हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

यह आपकी सेना है मिस्टर चिदंबरम

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/04/2010 05:19:00 PM

यह आपकी सेना है मिस्टर चिदंबरम
(और वे इस देश के लोग हैं)
 

रेयाज उल हक 
एक तसवीर बहाव को मोड़ सकती है. एक तसवीर, जो एक राष्ट्र को अपनी जड़ता को तोड़ते हुए खुद से पूछने पर मजबूर कर सकती है कि हम बार-बार हो रही ऐसी कितनी आधिकारिक मूर्खताओं को स्वीकार कर सकते हैं और एक विकसित राष्ट्र बनने की खोज में इसे जायज ठहरा सकते हैं और उचित प्रक्रियाओं और मर्यादा को निरंकुश तरीके से नकारने को नजरअंदाज कर सकते हैं. एक तसवीर हमारी आत्मा को जगा सकती है, एक आखिरी झटका, एक फूंक जो किसी सभ्य समाज और एक पूरी तरह बर्बर समाज की मान्यताओं को अलग करनेवाली बारीक लकीर को मिटा सकती है.

न्गूयेन न्गोक लोन बहुत कम लोगों को याद हैं. लेकिन यह तसवीर बहुत सारे लोगों को याद है. जिस आदमी- एडी एडम्स -ने इस तसवीर को खींचा था, उसे पुलित्जर पुरस्कार मिला था. इस तसवीर ने एक युद्ध की दिशा को मोड़ दिया था. वह युद्ध था- वियतनाम युद्ध.


और यह युद्ध हमारे अपने देश में हमारे अपने लोगों के खिलाफ चल रहा है. यह तसवीर हमारे अपने देश की है.

एक साल पहले हम लालगढ़ के गांवों में थे, जहां औरतें हमें बता रही थीं कि कैसे  वे पहली बार आजादी महसूस कर रही थीं. कि कैसे ब्रिटिश शासनकाल से ही उनके पुरखे गुलामी की जिंदगी जी रहे थे और पहली बार उनकी जिंदगी में ऐसे दिन आए हैं जिनके बारे में किसी से बता सकते थे कि वे अपने दिन और रातें अपने तरीके से गुजार रहे हैं.

यह आजादी उनके लिए वोट देने की आजादी भर नहीं थी. यह वह आजादी थी, जिसमें सुबह शौच के लिए जंगल में जाने के बाद किसी पुलिसवाले के मिलने और तंग किए जाने का डर नहीं था. यह ऐसी आजादी थी, जिसमें जंगल से लकड़ी लेकर लौटते हुए जांच के नाम पर साड़ी खुलवा कर यह पता लगाए जाने का डर नहीं था कि वे महिला ही हैं या इस वेष में कोई पुरुष. उनके लिए रातें इतनी ज्यादा सुकून भरी हो गई थीं कि उन्हें जांच के नाम पर कभी भी और किसी भी समय घर में घुस कर सारा सामान तथा अनाज बिखेर देने और मारपीट करनेवाले पुलिस या अर्धसैनिक बलों का आना सुदूर अतीत का बुरा सपना-सा लगने लगा था. इस आजादी का उनके जानवरों के लिए यह मतलब था कि उनके चरते हुए पकड़े जाने का डर नहीं रह गया था. राष्ट्रीय रोजगार गारंटी तथा पंचायत के दूसरे कामों में लोगों को अब पूरी और बिना किसी धांधली के मजदूरी मिलने लगी थी. सरकारी कर्मचारी अब उनसे रिश्वत मांगने के पहले सोचने लगे थे. इंदिरा आवास के आवेदन जल्दी और बिना किसी घूस के पूरे होने लगे थे. चप्पलवाली पुलिस (सीपीएम की सशस्त्र वाहिनी, हरमाद वाहिनी को लोगों ने यही नाम दिया था) और ब्रिटिश (भारत के अर्धसैनिक बल) का अब गांववालों को डर नहीं रह गया था. जंगल अब फिर से उनका अपना हो गया था. उनके घर के सामने का तालाब अब उनका अपना हो गया था. उनकी लड़कियां पहले के मुकाबले निर्भीक हो गई थीं. उनके लड़के ज्यादा सुरक्षित हो गए थे. उनके मर्दों के पकड़े और मारे जाने का खतरा खत्म हो गया था. अपने चौक-चौराहों और रास्तों पर उनका राज था.

मिस्टर चिदंबरम, पिछले साल जून की 19 तारीख तक यह पीसीएपीए का लालगढ़ था.

और इसके एक साल बाद की ये खबरें और तसवीरें हैं...अर्धसैनिक बलों और पुलिस द्वारा जानवरों की तरह टांग कर ले जाई जाती आदिवासी युवती की तसवीर. छत्तीसगढ़ में (आपके कारपोरेट मालिकों के लिए) इलाका हथियाने गई आपकी सेना और पुलिस द्वारा आदिवासी युवतियों के बलात्कार की खबर...और यह भी कि उन्हें अपनी जीत की निशानी के तौर पर पेश किया गया.
बेशक...पुलिस और आपके जवान गलत नहीं हैं. वे जीत की निशानियां ही हैं. आपकी और आप जिस व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसकी जीत की निशानियां यही हो सकती हैं. पूर्वोत्तर (मनोरमा देवी...), कश्मीर (शोपियां...) से लेकर जहानाबाद, लालगढ़, उड़ीसा, बस्तर तक आपकी व्यवस्था के तहत जीत की निशानियां यही तो रही हैं.

इन पर आपकी व्यवस्था को गर्व रहा है, क्योंकि हम नहीं जानते कि इनके लिए कभी कोई माफी मांगी गई. कोई शर्मिंदगी. कोई बयान.
कुछ नहीं.

यह है सभ्यता, न्याय, विकास और लोकतंत्र के आपके उसूलों से संचालित आपकी सेना और पुलिस जो इन इलाकों में दशकों से ’शांति’ और ’लोकतंत्र’ ’स्थापित’ करती रही है. शायद इसे स्थापित करने का तरीका भी यही है. यह सभ्यता है, मि चिदंबरम.

लेकिन फर्क इतना साफ है कि कोई भी उसे देख सकता है. आपकी सेना के पहुंचने के पहले पीसीएपीए ने लालगढ़ के गांवों में ऐसे काम किए थे, जिन्हें आपकी व्यवस्था पिछले साठ सालों में कभी नहीं कर पाई...पूरे देश में नहीं कर पाई. वे भूमिहीनों को जमीन का वितरण कर रहे थे, उन्हें जमीन की उर्वरता के अनुसार बीज और खाद बांट रहे थे. उन्होंने नहरें बनाई थीं और खेतों तक पानी ले जाने की व्यवस्था उनके पास थी. उन्होंने शासन और विकास के नए मायने गढ़े थे. वे भारत को एक नया जनवाद सिखा रहे थे. उनकी ग्राम कमेटियों में आधे पद महिलाओं के लिए आरक्षित थे, जिनके बिना कमेटियां गठित नहीं हो सकती थीं. और लगभग 1200 गांवों में उनकी कमेटियां कायम हुई थीं. पीसीएपीए की अपनी महिला शाखा थी और उसके फैसलों का उल्लंघन गांव के मर्द भी नहीं कर सकते थे. उन्होंने पूरे विद्रोही इलाके में शराबबंदी की घोषणा की थी और यह 19 जून तक लागू रही थी. पीसीएपीए आपकी व्यवस्था द्वारा विश्व बैंक के पैसे से लगाए गए यूक्लिप्टस के पेड़ों से होड़ ले रहा था, जिन्होंने जमीन को बंजर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. पीसीएपीए फर्जी लाइसेंस पर चल रहे स्पंज आयरन कारखानों से हो रहे भारी प्रदूषण, फसलों पर दुष्प्रभाव, जानवरों में बीमारी के खिलाफ लड़ रहा था.

तब लालगढ़ की कोई भी शाम बिना दर्जनों मीटिंगों के नहीं गुजरती थी. पारंपरिक हथियारों से लैस आदिवासी महिलाएं और पुरुष, बूढ़े और बच्चे हर गांव में मीटिंगें करते, आपस में राय मशविरा करते, आगे की कार्रवाइयों के बारे में तय करते. वे राजनीति कर रहे थे लेकिन वैसी राजनीति नहीं जो मौसमी वायदों और विश्वासघातक कार्रवाइयों पर टिकी हुई होती है जिसके हम भारत में आदी बना दिए गए हैं. बल्कि उनकी राजनीति उनकी अपनी जनवादी राजनीतिक कार्वाइयां थीं, जिनमें महज वादे और मांगें नहीं थीं- योजनाएं थीं और उनका कार्यान्वयन था. हर ग्राम कमेटी अपने गांव के सबसे गरीब और वंचित तबके की जरूरतों के हिसाब से गांव की जरूरतें तय करती- कहां नहर बननी है, कहां पुल की मरम्मत होनी है, कहां सड़क बिछाई जानी है, कहां तालाब की खुदाई करनी है, कहां खेतों को फसल के लायक तैयार करना है.

