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भोपाल गैस कांडः महानायक और महात्रासदी

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/01/2010 01:53:00 PM

पीड़ितों को राहत मिलना चाहिए, हमें भी उन्हें राहत पहुंचानी चाहिए, लेकिन इसकी ओट में अपराधियों और उन्हें बचानेवाली पूरे व्यवस्था को को बच कर जाने नहीं दिया जा सकता. उनकी करतूतों का हिसाब मांगा जाना अभी बाकी है, इसे किसी भी हालत में नहीं भूला जाना चाहिए. मनीष शांडिल्य का आलेख.

भोपाल गैस कांड पर हो रही बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप से 'दुखी' होकर बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने पिछले दिनों कहा है कि ऐसे लोग जो इस मुद्दे पर वाकई गंभीर है, राजनीति छोड़ व्यक्तिगत तौर पर एक साझा कोष में 10 रुपये का ही दान करना शुरू करे दें तो यह राशि उससे भी ज्यादा होगी, जितने मुआवजे पर पूरी बहस के बीच विचार किया जा रहा है. पहली नजर में उनकी यह अपील किसी को भी संवेदना के ज्वार में बहाकर कुछ दूर तक ले जा सकती है और गैस पीड़ितों के लिए व्यक्तिगत स्तर ही सही कुछ करने के लिए प्ररित कर सकती है. लेकिन अगर महानायक की पेशेवर जिंदगी के पन्नों को पलटकर देखने की कोशिश करें तो यह साफ झलकता दिखाई देता है कि ऊपर वर्णित राजनीति से दुखी अमिताभ खुद किस तरह सत्ता की राजनीति करते रहे हैं. यह राजनीतिक सत्ता पाने की कवायद नहीं है, यह कवायद है आर्थिक व पहचान की सत्ता प्राप्त करने की.
आज भोपाल गैस पीड़ितों के हमदर्द बने अमिताभ ने खुद 2006 में एवरेडी बैटरी के विज्ञापन के लिए करोड़ों रुपये लिये थे. हो सकता है कि बहुत कम लोगों को यह पता हो कि एवरेडी बैटरी वही यूनियन कार्बाइड बनाती है, जिसकी आपराधिक लापरवाही के कारण आज से 26 साल पहले 20 हजार से ज्यादा लोग मारे गये थे और लगभग 6 लाख जानलेवा रोगों के शिकार हुए थे. इस बैटरी को बेचते वक्त क्या अमिताभ को इसका ध्यान नहीं था कि ऐसा करते हुए वो पीड़ितों और तमाम भारतीयों के भावनाओं के साथ कैसा मजाक कर रहे हैं. ये वही भारतीय हैं जिन्होंने उन्हें सुपर स्टार का दर्जा दिया, महानायक मानकर सर आंखों पर बिठाया, उनके घायल होने पर दुआएं मांगीं. लेकिन भारतीयों का यह महानायक तो मौत के सौदागरों का खजाना और अपनी भी तिजोरी भरने के लिए पर्दे पर चिल्ला रहा था ''गिव मी रेड''. जबकि उसे पता था कि वह ज्यादा-से-ज्यादा भारतीयों के हाथ में जो लाल रंग की बैटरी पहुंचाना चाहता है, उसको बनाने वाली कंपनी के हाथ हजारों भारतीयों के खून से लाल हैं. लेकिन तब बैटरी बेचना उनकी आर्थिक हवस को पूरा करने में सहायक था तो आज गैस पीड़ितों का हमदर्द होना उनकी छवि को चमकाने में कारगर हो रहा है. बहुत आसान है कि जनसंहार करने वालों से करोड़ों लेकर मारे गये लोगों के कल्याण के लिए 10 रुपये दान करने की अपील करना.
लेकिन उनके इस बयान को ध्यान से पढ़ें तो एक और बात सामने आती है, जो उनकी अब तक की छवि से और वे जिस वर्ग के हैं उसके चरित्र से मेल ही खाती है. उनका बयान इस पूरे मामले के राजनीतिक चरित्र को भोथरा करके भूल जाने का भी आह्वान करता है और इस आपराधिक कृत्य को किसी सामान्य प्राकृतिक आपदा के रूप में सीमित कर देता है, जिससे द्रवित होकर लोगों को विवाद और आरोप-प्रत्यारोप भूल कर आपस में सहायतार्थ उठ खड़े होना चाहिए. इसका एक मतलब यह भी है जिसने अपराध किये उसकी गलतियों को भूल जाएं, उसे बचानेवाली पूरी व्यवस्था (अकेले कांग्रेस या अकेले भाजपा ही नहीं) को भूल जाएं, जिन लोगों ने इतने लोगों की जानों से अब तक खिलवाड़ की उनको छोड़ दें, उन पर कोई विवाद न करें और पीड़ितों के बचाव में आगे आएं. एसा करके हम यहां एक गलती करेंगे, वह यह कि पीड़ितों को राहत पहुंचाने और उनके इंसाफ दिलाने के मामलों को एक साथ मिला देंगे, बल्कि इससे भी बड़ा अपराध यह करेंगे कि उनको न्याय दिलाने की कीमत पर उन्हें राहत पहुंचाने की कोशिश करेंगे. पीड़ितों को राहत मिलना चाहिए, हमें भी उन्हें राहत पहुंचानी चाहिए, लेकिन इसकी ओट में अपराधियों और उन्हें बचानेवाली पूरे व्यवस्था को को बच कर जाने नहीं दिया जा सकता. उनकी करतूतों का हिसाब मांगा जाना अभी बाकी है, इसे किसी भी हालत में नहीं भूला जाना चाहिए. वह भी एसी हालत में जब सरकार परमाणु जवाबदेही विधेयक के जरिये एसी किसी भी भावी दुर्घटना या आपराधिक लापरवाही की स्थिति में दोषी कंपनी को पूरी तरह किसी भी जवाबदेही और मुआवजा देने के दायित्व से बरी करना चाहती है.
अमिताभ के मामले पर दोबारा लौटते हैं. जाहिर है, वे जिस तरह पूरे मामले पर सोच और लिख रहे हैं, उसके जरिए वे जनता का इस तरह अराजनीतिक तरीके से सोचने के लिए आह्वान कर रहे हैं, जिसका अंततः नतीजा अपराधी कंपनी और उतनी ही अपराधी व्यवस्था के दोषों को नजरअंदाज कर देना होगा.
ऊपर जिस एवरेडी के विज्ञापन की बात की गई है, वही अकेला मामला नहीं है. अमिताभ अपनी सुविधा के मुताबिक काम और बयानबाजी करते रहे हैं और विवादों में घिरते भी रहे हैं. बोफोर्स विवाद में घिरने के बाद उन्होंने भले ही यह कहते हुए इलाहाबाद लोकसभा सीट छोड़ दी थी कि संसदीय राजनीति उनके बस की बात नहीं. लेकिन सच्चाई तो यह है कि अब अमिताभ अपने व्यक्तिगत हित साधने के लिए बहुत ही चतुराई से अवसरवादी राजनीति करने लगे हैं.

