हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भारत में आदिवासी प्रश्न

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/06/2010 02:04:00 PM

'आदिवासी समेत प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के मुताबिक अपनी क्षमताओं को साकार करने, देश में आम समाज का हिस्सा बनने तथा सार्वभौमिक सभ्यता तक पहुंच बनाने के लिए सम्पूर्ण अवसरों की दरकार होती है। एक व्यक्ति की ऐसी प्रगति तभी संभव होगी, यदि आदिवासियों को महज तथाकथित ‘अधिसूचित क्षेत्रों’ में न रखा जाए और अरण्येर अधिकार के नाम पर बहलाया न जाए। हर आदिवासी बच्चे को उसके चुनाव के मुताबिक कवि, डॉक्टर, इंजीनियर, संगीतकार, डाकिया, फुटबॉल खिलाड़ी या अकाउंटेंट अथवा कोई भी अन्य पेशा चुनने में मदद की जानी चाहिए। इस लिहाज से संविधान की पांचवीं अनुसूची आदिवासियों के लिए संभावनाओं को बाधित करती है। भारत के आदिवासी विभाजित, बिखरे हुए और अनगिनत बोलियों के बोझ तले दबे हुए हैं। वे खुद में संवाद नहीं कर पा रहे और बाहरी दुनिया से भी परिचित नहीं हैं। उन्हें अंधा न बनाए रखें, प्लेटो के प्राचीन गुहांधकार में जकड़े न रखें।'  फ्रंटियर में प्रकाशित अपने इस लंबे लेख में रंजीत साउ ने कई सवाल उठाए हैं, देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे आदिवासियों के संघर्षों के आगे भी और इस देश की राजसत्ता के आगे भी. इनके जवाब भी शायद अपनी-अपनी तरह सामने आएंगे- आ रहे हैं. हम कोशिश करेंगे कि समय-समय पर उन जवाबों का जायजा भी लिया जाए.हिंदी अनुवाद समयांतर से साभार.


भारत में आदिवासी प्रश्न

दुनिया में लोकतंत्र का पहला फूल सैन्य आविष्कारों के साये में ग्रीस में खिला। हथियारों का विनिर्माण काफी आधुनिक हो चला था। अब राज्यों के पास छोटी फौजी टुकडिय़ों की जगह बड़ी सेनाओं को हथियारों से लैस करने की तकनीक आ चुकी थी। एक बार में हमला करने वाले पुराने जमाने के लड़ाकुओं की जगह राज्यों ने अब भारी-भरकम हथियारों से संपन्न सैन्य बलों को तैनात करना शुरू कर दिया था। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह भूस्वामी हो या किसान, जो खुद को इन हथियारों (होपला) से लैस करने की क्षमता रखता था, वह इस सैन्य टुकड़ी में शामिल हो सकता था। इस नई सेना ने एक नए किस्म की समानता को जन्म दिया।
होपला से लड़े जाने वाले युद्ध की खासियत कंधे से कंधा मिला कर सट कर खड़े होने वाले आठ फौजियों की एक कतार थी, जिसे फैलेंक्स कहते थे। हर सिपाही अपनी वृत्ताकार ढाल को अपनी बाईं ओर रक्षा के लिए रखता था और अपने बगल वाले सिपाही के दाएं कंधे को कस कर पकड़े रहता था। यह जन सेना थी, जिसमें नागरिक ही सैनिक बन चुके थे। होपला ने ग्रीस का रूपांतरण कर डाला और एक सुनियोजित तरीके से गढ़े गए लोकतंत्र की बुनियाद रखी। एक किसान जो अब फैलेंक्स की कतार में राजपरिवार के सदस्य के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ा होता था, राजशाही को देखने का उसका नजरिया अब बदल चुका था।
ईसा पूर्व 510 में एथेंस पर स्पार्टा का हमला हुआ। एक निरंकुश तानाशाह के पुत्र क्लीस्थेनीज के नेतृत्व में एथेंस की सेना ने आक्रमणकारियों को खदेड़ दिया और उसे सिटी मजिस्ट्रेट बना दिया। तीन साल के भीतर ही चौंकाने वाले सुधार लागू किए गए। क्लीस्थेनीज ने अनगिनत पारंपरिक जनजातियों को समाप्त कर के सभी को दस इकाइयों का सदस्य बना दिया और इस तरह एक जनजातीय शहर राज्य का रूप ले सका, जो धीरे-धीरे भूमध्य सागर के पूर्वी तट की सबसे समृद्ध सैन्य, वाणिज्यिक, कलात्मक और बौद्धिक ताकत बन कर उभरा। तकरीबन ऐसे ही सुधारों ने 2000 साल बाद भीतरी एशिया में मंगोलों के लिए कहीं ज्यादा चौंकाने वाले नतीजे दिए।
लोगों की विधायी परिषद के सदस्यों का चयन हर साल मध्य वर्ग के बीच में से होता था और एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में सिर्फ दो बार ही इस पद पर रह सकता था। इस तरह एक ही समय में अधिकतर किसान, शिल्पकार और व्यापारी परिषद के सदस्य होते और इस तरह उनके नागरिक होने की परिभाषा में बिल्कुल नया और सार्थक आयाम जुड़ गया था। अब तक आविष्कृत राजनीतिक प्रणालियों में यह सर्वाधिक समतापूर्ण प्रणाली थी जिसका असर ग्रीक जगत पर रूपांतरकारी था। दुनिया में लोकतंत्र का यह पहला संगठित स्वरूप था। और इसे किसने किया? एथेंस के उन आदिवासियों ने, वह भी आज से 2500 सदी से भी पहले।
आदिवासियों का इतिहास और उनका नृतत्वशास्त्र अधिकांशत: उन लेखकों द्वारा लिखा गया जो औपनिवेशिक शासकों की सेवा में नियुक्त थे। उन्होंने जनजातियों द्वारा किए गए कार्यों के विनाशक पहलुओं पर जोर दिया तथा व्यापार, खोज और राजनीतिक व सांस्कृतिक संस्थाओं में उनके योगदान की उपेक्षा करते हुए एक ऐसी तस्वीर खींची जो अधूरी और विकृत थी। परिणाम यह हुआ कि आदिवासी जीवन को लेकर आम धारणा आज भी काफी धुंधली और एकपक्षीय है। एक ओर आदर्श तो दूसरे सिरे पर भ्रष्ट।
आज भारत क्रांतिकारी बगावत की चुनौती को झेल रहा है जिसे माओवादी (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) या नक्सल (पश्चिम बंगाल में 1967 में नक्सलबाड़ी में शुरू हुए सशस्त्र संघर्ष से यह नाम आया है) सघर्ष कहा जाता है, जिसका केंद्र वे जंगल हैं जहां अधिकतर आदिवासी रहते हैं। यानी इस संघर्ष को मोटे तौर पर एक आदिवासी उभार मान लिया जाता है, जिससे दुनिया भर में आदिवासियों की दास्तानों का एक नया अध्याय खुलता है। यह अध्याय जमीन जीत लेने के किसी अभियान या उपनिवेश बनाने से नहीं जुड़ा है, बल्कि यह राजनीतिक सत्ता हथियाने और सामाजिक-आर्थिक न्याय सभी को दिलाने का एक महत्वाकांक्षी संघर्ष है।
इस आलेख में हम शुरुआत करेंगे उन आदिवासी समुदायों के वैश्विक परिदृश्य से, जो इस आधुनिक सभ्यता का मार्ग प्रशस्त करने में शामिल रहे हों। अगला परिदृश्य भारत के कुछ आदिवासी समुदायों द्वारा दिए गए योगदानों को दिखाता है, जिनमें कुछ ऐसे समुदाय हैं जो अब अलग-थलग पड़ गए हैं और जिन पर ‘आदिवासी’ होने का ठप्पा लगा दिया गया है। इस समग्र परिप्रेक्ष्य में ही हमें भारत के आदिवासी असंतोष से पैदा हो रही मौजूदा घटनाओं को देखना होगा। आगे क्या करना है, यह सवाल सरकार, जनता और नक्सल तीनों के लिए खुला है।


सभ्यता के निर्माता

अंग्रेजी में आने वाले शब्द ‘ट्राइब’ का मूल लैटिन का ‘ट्राइबस’ है जो रोमन राज्य में मूल त्रिपक्षीय जातीय विभाजन के लिए इस्तेमाल होता है। कई नृविज्ञानी इसका प्रयोग उन समाजों के लिए करते हैं जो मोटे तौर पर कुटुंब के आधार पर संगठित हुए। यहां भारत में सरकारी भाषा में एक आदिवासी समुदाय मूलत: प्रशासनिक और राजनीतिक अवधारणा है। इस अवधारणा में आदिवासी होने का सामाजिक और आर्थिक पक्ष गायब है।
आदिवासी समुदायों की प्रकृति को समझने के लिए हमने छह समुदायों के उदाहरण लिए हैं- योरोप से तीन-वाइकिंग, गोथ और वैंडल, एशिया से दो-स्काइथियन और मंगोल तथा अमेरिका से एक-संयुक्त राज्य अमेरिका के मूलवासी (नेटिव)। शुरुआती पांच कोटियां बेहद चतुर, विनाशक और वर्चस्व का प्रतीक रहीं जबकि आखिरी समुदाय बर्बर सत्ता और उत्पीडऩ का शिकार रहा। इनमें इतना अंतर आता कहां से है?
वाइकिंग: इंग्लैंड की स्थापना पांचवी ईसवीं में जर्मैनिक और स्कैंडिनेवियन आदिवासियों ने की। इसका नाम भी जर्मैनिक आदिवासी समुदाय एंगल्स पर पड़ा है। स्कैंडिनेविया के वाइकिंग खोजी, लड़ाकू, व्यापारी और समुद्री लुटेरे थे जिन्होंने आठवीं और ग्यारहवीं सदी के बीच योरोप के विशाल क्षेत्र का औपनिवेशीकरण कर डाला। उन्होंने उत्तरी अटलांटिक की यात्राएं कीं, उत्तरी अफ्रीका, पूर्वी रूस, कस्तुनतूनिया और मध्यपूर्व तक गए। वाइकिंग उत्तरी अमेरिका भी गए और वहां कनाडा में उन्होंने एक अल्पजीवी रिहाइश बनाई। वाइकिंग के वर्चस्व की तीन सदियों को इतिहास में वाइकिंग युग के नाम से याद किया जाता है। भौगोलिक स्तर पर वाइकिंग युग का संबंध सिर्फ स्कैंडिनेवियाई भूमि (यानी आधुनिक डेनमार्क, नॉर्वे और स्वीडन) से नहीं रहा, बल्कि उत्तरी जर्मनी के तहत आने वाले इलाकों से भी रहा।
वह इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, धर्म और समुद्री कलाओं का असर था जिसने वाइकिंग को उस दौर में विशिष्टता प्रदान की। स्कैंडिनेवियाई भूमि की कृषि उत्पादक क्षमता से कहीं ज्यादा वहां की आबादी हो गई थी। घर में युवाओं की बढ़ती तादाद के मद्देनजर समुद्र पार पैर फैलाना इन तटवर्ती लोगों के लिए अर्थ रखता था, चूंकि इनके पास बेहतर समुद्री तकनीकें मौजूद थीं।
पांचवीं सदी में रोमन साम्राज्य के पतन के बाद योरोप और शेष यूरेशिया के बीच व्यापार प्रभावित हुआ। सातवीं सदी में इस्लाम के उभार ने पश्चिमी योरोप के साथ व्यापार को प्रभावित किया। नए व्यापार मार्गों को खोलकर वाइकिंग समुदाय ने व्यावसायिक समेत कई तरीकों से खुद को लाभ पहुंचाया।
गोथ: गोथ और वैंडल वाइकिंग समुदाय के अग्रज कहे जा सकते हैं। इन्हें जर्मनी के जंगलों का बर्बर समुदाय माना जाता है। इन तीनों की जड़ें स्कैंडिनेविया में ही हैं। ये तीनों स्वीडन के उप्सल शहर में तीन देवताओं वाले एक ही मंदिर में अराधना करते थे। ये तीन देवता थे- युद्ध का देवता थोर, उर्वरता की देवी और गर्जन का देवता। यह एक ऐसा धर्म था जो लोगों और जलवायु के हिसाब से बना था। गोथ और वैंडल को अक्सर इतिहासकार लड़ाइयों में उनकी बर्बरता के लिए ही याद करते हैं बजाय बाद में रोमन साम्राज्य को बनाए रखने में उनकी भूमिका या फिर उत्तरी अफ्रीका के उनके दीर्घजीवी साम्राज्यों के चलते।
गोथों ने 262 ईसवी में रोमन साम्राज्य पर पहला बड़ा हमला किया था, लेकिन 271 तक उनकी हार हुई। जो बच गए वे इसी साम्राज्य का हिस्सा बन गए और कई रोमन सेना में चले गए। एक बार फिर गोथ राष्ट्रीयता का उभार हुआ और उसने एशिया माइनर, ग्रीस और इटली पर हमला कर उन्हें लूट लिया। उन्होंने 410 ईसवीं में रोम पर हमला किया और तकरीबन समूचे आईबेरियन पेनिनसुला पर उनका शासन कायम हो गया। आखिरकार, 711 ईसवी में मुस्लिम उमय्याग के आक्रमण के सामने वे हार गए।
वैंडल: पांचवीं सदी के उत्तराद्र्ध में वैंडलों ने रोमन साम्राज्य में प्रवेश किया और 455 ईसवी में रोम को लूट लिया। भले ही, उनकी लूट पुराने आक्रमणकारियों जितनी बड़ी नहीं थी, लेकिन आधुनिक लेखक इस घटना के लिए उन्हीं पर आरोप लगाते हैं। यहीं से अंग्रेजी में ‘वैंडलिज्म’ शब्द आया जिसका अर्थ विवेकहीन, तोड़-फोड़ और लूट है, खासकर कलाकृतियों पर हमला।
उत्तरी अफ्रीकी तट पर वैंडलों की फतह एक रणनीतिक कदम था, बिल्कुल विकिंग की तरह ताकि भूमध्य (मेडिटेरेनियन) पर हमला किया जा सके। उन्होंने भूमध्य को लूटने के लिए एक बेड़ा भी बनाया।
इन तीन जनजातियों का यह संक्षिप्त आख्यान दिखाता है कि दूसरों को प्रभावित करने वाली किसी परियोजना में कामयाबी के लिए एक निश्चित किस्म की सहूलियत और बेहतर क्षमता की जरूरत होती है। वाइकिंग युग से काफी पहले सिर्फ तीन गतिविधियां ही केंद्र में थीं- व्यापार, समुद्री लूट और जमीन पर कब्जा। वाइकिंग द्वारा कम समय में की गई ज्यादा लूट संभव नहीं हो पाती, यदि स्कैंडिनेवियाई लोगों ने बेहतर जहाज नहीं बनाए होते। अटलांटिक की लंबी यात्राओं के लिए पहली शर्त तो यही थी कि जहाजी अपने अक्षांश को तय कर सकें। वाइकिंग के पास जो आधुनिक तकनीक थी, उससे वे साल भर के दौरान हर हफ्ते दिन के बीचों-बीच सूर्य के अक्षांश को माप सकते थे। ऐसी सूचना सिर्फ एक लकड़ी जैसे सामान्य उपकरण पर दर्ज की जाती जिस पर कुछ चिन्ह बने हुए होते और जहाजी इसके माध्यम से गंतव्य स्थान के अक्षांश की तुलना में अपने अक्षांश का अंदाजा लगा लेता। दिन के मध्य में सूर्य का अक्षांश अथवा धु्रव तारे की स्थिति या फिर दोपहर में पडऩे वाली परछाई के माप और क्षितिज रेखा के ऊपर तारे की ऊंचाई का माप जिसे अंगूठे, बित्ते या हाथ से नापा जाता – यह सभी अक्षांश का एक मोटा अंदाज दे देते थे जो कि पश्चिम की यात्राओं में देशांतर के मुकाबले कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था।
स्काइथियन: स्काइथियन घोड़ा चलाने वाले बंजारे थे, एक प्राचीन ईरानी (फारसी) आदिवासियों का समूह थे जो ककेशस से आए थे। एशियाई लोग उन्हें शक के नाम से जानते थे। भारत में आज दो किस्म के कैलेंडर चलते हैं। एक बीसी/एडी वाला परिचित ग्रेगोरियन कैलेंडर और दूसरा शक सम्वत् वाला कैलेंडर जो शक साम्राज्य पर आधारित है जिसकी शुरुआत भारत में 78 ईसवी से मानी जाती है। भारतीय ग्रंथों रामायण, महाभारत आदि में शकों के कई संदर्भ हैं।
शक समुदाय के लोग छोटे-छोटे रजवाड़ों में बंट गए थे जैसे छत्रप इत्यादि, और धीरे-धीरे वे भारतीय समाज का हिस्सा हो गए और इस पर अपनी छाप छोड़ी। उत्तर पश्चिम भारत में शक राजा रूद्रदमन ने संभवत: अशोक का अनुकरण कर धर्म को अपना लिया और अपने शिलालेखों पर उनके धर्मोपदेशों को भी सहर्ष जगह दी। इस क्षत्रप राजा ने शास्त्रोक्त संस्कृत की वापसी में बड़ी भूमिका निभाई और इस काम को उनकी स्मृति में लगे उस शिलालेख से प्रेरणा मिली जो प्राकृत, मगधी या पाली में नहीं थे, बल्कि जिन पर संस्कृत में लिखा था। जाहिर तौर पर क्षत्रप द्वारा संस्कृत का प्रयोग दरअसल स्थानीय शासक वर्ग में विदेशी मूल के शासक के प्रति सद्भाव पैदा करना था ताकि ‘क्षत्रप यानी शक शासक के संदर्भ में राजा के चुनाव के विकल्प का खतरा खत्म किया जा सके।’ इसके बाद संस्कृत के शिलालेख सुमात्रा, जावा, इंडो-चीन और दक्षिण-पूर्वी एशिया के अन्य हिस्सों में जल्द ही स्वीकार्य हो गए। अभारतीय साम्राज्यों को भी इस प्रतिष्ठित भाषा को अपनाने से ख्याति और विशिष्टता प्राप्त हुई।
मंगोल: बंजर स्तेपी की सर्द हवाओं में पले-बढ़े चंगेज खान ने आरंभिक तेरहवीं सदी में मंगोल साम्राज्य की स्थापना की। प्राचीन ग्रीक इतिहास से अनभिज्ञ उसने मंगोलिया के बीहड़ों में उसी आदिवासी सुधार के मॉडल की एक अनुकृति रची, जो क्लीस्थेनीज के नेतृत्व में एथेंस में थी, जिसके बारे में बताया जा चुका है।
उसकी सेना ने सिर्फ 25 वर्षों में उतनी जमीन और लोगों पर फतह हासिल की जो काम चार सौ साल में रोमन कर पाए थे। जिन देशों में मंगोल फतह हुई, तकरीबन हर जगह उन्होंने सांस्कृतिक संचार में उन्नति की, व्यापार को विस्तार दिया और सभ्यता इन स्थानों में फली-फूली। अपने योरोपीय व एशियाई समकक्षों से कहीं ज्यादा प्रगतिशील चंगेज खान ने उत्पीडऩ को समाप्त किया, सार्वभौमिक धार्मिक स्वतंत्रता का आगाज किया तथा राजसी वैशिष्ट्य के सामंती ढांचे को तोड़ डाला। मंगोलिया में आत्यंतिक जनजातीय हिंसा के बीच पोषित चंगेज खान अपने पीछे आधुनिक सभ्यता के निर्माण की एक महागाथा को छोड़ गया।
संयुक्त राज्य अमेरिका में मूलवासी (नेटिव): 1995 में हुई अमेरिकी जनगणना में मूलवासी समुदायों ने खुद को नेटिव अमेरिकी कहे जाने के बजाय इंडियन या अमेरिकन इंडियन कहे जाने को तरजीह दी। उनके लिए इंडियन शब्द इंडिया से नहीं आता, बल्कि मूल स्पैनिश एन डियो से आता है जिसका अर्थ है ‘‘ईश्वर में’’। अमेरिका में 1513 में प्रवेश करने वाला पहला औपनिवेशिक स्पेन का एक अन्वेषी था।
1924 में नेटिव समुदाय को अमेरिकी नागरिकता नवाजी गई। 1975 में उन्हें आत्मनिर्णय का अधिकार दिया गया। आज देश के भीतर संघीय मान्यता प्राप्त 562 जनजातीय सरकारें हैं। इनके पास अपनी सरकार बनाने, कानून लागू करने (दीवानी और फौजदारी), कर लगाने, लाइसेंस देने और गतिविधियों को नियामित करने, आदिवासी क्षेत्रों से लोगों को अलग करने और क्षेत्र का निर्धारण करने के अधिकार हैं। स्वप्रशासन के अधिकारों पर वे ही बंदिशें लागू हैं जो अन्य प्रांतों पर हैं; मसलन, न तो जनजातियों को और न ही प्रांतों को यह अधिकार हैं कि वे युद्ध, विदेशी रिश्तों या मुद्रा (कागजी और सिक्के दोनों) जारी करने संबंधी गतिविधियों में संलग्न हों।
समाज में आदिवासियों के समावेश की रफ्तार धीमी रही है। अठारहवीं सदी में जॉर्ज वॉशिंगटन ने माना था कि नेटिव अन्य नागरिकों के समान हैं लेकिन वे निचले दर्जे के हैं और इसीलिए उन्हें आम समाज का हिस्सा बनाने के लिए उन्होंने आदिवासियों को ‘‘सभ्य’’ बनाने की वकालत की। अगली सदी में इनके बच्चों के लिए बोर्डिंग स्कूल खोले गए। लेकिन इन छात्रों के लिए यह अनुभव किसी सदमे से कम नहीं था, जहां उन्हें अपनी मूल भाषा बोलने की मनाही थी, ईसाइयत सिखाई जाती थी और अपने मूल धर्म का पालन करने पर रोक थी। इसके अलावा कई अन्य तरीकों से उन्हें उनकी मूलवासी अस्मिता को त्याग कर योरोपीय-अमेरिकी संस्कृति अपनाने को बाध्य किया जाता था।
एकल जातीय समूहों के बजाय नेटिव अमेरिकन सैकड़ों जातीय-भाषायी समूहों में बंटे हुए हैं। इनका सबसे बड़ा पेशा जुआ है। कई समुदायों के अपने कसीनो (जुआघर) हैं और इनके प्रभावों पर भी काफी चर्चा होती है। कुछ समुदायों का मानना है कि कसीनो जनजातीय संस्कृति को भीतर से खा रहे हैं।
नेटिव अमेरिकियों की आर्थिक स्थिति कमजोर है। सभी आंकड़ों में वे सबसे नीचे आते हैं। सभी अल्पसंख्यकों के बीच इनमें किशोरों की आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा है, किशोरियों की गर्भावस्था की दर सर्वाधिक है, हाई स्कूल ड्रॉप आउट दर भी सर्वाधिक है, प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है और बेरोजगारी की दर 50 से 90 फीसदी के बीच है।
हारवर्ड प्रोजेक्ट की एक रिपोर्ट में आदिवासियों की आर्थिक प्रगति में बाधाओं का जिक्र है। इस सूची में कुछ मुख्य कारण निम्न हैं: पूंजी तक पहुंच का अभाव, आदिवासी क्षेत्रों के विपन्न प्राकृतिक संसाधन, बाजारों से दूरी के कारण होने वाले नुकसान, परिवहन की उच्च लागत। इसमें आदिवासी संस्कृति भी शामिल है। शिक्षा और कारोबारी तजुर्बे की कमी आम तौर पर संभावित उद्यमियों की राह में बड़ी चुनौती बन कर उभरती है।
इस खंड में जिन छह किस्म के आदिवासियों की बात की गई है, वे अपने-अपने प्रयासों में कामयाबी के लिहाज से बिल्कुल जुदा हैं। हालांकि एक चीज इनमें समान है: आदिवासियों का निष्पक्ष और सच्चा इतिहास अब तक नहीं लिखा गया है। इन सभी उदाहरणों में अंतिम उदाहरण आगे के विश्लेषण से मेल खाता है। अमेरिकी इंडियन आदिवासी समुदाय और दक्षिण एशियाई इंडियन आदिवासी इतिहास के पन्नों में एक-दूसरे के रिश्तेदार जान पड़ते हैं। दोनों को ही दास बनने पर मजबूर किया गया, और दोनों ही मुख्यधारा के समाजों का हिस्सा अब तक नहीं बन सके हैं।


विश्लेषण का एक मॉडल

वैदिक युग ने कृषि युग का मार्ग प्रशस्त किया। पहली प्रमुख ग्रामीण रिहाइश राजकीय नियंत्रण में बसाई गई। चौथी सदी के उत्तराद्र्ध में चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य में चाणक्य (कौटिल्य) ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में आदिवासियों को संगठित करने की प्रक्रिया का जिक्र किया है कि कैसे उन्हें दास बनाकर खेती की जमीनों पर खटाया जाए। ‘‘राजकीय एजेंटों की सभी आदिवासी समुदायों तक पहुंच बनानी चाहिए; उनके बीच ईष्र्या, विद्वेष, विवाद आदि के संभावित स्रोतों की तलाश करनी चाहिए; और असहमति के बीजों को उनके बीच डालना चाहिए। समुदाय के भीतर उच्च पद पर बैठे लोगों को निचले पदों के लोगों के साथ एक साथ बैठकर खाना खाने या विवाह करने से हतोत्साहित किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, निचले दर्जे के आदिवासियों को बराबरी का दर्जा प्राप्त करने और विवाह करने की मांग करने के लिए उकसाया जाना चाहिए। परिवार और समुदाय के भीतर निचले दर्जे के लोगों को समानता की मांग करने के लिए उकसाया जाना चाहिए। सार्वजनिक फैसलों और आदिवासी परंपराओं को भंग करने की स्थिति में लाया जाना चाहिए।’’
प्राचीन भारत में आदिवासियों के इस अमानवीय दोहन का यह अध्याय उनके अमेरिकी समकक्षों के साथ दो सदी बाद हुए व्यवहार से मेल खाता है। उन्नीसवीं सदी में अमेरिका का पश्चिमी विस्तार इतने बड़े पैमाने पर हुआ कि नेटिव अमेरिकीयों को पश्चिम में जाकर बसना पड़ा। ऐसा अक्सर बल प्रयोग से किया जाता, हालांकि वे इसके विरोधी थे। 1830 में आए इंडियन रिमूवल एक्ट के तहत कम से कम एक लाख नेटिव अमेरिकियों को पश्चिम में बसाया गया जिसके कारण दसियों हजार की मौत हो गई।
भारत में अगला कदम जाति प्रथा को लागू कर आदिवासियों को हमेशा के लिए परित्यक्त कर देना था। समाज के निचले तबके यानी अनुसूचित जाति और समाज के बाहर की जाति यानी आदिवासियों का एक संक्षिप्त इतिहास निम्न है:
गुप्तकाल के दौरान (300-500 ईसवी) शांति और व्यापार में तेजी के चलते ग्रामीण रिहाइशों में निजी उद्यम पनपने लगे थे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था उछाल पर थी। इस दौरान शहरी नवधनाढ्य वर्ग, जो कि भूमध्यसागरीय कोरल, महंगी शराबों, घरेलू दासों, मनोरंजन के साधनों तथा रोमन ग्रीक जगत की कला और शिल्प का शौकीन था उसने देश के विदेशी मुद्रा भंडारों को खत्म कर डाला। घरेलू व्यापार विनिमय के लिए मुद्रा यानी सिक्कों की कमी पड़ गई। इस समस्या को सुलझाने के लिए सत्ता ने हर गांव में जाति संतुलित शिल्पकारों की अवधारणा लागू की जिससे वस्तु विनिमय संभव हो सके। हर गांव में उसकी जरूरत के मुताबिक लोहार, बढ़ई, कुम्हार और अन्य शिल्पकार एक निश्चित संख्या में दिए