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बीच सफ़हे की लड़ाई

इराकः एक देश के बारे में दो कविताएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/19/2010 03:18:00 PM

अमेरिकी सेना ने इराक को छोड़ दिया है. जैसा कि भारत के बारे में कहा जाता है, बहुत से लोग अब इराक के बारे में भी कहेंगे कि वह  विदेशी कब्जे से आजाद हो गया है. लेकिन हम जानते हैं और इराकी भी जानते हैं कि आजादी उनके लिए अब भी एक सपने और संघर्ष का नाम है. अमेरिकी या किसी भी विदेशी सेना के निकल जाने से कुछ नहीं होता, इस दौरान वहां जिस तरह की सत्ता संरचना को स्थापित किया गया है, जिस तरह का शासक वर्ग वहां सत्ता पर काबिज है, वह अब इस सेना द्वारा छोड़ी गई जिम्मेदारियों को पूरा करेगा. इराकी संसाधनों की लूट जारी रहेगी, वह साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुनाफे की चरागाह बना रहेगा. इराक की जनता की दुर्दशा और बदतर हालत में कोई कमी नहीं आएगी. लेकिन जाहिर है कि इसी के साथ इराकी जनता का शानदार और अपराजेय प्रतिरोध भी जारी रहेगा और पूरी दुनिया उसके साथ अपनी उम्मीदों को जोड़े रखने में अपनी सार्थकता तलाशेगी. पेश हैं फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश और छात्र राजनीति में साक्रिय अंजनी कुमार की कविताएं. रविवार और कारवां से साभार. दरवेश की कविता का अनुवाद अनिल जनविजय ने किया है.

एक आदमी के बारे में
महमूद दरवेश
 
उन्होंने उसके मुँह पर जंज़ीरें कस दीं
मौत की चट्टान से बांध दिया उसे
और कहा- तुम हत्यारे हो

उन्होंने उससे भोजन, कपड़े और अण्डे छीन लिए
फेंक दिया उसे मृत्यु-कक्ष में
और कहा- चोर हो तुम

उसे हर जगह से भगाया उन्होंने
प्यारी छोटी लड़की को छीन लिया
और कहा- शरणार्थी हो तुम, शरणार्थी

अपनी जलती आँखों
और रक्तिम हाथों को बताओ
रात जाएगी
कोई क़ैद, कोई जंज़ीर नहीं रहेगी
नीरो मर गया था रोम नहीं
वह लड़ा था अपनी आँखों से

एक सूखी हुई गेहूँ की बाली के बीज़
भर देंगे खेतों को
करोड़ों-करोड़ हरी बालियों से


इराक मेरा देश नहीं है 
अंजनी कुमार
 
इराक मेरा देश नहीं है
और फल्‍लुजाह मेरा शहर नहीं है।
अमेरिकी हमले में मारे गये लोगों की सूची मे
मेरा नाम नहीं है।
गुएन्‍तमाओं के यातनागृहों में
चल रही पूछताछ के दौरान
हजार वॉट की रौशनी में नहीं पिघली मेरी आंख
और न ही सर्द संगीनों तले
घुट गयी मेरी सांस ... ।

जिन्‍हें नंगा किया गया सरे बाजार
वे मेरे कुछ नहीं लगते थे
शक् के आधार पर
जिनमें सिर में मार दी गयी गोली
वे भी मेरे भाई बंधु नहीं थे।

बारूद के धुंए के बीच तड़पता
नजफ या बगदाद का बाशिंदा नहीं हूं मैं।
धमाकों से बिखर गयी जिनकी देह
भूख और बीमारी की गोद में सो गयो जो बच्‍चे
मलबे में तब्‍दील घरों में जो खोज रहे हैं जीवन का नया सूत्र
इनमें से कोई भी मैं नहीं हूं मैं।
दजला फरात ने जिन इन्‍सानों को जन्‍मा
उन तहजीवी विरासत को ले जाने वालों में
मेरा नाम नहीं है।

आज़ादी के जुगजुओं के देश का नाम है इराक
जिनकी कबू‍लियत में गुलामी काफिराना शब्‍द है
और लहू इतिहास की इबादत का सबसे खूबसूरत लफ्ज,
इराक के नाम पर कंधे उचका देने वालों में
मेरा नाम नहीं है।

वैदिक हिंसा और शांति के वारिस
नागरिकों की सूची में
आजादी एक निरीह शब्‍द है
और इराक दुष्‍टता का प्रतीक,
.............
इन नागरिकों की सूची में
मेरा नाम नहीं है।

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  1. 7 टिप्पणियां: Responses to “ इराकः एक देश के बारे में दो कविताएं ”

  2. By Rahul Kumar on August 19, 2010 3:44 PM

    सोलह आने सच है यह कविता... और सफ़ेद झूठ है अमरीका की बातें!! जो दिख रहा है वो सच नहीं..!! जो टुकड़ी वहां से वापस आयी है... वैसे कई दस्ते अमरीका में आज भी हथियारबंद हैं!! कैसे मान लिया जाए कि वो इराकी प्रशासन के इशारे पर चलेंगे.. जबकी उन्हें रोटी तो अमरीका ही खिलाएगा न!!

  3. By अजित वडनेरकर on August 19, 2010 4:54 PM

    बढ़िया

  4. By Suman on August 19, 2010 5:03 PM

    nice

  5. By बेचैन आत्मा on August 19, 2010 10:31 PM

    ..एक सूखी हुई गेहूँ की बाली के बीज़
    भर देंगे खेतों को
    करोड़ों-करोड़ हरी बालियों से.
    ..बेहतरीन कविताएँ, उम्दा पोस्ट.

  6. By sanjay joshi on August 20, 2010 7:34 AM

    bahut achchi lageen dono kavitaain, mubrakbaad is arthaporan prayas ke liye.

  7. By समय on August 21, 2010 7:28 PM

    कमाल की प्रतिरोधी अभिव्यक्ति।

    शुक्रिया।

  8. By Free Hindi Books on September 24, 2010 6:43 PM

    बहुत सुंदर।

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बीच सफ़हे की लड़ाई

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न?

अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत.

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कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.
-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

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