हाल में वे गुजरात सरकार का ब्रांड अंबेसेडर बनने के लिए विवादों में रहे हैं. हकीकत यह है कि हमारा कथित 'महानायक' कोई नैतिक उदाहरण प्रस्तुत करने में विश्वास नहीं रखता. जब उसे अपने कर्ज खत्म करने का जुगाड़ करना होता है तो अमर सिंह के बहाने समाजवादी पार्टी के करीब जाता है और कहता-फिरता है कि यूपी में दम है. दूसरी ओर अपनी और अपने पारिवारिक सदस्यों की फिल्मों को सफल बनाना होता है कभी खुद बाल ठाकरे की छवि को पर्दे पर जीवंत करता है तो कभी उनके सामने दंडवत हो जाता है. यह अमिताभ के अभिनय क्षमता की ही 'खासियत' है कि वो सपा और भाजपा व शिवसेना जैसे धुर विरोधी दलों के जरिये अपने हित पूरे करने में सफल हो जाते हैं. अमिताभ हिंदी फिल्म लागा चुनरी में दाग के प्रदर्शन के पहले अपने पत्नी और बच्चे के फिल्म के व्यवसायिक हितों की रक्षा के लिए हिंदी के समर्थन में अपने दिए बयान से पलटते हुए शिवसेना और मनसे प्रमुख के सम्मुख नतमस्तक हुए थे. हालांकि तब जरूरत थी कि वो हिंदी के समर्थन और संकीर्णता की राजनीति के विरूद्ध अपने बयान पर अडिग रहते. लेकिन तब भी उनका व्यवसायिक और पारिवारिक हित इसके आड़े आ गया था.
अमिताभ ने भोपाल गैस कांड पर विगत 07 जून को आये बहुप्रतीक्षित फैसले के बाद अपने ब्लॉग पर लिखा था ''कंपनी के प्रबंधकों के लिए केवल जेल में दो साल! दोषियों को इतनी कम सजा मिलने के बाद सभी अचंभित हैं और सदमे व आक्रोश में भी''. यह लिखते वक्त वो यह छुपा गये थे कि अप्रत्यक्ष रूप तो दोषियों की इस सूची में वो भी शामिल हैं. बेहतर तो यह होगा कि अमिताभ गैस पीड़ितों के लिए हमदर्दी दिखाने के साथ अपनी पुरानी गलती के लिए भोपाल की जनता सहित पूरे देश से माफी मांगें. अमिताभ के अगले ब्लॉग पोस्ट या ट्‌विटर संदेश में देश को इसका इंतजार रहेगा.

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“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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