ गए। गरीबी और प्राकृतिक आपदाओं के चलते उनका परिवार एल चपारे नामक जगह पर चला गया जहां उन्होंने एक छोटी सी जमीन हासिल की। तेईस बरस की उम्र में 1983 में उनके पिता गुज़र गए। उन्होंने इस ज़मीन पर खूब मेहनत की, श्रमिकों को एकजुट किया, मजदूर संगठन बनाया और उस जगह को भरा जहां तब तक सरकार की पहुंच नहीं थी।
पिछले पचास बरसों से बोलीविया में सामाजिक क्रांति की जमीन पक रही थी। आखिरकार 9 अप्रैल 1952 को विक्टर पाज़ एस्तोंसोरो के नेशनलिस्ट रेवल्यूशनरी मूवमेंट के नेतृत्व में क्रांति का आगाज़ हुआ। यह हमसे पहले की बात है। शोषक ताकतों की हार हुई और एमएनआर के हाथों में सत्ता आ गई।
कुछ सूत्रों की मानें तो क्रांति के उद्देश्य बोलीविया में अधूरे रहे गए जिनकी वजह से 1956 में इस प्रक्रिया में गिरावट आने लगी। 1 जनवरी 1959 को क्यूबा में क्रांति कामयाब हुई और तीन साल बाद हम ओएएस से आज़ाद हुए। मेक्सिको को छोड़कर अन्य सभी देशों ने क्यूबा से संबंध मजबूत किए।
अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलन में विघटन का असर बोलीविया पर भी पड़ा। वक्त बीतता गया, आज चालीस साल बाद बोलिवेरायाईक्रांति वेनेजुएला में भी हो चुकी है और मोरालेस और उनकी एमएएस आज बोलीविया की सत्ता में हैं।
इतने संपन्न अतिहास को कुछेक पन्नों में समेट पाना मुश्किल जान पड़ता है।
मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि मोरालेस ने दुष्ट और विश्वासघाती साम्राज्यवादी अभियानों पर विजय हासिल की है, बोलीविया की संप्रभुता की रक्षा की है और हजारों साल पुरानी लोगों की परंपराओं को सम्मान दिलवाया है।
ड्रग तस्करी का जानलेवा दुष्चक्र कम से कम बोलीविया, वेनेजुएला, इक्वेडर और क्यूबा जैसे आल्बा के क्रांतिकारी देशों को अपनी गिरफ्त में नहीं ले सका है। वे जानते हैं कि उन्हें अपने लोगों की शिक्षा, सेहत और भलाई के लिए काम करना है और वे ऐसा कर सकते हैं। उन्हें तस्करी से निपटने के लिए विदेशी टुकड़ियों की जरूरत नहीं।
एमारा समुदाय के राष्ट्रपति के नेतृत्व में बोलीविया अच्छा काम कर रहा है और उसे लोगों का समर्थन हासिल है।
तीन साल से कम की अवधि में निरक्षरता को दूर कर दिया गयाः 824,101 बोलीवियाई अब लिखना और पढ़ना जानते हैं; इनमें एमारा के 24,699 और क्वेश्वा के 13,599 लोग शामिल हैं। क्यूबा और वेनेजुएला के बाद बोलीविया तीसरा देश है जो निरक्षरता से मुक्त है।
यह देश उन करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं दिलवा रहा है जिन्होंने इसका नाम तक नहीं सुना था। यह दुनिया के उन सात देशों में है जहां पिछले पांच वर्षों के दौरान शिशु मृत्यु दर में सबसे ज्यादा कमी की गई है। मातृ मृत्यु दर में भी ऐसी ही कमी आई है। यहां 454,161 लोगों की आंखों की सर्जरी की गई है, जिनमें 75,974 लोग ब्राजील, अर्जेंटीना, पेरू और पैरागुए के हैं।
बोलीविया का सामाजिक कार्यक्रम का लक्ष्य बेहद महत्वाकांक्षी हैः एक से आठवीं तक स्कूल जाने वाले हर बच्चे को अनुदान दिया जा रहा है। करीब 20 लाख बच्चे इससे लाभान्वित हो रहे हैं।
साठ साल की उम्र के सात लाख से ज्यादा  लोगों को करीब 342 डाॅलर सालाना का बोनस मिल रहा है।
हर गर्भवती महिला और दो साल से कम उम्र के बच्चे को करीब 257 डाॅलर का अतिरिक्त लाभ दिया जा रहा है।
गोलार्द्ध के तीन सर्वाधिक गरीब देशों में एक  बोलीविया ने राजकीय नियंत्रण में सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा और खनिज संसाधनों को ले लिया है और हरेक प्रभावित व्यक्ति के हितों की भरपाई की जा रही है। यह देश काफी संभल कर आगे बढ़ रहा है क्योंकि यह पीछे नहीं जाना चाहता। मुद्रा भंडार लगातार बढ़ रहा है, और एवो के शासन में आने के बाद से यह तीन गुना से ज्यादा हो गया है।
काफी कम समय में बोलीविया ने बायोमीट्रिक चुनावी रजिस्टर बना लिया है और अब तक करीब 47 लाख मतदाताओं का नाम इसमें दर्ज किया जा चुका है।
दिसंबर की 6 तारीख को यहां चुनाव होने हैं। ज़ाहिर है, अपने राष्ट्रपति के लिए लोगों का समर्थन बढ़ेगा। उनकी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता को रोकने का किसी में दम नहीं।
तो सवाल उठता है कि उन्हें आखिर नोबेल शांति पुरस्कार क्यों नहीं दिया गया?
मैं जानता हूं कि उनकी सबसे बड़ी कमी क्या हैः वे संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं है।

माओ के बाद का चीन : मिथक और यथार्थ

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/17/2010 03:05:00 AM

चीन की आर्थिक वृद्धि की दर सबको लुभा रही है. लेकिन चीन के पिछवाड़े में क्या है, यह जानने की कोशिश की है टी जी जैकब और पी बंधू ने इस लेख में. इस आलेख का अनुवाद किया है अभिषेक श्रीवास्तव ने. जल्दी ही हम चीनी मामलों के विशेषज्ञ राबर्ट वेल से हाशिया और रविवार की एक लम्बी बातचीत भी पढेंगे.





‘हम कहते हैं कि चीन एक विशाल परिक्षेत्र वाला देश है, संसाधन संपन्न है और आबादी में विशाल; सचाई यह है कि वे हान राष्ट्रीयता के लोग हैं जिनकी आबादी विशाल है तथा वे लोग अल्पसंख्यक राष्ट्रीयता वाले हैं जिनकी विशाल जमीनें हैं और जिनके संसाधन काफी सम्पन्न हैं...’
-सेलेक्टेड वक्र्स आफ माओ त्से-तुंग, अंक 5, फारेन लैंगवेजेज प्रेस, 1977, पृष्ठ 295

चीनी क्रांति और क्रांति के बाद के चीन के सबसे अग्रणी नेता माओ की उपर्युक्त उक्ति बिल्कुल सही और निरपेक्ष सूत्रीकरण है जिसकी वैधता क्रांति के 60 साल से ज्यादा वक्त के बाद भी बनी हुई है। दरअसल, यह वैधता 30 साल पहले चीन के वैश्विक नवउदारवादी तंत्र में शामिल हो जाने के बाद उन भौतिक परिवर्तनों के साथ ज्यादा से ज्यादा पुष्ट होती गई है जिनसे चीन गुजर रहा है। यह माओ की उपर्युक्त यथार्थवादी स्वीकारोक्ति थी और साथ ही चीन की पश्चिमी सीमाओं तथा मध्य एशिया व यूरोप के साथ व्यापार मार्गों को सुरक्षित करने के रणनीतिक सरोकार जिसने पहले से हान वर्चस्व वाली चीनी जन मुक्ति सेना को चीनी क्रांति की विजय के ठीक बाद विशाल और तथाकथित अल्पसंख्यक राष्ट्रीयताओं वाले क्षेत्रों पर आक्रमण करने को प्रेरित किया। इन आक्रमणों को सामंती व साम्राज्यवादी दमनकारियों के शिकंजे से इन राष्ट्रीयताओं के गरीबों की ‘मुक्ति’ के लिहाफ में लपेट कर पेश किया गया। इस तरह का इतिहास लेखन किया गया जिसमें प्रचारित किया गया कि ये तमाम भौगोलिक क्षेत्र और इसमें रहने वाले लोग लंबे समय से चीन का अभिन्न हिस्सा थे।
चीनी क्रांति के वक्त वर्तमान चीन का सिर्फ एक-तिहाई ही मुख्य चीन था जिसमें मोटे तौर पर मंदारिन बोलने वाले हान लोग रहा करते थे। इनमें कम वर्चस्व वाले क्षेत्रों में तिब्बत, पूर्वी तुर्किस्तान, भीतरी मंगोलिया और मंचूरिया थे- ये सभी विभिन्न राष्ट्रीय इकाइयां थीं जिनके प्रशासन की प्रणाली, भाषाएं तथा प्राचीन सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक इतिहास अपने-अपने थे। लेकिन, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी इन्हें अल्पसंख्यक राष्ट्रीयताएं मानती थी जिन्हें चीनी गणराज्य के साथ स्वायत्त संघीय आधार पर एकीकृत किया जाना था। पूर्वी तुर्किस्तान के मामले में जैसा हुआ, सिल्क रूट पर इसके होने के कारण रणनीतिक महत्व के चलते 1912 की गणतांत्रिक क्रांति के बाद इसे पूर्ण प्रांत के रूप में चीन में शामिल कर लिया गया। इस क्षेत्र में सदियों से विद्रोहों और शासन परिवर्तन का लंबा सिलसिला रहा है। 1949 में कम्युनिस्ट सत्ता द्वारा इस पर कब्जे के बाद इसे एक बार फिर स्वायत्त दर्जा दे दिया गया, लेकिन यह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्ण नियंत्रण में रहा। पांच स्वायत्त क्षेत्रों को संविधान और स्थानीय स्वायत्ता कानून के तहत दिया गया स्वायत्ता का दर्जा मोटे तौर पर प्रतिकात्मक है। इन तथाकथित स्वायत्त क्षेत्रों में सभी प्रमुख नीतिगत फैसले चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा लिए जाते हैं और स्थानीय व क्षेत्रीय सीसीपी कमेटियों में तकरीबन सभी वरिष्ठ पदों पर हान चीनी काबिज हैं।
आज चीन जिस विशाल रूप में दिखता है, वह दरअसल इन विशाल स्वायत्त क्षेत्रों के विलय और संख्या बल में कम लोगों की उपेक्षा का परिणाम है। विलय किए गए इन क्षेत्रों में चीजें कभी भी सहजता से नहीं चलीं और समय-समय पर राष्ट्रीयताओं के उभार ने चीन की राजनीति को हिला कर रखा। पूर्वी तुर्किस्तान के 1912 में विलय के बाद से ही वहां स्वप्रशासन का एक आंदोलन चल रहा है। 1933 और 1944 से 1949 के बीच दो बार पूर्वी तुर्किस्तान के स्वतंत्र गणराज्यों का गठन हुआ जिन्हें सोवियत रूस का समर्थन था। हालांकि ये गणराज्य टिक नहीं सके, लेकिन आज भी वे उघुर लोगों के राष्ट्रीयता के संघर्ष का प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं, जिन्होंने पिछले वर्षों के दौरान अक्सर हिंसा का रास्ता अपनाते हुए इस क्षेत्र की तथाकथित शांतिपूर्ण मुक्ति को झुठलाया है।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के हान नेतृत्व ने कभी भी बने बनाए राजनीतिक ढांचों को तोड़ने की संभावना को हल्के में नहीं लिया। इस लिहाज से उसने दीर्घकालिक रणनीतियां ईजाद की जिनका उद्देश्य उन राष्ट्रीय अस्मिताओं का  उन्मूलन था जो अपने चरित्र में यानी सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से  बहुपक्षीय थीं।
पूर्वी तुर्किस्तान में तुर्किक बोलने वाले उघुर मुस्लिमों का आबादी में वर्चस्व है। यहां कजाक, उजबेक, किरगिज, ताजिक, टारटार और हुइ (चीनी) मुस्लिमों के छोटे-छोटे समूह भी रहते हैं। पीआरसी में इस क्षेत्र को जबरन शामिल किए जाने के बाद यहां हान चीनियों के पुनस्र्थापन को आसान बनाने का काम जिनजियांग प्रोडक्शन एंड कंस्ट्रक्शन काप्र्स  (चीनी में इसे बिंग्तुआन कहते हैं) ने किया, जिसकी स्थापना 50 के दशक के शुरुआत में हुई थी। बिंग्तुआन एक विशाल सैन्यकृत प्रशासनिक व विकास संगठन होता है। इसे सीमा के पास तथा जिनजियांग उघुर स्वायत्त क्षेत्र के तकरीबन मध्य में स्थापित किया गया और यह उत्तरी क्षेत्र को बांटता है जहां दक्षिणी उघुर से आकर अधिकतर कजाक रहते हैं। यह कई करोड़ हेक्टेयर जमीन पर नियंत्रण रखता है जहां की अधिसंख्य आबादी चीनी जातीयताएं हैं। पिछले बरसों के दौरान इसका विस्तार हुआ है और जब जरूरत पड़ी है, इसने जमीनों पर कब्जा किया है। ऐसा उघुर और कजाकों के पारंपरिक पेशे पशुपालन की कीमत पर किया गया है। नब्बे के दशक  के बाद यह क्षेत्रीय सरकार के तहत नहीं रह गया है, बल्कि सीधे चीन की केन्द्र सरकार के अंतर्गत आ गया है। इसका अपना पुलिस बल, न्यायालय, कृषि और औद्योगिक उद्यम हैं। इसके पास श्रमिकों को रखने के लिए शिविरों व कैदखानों का एक विशाल नेटवर्क है। बिंग्तुआन एक साथ दो उद्देश्य पूरे करता है। यह क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का विकास करता है और इसे आंतरिक व बाहरी खतरों से बचाता है। इसकी सशस्त्र पुलिस इकाइयों ने जातीयताओं के उभार को कुचलने का काम किया है।

(देखें, एमनेस्टी इंटरनेशनलः ग्रास वायलेशंस आफ ह्यूमन राइट्स इन द जिनजियांग उघुर आटोनोमस रीजन, 21 अप्रैल 1999 पृष्ठ 7)
इनकी पारंपरिक घुमंतु अर्थव्यवस्था भी छिन्न-भिन्न हो गई। भेड़ों की चरागाहें और गेहूं के खेतों को कपास, अंगूर आदि के फार्मों में हान चीनियों ने तब्दील कर दिया। 1949 में हान चीनी आबादी का महज 6 फीसदी थे, लेकिन 2004 तक यह आंकड़ा आश्चर्यजनक ढंग से 40 फीसदी को पार कर गया। तिब्बत, पूर्वी तुर्किस्तान, मंगोलिया और मंचूरिया की भी यही कहानी है। मसलन, ल्हासा और उरुमकी जैसे शहरों में आज हान चीनियों की सबसे ज्यादा संख्या हो गई। बड़े पैमाने पर इस पलायन के बारे में चीन के आधिकारिक वक्तव्य बताते हैं कि इन ‘पिछड़े’ क्षेत्रों के आर्थिक विकास के लिए ऐसा जरूरी है। राजनीतिक रूप से देखें, तो यह हान चीनियों द्वारा उपनिवेशीकरण के रूप में दिखाई पड़ता है जिसका सीधा मकसद इन राष्ट्रीयताओं को समाप्त करना है।
एक अन्य रणनीति कठोर तरीकों से जनसंख्या नियंत्रण है। पीएलए ने इन विलय किए गए क्षेत्रों में अनिवार्य रूप से परिवार नियोजन को लागू किया। इन क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व पहले से ही बहुत कम था और जमीनें पर्याप्त से भी ज्यादा थीं। सरकारी जन्म नियंत्रण नीति के तहत अल्पसंख्यक राष्ट्रीयता वाले दंपतियों को गांवों में तीन और शहरों में दो बच्चे पैदा करने की अनुमति है, लेकिन यह कहा जाता है कि जिनजियांग में बैठे अधिकारियों ने लोगों पर लगातार दबाव बनाया है कि वे इस संख्या को दो और एक पर ले आएं। जहां तक बाकी देश का सवाल है किसी निश्चित क्षेत्र में एक निश्चित अवधि के लिए मंजूर किए गए जन्म के कोटे के मुताबिक महिलाओं को नियोजित तरीके से गर्भ धारण करना होता है। ऐसा हो सकता है कि यदि ‘योजना’ से मंजूरी न मिले, तो एक दंपति को कई साल तक बच्चे पैदा करने की छूट नहीं दी जा सकती। कई महिलाएं जो इस योजना का उल्लंघन करते हुए गर्भ धारण कर लेती हैं, उनका कथित तौर पर जबरन गर्भपात करवा दिया जाता है। जो महिलाएं योजना के बाहर बच्चे को जन्म दे देती हैं, उन्हें दंड भोगना पड़ता है जिससे अक्सर परिवार की आजीविका खतरे में पड़ जाती है। जबरन बंध्याकरण की खबरें भी हैं, हालांकि परिवार नियोजन को पुरस्कार और दंड की प्रणाली के रूप में भी माना जाता है।
धार्मिक स्वतंत्रता का दमन भी चीनी राज्य की एक अन्य नीति है। चीनी सरकार ने इन क्षेत्रों में कब्जे के बाद मस्जिदें और मदरसे बंद करवा दिए, धार्मिक संस्थानों की जमीनों को जब्त कर लिया गया तथा तमाम धार्मिक नेताओं को कैद कर कठोर श्रम की सजा सुनाई गई। चीनी स्कूल स्थापित किए गए और 18 साल के नीचे बच्चों की धार्मिक शिक्षा पर रोक लगा दी गई। सत्तर के दशक के अंत में देंग द्वारा शुरू किए गए उदारीकरण व आर्थिक सुधार के दौर में तिब्बत और पूर्वी तुर्किस्तान दोनों ही जगह नियंत्रण में ढील दी गई और धार्मिक गतिविधियों के दमन को कम किया गया। कई मस्जिदों को दोबारा खोल दिया गया और अन्य इस्लामिक देशों के अनुदान से नई मस्जिदों के निर्माण को मंजूरी दी गई। मुस्लिमों को फिर से इस्लामिक व अन्य देशों में यात्रा करने की अनुमति दी गई।
अस्सी के दशक के अंत तक आते-आते एक बार फिर प्रतिबंधों को लागू किया जाने लगा। ऐसा इस बार सोवियत संघ के विघटन तथा कई मध्य एशियाई देशों में कट्टर धार्मिक राष्ट्रवाद के उभार के परिदृश्य में किया गया। इस बार यह भय था कि जिनजियांग में भी कहीं इस्लाम एक बार फिर जातीय राष्ट्रवाद का आधार न बन जाए और अलगाववादी प्रवृत्तियां दोबारा न भड़क जाएं। वास्तव में 1990 में बैरन टाउनशिप में एक उभार हुआ था जिसे चीनी सरकार ने ‘प्रतिक्रांतिकारी विद्रोह’ का नाम दिया था। एक बार फिर मस्जिदों और मदरसों को बंद कर दिया गया तथा अरबी के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई। जो मौल्वी काफी स्वतंत्र या विद्रोही किस्म के थे, उन्हें या तो बर्खास्त या फिर गिरफ्तार कर लिया गया। सरकारी दफ्तरों और अन्य संस्थानों में काम करने वाले मुस्लिमों को इस दौरान धार्मिक आचार से वर्जित किया गया, और ऐसा न करने पर उनकी नौकरियां चली जाती थीं। 1996 के बाद सरकार ने ‘धार्मिक अतिवादियों’ तथा ‘गैरकानूनी धार्मिक गतिविधियों’ के खिलाफ अपने अभियान को तेज कर दिया। सरकार ने नास्तिक शिक्षा का एक अभियान शुरू किया ताकि जमीनी स्तर पर कम्युनिस्ट पार्टी की कमेटियों और अन्य आस्तिक मुस्लिमों की संस्थाओं को खत्म किया जा सके। यहां धार्मिक मामलों पर नियंत्रण कायम करने का काम टाउनशिप, शहर और ग्रामीण स्तर पर धार्मिक नियंत्रण कमेटियां करती हैं।
सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों का भी हनन किया गया है। पारंपरिक कपड़ों को पहनने के लिए लोगों को प्रोत्साहित नहीं किया जाता। इल्ली और कुछ अन्य क्षेत्रों में एक सामाजिक और सांस्कृतिक मंच हुआ करता था जिसका नाम था ‘मेश्रेप’, इसे 1995 में अधिकारियों ने प्रतिबंधित कर दिया। मेश्रेप  पारंपरिक किस्म की पार्टियां होती हैं जिनमें महिलाएं, पुरुष, युवा या एक मिश्रित समूह हिस्सा लेता है और इसे एक नाटक की तरह किया जाता है जिसमें एक व्यक्ति समूह का नेतृत्व करता है और सभी एकत्रित लोगों को पारी-पारी से बोलने, संगीत बजाने, गीत गाने या कविताएं पढ़ने का मौका देता है। इल्ली युवा मेश्रेप का आयोजन गिलजा में 1994 के अंत में उघुर समुदाय के कुछ युवाओं ने किया था जिसके लिए नगर प्रशासन की सहमति ली गई थी। यह उघुर समुदाय के युवाओं के बीच फैल चुकी नशीली दवाओं की लत से निपटने का एक प्रयास था, जिनमें अधिकतर बेरोजगार और अशिक्षित थे। इसी तरह मेश्रेप स्थानीय उघुर समुदाय को प्रभावित करने वाले मुद्दों और समस्याओं को भी उठाते थे। उन्होंने सांस्कृतिक और इस्लामिक परंपराओं को बहाल करने की कोशिश की तथा नैतिक मूल्यों की एक समझदारी कायम करते हुए ऐसे नियमों को लागू किया जिनके तहत शराब पीना, धूम्रपान  और नशीली दवाएं लेना वर्जित था। वे कुछ हद तक इस काम में सफल भी हुए।
यह अभियान लोकप्रिय हो गया और दूसरे क्षेत्रों में भी फैलने लगा। धीरे-धीरे इस इलाके में करीब 400 मेश्रेप बन गए। सरकारी अधिकारियों के लिए यह चिंता के विषय थे क्योंकि ये सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते थे। इसी वजह से इन पर सरकारी दमन बरपा और इसके नेता को गिरफ्तार कर लिया गया। धीरे-धीरे स्थिति यह आ गई कि मेश्रेप गुप्त तरीके से चलने लगे तथा उनके सदस्यों व अनुयायियों के खिलाफ मनमानी कार्रवाइयों और गिरफ्तारियों की रफ्तार भी बढ़ती रही। 24 अक्टूबर 1998 को एक आदेश आया जिसमें हज यात्रा को प्रतिबंधित कर दिया गया।
धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों के हनन, फसलों की पैदावार को जबरिया बदलने के कारण आने वाले सूखे, आर्थिक बदहाली और सामान्य तौर पर जीने की बदहाल स्थितियों ने इन लोगों को बड़े पैमाने पर पलायन कर जाने को मजबूर कर दिया जिससे ये शरणार्थियों की स्थिति में आ गए। जाहिर है, चीन का समाज संरक्षणवादी है जहां नियंत्रण के तरीके काफी बर्बर हैं, लिहाजा यह पलायन इस दृष्टि से काफी कम रहा क्योंकि किसी और किस्म के समाज में यह काफी ज्यादा होता। इसके बावजूद जो लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हुए ओर जो देश छोड़ कर चले गए, उनकी संख्या कम नहीं कही जा सकती। आंतरिक रूप से विस्थापित लोग आम तौर पर बदहाल आजीविकाओं के शिकार होते हैं, जबकि जो लोग देश छोड़ कर चले जाते हैं उनमें राजनीतिक रूप से सचेतन लोगों की संख्या काफी होती है।

पश्चिमी विकास योजना
जैसा कि माओ ने बिल्कुल सटीक कहा था, ये क्षेत्रप्राकृतिक संसाधनों के मामले में काफी संपन्न थे। तिब्बत का पारंपरिक नाम पष्चिमी खजाना है जबकि पूर्वी तुर्किस्तान को उम्मीदों का महासागर कहा जाता है क्योंकि यह तेल और गैस के मामले में काफी संपन्न है। यहां कोयले के भी विशाल भंडार हैं- और ये सभी ऊर्जा के भूखे चीन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। चीन ने अस्सी के दशक में जब बहुराष्ट्रीय पूंजी के लिए अपने द्वार खोले, उस वक्त पूर्वी तटवर्ती क्षेत्र वैश्विक पूंजी का केंद्र बना जिसके मध्य में शंघाई रहा। चीन को दो अंकों की विकास दर दिलाने वाले तमाम विशेष आर्थिक क्षेत्र इसी पट्टी में स्थित हैं, लेकिन इनके लिए संसाधनों को मुख्यतः पश्चिमी पट्टी से आना था। इसी परिस्थिति ने 1999 में पश्चिमी विकास योजना की नींव रखी। इस योजना के तहत सुपर हाइवे, रेलवे और विमानपत्तन सुविधाओं जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का निर्माण पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी इलाकों, खासकर संसाधन संपन्न तिब्बत और पूर्वी तुर्किस्तान के इलाकों में किया गया। पूर्वी तुर्किस्तान को बाद में सिंकियांग या जिनजियांग का नाम दे दिया गया जिसका चीनी में अर्थ होता है नई सीमा। इन विकास गतिविधियों ने इस इलाके में तीव्र शहरीकरण की प्रक्रिया को जन्म दिया जिससे तटवर्ती चीन में आर्थिक गतिविधियों की गति काफी तेज हो गई। पूर्वी तुर्किस्तान के सकल घरेलू उत्पाद में 2004 से 2007 के बीच 60 फीसदी की वृद्धि देखी गई और इसकी राजधानी बेहद कम समय के भीतर ही महानगर में तब्दील हो गई।
पश्चिमी चीन के तेल भंडार चीन के कुल तेल भंडारों के 60 फीसदी से ज्यादा हिस्सा रखते हैं। पूर्वी तट के तीव्र औद्योगीकरण का पेट भरने के लिए तेल और अन्य खनिजों की खनन गतिविधियों में काफी तेजी आई। इस वजह से इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हान चीनी श्रमिकों का पलायन हुआ। मध्य एशिया की थ्री गाॅर्जेज परियोजना के कारण विस्थापित करीब एक लाख चीनी 1998 में इस क्षेत्र के कृषि कम्यूनों में पुनस्र्थापित किए गए जिसकी वजह से स्थानीस लोगों के साथ उनके तनाव बढ़े। बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में एक बड़ा निवेश 4000 किलोमीटर की एक लंबी तेल पाइपलाइन में किया गया जो तारिम बेसिन में पूर्वी तुर्किस्तान के तेल के मैदानों को शंघाई के वाणिज्यिक महानगर से जोड़ती थी। राजमार्गों और रेलरोड परियोजनाओं को खोले जाने का उद्देश्य यूरोप के साथ
सीधे सड़क मार्ग से व्यापार था। जैसा कि तिब्बत के मामले में हुआ है, पश्चिमी कंपनियों को यहां पर्यटन, निर्माण व तेल परिशोधक संयंत्रों के विकास में निवेश करने को प्रोत्साहित किया गया।
चमकदार आंकड़ों और गगनचुंबी इमारतों के बावजूद जमीनी सच्चाई यहां बहुत सकारात्मक नहीं रही है। पिछले कुछेक दशकों के दौरान समूचे चीन में आय की असमानता ने आसमान छू लिया है और यही हाल पूर्वी तुर्किस्तान का भी है। यहां असमानताएं सिर्फ वर्ग भेदों पर आधारित नहीं हैं, बल्कि ये जातीय विभाजनों को ज्यादा अभिव्यक्त करती हैं। यहां जो नया संपन्न वर्ग उभरा है, उसमें उघुर जातीयता और अन्य छोटी अल्पसंख्यक जातीयताएं हाशिये पर चली गई हैं। उघुर अब आबादी का सिर्फ 40 फीसद ही रह गए हैं। इसका कुल फायदा यहां पलायन कर आए हान चीनियों को ही मिला है। यहां जो औद्योगीकरण हुआ है, उसका आधार पारंपरिक घुमंतू आर्थिक गतिविधियों को नहीं बनाया गया जिससे कि मुख्य लाभ मूलवासियों को मिल सके। यह सब कुछ संसाधनों के दोहन के लिए किया गया है जिससे चीनी मुख्यभूमि को लाभ मिल सके। अच्छे वेतन वाले कामों पर पलायन कर आई हान चीनी आबादी का दबदबा है जिसका नतीजा यह हुआ हे कि यहां की मूल जनता दोयम दर्जे की नागरिक बन कर रह गई है और सबसे कम वेतन-भत्ते वाले कामों से अपना गुजारा कर रही है। इसके बावजूद बेरोजगारी का आलम यह है कि उघुर जातियों में इसकी दर 65 फीसदी तक पहुंच चुकी है।
इसी निराशाजनक स्थिति का नतीजा रहा कि उघुर जाति के युवा चीन के तटवर्ती इलाकों में पलायन कर गए जहां उन्होंने हान चीनी श्रमिकों का हिस्सा मारना शुरू कर दिया। इसने एक नए नए किस्म के तनाव को जन्म दिया। वैश्विक मंदी ने पहले से ही चली आ रही असमान स्थितियों को और तीखा किया है। चीनी सरकार की शिक्षा नीति ने जातीय भेदभाव को बढ़ाते हुए हान चीनियों का पक्ष लिया है। अच्छे वेतन वाले किसी भी रोजगार के लिए मंदारिन भाषा की जानकारी को अनिवार्य कर दिया गया है। इस इकलौती कसौटी ने ही स्थानीय लोगों को रोजगार के बाजार में हाशिये पर डालने का काम किया है। बिल्कुल यही हालात तिब्बत में भी हैं। उघुर अब यह महसूस करते हैं कि तुर्किक की जगह मंदारिन को अनिवार्य दर्जा दिया जाना दरअसल उनकी सांस्कृतिक जड़ों और जातीय अस्मिता को नष्ट करने का ही एक और प्रयास है।

दमन और प्रतिरोध

उघुर कलाकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों की कविताओं, नाटकों व अन्य रचनाओं को या तो प्रतिबंधित कर दिया गया है अथवा राष्ट्रवादी भावनाएं भड़काने के आरोप में इनकी घोर निंदा की जाती रही है। पिछले कुछ दशकों के दौरान स्थिति अब टूटन के कगार पर आ गई हे और कई बार तो इसने विस्फोटक रूप भी ले लिया है। चीनी सरकार ने ‘प्रतिक्रांतिकारी संगठनों’ की अपनी सूची में 60 संगठनों का दनाम डाला हुआ है। नब्बे के दशक में कई नेता अफगानिस्तान, मध्य एशियाई देशों व तुर्की में निर्वासन में चले गए। इस क्षेत्र के पहाड़ी इलाकों में इनकी एक निर्वासित सरकार है। इनके अपने सैन्य  शिविर हैं जहां सैन्य प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इनमें सबसे प्रमुख समूह पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक आंदोलन (ईटीआईएम) है, जो चीन से पूर्ण आजादी के लिए संघर्ष में विश्वास करता है। यह एक कट्टर इस्लामी समूह है जिसे संयुक्त राष्ट्र ने 2002 में वैश्विक आतंकी सूची में डाल दिया था। विश्व उघुर कांग्रेस को अमेरिका का समर्थन है। यहां कई अन्य समूह भी हैं जिन्होंने अल कायदा, तालिबान, चेचेन विद्रोहियों और ऐसे ही अन्य संगठनों के साथ करीबी रिश्ते बना लिए हैं। इस क्षेत्र की सदियों पुरानी सूफी परंपरा के उलट कई उघुर विद्रोही संगठनों ने वहाबी या सलाफी विचारधारा को अपना लिया है।
उघुर समूहों ने अब तक कई चीनी अधिकारियों और मौलवियों की हत्या की है। देश के कई हिस्सों में बम विस्फोट किए गए हैंः इनका निशाना डाकघर, सैन्य प्रतिष्ठान, पुलिस स्टेशन और तेल के संयंत्र रहे हैं। परमाणु परीक्षण, जन्म नियंत्रण और हान चीनियों के पलायन के खिलाफ छात्रों के प्रदर्शन भी हुए हैं। इसके अलावा सरकारी भ्रष्टाचार, भेदभाव, अपराध से निपटने में सरकारी अधिकारियों की नाकामी और नशे की लत व वेश्यावृत्ति जैसी सामाजिक समस्याओं के खिलाफ भी यहां कई प्रदर्शन हुए हैं। बीजिंग ओलंपिक 2008 की तैरूारियों के दौरान ईटीआईएम के गुरिल्लों ने चीनी सुरक्षा बलों को निशाना बना कर हमले किए। हालिया जन उभार और असंतोष और इनका व्यापक दमन दरअसल उन सटीक अंतर्विरोधों का तार्किक विकास ही है जो लंबे समय के दौरान चीनी समाज में विकसित हुए हैं और जिनका प्रसार किया जाता रहा है। जैसा कि क्षेत्रीय प्रशासक बताते हैं, चीन की आधिकारिक नीति ‘अलगाववादियों’ का तीव्र दमन है। बीजिंग के शासक किसी किस्म के राजनीतिक समाधान के बारे में नहीं सोच रहे। जाहिर है कि इससे पहले से चले आ रहे अंतर्विरोध और तीखे होंगे तथा भविष्य के संघर्ष और ज्यादा खूनी होंगे।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान ‘राष्ट्रवादी’, ‘अलगाववादी’, ‘कट्टर धार्मिक’, ‘गैर-कानूनी धार्मिक’ गतिविधियों के लिए जिन्हें गिरफ्ार किया गया है, उनमें किसान, छात्र, मौलवी, व्यापारी, इस्लामिक विद्वान, लेखक, कवि और अध्यापक रहे हैं। राजनीतिक बंदियों को अक्सर उनकी सुनवाई से पहले महीनों या बरसों तक एकल कारावास में रखा जाता है। यहां उत्पीड़न और सजाएं बर्बर होती हैं। कुछ ही कैदियों की पहुंच वकीलों तक होती है, कुछ को ही औपचारिक रूप से सुनवाई का मौका दिया जाता है और कई को लंबी अवधि के कारावास की सजा सुनाई जाती है और यहां तक कि झूठे मुकदमों के बाद मौत की सजा भी दे दी जाती है। कई मामलों में सार्वजनिक सुनवाइयां भी होती हैं जिनमें सैकड़ों-हजारों लोग इसे देखने आते हैं। वहीं पर सजा घोषित कर दी जाती है। एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे कई मानवाधिकार संगठनों ने इस बात पर चिंता जाहिर की है कि मौत की सजा सुनाए गए कई ऐसे मामले रहे हैं जिनमें अंतरराष्ट्रीय न्याय कानूनों का उल्लंघन किया गया है। बड़े पैमाने पर उघुर राजनीतिक बंदियों को मौत के घाट उतारा गया है। जिनजियांग-उघुर क्षेत्र में बाकी चीन के मुकाबले मौत की सजा सुनाए गए लोगों और आबादी का अनुपात कई गुना ज्यादा है। इस साल जुलाई में यहां हुए दंगे के बाद बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों को यहां तैनात कर दिया गया था और इस असंतोष के दौरान हत्या के आरोपियों को उरुमकी की कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया ली झी ने बर्बर तरीके से मौत का दंड दे दिया था।

वर्तमान हालात
कानून प्रणाली का विनाश और 80 के दशक के अंत से जमीन के निजीकरण के कारण चीन में अभूतपूर्व पैमाने पर किसान उजड़ गए। रिपोर्टें और अध्ययन बताते हैं कि 90 के दशक की शुरुआत तक 5 करोड़ से ज्यादा किसान सड़क पर रोजगार की तलाश में भटक रहे थे और ये सभी अपनी जमीन से उजड़ कर पूर्वी तटवर्ती क्षेत्रों में पहुंच गए जहां बहुराष्ट्रीय पूंजी के लिए ये सस्ते श्रमिकों में तब्दील हो गए। चीनी अर्थव्यवस्था के उच्च विकास और भारी मुनाफे के पीछे तमाम वजहों में यह वजह प्रमुख थी। आज वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में चीन में बेरोजगारी की दर दुनिया में सबसे ज्यादा है। रिपोर्टों के मुताबिक मंदी की शुरुआत से लेकर अब तक चीन में 2 करोड़ से ज्यादा श्रमिक सड़कों पर आ गए हैं। इसमें कोई शक नहीं कि वैश्विक पूंजी के साथ अपने मजबूत आर्थिक एकीकरण के कारण मंदी से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में चीन रहा है। जैसे-जैसे मंदी के हालात खींचते जाएंगे , आने वाले दिनों में सामाजिक व राजनीतिक तनाव भी बढ़ेंगे। चीन में राष्ट्रीयताओं और जातीयताओं के सवाल अभी सुप्त नहीं हुए हैं और वे वैश्विक मंदी के परिणामों के साथ और ज्यादा मजबूती से उभर कर सामने आएंगे। वास्तव में, यही वह प्रक्रिया है जो वर्तमान चीन में धीरे-धीरे करवट ले रही है। ऐसी स्थिति में जमीनी वास्तविकताओं में जड़ जमाए लोकप्रिय असंतोष के प्रति चीन के शासक पूरी तरह उपेक्षा की दृष्टि अपनाए हुए हैं।
चीन के पास पूर्व सोवियत संघ के विघटन का उदाहरण है। 1989-91 के दौरान अफगानिस्तान में जब सोवियत कब्जे के खिलाफ मुजाहिदीनों की लड़ाई चल रही थी, तो उसे न सिर्फ अमेरिका, बल्कि चीन का भी समर्थन प्राप्त था। आज इस क्षेत्र में अमेरिका की मौजूदगी के कारण इस्लामिक चरमपंथी उसी को निशाना बना रहे हैं। इस क्षेत्र के सभी इस्लामिक देशों में धार्मिक सैन्यवाद एक मजबूत ताकत है क्योंकि उत्तर-सोवियत युग में वह यहां कायम सामाजिक-आर्थिक समस्याओं की ही देन है।
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बार-बार कहते हैं कि वे उन गलतियों को नहीं दोहराएंगे जिनके चलते सोवियत रूस टूट गया, लेकिन 1949 में सत्ता में आने के बाद से लेकर अब तक चीनी साम्यवाद का समूचा विकास यह दिखाता है कि उसने वास्तव में रूस के उदाहरण से कुछ नहीं सीखा है। उदाहरण के लिए, बाहरी संसाधन सम्पन्न राष्ट्रों के प्रति चीन की नीति में कोई अंतर नहीं है। माक्र्सवाद-लेनिनवाद सैद्धांतिक तौर पर राष्ट्रीयता के सवाल पर आत्मनिर्णय के राष्ट्रों के अधिकार का वहां तक पक्ष लेता है जहां तक यह अलगाव के अधिकार में तब्दील हो जाए। माक्र्स ने कहा था, ‘कोई भी राष्ट्र जो दूसरे का दमन करता है, खुद अपने लिए बेड़ियां मजबूत करता है।’ माक्र्सवाद का लक्ष्य अंतरराष्ट्रीयतावाद था। राष्ट्रों के आत्मनिर्णय के अधिकार को लेनिन का समर्थन तात्कालिक और अपने चरित्र में अस्थायी था और यह सर्वहारा अंतरराष्ट्रीयतावाद के उद्देश्य के अधीन था। चूंकि, एक ‘स्वायत्त’ राष्ट्र को एक ‘संप्रभु’ राष्ट्र के बराबर अधिकार प्राप्त नहीं होते, इसलिए उन्होंने जोर देकर कहा था कि सिर्फ अलगाव का अधिकार ही लंबी अवधि में राष्ट्रों के बीच एकीकरण तथा स्वतंत्र और स्वैच्छिक एका व सहयोग  को संभव बना सकता है।
व्यवहार में देखें, तो रूसी बोल्शेविकों ने कई मामलों में अलगाव के अधिकार को दबाया नहीं, बल्कि अतीत में ज़ार के साम्राज्य पर निर्भर देशों को संघीय गणराज्य के रूप में संघ में शामिल करने के लिए सैन्य हस्तक्षेप का प्रयोग किया। उक्रेन, जाॅर्जिया, बाल्टिक राष्ट्रों व मध्य एशिया के मुस्लिम राष्ट्रों के साथ ऐसा ही किया गया। शुरुआत में धार्मिक आस्था, पारंपरिक आचार व सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी संस्थानों को पूर्ण स्वतंत्रता का वादा किया गया, लेकिन आखिरकार इस्लाम और उसकी परंपराओं व व्यवहार के खिलाफ यह हमले में ही तब्दील हो गया क्योंकि मुस्लिमों के राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व अक्सर मौलवियांे के हाथों में होता था। अंततः स्टालिन के नेतृत्व में विकास की एक केन्द्रीय योजना बनाई गई जिसके तहत इन बाहरी राष्ट्रों को एक बार फिर उपनिवेशों में तब्दील कर दिया गया जिनका काम मोटे तौर पर रूस के औद्योगीकरण के लिए कच्चे माल की आपूर्ति करना था। इस योजना के साथ इन राष्ट्रों की समूची संस्कृति और इतिहास को पूरी तरह समाप्त करने की कोशिश की गई। अरबी की जगह सिरिलिक को बैठा दिया गया, मस्जिदें तोड़ दी गईं और मदरसे बंद कर दिए गए। अखिल इस्लामिक विश्व के साथ सभी रिश्ते खत्म कर दिए गए। घुमंतू अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई। जिस तरीके से मध्य एशिया के वर्चस्व वाली सरकार ने सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया, उसने तमाम जातीय समूहों के बीच संघर्षों को जन्म दिया। सोवियत तंत्र के भीतर जिन विशिष्ट जनजातीय और कबीलाई समूहों को शामिल किया गया था, उनके भेदभावपूर्ण व्यवहार और भ्रष्टाचार ने समूची आबादी में भारी असंतोष को पैदा कर दिया।
उपर्युक्त तमाम तथ्यों को पढ़ कर यदि हम बाहरी देशों के साथ चीन की नीतियों की इनसे तुलना करें, तो हमें वास्तव में कोई अंतर नहीं दिखाई देता। दोनों के नतीजे भी समान हैं। वास्तव में, तिब्बत और पूर्वी तुर्किस्तान में जारी प्रतिरोध तथाकथित चीनी कम्युनिस्टों के बुर्जुआ साम्राज्यवादी चेहरे को ही बेनकाब करता है। ऐसी सत्ता के तहत राष्ट्रीयताओं और जातीयताओं के सवाल को हल नहीं किया जा सकता। जिस चीनी माॅडल का इतना हल्ला है, वह वास्तव में आज पतन के एक महान खतरे से जूझ रहा है। आज दुनिया 19वीं सदी के उसी खेल का दोहराया जाना देख रही है जहां तमाम बड़ी ताकतें अपने पूंजीवादी औद्योगीकरण के लिए बेहद अनिवार्य ऊर्जा संसाधनों को हड़प लेने की साजिशों में जुटी हैं।(समयांतर से साभार) 

उदार आर्थिक नीति के युग में कांग्रेस

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/16/2010 07:35:00 AM

प्रभाकर चौबे

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस देश की ''आधुनिक'' पार्टी है। भारतीय पुनर्जागरण के दौर में जब औद्योगिक क्रांति की हवा देश में मंद-मंद बहने लगी और यहां औद्योगीकरण अपने उदय की आहट दे रहा था उस काल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ।

इस तरह अपना बुर्जुआ चरित्र कायम रखते हुए आज कांग्रेस 125 साल की हो गई और औद्योगीकरण के प्रारंभिक दौर से गुजरते हुए वैश्विक नवउदारवादी आर्थिक नीतियों की धरा में बहने वाली देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर खड़ी है। भाजपा ने जो जनसंघ का नया नाम-रूप है, और जो महज व्यापारियों की पार्टी कहलाती रही, अपनी नई आर्थिक नीतियां कांग्रेस से लिया। इसलिए कहा व माना जाता है कि कांग्रेस और भाजपा की आर्थिक नीतियां एक सी हैं। और हैं भी। बहरहाल यहां कांग्रेस की बात करें। कांग्रेस के गठन में बुर्जुआ समाज के श्रेष्ठवर्ग, प्रतिनिधियों ने प्रमुख भूमिका निभाई और निरंतर इसका बुर्जुआ चरित्र पुख्ता हुआ। यह कांग्रेस की हर पीढ़ी ने किया। आज कांग्रेस में जो पीढ़ी है वह न तो कल्याणकारी राज्य, न समाजवादी ढंग का समाज (स्शष्द्बड्डद्यद्बह्यह्लद्बष् श्चड्डह्लह्लद्गह्मठ्ठ शद्ध ह्यशष्द्बद्गह्ल4) या सम्पूर्ण समाजवाद पर विश्वास करती है न सार्वजनिक क्षेत्रों को निजी क्षेत्र में बेचने पर परहेज है उसे। ब्रिटिश औपनिवेशक शासन से मुक्त होकर अमरीकी साम्राज्यवादी आर्थिक नीतियों के शिकंजे में जकड़ने के पूरे क्रम का शोधपूर्ण अध्ययन जरूरी है। दरअसल कांग्रेस के जन्म तथा क्रमिक विकास और उसकी राजनीतिक दल के रूप में मजबूती का सामाजिक विश्लेषण तथा सांस्कृतिक समीक्षा जरूरी है। आज तक केवल राजनीतिक विश्लेषण होता रहा है। कांग्रेस इस बात को भले से समझ रही है कि अगर आज उसने पीछे देखना शुरू किया या देखा तो उसका राजनीतिक अंत हो जाएगा क्योंकि इन 125 वर्षों में आज देश में मध्यमवर्ग की संख्या कई गुना बढ़ी है और पहले के मध्यवर्ग की अपेक्षा आज के मध्यवर्ग की इच्छाएं, महत्वाकांक्षाएं, तौर तरीके, दुनिया को देखने का नजरिया और चलने का ढंग एकदम जुदा है, बदला हुआ है। आज इस वैश्विक उदार आर्थिक नीतियों में मध्यवर्ग ज्यादा आत्मकेंद्रित हुआ है और वह इस आर्थिक उदारीकरण के सारे लाभ पोगरा लेने आतुर हैं। उसे न तो कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पसंद है न उसे समाजवाद से कोई लेना-देना है। कांग्रेस के नेतृत्व के केंद्र में बैठे नीति निर्धारक तथा व्याख्याकार और तत्ववेत्ता ज्यादा चतुर हैं और बहुत ही चतुराई के साथ, लेकिन भोला चेहरा बनाकर देश की जनता को उस वैश्विक आर्थिक नीतियों से उत्पन्न होने वाले ''लाभ'' की ओर हांक रहे हैं और उधर ले जा रहे हैं। इस तरह कांग्रेस ने कट्टरता से चिपके रहने को त्यागते हुए समय के अनुसार चलने की नीति का अनुसरण किया और अपने मूल चरित्र को परिमार्जित करते हुए ''कॉर्पोरेट'' चरित्र की ओर बढ़ी है। आजादी की लड़ाई के समय कांग्रेस एक राजनीतिक पार्टी की अपेक्षा एक मंच ज्यादा थी और उस मंच से हर विचारधारा के लोग जुड़कर आजादी की लड़ाई लड़ते रहे। आजादी मिलते ही ऐसे विचार के लोगों ने अपना-अपना रास्ता पकड़ा और कांग्रेस अपने रास्ते पर चलते हुए उसमें आधुनिक तत्व शामिल करती चली और आज वह देश की सबसे बड़ी पूंजीवादी पार्टी है। कांग्रेस ने मतलब साधने बुर्जआ तथा सामंतवादी तत्वों का सहयोग लेने में गुरेज नहीं किया। कांग्रेस मूलरूप से धर्मनिरपेक्ष पार्टी है लेकिन कई ऐसे उदाहरण हैं, खासकर हाल के वर्षों के, जब उसने घोर साम्प्रदायिकता के विरुध्द ''चुप'' रहने की भूमिका अपनाई। खासकर गुजरात दंगों के समय कांग्रेस का रुख सत्ता के लिए खुद को साम्प्रदायिकता के खिलाफ तटस्थ रखने का रहा। ऐसा भी समय आया जब कांग्रेस हिन्दुत्व के घोर कट्टरवाद के विकल्प में ''नरम हिन्दु'' का चेहरा लेकर पेश हुई जिससे उसे वोट मिलें। इस तरह धर्मनिरपेक्षता के मामले में कांग्रेस से कई बार देश ठगा गया और अब धर्मनिरपेक्षता को लेकर कांग्रेस अविश्वसनीयता के घेरे में भी आ गई है। कांग्रेस ने अपनी रक्षा के लिए सबसे ज्यादा उपयोग कम्युनिस्ट पार्टियों का किया है। और हर मदद के बाद या मदद देते समय भी कम्युनिस्ट पार्टियों ने खुद को छला गया महसूस किया है। इस तरह आज कांग्रेस न तो समतावादी समाज, समाजवाद चाहने वालों के लिए आशा का केंद्र है और न ही धर्मनिरपेक्षता के लिए उससे वैसी आशा है जो किसी समय हुआ करती थी। कांग्रेस शुरू से साम्राज्यवाद के खिलाफ रही, और इसमें आर्थिक साम्राज्यवाद भी शामिल है, लेकिन अबकी कांग्रेस कभी-कभार कोमल स्वर में साम्राज्यवाद के मंसूबों के खिलाफ बोल ले तो अहो भाग्य! नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद आज जो कांग्रेस है वह दुनिया की तमाम आर्थिक उदारवादी शक्तियों की प्रिय है क्योंकि आज की कांग्रेस आर्थिक नीतियां उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। इस तरह आज कांग्रेस ने अंतरराष्ट्रीय उदार नीतियों के क्लब के प्रमुख सदस्य का दर्जा पा लिया है। कांग्रेस का विकल्प क्या है? यह विचारणीय प्रश्न है। जहां तक सत्ता पर काबिज होने का सवाल है, कभी भाजपा सत्ता में आ जाती है, आ भी सकती है, लेकिन सम्पूर्ण व्यवस्था को बदलने के लिए जिस विकल्प की बात सोची जाती है उसका धुंधला रूप ही दिखाई देता है। अभी उत्तर आधुनिक युग में जिस दौर से आर्थिक नीतियां चल रही हैं और एक ताकतवर वर्ग पैदा हो रहा है उसमें कांग्रेस के और अच्छे दिन आने के लक्षण दिख रहे हैं। लोकतंत्र में चुनाव में इधर-उधर, ऊपर-नीचे स्थिति बनती है, बिगड़ती है। कुछ सीटें कम ज्यादा होती रहती हैं और गठबंधन की जरूरत भी पड़ती है। लेकिन व्यवस्था में परिवर्तन नहीं हो जाता, उल्टे वह निरंतरता कायम रहती है। आज कांग्रेस की उदार आर्थिक नीति बुर्जुआ दल की निरंतरता का उदाहरण है।

