हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

निराला ब्राह्मणवाद से ग्रसित लेखक हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/11/2010 05:44:00 PM

तहलका में एक छोटा-सा स्तंभ आता है पठन पाठन. लेखकों से वे क्या लिख-पढ़ रहे हैं, उन्हें पसंद-नापसंद विधाएं और रचनाएं कौन-सी हैं जैसे कुछ बंधे-बंधाए सवाल पूछे जाते हैं. इस बार के अंक में कथाकार प्रेमकुमार मणि के जवाब थोड़े दिलचस्प हैं, इसलिए यहां पेश किया जा रहा है.


आपकी पसंदीदा लेखन शैली क्या है?

फिक्शन. मैं कहानी लिखता रहा हूं. अभी एक उपन्यास पर काम चल रहा है, शायद इस साल पूरा हो जाए. डायरी जरूर लिखता हूं. मैं उम्र के इस पड़ाव पर हूं जिसमें बस लिखने के लिए लिखना नुकसानदेह ही होता है, अगर लिखने लायक आपके पास कुछ खास न हो. मुझे जब संवाद बनाना होता है तो लिखता हूं और उसके लिए जरूरी विधा अपना लेता हूं. हां, कविता कभी मेरा माध्यम नहीं रही.

अभी क्या पढ़ रहे हैं?

अभी एक बहुत बढ़िया उपन्यास पढ़ा, रणेंद्र का ग्लोबल के देवता. इसी समीक्षा भी लिखी है हंस के लिए. वाकई बहुत मौजू और खूबसूरत उपन्यास है. मिथकीय पौराणिकता के बीच जिस देवासुर संग्राम की चर्चा सुनते आ रहे थे, उसको समझा इसके जरिए. यह जाना कि आज भी 10 हजार की संख्या में असुर झारखंड में रह रहे हैं. हमने तो समझा था कि असुर अनार्य है, वे काले होते हैं. लेकिन यह धारणा टूट गई. यह धातु बनानेवाली जाति है, जिसका देवासुर संग्राम के समय से हम दमन करते आए हैं. आज भी उनका दमन जारी है. वही लोग नक्सली हैं और बहुत संख्या में मारे गए हैं. उपन्यास के माध्यम से रणेंद्र ने बहुत अच्छे से दर्शाया है कि किसी जाति को बहिष्कृत करने और फिर शामिल करने की क्या प्रक्रिया रही है. बहिष्करण और शामिल करने की यह प्रक्रिया को समझना हमारा बड़ा सांस्कृतिक संकट रहा है. लंबे दौर में हमने इसे समझने की कोशिश की. इस उपन्यास के जरिए इसे समझा.

वे रचनाएं या लेखक जिन्हें आप बेहद पसंद करते हों?

प्रेमचंद, मुक्तिबोध, रेणु बार बार अपनी ओर खींचते हैं. खास कर एक जटिल और नजदीक के लगते हैं मुक्तिबोध. उन्होंने कहानियां, कविताएं, डायरी, समीक्षा, आलोचना लिखी. उन्हें पढ़ कर सीखा कि लेखक की चिंता और प्रतिबद्धता, मूल्य, समर्पण कैसा होना चाहिए. जहां तक सीखने की बात है, मार्क्वेज से लेकर काफ्का और चेखव सबसे सीखा है. जब मैं रूसी साहित्य पढ़ता था, जो मेरा प्रिय है तो मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित होने के बावजूद मुझे गोर्की के बजाय चेखव अब भी बहुत पसंद आते हैं.

कोई जरूरी रचना जिसपर नजर नहीं गई हो?
संस्कृत की एक प्रगतिशील धारा भी रही है. अश्वघोष और शूद्रक जैसे महत्वपूर्ण कवियों को नजरअंदाज किया गया. अश्वघोष का बुद्धचरितम का लीला भाग तो हमारे पास रहा, लेकिन ज्ञान प्राप्ति के बाद विचार वाला भाग नष्ट कर दिया गया, जिसे चीन से अनुवाद करके मंगाया गया है. उसका संस्कृत वाला भाग नहीं बचा है. आखिर अश्वघोष की चर्चा क्यों नहीं होती. कालिदास पर अश्वघोष के प्रभाव को लोगों ने रेखांकित किया है. इतने महत्वपूर्ण कवि को क्यों नजरअंदाज करते रहे हैं. क्योंकि वे बौद्ध थे. सूर्यनारायण चौधरी ने बुद्धचरितम का अनुवाद किया है. संस्कृत की प्रगतिशील परंपरा पर काम नहीं हुआ...एसा समझा गया कि यह तो ब्राह्मणवाद की भाषा है, रूढ़ मूल्यों की भाषा है. जबकि इसमें जो प्रतिरोध की संस्कृति रही है, उसकी बार-बार उपेक्षा की गई है. वर्चस्व की संस्कृति की हमने ज्यादा परवाह की है.

कोई रचना जो बेवजह मशहूर हो गई हो?


राम की शक्ति पूजा और तुलसीदास समेत निराला की रचनाएं. भाषा के मामले में निराला की जो काव्य क्षमता है, वह आकर्षित करती है. मैं राम की शक्ति पूजा पर बार-बार रीझता हूं. अपने शाब्दिक शौष्ठव में यह अद्भुत कविता है. मंत्रों या आयतों की तरह यह आकर्षित तो करती है, लेकिन जब मैं इसका अर्थ ढूंढ़ने की कोशिश करता हूं तो निराश होता हूं. मुझे समझ में नहीं आता कि कवि कहना क्या चाहता है, वह हमें किस ओर ले जाना चाहता है. मुक्तिबोध की अंधेरे में कविता में आज के आदमी की पीड़ा झलकती है. लेकिन निराला की इस रचना में एक पूजा का दूसरी पूजा से उत्तर देना, एक दासता का गहरी दासता से उत्तर देना- यह समझ में नहीं आता. मेरे मन में सवाल उठता है कि यह है क्या. उन दिनों देश में राष्ट्रीय आंदोलन चल रहा था और निराला तुलसीदास लिख रहे थे, जिसमें सांस्कृतिक एकांगीपन और सांप्रदायिक पुट है. यह पढ़ने पर हिंदू महासभा से जुड़े लेखक की रचना लगती है. अगर मुझे निराला और (मैथिलीशरण) गुप्त में से चुनना होगा तो गुप्त ज्यादा प्रगतिशील दिखते हैं, मैं उन्हें चुनूंगा. मुझे गुप्त जी ज्यादा आधुनिक लगते हैं. वे ज्यादा उदार हैं, उनमें निराला जैसी कट्टरता नहीं है. गुप्त में भागवत भाव है. हिंदुत्व का भाव नहीं है जो निराला में है. ब्राह्मणवाद से ज्यादा ग्रसित लेखक हैं निराला. वे रामनामी हैं. गुप्त हिंदू हैं इस पर उन्हें शर्म नहीं है पर उनके लिए दूसरे धर्मवाले भी बुरे नहीं हैं. जबकि निराला कहते हैं कि दूसरे धर्मवाले गर्त में हैं. निराला कहते हैं कि दूसरे सारे गलत हैं और मैं ठीक हूं. इस आधार पर हिंदी का मिजाज क्या है, उसने किस तरह अपने रचनाकारों देखा है. इस पर चर्चा नहीं हुई है.

पढ़ने की परंपरा कायम रहे, इसके लिए क्या किया जाना चाहिए?


बिना पढ़े मुझे तो मुक्ति नही मिलती. यह आनेवाली पीढ़ी के ऊपर है कि वह कौन से रास्ता अपनाती है. पढ़ने के संदर्भ में किताबों को लिया जाता है लेकिन किताब भी हमेशा इस रूप में नहीं रही. बहुत दिनों तक श्रुति में बातें चलन में रही, बातों को एक दूसरे से याद किया गया. बहुत बाद में जा कर उनका ग्रंथन हुआ. ताल पत्रों पर आंका गया. कुछ ही सौ सालों से किताबें इस रूप में हैं. कंप्यूटर के बाद किताबों का एक रूप बदल सकता है. मैं उससे भयभीत नहीं हूं. मैं भले न समझ पाऊं पर पीढ़ियों में इसके जरिए विमर्श जीवित रहेगा. जरूरी है कि पढ़ने से अधिक विमर्श जीवित रहे, सोचने समझने की प्रवृत्ति जीवित रहे. आज की हमारी पीढ़ी से अधिक सेकुलर है और समझदार है. लोग समझते हैं कि आज की पीढी बहुत सांप्रदायिक हो गई है और गांधी की पीढ़ी बहुत उदार थी. लेकिन वह गांधी की ही पीढ़ी थी कि एक मुसलमान कलाकार को अपना नाम दिलीप कुमार या मीना कुमारी रखना पड़ता था. उनके मूल नाम तक बहुत कम लोगों को पता होते थे. हमारी पीढ़ी में नक्सलवाद पर जिस तरह बात होती थी आज की पीढ़ी में उसी तरह नहीं हो रही है. नई पीढ़ी के बच्चे ऑपरेशन ग्रीन हंट के लिए तैयार नहीं है. यह वही पीढ़ी है जिसे आप कंप्यूटर की औलाद और कम पढ़ा लिखा समझ रहे हैं. जबकि आज तो नामवर सिंह की पीढ़ी इस ग्रीन हंट पर चुप है. यह आज की ही पीढ़ी है जो इसके खिलाफ विरोध दर्ज करा रही है अरुंधति को समझ रही है और उसके साथ है. नामवर की पीढ़ी तो 1084वें की मां पढ़ कर रोनेवाली पीढ़ी थी. वह विरोध जतानेवाली पीढ़ी नहीं थी. आज की पीढ़ी ज्यादा जानकारी रखती है. जानकारी रखना और सोचना ही अधिक महत्वपूर्ण है. यह जरूरी नहीं कि हमारी कहानियों को पढ़ कर नई पीढ़ी बालू से तेल निकालती रहे. पढ़ना, सोचना और एक विवेक का निर्माण करना यह प्रक्रिया तेज हुई है कमजोर नहीं हुई है.
-रेयाज उल हक

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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