जाते जिनकी कुल अधिकतम संख्या 12 थी। प्रत्येक शिल्पकार को किसानों से फसल का एक निश्चित हिस्सा मिलता। इस तरह हर गांव आत्मनिर्भर हो गया, नगद मुक्त हो गया तथा दूसरे गांवों और बाहरी दुनिया से कट गया। इसका नतीजा यह हुआ कि गांवों में जाति व्यवस्था बहुत सुदृढ़ हो गई। जाति के कट्टर नियमों के तहत अर्थव्यवस्था गतिरोध का शिकार हो गई और अतिरिक्त लोगों को काम दिलाने में अक्षम हो गई। नतीजतन, बेरोजगारी बहुत तेजी से बढ़ी। जातिगत समूहों ने शिल्पकलाओं में महारत हासिल करने से दूसरों को रोका। जाति के कारण कुछ ही लोग ये महीन काम कर पाते थे जैसे भेड़ से ऊन उतारना, चमड़े का काम करना इत्यादि जो कि सारे निचले दर्जे के पेशे थे। कुछ आदिवासी टोकरी बनाने लगे, हालांकि वे कपड़ा बुनना या कातना नहीं जानते थे। दूसरी ओर, सामाजिक ढांचे के चलते ऐसा कोई गांव नहीं था जो पूरी तरह लोहारों के गिल्ड या सिर्फ चर्मकारों को समर्थन देता हो। नतीजा यह हुआ कि जो लोग दुर्भाग्यवश बेरोजगार रह गए, वे जंगलों और पहाड़ों की ओर चले गए और तब से वे आदिवासी कहलाते हैं।
इतिहास तीन स्तरों पर चलता है: पहला, जो सनातन है यानी अपने प्राकृतिक वातावरण के सम्बन्ध में मनुष्य का इतिहास। दूसरा, वह पारंपरिक सामाजिक इतिहास है जो समूह या छोटे समूहों से बनता है। तीसरा इतिहास मनुष्य का न होकर विशिष्ट तौर पर किसी एक मनुष्य का होता है। दूसरे शब्दों में, इतिहास प्रकृति की ताकतों, समाज के ढांचे और व्यक्तियों की भूमिकाओं से गढ़ा जाता है। यह सूत्रीकरण फ्रेंच चिंतकों द्वारा दिया गया है जो मानते हैं कि यह मॉडल ही सम्पूर्ण इतिहास का मॉडल है। सम्पूर्ण इतिहास की संरचना में आदिवासियों के तुलनात्मक संदर्भों को बेहतर ढंग से व्यवस्थित किया जा सकता है। मसलन, भारत और अमेरिका के आदिवासियों में आंशिक समानता इसलिए है क्योंकि दोनों देशों में शासक वर्ग द्वारा जतलाए गए अधिकारों के संदर्भ में इनकी सामाजिक व्यवस्था और अनुक्रम तुलनात्मक रहे हैं। यदि योरोपीय औपनिवेशिक ताकतों ने अमेरिकी नेटिवों पर अपना धर्म थोपा, तो भारत में मौर्य साम्राज्य की राजसत्ता ने शाही गांवों के श्रमिकों शिविरों में रहने वाले आदिवासियों के साथ भी तकरीबन यही किया।
नक्सलियों और माओवादियों द्वारा प्रेरित आदिवासी विद्रोह आधिकारिक तौर पर भारतीय राज्य की सुरक्षा के लिए बड़ा और गंभीर आंतरिक खतरा बताया जा रहा है। बागियों ने राजसत्ता के खिलाफ अपना युद्ध घोषित कर दिया है।
आखिर, वे मौजूदा राजसत्ता की जगह क्या लेकर आएंगे; उनकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अवस्थिति कैसी होगी? यह सब कुछ गोपनीय है और मोटे तौर पर लोगों को नहीं पता। एक सशस्त्र अभियान जो सिर्फ नकारात्मकता की जमीन पर खड़ा हो और अपने सकारात्मक पहलुओं के प्रति चुप हो, उसकी सार्वजनिक विश्वसनीयता नहीं होती। हो सकता है कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती हो, लेकिन एक बार गोलियों की कमी पड़ जाए, तो वह हाथ से चली भी जा सकती है। मनुष्य का अस्तित्व सिर्फ राजनीतिक नहीं है।
नक्सलियों को काबू में करने के लिए सरकार और विशेषज्ञ दोनों ही दोतरफा रणनीति की बात कर रहे हैं- जंगलमहाल में पंचायत राज और विकास। पंचायत कानून (पेसा) जैसे ‘ऐतिहासिक क्रांतिकारी आदिवासी समर्थक कानून का उद्देश्य लोकतंत्र की ताजा बयार को लाना था ताकि आदिवासियों की भागीदारी सक्रिय और उत्साहजनक हो। इसके उलट सत्ता व सभ्यता के केन्द्रों से दूर जंगलों में मूलवासियों के झोपड़े अब भी बस टिमटिमा रहे हैं।