...तो हम कभी नहीं ठिठकेंगे

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/14/2010 08:57:00 PM

देश अपने गणतंत्र के 60 वें वर्ष में अपने ही नागरिकों के खिलाफ छेड़े गए दर्जन भर से अधिक युद्धों, लगभग एक अघोषित आपातकाल, लाखों किसानी आत्महत्याओं और एक अदद इरोम शर्मीला के साथ दाखिल हो रहा ही. इरोम ने अपने अनशन के दस वर्षों में इस लोकतंत्र का रेशा-रेशा उजागर किया है, किसी अर्थशास्त्री, नेता, आन्दोलन, समाज विज्ञानी, ने नहीं किया है. इस शानदार प्रतिरोध पर शोमा चौधरी का यह शानदार आलेख, तहलका से साभार.


कभी-कभी हमें अपने जिद्दी और अड़ियल वर्तमान को ठीक से जानने के लिए अतीत में लौटना पड़ता है. इसलिए पहले एक फ्लैशबैक.
यह 2006 है. नवंबर में दिल्ली की एक आम-सी शाम. तभी एक रुक-रुककर आती धीमी आवाज आपकी चेतना को चीरती हुई चली जाती है. 'मैं कैसे समझाऊं? यह सजा नहीं, मेरा कर्तव्य है.. अपने दर्द के कारण धीमी मगर फिर भी अपनी नैतिकता में डूबी हुई ऐसी जादुई आवाज और ऐसे शब्द, जिन्हें आप कभी नहीं भूल सकते. 'मेरा कर्तव्य.' आर्थिक प्रगति के उत्साह में गले तक डूबे भारत में 'कर्तव्य' का भला क्या मतलब होगा?

आप कहीं दूर चले जाना चाहते हैं. आप व्यस्त हैं और उस आवाज में हिंसा का कोई संकेत भी नहीं है. लेकिन तभी एक चित्र बनने लगता है. अस्पताल के एक बिस्तर पर गोरे रंग की एक कमजोर औरत, बिखरे हुए काले बालोंवाला सिर, नाक में प्लास्टिक की एक ट्यूब, दुबले और साफ हाथ, दृढ़ और बादामी आंखें और रुक-रुक कर आती, कांपती आवाज, जो कर्तव्य की बात करती है.

उसी क्षण इरोम शर्मिला की पूरी कहानी हमारे भीतर पैठना शुरू करती है. आप किसी ऐतिहासिक इनसान के आस-पास हैं. ऐसा कोई, जिसका राजनीतिक विरोधों के इतिहास में पूरी दुनिया में कोई सानी नहीं है. फिर भी आप उसे भूल गए हैं. आपके पास सैकड़ों टीवी चैनल और  मीडिया का अपूर्व गौरवशाली दौर है, मगर फिर भी आप उसे भूल गए हैं.

2006 में इरोम शर्मिला ने पिछले छह साल से न ही कुछ खाया था और न ही पानी की एक बूंद तक पी थी. भारत सरकार उसकी नाक में एक ड्रिप लगाकर उसे जबर्दस्ती जीवित रख रही थी. छह साल से कोई ठोस पदार्थ उसके शरीर में नहीं गया था और पानी की एक भी बूंद ने उसके होठों को नहीं छुआ था. उसने बालों में कंघी करना तक बन्द कर रखा था. वह अपने दांतों को रुई से और होंठों को सूखी स्पिरिट से साफ करती थी, जिससे उसका उपवास न टूटे. उसका शरीर अंदर से खत्म होता जा रहा था. उसके मासिक चक्र बंद हो गए थे, परंतु उसका संकल्प नहीं टूटा था. जब भी उसका बस चलता था, वह नाक से ट्यूब निकाल फेंकती थी. वह कहती थी कि अपनी आवाज को 'उचित और शांत ढंग' से सुनाने के लिए यही उसका नैतिक कर्तव्य है.

फिर भी भारत सरकार और भारत के लोग उसके प्रति बेपरवाह थे.

वह तीन साल पहले था. बीते साल 5 नवंबर को इरोम शर्मिला ने अपने इस अभूतपूर्व उपवास के दसवें साल में प्रवेश किया, जो मणिपुर और अधिकांश पूर्वोत्तर पर 1980 से थोपे गए अफ्स्पा (सशस्त्न बल विशेष अधिकार अधिनियम) के विरोध में था. सिर्फ इस संदेह के आधार पर कि कोई व्यक्ति अपराध करने वाला है या कर चुका है, यह एक्ट सेना को बलप्रयोग, गिरफ्तारी और गोली मारने तक की छूट देता है. यह एक्ट सेना के किसी भी व्यक्ति के विरु द्ध केंद्र सरकार की अनुमति के बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया की अनुमति भी नहीं देता.

शब्दों में क्रूर दिखनेवाला यह कानून इरादों में और भी क्रूर है. आधिकारिक तौर पर इसके लागू किए जाने के बाद से सुरक्षा बलों ने मणिपुर में हजारों लोग मारे हैं. (2009 में ही सरकारी आंकड़ों में यह संख्या 265 है, जो मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक 300 से ऊपर है, जिसका अर्थ है- प्रतिदिन एक या दो ग़ैर कानूनी हत्याएं) विद्रोही संगठनों पर लगाम कसने के बजाय इस एक्ट ने आम आदमी में उबलता हुआ आक्रोश ही पैदा किया है और उससे नए उग्रवादी पनपे हैं. 1980 में जब यह कानून लागू हुआ, मणिपुर में केवल 4 विद्रोही संगठन थे. आज उनकी संख्या 40 है और मणिपुर मौत की घाटी जैसा बन गया है, जहां बेतहाशा भ्रष्टाचार है और उसके दस्ताने के अंदर पुलिस, उग्रवादियों और राजनीतिज्ञों के हाथ एक साथ हैं और निर्दोष नागरिक उस दस्ताने की गिरफ्त में हैं.

कुछ साल पहले एक सीडी सभ्य समाज के गलियारों तक पहुंची. इसमें सेना की अपमानजनक क्रूरता और जनता के रोष की फुटेज थीं. छोटे बच्चों, छात्रों, कामकाजी वर्ग की औरतों की तसवीरें थीं, जो सड़कों पर आ गए थे और आंसू गैस या गोलियों का निशाना बन रहे थे. ऐसी तसवीरें थीं, जिनमें आदमियों को नीचे जमीन पर लिटा दिया गया था और फौज उनके सिरों से बस कुछ इंच ऊपर गोलियां दाग रही थी. हर गुजरते दिन के साथ आते किस्से ग़ुस्सा बढ़ाते जा रहे थे. लड़के गायब हो रहे थे, औरतों के साथ बलात्कार किए जा रहे थे. मनुष्य की सबसे जरूरी चीज, उसके आत्मसम्मान को छील-छील कर उतारा जा रहा था.

युवा इरोम शर्मिला के लिए ये सब चीजें 2 नवंबर, 2000 को स्पष्ट हुईं. एक दिन पहले एक विद्रोही संगठन ने असम राइफल्स के एक दस्ते पर बम फेंका था, क्रोधित बटालियन ने मालोम बस स्टैंड पर दस बेकसूर लोगों को मार डाला. उन शवों की दिल दहला देनेवाली तसवीरें अगले दिन के स्थानीय अखबारों में छपीं, जिनमें एक 62 साल की औरत लिसेंगबम इबेतोमी और 18 साल की सिनम चंद्रमणि भी थी, जो 1988 में राष्ट्रपति से वीरता पुरस्कार ले चुकी थी. असामान्य रूप से बेचैन 28 साल की शर्मिला ने 4 नवंबर को अपना सत्याग्रह शुरू किया.

तीन साल पहले की नवंबर की उस सर्द शाम में हॉस्पिटल के एक बर्फ से सफेद गलियारे में पसर कर बैठे हुए शर्मिला के 48 वर्षीय भाई सिंहजीत ने कुछ हंस कर कहा था, 'हम यहां कैसे पहुंचे?' उस उदास प्रश्न की अनुगूंज में ही शर्मिला और उनके अद्भुत सफर की कहानी छिपी थी. उस कहानी के बड़े हिस्से को अपने अंदर झांक कर जानने की जरूरत है. ऐसा तनाव, तीव्रता और लगभग असंभव कल्पना का काम इतनी आसानी से नहीं दिखता. यह इंफाल की एक सुदूर झोंपड़ी में शुरू हुआ. राजधानी और राज्य की सारी शक्तियां उनके विरुद्ध लामबंद हो गईं. अस्पताल के उसके छोटे-से कमरे में उसके साथ बंद नर्स थी और बाहर भाई था, जिसके पास कपड़ों के अलावा कुछ भी नहीं था और जो न हिंदी बोल पाता था, न अंग्रेजी. दरवाजे पर तैनात पुलिसवाले भी थे.

'मेंघाओबी' अर्थात गोरी लड़की, जिस नाम से मणिपुर के लोग उसे पुकारते हैं, इंफाल के पशु चिकित्सालय में काम करनेवाले एक अनपढ़ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की सबसे छोटी बेटी थी. वह हमेशा से अकेले रहना पसंद करती थी, क्लास में सबसे पीछे बैठती थी और अच्छी श्रोता थी. उससे बड़े आठ भाई-बहन और थे. जब उसका जन्म हुआ, उसकी 44 वर्षीया मां इरोम सखी का दूध सूख चुका था. जब शाम ढलती थी और मणिपुर अंधेरे में डूबने लगता था, शर्मिला रोना शुरू कर देती थी. उसके सामने से हटने के लिए मां को पास की किराने की दुकान पर जाना पड़ता था, ताकि सिंहजीत अपनी छोटी बहन को गोद में लेकर पड़ोस की किसी मां के पास दूध पिलाने ले जा सके.

'इसकी इच्छाशक्ति हमेशा से असाधारण रही है. शायद इसीलिए वह सबसे अलग भी है,' सिंहजीत कहते हैं, 'शायद इस तरह यह उन सब मांओं के दूध का कर्ज चुका रही है.'

बगल में बैठे इस समझदार गंवई व्यक्ति की कहानी में एक तीखा-सा दर्द था- इस जंग को अपनी अदृश्य सांसें देता हुआ वफादार योद्धा, एक अधेड़ भाई, जिसने बाहर दरवाजे पर रह कर बहन की देखभाल करने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी, वह आदमी जो बुनाई से प्रतिदिन 120 रू कमानेवाली अपनी पत्नी पर निर्भर है, ताकि वह दृढ़ता से अपनी बहन के साथ खड़ा रह सके.

डेढ़ महीने पहले वह अपने दो साथियों बबलू लोइतेंगबम और कांग्लेपाल की मदद से शर्मिला को किसी तरह मणिपुर से बाहर निकाल लाने में सफल हो गया था. पिछले छह साल से वह पुलिस की निगरानी में इंफाल के जेएन हास्पिटल के एक छोटे-से कमरे में बंद थी. जब भी उसे रिहा किया जाता, वह अपनी नाक से ट्यूब निकाल फेंकती और अपना अनशन जारी रखती. तीन दिन बाद मरणासन्न हालत में उसे 'आत्महत्या के प्रयास के आरोप में फिर से गिरफ्तार कर लिया जाता और यह सिलसिला बार- बार दोहराया जाता. मगर मणिपुर में अनशन, गिरफ्तारी और उस ट्यूब के छह साल थोड़ा काम ही कर पाए थे. लड़ाई को दिल्ली में लाना ही था.

3 अक्तूबर, 2006 को दिल्ली पहुंच कर दोनों भाई-बहनों ने भारतीय लोकतंत्र की आशाओं से भरी वेदी जंतर-मंतर पर डेरा डाला. मीडिया को उनमें कोई रुचि नहीं थी. फिर एक रात पुलिस ने आकर उसे आत्महत्या के प्रयास के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और उसे एम्स में फेंक दिया गया. उसने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और गृहमंत्री को तीन भावुक चिट्ठियां लिखीं, लेकिन कोई जवाब नहीं आया. यदि उसने यह करने के बजाय किसी विमान का अपहरण कर लिया होता तो शायद उसकी बात कुछ जल्दी सुनी जाती.

सिंहजीत ने उस हास्पिटल के गलियारे में कहा था, 'हम अपनी लड़ाई के बीच में हैं. परेशानियां तो आएंगी ही मगर फिर भी हम आखिर तक लड़ेंगे, चाहे इसमें मेरी बहन की जान ही क्यों न चली जाये. लेकिन अगर उसने यह अनशन शुरू करने से पहले मुझे बता दिया होता तो मैं उसे खुद के साथ यह कभी न करने देता. पहले हमें बहुत सारी चीजें सीखनी चाहिए थीं. बात कैसे करनी है, समझौता कैसे करना है, पर हमें कुछ भी नहीं पता था. हम गरीब थे और कुछ भी नहीं जानते थे.'

लेकिन एक तरह से देखा जाए तो शर्मिला की कहानी की विनम्र कर देनेवाली शक्ति का मूल उसकी उसी बिना मार्गदर्शनवाली शुरुआत में है. वह कोई बड़ा राजनीतिक आंदोलन नहीं चला रही और अगर आप करिश्माई भाषणों और जोशीले नायकत्व की उम्मीद कर रहे हैं तो लेटी हुई यह शांत महिला आपको निराश ही करेगी. उस 34 वर्षीया स्त्री का सत्याग्रह कोई वैचारिक उपज नहीं था. अपने आस-पास मृत्यु और हिंसा के चक्र की प्रतिक्रिया में यह उसका नितांत मानवीय उत्तर था, अंदर से एक आध्यात्मिक संदेश जैसा.

शर्मिला ने अपनी कांपती लेकिन स्पष्ट आवाज में कहा था, 'पहले पन्ने पर मालोम के शव को देख कर मैं स्तब्ध थी. मैं एक शांति रैली में हिस्सा लेने जानेवाली थी, मगर मुझे लगा कि इस तरह सेना की हिंसा नहीं रोकी जा सकती. इसलिए मैंने अनशन पर बैठने का निश्चय किया.'

4 नवंबर, 2000 को शर्मिला की मां सखी ने उसे आशीर्वाद दिया था, 'तुम अपनी मंजिल पाओगी' और फिर वे तटस्थ भाव से पलट कर चली गई थीं.

उसके बाद चाहे शर्मिला इंफाल में अपनी मां से पैदल पहुंचने की दूरी पर ही कैद थी, वे कभी नहीं मिलीं.

दिल्ली की एक फिल्म-निर्मात्री कविता जोशी द्वारा बनाई गई एक फिल्म में सखी रोते हुए कहती हैं, 'क्या फायदा है? मेरा दिल बहुत कमजोर है. मैं उसे देखते ही रो पड़ूंगी. इसीलिए मैंने तय किया है कि जब तक उसकी बातें नहीं मानी जातीं, मैं उससे नहीं मिलूंगी, क्योंकि इससे उसका संकल्प कमजोर पड़ जाएगा. हमें खाना नहीं मिलता तो हम किस तरह बिस्तर पर करवटें बदलते रहते हैं और सो भी नहीं पाते. वे जो थोड़ा-सा द्रव उसके शरीर में डालते हैं, वह उसके सहारे किस तरह अपने दिन और रातें बिताती होगी. अगर पांच दिन के लिए भी यह कानून हटा लिया जाए तो मैं अपने हाथों से उसे एक-एक चम्मच करके चावल खिलाऊंगी. उसके बाद वह मर भी जाती है, तो भी हमें संतुष्टि रहेगी कि मेरी शर्मिला की इच्छा पूरी हुई.'

शर्मिला के लिए यह साहसी, निरक्षर औरत ही भगवान है. यही वह मंदिर है, जिससे शर्मिला को शक्ति मिलती है. यह पूछने पर कि मां से न मिल पाना उसके लिए कितना कष्टकारक है, वह उत्तर देती है, 'ज्यादा नहीं', और थोड़ा रुकती है, 'क्योंकि... मुझे नहीं पता कि मैं यह कैसे समझाऊं. पर हम सब यहां एक खास काम करने आए हैं और उसके लिए हम अकेले ही यहां आए हैं.'

अपने शरीर और दिमाग में संतुलन बनाए रखने के लिए वह दिन में चार-पांच घंटे योग करती है, जो उसने खुद से ही सीखा है. डाक्टर आपको बताएंगे कि शर्मिला का उपवास एक चमत्कार है. उसकी स्थिति का अनुमान लगाना ही आपको डरा देता है. लेकिन शर्मिला कभी किसी शारीरिक कष्ट की बात स्वीकार नहीं करती. वह मुस्कुरा कर कहती है, 'मैं ठीक हूं, मैं ठीक हूं. मैं अपने ऊपर कोई अत्याचार नहीं कर रही. यह सजा नहीं है, यह तो मेरा फर्ज है. मुझे नहीं पता कि भविष्य में मेरे साथ क्या होनेवाला है. वह तो ईश्वर की मर्जी है. मैंने अपने अनुभव से यही सीखा है कि नियमितता, अनुशासन और बहुत सारे उत्साह के साथ आप कुछ भी पा सकते हैं.' आप इन बातों को सुनी-सुनाई नीरस बातें कहकर खारिज कर सकते हैं, लेकिन जब वह बोल रही होती है तो यही बातें नायकत्व का चोला पहन लेती हैं.

उसके बाद तीन साल से कुछ नहीं बदला है. दिल्ली आने का भी कोई फायदा नहीं हुआ. अपने उपवास के दसवें साल में भी वह इंफाल हास्पिटल के एक गंदे से कमरे में किसी अदने अपराधी की तरह बंद है. यद्यपि इसका कोई कानूनी आधार नहीं है, फिर भी कभी-कभी अपने भाई के अलावा उसे किसी से भी मिलने की इजाजत नहीं है. यहां तक कि कुछ महीने पहले महाश्वेता देवी को भी उससे मिलने नहीं दिया गया. वह किसी के साथ और गांधी और मंडेला की जीवनियों लिए तरसती रहती है. उसका भाईचारे का भ्रम तथा महान और लगभग अमानवीय आशा का खजाना कभी उसका साथ नहीं छोड़ता.

लेकिन भाई की हताशा उतनी ही प्रबल है. शर्मिला के इस ऐतिहासिक सत्याग्रह की कद्र करने में देश की असफलता उस बेकद्री की एक झलक दिखाती है, जिसके चलते पूरा उत्तर-पूर्व नष्ट हो रहा है. जब 32 साल की मनोरमा देवी को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से संबंध रखने के आरोप में असम राइफल्स ने गिरफ्तार किया, तब अफ्स्पा के विरुद्ध शर्मिला के अनशन को चार साल हो चुके थे. एक दिन बाद इंफाल में मनोरमा का शव मिला था, जिस पर यातना और बलात्कार के भयानक निशान थे. मणिपुर उबल पड़ा था. पांच दिन बाद, 15 जुलाई, 2004 को मानवीय अभिव्यक्ति  की सब सीमाएं लांघते हुए 30 आम महिलाओं ने असम राइफल्स के मुख्यालय कांग्ला फोर्ट पर नग्न होकर प्रदर्शन किया था. जो बुरा होना बचा था, उसे पूरा करती आम मांएं और दादियां चिल्ला रही थीं, 'भारतीय सेना, हमारा बलात्कार करो.' उन सबको तीन महीने के लिए जेल के अंदर डाल दिया गया.

उसके बाद सरकार द्वारा गठित किए गए हर आयोग ने घावों को बढ़ाने का काम ही किया है. मनोरमा हत्याकांड के बाद गठित किए गए जस्टिस उपेंद्र आयोग की रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की गई. नवंबर, 2004 में प्रधानमंत्नी मनमोहन सिंह ने अफ्स्पा की समीक्षा के लिए जस्टिस जीवन रेड्डी समिति गठित की. उस समिति ने अफ्स्पा को खत्म करने की सिफारिश की और साथ ही उसकी सबसे क्रूर शक्तियों को ग़ैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) एक्ट में स्थानांतरित करने की सलाह दी. इस निष्कर्ष पर हर आधिकारिक प्रतिक्रिया इसे ग़लत ही ठहराती है. तब के रक्षा मंत्नी प्रणब मुखर्जी ने अफ्स्पा को वापस लेने या उसकी शक्तियों को कम करने की बात इस आधार पर खरिज कर दी थी कि 'अशांत इलाकों' में ऐसी शक्तियों के बिना सेना ठीक से काम नहीं कर सकती.

रोचक बात यह है कि शर्मिला के मुद्दे को रोशनी में आने के लिए शांति के लिए नोबल पुरस्कार विजेता, ईरान की शिरीन एबादी की 2006 की भारत यात्ना का इंतजार करना पड़ा. पत्रकारों के बीच वे उबलते हुए बोली थीं, 'यदि शर्मिला मरती है तो संसद इसकी सीधे तौर पर जिम्मेदार है. वह मरती है तो कार्यपालिका, प्रधानमंत्नी और राष्ट्रपति भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्होंने कुछ नहीं किया...अगर वह मरती है तो आप सब पत्रकार भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि आपने अपना फर्ज नहीं निभाया...'

फिर भी पिछले तीन साल में कुछ नहीं बदला है. 'मनोरमा मदर्स' के असीमित आक्रोश के बाद इंफाल के कुछ जिलों से अफ्स्पा हटाया गया, लेकिन वायरस ने अपनी जगह बदल ली. जहां आर्मी ने छोड़ा, वहां मणिपुर पुलिस के कमांडो आ गए. अफ्स्पा के अत्याचार शासन की संस्कृति में ही घुल गए हैं. इसे आप 'दंडविहीन संस्कृति' भी कह सकते हैं, जहां मानवाधिकारों के हनन पर कोई सजा नहीं है. इस साल 23 जुलाई को एक पूर्व विद्रोही नवयुवक संजीत को पुलिस ने इंफाल के व्यस्ततम बाजार में भीड़ के सामने दिन-दहाड़े गोली मार दी. पास खड़ी एक निर्दोष महिला राबिना देवी, जिसे पांच महीने का गर्भ था, के सिर में भी एक गोली लगी और वह भी वहीं मारी गई. उसके साथ उसका दो साल का बेटा रसेल भी था. कई लोग घायल हुए.

इस पूरे हत्याकांड की तसवीरें लेनेवाले अज्ञात फोटोग्राफर के लिए ये महज संख्याएं बनकर रह जातीं: पिछले साल हुई 265 हत्याओं में से सिर्फ दो, मगर इस बार तहलका में छपी ये तसवीरें सबूत थीं. मणिपुर फिर से उबल पड़ा.

चार महीने बाद भी लोगों का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ. लोगों की भावनाओं से बेपरवाह मुख्यमंत्नी इबोबी सिंह ने पहले तो बेशर्मी से बच निकलने की कोशिश की. संजित की हत्या के दिन उन्होंने विधानसभा में दावा किया कि उनकी पुलिस ने मुठभेड़ में एक उग्रवादी मारा है. बाद में तहलका के आलेख के सामने आने पर वे बोले कि उन्हें उनके अधिकारियों ने गुमराह किया है और अब वे न्यायिक जांच करवाने के लिए मजबूर थे. हालांकि मुख्यमंत्री और मणिपुर के डीजीपी जॉय कुमार, दोनों तहलका पर घटना को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप लगाते हैं.

अब भी थोड़ी-सी उम्मीद बाकी है. पिछले कुछ महीनों में राज्य में विरोध बढ़ा है और दर्जनों सामाजिक अधिकार कार्यकर्ताओं को निरंकुश राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत बहुत ओछे ढंग से गिरफ्तार किया गया है. इनमें एक प्रतिष्ठित पर्यावरण कार्यकर्ता जितेन युमनाम भी थे. 23 नवंबर को एक स्वतंत्न 'सिटिजंस फैक्ट फाइंडिंग टीम' ने 'लोकतंत्र से मुठभेड़: मणिपुर में अधिकारों का हनन' नाम की रिपोर्ट जारी की और गृह मंत्रालय को एक प्रेजेंटेशन दी. एक दिन बाद गृह सचिव गोपाल पिल्लै ने भूतपूर्व आइपीएस अधिकारी और फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य के.एस. सुब्रह्मण्यम को बताया कि मंत्रालय ने जितेन और दस अन्य लोगों का रासुका के तहत कारावास रद्द कर दिया है. एक और छोटी-सी आशा का संकेत यह है कि तहलका से एक साक्षात्कार में गृहमंत्नी पी चिदंबरम ने अफ्स्पा को अधिक मानवीय और जवाबदेह बनाने के लिए कुछ सुधारों की सिफारिश किए जाने के बारे में कहा है. इन सुधारों को अभी कैबिनेट का मंजूरी का इंतजार है.

उलझी हुई इस दुनिया में अक्सर किसी समस्या का समाधान एक अटल और प्रेरणादायक नेतृत्व में मिलता है. ऐसा नेतृत्व, जो अपने सामने आते प्रश्नों की नैतिकता को जगा सके और बिना किसी शर्त के उसे सही दिशा में सोचने को प्रेरित कर सके. शर्मिला का महान सत्याग्रह भी ऐसा ही एक नेतृत्व है. यह एक सच्चे और सभ्य समाज के विचार को फिर से आधार देता है. यह मृत्युपरक और संवेदनहीन क्रूरता के चेहरे पर क्रूरता का तमाचा मारने से इनकार कर देता है. उसकी याचना सीधी-सी है-सशस्त्न बल विशेष अधिकार अधिनियम को वापस लिया जाए. यह भारतीय गणराज्य के उस विचार में तो कहीं नहीं था, जिसे इसके संस्थापकों ने हमें वसीयत में दिया है. यह अमानवीय है.

यह सच है कि आज मणिपुर टूटा हुआ और हिंसक समाज है. मगर उसका हल दृढ़ और प्रेरक नेतृत्व में ही खोजा जा सकता है, जिसे निभाने की जिम्मेदारी अब सरकार की है. बाकी दर्शन छोड़कर नैतिकता का कानून लागू कीजिए. बाकी सब अपने आप सुलझ जाएगा.

लेकिन दुर्भाग्यवश, जब हम हिंसा की भयानक तारीख 26/11 की बरसी मनाना याद रखते हैं, हम उस औरत को भूल जाते हैं, जिसने असीम हिंसा का उत्तर असीम शांति से दिया.

यह हमारे समय का एक दृष्टांत है. यदि इरोम शर्मिला की कहानी हमें रुक कर कुछ सोचने पर मजबूर नहीं करती तो कोई भी चीज ऐसा नहीं कर सकेगी. यह असाधारण होने की कहानी है. असाधारण इच्छाशक्ति, असाधारण सादगी और असाधारण उम्मीदों की. सूचनाओं से भरे हुए इस व्यस्त समय में अपनी बात किसी को सुनवाना असंभव ही है, मगर यदि इरोम शर्मिला की कहानी सुन कर हम नहीं ठिठकते तो हम कभी नहीं ठिठकेंगे.'

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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