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बीच सफ़हे की लड़ाई

अरुंधति का ईमेलः हंस के कार्यक्रम में शामिल होने का कोई इरादा नहीं

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/13/2010 07:36:00 PM

नीलाभ 

हंस ने जो अगले सालाना आयोजन कि रूप-रेखा प्रचारित की थी उसमें सब को यह आभास दिया था कि इस बार वे पुलिस अधिकारी विश्वरंजन और अरुंधति राय को एक ही मंच पर लायेंगे. लोगों में इस पर बड़ा आक्रोश था. मैंने दो-तीन दिन पहले हंस कार्यालय में राजेंद्र जी से पूछा तो उन्होंने भी तस्दीक की. लेकिन जब मैं ने अरुंधति से पूछा तो उन्होंने साफ़ कहा कि वे ऐसे कार्यक्रम में नहीं जा रहीं हैं. उनका जवाब संलग्न है.

Dear Neelabh
Thanks for alerting me about a meeting I had no idea about! Rajendra Yadav did call a few weeks ago and ask whether I could come to a Hans event in July. I was travelling at the time and said I'd speak to him later. And now you tell me that without my ever having agreed, it's being billed as a debate between me and the notorious policeman Mr Vishwaranjan! I had no idea about all this. I have no intention of being there. Not after my recent experience with PTI and the rubbish that is being put out by the Chhattisgarh police and headlined in the Indian Express. You say a bunch of youngsters are putting together a petition asking me not to go...please tell them that I don't need a petition to persuade me! I never agreed to go in the first place. And now it's beginning to look like a set up . You can circulate this  to anyone who is worried that I might walk into this trap. (translate it if it will help?) I think there are better ways of having debates in which co-opted media people controlled by the police cannot misquote you.
All the best
Arundhati

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  1. 6 टिप्पणियां: Responses to “ अरुंधति का ईमेलः हंस के कार्यक्रम में शामिल होने का कोई इरादा नहीं ”

  2. By Anonymous on July 13, 2010 at 8:15 PM

    Arundhati ka faisla ekdam sahi hai.

    us hatyare se kya baat ya samvaad karna.

    rajendr ji ko lage to khana khaye. hans ke daftar me chay waay piye.

    magar ek baat samajh nahi aati itna bada faislaa rajendr ji ne kaise le liya.

    jaroor poori daal kaali hai.

    ek bhai ne sawaal uthaya hai bikne ka.

    yah ghambhir maamla hai.

    Nayan Jyoti. Mumbai se

  3. By Krishna on July 14, 2010 at 12:09 AM

    your decision is absolutely correct.

  4. By दिलीप मंडल on July 14, 2010 at 12:13 AM

    शुक्रिया अरुंधति। आपने हमारे विश्वास को कायम रखा है। मैं पहले ही कह चुका हूं कि विश्वरंजन को सुनने कि लिए मैं हंस के समारोह में नहीं जाऊंगा। जनज्वार को भी बधाई, कि उन्होंने इस मुद्दे को उठाया।

    उम्मीद है कि राजेंद्र यादव नरेंद्र मोदी या तोगड़िया को बुलाकर अरुंधति के न आने की भरपाई कर लेंगे। वे केपीएस गिल को भी बुला सकते हैं या अरवल कांड के जिम्मेदार अफसर सी आर कासवान को भी। रामपुर तिराहा कांड का आदेश देने वाले अफसर भी विकल्प हो सकते हैं।

  5. By Reyaz-ul-haque on July 14, 2010 at 11:54 AM

    दिलीप भाई
    ब्रह्मेश्वर मुखिया आदि गिरोह को भी बुला लिया जा सकता है कभी, अगर विषय दलित आंदोलन हो तो. कैसा रहेगा?

    रेयाज

  6. By AAM AAWAAZ on July 14, 2010 at 12:43 PM

    अरुंधती का फैसला सही है. अगर विश्वरंजन हंस के कार्यक्रम में आता है तो उस कार्यक्रम स्थल पर जाकर धरना प्रदर्शन भी करना होगा. हंस महज राजेन्द्र जी तक सीमित नहीं है. यह हमारे विचारों और भावनाओं से भी जुडी रही है. यह विश्वरंजन को भी पता चलना चाहिए कि अकेले आदमी तो उस तरफ से उस तरफ हो सकता है. मगर जनता का क्या कीजिएगा ? विश्वरंजन खेल को आसान समझ रहा है तो उसे बता देना होगा खेल इतना आसान भी नहीं है.

  7. By Anonymous on September 3, 2010 at 12:13 PM

    नौटंकीबाज अरुन्धति।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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