हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय-दूसरी किस्त

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/29/2010 05:19:00 PM

राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय -2 

हाशिया पर राष्ट्र, आधुनिकता, समुदाय और इतिहास पर प्रसन्न कुमार चौधरी के लम्बे लेख कि पहली किस्त पोस्ट की गयी थी. अब इसकी दूसरी किस्त पेश कि जा रही है. तीन किस्तों में इस लेख का प्रकाशन हंस में हुआ है, जिसे हम भाई रणेंद्र के सौजन्य से यहाँ साभार पेश कर रहे हैं. 
 
दो दृष्टियां

एक दृष्टि है जो चीजों को, परिघटनाओं को निरपेक्ष रूप से एक-दूसरे के विरूद्ध खड़ा कर देखती है, ‘बनाम’ की दृष्टि से चीजों को परखती है. ईश्वर बनाम शैतान, अच्छा बनाम बुरा, सही बनाम गलत, सफेद बनाम बर्बर, हम बनाम वे, आदि, आदि. फलतः यह विचार पद्धति स्याह को समाप्त कर सफेद को, गलत का विनाश कर सही को, निम्न को निष्कासित कर श्रेष्ठ को, बर्बर का उन्मूलन कर सभ्य को ... प्रतिष्ठित करने का अभियान चलाती है.

कहा जाता है कि विद्युतीय तथा कम्प्युटर जैसे उपकरण, मानव-मस्तिष्क के न्यूरॉन्सः में सूचना-संप्रेषण की विद्युतीय किया इसी द्विचर (बाइनरी) आधार पर काम करती है-ऑन-ऑफ, शून्य-एक. सृष्टि के विभिन्न अस्तित्व रूपों को मनुष्य इसी बाइनरी आधार पर ग्रहण करता है.

यह दृष्टि मानव-जाति के उद्भव से तथा औजार निर्माण से जुड़ा रहा है. इसने इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. आदिम चिंतन में भी हम युग्म प्रतीकों तथा द्विचर विरोधों (हां-ना, काला-सफेद, आदि) का साक्षात करते हैं. मानव समेत अन्य प्राणियों के शरीर में और औजार निर्माण में हम दक्षिण तथा वामपक्षीय समिति, ऊर्ध्व-अधर, अग्र-पश्च, मध्य-छोर आदि सामान्य प्रकार के द्विचर विरोधों को अवलोकन करते हैं. बहरहाल, बुनियादी विरोधों के रूप में ऐसे वर्गीकरण सिद्धांतों का सूत्रीकरण 1896 ई. में इंगलैंड में आर. डेन्नेट द्वारा और 1902 ई. में फ्रांस में ई. दुर्खीम तथा एम. मास्स द्वारा किया गया. विरोधों के अनन्य महत्व के प्रदर्शन के इस संदर्भ में के. लेवी-स्ट्रॉस का भी नाम लिया जा सकता है (1958). (वलेरी अलेक्सेयेव, ‘मानव-जाति की उत्पति’, मास्को, 1987)

निरपेक्ष रूप से श्रेष्ठ और निम्न की अवधारणा के पक्ष में कुछ मनोविश्लेषकों का मानना है कि मानव-शिशु चूंकि अपेक्षाकृत लंबे समय तक अपने पालन-पोषण के लिए बड़ों पर आश्रित होता है, इसलिए शैशवावस्था में ही शिशु-मस्तिष्क में बड़े (पिता) निरपेक्ष रूप से ‘श्रेष्ठ’ तथा ‘सबल’ के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं और वयस्क हो जाने के बावजूद अवचेतन में मौजूद यही श्रेणीकरण (द्विविभाजन) अन्य क्षेत्रों में भी अभिव्यक्ति पाता है.

इसी दृष्टि के साथ एक और दृष्टि भी जोड़ दीजिए. इसके अनुसार सृष्टि और उसके सारे अस्तित्व-रूप कुछ निश्चित नियमों से संचालित होते हैं, इन नियमों को पूरी तरह जाना जा सकता है और इन नियमों को जान लेने के बाद सृष्टि का सारा रहस्य स्वतः समाप्त हो जाएगा. इसी दृष्टि के आधर पर कुछ वैज्ञानिक ‘थ्योरी ऑफ एवरीथिंग’ विकसित करने में जुटे हैं.

इस जीवन-दृष्टि पर आधारित कई वैचारिक शाखाएं, संप्रदाय और स्कूल मौजूद हैं. जीवन-दृष्टि एक होने पर भी अनेक विचारशाखाओं की मौजूदगी और उनके बीच निरंतर चलनेवाले विवादों का कारण यह है कि कया सफेद है और क्या स्याह, क्या सही है और क्या गलत, क्या श्रेष्ठ है और क्या निम्न, क्या सभ्य है और क्या बर्बर, क्या पश्चिम है और क्या पूरब...इन प्रश्नों पर इनमें. मतैक्य नहीं है (हो भी नहीं सकता). इसी तरह सृष्टि और मानव समाज को संचालित करनेवाला कौन-सा नियम अथवा. नियमों का समूह सही या गलत है, इस पर इनमें सहमति नहीं है.

यह सृष्टि हर विचार को विभिन्न सांचों पर बांटकर रख देती है-भाववादी, भौतिकवादी, द्वंद्ववादी, अधिभूतवादी, प्रत्यक्षवादी, प्रभाववादी, सारसंग्रहवादी, तार्किक प्रत्यक्षवादी, आदि. जो विचार इन सांचों में नहीं समा पाते, उन्हें वे तोड़कर अलग-अलग सांचों में डाल देते हैं. बुद्ध के विचार फलां प्रतिशत भाववादी. कबीर थोड़े भौतिकवादी, थोड़े अद्वैतवादी. उनके दोहे की एक पंक्ति भौतिकवादी, दूसरी पंक्ति रहस्यवादी-भाववादी. आदि, आदि. इस तरह, इस सृष्टि के विचारक मानव-जाति के सभी पूर्व विचारकों और उनके विचारों के प्रति न्यायाधीश का रूख अख्तियार करते हैं और उन पर अपने फैसले सुनाते हैं.

दूसरी दृष्टि चीजों और परिघटनाओं को उनके दिक्-काल सापेक्ष परिपेक्ष्य में देखती है... किसी भी चीज अथवा परिघटना को अनंत (सापेक्ष) परिप्रेक्ष्यों में देखा जा सकता है. कोई भी पर्यवेक्षण अंतिम नहीं हो सकता. देखना कभी खत्म नहीं होता. एक सापेक्ष परिप्रेक्ष्य में जो महान है, वही दूसरे परिप्रेक्ष्य में अधम हो सकता है, सफेद भिन्न परिप्रेक्ष्य में स्याह है, श्रेष्ठ निम्न है, सभ्य बर्बर और पूरब पश्चिम हो सकता है. (जैसा कि ‘स्टार वार्स’ में एनाकिन स्काइवाकर के इस प्रश्न कि ‘या तो तुम मेरे साथ हो या फिर मेरे दुश्मन हो’ के जवाब में जेदाइ ओबे-वान केनोबी कहता है, ‘निरपेक्षों में सिर्फ सिथ (तामसिक लोग) ही विश्वास रखते हैं.’)

अतः यह दृष्टि विभिन्न दिक्-काल सापेक्ष परिप्रेक्ष्यों को समझने और उन्हें उचित सम्मान देने पर जोर देती है. दो भिन्न परिप्रेक्ष्यों के बीच का संबंध सही और गतल का संबंध नहीं है, उन्हें बनाम के रूप में पेश नहीं किया जा सकता. एक ही समय एक साथ कई (कहिए अनंत) सत्य मौजूद रहते हैं, संघर्ष और टकराव सापेक्ष सत्य एकमात्र सत्य होने को ‘दावा करते हुए’ अन्य सारे सापेक्ष सत्यों का सफाया करने लगता है. हर सत्य का अपना समय है, अपना स्थान है, अपनी उम्र है. समस्या अपनी उम्र से परे जीने की लालसा है.

इस समावेशी जीवन-दृष्टि में ‘एकमात्र’ और ‘अंतिम’ जैसे शब्दों का कोई स्थान नहीं. इसमें ‘कोई विकल्प नहीं है’ जैसे प्रस्ताव नहीं होते. चूंकि सृष्टि और उसके अस्तित्व-रूपों के अनंत आयाम हैं, इसीलिए विकल्पों का भी कोई अंत नहीं. जब आपको लगता है कि सारे दरवाजा बंद हो चुके हैं, तब यह दृष्टि आप में विकल्पों के अनेक झरोखे होने का विश्वास जगाती है और उन्हें ढूंढ़ने तथा साकार करने का साहस पैदा करती है.

यह दृष्टि हमें किसी व्यक्ति, समाज और बाह्य जगत की किसी एकआयामी व्याख्या से रोकती और हमारे मूल्यांकनों को निंदा-प्रशंसा की सफेद-स्याह दुनिया से मुक्त कर देती है. इस दृष्टि के अनुसार, एक बंद दुनिया के ही कुछ निश्चित नियम अथवा नियमों के समूह हो सकते हैं. एक खुली दुनिया को, अनंत प्रवाहमान सृष्टि को नियमों के कुछ निश्चित समूहों में कैसे सीमित किया जा सकता है? नियम हैं और उनके व्यवहारिक उपयोग भी हैं, लेकिन वे एकमात्र नियम नहीं हैं. न्यूटन-पूर्व तथा न्यूटन की त्रिआयामी दुनिया में आइंस्टीन की (दिक्-काल आयाम को जोड़ते हुए) चतुरायामी दुनिया की खोज अब स्ट्रिंग थ्योरी के अंतर्गत षट्आयामी दुनिया और नवीनतम एम-थ्योरी में ग्यारह-आयामी दुनिया तक जा पहुंची है-लेकिन जो सृष्टि अनंत है, ग्यारह आयामों में कैसे बांधा जा सकता है? इस दृष्टि में अनवरत अन्वेषण का आनंद है, न कि अंतिम नियम पा लेने की अहमन्यता.

यह दृष्टि भी मानव-मन में कमोवेश मानव-जाति के जन्मकाल से मौजूद है और इसका भी प्रागैतिहासिक मानव-जनों के उत्पादक कार्यकलाप से, उनके औजार-निर्माण से अंतरंग रिश्ता है. अमेरिकी पुरातत्वविद टी. विन्न ने ओल्डुवाई दर्रे से प्राप्त (सोलह लाख से साढ़े ग्यारह लाख वर्ष पुरानी) पुरातात्विक सामग्री की तुलना (तीन लाख तीस हजार से एक लाख सत्तर हजार साल पुरानी) हसीमिल से प्राप्त सामग्रियों से की. करीब दस लाख वर्ष से भी  ज्यादा लंबे कालखंड के दौरान औजार निर्माण में हुए परिवर्तनों और साथ ही उसमें प्रतिबंबित मानसिक विकास-क्रम का अध्ययन कर उन्होंने संक्रियात्मक गुणों का निरूपण किया, जिसका प्रतिबिंब हस्तकुठार तथा खंडकों जैसे पत्थर के औजारों में देखा जा सकता है. ये गुण हैं: (1) पूर्ण से अंश के और अंश से पूर्ण के संबंध की समझ, (2) अंशों के सहसंबंध का ज्ञान, (3) दिक्-काल संबंधी चेतना और (4) वस्तुओं अथवा संक्रियाओं की एकरूपता का बोध. (वलेरी अलेक्सेयेव, वही) (प्रसंगवश, हस्तकुठार तथा खंडकों के निर्माण में हम मानस के जिन बुनियादी संक्रियात्मक गुणों का साक्षात करते हैं, क्या वही मानव-जाति के हजारों वर्षों के इतिहास में तत्वशास्त्रीय विमर्श के प्रमुख विषय नहीं रहे हैं?)

मस्तिष्क विज्ञान भी अब न्यूरॉन्स की दुनिया से आगे (न्यूरॉन्स को जोड़नेवाले) साइनेप्सेज और साइनेप्टिक क्लेफ्ट्स की दुनिया में जा पहुंचा है. चेतना के उत्स की खोज में लगे वैज्ञानिक अब बताते हैं कि इन्हीं साइनेप्टिक क्लेफ्ट्स के माइक्रोट्युब्यूल्स (सूक्ष्म नालिकाओं) में ‘बोस-आइंस्टीन कंडेन्सेशन’ की, क्वांटम कोहेरेंस की परिघटना घटित होती है-बड़ीं संख्या में सूक्ष्म कण एकल क्वांटम अवस्था सामूहिम रूप से भागीदार होते हैं. मस्तिष्क की बुनियादी संक्रियाओं को अब इसी परिघटना से जोड़ा जा रहा है. (रोजर पेनरोज, ‘शैडोज ऑफ दि माइंड’, लंदन, 1995) यह न्यूरॉन्स की ‘ऑन-ऑफ’ की दुनिया नहीं, माइक्रोट्युब्यूल्स की क्वांटम सहभागिता की दुनिया है-विरोधों का द्वंद्व नहीं, भिन्नताओं का एकत्व.

इस दृष्टि के अनुसार, हर विचारशाखा के अतिवादी दावों और सार्विक होने की जिद को दरकिनार कर दिया जाए तो उनमें अंतनिर्हित सापेक्ष सत्यों की शिनाख्त की जा सकती है. पहली दृष्टि पर आधारित विभिन्न विचारशाखाएं आपस में भले लड़ती रहें, यह दृष्टि तो पहली दृष्टि में भी अंतर्निहित दिक्-काल सापेक्ष सत्य को सवीकार करती है और इतिहास में उसके यथोचित स्थान का सम्मान करती है.
स्वसिद्धांतव्यवस्थासु द्वैतिनो निश्चिता दृढम.
परस्परं विरूध्यन्ते तैरयं न विरूध्यते...
(मांडूक्य उपनिषद, गौड़पाद की. कारिका, 3/17)  

हर व्यक्ति और आंदोलन दिक्-काल सापेक्ष स्थितियों के अनुरूप भौतिकवादी, प्रत्यक्षवादी, परिणामवादी या भाववादी होता है. उसी तरह, व्यक्ति और समाज में हर समय एक ही साथ पूर्व परंपरागत, परंपरागत, आधुनिक और उत्तर-आधुनिक प्रवृतियां होती हैं, भले ही स्थितियों के अनुरूप उनका अनुपात अलग-अलग हो. समुचित संदर्भों से हटकर निपेक्ष रूप में हम वैचारिक सांचों में बांटकर इन प्रवृत्तियों का मूल्यांकन नहीं कर सकते.

पहली दृष्टि की स्वाभाविक परिणति हिंसा के महिमामंडन में होती है, जबकि दूसरी दृष्टि की नैतिक निष्पत्ति अहिंसा में. (जैनियों की अहिंसा का नैतिक संदर्भ अनिवार्यतः उनकी अनेकांतवादी दृष्टि का परिणाम है.)

मानव-जाति के सभी समाजों में ये दोनों दृष्टियां मौजूद रही हैं. हां, अलग-अलग स्थितियों में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में दोनों दृष्टियों का अनुपात एक समान नहीं रहा है. किसी खास काल में किसी समाज अथवा जीवन के किसी क्षेत्र में एक दृष्टि प्रभावशाली स्थिति में हो सकती है, तो दूसरे काल में दूसरी दृष्टि.

यूरोपीय आधुनिकता में पहली दृष्टि हावी रही है. वहीं क्वांटम विज्ञान में, यूरोप के उत्तर-आधुनिक विमर्श में दूसरी दृष्टि का पक्षपोषण सहज ही रेखांकित किया जा सकता है. लेकिन जाहिर है, यह दूसरी दृष्टि की ओर रहा है. विस्तार में जाने की जगह हम बस कुछ उद्धरणों तक ही खुद को सीमित रखेंगे.

ऐमी सीजैर (फ्रेंच कम्यूनिस्ट पार्टी के महासचिव मॉरिस थोरेज के नाम पत्र)
‘मैं किसी निपट विशिष्टतावाद की दीवार में खुद को चिनवाने नहीं जा रहा हूं. न ही मैं किसी हाड़-मांस विहीन सार्विकता में गुम होना चाहता हूं....सार्विकता का मेरा विचार भिन्न है. यह तमाम विशिष्टताओं से. युक्त सार्विकता है, यह तमाम विशिष्टताओं का और गहन होना है और उन सबका सह-अस्तित्व है.’

फ्रांज फैनन
‘इतिहास स्पष्ट रूप से सह सिखाता है कि उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई राष्ट्रवाद के सीधे रास्ते पर नहीं चलती....रूढ़िवादी राष्ट्रवाद सम्राजवाद द्वारा गढ़ी गई लीक का ही अनुसरण करता है...साम्राज्यवाद से ही विरासत में प्राप्त सोपान का स्थान गतिशील संबंधों की नई व्यवस्था को लेना होगा.’

कियान लीकुन (अपने आलेख ‘रिफ्युजिंग टू फॉरगेट’ में लु शुन, 1881-1936, की रचना ‘पोस्टस्क्रिप्ट टू ग्रेव’ का हवाला देते हुए)
लु शुन की मान्यता थी कि विकास-क्रम की श्रृखंला में सब कुछ मध्यवर्ती है....कोई भी पूर्ण अथवा विशुद्ध क्षितिज के परे ही रहेगी. वह एक ऐसा आदर्श है जिसका अनुसरण तक किया जाना चाहिए, लेकिन जिसकी प्राप्ति असंभव है. उसके अनुसरण से ही बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धियों की प्रेरणा मिलती है. उन्होंने भी एक बहु-संस्कृति वाले विश्व की प्रत्याशी की थी.
वाङष्याओ मिंग
‘(चीन की) जटिल स्थितियों की पृष्ठभूमि में चीजों को परस्पर विरोधी श्रेणियों (डायकोटोमीज)- परंपरागत/आधुनिक, खुला/बंद, रूढ़िवादी/सुधारवादी, बाजार/योजना, समाजवाद/पुंजीवाद, कम्युनिस्ट/कम्युनिस्ट-विरोधी-में बांटकर सोचने का बुद्धिजीवियों का असाधारण हठ बड़ा ही सतही लगता है...सांस्कृतिक अध्ययनों को आधुनिक बनाने के नाम पर, जीवन के अलग-अलग सांचों में कदापि कैद नहीं होने देना होगा. न ही अधिकाधिक जटिल होती जा रही शैक्षणिक-प्रशासनिक व्यवस्थाओं में कार्यशील ज्ञान के नियमन के जाल में फंसना होगा.....चीन में सांस्कृतिक अध्ययनों को न प्रचिलित ज्ञान-शाखाओं की सीमाओं का पालन करना चाहिए, न ही खुद एक नई ज्ञान-शाखा बनना चाहिए....’

भारतीय संदर्भ
भारतीय वैचारिक परंपरा में दूसरी दृष्टि की प्रभावशाली उपस्थिति देखी जा सकती है. ऋग्वेद और उपनिषदों से लेकर जैन, बौद्ध, तांत्रिक मतों, सिद्ध-संतों के दोहों में, सिख गुरुओं की वाणी में भक्तिकालीन सूफी-संत-फकीरों के दोहों तथा कवित्तों में इस दृष्टि का प्रवर्तन अनेक रूपों में हुआ है. इस दृष्टि के चिंतकों-विचारकों की दुनिया से आगे जाकर आम लोगों तक विस्तार हुआ. विभिन्न जनों, जातियों, समुदायों, भाषाओं-बोलियों, पंथों-संप्रदायों, पर्व-त्योहारों, खानपान, पहनावों, रीति-रिवाजों वाले हमारे देश में यह दूसरी दृष्टि हमारे अस्तित्व की आवश्यक शर्त है, हमारा ऐतिहासिक अनुभव है.

हमारा यह ऐतिहासिक अनुभव हमारी महागाथाओं. (रामायण/महाभारत) में भी काफी प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त हुआ है. वनवास-अज्ञातवास जैसे प्रसंगों को इस दृष्टिकोण से देख जा सकता है. वनवास के दौरान ही प्रमुख चरित-नायक अनेक जनों के संपर्क में आते हैं, उनके साथ बंधुत्व कायम करते हैं... उनके बीच. उनके होकर रहते हैं, उनके मुसीबतों में उनकी मदद करते हैं, उनके खानपान, रीति-रिवाज, उनकी वेश-भूषा, आदि से परिचित होते हैं. भारत के करीब-करीब सभी अंचलों में उनकी कथा के सूत्र मिलते हैं. उन क्षेत्रों में अदा की जानेवाली उन जनों की निर्णायक भूमिका सुरक्षित है. उन क्षेत्रों के लोगों और जनों को लगता है कि उनकी भूमिका के बिना इन चरित-नायिकों की कथा आगे बढ़ती ही नहीं.

इस प्रकार वनवास-अज्ञातवास भारतीय समाज का नेतृत्व करने, और शासन करने योग्य क्षमता हासिल करने का प्रशिक्षण-काल साबित होता है. वनवास के इस दीर्घ अनुभव के बाद ही वे राजकाज संभालने योग्य होते हैं. (कुछ भिन्न संदर्भ में, स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व ग्रहण करने से पूर्व महात्मा गांधी द्वारा ट्रेन के साधारण डिब्बे मे की गई भारत-यात्रा को इस परंपरा में देख सकते हैं.)

भारत जैसी विविधतावाले देश में स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व दूसरी दृष्टि अपनाकर ही किया जा सकता था और इसका मतलब था द्विचर (बाइनरी) विरोधों पर आधारित यूरोपीय आधुनिकता का परित्याग. इस आधुनिकता एक चरित्र-लक्षण था हिंसात्मक क्रांति के जरिए सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन. वैसे सामंती कृषि युग में भी सत्ता परिवर्तन प्रायः हिंसात्मक उपायों से ही हासिल किया जाता था, तथापि यूरोप की पूंजीवादी क्रांतियों के दौरान हिंसात्मक जनक्रांति का पूरा शास्त्र गढ़ा गया. अगर आप जनतंत्रवादी हैं तो शस्त्र उठाइए और राजतंत्रवादी का सफाया कीजिए. फलतः आधुनिक राजनीति-शास्त्र में सैनिक शब्दावलियों की भरमार हो गई. रूसो, वाल्तेयर, मैकियावेली, हाब्स आदि के साथ-साथ क्लाउजेवित्ज भी राजनीतिक विमर्श में प्रायः उद्धृत किए जाने लगे.

स्वभावतः द्विचर विरोधों पर आधारित यूरोपीय आधुनिकता के परित्याग का मतलब था हिंसात्मक क्रांति का परित्याग. भारत में इस घटना ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में मूर्तिमान रूप ग्रहण किया. उन्होंने विचार और व्यवहार के लगभग हर क्षेत्र में (चिंतन, कार्यशैली, भाषा, वेश-भूषा, आदि में) इस आधुनिकता  का विकल्प प्रस्तुत करने की कोशिश की और काफी हद तक सफल भी हुए. पहले वर्णित भारतीय विचार-परंपरा ने उनकी इस कोशिश को बल प्रदान किया और वे यूरोपीय आधुनिकता के समांतर भारतीयता के प्रतीक-पुरुष बन गए. मानव समुदाय के एक रूप के बतौर राष्ट्र की जो अवधारणा यूरोपीय आधुनिकता ने प्रस्तूत की थी, भारत उस अर्थ में राष्ट्र नहीं था, न ही महात्मा गांधी उस अर्थ में एक राष्ट्रवादी नेता. उन्हें परिभाषित करना यूरोप के लिए एक चुनौती था-एक आध्यात्मिक संत? चतुर राजनीतिज्ञ? हाफ-नेकेड फकीर? धूर्त पाखंडी? इसी तरह समुदाय के रूप में भारतीय समाज भी यूरोपीय आधुनिकता के लिए चुनौती बना रहा. हिंसात्मक आंदोलन के साथ प्रायः कम्युनिस्टों का नाता जोड़ा जाता है, लेकिन कम्युनिस्ट खुद हिंसात्मक क्रांति की प्रेरणा बुर्जुआ क्रांतियों से पाते थे. 1879 में ‘दि शिकागो ट्रिब्यून’ के संवाददाता के इसी आशय के प्रश्न का जवाब देते हूए कार्ल मार्क्स ने कहा था, ‘कोई महान आंदोलन बिना रक्तपात के कभी संपन्न नहीं हुआ है. अमेरिका की स्वतंत्रता रक्तपात से हासिल की गई. नेपोलियन ने एक खूनी प्रक्रिया के जरिए ही फ्रांस पर अपना कब्जा जमाया, और वह उसी तरीके से उखाड़ भी फेंका गया. इटली, इंगलैंड, जर्मनी और प्रत्येक देश इस बात का प्रमाण मुहय्या करता है. जहां तक हत्याओं की बात है, यह कोई नई बात नहीं है. मुझे शायद ही कुछ कहने की जरूरत है. ओरसिनी ने नेपोलियन की हत्या करने की कोशिश की. अन्य किसी की तुलना में राजाओं ने सबसे अधिक हत्याएं की हैं, जेसुइट्स ने हत्याएं कीं, क्रॉमवेल के समय प्युरिटन्स ने लोगों को मौत के घाट उतारा. इन सब कार्यों को तब अंजाम दिया गया अथवा देने की कोशिश की गई, जब समाजवाद का पता ठिकाना तक नहीं था...’ (‘दि शिकागो ट्रिब्यून’ में पहली बार प्रकाशित, सं. 6;5 जनवरी, 1879; कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स, कलेक्टेड वर्क्स, खंड 24, मास्को, 1989) इस तरह हिंसात्मक क्रांति का पक्षपोषण कोई नई बात नहीं थी, यह तो यूरोपीय आधुनिकता का अनिवार्य तत्व था और कम्युनिस्ट खुद इस आधुनिकता की उपज थे. भारत में भी इस आधुनिकता से प्रेरित समूह अथवा दल (‘इतिहास में ऐसा होता आया है’ की तर्ज पर) हिंसात्मक क्रांति का पक्षपोषण करते थे.
नई बात थी अहिंसात्मक आंदोलन. लेकिन हिंसात्मक क्रांति की शब्दावली और कार्यशैली के साथ अहिंसात्मक आंदोलन का संचालन नहीं किया जा सकता था. इसीलिए महात्मा गांधी ने नई शब्दावली और नई कार्यशैली गढ़ी- सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा, रचनात्मक कार्यक्रमों की एक श्रृंखला, आश्रमों का जाल. इनमें से लगभग प्रत्येक मामले में वे खुद अनेक प्रयोगों से गुजरे, क्योंकि उनके पास कोई पूर्व उदाहरण मौजूद नहीं था. अपनी विनम्रता में उन्होंने भले ही इन कार्यों के लिए थॉरो, रस्किन और टॉल्सटॉय का प्रभाव स्वीकार किया हो, लेकिन सच्चाई यह थी कि एक विराट अहिंसात्मक राजनीतिक आंदोलन में करोड़ों लेगों की गोलबंदी इतिहास में अनूठी घटना थी. (प्रसंगवश, उपर्युक्त तीनों चिंतक भी यूरोपीय आधुनिकता का विकल्प ढूंढ़ने अथवा प्रस्तुत करने के अपने प्रयासों के लिए जाने जाते थे) गांधी के बाद हिंसात्मक क्रांति के हर पैरोकार को बचाव की मुद्रा अपनानी पड़ी. हिंसात्मक आंदोलन की कोशिशें समाप्त नहीं हुईं, लेकिन अब एक नई अहिंसक आंदोलनकारी धारा के व्यापक जनगोलबंदी के माध्यम से उसे पीछे जरूर धकेल दिया था. चूंकि यह एक नया प्रयोग था, इसीलिए आरंभिक दौर में इसे स्थापित करने के लिए उन्हें अपेक्षाकृत कट्टर रवैया अपनाना पड़ा और कभी-कभी कुछ कठौर फैसले भी लेने पड़े. राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बीच नए विचारों को स्थापित करने के लिए ऐसा करना जरूरी होता है. अहिंसा के एस प्रयोग के कारण ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में वे विभिन्न क्षेत्रों के विभिन्न विचारों, पंथों, संप्रदायों तथा अन्य समुदायों के लोगों को एकजुट करने में कामयाब हुए.

भारत के लिए इसका खास महत्व था. अनेक विविधताओं से भरे-पूरे तथा विभिन्न क्षेत्रों के असमान विकास के कारण भारत में सशस्त्र आंदोलन का कोई प्रयास कुछेक क्षेत्रों तक सिमटकर रह जाने या फिर दीर्घकालीन गृहयुद्ध में अधःपतित हो जाने को बाध्य था-यह औपनिवेशिक शासकों को भी भारत में जमे रहने का सुनहरा मौका प्रदान कर देता. 1857 के प्रथम स्वातंत्र्य -युद्ध की भी यह एक महत्वपूर्ण सीख थी और बाद में चले शस्त्र आंदोलनों की परिणति भी इसे पुष्ट करती हैं.

बहरहाल महात्मा गांधी की अहिंसा यूरोपीय आधुनिकता के विकल्प के रूप में सामने आई थी, इसीलिए इस आधुनिकता से उत्पीड़ित जनों एवं राष्ट्रों में इसके प्रति स्वाभाविक आकर्षण पैदा हुआ, और कइयों के लिए प्रेरणास्त्रोत भी बना. यूरोपीय आधुनिकता का परित्याग कर भी आधुनिक हो सकते हैं और आधुनिक होने के अपने नए अर्थ गढ़ सकते हैं.

भारत के वैचारिक परंपरा में जहां हम दूसरी दृष्टि की प्रभावकारी उपस्थिति देखते हैं, वहीं सामाजिक नियमन से संबंधित भारत के स्मृति साहित्य में पहली दृष्टि की प्रधानता मिलती है. यथार्थ जगत में इन दो दृष्टियों के बीच निपट विभाजक रेखाएं खींचना मुश्किल है-स्मृतियों में भी दूसरी दृष्टि से संबंधित विचार मिलते हैं, वहीं दार्शनिक परंपरा में भी पहली दृष्टि का प्रभाव जगह-जगह परिलक्षित होता है. यहां हम मुख्यतः दो धाराओं की चर्चा कर रहे हैं.

पहली दृष्टि के चरम अभिव्यक्ति हम जातीय सोपान पर आधारित भारत की सामाजिक संरचना में देख सकते हैं-द्विज और शुद्र, स्पृश्य और अस्पृश्य के बीच जन्मजात विभाजन की उत्पीड़क सामाजिक व्यवस्था जिसमें जन्म से निर्धारित जातीय अस्मिता अन्य सारी अस्मिताओं का दमन कर देती है. कुछ जातियों को वर्चस्व का सारा सुख और अन्य को वंचना का सारा दुख प्रदान करती है.

जातीय सोपान पर आधारित भारतीय समाज पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का स्वभावतः एक जैसा प्रभाव नहीं पड़ना था. फलतः इस शासन के प्रति भारत के विभिन्न समुदायों और जातियों का रूख भी एक जैसा नहीं होना था. औपनिवेशिक शासन के किसी एक पाठ की जगह अनेक पाठ होना कतई स्वाभाविक था. वैसे, अंग्रेज भारत में सामाजिक सुधार के लिए नहीं आए थे, उनका संबंध एक भिन्न उत्पादन प्रणाली से था और उनके देश में नई-नई सामाजिक तथा राजनीतिक संस्थाएं आकार ग्रहण कर रही थीं. कृषि युग के विगत साम्राज्यों से व्यापारिक औधोगिक तथा वित्तीय पूंजी के औपनिवेशिक हित भिन्न थे. और उनकी शासन प्रणाली भी.

अंग्रेजी शिक्षा, सरकारी नौकरी, और बाद में (मनोनयन अथवा निर्वाचन के जरिए) राजनीतिक प्रतिनिधित्व दलित-उत्पीड़ित तथा पिछड़े समुदायों का भारतीय समाज की जातीय जकड़बंदी से, बंद तथा बहिष्कृत दुनिया से मुक्त करने में उपयोगी साबित हुआ था. भारतीय समाज की पुनर्रचना के  प्रयासों में यूरोपीय आधुनिकता उनके लिए त्याज्य नहीं, (और हुआ भी.) पहली दृष्टि पर आधारित भारतीय स्मृति परंपरा की काट पहली दृष्टि पर ही आधारित यूरोपीय आधुनिकता से की जा सकती थी.

समाज की पुनर्रचना के प्रयासों ने दलित-उत्पीड़ित-पिछड़े समुदायों की विशाल आबादी की रचनात्मक ऊर्जा का सामाजिक पुनर्रचना में कारगर उपयोग स्वतंत्रता के बाद जारी रहना था. स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक पुनर्रचना के प्रयासों के बीच सतह पर दिखनेवाली टकराहटों के बावजूद दोनों धाराएं एक-दूसरे की पूरक थीं और भारतीय समाज की अग्रगति के लिए अपरिहार्य भी.

बहरहाल, सामाजिक पुनर्रचना के प्रयासों में यूरोपीय आधुनिकता का सीमित उपयोग तो किया जा सकता था, लेकिन वह इस पुनर्रचना का आधार नहीं हो सकती थी. भारतीय समाज में द्विचर विभाजनों के आधार पर किसी समस्या का समाधान नामुमकिन है. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही भारतीय समाज की पुनर्रचना के प्रतीक-पुरुष बन गए डॉ. बाबासाहब अंबेडकर अपने विचारों, अपनी कार्यशैली और वेशभूषा में (महात्मा गांधी से उलट) यूरोपीय आधुनिकता के प्रतिनिधि-पुरुष दिखते थे और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने के क्रम में उन्होंने इस आधुनिकता का इस्तेमाल भी किया. मुख्यतः स्मृतियों के परंपरा के खिलाफ उनकी लड़ाई एक समावेशी भारतीय संविधानके निर्माण के साथ, जिसमें यूरोपीय आधुनिकता के कई उपयोगी तत्वों को भी शामिल कर लिया गया था और जिसकी रचना में स्वतंत्र भारत के पहले विधि मंत्री तथा संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, बहुत हद तक एक मुकाम हासिल कर चुकी थी.

बहरहाल, भारतीय समाज की पुनर्रचना के आधार के रूप में उन्हें भी यह यूरोपीय आधुनिकता अपर्याप्त लगी. अंततः उन्होंने बुद्ध धर्म के साथ अपना वैचारिक नाता जोड़ा (पश्चिम विचारकों की शब्दावली में उन्होंने जुडियो-क्रिश्चियन पंथ की जगह एक इंडिक पंथ का वरण किया). यह बुद्ध का पुनराविष्कार था और उन्हें नया अर्थ देना था. इस तरह उन्होंने दलितों को फ्रेंच इनलाइटेनमेंट से नहीं, बल्कि यूरापीय ज्ञानोदय के करीब दो हजार वर्ष पूर्व के भारतीय एनलाइटेंड (बुद्ध) से जोड़ दिया. बुद्ध का दर्शन नहीं है. (बाबासाहब भारतीय और पश्चिमी विचार परंपरा के गहन अध्येता थे और उन्होंने यह निर्णय काफी मनन-चिंतन के बाद लिया था. प्रसंगवश, बौद्ध राजाओं के बीच विभिन्न समयों में हुए कुछेक युद्धों के बावजूद भारतीय समाज में इन दोनों धाराओं का समन्वय घटित हुआ. गुप्त साम्राज्य के पतन और उत्तर भारत में पालों के प्रभुत्व के बीच के करीब पांच सौ वर्षों के दौरान जमीनी स्तर पर इस समन्वय में तांत्रिक संप्रदायों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. दूसरे दलित नेता अपना वैचारिक संबंध विभिन्न संतो-सूफियों-फकीरों के संप्रदायों से जोड़ते थे.)

इस तरह यूरोपीय आधुनिकता का उपयोग करने के बावजूद उन्होंने वैचारिक तौर पर उस आधुनिकता का परित्याग कर दिया. प्रकटतः एक-दूसरे के उलट दिखने के बावजूद सारतः महात्मा और बाबासाहब अंततः एक ही जगह खड़े थे.

राष्ट्र-जनता
जैसा कि हम पहले देख चुके हैं कि प्रत्येक राजनीतिक विचारधारा की भांति राष्ट्रवादी विचारधारा भी अपनी एक अमूर्त राष्ट्र-जनता की रचना करती है. राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान इस अमूर्त राष्ट्र-जनता को मूर्त राष्ट्र-जनता में तब्दील कर दिया जाता है. राष्ट्रवादी आंदोलन का मूल लक्ष्य हासिल हो जाने के बाद इस मूर्त राष्ट्र-जनता को पूनः अमूर्त राष्ट्र-जनता में परिणत कर दिया जाता है.

इसे अलावा, हर राजनीतिक विचाधारा अपनी यथार्थ मांगों को अमूर्त सपनों की पैकेजिंग के साथ प्रस्तुत करता है. यथार्थ प्रायः सपनों के साथ ही अवतरित होता है. यथार्थ मांगों की पूर्ति के बाद और कुछेक सपनों के साकार होने के साथ पैकेजिंग के रूप में आए अमूर्त सपनों को भी त्याग दिया जाता है, वैसे ही जैसे किसी माल की प्राप्ति के बाद आप पैकेजिंग की सामग्री कूड़ेदान में डाल देते हैं.

समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक रूप से सक्रिय मूर्त जनता का एक हिस्सा अमूर्त की दुनिया में वापस जाने से इंकार कर देता है (जैसाकि कुछ पौरांणिक कथाओं में, उलट रूप में, वर्णित किया गया है-स्वप्न में भ्रमण को निकली आत्मा वापस शरीर में जाना भूल जाती है अथवा वापस जाने से इनकार कर देती है). स्थिति तब और भी जटिल हो जाती है जब यथार्थ मांगों की पूर्ति के बाद मूर्त विचारधारा-जनता न सिर्फ अमूर्त की दुनिया में वापस लौटने से इनकार कर देती है, बल्कि वह यथार्थ मांगों के साथ आए अमूर्त सपनों में भी सचमुच यकीन करने लगती है. मूर्त विचारधार-जनता का अमूर्त सपनों के साथ यह मेल अनेक समय में बड़ी ही विकट समस्या पैदा कर देता है. आज भारत समेत पूरी दुनिया में विचारधारा की बुलंद इमारतों से चिपके मूर्त विचारधारा-जनता के छिटपुट निराशावादी समूह बिखरे पड़े हैं-अपनी विचारधारा के कभी जुड़े नेताओं को कोसते, सिर धुनते और अपने सपनों के टूटने का रोना रोते. कुछ मामलों में ऐसे समूहों का अंत आतंकी गिरोहों, अपराध और नशीले पदार्थों की दुनिया में भी होता है. समाज रुका नहीं रहता. कुछ यथार्थ मांगों और कुछेक सपनों की पूर्ति के साथ ही समाज में नई यथार्थ मांगें पैदा हो जाती हैं और उनके साथ नए सपने भी. सवाल नई मांगों और नए सपनों के साथ आगे बढ़ जाने का है, न कि पुरानी मांगों और पुराने सपनों से चिपके रहने का.

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब मुस्लिम अभिजातों के एक हिस्से ने स्वतंत्र्योत्तर हिंदू-बहुल भारत में रहने से इनकार करते हुए एक पृथक राज्य की मांग की, तो उन्हें अपनी यह मांग ‘समुदाय के स्वाभाविक आधुनिक रूप राष्ट्र’ की मांग के रूप में रखनी पड़ी. ब्रिटिश तथा यूरोपीय शासक यही शब्दावली समझते थे और ‘राष्ट्र के  आत्मनिर्णय के अधिकार’ के अंतर्गत उनकी मांग पर विचार कर सकते थे. इसीलिए कहा गया कि भारतीय मुसलमान एक पृथक राष्ट्र-राज्य उनका समान मनोवैज्ञानिक गठन है. इस आधार पर एक पृथक राष्ट्र-राज्य उनका हक बनता है. यूरोपीय आधुनिकता और राष्ट्रवादी शब्दावली में प्रस्तुत इस मांग ने तब इस बौद्धिकता से प्रेरित बौद्धिक हलकों को बचाव की मुद्रा में खड़ा कर दिया था. आधुनिकता में रचे-बसे मुहम्मद अली जिन्ना इस धारा के स्वभावतः प्रतीक पुरुष बन गए और पाकिस्तानी संविधान सभा में दिया गया उनका ‘सेक्यूलर राज्य’ संबंधी वक्तव्य इस पूरी आधुनिकता-प्रेरित प्रक्रिया स्वाभाविक हिस्सा था. यह आधुनिकता-आधारित धारा खुद मुसलमानों में तब अच्छा-खासा प्रभाव रखनेवाली उस धारा के विरुद्ध थी जिसका प्रतिनिधित्व मौलाना अबुल कलाम आजाद और मौलाना हुसैन अहमद मदनी करते थे तथा जो जिन्ना के द्विराष्ट्रवादी सिद्धांत के विरोधी थे.

इस मांग की प्राप्ति की दिशा में एक अमूर्त मुस्लिम राष्ट्र-जनता की रचना की गई, जिसे समय-समय पर मूर्त राष्ट्र-जनता का रूप दिया गया. (बताने की जरूरत नहीं कि यह प्रक्रिया कितनी रक्तपातपूर्ण रही.) साथ ही इस यथार्थ मांग को आकर्षक अमूर्त सपनों (एक आदर्श मुस्लिम समाज के निर्माण के सपनों) की पैकेजिंग के साथ बाजार में उतारा गया. यथार्थ मांग की प्राप्ति के बाद अमूर्त सपनों की पैकिंग सामग्री ठिकाने लगा दी गई.

बहरहाल, इस मामले में भी अमूर्त की दुनिया में वापस लौटने से इनकार करनेवाली मूर्त राष्ट्र-जनता और अमूर्त सपनों के मेल ने पाकिस्तान के लिए समय-समय पर विकट स्थिति पैदा की. कुछ चिरलंबित समस्याओं से जुड़कर तथा जन्म से ही आंग्ल-अमेरिकी और फिर अमेरिकी प्रभुत्वाद के संरक्षण तथा हस्तक्षेपों की वजह से इसने आज विस्फोटक रूप धारण कर लिया है. पाकिस्तान का आज का संकट आधुनिकता-प्रेरित पाकिस्तानी राष्ट्र-राज्य के गठन के अंदरूनी द्वंद्वों का ही प्रकटीकरण है.

हिंदुत्व की विचारधारा भी उसी यूरोपीय आधुनिकता से प्रेरित यूरोपीय राष्ट्रवाद की हीं एक उग्रशाखा (नाजीवाद) का (विचार, कार्यशैली तथा वेशभूषा में) अनुकरण थी. ‘स्वदेशी’ का तमाम दावों के बावजूद यह नितांत ‘विदेशी’ विचारधारा थी जिसका लक्ष्य ‘जुडियो-क्रिश्चियन पंथों’ के अनुरूप हिंदू धर्म का पुनर्गठन करना, ‘हिंदू जाति’ का सैन्यीकरण करना और उसका एक राष्ट्र-राज्य गठन करना था. हिंदूओं की सारी विशिष्टताएं (उनकी विविधता, उनके बीच प्रचलित अनेक पंथ-संप्रदाय, उनके बीच किसी संगठित चर्च तथा अधिकारिक प्रवक्ता का अभाव आदि) उन्हें उनकी कमजोरी लगते थे और वे हिंदुओं के लिए भी ‘एक चर्च, एक पोप, एक रोम’ की रचना करना चाहते थे. जो अपरिभाषेय था, उसे वे अपनी परिभाषा से मंडित करना चाहते थे. जो भारत के अस्तित्व की शर्त था, उसे वे विघटन का कारण मानते थे. वे भारत की समावेशी वैचारिक परंपरा के बजाया उसकी समय-सापेक्ष स्मृति परंपरा के प्रतिगामी पक्षों से खुद को अधिक निकट पाते थे. उदार होने के तमाम दावों के बावजूद उनके कुछ नेताओं द्वारा समय-समय पर हिटलर और गोडसे की प्रशंसा कोई विच्युति नहीं उनके मूल वैचारिक स्त्रोतों का ही प्रकटीकरण है. हिंदुत्व भारतीयता का निषेध है. पश्चिमी आधुनिकता-प्रेरित प्रतिद्वंद्वी विचारधाराएं नहीं, बल्कि गांधी ही उनकी राह की सबसे बड़ी रुकावट थे.

हिंदुत्व की विचारधारा ने भी एक अमूर्त हिंदू-जनता की रचना की और उसे समय-समय पर मूर्त हिंदू जनता का रूप देने की कोशिश की. यह प्रयास भी काफी रक्तरंजित रहा और भयानक दंगों का सबब बना. उन्होंने जबरन समूची हिंदू जनता का प्रवक्ता बनने की कोशिश की और हिंदुओं के पूरे स्पेस पर अपना एकाधिकार जताना चाहा. बहरहाल, उन्हें इसमें अपेक्षित सफलता नहीं मिली और वे लंबे समय तक हाशिए पर ही रहे.

अमूर्त हिंदू जनता को मूर्त रूप देने में उन्हें सबसे बड़ी कामयाबी रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान मिली. लेकिन यह कामयाबी भी अपर्याप्त थी और उसका भी एक बड़ा कारण उसकी प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक शक्तियां की कमजोरी और गलतियां थीं.

इसलिए हिंदुत्व के नेता ने जब जिन्ना की कब्र पर उनके द्वारा एक ‘सेक्यूलर’ राष्ट्र की रचना के लिए उनकी तारीफ की, तो इसमें उनकी ‘ईर्ष्या’ भी छिपी थी-खुद वही मुकाम न पाने का दर्दं भी था. साथ ही यह दोनों धाराओं के वैचारिक साम्य की स्वीकारोक्ति भी थी.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 0 टिप्पणियां: Responses to “ राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय-दूसरी किस्त ”

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें