हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कैसे मिले मानसिक हिंसा से छुटकारा?

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/14/2010 07:12:00 PM

अनिल मिश्र

बीते सप्ताह फ्रांस की संसद ने परिवार के भीतर, मानसिक हिंसा रोकने के लिए विधेयक पारित किया। आज दुनिया के लगभग सभी हिस्सों में तनाव, हिंसा और युद्ध की चीख़ें गूंज रही हैं। अफ़गानिस्तान से अमरीकी सेना की वापसी का वादा अफ़गानिस्तान के नागरिकों के लिए पल भर के लिए भी सुकूनदेह साबित नहीं हो रहा है। ईरान पर आक्रमण करने की अमरीकी मुहिम में इसरायल अपनी निर्णायक सहमति दे चुका है और क्षेत्रीय हथकंडे की भूमिका में उतरने को तैयार है। और इराक़ में भूख से मरने वाले बच्चों की तादाद में कमी होने के आसार कम ही दिख रहे हैं। कई विश्लेषकों की राय है कि पश्चिमी यूरोप में रूस और अमरीकी टकराव ज़ोर पकड़ रहा है। उज़्बेकिस्तान में महीने भर पहले दो समुदायों के बीच हुए खूंनी टकराव आगामी युद्धमोर्चे के पार्श्व सूचक हैं।
इसे हम ’सभ्यताओं के’ अनिवार्य ’टकराव’ की आक्रमणकारी संज्ञा नहीं दे सकते। आर्थिक मोर्चे पर ज़ारी संकट दुनिया के लिए रोज़ नई विपदाएं लेकर हाज़िर हो रहे हैं। पखवाड़े भर पहले ज़ारी हुई संयुक्‍त राष्‍ट्र की ’सहस्त्राब्दी विकास परियोजना’ की सालाना समीक्षा साफ़ कहती है कि पूरी दुनिया में भूख और बेरोज़गारी का मारक स्तर बढ़ रहा है। ख़ासतौर से, दक्षिण एशिया में भूख का वर्तमान स्तर १९९० के दशक के सूचकांक के क़रीब पहुंच गया है। इस रपट के सार के अनुसार, ’विकसित’ देश, आर्थिक भहराव से तभी उबर सकते हैं जब ’कम विकसित’ और ’विकासशील’ देशों की व्यापक आबादी के रहन सहन में उन्नति के अवसरों की गांठें खुलेंगी। यह रिपोर्ट २०१५ तक दुनिया की एक तिहाई आबादी को भूख और वंचना से मुक्‍त करने की दिशा में सरकारों की अक्षम कार्ययोजना की ओर भी ध्यान दिलाती है।
हमारे अपने देश में मंहगाई का तक़लीफ़देह बुख़ार रोज़ी रोटी पर तेज़ी से अपना असर दिखा रहा है। आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए अब नमक-रोटी जुटा पाने के मौसमी ठिकानों की खोज मुश्किल और टेढ़ा मेढ़ा अभियान साबित होने जा रहा है। निर्धन और निर्धनतम जिस नाउम्मीदी के अनचाहे और आसान शिकार बन रहे हैं वह उन्हें सामूहिक तौर पर ऐतिहासिक त्रासदियों की ओर  ले जा रहा है। पेट्रोलियम पदार्थों की क़ीमतों में निरंतर बढ़ोत्तरी से पहले ही दैनंदिन ज़रुरतों की चीज़ों की सर्वसुलभता की डोर खींची जा चुकी है। वंचित और निर्धनतम आबादी के राजनीतिक अधिकारों को टिकाऊ बनाने के लिए ’मुख्यधारा’ की पार्टियों में न्यूनतम रचनात्मक दिलचस्पी का सुखाड़, फैलती आग में गाढ़े घी का काम कर रहा है।
ऐसे में, गांधी, रस्किन, क्रोपटिकन जैसे चिंतकों और जे सी कुमारप्पा जैसे अर्थशास्त्री, भविष्‍य के वादों को गढ़ने के उपक्रमों के लिए एक बार फिर बेहद प्रासंगिक हो चले हैं। जॉन रस्किन की भविष्यदृष्‍टा किताब ’अन टू द लास्ट’ के परिचय में वालजी गोविंदजी देसाई लिखते हैं, ’नैतिकता, दुनिया की सभी आस्थाओं में अति-आवश्यक ऊपादान होती है, लेकिन हमारी सहज बुद्धि, धर्म के दायरे के बाहर, हमें सुझाती है कि नैतिकता के क़ानून के निरीक्षण की ज़रूरत है। हालांकि, ख़ुद को धर्म की परंपरागत व्याख्या से परे मानने वाले चिंतक क्रोपटिकन को ’नैतिक संत’ की संज्ञा दी गई है।
आज, जबकि सारी दुनिया की विशाल आबादी कुपोषण, भूख, बेरोज़गारी और तीखे होते सामुदायिक टकरावों की समुद्र-चक्की में फंसी हुई है तो मानसिक हिंसा के बारीक़ चक्रों को समझने की कोशिश, दिन में आकाशगंगा की लकीरें खोजने जैसी है। फ्रांस के निरंतर गतिशील समाज में मानसिक हिंसा की व्याख्या और क़ानून को संसदीय मान्यता शायद इसलिए मिल रही है क्योंकि वहां चिंतन के क्षितिज में नित नए आयाम उद्घाटित होते रहे हैं। १९वीं और २०वीं सदी में इन धारणाओं की प्रामाणिक पुष्‍टि के उत्पादक बीज मिलते हैं।
हमारे अपने देश में, कश्मीर, उत्तरपूर्व सहित मध्य भारत के कई इलाकों में सैकड़ों लोग मारे जा रहे हैं। कहीं हिंसा की मरूभूमि दिखती है तो कहीं लोग टोही शिकार की तरह मारे जा रहे हैं। समाज के ज़रुरी शांतिपूर्ण ऐतिहासिक संक्रमण के विचार-स्वप्न का अभाव भविष्य की भरोसेमंद पगडंडी को जगह जगह छील रहा है। 
विभिन्न राजनीतिक धाराओं की वैचारिक आस्थाओं में नैतिकता के क़ानून, चिल्लर पैसों की तरह चलन से बाहर होते जा रहे हैं। पेशेवर ईमानदारी के पैमाने जिस मायूसी और अनिच्छा से लागू होते हैं, उनसे बेहतर भविष्य बुनने में धीमी आंच महसूसना ख़याली पुलाव ज़्यादा है। बढ़ती शहरी आबादी को रेलम-भाग ज़िंदगी के जिस अजूबे और अजनबीपन से साना जा रहा है, उसके किरचन की आवाज़ के लिए कोई सूकूनदेह और खुली जगह कम ही बन पा रही है और आमफ़हम-सी दिखने वाली ज़िंदगियों की तहों में व्याप्त गोरखधंधे, आकंठ भ्रष्‍टाचार से लथपथ व्यवस्था के लिए सहज ग्राह्य हैं।
सामुदायिक संस्कृति को उन्नत और अधिक मानवीय बनाने के हमारे अधिकतर राजनीतिक दलों के उपकरण घिस-पिट चुके हैं। ’वोट प्रबंधन’ की अंतहीन गणित अब आम जन जल्दी समझने लगे हैं। निर्धनतम और वंचित समुदायों को १०० दिवसीय रोज़ी रोटी की गारंटी के साथ साथ गरिमापूर्ण जीवन सौंपना ही होगा। फिर, इस प्रक्रिया को अधिकतम किस अवधि तक हवा में लटकाया जा सकता है? वरना, देश में गृहयुद्ध की आग तो पहले ही कम नहीं धधक रही है।

ऐसे में, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के पहले उद्घोषक देश फ्रांस की संसद में पारिवारिक रिश्तों और आपसी संबंधों में समानता के धरातल-निर्माण की यह कोशिश मामूली ही सही लेकिन एक उत्साहजनक मिसाल है।

लेखक हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में मीडिया के शोधार्थी हैं।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ कैसे मिले मानसिक हिंसा से छुटकारा? ”

  2. By kavita on July 21, 2010 at 12:02 AM

    anil ji aap anil mishra kab se ho gaye hain.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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