हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

हिंदी समुदाय, नवजागरण और राष्ट्रवाद

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/04/2010 10:33:00 PM

राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय - 3  
 
हिंदी समुदाय, नवजागरण और राष्ट्रवाद के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान खींचनेवाले इस लंबे लेख की तीसरी  और आखिरी किस्त पोस्ट करते हुए हाशिया अभी राष्ट्रीय और औपनिवेशिक संस्कृति पर जारी बहस में भी शामिल हो रहा है. आगे हम इस बहस से जुड़ी कुछ और सामग्री भी पोस्ट करेंगे और इसी के साथ अपना नजरिया भी पेश करेंगे. फिलहाल यह लेख, हंस से साभार.
दूसरी किस्त


प्रसन्न कुमार चौधरी

हिंदुत्व की वैचारिक धारा की उपस्थिति ने एक ओर मुस्लिम लीग के पृथक पाकिस्तान की मांग को बल प्रदान किया, और दूसरी ओर, संभवतः बाबासाहब द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने की प्रक्रिया को भी गति प्रदान की होगी. नागपुर इस हिंदुत्व का मुख्यालय था और महाराष्ट्र उसकी मुख्य कर्मभूमि. 1950 ई में मुंबई में हिंदू कोड बिल के पक्ष में बाबासाहब के नेतृत्व में चले जन-आंदोलन का (जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं ने शिरकत की थी) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उग्र विरोध किया था. आरंभ में हिंदी-भाषी क्षेत्रों में भी आरएसएस ने नागपुर से ही संगठक भेजे थे. नागपुर में ही बाबासाहब ने समारोहपूर्वक अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। जिन प्रदेशें में हिन्दुत्व की विचारधारा और उससे जुड़े संगठनों का प्रभाव काफी सीमित था, वहां बाबासाहब के प्रति पर्याप्त सम्मान के बावजूद धर्मांतरण की घटनाएं भी न के बराबर हुईं.
    महात्मा और बाबासाहब दोनों हिंदुत्व के विचारकों के निशाने पर रहे. इसे आप यूरोपीय आधुनिकता के भारतीयता पर प्रभाव के रूप में देख सकते हैं। इस आधुनिकता ने बाह्‌य और अंदरूनी तौर पर भारत को विभाजित करने का ही काम किया है.

हिंदी समुदाय
इतिहास मे बोलियां और भाषाएं दो स्वरूपों में सामने आती हैं. एक, 'जनों के अंदरूनी' संवाद के माध्यम के रूप में और दूसरा, 'जनों के बीच' संवाद के माध्यम के रूप में. एक 'जनों की अपनी-अपनी बोलियों अथवा भाषाओं' के रूप में, दूसरा 'जनों के बीच संपर्क बोली अथवा भाषा' के रूप में.
    प्राचीन काल से ही, जीविकोपार्जन के लिहाज से समृद्ध भौगोलिक क्षेत्रों में धीरे-धीरे अनेक जन आकर बसने लगते थे. इन जनों के बीच स्वभावतः विभिन्न स्तरों पर संबंध भी विकसित होते. इन जनों की अपनी-अपनी बोलियां (अथवा भाषाएं) तो होती ही थीं, तथापि एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में अनेक जनों के साथ-साथ रहने और उनके बीच अनेक स्तर पर विकसित संबंधों के कारण एक 'संपर्क' बोली (अथवा भाषा) का भी विकास होता.
    इन संपर्क बोलियों/भाषाओं के विकास का कोई एक नियम नहीं है. कभी किसी प्रभावशाली जन की बोली और भाषा ही यह भूमिका निभाने लगती. किसी-किसी अन्य मामले में इन बोलियों/भाषाओं के मेल से कालक्रम में एक नई बोली अथवा भाषा संपर्क बोली अथवा भाषा के रूप में विकसित होती. प्राचीन समाज में इस तरह की बोलियां/भाषाओं का विकास शताब्दियों में घटित होता.
    आज से करीब दस हजार से आठ हजार साल पहले, लगभग दो हजार वर्षों तक, वर्तमान सहारा रेगिस्तान के दक्षिणी क्षेत्र में (जो अटलांटिक महासागर से नील नदी तक फैला था) पुरातत्वविद डॉ. जेईज सटन के अनुसार, एक समृद्ध 'जल पाषाण' संस्कृति (अक्वालिथिक कल्चर) फलती-फूलती रही थी. इस क्षेत्र में तब कई बड़ी-बड़ी नदियां थीं, ताल थे और दलदली जमीन थी. जलस्रोतों से समृद्ध इस क्षेत्र में विकसित संस्कृति ने तब आस-पास के जनों को भी आकर्षित करना शुरू किया. जाहिर है, इन जनों के बीच अवश्य कोई संपर्क बोली/भाषा विकसित हुई होगी. वर्तमान समय में इन क्षेत्रों तथा आस-पड़ोस के देशों की भाषाओं की गहन छानबीन के बाद भाषाविद जेएच ग्रीनबर्ग ने जो निष्कर्ष निकाले ('लैंग्वेजेज ऑफ अफ्रीका,' 1963,) उस आधार पर सटन उन जनों की बोली को 'नाइलो-सहारन' वृहत भाषा-परिवार जोड़ते हैं. ग्रीनबर्ग वर्तमान में उस वृहत भाषा परिवार का संबंध 'चारी-नाइल' भाषा परिवार से बताते हैं. पूर्वी सूडानी, मध्य सूडानी और कुछ अन्य लघु भाषाएं इस 'चारि-नाइल' भाषा परिवार की ही शाखाएं हैं. करीब हजार वर्षों तक फलने-फूलने के बाद यह संस्कृति जल स्रोतों के छीजने अथवा सूखने के कारण बिखर गई और संभवतः (एशिया की ओर) उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों की नव पाषाणकालीन (नियोलिथिक) संस्कृतियों से जा मिलीं. (जेइजी सटन, 'दि अफ्रीकन अक्वालिथिक', 'एंटीक्विटी', मार्च, 1977.)
    मध्यकाल में दांते की 'डिवाइन कॉमेंडी' और 'इनफर्नो' के कारण 'फ्लोरेंटाइन' बोली को असाधारण सांस्कृतिक प्रतिष्ठा हासिल थी (फ्लोरेंस नवजागरण का केंद्र भी था). इसी फ्लोरेंटाइन बोली से इतालवी भाषा का विकास हुआ. तथापि, इटली के राजनीतिक एकीकरण के समय (1861ई.) में आबादी की मात्र ढाई फीसदी ही इतालवी भाषी थी.
    अमेरिका की उपनिवेशीकरण के क्रम में यूरोप के कई देशों के लोग वहां जाकर बसे. उनकी भाषाएं भिन्न-भिन्न थीं. लेकिन एंग्लो-सैक्सनों के वर्चस्व के कारण अमेरिकन इंगलिश संयुक्त राज्य अमेरिका की भाषा बन गई इन संपर्क बोलियों/भाषाओं के विघटन की भी कोई एक प्रक्रिया नहीं रही है. इतिहास में इन बोलियों/भाषाओं के विघटन के जो कुछ उदाहरण मिलते हैं, उनका यहां संक्षिप्त रूप से जिक्र किया जा सकता है. जिन कारणों से विभिन्न जन एक भौगोलिक क्षेत्र में जमा होने लगते थे, उन्हीं कारणों की अनुपस्थिति (खासकर जलवायु परिवर्तन, अथवा संबंधित भौगोलिक क्षेत्र में शताब्दियों के उपयोग के बाद जीविकोपार्जन के स्रोतों के क्षरण, आदि) के फलस्वरूप जनों का दूसरे-दूसरे क्षेत्रों में स्थानांतरण भी घटित होता था. ऐसी स्थिति में संबंधित जनों के बीच प्रचलित हो चुकी संपर्क बोली अथवा भाषा विभिन्न क्षेत्रों/प्रदेशों की क्षेत्रीय/प्रादेशिक बोलियों अथवा भाषाओं का (अपनी-अपनी क्षेत्रीय विशिष्टताओं के साथ) रूप ले लेतीं.
    कुछ संपर्क भाषाएं मानकीकरण के क्रम में क्रमशः परिशुद्ध होते हुए मानक भाषा का रूप ले लेती हैं. जनपदीय/प्रादेशिक भाषाओं की तुलना में संपर्क भाषाएं स्वभाव से ही अधिक नमनीय होती हैं-उच्चारण तथा व्याकरण में नमनीयता के साथ-साथ उनमें नए-नए शब्दों को ग्रहण करने की क्षमता तुलनात्मक रूप से अधिक होती है. जिन जनपदीय/प्रदेशिक भाषाओं के बीच वे संपर्क भाषा की भूमिका निभातीं उन भाषाओं का अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र उनका 'कैचमेंट एरिया' (शब्द ग्रहण क्षेत्र) होता. एक सीमा तक 'भ्रष्ट' होने की अंतर्निहित क्षमता हर संपर्क भाषा की विशिष्ट लाक्षणिकता रही है. शुद्धिकरण तथा मानकीकरण के क्रम में उनकी यह क्षमता निरंतर संकुचित होती जाती है और इस प्रक्रिया में उनका जन संपर्क भी क्षीण होता जाता है-वह विशिष्ट 'जनों' की विशिष्ट भाषा बनकर रह जाती है. सबसे शुद्ध और मानक भाषा अंततः एक मृत भाषा बनकर रह जाती है. तथापि इन मृत भाषाओं का भी इतिहास में अपना महत्वपूर्ण स्थान है. यह विभिन्न बोलियों और भाषाओं की पृष्ठभूमि तथा परिप्रेक्ष्य, और उनके बीच फर्क को रेखंकित करने की समझ हासिल करने में अनिवार्य संदर्भ का काम करती हैं. यथार्थ में इन शुद्ध और मानक भाषाओं का उद्‌भव जनबोलियों तथा भाषाओं से ही होता है, लेकिन हमारी चेतना में प्रायः यह उलट रूप में ('मिरर इमेज' के रूप में) अभिव्यक्त होता है. हमें लगता है कि बोलियों और भाषाओं का विकास इन्हीं (प्लेटो के 'आइडियल्स' की श्रेणी की भांति) शुद्ध मानक भाषाओं से हुआ है-जनों की बोलियां और भाषाएं इन शुद्ध मानक भाषाओं का स्खलन लगती हैं.
    संपर्क भाषाओं की एक और परिणति राजभाषाओं के रूप में देखी जा सकती है. इतिहास में राजकाज में अमूमन आम जन से दूरी बनाकर रखी जाती है-राजसत्ता जनता से ऊपर की एक सत्ता के रूप में उपस्थित होती है, जनसंपर्कों से उसकी कथित 'निष्पक्षता' और शासन के लिए 'जरूरी भयोत्पादक रुतबा तथा दबदबा' खंडित होता है. अपारदर्शिता, गोपनीयता और रहस्यमयता राजकर्म की विशेषताएं रही हैं. राजभाषा बनने के बाद संपर्क भाषा की भी जनता से दूरी बढ़ती जाती है, शासन कार्य के अनुरूप उसका भी मानकीकरण होने लगता है और वह नौकरशाही की भाषा के रूप में एक रहस्यमय दुरूहता का वरण करने लगती है. अपनी भाषा होते हुए भी आम जन राजभाषा को एक अबूझ, पराई, रहस्यमयी कूट भाषा के रूप में देखने लगती हैं, जिस पर उनके रोजमर्रे के जीवन का कितना-कुछ निर्भर करता है. राज का रहस्य एक रहस्यमय भाषा में अपनी अभिव्यक्ति पाता है और यह भाषा शासन के लिए जरूरी 'भयोत्पादक रुतबे तथा दबदबे' का माध्यम बन जाती है. जनतांत्रिक शासन के दौर में भी राजभाषा की दुरूह पारिभाषिक-तकनीकी शब्दावली का कारण राजकाज की उसी परंपरा में निहित है.
    कुछ संपर्क भाषाएं आबादी के स्थानांतरण की स्थिति में स्वतः खत्म हो जाती हैं. लुप्त हो जाने के बाद विभिन्न भाषाओं में उनके अवशेषों से हम उस संपर्क भाषा की कुछ रूपरेखा का पता लगा सकते हैं.
    कुल मिलाकर, संपर्क भाषाओं की कमोवेश यही चार परिणतियां इतिहास में देखने को मिलती हैं. अनेक संपर्क भाषाएं इन सारी प्रक्रियाओं से गुजरी हैं.
    आदि संस्कृत, आदि द्रविड़, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, उर्दू (खासकर पश्चिमोत्तर भारत में) और हिंदी-ये सब संपर्क भाषाएं ही रही हैं. एक संपर्क भाषा के रूप में पूर्वी और उत्तर भारत के विशाल भूभाग की अनेक जनपदीय भाषाओं तथा बोलियों के साथ हिंदी का कोई विरोध नहीं है. वह (हिंदी) तो अपने अस्तित्व कि लिए इन्हीं पर निर्भर है. जनपदीय भाषाएं और बोलियां हैं, तब ही तो उनके बीच संपर्क भाषा के रूप में हिंदी है. हिंदी का यह संपर्क भाषा वाला स्वरूप उसे भारत की अन्य प्रादेशिक भाषाओं से पृथक करता है. सवाल यह बिल्कुल नहीं है कि हिंदी श्रेष्ठ है और अन्य प्रादेशिक भाषाएं निम्न. सारी प्रादेशिक भाषाएं काफी समृद्ध हैं. सवाल भाषा के दो भिन्न स्वरूप का है. इसलिए प्रादेशिक भाषाओं से निर्मित प्रादेशिक अस्मिताओं के तुलना हिंदी के साथ नहीं की जा सकती. एक संपर्क भाषा के रूप में हिंदी अनेक जनपदीय अस्मिताओं (मैथिली, मगही, भोजपुरी, अवधी, बुंदेली, ब्रज, मालवाई, छत्तीसगढ़ी, आदि) की वाहक भाषा है. हाल के दशकों में अंतरक्षेत्रीय संबंधों के प्रसार के कारण महानगरों तथा शहरों के कुछ घरों में हिंदी जरूर बोली जाने लगी है, लेकिन तब भी हिंदी क्षेत्र के लगभग शत-प्रतिशत घरों में लोग अपनी-अपनी जनपदीय भाषाओं और बोलियों में ही बातचीत करते हैं. 'यह कहीं नहीं और हर कहीं बोली जाती है.' यह बात अन्य प्रादेशिक भाषाओं पर लागू नहीं होती. कारण हिंदी का संपर्क भाषा वाला स्वरूप है.
    इन जनपदों का इतिहास हिंदी की तुलना में काफी पुराना है और यह इन जनपदीय लोगों की स्मृति में अब भी सुरक्षित है. इन जनपदों की अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत रही है. हिंदी से जुड़ी इन जनपदीय भाषाओं का संबंध भी किसी एक भाषा-परिवार से नहीं, बल्कि अलग-अलग भाषा-परिवारों से रहा है. राजस्थानी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली का संबंध शौरसेनी अपभ्रंश और शौरसेनी प्राकृत से रहा है, तो अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी, आदि का अर्ध-मागधीप्राकृत से. बिहार की जनपदीय भाषाओं (मैथिली, मगही, भोजपुरी, अंगिका, वज्जिका) का नाता मागधी अपभ्रंश तथा मागधी प्राकृत से जुड़ता है. झारखंड में बोली जाने वाली खोरठा, नागपुरिया, पंचपरगनिया के साथ भी यह बात है. एक-एक जनपद की आबादी यूरोप के अधिकांश देशों से प्रायः ज्यादा ही है और कहीं-कहीं बराबर. हिंदी को उनकी जनपदीय अस्मिता का सम्मान करना चाहिए और उनकी वाजिब मांगों का (मसलन प्राथमिक शिक्षा जनपदीय भाषाओं में देने की मांग का) समर्थन करना चाहिए. जनपदीय अस्मिताएं कहीं-कहीं प्रादेशिक पुनर्गठन की मांगों में भी प्रकट हो सकती हैं. ऐसा होने पर भी यह हिंदी के लिए कतई नुकसानदेह नहीं. यह सकारात्मक बात है कि संबंधित प्रदेशों की विधानसभाओं ने खुद अपने बंटवारे का प्रस्ताव पारित किया.
    हिंदी के प्रसार में जैसे बॉलीवुड और मनोरंजन उद्योग की भूमिका की चर्चा होती है, वैसी चर्चा इस प्रसार में हिंदी क्षेत्र के मेहनतकश वर्गों की भूमिका की नहीं होती. हिंदी का विश्व्यापी प्रसार अंग्रेजी की तरह साम्राज्य की ताकत के कारण नहीं हुआ. सरकारी प्रयासों की भी इसमें कोई खास भूमिका नहीं रही. फिजी, मॉरिशस, कैरेबियाईद्वीप-समूह में हिंदी क्षेत्र के जो मजदूर-किसान गए, वे अपने साथ अपनी-अपनी जनपदीय भाषाएं भी ले गए. भोजपुरी गई तो साथ-साथ हिंदी भी गई. कोलकता, पंजाब, दिल्ली, मुंबई और अब चैन्नई, बेंगलूर, हैदराबाद, कोच्चि जाने वाले हिंदी क्षेत्र के मजदूर और कारीगर अपने साथ ठेठ गंवई हिंदी भी ले जाते हैं और साथ ही तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम सीखकर लौटते हैं. मैथिली नेपाल की दूसरी भाषा है. मैथिली है तो साथ-साथ हिंदी भी चलेगी.
    इन व्यापक जन-संपर्कों के कारण हिंदी पूरे देश में अनेक दिलचस्प रूपों में अवतरित हुई है- बॉलीवुड की फिल्मों और गानों में ये सारे रूप अभिव्यक्त हुए. बंगाली हिंदी, पंजाबी हिंदी, मुंबइया हिंदी, मद्रासी हिंदी, गोवानीज हिंदी, टपोरी हिंदी. हिंदी साहित्य में भी इन सारे रूपों का साक्षात्कार किया जा सकता है. इसी तरह जनपदीय हिंदियों की भी बहुरंगी छटा है- भोजपुरी हिंदी, बुंदेली हिंदी, मैथिली हिंदी, अवधी हिंदी, आदि. यह विविधता हिंदी को दिलचस्प और आकर्षक बनाती है. उसकी विविधता न सिर्फ उसकी अंतर्निहित नमनीयता को प्रदर्शित करती है, बल्कि उसे निरंतर समृद्ध भी करती है. हिंदी समुदाय भारतीयता का ही एक लघु रूप कहा जा सकता है.
    भारत में विंध्य के उत्तर का विशाल भूभाग जिसमें करीब पैंतालीस करोड़ लोग बसते हैं हिंदी का गृह क्षेत्र है. भारत के इतिहास में, उसकी सांस्कृतिक-भाषाई विरासत में इस क्षेत्र की क्या भूमिका रही है, उसकी अतिसंक्षिप्त चर्चा भी यहां मुमकिन नहीं. पाषाण काल से लेकर आज तक, हजारों वर्षों के 'धारावाहिक' इतिहास वाले क्षेत्र की नवीनतम भाषा के रूप में आधुनिक हिंदी गौरवान्वित है, लेकिन साथ ही, जन्म से ही उसके सामने इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक भाषाई परंपरा का वाहक बनने की गंभीर चुनौती भी है. इस क्षेत्र के इतिहास के पैमाने पर देखें तो हिंदी का अभी-अभी जन्म ही हुआ है-इस क्षेत्र के अनेक प्रमुख शहर इससे उम्र में हजारों वर्ष बड़े हैं. हिन्दी समुदाय को तमाम अतिवादी थपेड़ों से इस शिशु की रक्षा करनी है. इस गृह क्षेत्र से परे भारत और विश्व के विभिन्न हिस्सों में इसे बोलने-समझने वालों की आबादी भी करीब उतनी ही आंकी जाती है, जितनी इसके गृह-क्षेत्र की. हिंदी को इस तथ्य के प्रति भी संवेदनशील रहना है.
    उपर्युक्त तथ्यों की रोशनी में, 'एक मंद, दबी हुई हिंदी अस्मिता भारतीयता के अस्तित्वकी एक शर्त है.' राष्ट्रीयता (बांग्ला में जाति) के यूरोपीय आधुनिकता पर आधारित सिद्धांत के तहत एक हिंदी जाति, एक हिंदी प्रदेश और एक हिंदी विधानसभा की बात तार्किक लग सकती है, लेकिन ठोस भारतीय संदर्भ में न सिर्फ अव्यावहरिक है, बल्कि नुकसानदेह भी. हिंदी जातीय संहति का प्रयास हिंदी समुदाय की अंदरूनी जनपदीय विविधता और उसकी बाह्य बहुरंगी छटा को कमजोर करेगा, उसकी अंतर्निहित नमनीयता को नुकसान पहुँचाएगा, और उसे एक प्रादेशिक भाषा के स्वरूप में ला खड़ा करेगा. मुखर और आक्रामक हिंदी जातीयता खुद हिंदी समुदाय और भारत के अंदर सांघातिक तनावों को जन्म देगा और तंततः खुद हिंदी और हिंदी समुदाय को अपने जीवनदायिनी तत्वों से वंचित हर देगा. हिंदी प्रदेशों में यदि हिंदी राष्ट्रीयता को लेकर कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं चला, कहीं थोड़ी-बहुत कोशिश होने पर भी उस जन संमर्थन नहीं मिला और उल्टे, हिंदी प्रदेशों ने ही खुद इसके बंटवारे का फैसला किया, तो इसके पीछे कोई गूढ़ हिन्दी-विरोधी राजनीतिक षडयंत्र नहीं है. कागज पर बिल्कुल तर्कसंगत और उन्नत सिद्धांतों को भी समय-समय पर जमीनी हकीकत की कसौटी पर परखते रहना जरूरी होता है.

नव जागरण
जिस तरह समुदाय के रूप में कल्पना का एकमात्र जरिया बन गया 'राष्ट्र', उसी तरह आधुनिक यूरोप का ऐतिहासिक घटनाक्रम इतिहास लेखन का एकमात्र संदर्भ बिंदु बन गया. इस प्रकार, यूरोप के ठोस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से उसके घटनाक्रम का पृथक कर उसे एक अमूर्त, सार्विक संदर्भ का दर्जा प्रदान कर दिया गया. आधुनिक यूरोप का इतिहास 'नवजागरण' से शुरू होता है, तो हमें भी अपना आधुनिक इतिहास 'नवजागरण' से शुरू करना होगा-बांग्ला नवजागरण, मराठी नवजागरण, हिंदी नवजागरण, आदि. हर प्रदेश में 'नवजागरण' 'खोजा' जाने लगा. मेरी दृष्टि में इतिहासलेखन का यह नजरिया ही गलत है. हमें इस मानसिक अनुकूलन (कंडीशनिंग) से बाहर निकलना जरूरी है. भारत में कोई 'नवजागरण' नहीं हुआ. जो ऐतिहासिक घटनाएं घटीं, उन्हें आप उसी नाम से पुकार सकते हैं, अथवा अपना कोई नाम दे सकते हैं जहां 'नवजागरण' नहीं होता, क्या वहां इतिहास आगे नहीं बढ़ता? इतिहास लेखन के लिए 'नवजागरण' का प्रस्थान बिंदु होना जरूरी है क्या? इसका आशय कथित 'नवजागरण' से जुड़े व्यक्तियों के महत्व को घटाना या बढ़ाना नहीं है, न ही 'नवजागरण' से संबंधित साहित्य को बिल्कुल अनुपयोगी करार देना है. दरअसल, 'नवजागरण' संबंधी शोधों से हिंदी के इतिहास को लेकर कई नए तथ्यों का उद्‌घाटन हुआ है.
    इतिहास के प्रति इस भ्रामक नजरिए के कारण शोधार्थियों को भी अनेक गड़बड़झालों का सामना करना पड़ता है. किन्हीं को लगता है कि भारत में 'असली नवजागरण' उन्नीसवीं सदी में नहीं, बल्कि भक्तिकाल में ही हो गया था. फिर भक्तिकाल में ही क्यों रुका जाए? वैदिक काल, ईसा पूर्व छठी शताब्दी का काल, मौर्य काल, गुप्त काल, संगम काल, विजयनगर साम्राज्य का काल, आदि की भी चर्चा चलेगी और भारत में नवजागरण भाग I, II, III, IV की बात होगी. शेक्सपीयर की खोज शेक्सपीयर से करीब हजार वर्ष पूर्व कालिदास तक जाएगी, कोपरनिकस की खोज आर्यभट तक, हेगेल की खोज धर्मकीर्ति तक, कारडानो की खोज भास्करचार्य तक, उपन्यास विधा की खोज 'दशकुमार चरित' तथा दंडिन्‌ तक जाएगी. यूरोपीय नवजागरण के सांचे में भारतीय इतिहास को ढालने का प्रयास न मालूम हमें कहां-कहां भटकाएगा, फिर भी क्या हासिल होगा?
    हां, एक भिन्न अर्थ में हम 'नवजागरण' शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं. जैसे किसी इलाके में निस्वार्थ भाव से सामाजिक-राजनीतिक कार्य में लगे व्यक्ति को लोग वहां के 'गांधी' कहने लगते हैं (मसलन, पीरो के गांधी राम इकबाल), उसी तरह किसी क्षेत्र में 'नवजागरण' की संज्ञा दे सकते हैं. मामला अगर ऐसा हो, तब बात और है. 'पटना के एल्विस प्रिस्ले' की तर्ज पर हम मझौलिया के माइकल एंजलो, लखनऊ के लियानार्डो दा विंची और बरेली के बेकन की खोज कर सकते हैं.
    जब भारत में नवजागरण ही नहीं हुआ तो नवजागरण के प्रतीक पुरुषों अथवा अग्रदूतों की बात ही नहीं उठती.
   
आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास
आधुनिक हिंदी साहित्य के आरंभ काल में साहित्य का रसास्वादन करने वाला पाठक वर्ग मुख्यतः 'उच्च' जाति अभिजातों के कुछ समूहों तक ही सीमित था. दलित वर्ग लगभग पूरी तरह निरक्षर था. 'पिछड़ी' जातियों में भी साक्षरता नाममात्र ही थी. यहां तक कि 'उच्च' जातियों के गरीब तथा निम्नमध्यवर्गीय तबकों का भी यही हाल था. (प्रसंगवश, यहां निरक्षरता का मतलब यही लेना चाहिए कि वे साहित्यिक कृतियों के पाठक नहीं हो सकते थे. इसका मतलब यह कतई नहीं कि इन तबकों की कोई सांस्कृतिक-साहित्यिक अभिरुचि नहीं थी. उनकी अपनी मौखिक परंपरा थी और उनके बीच अपनी गायन तथा नृत्य-नाट्‌य मंडलियां थीं. निरक्षर लोग भी अद्‌भुत गीत रचने में सक्षम थे, उनमें काफी प्रभावशाली कथावाचक और कलाकार थे.)
    जाहिर है, इस पृष्ठभूमि में तत्कालीन साहित्य की अपनी सीमाएं थीं, उन दिनों के लेखकों तथा पाठकों के अपने पूर्वाग्रह थे, अपनी रुचियां थीं, और रस्वादन के अपने मानदंड थे. यह सही है कि कई लेखक इन सीमाओं तथा पूर्वाग्रहों का अतिक्रमण करने में भी समर्थ हुए-खासकर स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि में यह 'अतिक्रमण' अधिक मुखर होकर सामने आया.
    आज स्थिति, अगर काफी संतोषजनक नहीं, तब भी उन दिनों की तुलना में काफी भिन्न है. महिलाओं, दलितों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के बीच साक्षरता काफी बढ़ी हैं, करोड़ों की संखया में स्नातक है और इन समुदायों के बीच से एक मुखर बौद्धिक वर्ग उभर आया है. हिंदी अखबार करोड़ों में तथा पत्रिकाएं लाखों में बिक रही हैं. कस्बों-शहरों से अनेक लघु पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है, हिंदी समीक्षकों के रेडार से बाहर सैकड़ों नए लेखक-पत्रकार, अनुवादक, पटकथा-लेखक, विज्ञापनकर्मी, रेडियो तथा विडियो जॉकीज, आदि सामने आ रहे हैं. इस उभार में, जाहिर है, दलित, नारी तथा पिछड़े वर्गों के सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों का भी खास योगदान रहा है. हिंदी तथा हिंदी साहित्य के लिहाज से यह सकारात्मक विकास है. इस नये बौद्धिक समुदाय की हिंदी और हिंदी साहित्य पर दावेदारी हिंदी को नया अभूतवूर्व विस्तार देती है. इंटरनेट पर भी अब अच्छी-खासी संखया मे हिंदी की नई पीढ़ी सक्रिय है, और इसमें हिंदी सॉफ्टवेयर निर्माताओं की भी उल्लेखनीय भूमिका रही है.
    समाज में नए वर्गों, समुदायों अथवा समूहों के उत्थान के साथ हमेशा नया इतिहास भी उपस्थित होता है. इतिहास के एक या दो 'अधिकारिक' पाठों का स्थान अब अनेक पाठ ले लेते हैं और पुराने विमर्शों का स्थान नए विमर्श. इस प्रक्रिया में स्वभावतः अनेक पुरानी मूर्तियां टूटती हैं और नई बनती हैं. जिनकी हिंदी को हिंदी ही नहीं माना गया, जिस हिंदी को सुनने से इनकार कर दिया गया, वह हिंदी जब रंगमंच पर एक सशक्त किरदार के रूप में अवतरित होगी तो टकराव होंगे, ज्यादतियां भी होंगी और कुछ निर्दोष मूर्तियां भी टूटेंगी. इतिहास के रंगमंच पर खेले गए नाटक के पहले अंक में प्रायः ऐसा ही होता है, लेकिन कभी एकांकी का आना बाकी होता है. अगर किसी किरदार के साथ अन्याय हुआ है, किसी भूमिका को गलत तरीके से छोटा कर दिया गया है, तो उसके परिमार्जन की संभावना खत्म नहीं होती. हिंदी अगर आज विभिन्न समुदायों के बीच 'रणक्षेत्र' बन गई है तो इससे हिंदी के कुछ किरदार लहूलुहान हो सकते हैं, पर आखिरकार यह हिंदी की जीत ही है. इससे हिंदी को रचनात्मक ऊर्जा मिलती है.
    इस नई स्थिति में यदि विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग हिंदी इतिहास के एक या दो पाठों और पुराने विमर्शों से ही चिपके रहते हैं, तो यह उनकी अप्रासंगिकता का ही परिचायक है-विमर्शों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में उनकी अक्षमता का ही प्रदर्शन है. वैसे, शैक्षणिक विभाग अपने स्वभाव से ही कुछ हद तक रूढ़िवादी होते हैं-हिंदी समाज का बौद्धिक नेतृत्व करने की उनसे उम्मीद भी नहीं की जाती. हिंदी समाज के अमूमन सारे प्रमुख विमर्श इन विभागों में भी बाहर से ही गए. ऐसे विभागों में चले विमर्शों के बारे में हिंदी प्राध्यापकों के जो भी भ्रम हों, उनमें आम हिंदी पाठकों की अधिक दिलचस्पी नहीं होती. वे प्रायः हर खेमे को पढ़ते हैं और अपने उपयोग की सार्थक चीजें हर कहीं से निकाल लेते हैं.
    कुल मिलाकर एक या दो आधिकारिक पाठों का जमाना बीत चुका है, इसीलिए मठों का भी. हिंदी साहित्य का कोई आधिकारिक इतिहास नहीं, कोई आधिकारिक प्रवक्ता नहीं, बहरहाल, हिंदी समाज के लिए यह शुभ स्थिति विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों के लिए मुश्किल स्थिति पैदा कर देती है-वह कौन-सा इतिहास पढ़ाएं? बेहतर तो यही है कि कुछेक प्रचलित पाठों के साथ-साथ हर प्राध्यापक 'अपना इतिहास' पढ़ाए (हिंदी इतिहास के कुछेक पाठ इसी तरह सामने आए प्राध्यापकों के अपने नोट्‌स ही हैं) और छात्रों को भी 'अपना इतिहास' लिखने तथा अपने नायक गढ़ने की स्वतंत्रता दें. पाठ्‌यक्रमों में भी हिंदी इतिहास के विभिन्न पाठों को यथोचित स्थान दिया जाए और किसी भी एक पाठ के 'एकमात्र' पाठ होने के दावे को खारिज कर दिया जाए. कुछेक विषयों की पाठ्‌यपुस्तकों में इस तरह के परिवर्तन शुरू भी हो चुके हैं, तथापि शैक्षणिक-नौकरशाही और रूढ़िवादी प्राध्यापकों के लिए यह जरूर मुश्किल है.
    इतिहास में नई सामाजिक शक्तियों की दावेदारी के साथ इतिहास के पुनर्लेखन का कार्य कोई नई बात नहीं है. यह हमेशा से होता आया है. अमेरिका में एंग्लो-सैक्सनों की जगह जैसे-जैसे अफ्रीकी अमेरिकनों, हिस्पैनिक समुदायों, एशियनअमेरिकनों, अमेरिकन इंडियनों और महिलाओं की दावेदारी बढ़ेगी, अमेरिका का इतिहास वही नहीं होगा, जो आज पढ़ाया जाता है. यह प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है. दस-पंद्रह साल बाद पढ़ाए जाने वाले इतिहास में अमेरिका के कई चरित नायक-जेफरसन और अब्राहम लिंकन भी पुनर्मूल्यांकन की जद में आ चुके होंगे. उसी तरह विश्व में जैसे-जैसे चीन, भारत (और ऐसे ही अन्य देशों) की आर्थिक-राजनीतिक शक्ति बढ़ेगी, विश्व-इतिहास की पाठ्‌यपुस्तक भी बदलेगी. चीनी इतिहास से संबंधित पृष्ठों का बढ़ना तो लगभग शुरू ही हो चुका है.

हिंदी आज
हिंदी पहले से ही, सीमित अर्थों में ही सही, एक विश्व भाषा रही है. वैश्वीकरण के दौर में इसके समक्ष नई संभावनाएं और नई चुनौतियां उपस्थित हुई हैं. अब यह हिंदी समुदाय पर निर्भर है कि वह इन संभावनाओं तथा चुनौतियों का क्या करता है.
    आज के वैश्वीकरण के दौर में इतनी बड़ी हिंदीभाषी आबादी की उपेक्षा कौन करेगा? इसीलिए हिंदी समुदाय की ओर से बिना किसी अपेक्षित प्रयास के ही अंग्रेजी और अन्य विदेशी भाषाओं की विभिन्न कृतियां हिंदी में अनूदित होकर आने लगी हैं-वेस्ट सेलर किताबें, हॉलीवुड की फिल्में, कार्टून, सामाचार चैनल्स, नेशनल ज्योगाफ्रिक, डिस्कवरी, हिस्ट्री जैसे चैनल्स, विज्ञापन, आदि. इन सबके कारण, हिंदी अनुवादकों, पटकथा-लेखकों और इन सबसे जुड़े रचनाकारों-कलाकारों की एक नई पीढ़ी सामने आई है. हिंदी पाठकों, श्रोताओं तथा दर्शकों के सामने भी एक नई दुनिया उद्‌घाटित हुई है. इतने बड़े हिंदी-बाजार के प्रति विदेशों में भी उत्सुकता बढ़ी है. कार्टूनों, फिल्मों, विज्ञान-आधारित कार्यक्रमों, विज्ञापनों, बिलबोर्डों का गौर से देखिए तो बाजार में हिन्दी का नया निखरता चेहरा आसानी से पहचाना जा सकता है. अपने स्वरूप में ही संपर्क भाषा होने तथा उसके गुणों से लैस होने के कारण, आरंभ से ही अपने विविध, मिश्रित आधार के कारण 'हिंदी आज' अंग्रेजी के समांतर विश्व की संपर्क भाषा होने की भरपूर संभावना रखती है. विश्व की दूसरी सबसे तेजी से विकसित हो रही भारतीय अर्थव्यवस्था इस संभावना का बल प्रदान करती है. लेकिन हिंदी समुदाय के पास हिंदी क्षेत्रों के राजनीतिज्ञों, राजनायिकों, नौकरशाहों, मीडिया-मालिकों, उद्योगपतियों-व्यवसायियों की मिली-जुली मजबूत लॉबी का नितांत अभाव है. फलस्वरूप, संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यताप्राप्त भाषा होने का अपना वाजिब हक भी वह अब तक प्राप्त नहीं कर सकी है. (वैसे, अपने इस वाजिब हक की प्राप्ति के लिए उसे कभी भी दूसरी भाषाओं से उलझना नहीं चाहिए.)
    बहरहाल, हिंदी समुदाय के समक्ष एक बड़ी चुनौती तो इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था है जिसकी विकास दर संतोषजनक नहीं कही जा सकती. यहां हम उन आर्थिक सुधारों की चर्चा में नहीं जा सकते जिसके जरिए इस क्षेत्र को नई आर्थिक गतिविधियों का सक्रिय क्षेत्र बनाया जा सकता है. ऐसे कुछ प्रयास आरंभ भी हुए हैं. कहने की जरूरत नहीं कि गरीबी की रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाली सबसे बड़ी आबादी इसी क्षेत्र में बसती है और कोई भी आर्थिक सुधार इस समस्या से नजरें चुराकर न तो सफल हो सकता है और न ही समावेशी आर्थिक सुधार की संज्ञा पा सकता है. हिंदी के हितों को गति प्रति करने का प्रश्न भी बहुत हद तक इस समस्या से जुड़ा है.
    हिंदी समुदाय आज बाहर से जितनी चीजें ले रहा है, उस तुलना में उसके पास देने के लिए (अपनी श्रमशक्ति के अलावा) कुछ खास है नहीं. यह स्थिति भी बहुत हद तक पहली समस्या से जुड़ी है. यह क्षेत्र विज्ञान तथा तकनीक के अनुसंधान और विकास का क्रियास्थल नहीं बन पाया है.(ज्ञान युग में मोबाइल कंप्यूटर, आदि दैनिक उपयोग के उपकरण बन गए हैं. इनसे संबंधित सारी शब्दावली पर अंग्रेजी का एकछत्र प्रभुत्व है. जैसे किसानों और कारीगरों के दैनिक उपयोग के पुराने उपकरणों के विविध गंवई नाम आपको विभिन्न क्षेत्रों में मिल जाएंगे.) मौलिक शोध-ग्रंथ हिंदी में न के बराबर हैं. शोध से जुड़े हिंदीभाषी शोधार्थी भी अपनी रचनाएं हिंदी में ही लिखते हैं. हिंदी के पास स्तरीय बाल-साहित्य, किशोर-साहित्य, विज्ञान-साहित्य का घोर अभाव है, और अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी भाषाओं में अनूदित हिंदी की 'बेस्ट सेलर' क्या, ठीक-ठाक व्यवसाय करने वाली किताबें नहीं के बराबर हैं. ले-देकर मध्य एशिया और अफ्रीका के बाजार में, और कुछ हद तक ब्रिटेन में, बॉलीवुड की कुछ फिल्मों और कुछेक धारावाहिकों ने अपनी थोड़ी-बहुत जगह बनाई है. हिंदी के लिए 'जय हो' की स्थिति अभी कोसों दूर है.
    चुनौती खुद हिंदी पर उत्पन्न खतरों से निपटने की भी है. एक संपर्क भाषा के रूप में अंतर्निहित नमनीयता क्या हिंदी को ही इतना बदल डालेगी कि उसकी पहचान ही मिट जाए? खासकर तब जब सामना अंग्रेजी से हो जिसके पीछे शताब्दियों तक एकसाम्राज्य की ताकत थी और अब अमेरिका की. क्या अपनी नमनीयता पर पड़ने वाले दबावों से हिंदी टूट जाएगी? वैसे समृद्ध सांस्कृतिक-भाषाई विरासत, विशाल शब्द भंडार और विविधताभरा जनाधार हिंदी को पर्याप्त मजबूती प्रदान करता है, तथापि हिंदी क्षेत्र के ही कुछेक हलकों में तुरत-फुरत मुनाफा बटोरने की चाहत रखने वाले भाषाई सटोरिए इसे तोड़ने का प्रयास भी कर रहे हैं. कुछेक हिंग्लिश शब्दों के प्रचलन से वैसे हिंदी का कुछ बिगड़ने वाला नहीं, लेकिन हिंदी मीडिया के कुछ प्रकाशन एक बनावटी हिंग्लिश के पैरोकार बनकर उभरे हैं.
    नेट पर हिंदी की उपस्थिति धीरे-धीरे बढ़ रही है. यहां भी लक्ष्य नेट पर हिंदी की उपस्थिति को (हिंदीभाषियों की आबादी के अनुपात में कम से कम) आठ फीसदी तक पहुंचाना है. नेट के आरंभ में अंग्रेजी की उपस्थिति पचानबे फीसदी से भी अधिक थी, चीनी की नगण्य. अब चीनी की उपस्थिति पैंतीस फीसदी से भी ऊपर जा पहुंची है (विश्व की आबादी में चीनीभाषी आबादी का अनुपात करीब बाईस फीसदी है).
    एक बड़ा सवाल भाषाओं के विश्व-बाजार में हिंदी को बेचने का है. हिंदी समुदाय के पास हिंदी के छवि-निर्माण, उसकी पैकेजिंग तथा उसकी बिक्री कर कारोबार करने वाले उद्यमियों का नितांत अभाव है. वैसे यह भी हिंदी समाज की पिछड़ी स्थिति की ही एक अभिव्यक्ति है. लेकिन इस पिछड़ेपन की दुहाई देकर इस कार्य से मुंह मोड़ने को भी उचित नहीं ठहराया जा सकता. घरेलू तौर पर भी हिंदी के वर्तमान कारोबारी-और ऐसे कारोबारी कम नहीं हैं-सरकारी अथवा संस्थागत खरीद और सरकारी मदद से होने वाले समारोहों, गोष्ठियों, जलसों, प्रकाशनों आदि से ही संतुष्ट हैं. हिंदी का एक जन बाजार (मास मार्केट) बनाने के लिए जरूरी निवेश करने और जोखिम उठाने का उद्यमी भाव उनमें नदारद है. राजभाषा होने का या एक नकारात्मक पक्ष है.
    हिंदी के जन बाजार के लिए स्थितियां कब से मौजूद हैं. यदि हिंदी के प्रकाशक इस दिशा में आगे नहीं बढ़ते, तो इतना बड़ा बाजार कोई छोड़ नहीं देगा. दूसरे आएंगे (आ चुके हैं तथा आ रहे हैं) और तब हिंदी के परंपरागत प्रकाशक या तो बदलने को बाध्य होंगे, या बंद हो जाएंगे, या फिर उन्हीं संस्थानों के कनीय भागीदार बनकर रह जाएंगे. हिंदी प्रकाशकों की वेबसाइटें भी अनाकर्षक तथा आवश्यक सूचनाओं से वंचित हैं.
    हिंदी का जन बाजार बनाने में एक बड़ी बाधा खुद हिंदी बुद्धिजीवियों के एक प्रभावशाली हिस्से में बाजार के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण है. 'बाजार ही सारी समस्याओं का समाधान है' जैसे बाजारवादी-वर्चस्वादी तर्क का विरोध करते-करते वे प्रायः बाजार का ही विरोध करने लगते हैं, फलतः बाजार में विश्वास के साथ उतरने से कतरा जाते हैं. 'बेचना' शब्द सुनते ही ऐसे लोग भड़क जाते हैं, मानो कोई पाप कर रहे हों. बाजार हजारों वर्ष पुरानी संस्था है और विनिमय के युग में यह हमारे सामाजिक जीवन की प्रमुख हिस्सा है. विनिमय ही आज हमारे जीविकोपार्जन का सर्वप्रमुख जरिया है. बाजार के विरोध के पीछे कभी-कभी कृषि युगीन, कमोवेश स्वयंसंपूर्ण ग्रमीण अर्थव्यवस्था में व्यापारियों के प्रति मौजूद पूर्वाग्रह भी झलकता है. बहरहाल, बाजार विरोध का व्यवसाय भी बाजार में ही फलता-फूलता है.
    हिंदी के कारोबारियों के लिए अफ्रीकी, मध्य एशिया, लातिनी अमेरिका, और सर्वोपरि, चीन के बाजार में अपार संभावनाएं हैं जिन पर पर्याप्त ध्यान देने की जरूरत है.
    हिंदी कारोबार के भौतिक-आर्थिक पक्ष के अलावा उसके साहित्यिक पक्ष की भी यहां थोड़ी चर्चा की जा सकती है. विभिन्न जनपदीय समूहों के बीच संवाद के माध्यम के रूप में हिंदी में प्रायः एक आभासीपन, एक शिष्टता और संवेदनशीलता आ जाती है. कालक्रम मं इसने एक ग्रंथि का रूप ले लिया. यह ग्रंथि श्रेष्ठ साहित्य की रचना में रुकावटें खड़ी कर देती है. साहित्य में हम अपने उदात्त भावों से ही रू-ब-रू नहीं होते, बल्कि अपने उन्मत्त क्षणों का भी साक्षात करते हैं, हम अपने प्रकट जीवन की ही कथा नहीं पढ़ते, अपने अंतरंग तथा गुप्त जीवन के रहस्योद्‌घाटन का भी आनंद उठाते हैं, अपने शिष्ट बरताव का ही पाठ नहीं पढ़ते, उस शिष्टाचार के पीछे छिपी अपनी गालियों पर भी मुग्ध होते हैं. एक शिष्ट, सतही तथा 'अभिभावक' के भाव से गर्वित भाषा में यह सब अभिव्यक्त करना समस्या बन जाता है. ऐसे में हम या तो जनपदीय भाषाओं या बोलियों की शरण में चले जाते हैं या फिर अंग्रेजी की शरण में. साहित्य में यह समस्या पहले श्लील-अश्लील विवाद के रूप में उपस्थित होती है और फिर इस विवाद के परे जाकर परिपक्वता हासिल करती है. इस परिपक्वता के बिना किसी भी भाषा का साहित्य 'सार्विक दिलचस्पी' पैदा नहीं कर पाता. प्रत्येक भाषा की परिपक्वता की निशानी उसमें कथित रूप से 'अश्लील' साहित्य की उपस्थिति है.
    साहित्य समाज का दर्पण है तो इसका अर्थ हुआ कि (दर्पण के प्रतिबिंब की तरह) आप उसमें अपने उलट रूप में प्रतिबिंबित होते हैं. वह सभ्यता को उसकी बर्बरता का और बर्बरता को सभ्यता का, समाज को उसकी असामाजिकता का और असामाजिकों को समाज का चेहरा दिखाता है. वह संतुलित करता है, बसे घरों को उजाड़ता है और उजड़े घरों को बसाता है. वह हर चरित्र को अपने उलट रूप से परिचित कराता है और इस तरह उसके पाखंड का अंत कर उसे अपने अभिशप्त व विभाजित अस्तित्व से मुक्त कर देता है. यह मुक्ति ही साहित्य के सार्विक आकर्षण की कुंजी है. यही शास्त्रीय रचनाओं की कालजयिता का सबब है. हस्तिनापुर के व्यवस्थित राज्य में सारे आदर्श पात्र मौजूद थे- आदर्श पितामह, आदर्श राजा, आदर्श माताएं, आदर्श राजकुमार, आदर्श गुरु, आदर्श मंत्री, आदि. एक-एक कर सारे आदर्श पात्रों का, उनके उलट रूप का उद्‌घाटन करते हुए, कुरूक्षेत्र की रणभूमि में ला खड़ा कर दिया जाता है. और कुरूक्षेत्र में? विरोधों के महासमर के बीच, आजकल की भाषा में, 'क्वांटम कोहेरेंस' का, कृष्ण के 'विश्वरूप' का दिग्दर्शन कराय जाता है. यही चीज आप विश्व की अनेक महागाथाओं में देख सकते हैं.
    सभ्यता तो अपने जन्म से ही पाखंड रचती है. सभ्यता के पेनोप्टिकोन (साभार जेरेमही बेंथम और मिशेल फूको) में हर नागरिक से यह उपेक्षा की जाती है कि वह इस पाखंड को अपना ले, सभ्यता के मानदंडों के अनुकूल खुद को ढाल ले. धीरे-धीरे लगता है कि हर नागरिक स्वेच्छा से सभ्य हो रहा है, उन्होंने सभ्यता का आभ्यंतरीकरण कर लिया है. लेकिन पेनोप्टिकान की प्रहरी-मीनारों के सजग प्रेक्षकों के लए भी इन बंदियों के अंतरतम की निगहबानी नामुमकिन है. वे उन्हें शारीरिक रूप से अनुशासित कर सकते हैं, अपने सांस्कृतिक उपादानों से उनके मनोजगत का भी नियमन कर सकते हैं, तब भी उनके अंतरतम का कोई कोना उनकी नजरों से ओझल ही रहता है.
    सभ्यता को सत्ता को लगता है कि सारे बंदी उसके अनुरूप अनुकूलित हो चुके हैं. लेकिन तभी, सबसे अनुशासित-अनुकूलित उनका हमराही उनका हंता साबित होता है. अंतरतम के उसी अनजान कोने में प्रतिसत्ता का भूमिगत संसार रचा जाता है. साहित्य सभ्यता की सत्ता के पेनोप्टिकोन में रचा गया प्रतिसत्ता का वही भूमिगत संसार है. 'साहित्य सभ्यता का विलोम है.'
    सभ्यता हमेशा कुछ लक्ष्य, कुछ मंजिलें तय करती है ओर उन्हीं से अपनी सफलता के पैमाने निर्धारित करती है. साहित्य का कोई लक्ष्य नहीं होता, कोई मंजिल नहीं होती और इसीलिए उसकी सफलता का कोई पैमाना नहीं होता. वह तो हमें लक्ष्यहीन, मंजिलविहीन प्रवाह में छोड़ देता है- प्रवाह की पुनप्राप्ति में ही हमें मुक्ति का आनंद मिलता है.
    हिंदी साहित्य में ग्रंथि मुक्ति एक परिघटना बनती दिख रही है. तथापि वह कुछ ज्यादा ही शिष्ट, सभ्य और लक्ष्योन्मुख रही है. फलतः उसके पास सार्विक सहानुभूति वाली रचनाएं कम ही हैं.
   
'हिंदी समुदाय और राष्ट्रवाद'
राष्ट्रवाद और हिंदी के प्रश्न पर जिन भारतीय विचारकों ने अपने गहन शोध, तीक्ष्ण विश्लेषण और बेबाक विचारों से अपनी प्रभावकारी छाप छोड़ी, उनमें निश्चय ही रामविलास शर्मा का नाम काफी सम्मान के साथ लिया जाता है. उन्होंने दरअसल एक खास विचारशाखा की नींव रखी जिसने हिंदी क्षेत्र के बौद्धिक समुदाय को काफी प्रभावित किया.
    हिंदी जाति की अवधारणा रामविलास शर्मा की एक प्रमुख अवधारणा रही है. सुधीर रंजन सिंह की पुस्तक 'हिंदी समुदाय और राष्ट्रवाद' (राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009; पृष्ठ; 131, मूल्य : 150 रुपए.) इसी अवधारणा को केंद्र में रखकर लिखी गई है. पुस्तक 'राम विलास शर्मा की हिंदी जाति के लिए' समर्पित है. पुस्तक की भूमिका में ही लेखक ने स्पष्ट कर दिया है कि हिंदी जाति के 'महानायक' रामविलास शर्मा के कामों में निहित हिंदी जाति के प्रति पूर्ण समपर्ण से ही उन्हें इस रचना की प्रेरणा प्राप्त हुई है. लेखक का मानना है कि 'हिंदी भाषी समुदाय जातीय पहचान की दृष्टि से अभी अधूरी अवस्था में है. देश के दूसरे आधुनिक भाषा समुदायों की तुलना में इसमें जातीय अनुभूति के स्तर पर अधिक असमानताएं एवं विभाजन हैं. दूसरे शब्दों में, इसमें पिछड़ी और टूटी-फूटी अस्मिताओं का ही अस्तित्व अधिक है... पृथकतावादी (?) आंदोलन देश के दूसरे क्षेत्रों-तेलंगाना, सौराष्ट्र, विदर्भ, कोंकण, दार्जिलिंग, त्रिपुरा, आदि में भी हुए और कुछ में ज्यादा ही दबाव बने, लेकिन उनमें से कोई नहीं टूटा, केवल हिंदी प्रदेश-उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार का बंटवारा हुआ. कोई प्रतिरोध नहीं. स्वाधीनता के बाद जैसे विखंडन का सारा इतिहास हिंदी प्रदेशों को सौंप दिया गया हो...' (पृ. 7) इस प्रकार लेखक ने अपनी भूमिका में पुस्तक रचना के पीछे निहित अपनी प्रेरणा और उसकी पृष्ठभूमि का स्पष्ट उल्लेख कर दिया है. पुस्तक पांच अध्यायों में विभक्त है-राष्ट्रवाद : इतिहास का वैचारिक पाठ, राष्ट्र और उसके समुदाय, भाषायी राष्ट्रवाद, नवजागरण और हिंदी समुदाय, हिंदी समुदाय : भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक चेतना, एवं राष्ट्र का वर्तमान और हिंदी समुदाय.
    मेरा यह आलेख दरअसल इसी पुस्तक की समीक्षा के बहाने लिखा गया है. पुस्तक में व्यक्त लगभग सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों पर मैंने इस आलेख में अपना विचार रखने की कोशिश की है.
    घोषित रूप से हिंदी जाति की अवधारणा के समर्थन में पुस्तक लिखने के बावजूद, ऐसा लगता है कि लेखक खुद इस अवधारणा को लेकर असहज महसूस करते हैं. यह असहजता लगभग हर महत्वपूर्ण प्रश्न पर चर्चा के दौरान दिख जाती है और 'लेकिन', 'किंतु-परंतु' के साथ लगभग हर अध्याय के निष्कर्ष वाले वाक्यांशों में उपस्थित हो जाती है. मसलन हिंदी जाति के प्रश्न को ही लीजिए. वे लिखते हैं, 'आज इकहरे अर्थ में बंगाली, मराठी या तमिल रहने का युग नहीं है. हिंदी समुदाय की मिश्रित प्रकृति, बोली और जीवनशैलीगत भिन्नताएं, उसकी हदबंदी-मुक्त संस्कृति की सूचक हैं. इसमें आश्चर्य नहीं कि यह समुदाय अपने इस गुण के कारण देश के दूसरे समुदायों के बीच कभी आदर्श बने.' (पृ. 9)
    उपर्युक्त वाक्य में, पुस्तक में भी अनेक जगहों पर और खुद पुस्तक के नाम में भी हिंदी 'जाति' की जगह 'समुदाय' शब्द का प्रयोग किया गया है. एक जगह (पृ. 70) समुदाय को लिखकर कोष्ठक में जाति लिखा गया है. यह हिंदी जाति की अवधारणा के प्रति खुद लेखक की असहजता के संकेत हैं. मेरी नजर में यह 'फ्रायडियन स्लिप' है- 'जाति' की बंद, क्लाउस्ट्रोफोबिक दुनिया की जगह लेखक के अवचेतन में समुदाय की खुली, 'इरोटिक' दुनिया ही बसी है. एक दूसरे कारण का भी आधार बनता है- राष्ट्रीयता के लिए जाति शब्द बांग्ला से लिया गया है. लेकिन एक हिंदीभाषी के लिए जाति से सहज बोध जात (कास्ट) का होता है. दो अर्थों के घुलमिल जाने, एक अर्थ पर दूसरे अर्थ के आरोपन अथवा अध्यास (सुपरइम्पोजिशन) से भी उपर्युक्त असहजता पैदा हो सकती है. (प्रसंगवश, उपर्युक्त उद्धरण के बारे में एक बात और. हिंदी समुदाय को आदर्श बनने न बनने की चिंता नहीं करनी चाहिए.)
    इसी तरह, राष्ट्र और राष्ट्रीयता की जिस अवधारणा का वे पक्षपोषण करते हैं, उस अवधारणा की भारत के संदर्भ में उपयोगिता भी उन्हें संदिग्ध लगती है. रवींद्रनाथ को उद्‌धृत करते हुए (और उनसे सहमत होते हुए) वे कहते हैं, ''पश्चिमी राष्ट्रवाद मुखयतः प्रजातीय अस्मिता का राष्ट्रवाद रहा है, जिसका कुपरिणाम वह विश्वयुद्धों में झेल चुका है. रवींद्रनाथ उस राष्ट्रवाद के कुपरिणामों से प्रथम विश्वयुद्ध के समय ही परिचित हो चुके थे... पश्चिमी राष्ट्रवाद उनके लिए चिंतित करने वाला इसलिए था कि भारत में किसी एक प्रजाति के लोग नहीं रहतेः 'भारत का इतिहास...सृजन की ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विश्व की अनेक प्रजातियों ने योगदान दिया है...' रवींद्रनाथ किसी एक प्रजातीय राष्ट्र, (धर्म, क्षेत्र, वर्ण, जाति, चाहे वह जिस आधार पर हो) के धारण के विरुद्ध थे.'' (पृ. 31)... ''भारत के लोग, असली बात है, बहुलता को अंतर्मन से स्वीकार करते हैं, और किसी न किसी विचार के कारण भारत से प्रतिबद्ध दिखाई पड़ते हैं.'' (पृ. 56)... 'भारत की बहुराष्ट्रीयता एक सच्चाई है, तो उससे बढ़कर भारतीयता एक सच्चाई है.' (पृ. 108) (उपर्युक्त वाक्यों में 'प्रजाति' शब्द का प्रयोग मेरी समझ से सही नहीं है. आज से कुछ हजार साल पहले तक मानव जाति की एक दूसरी प्रजाति होमो नियंडरथलेसिस भी मौजूद थी. लेकिन अब हम सभी एक ही प्रजाति, होमो सेपिन्यस, के वंशज हैं. जैसे राष्ट्रीयता के लिए 'जाति' का प्रयोग किया गया है, उसी तरह 'उपजाति' का प्रयोग किया जा सकता था. बांग्ला में उपजाति का भी प्रयोग किया ही जाता है. त्रिपुरा के एक दल का नाम है त्रिपुरा उपजाति जुबो समिति.)
    हिंदुत्व के बारे में लेखक का यह विचार कि 'सावरकर का यह राष्ट्रवाद हिंदू, हिंदुत्व और हिंदुस्तान का एक ऐसा सघनीकरण है, जो धार्मिक प्रेरणाओं से आगे संस्कृति का राजनीतिक रूपांतरण है', मेरी समझ से हिंदुत्व विचारधारा की पैकेजिंग पर ही अटक जाना है.
    हिंदी क्षेत्र में नए प्रदेशों के गठन को नकारात्मक नजरिए से देखने और प्रादेशिक पुनर्गठन के लिए चलने वाले आंदोलनो को पृथकतावादी करार देना भी मेरी नजर में गलत है. इस पर पहले लिखा जा चुका हैं
    पुस्तक का एक बड़ा कमजोर पक्ष वीर भारत तलवार वाला प्रसंग है. गंभीर विमर्श वाली पुस्तक में व्यक्तिगत आक्षेपों से बचना चाहिए. वे लिखते हैं, ''लेकिन सितारेहिंद की छवि ठीक करने में उन्होंने (वीर भारत तलवार ने) भारतेन्दु की जिस ढंग से 'रस्साबंदी' की है, वह सबाल्टर्न पद्धति के लेखन की भी बात नहीं है. उसमें उनकी मानसिक विकृति ही अधिक झलकती है, जिसका थोड़ा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण अनुचितन होगा...'' ''जहां तक मुझे ध्यान है वीर भारत तलवार राम विलास शर्मा के शिष्य तो नहीं, अवैतनिक मुंशी अवश्य रहे हैं.'' (पृ. 70) ''अब...'' (पृ. 71) क्या किसी शिष्य या 'अवैतनिक मुंशी' को अपने गुरु की प्रस्थापनाओं या फिर अपनी ही पूर्व प्रस्थापनाओं को चुनौती देने या बदलने का अधिकार नहीं है? क्या ऐसा करना 'मानसिक विकृति' है? किसी लेखक का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करना गलत नहीं है, लेकिन इस मनोविश्लेषण से जो तथ्य मिलते हैं, वे उसकी मानसिक शक्ति हैं या विकृति, इस निर्णय पर पहुंचने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. लेखक पुस्तक में जो प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, 'मानसिक विकृति' साबित करने के लिए वे कतई उपयोगी नहीं हैं. उल्टे, इसमें लेखक का ही कोई पूर्वाग्रह झलकता है, क्योंकि पुस्तक के सहज प्रवाह में अचानक यह 'आक्रमण' घटित होता है.
    पुस्तक में जिन विमर्शों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, हिंदी समाज और साहित्य उनसे आगे निकल चुका है. अगर पाठ्‌यपुस्तकों और शैक्षणिक जगत में यही विमर्श बड़ी जगह घेरे हुए है तो इससे यही पता चलता है कि हिंदी शैक्षणिक जगत किस तरह समय से ताल मिलाकर चलने में विफल हो रहा है. मृत्युशय्या पर पड़े डान क्विक्जोट के शब्दों में यह 'पिछले वर्ष के घोंसलों में इस वर्ष के पंछियों की तलाश' के समान है.
    पुस्तक एक अवधारणा की रक्षा और उसी अवधारणा के प्रति असहजता के बीच के अंतर्द्वंद्व से गुजरती हुई 'भूमिका' में घोषित लक्ष्य का निर्वाह करने से चुक जाती है. आगे लेखक अपनी इस असहजता की अंदरूनी दूनिया की पड़ताल करते हैं या नहीं, पता नहीं. लेकिन वह आत्मानुसंधान दिलचस्प होगा.
    बहरहाल, हिंदी समुदाय को केंद्र कर चलने वाले विमर्श के लिए यह एक उपयोगी पुस्तक है.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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