हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बिहार के मुसलमान और राजनीति में हिस्सेदारी

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/28/2010 02:24:00 PM

यह बिहार का चुनावी वर्ष है. जानेमाने पत्रकार श्रीकांत ने इस संदर्भ में बिहार के मुसलमानों की स्थिति और राजनीति में उनकी हिस्से का एक जायजा लेते हुए एक पुस्तिका प्रकाशिक की है. हाशिया पर हम उसके कुछ अंश और साथ में पूरी पुस्तिका (पीडीएफ) पोस्ट कर रहे हैं. शुरुआत पुस्तिका की भूमिका से.
बिहार में मुस्लिम समुदाय की आबादी और राजनीतिक स्थिति को लेकर पुस्तिका में कुछ तथ्य रखे गए हैं। बिहार में इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव की हलचल के बीच अपने अखबार में मुस्लिम समुदाय को लेकर कुछ रपटें लिखीं। राजनीति, जाति, आबादी और प्रतिनिधित्व का सवाल जब उठता है तो आम आदमी संवेदनशील हो जाता है। तथ्य सशक्तीकरण के हथियार की तरह होते हैं। नये परिसीमन ने बहुत कुछ उलट-पुलट दिया है। स्वाभाविक तौर परमुसलमानों की आबादी में भी विधानसभावार बदलाव आया है। यह आंकड़ा 2001 की जनगणना पर आधारित है। इस काम में साथी संजीव ने काफी परिश्रम किया। इसका उपयोग शशि और रजनीश ने विधानसभा क्षेत्रों की बनावट से संबंधित रिपोर्ट में किया। कुछ सुधी पाठकों ने आंकड़ों को लेकर पूछताछ भी की। मुस्लिम आबादी से संबंधित आंकड़ों को दुरूस्त करने के लिये सीएसडीएस के संजय जी को भेजा गया। उनके आंकड़ों को मिला लेने, संतुष्ट होने के बाद पुस्तिका प्रकाशित करने का फैसला किया गया।
मुसलमानों की आबादी के विधानसभावार आंकड़े इस पुस्तिका में हैं। आंकड़ों में एकाध प्रतिशत का अंतर हो सकता है। आंकड़ों को देखकर आप तथ्य की रोशनी में सत्य के करीब पहुंच सकते हैं।
मुसलमानों की राजनीति और आबादी को लेकर रजी साहब और प्रसन्न जी से बात की। रजी साहब ने कहा कि इसकी एक पुस्तिका छपवा दीजिये। राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले आम व सुधी पाठकों केलिए यह उपयोगी हो सकता है। आप तक इसे पहुंचाने में अकु श्रीवास्तव व अवधेश प्रीत के साथ अरुण नारायण और धर्मेन्द्र जी के हम आभारी हैं।
श्रीकांत

वोट के लिए जियारत, टिकट देने में सियासत
बिहार के 243 विधान सभा क्षेत्रों के 50 से अधिक विधान सभा क्षेत्रों में मुसलमानों का वोट निर्णायक साबित हो सकता है। इन विधान सभा क्षेत्रों में मुसलमानों की आबादी 18 से 74 प्रतिशत है। लगभग पचास से अधिक विधान सभा क्षेत्रों में उनकी आबादी 10 से 17 प्रतिशत है।
बिहार में मुसलमानों की आबादी 16.5 प्रतिशत है। आबादी के लिहाज से देखें तो कम-से-कम बिहार विधान सभा में 38-40 मुसलमान प्रतिनिधियों को पहुंचना चाहिए, लेकिन पहुंचते हैं 24-25।
बिहार में मुसलमानों की सबसे अधिक आबादी 74 प्रतिशत नए विधान सभा क्षेत्र कोचाधमन और पुराने विधान सभा क्षेत्र अमौर में है। नए बने विधान सभा क्षेत्रों में बलरामपुर में लगभग 65 प्रतिशत और पुराने विधान सभा क्षेत्र जोकीहाट में मुसलमानों की आबादी 68 प्रतिशत है। बहादुरगंज, ठाकुरगंज, किशनगंज, अररिया, कदवा, प्राणपुर, कोढ़ा और बरारी में तो मुस्लिम आबादी की तादाद अच्छी-खासी है। अजजा के लिए सुरक्षित विधान सभा क्षेत्र मनिहारी में मुसलमानों की आबादी लगभग 41 प्रतिशत है।
पश्चिम चम्पारण के सिकटा और नरकटियागंज में मुसलमानों की आबादी 30 प्रतिशत और 29 प्रतिशत है। इसी तरह रामनगर (अजा), चनपटिया में 21 प्रतिशत और बेतिया में 27 प्रतिशत आबादी है। नौतन में 18 प्रतिशत तो बगहा में पंद्रह प्रतिशत है। पूर्वी चम्पारण के रक्सौल, नरकटिया और हरसिद्ध (अजा) और सुगौली में आबादी 24 प्रतिशत है।
मधुबनी के राजनगर (अजा) में 14 प्रतिशत तो बिस्फी में 34 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। इसी तरह सीतामढ़ी के परिहार, सुरसंड, बाजपट्‌टी और सीतामढ़ी में आबादी 18 प्रतिशत से 32 प्रतिशत है। मनिहारी में 41 प्रतिशत तो बरारी में 31 और कोढ़ा में 33 प्रतिशत है। मुसलमानों की आबादी गौड़ाबौराम, दरभंगा ग्रामीण, अली नगर और बेनीपुर, जाले और केवटी में 22 से 32 प्रतिशत के बीच है।
गोपालगंज और बरौली में 23-24 प्रतिशत तो हथुआ विधान सभा क्षेत्र में मुसलमानों की 19 प्रतिशत आबादी बसती है। सीवान, रघुनाथपुर बड़हरिया में 21 प्रतिशत से 27 प्रतिशत आबादी बसती है। भागलपुर में 30 प्रतिशत, नाथनगर में 24 प्रतिशत, कहलगांव में 19 प्रतिशत, बांका के धेरैया में 18 प्रतिशत, बिहारशरीफ में लगभग 24 प्रतिशत और गया शहर में 25 प्रतिशत आबादी बसती है।
10 प्रतिशत से अधिक और 17 प्रतिशत से कम आबादी वाले क्षेत्र
बाल्मीकिनगर, बगहा, गोविंदगंज, केसरिया, कल्याणपुर, पिपरा, मोतिहारी, चिरैया, रीगा, बथनाहा, रून्नी सैदपुर, हरलाखी, बेलसंड, खजौली, बाबूबरही, राजनगर (अजा), झंझारपुर, फुलपरास, लौकहा, निर्मली, पिपला, सुपौल, त्रिवेणीगंज, बनमनखी (अजा), रूपौली, आलमनगर, बिहारीगंज, सिहेंद्गवर, सोनबरसा, सहरसा, सिमरी बख्तियारपुर, महिषि, कुशेश्वर स्थान (अजा), बेनीपुर, हायाघाट, बहादुरपुर, गायघाट, औराई, मीनापुर, सकरा (अजा), बोचहा (अजा), कुढनी, बरूराज, पारू, साहेबगंज, बैकुंठपुर, कुचायकोट, भोरे, जीरादेई, दरौंदा, महाराजगंज, एकमा, बनियापुर, तरैया, मढ़ौरा, छपरा, अमनौर और परसा।
वैशाली, महुआ, पातेपुर (अजा), कल्याणपुर (अजा), वारिशनगर समस्तीपुर, मोरवा, हसनपुर, चेरिया बरियारपुर, तेघड़ा, मटिहानी, साहेबपुर कमाल, बेगूसराय, बखरी (अजा), खगड़िया, परबत्ता, बिहपुर, पीरपैंती (अजा), सुलतानगंज, अमरपुर, बांका, कटोरिया (अजजा), मुंगेर, बांकीपुर, फुलवारी (अजा), आरा, तरारी, चैनपुर, सासाराम, डिहरी, अरवल, औरंगाबाद, इमामगंज (अजा), बाराचट्‌टी (अजा), बेलागंज,वजीरगंज, हिसुआ, नवादा, गोविन्दपुर, सिकन्दरा (अजा), जमुई, झाझा, चकाई।
बिहार की कुल आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत 16.5 है और विधान सभा में उनका प्रतिनिधित्व आठ से नौ प्रतिशत है। 2005 के चुनाव में सिर्फ 16 मुसलमान ही विधायक बने थे। आजादी के बाद बिहार में मुसलमानों का यह सबसे कम प्रतिनिधित्व का रिकार्ड है।
बिहार की राजनीति में बाबरी मस्जिद तोड़क से लेकर गोधरा के नायकों-खलनायकों के नाम पर राजनीति चल रही है और इस राजनीति के केन्द्र में मुसलमान ही हैं। दरअसल पार्टियों को वोट बैंक की तो काफी चिंता रहती है लेकिन टिकट देते वक्त शायद उनका गणित बदल जाता है। हर चुनाव में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व का सवाल गौण हो जाता है।
बिहार में लोक सभा की 40 सीटों पर सभी पार्टियों को मिलाकर चार-पांच मुसलमान ही लोक सभा चुनाव में जीतते रहे हैं। कोई भी पार्टी मुसलमानों को आबादी के अनुसार टिकट नहीं देती। 1952 से 2009 तक बिहार में सिर्फ 54 मुसलमान लोक सभा पहुंच सके, इनमें 14 पिछड़े मुसलमान थे। 2009 में सिर्फ असरारुल, मोनाजिर और शाहनवाज जीते। आबादी के आधर पर कम-से-कम बिहार से सात मुसलमानों को लोक सभा में होना चाहिए।
बिहार विधानसभा में भी मुसलमानों के प्रतिनिधित्व का यही हाल है। 1952 से 2005 के बीच बिहार विधान सभा में मुसलमानों के पहुंचने की दर सात से दस प्रतिशत के बीच ही रही। झारखंड जब बिहार में शामिल था तब राज्य में विधान सभा की 323 सीटें थीं लेकिन बंटवारे के बाद बिहार विधान सभा में सीटों की संखया 243 हो गई है। सिर्फ 1985 में बिहार विधान सभा में मुसलमान विधायकों की संखया 34 थी। यह रिकार्ड भी आज तक नहीं टूटा।
विधान सभा के फरवरी और अक्तूबर-नवम्बर 2005 के चुनाव में राजद के मुस्लिम आधारों में क्षरण के कारण जद यू को जहां लाभ हुआ, वही राजद के मुस्लिम विधायकों की संखया घट कर 16 से 11 हो गयी है। जद यू के पांच में से चार प्रत्याशी जीतने में सफल हुए हैं। फरवरी के चुनाव में 24 प्रतिशत विधायक जीते थे, लेकिन अक्तूबर नवम्बर के चुनाव में मुसलमानों की संख्या घट कर सोलह पहुंच गयी।
बिहार विधान सभा के फरवरी में हुए चुनाव में भाजपा और लोजपा का कोई मुस्लिम प्रत्याशी सफल नहीं हो सका। राजद ने चुनाव में 32 मुस्लिम प्रत्याशियों को मैदान में उतारा था। उसके 21 प्रत्याशी पराजित हुए। कांग्रेस के नौ प्रत्याशियों में सिर्फ तीन सफल हो सके और एनसीपी के दो प्रत्याशी जीते। राजद के प्रत्याशियों की हार का कारण साफ तौर पर उसके आधार वोट बैंक का खिसकना माना गया है। भाजपा ने 103 प्रत्याशियों में एक मुस्लिम प्रत्याशी को अमौर में उतरा था। भाजपा प्रत्याशी बुरी तरह पराजित हुआ। भाजपा का यह प्रत्याशी कांग्रेस के जलील मस्तान से पराजित हुआ। लोजपा ने 29 मुस्लिम प्रत्याशियों को लड़ाया था, उसका कोई प्रत्याशी नहीं जीत सका। राज्य विधान सभा के चुनाव में माले, बसपा, सपा के एक-एक प्रत्याशी जीत सके। एक निर्दलीय मुस्लिम प्रत्याशी भी जीतने में कामयाब रहे।
राज्य के दर्जनों विधान सभा क्षेत्रों में राजद प्रत्याशियों को हार का मुंह देखना पड़ा। वोटों के विभाजन के कारण ही इन सीटों पर राजद की हार हुई। बरौली में राजद ने नेमतुल्ला को अपना प्रत्याशी बनाया था। इस सीट से भाजपा के रामप्रवेश राय जीते। उन्हें 26077 मत मिले, जबकि नेमतुल्ला को 20919 मत। कांग्रेस के डा. अदनान खां को 17808 मत मिले और एक निर्दलीय प्रत्याशी जयनाथ प्रसाद यादव को 7741 मत। भाजपा प्रत्याशी की जीत 5158 मतों सेहुई। वोटों का विभाजन बताता है कि किस तरह राजद के आधार मतों में विभाजन हुआ। कांग्रेस और राजद के आमने-सामने होने का लाभ भी भाजपा को मिला।
नाथनगर विधान सभा क्षेत्र में लगभग ऐसा ही हुआ। इस सीट पर जद (यु) की सुधा श्रीवास्तव जीतीं। उन्हें 37784 मत और राजद के परवेज खां को 36672 मत मिले। कांग्रेस के परवेज जमाल को 21155 मत मिले। राजद प्रत्याशी की हार 3312 वोट से हुई। बुनकरों की आबादी वाले इस क्षेत्र में राजद की हार हुई। दिलचस्प यह भी है कि सपा के चुनचुन प्रसाद यादव को 4050 मत मिले। इस सीट पर भी कांग्रेस और राजद के टकराव और राजद के आधार मतों में बिखरना साफ दिखाई पड़ता है। आरा और बिहारशरीफ में क्रमशः भाजपा और जद (यु) प्रत्याशियों की जीत हुई। आरा में राजद के नवाज आलम और बिहारशरीफ में सैयद नौशादुन नवीं बुरी तरह पराजित हुए। आरा में माले के साथ तिकोने संघर्ष में राजद प्रत्याशी की हार 14247 वोटों से हुई।
केवटी में स्वर्गीय गुलाम सरवर की सीट पर राजद ने मो.मोसिन को अपना प्रत्याशी बनाया था। भाजपा के अशोक कुमार यादव से राजद प्रत्याशी 4767 मतों से पराजित हुआ। लोजपा के महेश प्रसाद गुप्ता को 13607 वोट और निर्दलीय हुसैन को 3379 मत मिले। इस सीट पर भी स्पष्ट दिखाई पड़ता है राजद के आधार मतों में विभाजन।

मुंगेर में जद (यु) के मोनाजिर हसन के सामने राजद प्रत्याशी लगभग 40 हजार मतों से हारा। रक्सौल में राजद प्रत्याशी मो.सरब्बीर को सिर्फ 8426 वोट मिले। सिकटी में राजद प्रत्याशी हैदर यासिन 7078 मत पाकर सातवें नम्बर पर रहा। सिकटा में भी राजद प्रत्याशी सर्फुद्दीन उर्फ टेनी भी सातवें नम्बर पर रहा। बारसोई में राजद प्रत्याशी का हाल भी बुरा रहा।

बिहार विधान सभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व
वर्ष     सीट    प्रतिशत
1952    24    7.27
1957    25    7.84
1962    21    6.60
1967    18    5.66
1969    19    5.97
1972    25    7.85
1977    25    7.72
1980    28    8.64
1985    34    10.50
1990    20    6.19
1995    19    5.88
2000    20    9.87
2005    16    6.58
(कुल सीट, 324, 323 तथा 243 के आधार पर)

लोकसभा में मुसलमान
वर्ष     जीते
2009    3
2004    5
1999    3
1998    6
1996    4
1991    6
1989    3
1984    6
1980    4
1977    2
1971    3
1967    2
1962    2
1957    3
1952    3
(कुल सीट 54 तथा 40)

अक्तूबर-नवम्बर, 2005 में मुसलमानों को टिकट
पार्टी     कुल सीटें    मुसलमान    जीते
लोजपा  204           47                01
भाकपा  35             3                  00
राजद    176           30                04
कांग्रेस   51            12                05
राकांपा  08             4                 00
जद यू   139           9                 04
भाजपा  101           1                 00
माले      85             4                 01
सपा      167           20               00
बसपा    240          27               00
निर्दलीय (उन)       (उन)            01
(उनः उपलब्ध नहीं)

हाशिए पर मुस्लिम महिलाएं
1937 में पटना सिटी मुहम्डन अर्बन से अनिस इमाम निर्विरोध चुनी गईं थीं। 1945 में मुस्लिम लीग की जोहरा अहमद चुनी गईं। श्रीकृष्ण सिंह मंत्रिमंडल में कोई महिला मंत्री नहीं बन सकी थीं। 1957 में दूसरे मंत्रिमंडल में राजेश्वरी सरोजदास और ज्योर्तिमय देवी उपमंत्री बनाई गई थीं।
विधानसभा और लोकसभा में अगड़े मुसलमानों का कब्जा रहा है। 1952 से 2000 के बीच हुए चुनावों में 215 मुस्लिम विधायक जीते, जिनमें पिछड़े मुसलमानों की संखया 58 थी। 1952 से 2009 तक हुए चुनावों में कुल 54 मुसलमान लोक सभा के लिए चुने गए। इसमें 14 पिछड़े थे।
आजादी के बाद हुए विधान सभाओं के 1952 से 2005 तक हुए चुनावों में 205 महिलाएं चुनी गई हैं। अब तक तेरह विधान सभा चुनावों में सिर्फ छह मुस्लिम महिलाएं विधान सभा के लिए चुनी गईं और अनुसूचित जाति की 30 महिलाएं चुनी गईं हैं।
12 मई से 15 मई 1952 तक नइमा खातून हैदर तीन दिनों के लिए विधान परिषद की कार्यकारी अध्यक्ष बनाई गईं। ब्यूला दोजा 1973 के केदार पांडेय मंत्रिमंडल में उप मंत्री बनाई गईं थीं।
 
