हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

हंस के संपादक राजेंद्र यादव को एक और चिट्ठी

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/12/2010 06:37:00 PM

दिल्ली में होने जा रहे हंस के सालाना जलसे पर जनज्वार ने कुछ सवाल उठाये थे. उन सवालों पर ज्यादातर पाठकों ने सहमति जाहिर की. मसला जलसे पर न अटके और बात साहित्य के सरोकारों तक पहुंचे, इसके मद्देनज़र जनज्वार अगला लेख युवा पत्रकारविश्वदीपक का प्रकाशित कर रहा है. लेख के साथ एक तस्वीर भी प्रकाशित की जा रही है जो वामपंथी लेखकों के मौजूदा सरोकारों की घनीभूत अभिव्यक्ति है. उम्मीद है कि लेख और तस्वीर दोनों ही बहस को एक नए धरातल पर पहुंचाने का जरिया बनेंगी-अजय प्रकाश.

आदरणीय राजेंद्र जी,

पहले ‘जनज्वार’ से जानकारी मिली और फिर ‘समयांतर’ से इसकी पुष्टि हुई कि आप इस बार ‘हंस’ की सालाना गोष्ठी में छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन को बोलने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। ‘हंस’ अपनी स्थापना की सिल्वर जुबली मना रहा है-ये हम सब के लिए खुशी की बात है, लेकिन अपनी पच्चीसवीं सालगिरह पर आप ‘हंस’ को ये तोहफा देंगे इसकी उम्मीद नहीं थी। अब जबकि ‘हंस’ अपनी भरी जवानी को महसूस कर सकता है इस तरह इसे ‘को-आप्ट’ होने की प्रक्रिया में ले जाने का क्या मतलब?

‘प्रगतिशील चेतना के वाहक’ के तौर पर ‘हंस’ निश्चित रूप से आपका व्यक्तिगत प्रयास है, पर ये इस देश की संघर्षशील जनता की आकाक्षांओं का प्रतिबिंब भी है। इस पत्रिका के जरिए आप उन लाखों के संघर्ष से तादात्मय बिठाने में सफल रहे हैं जिन्हे हर समय की सत्ता ने हाशिए पर धकेल रखा है। यही वो बिंदु है जहां आपकी चेतना एक पहचान पाती हैं, लेकिन इस बार आपने ‘हंस’ की गोष्ठी में विश्वरंजन को आमंत्रित कर खुद को उन्ही लोगों की जमात में शामिल कर दिया है जो ये मानते हैं कि बीच का भी कोई रास्ता होता है, कि माओवादियों और सरकार के बीच संघर्ष का मुख्य मुद्दा ‘विकास’ है! सरकार पिछले साठ सालों से उपेक्षित हिस्से का विकास करना चाहती है और माओवादी विकास के खिलाफ हैं!

कमजोरों के खून से सने इन तर्कों के पीछे की मंशा आप नहीं समझते ऐसा नहीं है! फिर राज्य प्रायोजित हिंसा के सबसे बड़े कमांडर को मंच देकर आप क्या साबित करना चाहते हैं? क्या आपको लगता है कि सरकार के पास अभी भी अपनी सफाई में कुछ कहने को बाकी है? भारतीय राज्य की नेक नीयत पर अगर आपको इतना ही भरोसा है तो फिर आप जो चाहें कर सकते हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या विश्वरंजन जैसे लोगों को मंच देने के बाद आपकी साख यथावत रहेगी? जिस छवि को आपने व्यक्तिगत रिश्तों की कुर्बानी और साहित्य की स्थापित वैचारिक सत्ताओं के खिलाफ संघर्ष करके अर्जित किया है उसको मिट्टी में  मिलाने में क्यों तुले हैं आप?

संभवत: आप मानते हैं कि विश्वरंजन जैसे हत्यारों को मंच देकर आप राज्य प्रायोजित हिंसा के विरोधाभास को उजागर कर पाएंगे- तो ऐसा नहीं है। आप जानते हैं विश्वरंजन बीजेपी की फासीवादी सरकार के चहेते हैं, इसलिए नहीं कि वो बहुत काबिल अधिकारी हैं बल्कि इसलिए कि बीजेपी की नस्लवादी और बुनियादी तौर पर हिंसक सोच को अमल में लाने और वैधता प्रदान करवाने के लिए विश्वरंजन अधिकारी की सीमा से बाहर जाकर व्यक्तिगत प्रयास भी करते हैं। इसी तरह वो कांग्रेस के भी विश्वसनीय हैं। वजह यहां भी साफ हैं। मध्यवर्ग की राजनीति करते-करते कांग्रेस जिस हिंस्र-कॉर्पोरेट-डेमोक्रेसी को एक मॉडल के तौर पर स्थापित करने की कोशिश में है विश्वरंजन उसके लिए मैंदान साफ कर रहे हैं।

 ये अनायास नही है कि अरुंधति भारतीय राज्य को ‘बनाना रिपब्लिक’ की संज्ञा देती है। क्या आप भारतीय लोकतंत्र के क्लप्टोक्रेसी में तब्दील होने को नहीं समझ पा रहे हैं? या जानबूझकर इससे अनजान बने हुए हैं? भारतीय लोकतंत्र की इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है कि जिस संख्या बल के आधार पर ये दुनिया के सबसे बड़े और विविध लोकतंत्र होने का दंभ भरता है वही अब इसके निशाने पर है। भारतीय राज्य अब अपने ही आदमियों की हत्या पर आमादा है। और आप हत्यारों के सरदार को मंच देने के लिए बेताब हैं!


आप जानते हैं कि अमेरिकी कारपोरेट-साम्राज्यवाद के छोटे उस्ताद के तौर पर भारत ने कल्याणकारी राज्य होने की चाहत खो दी है। अब भारतीय राज्य की चिंता ये नहीं है कि हमारे जनगण का जीवन कैसा है, बल्कि उसकी चिंता अब ये है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश के लिए कैसे माहौल उपल्ब्ध कराया जाय, कैसे मिशन-चंद्रयान को पूरा किया जाय और कैसे अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत के बाजार को हरम में तब्दील कर दिया जाय!

लेकिन इससे भी शातिराना मंशा ये है कि इस पूरी साजिश को विकास के लुभावने नारे की शक्ल में पेश किया जा रहा है। विश्वरंजन जैसे लोग आज २०१० में वही भूमिका अदा कर रहे हैं जिसकी कल्पना औपनिवेशिक काल में मैकाले ने की थी। अमेरिकी सैन्य साम्राज्यवाद के लिए अनुकूल माहौल तैयार करवाने वाले वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर हम विश्वरंजन को चिन्हित करते हैं। और आप इसे उस बौद्धिक सरकारी प्रतिनिधि के तौर पर स्थापित करने की कोशिश में हैं जो कवि है और इसीलिए प्रगतिशील भी है? सही भी है? आपकी भावभंगिमा से लगता है कि आप उस हिंसक और कठोर सामंत के साथ है जिसे कल्याण की मंशा के तहत जनता पर चाबुक चलाने का दैवी अधिकार प्राप्त होता है!

आप ये कह सकते हैं कि ‘लोकतंत्र’ की परंपरा में विरोधी को भी बोलने की आजादी है और विचारों का संघर्ष दरअसल एक स्वस्थ्य परंपरा है। ये तर्क ‘सुअरबाड़े’ (चिदंबरम ने दंतेवाड़ा की घटना के बाद माओवाद के मसले पर संसद में बयान देते वक्त इस शब्द को कोट किया था) में तब्दील हो चुकी संसद के बारे में भी कहा जाता है, लेकिन आजादी के वर्तमान ढांचे के अंदर सत्ता और विपक्ष जो खेल खेलता है उससे आप अच्छी तरह वाकिफ है।

सर, वक्त कम है और शिकायतें ज्यादा। नुकीली चुभती हड्डियों और आंसुओं के अलावा हमारे पास कुछ नहीं...इसी से हमारा प्रतिरोध खड़ा हो रहा है। मनमोहन और सोनिया के राज में जिस दलाल-हत्यारे वर्ग का उदय हुआ है उसे आप जस्टीफाई कैसे कर सकते हैं? सलवा जुडूम के दौर में हुई हत्याओं, बलात्कारों और मासूमों के कत्ल के बारे में विश्वरंजन की भूमिका को लेकर अगर अभी भी आपके मन में संदेह की गुंजाइश है तो फिर आपसे संवाद की कोई जमीन नहीं बचती है। (In Maoist Country, by Gautan Navlaka and John Myrdal, Economic and political weekly april 17-31, 2010 में गौतम नौलखा ने लिखा है कि सलवा जुडूम के दौर में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 640 गांव बंदूक की नोंक पर खाली कराए गए, 3 लाख 50 हजार यानि दंतेवाड़ा जिले की आधी जनसंख्या अपना घर बार छोड़ने के लिए मजबूर हुई है, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, बहू बेटियों को मार दिया गया.

आप उन कुछ दुर्गों में  हैं जो अभी तक ढहे नहीं है. फिर भी आप ढहने को  तैयार हैं तो हमारे पास इस विध्वंस को  मंजूर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं।


आपका
विश्वदीपक 

और एक तसवीर, ताकि सनद रहे 
यारी देख ली, अब ईमान खोजें : दाहिने से खगेंद्र ठाकुर,  नामवर सिंह,  किताब विक्रेता अशोक  महेश्वरी, डीजीपी विश्वरंजन, कवि अरुण कमल और आलोकधन्वा : चचा आलोक आप  गाय घाट पर माला जपते,  तो भी अपने बुजुर्गों  हम शर्मिंदा न होते.


अग्रसारित- उन सुधीजनों को जिन्हें मुल्क के बेहतरी की चिंता है.

अजय प्रकाश के ब्लॉग जनज्वार से साभार

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ हंस के संपादक राजेंद्र यादव को एक और चिट्ठी ”

  2. By pratibha on July 12, 2010 at 7:27 PM

    विश्वदीपक के बारे में काफी सुना था. सही सुना था. खांटी पत्रकार. बधाई भाई!

  3. By Anonymous on July 12, 2010 at 9:03 PM

    राजेन्द्र यादव, नामवर जी, अरुणकमल,खगेन्द्र ठाकुर से लेकर आलोक धन्वा तक ये सभी लोग प्रगतिशील तो हैं, लेकिन बुर्जुआ समाज के बुर्जुआ प्रगतिशील हैं। ये लोग क्रान्तिकारी नहीं हैं। और ख़ुद को क्रान्तिकारी कहते भी नहीं हैं। दर‍असल प्रगतिशीलता का मतलब ही है समझौता करना। समझौते के बिना प्रगति नहीं हुआ करती । फिर प्रगति का मतलब तो अपनी प्रगति करना, सरकार की प्रगति करना, विश्वरंजन जैसे सरकारी टट्टुओं के साथ सहयोग करके कुछ पा जाना या पाने की आस लगाना भी होता है । विश्वदीपक जी आप इन्हें क्रान्तिकारी नहीं समझिए, प्रगतिशील ही समझिए।
    नक्सलवादी क्रान्तिकारी हैं क्योंकि मैदान में हैं । वो अपने विचार के लिए लड़ रहे हैं । प्रगतिशील लड़ता नहीं है, सिर्फ़ विचार करता है। फिर राजेन्द्र यादव तो प्रगतिशील भी नहीं हैं। उनसे क्या शिकायत करना।

  4. By Anonymous on July 13, 2010 at 12:54 PM

    तुम एक पिछड़े हुए वक्ता हो

    तुम एक ऐसे विरोध की भाषा में बोलते हो
    जैसे राजाओं का विरोध कर रहे हो
    एक ऐसे समय की भाषा जब संसद का जन्म नहीं हुआ था

    तुम क्या सोचते हो
    संसद ने विरोध की भाषा और सामग्री को वैसा ही रहने दिया है
    जैसी वह राजाओं के ज़माने में थी

    यह जो आदमी
    मेज़ की दूसरी ओर सुन रह है तुम्हें
    कितने करीब और ध्यान से
    यह राजा नहीं जिलाधीश है !

    यह जिलाधीश है
    जो राजाओं से आम तौर पर
    बहुत ज़्यादा शिक्षित है
    राजाओं से ज़्यादा तत्पर और संलग्न !

    यह दूर किसी किले में - ऐश्वर्य की निर्जनता में नहीं
    हमारी गलियों में पैदा हुआ एक लड़का है
    यह हमारी असफलताओं और गलतियों के बीच पला है
    यह जानता है हमारे साहस और लालच को
    राजाओं से बहुत ज़्यादा धैर्य और चिन्ता है इसके पास

    यह ज़्यादा भ्रम पैदा कर सकता है
    यह ज़्यादा अच्छी तरह हमे आजादी से दूर रख सकता है
    कड़ी
    कड़ी निगरानी चाहिए
    सरकार के इस बेहतरीन दिमाग पर !

    कभी-कभी तो इससे सीखना भी पड़ सकता है !

    -जिलाधीश/आलोकधन्वा

  5. By Anonymous on July 13, 2010 at 3:40 PM

    अगर राजेंद्र जी सलवा जुडुम और आपरेशन ग्रीनहंट की अगुआई कर रहे छ्त्तीसगढ के पुलिस अधिकारी विश्वरंजन को अरुंधती राय के आमने सामने करना चाहते हैं, तो उन्हें लिंगा राम और ग्लैड्सन डुंगडुंग को भी बराबर मंच पर आसीन करना चाहिये, जो उस जुल्म के शिकार हैं, जिसे विश्वरंजन जैसे प्रगतिशील-वामपंथी हिंदी कवि की पुलिस ढा रही है। सच तो ये है कि सवाल अकेले विश्वरंजन का नहीं है, यह एक तंत्र और एक प्रणाली है। अंग्रेजों ने भारतीय जनता को कुचलने के लिए पुलिस का जो औपनिवेशिक ढांचा खड़ा किया था, विश्वरंजन उसके एक पुर्जे भर हैं। वे आदिवासी, गरीबों और दलितों को कार्पोरेट और सवर्ण हिंदू सत्ता के हित के लिए मार रहे हैं, तो दूसरी ओर वी.एन. राय (दोनों)भी उन बौद्धिको-लेखकों के उन्मूलन और उत्पीड़न में लगे हैं, जो सवर्ण जातिवादी, नौकरशाही और सत्ताकेंद्रित राजनीति, भ्रष्ट और लुटेरे गुटों से जन-आंदोलनों और वामपंथी विचारधाराओं को मुक्त करना चाहते हैं। यह एक ही तंत्र है, जिसके दो पहलू हैं। विश्वरंजन एक तरफ़, वी.एन.राय दूसरी तरफ़। आप 'हेड' बोलें या 'टेल' टास कभी नहीं जीतेंगे। बल्कि हिंदी-हिंदू वामपंथी आपको टीम से ही नहीं, खेल के मैदान से भी बाहर कर देंगे। सारे मठाधीश (जिनके फोटो आपने लगा रखा है) और उनके चेले इस बात को जानते हैं, इसलिए बे-फ़िक्र और बेशर्म हैं। ..रही बात राजेंद्र जी की तो ..शर्म का उनसे क्या वास्ता ?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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