लेकिन, नेटिव अमेरिकियों का रिकॉर्ड ऐसा नहीं है। उन्हें तो आत्मनिर्णय का अधिकार भी दे दिया गया था तथा वे सारे अधिकार भी जो न्यूयॉर्क और कैलिफोर्निया जैसे संघीय राज्यों के पास हैं। भारी राजनीतिक जनादेश के बावजूद आदिवासी समुदाय सुदूर अलग-थलग और बंद रिहाइशों में रह रहे हैं और उनके पास बाजार, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और सबसे बढक़र सार्वभौमिक सभ्यता का हिस्सा होने की गुंजाइश की कमी है।
इस संदर्भ में विकास का क्या अर्थ बनता है? सरकारी परियोजनाओं की फेहरिस्त में विकास को सडक़ों के निर्माण, ट्यूबवेल, स्कूल, अस्पताल आदि बनवाने से मापा जाता है- और ये सारी चीजें दरअसल, ‘इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या’ से निकलकर आती हैं, ऐसी व्याख्या जो मनुष्य को एक व्यक्ति नहीं मानती, चूंकि वह सम्पूर्ण इतिहास की संरचना में तीसरा तत्व होता है।
योरोप में 15वीं शताब्दी का पुनर्जागरण दरअसल, व्यक्ति की अवधारणा का चरमोत्कर्ष था: ‘अपने बारे में एक व्यक्ति के रूप में बुनियादी तौर पर विचार करने की सार्वभौमिक क्षमता का विकास’, जो कि किसी परिवार, समूह, कुटुंब या समुदाय का महज सदस्य होने से विशिष्ट है। अब एक व्यक्ति को इंसानियत द्वारा तय की गई तमाम मंजिलों के एक प्रतिनिधि केंद्र के रूप में देखा गया, ‘मनुष्य द्वारा अपनी संप्रभु क्षमता से सचेतन होने के बाद से मस्तिष्क के भीतर सोचे गए हर कुछ और किए गए हर कुछ की एकता का एक बिंदु।’ यह मनुष्य की प्रकृति की एक स्थिर अवधारणा थी जो अतीतोन्मुख थी। उन्नीसवीं सदी आते-आते मनुष्य की एक गतिशील अवधारणा उभरी: ‘मनुष्य एक अनिवार्य प्रस्थान बिंदु नहीं, बल्कि गंतव्य बिंदु है और वह अंतर्भूत गुणों का समुच्चय कम है, बल्कि एक कभी न पूरी होने वाली प्रक्रिया का लक्ष्य है।’ ‘यदि मानवीय स्थिति’ नाम की कोई चीज होती है, तो वह कभी न चुकने वाली स्थिति है। मनुष्य एक सनातन और अपरिवर्तनीय इकाई नहीं है, बल्कि वह परिवर्तन का संकेत है, निरंतर रूपांतरण का एक स्थल है। मनुष्य की प्रगति की प्रक्रिया अंतहीन है। एक ‘व्यक्ति’ इस सनातन गति का वाहक होता है, उस महान नैरंतर्य के मनुष्य में रूपांतरित होने का स्थल, जो सम्मान और प्रतिष्ठा के योग्य हो।
आदिवासी समेत प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के मुताबिक अपनी क्षमताओं को साकार करने, देश में आम समाज का हिस्सा बनने तथा सार्वभौमिक सभ्यता तक पहुंच बनाने के लिए सम्पूर्ण अवसरों की दरकार होती है। एक व्यक्ति की ऐसी प्रगति तभी संभव होगी, यदि आदिवासियों को महज तथाकथित ‘अधिसूचित क्षेत्रों’ में न रखा जाए और अरण्येर अधिकार के नाम पर बहलाया न जाए।
हर आदिवासी बच्चे को उसके चुनाव के मुताबिक कवि, डॉक्टर, इंजीनियर, संगीतकार, डाकिया, फुटबॉल खिलाड़ी या अकाउंटेंट अथवा कोई भी अन्य पेशा चुनने में मदद की जानी चाहिए। इस लिहाज से संविधान की पांचवीं अनुसूची आदिवासियों के लिए संभावनाओं को बाधित करती है। भारत के आदिवासी विभाजित, बिखरे हुए और अनगिनत बोलियों के बोझ तले दबे हुए हैं। वे खुद में संवाद नहीं कर पा रहे और बाहरी दुनिया से भी परिचित नहीं हैं। उन्हें अंधा न बनाए रखें, प्लेटो के प्राचीन गुहांधकार में जकड़े न रखें।

अनुवाद: अभिषेक श्रीवास्तव

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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