इसके बाद इस पर अनुमानित खर्च के ब्योरे के साथ इस मांग को ऊपर की कमेटी में भेजा जाता. फिर ऊपर की कमेटी आकर गांववालों से बातचीत करती और खर्च का आकलन करती. इसके बाद उसी गांव और दूसरे गांवों के चंदे और श्रमदान से योजना पर काम शुरू होता, जिसकी निगरानी पीसीएपीए करती. इन कामों में मजदूरों को मजदूरी दी जाती और मशीनवालों को किराया. इस विकास को आपके सेंसेक्स और वृद्धि दर से कोई लेना-देना नहीं था, इसलिए यहां उपयोग में लाई जा रही सबसे भारी तकनीक ट्रैक्टर थे.

नई बनी और खाली पड़ी इमारतों में अस्पताल चलाए जा रहे थे और उन इलाकों में पहली बार लोगों को डॉक्टरी इलाज हासिल हो रहा था, जहां कभी डॉक्टर का चेहरा नहीं देखा गया था.

मि चिदंबरम, आपने कभी अलचिकी भाषा का नाम सुना है? मुझे यकीन है आपने नहीं सुना होगा. कई दूसरों ने भी नहीं- जो आपकी भाषा के शोर में दबे हुए हैं. यह लालगढ़ में बसनेवाली आबादी की अपनी भाषा है. पहली बार इस भाषा को थोड़े शुभचिंतक मिले थे, इसपर लालगढ़ में गंभीरता से काम शुरू हुआ था और लगने लगा था कि यह भाषा पहले की तरह अबोली-अनसुनी नहीं रह जाएगी.

लेकिन उसे चुप करा दिया गया. लालगढ़ को माओवादियों से ’आजाद’ कराने पहुंची आपकी सेना ने पुराने दिन लौटा दिए. वे दिन, जिनके लिए इस भाषा में एक ही शब्द था-गुलामी के दिन. वे दिन जब स्कूल सैनिक छावनी बना दिए जाते थे और अस्पताल यातना शिविर. यह आपकी पुलिस है जिसने छत्रधर महतो जैसे जननेता को पत्रकारों का भेष धर कर गिरफ्तार किया. यह आपकी सेना है, जिसने आदिवासियों के प्यारे नेता लालमोहर टुडू को उनके परिजनों के सामने घर में घुस कर हत्या की और कहा कि वे मुठभेड़ में मारे गए हैं. यह आपकी व्यवस्था है, जो बूढ़ी और निर्दोष महिलाओं को खतरनाक आतंकवादी कह कर जेलों में बंद करती है. यह आप हैं, जो ये कहते हैं कि आपके पास ऐसी कारर्वाइयों का नैतिक अधिकार है.
बेशक, आपको अधिकार है मिस्टर चिदंबरम. इसका आपको नैतिक अधिकार है कि आप देश के करोड़ों लोगों को भूख से मरने के लिए उनके हाल पर छोड़ दें. बेशक आपकी व्यवस्था ने यह अधिकार हासिल किया है कि वह दो लाख किसानों की आत्महत्या को सेंसेक्स की ऊंचाई और वृद्धि दर की तेजी के लिए जायज ठहराए. यही नैतिक अधिकार आपको इतनी मजबूती देता है कि आप हर साल लाखों बच्चों की भूख और बीमारी से मौत को निजी डॉक्टरों, दवा कंपनियों और जमाखोरों के मुनाफे के हित में बरदाश्त कर जाएं.

शायद यह एक संवैधानिक और लोकतांत्रिक सभ्यता के लिए अनिवार्य कीमत है, जो चुकाई ही जानी चाहिए. और इस कीमत को सबसे अधिक उन्हें ही चुकाना चाहिए जो सबसे ‘असंवैधानिक’, सबसे ‘अलोकतांत्रिक’ और सबसे ‘असभ्य’ हैं. वे बर्बर लोग, जिनकी पहचान कराने के लिए आपको अनेक बार राष्ट्रीय-क्षेत्रीय अखबारों के आधे-आधे पन्ने खर्च करने पड़े हैं. एक लोकतांत्रिक सरकार की आखिर अपनी कुछ जिम्मेदारियां भी होती ही हैं.

लेकिन मि चिदंबरम, आपने इन विज्ञापनों में छपे भूख और बदहाली से कंकाल बन गए शरीरों के बारे में कभी आपने कोई नैतिक अधिकार महसूस किया है कि नहीं? वे इसी देश के नागरिक हैं, उन्हें इतना बदहाल बनाए रखने की जिम्मेदारी क्या आपकी व्यवस्था की नहीं है? जब वे जीवित थे, तब उन पर आपकी व्यवस्था ने कितने रुपये खर्च किए थे? उनके घर के छप्परों पर आखिरी बार फूस कब चढ़ी थी? उनकी हांडी में आखिरी बार चावल कब बना था? उनके घर में आखिरी बार कब बीमारी का इलाज हुआ था? ...और इसी सरकार ने उनकी लाशों के विज्ञापनों पर लाखों रुपये खर्च किये हैं.. सचमुच हमारी सरकार का नैतिक मनोबल बहुत ऊंचा है.

आपके सैनिकों ने महिलाओं के साथ बलात्कार किया है. उन्हें सूअरों की तरह बांस पर बांध कर ले जाया गया है. उन्हें अपनी जीत की निशानी के तौर पर प्रदर्शित किया है. हम नहीं जानते कि आपकी नैतिकता की मनुस्मृति इसके बारे में क्या कहती है, लेकिन इसका भी आपको नैतिक अधिकार जरूर होगा.

यह ऐसा नैतिक अधिकार है, जो विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, वेदांताओं, रिलायंसों, जिंदलों, एनरॉनों और टाटाओं के दफ्तरों में गढ़ा जाता है और लुभावने पदों तथा वेतन के साथ पेश किया जाता है. नैतिकता का यह मानदंड मानवीय त्रासदियों (भोपाल गैस कांड) के लिए जिम्मेदार अपराधियों, जनता के पैसे (एनरॉन) और संसाधनों की आपराधिक लूट (सेज और सैकड़ों एमओयू) के पक्ष में खड़ा करता है. यह नैतिकता जनता पर युद्ध को थोपती है और जनसंहारों को जायज ठहराती है.
मि चिदंबरम, वे लोग जो छत्तीसगढ़ से लेकर बिहार, झारखंड, उड़ीसा और लालगढ़ में उजाड़े और मारे जा रहे हैं, वे आपके लोग नहीं हैं. यह आपका देश नहीं है. आपका देश तो वे बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं, जिनके लिए आप काम करते रहे हैं. यह देश उनका है जिनकी यह जमीन, नदियां, पेड़, जंगल, खेत और घर हैं. जो इस देश के बारे में, इसके वर्तमान और भविष्य के बारे में सोचते हैं. यह उनका देश है, जो जानवरों की तरह बांस पर ढोए जाने, बलात्कार किए जाने, अपनी आखिरी चीज भी लूट लिए जाने, अपना घर जला दिए जाने और अपनी जमीन से खदेड़ दिए जाने के खिलाफ लड़ रहे हैं.
वे सभी, जिनके पास एक नई दुनिया का सपना है.

हम जानते हैं कि आप कभी इन सबके लिए माफी नहीं मांगेंगे. हमें उम्मीद भी नहीं है. क्योंकि यह आपकी सेना है और यही आपका चेहरा भी है.

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ यह आपकी सेना है मिस्टर चिदंबरम ”

  2. By गिरिजेश राव on July 4, 2010 at 9:19 PM

    टुकड़ा टुकड़ा सच सन्दर्भ से विलग कर प्रचार का हिस्सा बना प्रस्तुत करना - कोई नई बात नहीं है। इस फोटो पर पहले भी बहुत बहस हो चुकी है। टिप्पणी में फोटो देने की सुविधा होती तो मैं भी कुछ विचलित करने वाले फोटो लगा देता जो और कहानी बयाँ करते।
    मृतकों/जीवितों के अंग भंग करने वाले और घात लगा कर हमला कर हत्या करने वाले अंतत: उसी राह चलने को अभिशप्त हैं जिसके विरोध में वे अस्त्र उठाते हैं।

  3. By pratibha on July 6, 2010 at 6:14 PM

    रियाज़ जी, शायद सच कहे बहुत दिन हुए की तर्ज़ पर सच सुने भी बहुत दिन हुए. यही वजह है की एकतरफा ख़बरें और मीडिया का भोंपू ही सच का चेहरा बनकर रह गए हैं. चिदम्बरम के पास तो क्या किसी के पास कोई जवाब नहीं है की हमें अपने ही देश
    के लोगों के खिलाफ सेनाएं क्यों भेजनी पड़ रही हैं...ये कैसा लोकतंत्र है जिसका लड्डू हर साल बंटता है लेकिन मन कसैला ही है...

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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