51 प्रतिशत हैं खेत मजदूर
बिहार के मुसलमानों की आधी से अधिक आबादी खेत मजदूरी करके जीवन-यापन करती है। मुसलमानों की आबादी का 51 प्रतिशत से अधिक का हिस्सा कृषि के क्षेत्र में खेत मजदूरी से जुड़ा हुआ है। मुस्लिम बहुल आबादी वाले जिलों में मुसलमान खेत मजदूरों का प्रतिशत साठ से अधिक है। बिहार में कुल खेत मजदूरों की तादाद 48 प्रतिशत है, लेकिन हिन्दुओं की तुलना में मुस्लिम समुदाय में खेत मजदूरों की तादाद अधिक है। हिन्दुओं में खेत मजदूरों ही तादाद 47.3 प्रतिशत है जबकि दलित समुदायों में खेत मजदूरों की तादाद सबसे अधिक 77 प्रतिशत से अधिक है। देश में खेत मजदूर के मामले में बिहार ही अव्वल स्थान पर है।
बिहार की धार्मिक जनगणना की रिपोर्ट 2001 के अनुसार बिहार के मुसलमान समुदाय में खेत मजदूर 51.5 प्रतिशत हैं। हिन्दी पट्‌टी के किसी भी राज्य में खेत मजदूरों का प्रतिशत बिहार के मुसलमानों से अधिक नहीं है। इसका अर्थ यह है कि मुसलमानों की आर्थिक दशा बहुत खराब है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि मुस्लमानों की परंपरागत दस्तकारी के खत्म होते जाने के कारण स्थितियां बद से बदतर होती चली गईं। कुटीर उद्योग बंद हो गए, कृषि पर बोझ बढ़ा। करघों की हालत बद से बदतर होती चली गई। बुनकर खेत मजदूर में बदल गए। ऐसे में केवल मुसलमानों में ही नहीं, बल्कि सभी समुदायों में खेत मजदूरों की तादाद अधिक है। दलित समुदाय में तो खेत मजदूरों का प्रतिशत  77.6 प्रतिशत है। खेत मजदूरों की तादाद अधिक है, तो गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की तादाद भी सबसे अधिक है।
राज्य में मुसलमान खेत मजदूरों की आबादी मुसलमान बहुल क्षेत्रों में ही बसती है। पश्चिम चम्पारण, पूर्वी चम्पारण, सीतामढ़ी, अररिया, किशनगंज, मधेपुरा, कटिहार पूर्णिया और शिवहार जैसे जिलों में मुसलमान खेत मजदूरों की बहुलता है। इन जिलों में इनकी संख्या 50 से 68 प्रतिशत के बीच है। राज्य के मुसलमानों में सबसे कम खेत मजदूरों की तादाद सबसे अधिक 69 प्रतिशत है।  सबसे कम खेत मजदूर पटना जिले में हैं- 13.4 प्रतिशत। नालंदा में मुसलमान खेत मजदूरों की तादाद 13.8, भोजपुर में 35.1 प्रतिशत, गया में 27 प्रतिशत और जहानाबाद में 35 प्रतिशत है। कृषि में विकसित माना जाने वाला जिला कैमूर अपवाद है, जहां मुसलमान खेत मजदूरों की तादाद 40 प्रतिशत है।
अर्थशास्त्री शैवाल गुप्ता का कहना है कि कोसी क्षेत्र में कृषि का विकास मध्य बिहार की तरह नहीं हुआ है। ऐसे में खेत मजदूरों की तादाद अधिक है। इसके साथ ही कृषि पर बोझ अधिक है। रोजगार के दूसरे साधन उपलब्ध नहीं हैं। गरीबी भी अधिक है और खेत मजदूर भी अधिक है। कोसी का पूरा बेल्ट पिछड़ा है। मध्य बिहार में ऐसी हालत नहीं है, उसका कारण है लोग दूसरे काम में भी लगे हैं। बीड़ी मजदूरों का बड़ा हिस्सा इस से जुड़ा है। 

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ बिहार के मुसलमान और राजनीति में हिस्सेदारी ”

  2. By शरद कोकास on September 28, 2010 at 10:13 PM

    बहुत मेहनत से किया गया विश्लेषण है

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें