हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

नामवर और चंद्रबली को छोड़ हिंदी अज्ञानियों से भरी पड़ी है

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/07/2010 06:08:00 PM

गिरीश मिश्र ने यह पत्र हरिवंश को प्रभात खबर में रविभूषण के आलेख हिंदी आलोचना का नया बखेड़ा के प्रकाशन के बाद उस पर प्रतिक्रिया के रूप में लिखा था. मूलतः अंगरेजी के इस पत्र के संपादित अंशों को हिंदी में अनुवाद करके प्रभात खबर ने अपने पत्रोंवाले स्तंभ में कुछ दिनों पहले प्रकाशित किया था. हम यहां प्रभात खबर में प्रकाशित पत्र, उस पर अखबार की ओर से लगाई गई टिप्पणी तथा गिरीश मिश्र का मूल अंगरेजी पत्र पोस्ट कर रहे हैं.

31 मई, 2010 को चतुर्दिक स्तंभ के अतंर्गत प्रकाशित स्तंभकार रविभूषण के आलेख 'हिंदी आलोचना का नया बखेड़ा' पर गिरीश मिश्र का पत्र प्राप्त हुआ है. विषय की गंभीरता के मद्देनजर हम इसे प्रकाशित कर रहे हैं. यद्यपि पत्र में लिखित कुछ अशालीन शब्द और वाक्य हटा दिये गये हैं, परंतु पत्र की मूल भावना यथावत रखने की कोशिश की गयी है. इस विषय पर अब और आगे किसी भी किस्म की टिप्पणी प्रकाशित करना हमारे लिए संभव नहीं होगा.
-संपादक (प्रभात खबर)

संपादक महोदय,
मुझे अभी-अभी एक आलेख मिला है. इसका शीर्षक है हिंदी आलोचना का नया बखेड़ा. इसे रविभूषण ने लिखा है. यह आपके समाचारपत्र में 31 मई, 2010 को प्रकाशित हुआ है.
ऐसा प्रतीत होता है कि यह कुछ वर्ष पहले मेरे द्वारा अपने मित्र डॉ पीएन सिंह, गाजीपुर को लिखे एक निजी पत्र में उठाये गये मुद्दों का खंडन है.  हाल में इस पत्र का हिंदी अनुवाद वाराणसी से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका साखी में छपा है.
ऐसा लगता है कि रविभूषण इतने अधीर हो गये कि मेरे द्वारा साखी पत्रिका में उठाये गये मुद्दों का खंडन करने के बजाय आपके साथ संबंधों का दुरुपयोग कर आपके समाचारपत्र में एक लंबा आलेख लिखकर मुझ पर दुर्भावनापूर्ण हमला किया, जबकि मेरा मूल पत्र आपके पाठकों की पहुंच में नहीं है. आप मुझसे सहमत होंगे कि यह पूर्णतया अनुचित है और एक ईमानदार संपादक के रूप में आपको इसकी अनुमति नहीं देनी चाहिए थी.
जिस जल्दीबाजी में उन्होंने यह आलेख लिखा है, और जिस तरह से उन्होंने मेरे मेरे तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया है- इसे देख कर यही लगता है, कि उन्हें ऐसा लिखने के लिए किसी ने उकसाया है या गलत तरीके से प्रेरित किया है.
 मैं पांव पूजने की संस्कृति में विश्वास नहीं रखता हूं. मैं तथ्यों और तर्कों के साथ अपनी बात कहने में विश्वास रखता हूं. मैंने हमेशा से ही डॉ रामविलास शर्मा के साहित्येतर लेखन को आधारहीन कहा है. मैंने ऐसा कई बार डॉ शर्मा के सामने भी कहा है, जब वे जीवित थे. वैसे, डॉ शर्मा और उनके छोटे भाई राम शरण शर्मा 'मुंशी' के साथ मेरे मधुर संबंध रहे हैं. राम शरण ने मेरे द्वारा अनुदित बहुत सारी पुस्तकों का संपादन किया है. आपके स्तंभकार इसकी पुष्टि कर सकते हैं. डॉ शर्मा के जीवित रहते मैंने उनकी पुस्तक भारत में अंगरेजी राज की आलोचना लिखी थी. यह आलोचना पत्रिका में छपी थी. तब डॉ शर्मा ने इस संदर्भ में कुछ आलोचनाओं को स्वीकार करते हुए मुझे एक पत्र लिखा था. उनके द्वारा किया गया मार्क्स की 'पूंजी' (भाग-2) का अनुवाद भयावह है.  इसके बारे में उन्होंने अपने एक प्रशंसक को लिखे एक पत्र में  बताया कि मास्को के लोगों ने उनके अनुवाद को पूरी तरह से बदल डाला था. तब मैंने सवाल उठाया था कि वे क्यों नहीं सार्वजनिक तौर पर इस काम से खुद को अलग कर लेते हैं. मैं इस बातपर दृढ़ हूं कि वे एक महान साहित्यकार होंगे, लेकिन जहां तक क्लासिकल इकोनॉमिक्स, इसके पहलुओं, मान्यताओं और इसकी शब्दावली की बात है तो वे इस बारे में कुछ नही जानते थे. आप इस संबंध में डॉ शर्मा के दूसरे महान प्रशंसक विश्वनाथ त्रिपाठी से संपर्क कर सकते हैं, जिनके साथ मेरी इस आशय को लेकर एक बार बहस हुई थी. अंत में उन्होंने छटपटाते हुए कहा था कि पूंजी का वह अनुवाद डॉ शर्मा का है ही नहीं!
डॉ शर्मा का यह दावा कि आर्य हमारी मातृभूमि के ही हैं, पूरी तरह से गलत है. शायद आप नयन चंदा के नाम से परिचित हों, जिन्होंने वर्षों तक फार इस्टर्न इकोनोमिक रिव्यू का संपादन किया. वर्तमान में वे येल यूनिवर्सिटी से जुड़े हुए हैं. दो वर्ष पहले चंदा की पुस्तक बाउंड टुगेदर छप कर आयी है. इस पुस्तक में वैज्ञानिक तथ्यों के साथ बताया गया है कि मानव का जन्म अफ्रीका में हुआ और यहीं से वह दुनिया भर में फैले. इसी तरह डॉ शर्मा की अनभिज्ञता या असावधानी निराला पर लिखी गयी एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचना में साफ दिखाई देती है, जिसमें उन्होंने महिषादल को नेटिव स्टेट बताया है जबकि वह एक जमींदारी एस्टेट था.
जहां तक मैनेजर पांडेय का सवाल है, तो न सिर्फ उनकी किताब के फ्लैप पर बल्कि उसकी अंदरूनी सामग्री में भी व्याकरण संबंधी अशुद्धियां हैं. सालों पहले मैनेजर पांडेय ने दावा किया था कि महावीर प्रसाद द्विवेदी की पुस्तक संपति शास्त्र आज भी अर्थशास्त्र के छात्रों के लिए उपयोगी है. इसी तरह बहुत दिन नहीं हुए जब उन्होंने कहा कि फकीरमोहन सेनापति पहले साहित्यकार थे, जिसने स्थायी बंदोबस्ती के विभिन्न पहलुओं के बारे में लिखा था. मैनेजर पांडेय इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं कि रेवरेंड लाल बिहारी डे का चर्चित उपन्यास बंगाल पीजेंट लाइफ, वर्ष 1870 के पूर्वार्द्ध में छपा था. इसकी प्रशंसा किसी और ने नहीं बल्कि चार्ल्स डार्विन जैसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक ने की थी. इसका पहला संस्करण गोविंद सामंत के नाम से छपा था.
मैं ऐसे कई उदाहरण दे सकता हूं कि जिससे पता चलता है कि हिंदी का वर्तमान साहित्यिक संसार अज्ञानियों से भरा पड़ा है. प्रोफेसर नामवर सिंह और प्रोफेसर चंद्रबली सिंह जैसे लोग बहुत दुर्लभ हैं.
किसी मुद्दे पर अधिकांश लोगों की राय के हिसाब से अपनी राय नहीं बनाता हूं. कम से कम तब तक नहीं, जब तक कि मैं इसकी सत्यता की पुष्टि न कर लूं. इसी तरह मेरे प्रिय मित्र डॉ पीसी जोशी ने डॉ शर्मा के बारे में जो कहा है, वह अलग है. ऐसा प्रतीत होता है कि आपके स्तंभकार को तर्कशास्त्र का ज्ञान नहीं है, चाहे वह हिंदुस्तानी हो या यूनानी. यहां तक कि उन्होंने हरिमोहन झा की कहानियां भी नहीं पढ़ी हैं.
शुभकामनाओं के साथ
गिरीश मिश्र

An Ignoramus as Your Columnist
I have just received a clipping of an article by some one called Ravibhushan, "Hindi Alochana ka Naya Bakheda", published in your daily dated 31st May.
This is supposed to be a refutation of the points raised by me in a personal letter to my friend Dr. P.N.Singh of Ghazipur, some years ago. Recently this letter appeared in Hindi translation in a journal Sakhi, published from Varanasi.
It seems Mr. Ravibhushan became so impatient that, instead of refuting the points raised by me in Sakhi, misused his connections with you to launch a full length malicious attack on me in your paper most of whose readers do not have an access to my original letter. This, you will agree with me, is totally unfair and as an honest editor you should not have allowed it.
Any way, this gentleman appears to be a hireling for somebody or the other because of the hurry he has shown and distortions of my views he has introduced.
Let me say at the outset that I do not believe in the culture of feet-touching and bowing with folded-hands. I go by facts and principles of logic. I have always regarded the non-literary writings of Dr. Ram Bilas Sharma as rubbish. I had said it umpteen times even in his face when he was alive. By the way, I had very good personal relations with him and his younger brother Ram Sharan Sharma "Munshi" who was associated with PPH for many decades and edited a number of books translated by me. Your columnist can even now verify this. I had voiced my criticisms in a review article on his book "Bharat Mein Angrezi Raj" in Alochana while he was alive and he wrote a letter to me acknowledging some of the criticisms. Second, his translation of Marx's Capital, Vol. II is horrifying, which he explained in a letter to one of his admirers, saying that his translation was completely altered by the Moscow people. I then raised the question why he did not publicly dissociate himself with it. I assert, he might have been a great literary writer but he was cipher so far as classical economics and nuances of its concepts and terminology were concerned. You may ask Vishwanath Tripathy, another great admirer of Dr. Sharma with whom I had a tiff and in the end he wriggled out saying that the published translation was not that of Dr. Sharma!
Dr. Sharma's assertion that the Aryans are products of this holy land of ours is completely false. You may be familiar with the name of Nayan Chanda who for many years edited the Far Eastern Economic Review and is now associated with the prestigious Yale University. Chanda's book "Bound Together", published a couple of years ago, has on the basis of scientific facts and figures showing that mankind originated in Africa and from where it spread to various parts of the world in waves over hundreds of thousands of years.
Dr. Sharma's ignorance or carelessness is obvious in his magnum opus on Nirala. He terms Mahishadal as a native state. In fact it was a zamindari estate.
As far as Manager Pandey is concerned not only the flap of his book but the text also contains grammatical errors. This "great" critic is no less an ignoramus than your columnist. Years ago he had asserted that Mahavir Prasad Dwivedi's book Sampatti Shastra was still useful for economics students as a source of knowledge. Not many years ago, he asserted that Fakir Mohan Senapati was the first literary writer who had taken up and depicted the various aspects of Permanent Settlement. He was completely unaware of Reverend Lal Behari Day's novel Bengal Peasant Life, published in the first half of 1870s and was praised by none other than legendary Charles Darwin. Its earlier version had appeared as Govinda Samanta.
I can go on multiplying the instances to show that the present day Hindi literary world is full of ignoramuses and the people like my friends such as Prof. Namwar Singh and Prof. Chandra Bali Singh are very rare.
I do not go by what the majority of the people say on any topic unless I verify its veracity because in logic there is a fallacy called argumentum ad populum. Hence what my dear friend Dr. P. C. Joshi has said about Sharma is beside the point. It appears that your columnist has no training in logic whether Indian or Greek. He has not even read Hari Mohan Jha's stories.
With best wishes,
Girish Mishra,
M-112 Saket, New Delhi-110017
Tel. 09811265654         

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ नामवर और चंद्रबली को छोड़ हिंदी अज्ञानियों से भरी पड़ी है ”

  2. By जनविजय on July 7, 2010 at 8:52 PM

    वैसे तो मैं गिरीश मिश्र जी की बहुत-सी बातों से सहमत हूँ । लेकिन इस प्रवृत्ति का समर्थन नहीं कर सकता कि दूसरों को छोटी-छोटी बातों पर अज्ञानी कह दिया जाए। हर व्यक्ति का अपना ज्ञान-क्षेत्र होता है, जिसमें वो विशेषज्ञ होता है बाकी क्षेत्रों में वह सिर्फ़ प्रतिक्रिया दे सकता है, निर्णय नहीं सुना सकता। लेकिन मिश्रा जी तो निर्णय सुना रहे हैं कि दो ज्ञानियों को छोड़कर बाक़ी लोग अझ`झानी ही नहीं मूर्ख भी हैं। यह बात कहते हुए स्पष्ट है कि उन्होंने ख़ुद को ज्ञानियों से भी ऊपर माना है तभी तो वे यह तय कर पा रहे हैं कि कौन ज्ञानी है और कौन अज्ञानी। ज्ञानी के ज्ञान की जानकारी या तो अपने अज्ञान की वज़ह से होती है या फिर अपने उत्तम ज्ञान की वज़ह से। अनुवाद करते हुए पारिभाषिक शब्दों के चयन में अनुवादक प्रायः ग़लतियाँ कर देते हैं और इस वज़ह से बात बिगड़ जाती है। लेकिन गिरीश जी ये भी मानेंगे कि छपी हुई किताब में अनुवादक का नाम ज़रूर जाता है लेकिन बहुत सारी ग़लतियाँ सम्पादक के अज्ञान और ज़िद्द की वज़ह से भी होती हैं। जल्दबाज़ी में किताबें छापी जाती हैं, अनुवादक को पूरा समय नहीं दिया जाता और ग़लतियाँ रह जाती हैं। इससे अनुवादक मूर्ख कैसे हो गया? क्या गिरीश जी के अनुवाद हमेशा सटीक और उत्तम होते हैं? यह बात तो उनके द्वारा नियुक्त विद्वान ही बता सकेंगे। हर आदमी अनुवादक नहीं हो सकता, यह बात ठीक है। अनुभव बढ़ने के साथ-साथ अनुवाद की क्वालिटी भी उत्तम होती चली जाती है। 'निराला की साहित्य-साधना' में एक ग़लती पकड़ लेने से वह निकृष्ट कैसे हो गई? ग़लतियाँ तो सभी से होती हैं। उन्हें सुधारना चाहिए। मुझे बस, गिरीश जी की यह प्रवृत्ति पसन्द नहीं आई कि दूसरों को निकृष्ट और अज्ञानी बताया जाए, इसीलिए अपने मन की बात लिखी।

  3. By सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी on July 8, 2010 at 9:34 PM

    जनविजय जी से सहमत।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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