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बीच सफ़हे की लड़ाई

थोडाई कैंप हमलाः यह चिदंबरी शौर्य नहीं हाराकीरी है

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/02/2010 12:58:00 PM

छत्तीसगढ़ डॉट नेट की मेल सेवा के जरिए हमें यह मेल हासिल हुआ है. इसकी भाषा को ठीक कर हम इसे यहां पोस्ट कर रहे हैं.


चिंतलनार से कल हुये थोडाई कैंप के पास हुआ यह चौथा बडा हमला है जिसमें 27 सैनिक शहीद हुए है,इस हमले के बाद फिर वही कवायद दोहराई जायेगी कि यह नक्सलियों की कायराना हरकत है, इससे सुरक्षा बलों का मनोबल नही कम किया जा सकता है,चूक कहीं हुई है इसे खोजा जायेगा, और कुछ लोग मानवाधिकारवादियों को संबोधित करेंगे कि उन्होने अपना मुंह क्यों नही खोला. फिर वही श्रद्धांजली दोहराई जायेगी जो पिछले चार माह से छत्तीसगढ देख रहा है.
यह कहना बहुत आसान है कि सुरक्षाबलों को यह यह नही करना चाहिए था, जिसके कारण यह घटना संभव हुई. पिछली शांतियात्रा में डीएसपी शर्मा ने हम लोगों से कहा था कि हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं है क्यों कि यहां का भैगोलिक क्षेत्र इतना विषम है कि आने जाने के दो दो रास्ते आसान नहीं हैं और न ही इतनी लंबी खोजखबर पैदल की जा सकती, यह हमला तो किसी बारूदी सुरंग का भी नहीं बल्कि सामने फायरिंग का है, पिछले 6 माह में सिर्फ सुरक्षा बल ही शिकार हो रहे है, दो से पांच सौ नक्सली एक साथ हमला करने पहुंच जाते है किन्तु हमें पता ही नही चलता. आखिर क्यों ? कारण है कि हमें वहां के स्थानीय आदिवासियों का सहयोग नही मिलता. क्या यह विडंम्बना नही है कि जिनकी रक्षा के लिए सुरक्षा बल वहां गये हैं उनका खुफिया सहयोग हमारे साथ नहीं बल्कि दूसरों के साथ है, दुनिया में जहां कहीं भी गुरिल्ला युद्व लडे़ गये है वह जन समर्थन से ही संचालित किये जाते हैं और लंबे समय तक चलाये जाते रहे हैं. यदि नक्सली पिछले चालीस सालों से इस प्रकार के युद्ध का संचालन कर पा रहे हैं तो निश्चित ही निरंतर आदिवासियों का ठोस समर्थन ही है.
सही बात तो यही है कि हमारे सुरक्षा बल जंगल वारफेयर में प्रशिक्षित नहीं हैं. भारत ही क्यों दुनिया के कसी भी देश की सेना या बल गुरिल्ला वार के लिए सक्षम नहीं हैं. दरअसल फौज के बलबूते पर नक्सलियों से नहीं निबटा जा सकता है. वह जिस रणनीति को अपना रहे हैं, वह राज्य के विरूद्व सीधे युद्व की नहीं है. फौज केवल सीधे युद्व के संचालन में दक्ष होती है. सेना का इस्तेमाल पूर्वी भारत और कश्मीर में पिछले पचास सालों से किया जा रहा है, वहां अभी तक कोई निर्णायक लडाई नहीं जीती जा सकी है.
यह युद्व नही हाराकीरी है जिसमें हमारे बहादुर सैनिक मारे जा रहे हैं. जो सरकारें यह लडाई इस फार्म में लड़ रही हैं उनका खुद का कुछ दांव पर नहीं लगा है. इस लडाई की रणनीति को बदलना होगा और सुरक्षाबल या सेना इसका हल नहीं है. पहले हमें उनका विश्वास जीतना होगा जिनकी रक्षा के नाम पर हम वहां गये हैं.
यह चिदंबरी शौर्य नहीं हाराकीरी है.

भगत सिंह, रायपुर

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ थोडाई कैंप हमलाः यह चिदंबरी शौर्य नहीं हाराकीरी है ”

  2. By ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ on July 2, 2010 at 5:47 PM

    आपकी बात से पूर्ण सहमति।
    ………….
    दिव्य शक्ति द्वारा उड़ने की कला।
    किसने कहा पढ़े-लिखे ज़्यादा समझदार होते हैं?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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