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प्रेम: भावना-अवधारणा और स्त्री

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/02/2010 11:42:00 PM

रणेन्द्र
प्रेम अपने मूल में एक भाव है । व्यक्ति की मूल प्रवृतियों में एक है राग । राग, अनुभव के स्तर पर आकर अनुराग बनता है । अनुराग में जब सान्द्रता और सघनता आती है तब वह प्रेम में ढलता है । प्रेम में व्यक्ति ममेतर से जुड़ना चाहता है । वह एक वृत्त का केन्द्र बन बृहत्तर वृत्त से जुड़ाव महसूस करना चाहता है । दरअसल प्रेम एक ही साथ उसे आत्मबोध भी प्रदान करता है और उसके ‘स्व’ के विसर्जन की कामना भी करता है । कबीर जब राजा-प्रजा किसी को भी ‘शीश’ देकर प्रेम ले जाने की बात करते हैं तो इसी ‘अहम’,  आत्मबोध को विसर्जित करने की ही प्रेरणा दे रहे होते हैं , यथाः ‘‘ प्रेम न खेतौं नीपजै, प्रेम न हाटि बिकाइ / राजा परजा जिस रुचै, सिर दे सौ ले जाई ।।’’ या ‘‘ जब मै था तो हरि नहीं अब हरि हैं तो मैं नाही ’’
    रामचन्द्र शुक्ल ने प्रेम की विशिष्टता को गहराई से रेखांकित करते हुए प्रेम और रुपलोभ में अन्तर बताया । प्रेमी किसी एक की कामना करता है, जबकि लोभी हर एक पर लुब्ध हो जाता है । वे प्रेम को आत्मबद्धता की जगह आत्मविस्तार का माध्यम मानते हैं । ठीक उस शायर की तरह जिसके लिए ‘‘ इक लफ्ज-ए मुहब्बत का बस इतना फसाना है / सिमटे तो दिले आशिक फैले तो जमाना है ।’’ इसी जमाने को दिल में समटेने और उसके माध्यम से कायनात को रचने वाले मालिक से जुड़ने की कामना भक्त कवियों और सूफियों ने बार-बार की है । यह एक काल-विशेष में प्रेम की पराकाष्ठा थी, ‘तुम नहीं कोई तो सब में नजर आते क्यों हो /सब तुम्ही तुम हो तो फिर मुँह छुपाते क्यों हो।’’ इसी एकात्म भाव को मीरा इन शब्दों में व्यक्त करती हैं, ‘दधि को नाम बिसर गयी ग्वालन, हरि लो हरि लो बोले रे ’ ।
    प्रेम एक साथ सहज है और जटिल भी। इसे महसूसना सहज है किन्तु व्याख्यायित करना कठिन । यह गूंगे का गुड़ है । कोई चीज आपको अच्छी क्यों लगती है इसके पीछे कोई ठोस तर्क नहीं भी हो सकता है । हो सकता है कोई अबूझ कारण हो । कालिदास की माने तो ‘कुछ चीजें हमें मधुर लगती हैं, कुछ लोग हमें अच्छे लगते हैं . . . वह जन्मोत्तर का सौहार्द है जिसके कारण ऐसा होता है ।’
    लेकिन प्रेम एक पवित्र-सात्विक भावना भर नहीं है । अगर यह भाव इतना निर्दोष है तो यहाँ प्रेम करती स्त्रियाँ अनुपस्थित क्यों हैं ? वे केवल प्रेम का आवलम्बन, काम्या, स्वप्न, उपकरण भर ही क्यों हैं? क्या प्रेम का पाठ पितृसत्ता द्वारा स्त्री के शोषण के लिए आवष्किृत सांस्कृतिक सूत्र भर है ?
    मैनेजर पांडेय का मानना है कि, ‘स्त्री हमारे आकर्षण का केन्द्र तो है किन्तु सम्मान की पात्र नहीं । भारतीय समाज स्त्री का सम्मान करना नहीं सीख पाया है । इसीलिए प्रेम पुरुष का विशेषाधिकार है, जबकि स्त्री के लिए अपराध । जिस समाज में स्त्री की अस्मिता नहीं, वहाँ प्रेम कैसे हो सकता है ।” राणा जी पहले भी जहर का प्याला भेजा करते थे । ‘राणा जी’ आज भी ‘ऑनर किलिंग’ किया करते हैं । अतः प्रेम को अवधारणा की कसौटी पर कसने की आवश्यकता है ताकि इसका वर्ग-चरित्र स्पष्ट हो सके और इसमें स्त्री के लिए स्पेस की तलाश की जा सके ।
    यह सत्य है कि प्रेम ही सबसे पहले आत्मबोध कराता है , स्वाधीनता का अहसास जगाता है, दूसरी ओर प्रिये के प्रति पजेसिवनेस (स्वत्वाधिकार) का भाव रखता है । उसकी आजादी सीमित करता है, बाँधता है । प्रेम और स्वतंत्रता में द्वंद्व एक शाश्वत प्रश्न है । अस्तित्ववादी दर्शन भी यह मानता है कि, ‘‘व्यक्तित्व की जिस स्वाधीनता से प्रेम के आकर्षण और भावावेग का जन्म होता है, प्रेम अपनी अन्तिम परिणति में उस की ही बलि चाहता है, इस तरह वह एक अन्तरविरोधी संवेदना है ।’ एकाधिपत्य का यह भाव भी दर्शनीय है,  ‘‘ नैनां अंतरि आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ / ना हौं देखौं और कूं, ना तुझे देखं देउं ।’’
    इस प्रकार एक आधिपत्यवादी पुरुषोचित प्रेम की अवधारणा सामने आती है जो स्त्री की स्वायतता, स्वतंत्र अस्मिता  को असंभव बनाती दिखती है । अतः स्त्री-दृष्टि से प्रेम का विश्लेषण जरुरी है ताकि इसके तनाव, द्वन्द्व और जटिलताओं को समझा जा सके । इसके जनतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया को गति दी जा सके । प्रेम का इतिहास और स्त्री का इतिहास अन्तर्गुम्फित हैं । वैयक्तिक सम्पति के उदय और स्त्री का मानवी से पदच्युत हो कर सम्पति और वस्तु में तब्दील हो जाना प्रेम के इतिहास का भी एक अध्याय है । आदिवासी और श्रमाधारित जीवन स्थितियाँ एक हद तक स्त्री-पुरुषों को सहभागी बनने को विवश करती हैं । श्रम और प्रकृति का संसर्ग उनके मनोभावों को उत्फुल्ल बनाता है। अतएव  इनके गीतों, कहानियों, चित्रों में प्रेम का ज्यादा समभावी रुप देखने को मिलता है । यहाँ स्त्रियों द्वारा रचित प्रेमगीत भी मिलते हैं जिनमें विशिष्ट अलंकरणों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती । दैनदिंन प्रयोग में आने वाली वस्तुएँ कविताई में ढ़लती हैं, ‘मन मोरा अदहन, तन मोरा चाउर, नयना मूँग के दालि /अपन बलम के जेंवना जेवंतिउ बिनु लकड़ी बिनु आगि।’ या, हंसिनी को सौत बनाती स्त्री-गीत की इन पंक्तियों में एकत्व बोध मानो दमक उठता है, ‘पिय सन अस मन मिलयूँ जस पय पानि / हंसनि भयि सवतिया, लइ विलगानि ।।’’
    आभिजात्य वर्ग को इस जीवन्त प्रेम से भेंट नहीं हो पाती । यह कल भी सच  था  और  आज भी । रानिवास की स्त्रियाँ सम्बोधन भर के लिए महारानी-रानी जो हों किन्तु हैं पूर्ण आश्रिता । अतएव वहाँ ‘स्व’ बोध कहाँ जो ऐसा प्रेम रचे । शास्त्रीय  साहित्य में , प्राचीन संस्कृत-साहित्य में भी, देह की कामना और उससे जुड़ी वायवीयता,  भावुकता, फैंटेसी ही प्रेम का आधार है । कालिदास, अश्वघोष, भारवि, माघ, अमरु आदि संस्कृत कवियों की नायिकाएँ पुरुष की काम्या, कामिनी भर हैं । उनके जीवन का एक मात्र उद्देश्य पुरुषों के लिए चिरआकर्षण का विषय भर बना रहना है । इसके अलावा उनका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं है। यह छवि ऐसी व्यवस्था से उपजी हैं जहाँ स्त्रियाँ पुरुषों के पूर्णतया अधीन हैं । पुरुष के जीवन में उनकी कोई सक्रिय सहभागिता है ही नहीं । अतएव यहाँ स्त्री लोक गीतों जैसी कोई रचना भी नहीं दिखती ।
    भक्तिकाव्य-काल का परिप्रेक्ष्य कुछ अलग है । भक्त कवियों ने सामन्ती व्यवस्था, वर्ण-व्यवस्था सबों पर चोट की । इस दौरान निम्न तबकों के साथ स्त्रियाँ भी सामाजिक-सांस्कृतिक विद्रोह की आवाज बुलंद करती हैं । अतएव यहाँ प्रेम एक नये रुप में प्रकट होता है । यहाँ ललद्येद , अंदाल, अक्का महादेवी, मीरा, ताज, हब्बा खातून, अरणिमाल जैसी सैकड़ों भक्त कवयित्रियाँ शाश्वत से नेह लगाती, उसी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करती और इस जरिए अजाने अपनी पहचान अपना ‘स्व’ भी अर्जित करती दिखती हैं । प्रेम का यह व्यापार भी अद्भुत है । ये भक्तिनें घर से निकलती हैं विद्रोह करके, सामाजिक - बन्धनों को तोड़ कर आजादी की साँस लेने लेकिन आगे बढ़ कर एक अनूठे अलौकिक  प्रेमी का दासत्व स्वीकार कर लेती हैं । यह उस देश-काल की अपनी सीमा है । मीरा ने हरि को मोल लिया या हरि ने मीरा को मोल लिया यह कौन तय करेगा ? किन्तु इतना सत्य है कि मीरा, अक्का, अंदाल या ललद्येद को यह कहने की जरुरत महसूस नहीं हुई कि पुरुष की झाँई पड़ते भुजंग अंधा हो जाता है या पुरुष नरक के द्वार या मीनार हैं ।  
   प्रेम की अवधारणा आधुनिकता के साथ बदली । आधुनिकता अपने साथ तर्क, जनतांत्रिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टि और सबके केन्द्र में मनुष्य को रख कर सामने आई । इसने आजादी, बराबरी और बंधुत्व का आदर्श सामने रखा । पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों और साहित्य-चिन्तकों ने प्रेम के नये अवतार ‘ आवेगमय प्रेम’ की अवधारणा सामने रखी । किन्तु अब प्रेम लगभग दो बराबर व्यक्तियों के बीच का कार्य व्यापार था । अब स्त्रियाँ मात्र काम्या बनने को, कामना के उपकरण बनने को तैयार नहीं थीं । अब प्रेम तो चाहिए था किंतु स्वतंत्रता का आलोप नहीं । ‘आवेगमय प्रेम’ में ‘आवेग’ कोई स्थायी वस्तु नहीं है । वह तभी तक रहता है जब तक प्रेम एक आकांक्षा या स्वप्न के रुप में हो । जैसे ही वह वास्तविक सम्बन्ध का रुप लेता है, जीवन की जटिलताएँ इससे टकराती हैं, आवेग का शीराजा बिखर जाता है । आवेग की इस भंगुरता को महसूस करते हुए इस प्रेम में स्वतंत्रता की अपनी चाह को न छोड़ते हुए भी साथी से ‘व्यक्तिगत प्रतिबद्धता’ की उत्कट कामना की जाती है । किन्तु स्त्री अब इस वाक् जाल में फँसती नहीं दिखती । वह शोषण के हर रुप से परिचित है । अब वह अपने शर्त्त पर प्रेम करना चाहती है । प्रेम उसके लिए कोई रहस्य नहीं , स्वप्न नहीं बल्कि स्वस्थ सहजीवन का आधार भर है ।
    आधुनिक काल में महादेवी प्रेम का नेतृत्व संभालती दिखती हैं । किन्तु वे आधुनिक स्त्री-आकांक्षा का प्रतीक नहीं बन पाती । छायावादी रहस्यवाद उनके प्रेम पर एक अलौकिक चादर डाले रहता है, उर में एक दीपक मदिर-मधुर शाश्वत जलता रहता है, पीड़ा और प्रकाश की धुंध खड़ा करता । ‘तुम आ जाते एक बार / कितनी करुणा कितने संदेश / पथ में बिछ जाते बन पराग/ गाता प्राणों का तार-तार/ अनुराग भरा उन्माद राग, आँसू लेते वे पद पखार ।’
    संभवतः छायावाद की एक सीमा थी । किन्तु परवर्ती कवयित्रियों ने पुरुष वर्चस्व को न केवल ठीक-ठीक समझा बल्कि उनकी धज्जियाँ उड़ा दीं । ज्योत्सना मिलन की यह काव्य पंक्तियाँ पुरुष के वर्चस्व भाव  को एक झटके में धूल चटा देती हैं, ‘प्यार के क्षणों में कभी-कभी / ईश्वर की तरह लगता है मर्द/ औरत को/ ईश्वर . . ईश्वर. . / की पुकार से / दहकने लगता है / उसका समूचा वजूद / अचानक / कहता है मर्द /  ‘‘देखो / मैं ईश्वर हूँ’’/ औरत / देखती है उसे / और / ईश्वर को खो देने की पीड़ा से बिलबिलाकर / फेर लेती है / अपना मुँह ।’’    
    अब वह पुरुष की आँखों  में आँखें डाल उसकी लुब्धता और लम्पटता के बारे में सीधे-सीधे बताना चाहती है बिना किसी संकोच-बिना किसी लाग लपेट के, ‘ अभी-अभी जब मैं तुमसे बतिया रही हूँ / संभव  है मेरी बातों में / महसूसते देह-गन्ध रोमांचित हो  रहे हो तुम / पर मत भूलो कि / जब बतिया रहे होते हो तुम गोल-गोल / तुम्हारी भाषा की दरारों से झाँक रहा होता है / तुम्हारे भीतर बैठा बदशक्ल आदमी ।’’ - (निर्मला पुतुल)
    लेकिन प्रेम में ममेतर से मिलने की कामना , बृहत्तर वृत्त से जुड़ने, शाश्वत अलौकिक का संग करने की आकांक्षा आधुनिक स्त्री भी कर रही है तभी तो अमृता प्रीतम कहती हैं, ‘ काया की हकीकत से लेकर/ काया की आबरू तक मैं थी / काया के हुस्न से लेकर/काया के इश्क तक तू था ।’’ लेकिन भक्त कवयित्रियों से यहाँ एक फर्क है यहाँ गुलामी स्वीकार नहीं । हर हाल में आजादी चाहिए देह की और रुह की भी, ‘ तो हर देश के , हर शहर की, हर गली का द्वार खटखटाओ / यह एक शाप है, एक वर है / और जहाँ भी / आजाद रुह की झलक पड़े / समझना वह मेरा घर है - अमृता प्रीतम ’’ ।
    आधुनिक स्त्रियों की नजर एकदम साफ है । आजादी - बराबरी और भगिनीत्व की शर्त्त पर उसे कुछ भी नहीं चाहिए, प्रेम भी नहीं । अस्मिता के लोप में नहीं अस्मिता के फैलाव में उसका यकीन है । अब अन्दाज तल्ख सही किन्तु इनकी कविताओं में आज भी इश्के मजाजी के साथ-साथ इश्के हकीकी की झलक है । भले उसका रुप बदला हुआ हो । अब वह प्रकृतिरुपा अपना फैलाव पूरे प्रकृति में कर रही है और उसके इस खास अन्दाजे - बयां से इश्के मजाजी जाहिर हो रही है, ‘ अभी मैं प्रेम से भरी हुई हूँ / पूरी दुनिया शिशु सी लगती है / मैं दे सकती हूँ किसी को कुछ भी / रात-दिन वर्ष-पल-अनंत/ . . . अभी जब मैं प्रेम करती हूँ / दुनिया में भरती हूँ रंग / जंगलों में बिखेरती हूँ हँसी / समुन्द्र को सौपती हूँ उछाल/ पत्थरों में भरती हूँ शान्ति , (अनीता वर्मा) ’’
    तसलीमा तो प्रेम में सूफी शायरा की तरह सीधे खुदा को पुकारी हैं, ‘‘ दोनेां बाँहें बढ़ाकर ओ अपरुप, उठा लो कोमल निदाध / मृदंग बजाकर मुझ प्यासी को प्लावन से भर दो / बड़ी साध जगती है मन में कुँवारी देह में पोत लूँ रक्तवर्णी दाग / दुनिया - जहान छोड़ एक बार छू कर देखूँ असह्य सुन्दर !’’    आधुनिक स्वतंत्रचेत्ता स्त्री ने प्रेम को थोड़ा ढंग से स्वीकारा है । उसे मोह से प्रारम्भ हुआ प्रेम स्वीकार है किन्तु साथी का पजेसिव होना उसे अब स्वीकार नहीं । उसे अपने लिए स्पेस चाहिए । वह बराबरी का सम्मान चाहती है अतः वह प्रेम में थोड़ा ऊपर उठकर ‘मित्रता-भाव’ की चाह करती है जो प्रेम का सुन्दरतम रुप है जो प्रेम को गहराई , नया आयाम देता है और जो प्रेम को भक्ति के उच्चतर भाव की तरह स्थायित्व देता है । इस प्रकार ‘मोह’, ‘प्रेम‘ और ‘मित्रता’ के रुप में  नव्य नेह अपने तीन स्तरों में प्रकट होता हैं ।    और अन्त में सिर्फ यह कि प्रेम के भावकों में देश-काल के अनुरुप भले
मनोदैहिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक परिवर्त्तन आये हों किन्तु प्रेम तो वही है एक शाश्वत भाव, राग और अनुराग जो मन में और पूरी कायनात में पल प्रतिपल सान्द्रता ग्रहण करता रहता है और रोम-रोम से अपने ‘पिऊ’ को पुकारता रहता है । जिस भाव में सोने-जगने का अन्तर भी मिट जाता है, ‘सोऊँ तो सपने मिलूँ जागु तो मन माहि’ । पिऊ को रिझाने का यह अन्दाज भी  कितना निराला है, ‘‘नैंनं की कर कोठरी, पुतली पलंग बिछाए / पलकों की चिक डाल के पी को लिय रिझाए ।’’ यही तो प्रेम है, सम्पूर्ण प्रेम । अपनी पूरी इयत्ता के साथ । आमीन ।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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