हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

तरस आता है उस देश पर जो इंसाफ की मांग करनेवालों को जेल भेजना चाहता है

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/26/2010 04:59:00 PM

अरुंधति रॉय 
मैं यह श्रीनगर, कश्मीर से लिख रही हूँ. आज सुबह के अख़बारों ने लिखा है कि मैं कश्मीर पर आयोजित एक आमसभा में कही गयी अपनी बातों के लिए देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार हो सकती हूँ. मैंने वह कहा जो यहाँ दसियों लाख लोग रोज कह रहे हैं. मैंने वही कहा जो दूसरे लेखक सालों से लिखते और कहते आये हैं. मेरे भाषणों को पढने की ज़हमत उठानेवाले यह देखेंगे कि मैंने बुनियादी तौर पर इंसाफ की मांग की है. मैंने कश्मीरी लोगों के लिए इंसाफ के बारे में कहा है जो दुनिया के सबसे क्रूर फौजी कब्ज़े में रह रहे हैं, उन कश्मीरी पंडितों के लिए, जो आपने घरों से उजाड़ दिए जाने की त्रासदी में जी रहे हैं, उन दलित सैनिकों के लिए, कूड़े के ढेर पर बनी कब्रों को मैंने कुड्डालोर में उनके गांवों में देखा, भारत के उन गरीबों के लिए जो इस कब्ज़े की कीमत चुकाते हैं और एक बनते जा रहे पुलिस राज के आतंक में जीना सीख रहे हैं.
कल मैं शोपियां गयी थी- दक्षिणी कश्मीर के सेबों के उस शहर में जो पिछले साल 47 दिनों तक आसिया और नीलोफर के बर्बर बलात्कार और हत्या के विरोध में बंद रहा था. इन दोनों युवतियों की लाशें उनके घरों के पास की एक पतली सी धारा में पाई गयी थी और उनके हत्यारे अब भी क़ानून से बहार हैं. मैं नीलोफर के पति और आसिया के भाई शकील से मिली. मैं वेदना और गुस्से से पागल उन लोगों के साथ एक घेरे में बैठी जो भारत से इंसाफ पाने की उम्मीद को खो चुके हैं, और अब यकीन रखते हैं कि आज़ादी उनकी अकेली उम्मीद है. मैं पत्थर फेंकनेवाले उन नौजवानों से मिली जिनकी आँखों में गोली मारी गयी थी. मैंने एक नौजवान के साथ सफ़र किया, जिसने मुझे बताया कि अनंतनाग जिले के उसके तीन किशोर दोस्त हिरासत में लिए गए और पत्थर फेंकने की सजा के तौर पर उनके नाखून उखाड़ लिए गए.
अख़बारों में कुछ लोगों ने मुझ पर नफ़रत फ़ैलाने और भारत को तोड़ने का आरोप लगाया है. इसके उलट, मैंने जो कहा है उसके पीछे प्यार और गर्व की भावना है. इसके पीछे यह इच्छा है कि लोग मारे न जाएँ, उनका बलात्कार न हो, उन्हें कैद न किया जाये और उन्हें खुद को भारतीय कहने पर मज़बूर करने के लिए उनके नाखून न उखाड़े जाएँ. यह एक ऐसे समाज में रहने की चाहत से पैदा हुआ है जो इंसाफ के लिए जद्दोजहद कर रहा हो. तरस आता है उस देश पर जो लेखकों की आत्मा की आवाज़ को खामोश करता है. तरस आता है उस देश पर जो इंसाफ की मांग करनेवालों को जेल भेजना चाहता है जबकि सांप्रदायिक हत्यारे, जनसंहारों के अपराधी, कार्पोरेट घोटालेबाज, लुटेरे, बलात्कारी और गरीबों के शिकारी खुले घूम रहे हैं.
26 अक्टूबर 2010

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ तरस आता है उस देश पर जो इंसाफ की मांग करनेवालों को जेल भेजना चाहता है ”

  2. By miracle5169@gmail.com on October 26, 2010 at 10:37 PM

    beshak mulk ko khamoshi ke saath faaseevad ki taraf dhakela ja raha hai.afsos ki isme mulk ka taaleemyafta tabka sabse badhkar hissa le raha hai.

  3. By miracle5169@gmail.com on October 26, 2010 at 10:37 PM

    beshak mulk ko khamoshi ke saath faaseevad ki taraf dhakela ja raha hai.afsos ki isme mulk ka taaleemyafta tabka sabse badhkar hissa le raha hai.

  4. By राजीव रंजन प्रसाद on October 27, 2010 at 11:18 AM

    तरस आता है उन लेखकों (और स्वयं घोषित समाजसेवियों) पर जिन्हे अधिकार शब्द तो पता है और उसका वे "भोंपू" बजा बजा कर इस्तेमाल करते हैं लेकिन उन्हे अपने कर्तव्यों का ककहरा भी पता नहीं।

    यह वही लेखिका है जिसे "तालिबानियों से बरबर माओवादी हिंसा" जायज लगती है। अर्थात यह वही लेखिका है जो बात आदिवासियों की करती है लेकिन कार्य उनके खिलाफ।

    यह वही लेखिका है जिसे कश्मीर में अलगाववादियों की मांग इंसाफ लगती है। लेकिन जब कश्मीर में पंडित बरबरता से भगाये या मारे गये तब इंसाफ की बीन भैंस ले गयी थी। आज घडियाल उन्हे अपनें आँसू किराये पर दे गया है, वाह!!

    यह वही लेखिका है जिसे जम्मू और कश्मीर का मतलब केवल "कश्मीर की घाटी" समझ में आता है और इंसाफ के पुजारी कश्मीर घाटी के पचास किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोग? लद्दाख और जम्मू भी कुछ कहते हैं महोदया? अरुंधति, बस कसर यही रह गयी कि पाकिस्तान और "आपके माओभाईयिओं के चीन" की जय जय भी कर ही लेतीं?

    यह देशद्रोह है बिलकुल है लेकिन सरकार को कत्तई अरुन्धति को जेल नहीं भेजना चाहिये। वह यही चाहती है। ये जबरदस्ती के विरोध करता "महान" बनना चाहते हैं।

  5. By Anonymous on October 27, 2010 at 12:41 PM

    ha ha ha ha prasad ji. kam se kam arundhati ka yahi comment padh lete theek se. apki bewakoofiyan bata rahi hain ki ap kitne ... hain.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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