हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

अरुंधति ने सिर्फ इतना ही नहीं कहा था

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/27/2010 01:27:00 PM

कश्मीर की आज़ादी के पक्ष में बोलने को देशद्रोह कहने वाले अरुंधति राय की गिरफ़्तारी की मांग कर रहे हैं. लेकिन, जैसा अरुंधति ने खुद कहा है, वे यह आवाज़ बुलंद करनेवाली अकेली नहीं हैं. कश्मीर ही नहीं, लाखों आवाजें भारत और भारत से बाहर भी उठ रही हैं जो यह मांग कर रही हैं की कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के अधिकार का सम्मान किया जाये. उन्हें आज़ादी दी जाये. लाखों लोगों को बर्बर फौजी ताकत के बल पर आधी सदी से भी ज्यादा समय तक आपने कब्ज़े में रखना देशप्रेम कैसे हो सकता है? और क्या देशप्रेम इतनी घिनौनी, इतनी अमानवीय, इतनी असंवेदनशील भावना है? इसलिए, कश्मीरी जो कह रहे हैं (और वे यह 60 साल से अधिक समय से कह रहे हैं) उसे सुना जाना चाहिए बजाय उनका पक्ष ले रहे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के. अरुंधति और कश्मीरी लोगों के समर्थन में हम यहाँ वरवर राव की यह टिप्पणी पेश कर रहे हैं. तेलुगु के क्रांतिकारी कवि वरवर कई बार देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किये गए हैं और हर बार बरी हुए हैं.


पिछले हफ्ते दिल्ली में हुए सेमिनार 'आज़ादी: द ओनली वे' में बोलनेवाले लोगों में से एक होने के नाते मुझे अरुंधति द्वारा कश्मीर के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार और आज़ादी पर दिए गए बयान पर मचे इस हाय-तौबा पर कोई हैरत नहीं है. उनको देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार करने कि मांगों पर भी मुझे हैरत नहीं है.

ऐसी बातें कहने वाली वे पहली नहीं हैं और न ही आखिरी होने जा रही हैं. दरअसल मीटिंग में शामिल हुए सभी लोगों ने- प्रो सुजातो भद्र, सैयद अली शाह गिलानी और मैंने खुद ऐसी हीभावनाओं का इज़हार किया था. इसकी वजह बहुत साफ है: कश्मीर के लोग यही चाहते हैं और इसे भूला नहीं जा सकता.

या तो जानबूझ कर या फिर किसी और वजह से मीडिया और राजनेता अरुंधति द्वारा उठाये गए कुछ पहलुओं पर बात नहीं कर रहे हैं. इसलिए उनका ज़िक्र करना ज़रूरी है.

आत्मनिर्णय के अधिकारों का पक्ष लेते हुए राय ने इस पर जोर दिया कि अकेले आज़ादी हर चीज़ नहीं दे सकती: उन्होंने जानना चाहा कि कश्मीरी लोगों को जब आज़ादी मिल जाएगी तो कश्मीरियों को कैसा इंसाफ मिलेगा. उन्होंने कश्मीर के एक दौरे के दौरान सुने गए नारे का हवाला दिया: 'भूखा नंगा हिंदुस्तान, जान से प्यारा पाकिस्तान' और इस नज़रिए पर गंभीर आपत्ति जताई थी. राय ने कहा कश्मीरियों के संघर्ष का समर्थन ठीक इन्हीं (भूखे-नंगे) वर्गों से आ रहा है- बुद्धिजीवियों के एक छोटे से हिस्से के अलावा देश के दूसरे हिस्सों के गरीब और उत्पीड़ित लोग कश्मीरी लोगों कि आज़ादी के संघर्ष को समर्थन दे रहे हैं. उनके संघर्ष का विरोध भारतीय राज्य कर रहा है.

मैं गिलानी के बदले हुए नज़रिए पर भी हैरान हुआ. दस साल पहले उन्होंने कहा था कि कश्मीर कि समस्याओं का हल इस्लाम के ज़रिये होगा. लेकिन आज उन्होंने हमें यह दिलाया कि महात्मा गाँधी चाहते थे कि कश्मीरी खुद तय करें कि वे कहाँ रहेंगे, कैसे जवाहरलाल नेहरू ने जनमत संग्रह का पक्ष लिया और कैसे भाजपा के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान से बातचीत कर के इसके राजनीतिक समाधान की कोशिशें कीं. हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि हैदराबाद और कश्मीर रियासतें उन तीन रियासतों में से थीं जो आज़ादी के समय भारतीय संघ का हिस्सा नहीं थे. तेलंगाना केलोग, हैदराबाद जिसका एक हिस्सा है, अब देश के भीतर अलग राज्य की मांग कर रहे हैं लेकिन कश्मीर के लोग, तभी से, मजबूती से आज़ादी के पक्ष में हैं. उनकी मांगों को मान्यता दिए बिना समाधान नहीं निकाल सकता.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 5 टिप्पणियां: Responses to “ अरुंधति ने सिर्फ इतना ही नहीं कहा था ”

  2. By राजीव रंजन प्रसाद on October 27, 2010 at 3:44 PM

    कश्मीर का मतलब क्या केवल कश्मीर की घाटी और उसके पचास किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोग हैं? क्या लद्दाख और जम्मू की भावनाओं को तभी समझा जायेगा जब उनके हाँथ में भी पत्थर होंगे? और "गुलाम" कश्मीर के बलूचिस्तान की भी एक आवाज है क्या उसको भी ये तिकडी समर्थन देती है?

    ये जुबान चाहे वरवर राव की हो अरुन्धति की या गिलानी की एक ही है। ये देश को तोडने वाली ताकते ही हैं एक भीतर से तो दूसरी अलगाव वादी नारों के साथ पाकिस्तान की ओर खडी है।

    अरुन्धति राय को छतीसगढ की सरकार नें गिरफ्तार न कर के जिस समझदारी का काम किया था वैसा ही काम अब भी होना चाहिये। इस तरह के बयान इन लोगों के आत्मप्रचार का जरिया और "महान" बनने का तरीका हैं।

  3. By Anonymous on October 28, 2010 at 1:11 PM

    kashmir ka matlab kashmir, poora, jaisa 1947 aur uske pahle tha. kya prasad ne nahin suna ki meeting men kya kaha gaya? bina sune fatwabazi? sanghiyon se akhir aur kya ummeed ki jaye?

  4. By अशोक कुमार पाण्डेय on October 29, 2010 at 2:14 PM

    राय ने इस पर जोर दिया कि अकेले आज़ादी हर चीज़ नहीं दे सकती: उन्होंने जानना चाहा कि कश्मीरी लोगों को जब आज़ादी मिल जाएगी तो कश्मीरियों को कैसा इंसाफ मिलेगा. उन्होंने कश्मीर के एक दौरे के दौरान सुने गए नारे का हवाला दिया: 'भूखा नंगा हिंदुस्तान, जान से प्यारा पाकिस्तान' और इस नज़रिए पर गंभीर आपत्ति जताई थी. राय ने कहा कश्मीरियों के संघर्ष का समर्थन ठीक इन्हीं (भूखे-नंगे) वर्गों से आ रहा है- बुद्धिजीवियों के एक छोटे से हिस्से के अलावा देश के दूसरे हिस्सों के गरीब और उत्पीड़ित लोग कश्मीरी लोगों कि आज़ादी के संघर्ष को समर्थन दे रहे हैं. उनके संघर्ष का विरोध भारतीय राज्य कर रहा है.

    इसमें ग़लत क्या है?

  5. By दृष्टिकोण on October 29, 2010 at 7:10 PM

    कश्मीर की आम जनता तब तक सुखी नहीं हो सकती जब तक पूँजीवाद का अंत नहीं होता। कश्मीरी स्थानीय पूँजीवाद पाकिस्तानी पूँजी के दम पर कितना भी उछलता रहे मगर वहाँ की आम जनता को तभी सुख मिलेगा जब उसके आर्थिक राजनैतिक और सामाजिक हित पूँजीवादी ताकतों से छुटकारा पा सकें।
    Please See complete post on
    http://drishtikon2009.blogspot.com/2010/10/blog-post_27.html

  6. By Harish on October 30, 2010 at 12:06 PM

    Hairani is baat ki arundhati g par varvar rai ki tippani mein unka samarthan is desh ke liye kahin adhik khatarnak hai. Pakistan bhi kashmir ke baare mein apni tippani dene se pehle kayee baar sochta hai, uski kashmir sambandhi tippani par sarkar turant sakriye hokar apni pratikriya deti hai, Lekin arundhati ki tippani (AUR VARVAR RAO ke samarthan) par sarkar khamosh rehti hai.
    Vainse is vishay main kya kahaa jaaye, is desh ko JAYCHANDOAN ne hi to barbaad kiya hai. Ho sakta hai aane wale samay mein RASHTRIYATA ki paribhasha ab fir se likhi jayegi, usmein JAYCHANDOAN ka samman hoga. Aakhir sarkar ki khamoshi ke peechhe ka raaj kya hai, aakhir kis baat ka dar hai sarkar ko?
    Aakhir is desh ke swarg se KASHMIRI PANDITOAN ko nikal kar unke adhikaroan ko chheen,ne waloan ke baare mein tathakathit ALGAVWADI chup kyon hain? Prashn to aur bhi hain, lekin jaanta huin unke jawah varvar sahab ya arundhati jainse log nahin denge, unka kaam to apni talkh tippaniyoan se is is mudde ko HASHIYE par jaane se rokne ka hai, taaki ye mudda is desh ki RAAJNITI mein JINDA rahe. Varvar sahab, Kabhi un logoan par bhi apna aakrosh vyakt karein jo KASHMIR main baithkar PAKISTAN ke jhande lehraate hain, Bharat ke jhande ko aag lagate hain, ve log apni aazadi nahin balki pakistan ke shadyantra ko anjaam de rahe hain. Rajeev Ranjan Prasad ki tippani ko phir se padiye aur phir se is vishay par apni baat rakhein..... dekhte hain, vainse sambhav nahin hai.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें