बुद्धदेव व चिदंबरम क्या लालगढ़ को लालमोहन टुडु बना देना चाहते हैं
Posted by Reyaz-ul-haque on 6/30/2010 12:35:00 PM महाश्वेता देवीलालगढ़ में जब ऑपरेशन ग्रीन हंट का एक वर्ष पूरा हो रहा था, ठीक उसी समय केंद्र और राज्य के सशस्त्र पुलिस बलों ने कथित रूप से आठ माओवादियों को तथाकथित मुठभेड़ में मार गिराया। सुरक्षा जवानों द्वारा मरनेवाले युवक-युवतियों की लाशें बांस में टांगकर ले जाते हुए तस्वीरें छपी हैं। इस तरह मरे मवेशियों को ही बांस में बांधकर-लटकाकर ले जाते हुए मैंने अब तक देखा है। उसी तरह मनुष्यों को देखा।
इसी का नाम लालगढ़ है? गत 15 जून को लालगढ़ अंचल के पिड़ाकाटा से केंद्र और राज्य की संयुक्त सशस्त्र वाहिनी ने सेंट्रल सिरामिक की सीनियर साइंटिस्ट निशा विश्वास, प्रो कनिष्क चौधरी और लेखक मानिक मंडल को गैरकानूनी ढंग से काफी देर तक रोके रखा और अंततः झूठे मामलों में गिरफ्तार कर उन्हें जेल में डाल दिया गया। ये बुद्धिजीवी संख्या में तीन थे, सो धारा 144 के उल्लंघन का आरोप भी उन पर नहीं लगता। फिर उन्हें क्यों गिरफ्तार किया गया? इसी तरह छत्रधर महतो, सुख शांति बास्के, राजा सरखेल और प्रसून चटर्जी को भी गिरफ्तार किया गया था।
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सिंगूर और नंदीग्राम की तरह लालगढ़ में जन-विरोधी काम किया, इसीलिए उनके खिलाफ हम सड़क पर उतरे और ‘परिवर्तन चाहिए’ का नारा दिया था। उस नारे के कारण निश्चित ही ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को मदद मिली है। ऐसे में, मैं पूछना चाहती हूं कि लालगढ़ में सुरक्षा बलों के आचरण की निंदा ममता बनर्जी क्यों नहीं कर रही हैं?
लालगढ़ को औद्योगिक समूह और बुद्धदेव के ‘हैप्पी हंटिंग ग्राउंड’ बनाये जाने की अनुमति वहां के निवासी कभी नहीं देंगे। बुद्धदेव ने वहां ‘सेज’ बनाना चाहा और केंद्र सरकार ने उसकी सहर्ष अनुमति दी। ