हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

धर्म, सत्ता और स्त्री

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/31/2010 09:37:00 PM

रणेन्द्र

बात की शुरूआत माधवी की कथा से करता हूँ. महाभारत के उद्योगपर्व के 106वें अध्याय से 123वें अध्याय तक माधवी के आख्यान का वर्णन है. माधवी नहुष कुल में उत्पन्न चन्द्रवंश के पांचवें राजा ययाति की पुत्री थी. गालव ऋषि को अपने गुरू विश्वामित्र को गुरूदक्षिणा में श्यामकर्ण और चन्द्रप्रभायुक्त आठ सौ घोड़े देने थे. गालव राजा ययाति के पास पहुंचे. राजा के पास भी श्यामकर्ण घोड़े नहीं थे. उन्होंने अपनी बेटी माधवी ऋषि को दे दी ताकि उसे अन्य राजाओं को सौंप कर घोड़े प्राप्त करे.
ऋषि गालव ने माधवी को पहले अयोध्यापति हर्यश्व को दिया जिन्होंने माधवी से एक पुत्र उत्पन्न करके दो सौ घोड़े दिए. काशीराज दिवोदास और भोजराज उशीनर ने भी इसी प्रकार पुत्र उत्पन्न कर प्रत्येक ने गालव को दो-दो सौ घोड़े दिए.अन्त में छह सौ श्यामकर्ण घोड़े सहित गालव ने माधवी को गुरू विश्वामित्र को अर्पित किया. माधवी के गर्भ से विश्वामित्र को अष्टक नामक पुत्र की प्राप्ति हुई. माधवी तब राजा ययाति को वापस लोटा दी गई. यानी महाभारत काल तक स्त्री अपने मानवी स्वरूप से च्युत होकर वस्तु में तब्दील हो चुकी थी. अब वह एक शेयर या बांड थी जिसे बार-बार भुनाया जा सकता था. बन्धक रखा जा सकता था.
माधवी की कथा पौराणिक काल में स्त्री के अमानवीकरण का एक वीभत्स उदाहरण है किन्तु इस प्रक्रिया की शुरूआत तो उसी समय हो गई थी जब व्यक्तिगत सम्पत्ति की अवधारणा प्रकट हुई. पुरूष के मन में यह परिकल्पना जागी कि उसकी अर्जित की हुई पम्पत्ति, उसकी गौयें उसकी भूमि उसके ही पुत्र को उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हो. इस परिकल्पना ने मातृसत्ता को उलट दिया. यह परिवर्तन मानवजाति द्वारा महसूस किए गए सबसे निर्णायक परिवर्तनों में से एक था.
एंगेल्स का कथन है, 'मातृसत्ता का विनाश स्त्री जाति का विश्व ऐतिहासिक पराजय था. अब घर के अन्दर भी पुरूष ने अपना आधिपत्य जमा लिया. स्त्री अपने पद से वंचित कर दी गई, जकड़ दी गई, पुरूष की वासना की दासी, सन्तान उत्पन्न करने का यंत्र मात्र बन कर रह गई.'
(फ्रेडरिक एंगेल्स : परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति, पृ0 64)
वैयक्तिक सम्पत्ति के उत्तराधिकार ने ही विवाह नामक संस्था को जन्म दिया. साथ ही यह भी सच है कि स्त्री भी यौन सम्बन्धों की अराजकता से उब चुकी थी. मार्गन ने 'ऐन्शियेन्ट सोसायटी' एकल परिवार संस्था के विकास के चरणों का उल्लेख करते हुए समूह एवं गोत्र यौन सम्बन्धों का वर्णन किया है. समूह के सारे पुरूष सारी स्त्रियों से प्रजा उत्पन्न करते थे या एक गोत्र के सारे पुरूष दूसरे गोत्र की सारी स्त्रियों से प्रजा उत्पन्न करते थे. रक्त सम्बन्धों का बंधन विकसित नहीं हुआ था. प्रजापति ब्रह्मा का अपनी पुत्री सरस्वती से सम्बन्ध या दूसरी पुत्री शतरूपा से मनु, मारीच आदि सात पुत्रों को जन्म देने को या ऋषि अगस्त्य का अपनी पुत्री लोपमुद्रा से विवाह को इस परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है.
यह सही है कि परिवार नामक संस्था के विकास की दृष्टि से एकल विवाह पद्धति को अपनाना ऐ प्रगतिशील कदम था. किन्तु एंगेल्स का मानना है कि 'आगे की दिशा में प्रत्येक गति के साथ ही साथ एक सापेक्ष पश्चगति भी होती है, जिसमें एक समूह का कल्याण और विकास दूसरे समूह को दुख देकर और कुचल कर सम्पन्न होता है.' (वही, पृ0 73) एकल विवाहवादी परिवार सर्वसत्तावादी पितृसत्तात्मक समाज में परिवर्तित हो गया. घर के प्रबन्ध का सार्वजनिक चरित्र जाता रहा. अब वह समाज का सरोकार नहीं रहा. यह एक निजी काम बन गया. पत्नी को सार्वजनिक उत्पादन के क्षेत्र से निकाल दिया गया, वह घर की मुख्य दासी बन गई. सम्पत्ति केवल वैध उत्तराधिकारी को प्राप्त हो इसके लिए सतीत्व और पतिव्रता जैसे सिद्धांत गढ़े गए. दासियों के लिए गढ़े गए हथकड़ियां और बेड़ियां धीरे-धीरे कंगल और कड़ा में ढल गईं. अपने गोठ के पशुधन और स्त्रीधन को पहचान के लिए चिह्न सिन्दूर के रूप में सुहाग के प्रतीक बना दिए गए. गुलामी की कन्डिशनिंग के ये अद्‌भुत उदाहरण हैं. एकल विवाह में प्रारम्भ से ही यह माना जाता रहा कि यह बन्धन सिर्फ स्त्रियों के लिए है पुरूषों की मर्यादा का बन्धन भी उसने नहीं माना.
ममता की कथा से यह बात स्पष्ट होगी. देवगुरू वृहस्पति, (जिन्हें श्रीमद्‌भागवत्‌,नवम कन्ध, बीसवां अध्याय, 36-39 श्लोक ने साक्षात्‌ ब्रह्म ही माना है) के अग्रज ऋषि उतथ्य थे. उतथ्य की गर्भवती पत्नी थी ममता जिनसे वृहस्पति ने रमण की कामना की. ममता ने गर्भ की दुहाई देकर मना करना चाहा तब भी उसे शापित करते हुए वृहस्पति ने बलपूर्वक गर्भाधान किया. शाप के कारण उतथ्य पुत्र दीर्घतमा जन्मांध उत्पन्न हुए. वृहस्पति ने ममता से उत्पन्न अपने पुत्र का नाम भरद्वाज रख क्योंकि वह उनका औरस पुत्र था और उत्थ्य का भी क्षेत्रय था. अतः वह दोनों का पुत्र, द्वाज था. यहां क्षेत्रज शब्द को स्पष्ट किया जाए तो पत्नी अपने पति की क्षेत्र यानी खेती मात्र थी.
देवराज इन्द्र की कामान्धता पौराधिक कथाओं के प्रिय विषय रहे हैं किन्तु वपुष्टमा के मामले में सारी सीमाएं लांघ दी गईं. वपुष्टता काशीराज सुवर्णवर्मा की पुत्री थी, जिसका विवाह राजा परीक्षित पुत्र जनमेजय के साथ हुआ था. परीक्षित अर्जुन के पौत्र थे और अर्जुन इन्द्र के पुत्र. तब भी अवश्मेघ यज्ञ के अवसर पर इन्द्र ने वपुष्टमा के साथ सहवास किया. (महाभारत : आदिपर्व : 44.8.11)
तात्पर्य यह कि स्त्री मात्र भोग की एक वस्तु थी, एक रमणीय यंत्र मात्र. पुरूष के लिए कोई भी बंधन, धर्म, नैतिकता उसकी इच्छापूर्ति में बाधक नहीं बनी. पुरूष के इसी स्वैराचार का प्रगटीकरण कभी इमराना के अनपढ़ ससुर में, कभी महाविद्वान नटराजन में होता है, जो अनगिन दुर्घटनाओं के प्रतीक मात्र हैं. पौराणिक कथाओं में वह सवर्णमुद्राओं, गौओं के साथ दान दी जाती हुई दिखती है ओर अतिथियों को स्वागत रूप में भोग हेतु प्रस्तुत की जाती हुई भी. यथा : मित्रसह राजा ने अपनी प्रिय पत्नी मदयंती मुनि वशिष्ठ को अर्पित की और स्वर्गलोग को प्राप्त किया. (महाभारत : शान्ति पर्व : 234)
महाभारत के अनुशासन पर्व में सुदर्शन की कथा है जिसमें वह अपनी पत्नी ओघवती को गृहस्थाश्रम धम्र की मर्यादा समझाते हुए अतिथि को रमण के लिए प्रस्तुत होने की भी शिक्षा देता है.
प्लूटार्क ने लिखा है कि एथेंस नगर के दार्शिनिक सुकरात ने अपनी पत्नी झांटिप को अपने मित्र अल्कि वियाडिस को रमण हेतु सौंपा.
सामन्तकाल में स्त्री का घुटन अपने चरम पर पहुंचा. सामन्ती समाज की झूठी मर्यादा अपने विकृत रूप में कन्या शिशु हत्या के रूप में प्रकट हुई. अकड़ी हुई मूंझे और ऊंची पगड़ियां बेटी के लिए झुकने को तैयार नहीं थीं, अतएव कुल में बेटी ही नहीं चाहिए थी. कन्या शिशु की हत्या पहला उल्लेख 1789 में सर जोनाथन डंकन के लेख मे मिलता है. वे वाराणसी के आयुक्त थे. उनहोंने राजकुमार राजपूतों में कन्या शिशु की हत्या का विवरण दिया जो जन्मते ही घर के पिछवाड़े छोड़ दी जाती थी.
1846 में प्रथम पंजाब युद्ध भी समाप्ति के बाद विजयी सैनिकों ने जब गढ़े धन की खोज में घरों के आंगन एवं पिछवाड़े की जमीनों की खुदाई की, तो उन्हें हर घर में ढेरों शिशुओं के कंकाल मिले. वे उन घरों की कई पीढ़ियों की कल्या शिशुओं के कंकाल थे. जहां राजपूत कल्या शिशु हत्या की घिनौनी प्रथा का पालन चोरी-छिपे करते थे, वहीं सिख अपनी चार सौ वर्षो से चली आ रही इस परम्परा की चर्चा में गर्व महसूस करते थे. जनगणना के आंकड़े यह बताते हैं कि 18वीं सदी हो या 21वीं सदी इस दिशा में परिवर्तन नहीं हुआ है. 1901 की जनगणना में पंजाब में सारे भारत की तुलना में सबसे कम स्त्रियां पाई गई. वहां प्रति हजार पुरूषों पर मात्र 832 स्त्रियां थीं. 2001 की जनगणना में भी यह पल्लवित हो रहे हैं उसका यह चमकता हुआ उदाहरण है.
सिमोन द बोउवा ने अपनी पुस्तक 'द सेकेंड सेक्स' में स्त्री को 'अन्य' की संज्ञा दी थी. उनका मानना था कि वह मात्र ऑब्जेक्ट यानी कर्म है कर्त्ता नहीं. कर्त्ता, सब्जेक्ट पुरूष है. वे झल्ला कर पूछती हैं कि स्त्री क्या है, क्या गर्भ? किन्तु उपभोक्तावादी पूंजी ने तो उसे गर्भ भी नहीं रहने दिया केवल त्वचा या खाल में तब्दील कर दिया है. प्रसाधन उद्योग का यह तंत्र की त्वचा के मामले में एक नए नस्लवादी की भी रचना करता चलता है जहां सांवली या काली-भूरी त्वचा के लिए जगह नहीं है. सुधीश पचौरी के अनुसार, 'समूचा प्रसाधन तंत्र मूलतः एक खाल तंत्र में तब्दील हो गया है.'
पूंजीवादी समाज ने सामन्ती समाज की अंधेरे में घुटती असूर्यंपश्याओं को थोड़ी-सी आजादी तो दी है किन्तु अपनी शर्त पर वह रमणीय वस्तु अब भी है किन्तु रंगीन पैकिंग से सजी हुई, जिसकी रमणीयता का उपयोग धूर्तता से ब्लेड से लेकर कार तक के बेचने के लिए किया जा रहा है.
अलका सरावगी की चिन्ता व्यर्थ नहीं है कि 'स्त्री को आत्मविकास और बराबरी के लिए लड़ते हुए एक नजर इस बात पर रखनी चाहिए कि क्या यह बराबरी एक नया फ्रिज या वाशिंग मशीन खरीदने के लायक बनने के लिए तो नहीं है. यानी यह बराबरी वह उसी उपभोक्ता संस्कृति का पुर्जा बनने के लिए तो नहीं मांग रही है, जिसका पुर्जा पुरुष पहले से ही इस तरह बना हुआ है कि उसी जिंदगी कोल्हू के बैल से अधिक नहीं है?'
इकोफेमिनिज्म की चर्चा में वंदना शिवा इस बात का उल्लेख करती हैं कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने प्रकृति और स्त्री को एक साथ तबाह किया है. इसका विरोध भी स्त्री ही चिपको आनदोलन, नर्मदा आनदोलन में करती दिखती है. कोयलकारों, नेतरहाट फाररिंग रेंज, पचुआरा आन्दोलनों को भी इससे जोड़ा जा सकता है. उधर 21वीं सदी में भी लोकतांत्रिक सत्ता का सर्वोच्च प्रतीक संसद स्त्री को आधा नहीं एक-तिहाई हक देने में भी सकुचा रहा है.
पुरूष के वर्चस्ववादी सत्ता के मुक्त, स्वतंत्र, प्रतिभा से दमकती, आत्मविश्वास से लबालब व्यक्तित्व की स्त्री-जाति का स्वप्न अभी भी भविष्य के गर्भ में है. सच है कि इसके लिए गार्गी जैसे असीम साहस की आवश्यकता पडेग़ी जब जनक के दरबार में शास्त्रार्थ करते हुए पति याज्ञवलक्य ने धमकी दी थी कि वह अब प्रश्न नहीं पूछे अन्यथा उसके सिर के टुकड़े हो जाएंगे. गार्गी ने गीदड़ भभकी की परवाह न करते हुए प्रश्न पूछना जारी रखा और याज्ञवलक्य को अपना दर्शन प्रतिपादित करने पर मजबूर होना पड़ा. प्रतिभा से दपदपाती और स्वतंत्र व्यक्तित्व वाली स्त्री के उदय से विवाह नामक संस्था और उज्ज्वल होगी क्योंकि पत्नी के रूप में पुरूष को दासी नहीं, सखा प्राप्त होगी जिसकी लोहिया ने द्रौपदी-कृष्ण के सम्बन्धों में गौरव से चर्चा की है.
अन्त में मेरी कविता 'साइकिल सवार लड़की' की आखिरी पंक्तियों की चर्चा जिसमें यह स्वप्न है कि-
'नवादित सूर्य के प्याले में, कूंची डुबो कर
सुनहरा रंगेगी सारा आकाश
चांद को मुट्‌ठी से निचोड़
दूधिया कर देगी सातों समुन्द्र
सप्तर्षि के छत्ते से, शहद चुआ कर
मीठा बनाएगी नदियों का पानी
हरे होंगे सारे ठूंठ
पक्रो सपनों का लाल-लाल फल.'
इस लाल फल के पकनेकी प्रतीक्षा रहेगी.
पल प्रतिपल से साभार

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ धर्म, सत्ता और स्त्री ”

  2. By विष्णु राजगढ़िया on September 1, 2010 at 5:57 PM

    Thanks for a good article

  3. By Anonymous on September 3, 2010 at 12:19 PM

    कहानी अधूरी छोड दी? सपनों के पके लाल लाल फल खाने वाली लडकी लाल क्रांति का सपना देखने वालों के कुनबे में घुसी। उसके हाँथ में बंदूख होने की खबर आई....लेकिन उसके साथ बार बार क्रांति होने लगी...बार बार...लगातार....ये पुराण नहीं वर्तमान है जिसपर भी नजर डालोगे कभी? या लाल फल के पकनेकी प्रतीक्षा करते रहोगे।

  4. By स्वप्नदर्शी on September 14, 2010 at 5:26 PM

    This comment has been removed by the author.

  5. By स्वप्नदर्शी on September 14, 2010 at 5:31 PM

    लेख अच्छा है. कुछ बातों से सहमति नहीं है. जैसे इंद्र कोई एक व्यक्ति मात्र न होकर एक पद था, इसीलिए इंद्र के कई नाम है, जैसे वासुकी इंद्र आदि. इंद्र कथाये किसी एक की नहीं कई समय समय पर रहे सत्ताधीशो की कहानियाँ हो सकती है. वपुष्टता, जो जनमजेय की पत्नी है, उसमे और इस लिहाज से अर्जुन के पिता इन्द्र में कम से कम पांच पीढी का अंतर है. पता नहीं तब औसत आयु किसी स्त्री और पुरुष की क्या रही होगी? ये कम गले पचता है कि पांच पीढीयाँ एक साथ जीवित रही होंगी. निसंदेह तब तक श्रीकृष्ण, अर्जुन, और परीक्षित का देहवासन हो चुका था, जब ये अवश्मेघ यज्ञ हुया था.
    महाभारत के समय बहुत से उदाहरण है जो आज की एकल परिवार की नैतिकता के बाहर है. ये कहना सरलीकरण ही होगा कि स्त्री सिर्फ वस्तु में तब्दील हो चुकी थी. अगर ऐसा वाकई होता, तो कम से कम द्रौपदी बिन सवाल किये दुशासन के साथ चली जाती, इस तरह की असंभव मांग न करती कि अपने बाल १३ साल तक खुले रखती अपमान के प्रतीक की तरह और फिर दुशासन के लहू से धोने की मांग करती, उस स्थिति में जब पांचों पांडव दास थे. ममता की कहानी का आपने जिक्र किया, और दीर्घतमा का भी. ये ज़िक्र आपसे छूट गया कि दीर्घतमा, अंधे और महादुराचारी बने, उनके चार पुत्रों ने अपनी माँ प्र्द्वेशी से जब मात्र-ऋण चुकाने की मांग की तो उसके एवज में, प्र्द्वेशी ने अपने पति दीर्घतमा की जीवीत जलसमाधी की कामना की. और प्र्द्वेशी का ज़िक्र जिस तरह से आया, उसमे उसकी गरिमा सती सीता की गरिमा से कम नहीं है, किसी कलंक की तरह उसका ज़िक्र नहीं है.

    ऐसे ही याज्ञवलक्य की दो पत्नियां थी, मैत्रयी और लोपामुद्रा. गार्गी उनकी पत्नी नहीं थी. गार्गी को उस अवसर पर निमंत्रण भी नहीं था. गार्गी अपने पति को ढूंढती वहां पहुँची थी, और उसे सर मुंडाए, अपमानित किसी कोने में पाकर, उसने याज्ञवलक्य से सवाल किये थे. अंत में याज्ञवलक्य जबाब नहीं दे पाए थे, और उन्होंने गार्गी से कहा था कि एक सवाल और और तुम्हारा मस्तक छिन्न हो जाएगा. याज्ञवलक्य की लम्बी फौज थी अनुयायियों की, एक तरह से गुंडागर्दी थी, शायद वाकई अपनी ह्त्या के डर से गार्गी चुप हुयी होगी, और चेलों ने याज्ञवलक्य की जाय का उद्दघोष किया होगा. पूरा दान जनक दरबार से लेकर याज्ञवलक्य लौटे थे.

    हमेशा अच्छे और बुरे दोनों तरहे के उदहारण समाज में रहेंगे, और उसका एक डोमिनेंट पाठ भी रहेगा, पर सरल सूत्रीकरण सुलझाने और समझने की जगह नए अंधेरों में धकेलेगा.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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