हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

वेदांतः हिदुत्व और साम्राज्यवादी मंसूबों का विध्वंसक मिश्रण

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/12/2010 05:55:00 PM

वेदांत सिर्फ एक कंपनी नहीं है, वह साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था के हमारे देश में हुए विस्तार का एक अनिवार्य चरित्र और स्वरूप भी है. यह वही कंपनी है, जिसके निदेशक मंडल में कभी पी चिदंबरम हुआ करते थे, और जिस पद पर से इस्तीफा देकर वे वित्तमंत्री बने. वेदांत ने जिस तरह से एक अर्धऔपनिवेशिक देश में हिंदुत्ववाद और साम्राज्यवाद का मिश्रण पेश किया है, वह एक अनिवार्य शोध का विषय है, जिस पर रोजर मूडी का यह लेख भी प्रकाश डालता है. इस कंपनी के काम करने के तरीके पर रोहित पोद्दार की किताब वेदांताज बिलियंस को भारत में  चिदंबरम के नेतृत्ववाले गृह मंत्रालय ने प्रतिबंधित कर दिया है. आइए पढ़ें. 




मुँह में राम...
विभिन्न देशों के कानून और पर्यावरण नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन करने में वेदांत रिसोर्सेज़ की एक अलग पहचान है. कहने को तो यह कम्पनी एक पब्लिक कम्पनी है मगर इसमें वर्चस्व खुले तौर पर केवल एक व्यक्ति, उसके परिवार और इष्ट मित्रों का ही है. इस कम्पनी को इस बात पर भी नाज़ है कि वह हिन्दुत्व और नव-उदार रूढ़िवादिता में समन्वय स्थापित करती है. परेशानी की बात यह है कि इसका चेहरा जानुस (एक रोमन मिथकीय पात्र जिसके दो विपरीत दिशाओं में जुड़े सिर थे और वह कोई भी दरवाज़ा खोल सकता था) की तरह है जिससे अधिकांश भारतीयों को कोई समस्या नहीं होती.

मुझसे कभी-कभी पूछा जाता है कि मैंने अपने 25 वर्षों के सारी दुनिया के उद्योगों के अध्ययन में किस खनन कम्पनी को सबसे 'घटिया' पाया है.1 कुछ समय पहले तक मेरा जवाब हुआ करता था कि ''इनमें से कोई भी कलंक से मुक्त नहीं है और सभी एक जैसे बुरे हैं. ''

लेकिन पिछले 2 वर्षों में मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि एक कम्पनी जरूर है जो अपने समकालीनों से एकदम अलग दिखाई पड़ती है. न केवल उस पर लगाये गये आरोपों की संख्या या उनकी सीमा तक बल्कि विभिन्न देशों के कानून और पर्यावरण नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन करने में भी उसका कोई सानी नहीं है. यह एक 'भारतीय' कम्पनी है, भले ही उसकी नाम इंग्लैण्ड में दर्ज है लेकिन इस पर सिर्फ एक आदमी, उसके परिवार और ताकतवर दोस्तों के एक कसे हुए समूह का आधिपत्य है. यह कोई बहुत आश्चर्यजनक बात नहीं है. स्विट्‌ज़रलैण्ड की ग्लेनकोर धातुओं का व्यापार करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनी है जिसके पास खनन से जुड़े बहुत से प्रतिष्ठानों का मालिकाना है. इस कम्पनी का निदेशक बोर्ड तक नहीं है और इसकी पूरी अर्थव्यवस्था सात तालों के भीतर बन्द रहती है. इस कम्पनी का कार्पोरेट मुखौटा एक्सस्ट्राटा लंदन में स्थित है.2

लेकिन इस तरह के संदिग्ध चरित्र वाले स्थिर सहयोगी से जो चीज़ वेदांत रिसोर्सेज़ को अलग करती है वह है उसकी वह रफ्तार जिससे कम्पनी ने अपने प्रभावी मालिक अनिल अग्रवाल के लिए सिर्फ तीन साल के अन्दर अकूत सम्पत्ति अर्जित कर ली है और जिसके दम पर वह लंदन स्टॉक एक्सचेंज में चौथी सबसे ताकतवर खनन कम्पनी के तौर पर निबन्धित हुई है. इसके अलावा जिस आश्चर्यजनक तरीके से इसके अमरीकी और यूरोपीय वित्त पोषकों ने इस कम्पनी के प्रति अपने सारे शुरुआती सन्देहों को ताक पर रख दिया और उसके उद्‌गम, निष्ठा और ईमानदारी की परवाह किये बगैर इस एकदम बाहरी संस्था को ब्रिटिश फाइनेन्शियल सर्विसेज़ ऑथोरिटी की मिली भगत से दुनिया के सबसे चलायमान पूंजी बाजार की गोद में आराम से बैठने की जगह दिलवा दी वह भी कम दिलचस्प नहीं है.

टाटा, जिन्दल और अम्बानी कहीं अब जाकर विदेशों में खनिजों के क्षेत्र में आपसी सहयोग की कोशिश कर रहे हैं. (ध्यान दें कि टाटा ने 2007 में इंग्लैण्ड डच स्टील कम्पनी-कोरस का अधिग्रहण किया, जिन्दल ने 2006 में बोलिविया की विशाल मुटुन-लौह अयस्क डिपॉज़िट को हासिल किया और एस्सार स्टील ने इस साल मध्य अप्रैल में कनाडा की तीसरी सबसे बड़ी कम्पनी अलगोमा का मालिकाना हासिल किया). लेकिन अग्रवाल आज से 10 साल पहले से आस्ट्रेलिया की तांबा खदानों में, मध्य एशिया में सोना और मैक्सिको, रूस तथा बर्मा में दूसरे उपक्रमों की खोज-बीन में मशगूल थे. 'भारत' के विश्व-स्तरीय विस्तार में उनसे बेहतर रुतबा सिर्फ़ लक्ष्मी मित्तल का है. लेकिन अग्रवाल और मित्तल दोनों ही वास्तव में इंग्लैण्ड में बसे अनिवासी भारतीय हैं. उस पार की हरियाली अब धीरे-धीरे भूरे रंग में बदल रही है.3

लक्ष्मी मित्तल अभी तक किसी स्कैण्डल में नहीं फंसे हैं मगर अग्रवाल और उनके चट्टे-बट्टे लम्बे समय से संदेहों की दलदल में हाथ पैर मार रहे हैं. जिस समय मैं यह लेख लिख रहा हूँ उस समय वेदांत की एक इकाई स्टरलाइट गोल्ड पर अर्मेनिया में जुर्म के कई इल्जाम लग रहे हैं जिनमें सरकार द्वारा निर्धारित सीमा से ज्य़ादा सोने का खनन, जान-बूझ कर अपने (खनिज) संसाधनों की कीमत कम आंक कर बताना तथा खदान से निकले हुए कचरे का उचित निस्तारण न करना शामिल है.4 पिछले साल ज़ाम्बिया में वेदांत पर आरोप लगा था कि उसने 2 साल वहाँ की सबसे बड़ी ताँबा खदान, केसीएम, खरीदी थी और उसके ज़हरीले कचरे को निस्तारित करने के लिए जान-बूझ कर ख़राब पाइप लाइन का निर्माण किया. उसने वहाँ ज़ाम्बिया सरकार की आधिकारिक अनुमति लिए बिना ही ज़ाम्बिया के सबसे महत्वपूर्ण ताँबे के स्मेल्टर पर काम शुरू कर रखा है.5 भारत में भी वेदांत ने तूतीकोरिन में तमिलनाडु राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के समुचित निर्देशों के बिना ताँबे के एक विशाल स्मेल्टर का विस्तार किया और वह भी तब जबकि उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित हैज़ार्ड्‌स वेस्ट मॉनिटरिंग सब-कमेटी (ख़तरनाक अपशिष्ट के अनुश्रवण के लिए गठित उप-समिति) ने इस बात की हिदायत दी थी कि कम्पनी ऐसा करने से बाज़ आये (कृपया आगे भी देखें). इसने उड़ीसा में लांजीगढ़ में एक बड़ी अल्युमिनियम रिफ़ाइनरी पर भी काम चालू रखा था बावजूद इसके कि उच्चतम न्यायालय की एक दूसरी उप-समिति ने सितम्बर 2005 में यह कहते हुए इसकी निन्दा की थी कि कम्पनी ने संरक्षित वनों का नाश किया है, इसलिए वह गैऱ-कानूनी तरीके से काम कर रही है. इसके अलावा, इस साल जनवरी में दिल्ली स्थित वीवी गिरी इन्स्टीट्यूट (श्रम मंत्रालय से सम्बद्ध) ने अपने एक शोध में पाया कि कम्पनी ने 2001 में, जब उसने सरकारी कम्पनी बाल्को का मालिकाना हासिल किया तब उसने कामगारों के साथ जितने भी करार किये थे प्रायः उनमें से किसी का भी पालन नहीं किया.6 अगले ही महीने उड़ीसा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने झारसुगुड़ा में बन रहे कम्पनी के अल्युमिनियम स्मेल्टर का काम बन्द कर देने को कहा क्योंकि इसे अल्युमिना लांजीगढ़ की गैऱ-कानूनी रिफ़ाइनरी से मिलने वाला था. सिर्फ़ 6 महीने पहले उड़ीसा के एक मशहूर मानवाधिकार एक्टिविस्ट प्रफुल्ल सामन्त राय द्वारा दिये गये फोटो के सबूतों के आधार पर लंदन स्थित 'विक्षुब्ध शेयर धारकों' ने कम्पनी और उसके दूसरे शेयर-धारकों को खुल कर समझाया था कि इस तरह का निर्माण गैऱ-कानूनी है.7 इसके बावजूद, वन और पर्यावरण मंत्रालय ने 10 दिन बाद इस भ्रष्टाचारी कम्पनी को जल्दी-जल्दी में पिछली तारीख से पर्यावरणीय अनापत्ति देकर बड़े आराम से पीठ ठोंक दी. यह सिर्फ़ एक मिसाल है कि हमारे देश के निर्णय-क्षमता वाले लोग, अग्रवाल की गुप्त-गोष्ठी और उसके चट्टे-बट्टे किस तरह से एक-दूसरे से मिले हुए हैं.

अनिल अग्रवाल की उत्तरोत्तर उड़ान
वेदांत रिसोर्सेज़ पीसीएल की लंदन स्टॉक एक्सचेंज में लॉन्चिंग दिसम्बर 2003 में इन्टरनेशनल पब्लिक ऑफ़रिंग (आईपीओ) के साथ हुई जिसमें एचएसबीसी, सिटीग्रुप, ऑस्ट्रेलिया की मैक्वायर बैंक, दॉइश बैंक, आईसीआई सिक्यूरिटीज़ (भारत), जेपी मॉर्गन कैज़ेनोवे का हाथ था. इन सबने मिल कर 1.3 करोड़ पाउण्ड के करीब राशि पर सम्मिलित फ़ीस के रूप में हाथ साफ़ किया.8 उनकी कोशिशों से नई कम्पनी को एक अरब डॉलर से अधिक की प्राथमिक बाज़ारी पूँजीकरण (इनीशियल मार्केट कैपिटलाइजे़शन) का लाभ हुआ. इंग्लैण्ड के एक्सचेंज में यह उस साल की दूसरी सबसे बड़ी पेशकश थी और किसी भी भारतीय पृष्ठभूमि वाली कम्पनी के लिए यह पहला मौका था. एबीएन ऐमरो, बर्कलेज़ कैपिटल और दॉइश बैंक द्वारा जारी किये गये 70 करोड़ डॉलर के बॉण्ड के दम पर इस कम्पनी ने 2.2 अरब अमरीकी डॉलर मूल्य की विस्तार की योजना बनाई. उसका लक्ष्य भारत का सबसे बड़ा ताँबे और अल्युमिनियम का उत्पादक बनना था (कुछ वर्षों तक इस कम्पनी ने देश में पैदा होने वाले जिंक और सीसे के अधिकांश भाग का उत्पादन किया था).

शहरों में रहने वाले बहुत से भारतीयों ने स्टरलाइट इण्डस्ट्रीज़ का नाम सुना होगा मगर (जैसा मुझे अपनी यात्राओं के दौरान पता लगा) इनमें से बहुतों को यह नहीं पता होगा कि स्टरलाइट पर वेदांत का 82  प्रतिशत नियंत्रण है. वास्तव में लन्दन में हुए निबन्धन ने अग्रवाल को विदेशी पूंजी हासिल करने का अभूतपूर्व अवसर प्रदान करने के साथ-साथ स्टरलाइट की भारतीय खदानों और उनसे सम्बद्ध शोधन इकाइयों की पूंजी को भी और अधिक बढ़ाने का मौका मुहैया करवाया. 2007 के प्रारम्भ में अनिल अग्रवाल और उनके परिवार के पास वेदांत का 54 प्रतिशत हिस्सा था और इस तरह से उसी अनुपात में उन्होंने कार्पोरेट मुनाफे का हिस्सा भी हथिया लिया.9

55 वर्ष पूर्व एक व्यापारी मारवाड़ी परिवार में पैदा हुए (मगर इस समय लंदन के फैशनपरस्त मेफेयर इलाके में सुखपूर्वक रहते हुए) अग्रवाल ने पिछले 3 दशकों में एक छोटी सी ताँबा उत्पादक इकाई को एक पारिवारिक होल्डिंग कम्पनी के रूप में संवर्धित किया था जो अब भारत सरकार की दो खनिज कम्पनियों, हिन्दुस्तान जिंक़ और बाल्को (भारत अल्युमिनियम कम्पनी) को नियंत्रित करती है. भारत के तीन खनिज समृद्ध राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ उनके व्यक्तिगत सम्बन्ध हैं, पी चिदम्बरम वेदांत कम्पनी के एक डायरेक्टर रह चुके हैं जिस पद को छोड़ कर वह भारत के ताकतवर वित्तमंत्री बने.

''मैं भारत के मानस को समझता हूँ.'' यह अग्रवाल ने 2005 के शुरू में सारी दुनिया के निवेशकों के सामने उनके ज्ञानवर्धन के लिए कहा था. वह निश्चित रूप से जानते हैं कि गोटी कैसे फिट की जाती है. जब वेदांत के अध्यक्ष माइकेल फाउल ने एकाएक उस साल मार्च में अपने पद से इस्तीपफ़ा दे दिया और उसके तुरन्त बाद ज्याँ पियरे रॉडियर, जो वेदांत के स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण समिति के अध्यक्ष थे, भी छोड़ कर चले गये तब अग्रवाल ने तुरन्त अपने आप को कम्पनी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया. यह इंग्लैण्ड के उस कार्पोरेट जगत के बेहतर गवर्नेंस नियमों के खिलापफ़ था जिसकी नाक-भौंह चढ़ जाती है अगर किसी कम्पनी का सबसे बड़ा शेयर धारक उसका मुखिया बन जाता है.10 अपने बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति को लेकर भी अग्रवाल पर छींटे पड़े. इंग्लैण्ड की निबन्धन संस्था की कम्पनी पर प्राथमिक शर्तों के अनुसार, जिस पर जेपी  मॉर्गन इन्वेस्टमेन्ट बैंक की भी मुहर थी, बोर्ड के अधिकांश निदेशक अग्रवाल परिवार और उनके ट्रस्ट के 'बाहर' के आदमी होने चाहियें. आजकल बोर्ड का केवल एक सदस्य ग़ैर-हिन्दुस्तानी है. तीन में से दो कार्यकारी निदेशक अग्रवाल हैं और तीसरे कुलदीप जौरा ने 2002 से स्टरलाइट के लिए काम किया है.11

नियमों की धज्जियाँ
विवाद अग्रवाल का पीछा 1990 के दशक के मध्य से ही कर रहे हैं. उन पर बार-बार आरोप लगे हैं कि उन्होंने राजनैतिक और न्यायिक स्तर पर घूस देने की पेशकश की है और भारत के दक्षिणपंथी हिन्दुत्व एजेण्डे की पैसे से मदद की है. उनके ख़िलाफ़ साबित तो कुछ नहीं हुआ है मगर इस साल शुरू में लोकसभा में भारत की राजनैतिक पार्टियों को दानदाता वेदांत फाउण्डेशन द्वारा चन्दा देने का प्रश्न उठाया गया था क्योंकि, जैसा लगता है, यह मामला देशी कानून का उल्लंघन है जो किसी भी विदेशी कम्पनी को ऐसा करने से निषेध करता है.12
इतना तो तय है कि 1998 में स्टरलाइट को वृहद रूप से खुद को फ़ायदा पहुँचाने वाले शेयर घोटाले का दोषी पाया गया था. परिणामतः बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के नियंत्रक, सिक्यूरिटी एण्ड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इण्डिया (सेबी) ने इसे 2 साल तक के लिए ट्रेडिंग करने से रोक दिया था (हालांकि इस आदेश को जल्दी ही सरकार द्वारा निरस्त कर दिया गया था जब सेबी द्वारा दिये गये नए सबूत को सरकार ने नहीं माना).13

तूतीकोरिन (तमिलनाडु) में कम्पनी की हरकतों से वहाँ के बाशिन्दों और कामगारों की हुई दुर्दशा एक दीर्घकालिक चिन्ता का विषय है. आस्ट्रेलिया के एक पुराने बन्द प्लांट से 1994 में खरीदे गये (अग्रवाल का कहना है कि यह माटी के मोल मिल गया था) इस स्मेल्टर को महाराष्ट्र सरकार ने बहुत ज्यादा ख़तरनाक बता कर खारिज कर दिया था और वही स्मेल्टर मन्नार की खाड़ी के स्पेशल बायो-स्पफीयर रिजर्व से 9 किलोमीटर दूर समुद्री सुरक्षा नियमों के ख़िलाफ़ बैठाया गया.

अपने पहले साल के कार्यकाल में इस स्मेल्टर को सरकारी आदेश से तीन बार बन्द किया गया मगर स्पष्ट रूप से असुरक्षित और ज़हरीले पदार्थों से छलकते हुए इस प्लांट को फिर खोलने की अनुमति दे दी गई. भारतीय उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित ख़तरनाक कचरों का अनुश्रवण (मॉनिटरिंग) करने वाली एक समिति जब सितम्बर 2004 में यह प्लांट देखने गई तब वह एक किनारे पर फॉस्फ़ो-जिप्सम के 'पहाड़' देख कर हैरान रह गई तो कारखाने के दूसरे किनारे पर ''हज़ारों टन आर्सेनिक से सने स्लैग'' देखने को मिले- सब खुले आसमान
के नीचे हवा और पानी के पूरे सम्पर्क में. न सिर्फ इस कचरे को तत्काल हटा देने वाले आदेश की वेदांत ने अनदेखी की बल्कि उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित एक अन्य विशेषज्ञ समिति जब अगले महीने वहाँ गई तो उसने देखा कि कम्पनी ने गैऱ-कानूनी ढंग से नये-नये उपकरण लाकर अपना विस्तार अपनी डिज़ाइन क्षमता से लगभग दुगुना कर लिया है जिसकी वजह से कचरा घटने के बजाय बढ़ गया है. बहुत से पर्यवेक्षकों और खुद मैंने इस स्मेल्टर तक की 2004 से 2006 के बीच कई यात्राएं कीं और सबका नतीजा एक ही था कि कम्पनी ने इन ख़तरनाक वस्तुओं की मात्रा को कम करने के लिए कुछ भी नहीं किया.14

इस बीच में अग्रवाल वेदांत के महत्वाकांक्षी बॉक्साइट खनन प्रयासों के साथ-साथ अल्युमिनियम की शोधन और स्मेल्टिंग क्षमता को आगे बढ़ाने के प्रयासों में उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में कोशिशें करते रहे. स्टरलाइट द्वारा 2001 में सरकार की कम्पनी बाल्को के अधिग्रहण पर उस साल एक बड़ा राजनैतिक विवाद उठ खड़ा हो गया था.15 यह पहला मौका नहीं था जब अग्रवाल ने भारत के एक बड़े अल्युमिनियम कारखाने को हथियाने की कोशिश की थी. उन्होंने इण्डैल को पाने के लिए इसके निवेशकों से शेयर लेने का प्रयास किया मगर पैसा नहीं चुका सके. 4 साल बाद दिल्ली उच्च न्यायालय को एक आदेश निर्गत कर उन्हें मजबूर करना पड़ा कि वह पैसा दिखायें. भारत की तीसरी सबसे बड़ी अल्युमिनियम कम्पनी बाल्को के 51 प्रतिशत हिस्से की आनन-फानन में बिक्री को कुछ लोगों ने सरकार के बीमार बही-खातों को 'बजट-पूर्व कलाबाजी' के रूप में देखा था. इस तरह के आरोप खुल कर लगाये गये कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में चल रही देश की सरकार ने जान-बूझ कर और सफलतापूर्वक बाल्को को अपनी शर्तों और अपने संसाधनों से आधुनिकीकरण नहीं करने दिया. जो भी रहा हो, कम्पनी की कीमत बहुत कम आँकी गई, कुछ अनुमानों के अनुसार स्टरलाइट ने जितना पैसा दिया उससे दस गुनी सम्पत्ति उसने हासिल की. इस रेवड़ी बंटने के सबसे पहले शिकार हुए बाल्को के कामगार जिन पर छंटनी और अन्य लाभों को गंवाने का खतरा मंडराने लगा. नवनिर्मित 'आदिवासी' छत्तीसगढ़ राज्य के सात हजार कामगार एक लम्बी हड़ताल पर चले गये और भारत अल्युमिनियम कर्मचारी संघ (सीटू से सम्बद्ध) के कार्यकारी अध्यक्ष एएम अन्सारी को स्टरलाइट प्रबन्धन ने 3 साल पहले किये गये दुर्व्यवहार का हवाला देकर नौकरी से बर्खास्त कर दिया.

जनवरी 2007 में वीवी गिरी इन्स्टीट्यूट की एक रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की गई कि वेदांत/बाल्को ने हस्तांतरण के समय अपने कर्मचारियों के साथ आतताइयों जैसा व्यवहार किया और रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कम्पनी ने निजीकरण अनुबन्ध के अधिकांश प्रावधानों का उल्लंघन किया.16 सर्वाधिक दबाव तथाकथित 'हरित धातु' के उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल की जो आवश्यकता पड़ती है, उस उच्च गुणवत्ता वाले सारी दुनिया में पाये जाने वाले बॉक्साइट का आठवाँ भाग भारत में ज़मीन के नीचे मौजूद है. लेकिन यह खनिज उन पहाड़ियों की चोटी पर मिलता है जो कम से कम 1000 मीटर उंची हैं जहाँ पहाड़ी ढलानों पर किनारे-किनारे केवल संकरे रास्तों और पगडण्डियों के जरिये ही पहुँचा जा सकता है. पिछले 20 वर्षों में जंगलों की भारी कटाई के बावजूद और पर्यटन तथा जंगल कटाई से बचते-बचाते ये इलाके अब भी इस उप-महाद्वीप के सबसे समृद्ध जैव-विविधता वाले क्षेत्र हैं. ये हज़ारों आदिवासियों, चीतों, हाथियों, भैंसों, हिरण और दुर्लभ औषधियों के घर-वास हैं. तमिलनाडु में यह शोला के जंगलों की शक्ल में बीहड़ों को ढकने का काम करते हैं.

मैंने वेदांत की प्रायः सभी बड़ी बॉक्साइट वाली खदानों के स्थानों को देखा है जो छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु में जगह-जगह पर फैली हुई हैं. बिना किसी अपवाद के मैंने यह पाया है कि यह कम्पनी छोटे से छोटे पर्यावरणीय मानकों का भी उल्लंघन करती है और अपने कामगारों का शोषण तो वह इस हद तक करती है जिसके आगे, अगर विश्वस्तरीय प्रतिष्ठानों की बात छोड़ दें, तो घरेलू भारतीय कम्पनियाँ भी उतना नीचे नहीं गिरती होंगी.

2005 में छत्तीसगढ़ में मैनपाट में वहाँ की सबसे बड़ी बॉक्साइट खदान में मैं लगभग 30 मजदूरों से मिला था जिनके सिर पर कोई हेलमेट नहीं था, उन्होंने साधारण कमीजें या साड़ियाँ पहन रखी थीं और चिलचिलाती धूप में लैटेराइट पत्थरों के ब्लास्टिंग के बीच काम करने को मजबूर थे. ब्लास्टिंग के बाद वह कुछ अंकुसी और हथौडे़ लेकर पत्थर तोड़ने के लिए आये ताकि वह इन्तज़ार कर रहे ट्रकों में हाथों से लदाई करने के पहले उनकी छंटाई कर सकें.

वेदांत के सारे खनिक ठेका मजदूर हैं. अगर मैनपाट में उनका दिन अच्छा है तो वह एक टन खनिज की डिलीवरी के बदले 60 रुपये प्रतिदिन से थोड़ा अधिक (महिलाओं के लिए यह राशि कम होती है) कमा सकते हैं. उनका घर क्या है, झोपड़ी है जो खदान के ढलानों पर टिकी हुई है, बिजली पानी से एकदम विहीन. एक आदिवासी युवती मती साहू ने मुझे बताया कि ''करीब 150 परिवारों के लिए एक हैण्ड पम्प है. कम्पनी की तरफ से कोई दवा-दारू नहीं मिलता है और अगर कोई घायल हो जाता है तो उसे हमीं लोगों को टैक्सी किराये पर लेकर नीचे जाना पड़ता है.'' थोड़ा अलग हट कर एक बेहतर बस्ती में गाँव वालों ने शिकायत की कि दिन-रात खदान से सिलिका भरी धूल वाली हवा उनके घरों में बहती है और दीवारों तथा फ़र्श पर जमा होती रहती है. छत्तीसगढ़ में कोरबा अल्युमिनियम संकुल के विस्तार के कारण बढ़ी भूख और उड़ीसा में लांजीगढ़ रिफ़ाइनरी की बॉक्साइट की जरूरतों को पूरा करने के लिए वेदांत ने कवर्धा जिले के बोदई-दलदली की 10 किलोमीटर लम्बी पहाड़ियों की लूटपाट शुरू कर दी है. ये पहाड़ियाँ कान्हा नेशनल पार्क के साथ उफँचा सिर कर के खड़ी हुई हैं जिनके जंगलों को रुडयार्ड किप्लिंग ने अपनी 'जंगल बुक' में अमर कर दिया था. पिछले साल एक अंग्रेज मानव विज्ञानी और उसके एक भारतीय सहकर्मी ने यहाँ के बॉक्साइट खनन का अध्ययन किया था और पाया कि यहाँ के हालात मैनपाट से कहीं ज्य़ादा बदतर हैं.

परियोजना की राह के रोड़े बनी बैगा आदिवासियों की दो बस्तियों को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया का पालन किये हुए उनके घरों समेत उजाड़ दिया गया और उन्हें मैदानों में गैऱ-आदिवासी बस्तियों के बीच लाकर छोड़ दिया गया. उन्हें उनकी मक्के, तिलहन, चने और सरसों की फ़सल को काटने तक की मोहलत नहीं दी गई. उनकी गाय, भैंस, बकरियाँ वगैरह सब वहीं छूट गईं और जितनी ज़मीन उनके पास हुआ करती थी अब उसकी आधे पर अपनी जिन्दगी बसर करने के लिए वे मजबूर हैं. वेदांत के पहले मैनेजर ने 2005 में मुझे बताया कि वेदांत ने यहाँ जो खैऱात बाँटी उसमें नया घर बनाने के लिए 2,500 रुपये, एक हैण्ड पम्प और एक नई सड़क शामिल थी. कुछ मुआवज़ा भी लोगों को दिया गया था लेकिन मैनेजर ने यह स्वीकार किया कि वह बहुत कम था. उन्होंने यह भी कहा कि, ''अगर सरकार हमें कुछ अतिरिक्त भुगतान करने के लिए कहती है तो हम करेंगे.'' लोगों के प्रति हुई नाइन्साफ़ी से साफ़ तौर पर परेशान मैनेजर ने कहा कि लोगों को और अधिक नहीं हटाया जाना चाहिए, कम से कम कुछ समय के लिए तो हरगिज़ नहीं. इसके कुछ दिनों बाद मैनेजर को ही हटा कर मैनपाट भेज दिया गया और इसी बीच में कुछ अन्य परिवारों को ज़बर्दस्ती उनकी ज़मीन से बेदखल कर दिया गया या पहाड़ों पर खदानों के किनारे ठेल दिया गया ताकि वे झूलते रहें. अब उनकी नींद हर सुबह खदानों के धमाके और धूल भरी बारिश से खुलती है.17

उधर दक्षिण में तमिलनाडु में शेवारोयाँ और कोल्लि पहाड़ियों में वेदांत की सब्सिडियरी माल्को में कामगारों के हालात थोड़े बेहतर हैं. यहाँ बड़े पत्थरों को तोड़ने का काम जेसीबी मशीनों से होता है मगर छंटाई का काम मजदूर करते हैं. इतनी-सी सुविधा को 'मांगलिक' मानते हुए कम्पनी इसे अर्धमशीनीकरण कहती है लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभाव जघन्य हैं. मैनपाट में भले ही नाम के लिए ही सही, कुछ वनीकरण पर काम हुआ था. यह एक अलग बात है कि पूरे पौधारोपण में बाहर से लाए हुए और जल्दी उगने वाले पेड़ लगाये गये थे, स्थानीय किस्मों के पौधे नहीं. इनको भी ऊपरी मिट्टी और खदान के अपशिष्ट को मिला कर जैसे-तैसे गक्के में लगा भर दिया. मगर यहाँ इन पहाड़ियों में वेदांत ने वह नौटंकी भी नहीं की, बस पहाड़ियों को व्यवस्थित तरीके से नंगा करते गये.

बादलों की पृष्ठभूमि में पहाड़ के ये अंश घाव की तरह दिखाई पड़ते थे. पहाड़ों की यह कटाई ऊपर से नीचे एकदम सीधी दिशा में चलती है. जैसे-जैसे पहाड़ को छीलते जाते हैं वैसे-वैसे उसका अपशिष्ट और खुदा हुआ माल किनारे से नीचे की ओर ठेल दिया जाता है. इसका जो परिणाम होता है उसे बहुत अच्छी तरह से एक पादरी अरुल आनन्दन ने मुझे और मेरे एक सहयोगी नित्यानन्द जयरामन को बताया. पादरी आदिवासियों द्वारा चलाये जा रहे एक कॉफी प्लांटेशन के प्रबन्धन का काम करते थे. ''हमारी एक पहाड़ी को वेदांत ने ऊपर से 200 फुट नीचे तक सीधे तराश दिया है. सामने वाली चोटी पर अब उन्होंने एक नई खदान का काम शुरू किया है. ब्लास्टिंग से घबरा कर बहुत से बाइसन वहाँ से भाग निकले हैं. कम्पनी ने कुछ पेड़-पौधे जरूर लगाये थे पर उनमें से अधिकांश मर चुके हैं.

सबसे बुरा जो हुआ वह यह कि जब पानी बरसता है तब हमारी ज़मीन पर बाढ़ आ जाती है मगर सूखे के मौसम में इसका उलटा होता है. पानी के हमारे जितने सदानीरा स्रोत थे वे सब सूख गये हैं.'' वेदांत की खदानों के निचले हिस्सों में खेती की कोशिश करने वाले ग्रामीण बार-बार एक ही बात दुहराते हैं. जब से यहाँ खनन का काम शुरू हुआ तभी से सारे सोते सूख गये और इसका कारण जानना कतई मुश्किल नहीं है. पहाड़ों के ऊपर जमे बॉक्साइट में एक अद्‌भुत विशिष्टता होती है. यह बरसात के मौसम में पानी का संग्रह कर लेता है और बाकी समय में धीरे-धीरे उसे पहाड़ी के ढलानों और तलहटी तक छोड़ता रहता है. वेदांत को यह बुनियादी जल-विज्ञान मालूम ही नहीं है. 'कम्पनी के सामाजिक दायित्व' का बखान करते हुए मालिकों का एक बयान देखने लायक है,'' बॉक्साइट पेड़-पौधों के विकास में सहायक नहीं होता (जबकि) खनन से वनीकरण में मदद मिलती है.'' इसके विपरीत कोल्लि पहाड़ियों का वर्षों से अध्ययन कर रहे प्रकृतिवादी डॉ मारिमुत्थु बड़ी शिद्दत से कहते हैं कि, ''इन पहाड़ियों में कभी हमारे भारत के विज्ञ वैद्यों सिद्धरों का निवास हुआ करता था और ये जगहें देश के सबसे बड़े भेषज (दवाओं में प्रयोग होने वाली वनस्पतियों) उद्यान के तौर पर मशहूर थीं. इन पहाड़ों की ऊपर की मिट्टी हटा कर इनकी खुदाई कर दीजिए, हमारे यह संसाधन हमेशा-हमेशा के लिए लुप्त हो जायेंगे.18

उड़ीसा की नियमगिरि पर्वतमाला वहाँ रहने वाले डोंगरिया कन्ध जन-जाति के लिए पूजनीय स्थान माना जाता है और वेदांत की सभी सबसे महत्वपूर्ण लक्षित खदानें इन्हीं पहाड़ियों में हैं (इत्तेफ़ाकन आज से करीब एक शताब्दी पहले जिस अंग्रेज भूगर्भशास्त्री ने समृद्ध खनिजों वाली इस जगह को खोज निकाला था उसने इस खनिज को 'खोण्डालाइट' नाम देकर यहाँ रहने वाली कन्ध जन-जाति के प्रति सम्मान प्रकट किया था. यहाँ का रास्ता उसे कन्ध लोगों ने ही बताया था). अगर इस परियोजना को उसकी डिज़ाइन क्षमता तक चलने दिया गया तो क़रीब 660 हेक्टेयर घने जंगल की बलि चढ़ जायेगी जो कुल आरक्षित क्षेत्र का 90 प्रतिशत है. इसकी वजह से लगभग 100 नाले, झरने, सोते सूख जायेंगे और उन नदियों पर खतरा पैदा हो जायेगा जिनको इन साधनों से पानी मिलता है. वंशधारा नदी पर इसका विशेष रूप से प्रभाव पड़ेगा क्योंकि उसके पानी से मैदानी इलाकों में सिंचाई होती है.

लेकिन अग्रवाल तो इस बात के लिए इतने निश्चिन्त थे कि परियोजना सारी कानूनी अड़चनों को पार कर लेगी. उन्होंने 2003 में आस्ट्रेलिया के एक बड़े इंजीनियरिंग समूह, वॉर्ली पारसन्स को नियुक्त कर दिया कि वह यथाशीघ्र एक अल्युमिना रिपफ़ाइनरी का निर्माण कर दें ताकि नियमगिरी से निकलने वाले बॉक्साइट का शोधन किया जा सके. साइट की सफाई और निर्माण कार्य परियोजना को वन तथा पर्यावरण मन्त्रालय द्वारा स्वीकृति मिलने के पहले ही शुरू कर दिया गया था. तब रिफ़ाइनरी के नज़दीक के गाँवों में रह रहे अधिकांश मांझीकन्ध परियोजना के विरोध में बग़ावत में उठ खड़े हो गये. यह आग तब और भी ज्य़ादा भड़की जब 2004 में उनके दो गाँवों को मिट्टट्ठी में मिला दिया गया. वहाँ के बाशिन्दों को पुलिस ने बर्बरतापूर्वक उठा कर एक कंक्रीट की कॉलोनी में डाल दिया. योजना के आलोचक इसे 'यातना शिविर' मानते हैं.

अगर भारत के पर्यावरणवादियों और आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोग न होते तो अब तक कम्पनी द्वारा इन पहाड़ियों की लूट-पाट शुरू हो चुकी होती. सितम्बर 2004 में भू-वैज्ञानिक डॉ श्रीधर राममूर्त्ति-निदेशक, अकैडेमी ऑफ माउन्टेन एन्विरॉनिक्स, उड़ीसा के पर्यावरणविद्‌ विश्वजीत महन्ती और अधिकार रक्षक-प्रचारक सामन्त राय ने मिल कर उच्चतम न्यायालय की सेन्ट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी को आवेदन किया कि वह कम्पनी के क्रिया-कलाप को बन्द करवाये. इसके प्रत्युत्तर में उस वर्ष के अन्त में दो विशेषज्ञों को लांजीगढ़ भेज कर वस्तुस्थिति की जानकारी मांगी गई. ये लोग इस नतीजे पर पहुँचे कि वेदांत ने उड़ीसा सरकार की मिली भगत से ग़ैर-कानूनी ढंग से संरक्षित वनों का विनाश किया है और बिना समुचित अनुमति के रिफ़ाइनरी का निर्माण चालू कर दिया है तथा वहाँ के बाशिन्दों को बिना किसी जन-सुनवाई के उनकी ज़मीन और घरों से हटा दिया है. जनवरी 2005 में सेन्ट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने स्पष्ट रूप से कहा कि वेदांत ने उड़ीसा सरकार की मदद से बेशक कानून को तोड़ा है.

पाँच महीने बाद उड़ीसा के पर्यावरण संरक्षण समूह (एनवॉयर्नमेन्ट प्रोटेक्शन ग्रुप) के एक अध्ययन में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आई कि पूरा का पूरा नियमगिरि खनिज डिपॉज़िट संरक्षित जंगल क्षेत्र के ऊपर स्थित है जो लुप्तप्राय और दुर्लभ वनस्पतियों और पशु-पक्षियों का आवास-स्थान है. यहाँ की जैव-विविधता का दक्षिण एशिया में कोई सानी नहीं है जिसमें 30 औषधियों वाले पौधे, कम से कम 15 किस्म के एपीफ़ाइट ऑर्किड्‌स,
20 जंगली सजावटी पौधे, दस से ज्यादा फ़सली पौधों के जंगली सम्बन्धी (इनमें से कुछ अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के अधीन संरक्षित हैं), चीते, हाथी, तेन्दुए, रीछ, मुसंग और दूसरे बहुत से जानवर भी यहाँ पाये जाते हैं जिनमें बहुत से जानवर इन्टरनेशनल यूनियन फॉर दि कंजर्वेशन ऑफ नेचर द्वारा दुर्लभ प्रजातियों का दर्जा पाये हुए हैं. यहाँ बहुत से दुर्लभ पक्षी भी मिलते हैं और पाये जाने वाले जानवरों में अद्‌भुत सुनहरी छिपकिली, जंगली सांप और एक दुर्लभ गेहुँअन सांप शामिल है.19

सेन्ट्रल एम्पावर्ड कमेटी की 'वेदांत मामले' की चौथी सुनवाई दिल्ली में 28 अप्रैल 2005 को हुई जिसमें कम्पनी के मुख्य वकील सीए सुन्दरम के माध्यम से कम्पनी ने यह दलील देने की कोशिश की कि लांजीगढ़ में उसका रिफ़ाइनरी का काम मामूली सा हुआ है. यह सफेद झूठ था क्योंकि सेन्ट्रल एम्पावर्ड कमेटी की दिसम्बर 2004 वाली रिपोर्ट में न केवल यह बात दर्ज़ थी वरन वेदांत की अपनी वार्षिक रिपोर्टों (2004 तथा 2005) में दिये गये बयान तथा फोटो और वॉर्ली पारसन के वेब साइट पर भी यह घोषणा की गई थी कि परियोजना का काम चुस्त मगर दुरुस्त तरीके से चल रहा है.

इस मुकाम पर आकर वेदांत ने पेशकश की कि रिफ़ाइनरी की साइट का कुछ हिस्सा अगर जंगल की ज़मीन है तो वह वहाँ से हट जायेगा. कम्पनी ने यह भी कहा कि नियमगिरि की पहाड़ियों से उसकी कोई अपेक्षा नहीं है. सुन्दरम के अनुसार अब यह उड़ीसा माइनिंग कार्पोरेशन पर निर्भर करता था कि वह कम्पनी के खनन परमिट वाली दरख़्वास्त पर आगे विचार करना चाहता है या नहीं. इससे ज्य़ादा कपटपूर्ण बात हो ही नहीं सकती थी.

सेन्ट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने पहले ही राज्य सरकार द्वारा गलत तरीके से खदान को स्थाई रूप से रिफ़ाइनरी से जोड़ कर दोनों को एक ही परियोजना बनाने और उसके लिए एक ही पर्यावरणीय प्रभाव के मूल्यांकन को स्वीकार किये जाने पर एतराज किया था. स्टरलाइट का एक मेमोरण्डम ऑफ अंडरस्टैंडिंग उड़ीसा माइनिंग कार्पोरेशन के साथ 1997 में पहले ही हो चुका था जिसका फिर जून 2003 में पुनर्नवीनीकरण हुआ था. इसके अनुसार वेदांत को प्रसिद्ध नियमगिरि खदान के लिए अधिकांश पूंजी और प्रबन्धन विशेषज्ञता मुहैया करनी थी और इसके बदले में इंग्लैण्ड की इस कम्पनी द्वारा उत्खनित माल को खरीदने का पहला हक इसी कम्पनी को दिया गया था.

2005 सितम्बर में सेन्ट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने वेदांत द्वारा नियमगिरि को लूटने की योजना पर एक निन्दात्मक रिपोर्ट प्रकाशित की.20 इसमें एक स्वर से स्पष्ट किया गया था कि नियमगिरि का उत्खनन नहीं होना चाहिए जबकि वेदांत से अभी तक ग़ैर-कानूनी ढंग से लांजीगढ़ रिपफ़ाइनरी के निर्माण के बारे में कोई जवाब आना बाकी था. लेकिन इस मसले पर कोई फैसला देने के पहले 2006 के प्रारम्भ में न्यायालय ने इसे फॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी के पास उसकी राय जानने के लिए और एक विस्तृत तकनीकी मूल्यांकन करने के लिए भेज दिया जिसे तीन महीने के अन्दर पूरा किया जाना था. इनमें से दो अध्ययन पूरे किये गये. पहला वाइल्ड लाइफ़ इन्स्टीट्यूट ऑफ इण्डिया-देहरादून ने वन्य जीवन पर प्रभाव के लिए किया और दूसरा सेन्ट्रल माइन प्लानिंग एण्ड डिज़ाइन इन्स्टीट्यूट (सीएमपीडीआई)-रांची ने खनन के तकनीकी पक्ष पर किया. वाइल्ड लाइफ़ इन्स्टीट्यूट की रिपोर्ट किसी तरह से लीक हो गई मगर इसमें कोई सन्देह नहीं था कि इस सम्मानित संस्था ने नियमगिरि के उत्खनन को सीधे शब्दों में ख़ारिज कर दिया.21 मगर फॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी ने अक्टूबर महीने में जंगल की ज़मीन को कुछ शर्तों के साथ परियोजना को हस्तान्तरित करने के लिए स्वीकृति दे दी.

ये सब रिपोर्टें अन्ततःन्यायालय को पिछले साल दिसम्बर में दे दी गईं जब वेदांत के एक वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि नियमगिरि पर खनन के बिना रिफ़ाइनरी चल ही नहीं सकती. वकील साहब ने जो कुछ भी बताया उसे परियोजना के आलोचक बहुत पहले से जानते थे. उन्होंने, सेन्ट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी के समक्ष और आम जानकारी देने के लिए, कम्पनी द्वारा दिये गये बयानों को गस्त्र-मस्त्र कर दिया था. अगस्त 2006 में हुई वार्षिक जनरल मीटिंग के बाद वेदांत ने कई बार यह बयान दिया है कि नियमगिरि पहाड़ियों से मिलने वाले बॉक्साइट के बिना भी वह अपनी रिफ़ाइनरी चला सकता है.

यह सब की जानकारी में है कि कम्पनी मध्य-2006 से काफ़ी मात्रा में आयातित खनिज लांजीगढ़ में इकट्ठा  कर रही है. इसी बीच न्यायालय ने तय किया है कि फॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी का गठन गलत तरीके से हुआ था क्योंकि इसमें स्वतंत्र सदस्य शामिल ही नहीं थे.22

यह लेख लिखने के समय तक नई फॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी ने अभी तक अपनी रिपोर्ट नहीं दी है.

उपसंहार : ''हमारा वेदांत''

दुनिया की किसी भी खनन कम्पनी ने इस तरह से अपने आपको प्रतिष्ठित नहीं किया जैसा कि वेदांत ने किया है. इसे एक ओर अपने भारतीय मूलपर नाज़ है और यह देश के औद्योगिक विकास में मदद करने के लिए कटिबद्ध है (इसने आणविक विद्युत केन्द्रों के निर्माण में रुचि दिखाई है, निजी कोयला खदानों के क्षेत्र में काम करना चाहती है, लौह अयस्क की खदानों को हासिल करना चाहती है,23 और कोलार की सोना खदानों के लिए बोली लगा रही है), वहीं इसने ऑस्ट्रेलिया, ज़ाम्बिया और अर्मेनिया में वर्तमान सेंधमारी के अलावा दुनिया की बहुत-सी जगहों पर अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए नज़रें गड़ा रखी हैं.

अनिल अग्रवाल यह दावा जरूर करते हैं कि उनके मुनाफ़ा कमाने से साथीभारतीयों को फ़ायदा पहुँचता है मगर हकीकत यह है कि उनका प्रक्षेपण एकदम उलटी दिशा में है.

दरअसल उनका पहला उद्देश्य अपने परिवार के ज़खीरे को बड़ा करना है और अपने विदेशी निवेशकों को उनका लाभांश पहुँचा देना है. अब तक किसी ने भी, लक्ष्मी मित्तल या टाटा बन्धुओं समेत, इतने व्यवस्थित और निन्दनीय तरीके से अपनी मातृ-भूमि को नंगा नहीं किया है, अपने कामगारों का इतना शोषण नहीं किया है, और न ही कभी निर्दयी लुटेरों की तरह उन समुदायों के अधिकारों का हनन किया है जिन्हें तथाकथित रूप से भारत के संविधान से सुरक्षा मिली हुई है. सच यह भी है कि पिछले 2 वर्षों में किसी भी खनन कम्पनी का आर्थिक रूप से इतना विकास नहीं हुआ है जितना इस कम्पनी का हुआ, जिसने अपने मुनाफ़े को इसी दौरान लगभग दोगुना कर दिया.

वेदांत को शुद्ध रूप से एक मानक की तरह भारतीय चमत्कार मानने को मन करता है और सचमुच इस निष्कर्ष पर पहुँचना ही होगा कि अग्रवाल ने जान-बूझ कर इस कम्पनी को इस तरह से गढ़ा है कि वह उच्चवर्णीय हिन्दुत्व का एक तार्किक विस्तार लगे, मगर प्रगट रूप में वह धर्मनिरपेक्ष दिखाई पड़े. उनका यह प्रस्ताव कि वह पुरी के पवित्र धाम के पास उड़ीसा में 'हार्वर्ड की तर्ज़ पर' एक वेदांत विश्वविद्यालय की स्थापना करेंगे, इसकी एक मिसाल है. इस विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए किसी 'योग्यता' की आवश्यकता नहीं होगी, (अर्थात इसमें मध्य वित्त वर्ग और सम्पन्न वर्ग के लोगों के लड़के-लड़कियों के लिए खास स्थान होगा और उनसे - अभिभावकों से- यह अपेक्षा रहेगी कि वे वेदांत के सभी सही-गलत कामों का समर्थन करते रहें). लेकिन इसके पहले कि इस दिव्य भवन की आधारशिला रखी जाए, वेदांत ने खुद आदिवासियों के मनुष्य और प्रकृति के बीच के सम्बन्धों की मनोभावना को निर्दयतापूर्वक निष्क्रिय कर दिया है और उनकी आध्यात्मिकता को ठिकाने लगा दिया है.

लांजीगढ़ रिफ़ाइनरी के निर्माण के लिए चौरस या उजाड़ कर दिये गये किसी भी क्षेत्र में अगर कोई जाये तो उसे हर गाँव में एक साइन बोर्ड लिखा मिलता है और उस पर स्पष्ट शब्दों में लिखा मिलता है कि यह 'हमारे वेदांत' का हिस्सा है.

यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है. अस्सी के दशक में सुनने में आया था कि मध्य-पूर्व में एक इस्लामिक मिनरल्स जैसी कोई कम्पनी वजूद में आई थी और ऑस्ट्रेलिया में वहाँ की आदिम जन-जातियों के एक समूह ने क्रिश्चियन मिनरल कम्पनी शुरू की थी. मगर इन लोगों ने अपने पंथ के मूल पर कोई परदा डालने की कोई कोशिश नहीं की थी और शायद इसीलिए उनका जीवन काल बहुत छोटा रहा क्योंकि आजकल के समय में कड़ी व्यापारिक स्पर्धा में यह सब टिक नहीं सकता. इसके विपरीत अग्रवाल उद्योग ने हिन्दुत्व और नव-उदार रूढ़िवादिता का मिश्रण करने में एक ज़बर्दस्त सफलता अर्जित की है भले ही यह सफलता बेतुकी क्यों न हो. परेशानी की बात यह है कि इसका चेहरा जीनस की तरह है जिससे अधिकांश भारतीयों को कोई समस्या नहीं होती, फिर चाहे वह अपनी खुद की ओर देख रहे हों या दुनिया के दूसरे लोगों को इसे दिखा रहे हों.

फुटनोट
1. वास्तव में जब मैं यह लेख लिख रहा था तब मुझसे डाउ जोन्स इंग्लैण्ड के एक खनन संवाददाता ने ठीक यही सवाल पूछा था.

2. ग्लेनकोर की स्थापना बदनाम माल विक्रेता मार्करिच और उसके साथ इन्वेस्टमेन्ट बैंक-क्रेडिट स्विस के बहुत से करार के उत्तराधिकार के लिए की गई थी. इस कम्पनी के पास एक्सस्ट्राटा के 40 प्रतिशत इक्विटी शेयर हैं जो दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी खनन कम्पनी है.

3. लक्ष्मी मित्तल को बहुत से भारतीय लोग ग़लती से स्थानीय उद्योगपति समझ बैठते हैं मगर उनके साथ ऐसा कुछ भी नहीं है. उनके नाम पर आधारित कम्पनी (आर्सेलर-मित्तल जो लक्जमबर्ग की सबसे बड़ी इस्पात बनाने वाली कम्पनी थी जिसे मित्तल ने पिछले साल खरीद लिया था) रॉटरडम में निबन्धित है. कई कोशिशों के बावजूद इन्हें आज तक भारत में किसी खदान या प्लांट को हासिल करने में सफलता प्राप्त नहीं हुई है.

4. देखें-Armenia may start prosecution of Vedanta-controlled Zod gold mine” by John Helmer, Mineweb, February 28, 2007. अग्रवाल द्वारा कम्पनी सम्बन्धी समस्याओं को नियंत्रित करने के बावजूद स्टरलाइट गोल्ड कुछ समय से घाटे में चल रही है. उन्होंने वायदा किया था कि इस खदान के नज़दीक ही एक नई मिल के लिए वह कम से कम 8 करोड़ अमरीकी डॉलर की व्यवस्था करेंगे मगर ऐसा हो नहीं सका. इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिये क्योंकि कोई भी निवेशक राजनीतिक रूप से अस्थिर अज़रबाइजान की सीमा से एकदम लगे हुए घाटे में चल रहे प्रकल्प में अपनी पूंजी फंसाना नहीं चाहेगा. इसके अलावा अग्रवाल ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वह परिवेश संरक्षित सेवन झील के पास, जो पवित्र माउन्ट अराफ़ात के पीछे अवस्थित है, एक रिफ़ाइनरी लगाने की तलाश में हैं. जब वह स्टरलाइट गोल्ड को वापस 2006 में वेदांत रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी में ले आये तब उनकी इंग्लैण्ड स्थित कम्पनी ने 6 करोड़ अमरीकी डॉलर अर्मेनियन कम्पनी को खरीदने के लिए दिये थे जिसमें आधे से ज्य़ादा अग्रवाल और उनके परिवार के सदस्यों ने हड़प लिये. यह एक चालबाज़ी भरी अन्दरूनी खरीद-फरोख्त थी जिस पर इंग्लैण्ड के फ़ाइनेन्शियल प्रेस ने कोई टिप्पणी करने की तकलीफ़ नहीं उठाई. इससे भी ज्य़ादा बुरी बात यह थी कि इस करार को उस 'जिम्मेदार' अकाउन्टैन्सी फर्म अर्न्स्ट एण्ड यंग की सहमति का ठप्पा भी लग गया (यह फर्म वेदांत की लेखा-परीक्षक है). ज़ॉड खदान प्रकल्प में अग्रवाल के प्रारम्भिक पार्टनर एक बदनाम हस्ती रॉबर्ट फ्रीडलैण्ड थे जिन्हें लोग 'टॉक्सिक बॉब' (जहरीले बॉब) के नाम से जानते थे. बॉब अमेरिका से 1992 में उस समय भाग निकले जब उनकी कोलोरैडो स्थित समिटविल सोना खदान के साइनाइड भरे लीच पैड से ज़हरीला कचरा निकल कर स्थानीय नदी-नालों में बहने लगा. फ्रीडलैण्ड को आपराधिक लापरवाही की सज़ा सुनाई गई लेकिन जेल जाने की कौन कहे वह कभी पूरे दिन के लिए अदालत में भी नहीं रहा.

5. देखें-Alastair Fraser and John Lungu, For Whom the Windfalls: Winners and Losers in the Privatization of Zambia’s Copper Mines, published by Civil Society Trade Network of Zambia, and the Catholic Centre for Justice Development and Peace, Zambia Episcopal Conference, Lusaka, March 2006. इस रिपोर्ट के अनुसार ''6 नवम्बर 2006 को पूरे चिन्गोला जिले (उत्तर ज़ाम्बिया) में पानी की किल्लत हो गई क्योंकि केसीएम प्लांट की खदानों से निकलने वाले अपशिष्ट के फैलने के कारण काफ्य़ू नदी का पानी प्रदूषित हो गया. पानी की आपूर्ति करने वाली दो कम्पनियाँ, जो चिन्गोला आवासीय क्षेत्र के 75,000 निवासियों को पानी की आपूर्ति करती हैं, उनको अपने प्लांट बन्द कर देने पड़े क्योंकि केसीएम प्लांट के टेलिंग लीच प्लान्ट से घोल ले जाने वाला एक पाइप फट गया और काफ्य़ू नदी का पानी एकाएक नीला हो गया. नदी के पानी में कचरा मिल जाने के कारण नदी के पानी में ताँबे की मात्रा स्वीकृत मानक से 1,000 प्रतिशत अधिक हो गई. मैंगनीज़ 77,000 प्रतिशत और कोबाल्ट की मात्रा इस पानी में10,000 प्रतिशत ज्य़ादा हो गई.''

''... काफ्य़ू नदी जैसे प्रदूषित पानी का खाने-पीने में उपयोग करना, नदी में मिलने वाली मछलियों का सेवन, या उसी प्रदूषित पानी से पेड़-पौधों की सिंचाई करने से स्वास्थ्य पर तात्कालिक या दीर्घकालिक दुष्प्रभाव पड़ने की काफ़ी सम्भावना है. जिस तरह के रासायनिक पदार्थ नदी के पानी में घुल गये हैं उनसे फेफड़े और दिल की बीमारियाँ या सांस की समस्याएं हो सकती हैं और जिगर तथा गुर्दे खराब हो सकते हैं. तात्कालिक प्रभाव यह हुआ है कि बड़ी संख्या में लोग पेचिश, आंख में संक्रमण और त्वचा में परेशानी महसूस कर रहे हैं. ये सब दूरगामी दुष्प्रभावों में प्रदूषण के प्राथमिक चिह्न हो सकते हैं. ज्य़ादा मात्रा में मैंगनीज़ से सम्पर्क के कारण 'मैगेनिज्म' नाम की बीमारी हो सकती है जो केन्द्रीय स्नायु प्रणाली की एक बीमारी है. इससे मानसिक और स्नायुविक प्रक्रियाओं पर बुरा असर पड़ सकता है. स्थानीय आबादी पर मस्तिष्क पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों में पीढ़ियों का अन्तर पड़ सकता है.''

ज़ाम्बिया की एवॉयर्नमेन्ट काउन्सिल का कहना था कि केसीएम द्वारा यह एक पर्यावरणीय लापरवाही की मिसाल है जिसके कारखाने में कई बार पाइप फटने की दुर्घटना हो चुकी है. कई बार तो ऐसा हुआ है कि बहुत जगह जनता को साल भर से अधिक समय के लिए प्रदूषित पानी मिला है. ईसीजेड के एक प्रवक्ता ने शिकायत की कि, ''केसीएम द्वारा पर्यावरणीय प्रबन्धन कम्पनियों के सामाजिक उतरदायित्व का यह एक स्पष्ट उदाहरण है.'' पूरी रिपोर्ट के लिए देखें- http://minewatchzambia.com/reports/report.pdf.

6. Impact of Privatization of labour : A study of BALCO Disinvestment, published by V. V. Giri National
Labour Institute, January 2007.

7.“Vedanta asked to stop construction” The Hindu, March 11, 2007.

8. वेदांत को बाजार में उतारने में मुख्य भूमिका किस शख़्स की थी, यह 2006 के मध्य तक U. K. Financial Times’ ने ज़ाहिर नहीं किया था. यह साहब थे इयान हन्नाम, तथाकथित 'जनता के सिपाही', जेपी मॉर्गन कैसेनोवा के कार्यकारी निदेशक, गल्फ़-एसएएस (स्पेशल एअर सर्विसेज़) के भूतपूर्व अपफ़सर जो इस विश्वस्तरीय निवेशक बैंक में कैपिटल मार्केट के अध्यक्ष हैं. हन्नाम ने दुनिया की सबसे बड़ी खनन कम्पनी बीएचपी बिल्लिटन की लन्दन में लिस्टिंग की व्यवस्था की थी और साथ हीकज़ाकमीज़, जो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी यूरेनियम कम्पनी है, की भी लिस्टिंग में उनका हाथ था. देखें-फाइनेन्शियल टाइम्स, जून-3/4, 2006.

9. लन्दन स्टॉक एक्सचेंज में दिसम्बर 2003 में वेदांत की लिस्टिंग के ठीक पहले फाइनेन्शियल टाइम्स के पहेलियाँ बुझाने वाले स्तम्भकार 'लेक्स' ने स्वीकार किया था कि, ''(स्टरलाइट) की संरचना बड़ गूढ़ है और उसके कार्पोरेट गवर्नेंस का उतार-चढ़ाव का इतिहास रहा है.'' अब यह तो पता नहीं कि यह संरचना जान-बूझ कर इसलिए बनाई गई है कि अनिल अग्रवाल के संदिग्ध सम्पर्कों को भारत के आर्थिक अण्डरवर्ल्ड के उनसे भी ज्य़ादा संदिग्ध व्यक्तियों से सम्पर्क को छिपाया जा सके, लेकिन इतना तय है कि यह संरचना पारदर्शी नहीं है. उस समय तक स्टरलाइट की 'दुरूह संरचना' की जड़ में टि्‌वन स्टार होल्डिंग्स के नाम से एक दूसरी संस्था टैक्स रियायतों के स्वर्ग, मॉरिशस, में हुआ करती थी और माना जाता है कि उसी के पास स्टरलाइट उद्योग का अधिकांश मालिकाना था. टि्‌वन स्टार ने अपना पहला समुद्र पार कदम 1998 में रखा था जब उसने कनाडा की फर्स्ट डाइनेस्टी माइन्स में बड़े इक्विटी निवेश के लिए हामी भरी थी जिसका संस्थापक एक बहुत ही विवादास्पद आर्थिक निवेशक रॉबर्ट 'टॉक्सिक बॉब' फ्रीडलैण्ड हुआ करता था. टि्‌वन स्टार के जरिये स्टरलाइट कम्पनी फर्स्ट डाइनेस्टी में 75 लाख अमरीकी डॉलर निवेश करने के लिए राज़ी हो गई जिससे भारतीय कम्पनी को अपने तीन निर्देशक नियुक्त करने का अवसर प्राप्त हुआ और अन्ततः यह कनाडा स्थित कम्पनी का 43 प्रतिशत हिस्सा ले बैठी. अग्रवाल का मुख्य उद्देश्य किसी तरह स्टरलाइट को अर्मेनिया में फर्स्ट डाइनेस्टी के ज़ॉड स्वर्ण परियोजना में घुसाना था. अग्रवाल और उसके दो सहयोगी वास्तव में फर्स्ट डाइनेस्टी के बोर्ड के सदस्य भी थे और उसके तुरन्त बाद फर्स्ट डाइनेस्टी में टि्‌वन स्टार का निवेश पूरा हो गया.

टि्‌वन स्टार के बारे में फिर 2003 तक कुछ खास सुनने को नहीं मिला जब इस कम्पनी ने पुष्टि की कि होल्डिंग कम्पनी के पास स्टरलाइट का 55 प्रतिशत स्टॉक है और उसके साथ 7.13 प्रतिशत का मालिकाना स्टरलाइट की मद्रास अल्युमिनियम कम्पनी (माल्को) का था जिसका 80 प्रतिशत खुद टि्‌वन स्टार के कब्ज़े में था. तब अक्टूबर में, जब वेदांत की इंग्लैण्ड में निरीक्षण के लिए परेड चल रही थी उसके ठीक बाद, टि्‌वन स्टार कम्पनी ने यह घोषणा की कि वह स्टरलाइट में अपनी हिस्सेदारी 75 प्रतिशत करना चाहती है. भारतीय अधिकारियों ने इस बात पर चिन्ता व्यक्त की कि बाल्को और हिन्दुस्तान जिंक का हस्तान्तरण अब किसी दूसरे विदेशी मालिक को कर दिया जायेगा जबकि इस तरह के हस्तान्तरण को खास तौर पर उस समय ग़ैर-कानूनी चिह्नित किया गया था जब स्टरलाइट ने इन कम्पनियों का अधिग्रहण किया था. जब अधिकारी अपनी इस दुविधा से समझौता करने की कोशिश कर रहे थे उसी समय वित्त मंत्रालय की विदेशी निवेश इकाई ने स्पष्ट किया कि टि्‌वन स्टार के असली मालिक अग्रवाल थे ही नहीं बल्कि यह कोई विनोद शाह था. लन्दन में रहने वाले एक दूसरे अप्रवासी भारतीय शाह ने अपनी होल्डिंग कम्पनी वोल्कन इन्वेस्टमेन्ट लिमिटेड के माध्यम से टि्‌वन स्टार का शत प्रतिशत मालिकाना अपने हाथ में लिया हुआ था.

उस समय यह स्पष्ट नहीं था कि सेबी के 'सब्सटेन्शियल अक्वीजीशन ऑफ शेयर्स एण्ड टेक ओवर्स' नियमों का उल्लंघन हुआ था या नहीं. लेकिन यह निश्चित था कि वेदांत की लिस्टिंग के समय वोल्कन इन्वेस्टमेन्ट लिमिटेड (वापस?) अग्रवाल के हाथों में आ चुकी थी. अगस्त 2006 में, जैसा कि वेदांत की वार्षिक रिपोर्ट (30 सितम्बर 2006) की एक उप-संचिका में कहा गया है कि एक दूसरी अज्ञात सब्सिडियरीवेल्टर ट्रेडिंग ने टि्‌वन स्टार इन्टरनेशनल लिमिटेड के 100 प्रतिशत पर कब्ज़ा जमा लिया था.

10. ऐसा लगता है कि माइकेल फाउल ने वेदांत को खुशगवार माहौल में छोड़ा लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि वह कम्पनी छोड़ने के लिए एक बहुत अच्छे पैकेज की वजह से ही आकर्षित हुआ, रोडियर ने कभी यह नहीं बताया कि उसने इस्तीफ़ा क्यों दिया. एक तार्किक अनुमान यह हो सकता है कि इस स्वनामधन्य पेशेवर आदमी ने जो कि पहले फ्रेंन्च एटॉमिक एनेर्जी एजेन्सी में काम कर चुका था और फिर पिचिनी अल्युमिनियम के शीर्ष पद पर था, वेदांत पर अनिल अग्रवाल की मजबूत पकड़ के कारण उत्तरोत्तर परेशान रहा करता था. अग्रवाल की ज्य़ादा दखलअंदाजी भी उसे खलती थी.

11. देखें-वेदांत रिसोर्सेज़ पब्लिक लिमिटेड कम्पनी, वार्षिक रिपोर्ट-2006, पृष्ठ 50.

12. वास्तव में यह बात पिछले साल उड़ीसा स्थित पत्रकार और एक्टिविस्ट समरेन्द्र दास ने वेदांत की वार्षिक साधारण सभा में उठाई थी. जवाब में अग्रवाल ने वायदा किया था कि उनके 'दान-धर्म' का फायदा पाने वाले भारतीय राजनीतिज्ञों की सूची वह उपलब्ध करवा देंगे पर यह आज तक नहीं किया गया.

13. सेबी ने स्टरलाइट और दो भारतीय निजी कम्पनियों की अन्दरूनी खरीद-फरोख्त की तीव्र भर्त्सना की
थी. यह एक ऐसा फैसला था जिसके बारे में फ्रन्टलाइन के स्तम्भकार प्रफुल्ल बिदवई ने कहा कि ''यह स्टॉक मार्केट में कम्पनियों की अंधेरगर्दी के ख़िलापफ़ किसी संवैधानिक संस्था द्वारा किया गया सबसे बड़ा अभियोग पत्र है.'' स्टरलाइट पर 2 वर्षों के लिए बाजार से पैसा उठाने पर पाबन्दी लगा दी गई और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के 34 दलालों को भी इस स्कैम में हेरा-फेरी का दोषी पाया गया. कहा जाता है कि अनिल अग्रवाल ने शेयर के दामों में दग़ल फसल के लिए एक 'प्रमोटर' हर्षद मेहता के साथ षडयंत्र किया. 6 साल पहले 1992 में मेहता को स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया से रसीद 'गायब' हो जाने का हवाला देकर 5 अरब रुपये हजम करने का दोषी पाया गया था. लेकिन इतना होने के बावजूद बाद में उसे स्टॉक खाली करने का टिप देने और बाजार के रुझान बताने वाली वेबसाइट चालू करने से रोका नहीं जा सका. अखबारों में भी उसकी छद्म 'प्रबुद्धि’ का प्रसारण करने से नहीं रोका जा सका. मेहता ने अपनी संदेहजनक सेवाएं उन कम्पनियों को भी अर्पित करने की पेशकश की जिनकी माली हालत ख़स्ता थी. स्टरलाइट इस सूची में शामिल थी.

सेबी द्वारा की गई जांच-पड़ताल से पता लगा कि अप्रैल से लेकर जून 1998 के बीच जब स्टरलाइट ने इण्डिया अल्युमिनियम कम्पनी को हासिल करने की एक नाकाम कोशिश की थी तब उसका स्क्रिप प्राइस 41 प्रतिशत बढ़ गया था लेकिन उसका जो वास्तविक परिवर्तन मूल्य था उसका बोझ कम्पनी की पहुँच से बाहर था. मेहता के पास पैसा तो बड़ा सीमित था पर उसने अग्रणी कम्पनियों का एक बहुत बड़ा नेटवर्क बना रखा था. सामूहिक रूप से दमयन्ती ग्रुप के नाम से जाने वाले इस समूह ने शीघ्र ही स्टरलाइट के अच्छे खासे फ्रलोटिंग स्टॉक का अधिग्रहण कर लिया जिसमें 30,000 शेयर इसके मद्रास सहयोगी के माध्यम से कर्ज़ के रूप में मिले (देखें-बिज़नेस इण्डिया, मार्च 13, 2005). कर्ज़ की अदायगी में दिक्कतें आने पर दमयंती ग्रुप ने अपनी पोज़ीशन्स को एक स्टॉक एक्सचेंज से दूसरे एक्सचेंज में 'रोल' करना शुरू कर दिया. दलालों के बीच में यह हस्तांतरण क्रेडिट नोटों के माध्यम से होता था. पैसा पास में न होने की वजह से हर्षद मेहता आखिरकार दिवालिया हो गया. जब सेबी ने इन अग्रणी कम्पनियों की छानबीन शुरू की और उनका हर्षद मेहता से रिश्ता जानना शुरू किया तब उसके चट्टे-बट्टे ने उलटी-सीधी बातें बता कर जांचकर्ताओं को गुमराह करने की कोशिश की. अंततः सेबी ने टेलीफोन बिलों के सहारे, वकीलों को दी गई फ़ीस और दूसरे दलालों की जांच-पड़ताल करके कार्पोरेट के काले कारनामों पर से परदा हटाया. ब्यूरो को पता लगा कि कम्पनियों ने हर्षद मेहता को पैसा उधार दिया ताकि वह अपनी पोज़ीशन मजबूत कर सके, बाज़ार में एक अप्राकृतिक उछाल आये और अंततः सारे निवेशों की हवा निकल जाये. एक तरह से यह 'एनरॉन स्कैम' का एक प्राथमिक भारतीय प्रतिरूप था. मेहता की बाजार में हाथ की सफाई के पीछे उसकी तीन भारतीय कम्पनियों-बीपीए, वीडियोकॉन और स्टरलाइट से रब्त-जब्त था. यह तीनों कम्पनियाँ पूंजी बाजार से पैसा उठाने के लिए क्रमशः चार, तीन और दो वर्षों के लिए प्रतिबन्धित थीं. लेकिन सिक्यूरिटी अपैलैन्ट ट्राइब्यूनल में स्टरलाइट ने सफलतापूर्वक यह दलील रखी कि इस आदेश का कोई कानूनी औचित्य नहीं है और इस तरह से उस पर से प्रतिबन्ध हटा लिया गया. इस निमित्त सेबी ने स्टरलाइट के ख़िलाफ़ जो नए सबूत ट्राइब्यूनल के सामने रखे उसे दुर्भाग्यवश ट्राइब्यूनल ने नहीं माना. 2001 में मेहता की हृदय गति रुक जाने से मृत्यु हो गई.

14. तूतीकोरिन में 1994-95 के बीच वेदांत द्वारा किये गये उल्लंघनों की एक सिलसिलेवार रिपोर्ट अक्टूबर 2005 में एक जाने माने पर्यावरणीय पत्रकार नित्यानन्द जयरामन ने मद्रास स्थित ’दि अदर मीडिया के कारपोरेट अकाउन्टेबिलिटी डेस्क’ के लिए तैयार की थी. संक्षेप में जो अभियोग बनते हैं वे यहाँ नीचे दिये गये हैं,
  • संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा चिर्ति मन्नार की खाड़ी के स्पेशल बायोस्फियर रिज़र्व से स्मेल्टर केवल 14 किलोमीटर की दूरी पर था जबकि कानून यह कहता है कि सारे औद्योगिक प्रतिष्ठान यहाँ से कम से कम 25 किलोमीटर के पफासले पर होने चाहिए.
  • कम्पनी (उस समय स्टरलाइट) द्वारा काम शुरू करने के पहले न तो पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का कोई मूल्यांकन हुआ और न ही वैसा कोई अनुमोदन हुआ.
  • इस तरह का कोई कारखाना शुरू करने के पहले जन-सुनवाई का प्रावधान होता है. यह तब तक नहीं हुई जब तक 2003 में स्टरलाइट कम्पनी वेदांत के हाथ में नहीं चली गई मगर तब तक स्मेल्टर को काम करते हुए 7 साल बीत चुके थे. उस समय तक भी, प्लांट के विस्तार के लिए मुख्य इकाइयों की स्वीकृति नहीं मिली थी मगर कम्पनी ने अपने उत्पादन का जोविस्तार कर लिया हुआ था वह उसकी स्वीकृत कानूनी सीमा से चार गुने से भी ज्यादा था और उसके पास तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति भी नहीं थी.
  • सितम्बर 2004 में (जब वेदांत रिसोर्सेज़ प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी को टूटीकोरिन स्मेल्टर का अधिग्रहण किये हुए 9 महीने का समय बीत चुका था) भारत के उच्चतम न्यायालय की हैज़ार्डस वेस्ट्‌स मॉनिटरिंग कमेटी ने पाया कि कम्पनी अनापत्ति प्रमाण-पत्र की चार मुख्य शर्तों का उल्लंघन कर रही थी. साइट पर हजारों टन आर्सेनिक-प्रदूषित स्लैग का मौजूद रहना खास तौर पर चिन्ताजनक था. एक सप्ताह बाद कमेटी ने उच्चतम न्यायालय से सिफ़ारिश की कि तूतीकोरिन में वेदांत के विकास की पूरी प्रक्रिया को गैऱ-कानूनी करार कर दिया जाए.
  •  इसके बावजूद तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 2004 अप्रैल में वेदांत के विस्तार के लिए बीती तारीखों से अनुमति प्रदान कर दी.
  • एक माह बाद (मई 2005 में) हैजार्ड़स वेस्ट्‌स मॉनिटरिंग कमेटी ने तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सफाई मांगी कि ग़ैर-कानूनी कामों को करने के लिए अनुमति कैसे दी गई? आज तक इसका कोई सन्तोषजनक उत्तर बोर्ड की ओर से नहीं दिया गया है.

15. ''बाल्को करार आर्थिक रूप से असंगत, राजनैतिक दृष्टि से निन्दनीय, कानूनी तौर पर अमान्य और पर्यावरणीय लिहाज़ से गलत है...यह भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये मौलिक अधिकारों पर ऐतिहासिक समता फैसले का उल्लंघन है जिसमें कहा गया है कि आदिवासियों की जमीन पर केवल उन्हीं का अधिकार है....'' (प्रफुल्ल बिदवई, फ्रन्टलाइन मई 12.25, 2001).

16. वीवी गिरी रिपोर्ट के अनुसार कर्मचारियों पर 'दबाव' डाला गया कि वे स्वैच्छिक अवकाश योजना के तहत रिटायरमेन्ट ले लें. जिन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया उन्हें परेशान किया गया. वेदांत ने स्वैच्छिक अवकाश की जो रणनीति अपनाई थी उसका मकसद था ''उनके आत्म सम्मान को ठेस पहुँचा कर बेइज्जत करना और कम्पनी के प्रति उनकी निष्ठा पर शक करना.'' जिन लोगों ने स्वैच्छिक अवकाश लेने की पेशकश की उनके पैसों का भुगतान पाँच किस्तों में किया गया और हर भुगतान के बीच छः महीने का अन्तर रखा गया. 1,302 कर्मचारियों को स्वैच्छिक अवकाश मिला जिनमें से लगभग सभी को (1,281) पैसों का भुगतान देर से किया गया. स्वैच्छिक अवकाश स्वीकृत किये जाने के बावजूद कर्मचारियों के 25,000 से 50,000 रुपयों तक की राशि को कम्पनी ने अपने पास रखा. नई दिल्ली कार्यालय और बिधानबाग इकाई में काम कर रहे कर्मचारियों को बड़ी संख्या में कोरबा अल्युमिनियम कॉम्प्लेक्स भेज दिया गया और वहाँ उन्हें स्वैच्छिक अवकाश लेने पर मजबूर किया गया. अगर उन लोगों ने स्थानान्तरण के विरुद्ध आवाज उठाई तो ''उनकी तनख़्वाह और भत्ते रोक दिए गये जिनका भुगतान सात महीने बाद तक नहीं हुआ.'' ''स्कूलों में नामांकन में भी भारी गिरावट आई'' यहाँ तक कि जूनियर स्कूल तो बन्द हो गया और ''अब कम्पनी जूनियर स्कूल भवन को एक गोदाम के तौर पर इस्तेमाल कर रही है.'' (देखें-बाल्को के कर्मचारी स्वैच्छिक अवकाश लेने को बाध्य किये गये-अक्षय मुकुल, टाइम्स ऑफ इण्डिया, जनवरी 25, 2007). यह भी ध्यान देने की बात है कि 2005 में छत्तीसगढ़ के राजस्व मंत्री ने बाल्को पर यह इल्जाम लगाया था कि उसने ''सम्बद्ध संस्थाओं की अनुमति के बगैर'' कोरबा अल्युमिनियम कॉम्प्लेक्स के विस्तार के लिए 20,000 पेड़ों को काट दिया. वेदांत पर 2004 में यह भी इल्जाम लगा था कि जब उसके पास विस्तार कार्यों के लिए पूंजी जमा हो गई तब उसने गैऱ-कानूनी तरीके से गाँव वालों को मजबूर किया कि वह अपनी जगह-जमीन छोड़ कर हट जायें. (देखें-बाल्को पर जमीन हड़पने की बदनामी टेलिग्राफ, कोलकाता, जून 18, 2005, न्यू इण्डियन एक्सप्रेस जून 24, 2005, आइएएनएस-जुलाई 13 तथा जुलाई 25, 2005).

17. 2005 के मध्य में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह ने यह स्वीकार किया कि इस तरह से इतना जल्दी किया गया जबर-दखल मान्य नहीं है. ऐसा उन्होंने तब कहा जब 20 प्रभावित परिवारों ने गवाही दी कि 'नई खदान' ने उनके घरों और खेती को ''पूरी तरह से तबाह'' कर दिया है. कहा जाता है कि सिंह ने जिला कलक्टर को यह आदेश दिया कि इन परिवारों का यथाशीघ्र और समुचित पुनर्वास सुनिश्चित किया जाय, उन्हें जीवन निर्वाह के लिए वैकल्पिक जमीन और रहने के लिए घर की व्यवस्था की जाए और समुचित क्षतिपूर्ति दी जाए. भारत तथा इंग्लैण्ड की एक अध्ययन टीम जब मई 2006 में इस क्षेत्र के भ्रमण के लिए गई तो उसे नहीं लगा कि इस तरह के कोई कदम उठाये गये थे या वह लोग जो इस खदान के जीवन काल में भविष्य में हटाये जायेंगे, उनके लिए भी इस तरह की कोई योजना है.

18. उत्तरी तमिलनाडु में मेट्‌टूर में माल्को के समग्र अल्युमिनियम उपक्रमों में इस तरह के प्रदूषण फैलाने वाले कुख्यात उद्योगों की पर्यावरण पर दुष्प्रभाव की निहायत घटिया प्रदर्शनी देखने को मिलती है जिसमें असुरक्षित कोयला चालित कैप्टिव पॉवर प्लांट से निकले जहरीले पदार्थों का अपना विशिष्ट योगदान रहता है. वेदांत दावा करता है कि वह माल्को से निकलने वाले ''लाल कीचड़'' (कॉस्टिक सोडा अपशिष्ट) और फ्लाइ ऐश का उपयोग ईंटें बनाने में करता है. यह अपने आप में ही बड़ा सन्देहास्पद ''समाधान'' है और बहुत मुमकिन है कि ऐसा पूरी तरह कर पाने में वर्षों लग जायेंगे. इस बीच लाल कीचड़ बजबजाते हुए खेतों तक पहुँच जाता है, पानी के स्रोतों को प्रदूषित करता है और जानवरों की मृत्यु का कारण बनता है. रिफ़ाइनरी और विद्युत गृह से निकलने वाला धुआँ बहुत से स्थानीय निवासियों, खास कर दलितों, की जीवनधारा में जहर घोलता है. अप्रैल, 2005 में बहुत से ऐसे लोगों ने जो माल्को से प्रभावित थे इण्डियन पीपुल्स ट्राइब्यूनल ऑन एनवायर्नमेन्ट एण्ड ह्यूमन राइट्‌स द्वारा आयोजित जांच-पड़ताल के समक्ष अपना बयान दिया. इसका काम केमप्लास्ट सन्मार और मालको लिमिटेड में पर्यावरण की दुःस्थिति और मानवाधिकार उल्लंघन का अध्ययन करना था. बहुत से लोगों ने, इनमें कर्मचारी भी शामिल थे, बहुत सी ऐसी बीमारियाँ बताईं जिनसे इलाके के लोग त्रस्त थे. इनमें गम्भीर रूप से श्वास तंत्र की बीमारियाँ, त्वचा तथा आंख की बीमारी, पेट की गड़बड़ी, सीने और हाथ-पैरों में दर्द की शिकायतें आम थीं.

19. देखें-A Brief Report on Ecological and Biodiverstiy Importance of Nyamgiri Hill and Implications of Bauxite Mining, Environmental Protection Group, Orissa, June 2005

20. Central Empowered Committee report in IA No. 1324 regarding the alumina refinery plant being set up by m/s Vedanta Alumina Limited at Lanjigarh in Kalahandi district, Orissa; Delhi, September 21, 2005

21. देखें: Studies on impact of proposed Lanjigarh bauxite mining on biodiversity including wildlife and its habitat, Wildlife Institute of India, Dehra Dun, August 2006

22. Information from Forest Case Update, Delhi, December 2006

23. अप्रैल 2007 के आखिर में भारत के सबसे बड़े ताँबा निर्यातक सीसा गोआ के अधिग्रहण के मामले में वेदांत ने लक्ष्मी मित्तल की कम्पनी आर्सेलर मित्तल को पछाड़ दिया. दुनिया के दूसरे नम्बर की निर्यातक रियो टिन्टो करीब 2 महीने पहले इस दौड़ से हट गई थी. कोरस के हाल के अधिग्रहण में संसाधन प्रायः चुक जाने के बाद (और अब नये संसाधनों की तलाश के कारण) टाटा स्टील की गिनती आखिरी सम्भावित खरीदारों तक में नहीं थी. देखें (“Vedanta buys 51 percent of India’s Sesa Goa” by Mark Potter and Emi Emoto, The Scotsman, April 24, 2007.)
वेदांत का कहना है कि वह सीसा गोआ के अधिग्रहण के लिए आवश्यक संसाधन ''मौजूदा नगद संसाधनों और बैंक द्वारा आश्वस्त किये गये नये 1100 करोड़ अमरीकी डॉलर'' से करेगा. एक जाहिर सा और तुरन्त का प्रश्न यह उठता है कि ऐसी परिस्थिति में उड़ीसा में बॉक्साइट को अल्युमिनियम में परिवर्तित करने के लिए जो विस्तार करना होगा उसके लिए जरूरी पूंजी कहाँ से आयेगी (यह सच है कि गोआ के लौह अयस्क में अल्युमिना की खासी मात्रा है और वहाँ बॉक्साइट का भी खनन होता है). लेकिन निर्विवाद रूप से भारत की सबसे बड़ी और सर्वाधिक विविधिता वाली यह खनन कम्पनी जिसका लन्दन स्टॉक एक्सचेंज में मार्केट कैपिटलाइजेशन बढ़ कर 4100 करोड़ अमरीकी डॉलर हो गया है, ऐसा नहीं लगता है कि अतिरिक्त पूँजी जुटाने में इसे कोई दिक्कत होने वाली है क्योंकि यूरोप और अमेरिका के इसके पुराने बैंक सूत्र इस काम में उसकी मदद करेंगे.

रोजर मूडी लंदन में रहते हैं और वेब साइट www.minesandcommunities.org के प्रबन्ध सम्पादक हैं. वह एक अनुभवी अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्त्ता और अभियानी हैं जिन्होंने बहुत-सी यात्राएँ, ख़ास कर एशिया प्रशान्त क्षेत्र में की हैं. उनकी बहुत-सी कृतियों में बहुचर्चित ‘The Gulliver File : Mines, People and Land’—A Global Battleground (Mineswatch/WISE Glen Aplin/International Books, 1992), The Indigenous Voice : Vision and Realities (Zed Books 1988)  तथा The Risks We Run : Mining, Communities and Political Risk Insurance (International Books, Utrecht, 2005 शामिल हैं. उनकी नवीनतम पुस्तक Rocks and Hard Places : Globalisation of Mining (Zed Books) पिछले महीने प्रकाशित हुई है.

पैनोस साउथ एशिया द्वारा प्रकाशित पुस्तक बुलडोजर और महुआ के फूल से साभार. 
यहां इसके अनुवाद को थोड़ा बेहतर बनाने की कोशिश की गई है.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ वेदांतः हिदुत्व और साम्राज्यवादी मंसूबों का विध्वंसक मिश्रण ”

  2. By Free Hindi Books on September 24, 2010 at 6:44 PM

    बहुत सुंदर।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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