हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

क्या जनतंत्र और मीडिया फासीवाद को किराये पर दे दिए गए हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/01/2010 01:43:00 PM

तहलका के साथ बातचीत में अपने ऊपर हमले की आशंका अरुंधति ने महज कुछ ही दिन पहले जताई थी. टाइम्स नाऊ और अर्नब जो कर रहे हैं वह वास्तव में चिदंबरम और आरएसएस के कारनामों से बहुत अलग नहीं है. उन्होंने इस देश में एक लेखक को, जो महिला भी है, एक हिन्दू फासिस्ट संगठन द्वारा जुटाई भीड़ के हाथों पीट-पीट कर मार दिए जाने के हालात पैदा कर दिए हैं. और ऐसे में अभिव्यक्ति और लेखकीय आज़ादी के लिए लड़ने का दावा करनेवाले लेखकों की शर्मनाक चुप्पी सामने आयी है. 
हम यहाँ अरुंधति के ई-मेल का हिंदी अनुवाद पोस्ट कर रहे हैं. इसका अनुवाद अनिल एकलव्य ने अनुवाद किया है. प्रतिष्ठित वेबसाइट जेड-नेट के हिंदी संस्करण सह संचार से साभार. 

करीब सौ लोगों की एक भीड़ मेरे घर पर आज सुबह 11 बजह पहुँची (रविवार 31 अक्टूबर 2010)। उन्होंने गेट तोड़ दिया और सामान की तोड़-फोड़ की। उन्होंने कश्मीर के बारे में मेरे विचारों के खिलाफ़ नारे लगाए, और मुझे एक सबक सिखाने की धमकी दी।

एन डी टी वी, टाइम्स नाऊ तथा न्यूज़ 24 की ओ बी वैनें पहले से ही घटना का सीधा प्रसारण करने के लिए तैयार थीं। टी वी रिपोर्टों का कहना है कि भीड़ में मुख्यत: भाजपा के महिला मोर्चे के सदस्य थे।

जब वे चले गए तो पुलिस ने सलाह दी कि आगे से अगर हमें कभी आस-पास कोई ओ बी वैन घूमती नज़र आए तो उन्हें बताएं क्योंकि इसका मतलब होगा कि कोई भीड़ भी आने वाली है। इस साल जून में, पी टी आई द्वारा एक झूठी रिपोर्ट अखबारों में छपने के बाद दो लोग मोटरसाइकल पर आए और उन्होंने मेरे घर की खिड़कियों पर पत्थर फेंकने की कोशिश की। उनके साथ भी टी वी के कैमरामैन थे।

तमाशे की तलाश मे लगे मीडिया के इन हिस्सों तथा भीड़ और अपराधियों के बीच यह संबंध किस प्रकार का है? क्या मीडिया जो खुद को पहले ही से उस 'सीन' की जगह तैयार कर लेती है को इस बात की गारंटी होती है कि ऐसे आक्रमण और प्रदर्शन अहिंसक होंगे? अगर ऐसे में आपराधिक घुसपैठ हो (जैसा कि आज हुआ) या इससे भी बुरा कुछ हो तब? क्या मीडिया उस हालत में अपराध में भागीदार नहीं होगा?

यह सवाल महत्वपूर्ण है, यह देखते हुए कि इस समय टी वी चैनल तथा अखबार बेखटके भीड़ के गुस्से को मेरे खिलाफ उकसाने में लगे हैं।

सनसनीखेज खबरों की तलाश में खबर रिपोर्ट करने और खबर उत्पादित करने के बीच की सीमारेखा मिटती जा रही है। क्या फ़र्क पड़ता है अगर टी आर पी रेटिंग की वेदी पर कुछ लोगों की बलि चढ़ानी पड़ती है?

सरकार ने ऐसा संकेत दिया है कि मेरे तथा हाल में कश्मीर की आज़ादी पर हुए सेमिनार में शामिल अन्य वक्ताओं के खिलाफ़ राजद्रोह के आरोपों को आगे बढ़ाने का उसका इरादा नहीं है। तो क्या इस विषय पर मेरी राय के लिए मुझे सज़ा देने का ज़िम्मा दक्षिणपंथी स्टार्म ट्रूपर्स ने ले लिया है?

बजरंग दल तथा आर एस एस ने खुले तौर पर घोषणा की है वो जो भी तरीके उनके पास हैं उनका इस्तेमाल करके मुझे 'ठीक' कर देंगे, जिसमें मेरे खिलाफ देश भर में मामले दर्ज करना भी शामिल है। पूरा देश देख चुका है कि वो क्या कर सकते हैं, और उसे करने में किस हद तर जा सकते हैं।

तो, जहाँ सरकार एक हद तक परिपक्वता दिखा रही है, क्या मीडिया के हिस्से तथा जनतंत्र की व्यवस्था को उन लोगों को किराए पर दिया जा रहा है जो भीड़ के न्याय में यकीन करते हैं?

यह बात मैं समझ सकती हूँ कि भाजपा का महिला मोर्चा मेरे बहाने आर एस एस के वरिष्ठ कार्यकर्ता इन्द्रेश कुमार पर से ध्यान हटाने की कोशिश कर रहा है, जिन पर हाल ही में सी बी आई ने अजमेर शरीफ़ में हुए बम विस्फोट, जिसमें कुछ लोग मारे गए तथा कई लोग घायल हुए, के लिए मामला दर्ज किया है।

लेकिन मीडिया की मुख्य धारा के कुछ हिस्से ये सब क्यों कर रहे हैं?

क्या अलोकप्रिय मत रखने से एक लेखक किसी बम विस्फोट के आरोपी से अधिक खतरनाक है? या फिर यह विचारधाराओं के तालमेल का सवाल है?

अरुंधति रॉय
31 अक्टूबर 2010

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ क्या जनतंत्र और मीडिया फासीवाद को किराये पर दे दिए गए हैं ”

  2. By nitesh on November 1, 2010 at 3:56 PM

    देश में एक लेखक को, जो महिला भी है - क्या इस पंक्ति का मतल्ब अरुन्धति राय के लिये महिला वाली सहानुभूति बटोरना है :)

    -*-*-*-*
    जो वामपंथी नहीं वो सारे फासिस्ट और आर एस एस के लोग कितना बढिया विश्लेशण। आप विद्वानों को प्रणाम।

    -*-*-*-*

    इतन बकवास खुले आप तो कर रही है अरुंधति यह बताता है कि हमारा लोकतंत्र परिपक्व है और यहाँ चीनी भाईयों की तरह बोलने वालों पर टैंक नहीं चढाये जाते हल्कि उंनके साथ ताली पीतने के लिये वामपंथी लग जाते हैं :)

    -*-*-*-*

    चुप्पी कहाँ है? खिलाफ बोलना कब से चुप्पी हो गया? वाह से विश्लेषण :)

    -*-*-*-*

    अरुन्धति जी आप पत्थर उठाने वालों के पक्ष में खडी हों तो आजादी की वकालत अरुअ आपके खिलाफ नारे बाजी हो तो आप नारेबाजों के अभिव्यक्ति के खिलाफ :) अरे नारे बाजों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रत नहीं है क्या? :) या सिस्र आपको है ;) या जिन गलियों में आप नारे लगवाती हैं और जो लोग आपके पीछे ख्डे होते हैं केवल उनको है :) खैर आपकी आत्मप्रचार की नौटंकी चलती रहनी चाहिये।

    -*-*-*-*

    मीडिया को उकसाने की जरूरत नहीं है आपने खुद उकसाया है अरुन्धति जी और एसा आप जान बूझ के करती हैं।

    -*-*-*-*

    दूसरे मत और सिद्धांत आपके खिलाफ कैसी आवाज उठाते हैं मुझे इससे वास्ता नहीं। न मैं वामपंथी हूँ न दक्षिणपंथी लेकिन मुझे इस देश के जयचंदों, मीरकासिमों और अरुन्धतियों से चिढ है।

  3. By Anonymous on November 1, 2010 at 4:17 PM

    what Arundathi thank that main stream of media is supposed to do?

    SHE IS WRONG AND NEED TO BE CONDEMNED

    Shame on her

  4. By Reyaz-ul-haque on November 2, 2010 at 3:03 PM

    इस पोस्ट में कुछ बड़ी गलतियाँ चली गयी थीं. मैं ने अनुवादक का नाम अनिल जनविजय बताया था जबकि यह अनुवाद अनिल एकलव्य का है. इसके अलावा बयान के अंतिम लाइन में भी एक गलती थी. इन दोनों को ठीक कर लिया गया है.

    रेयाज़

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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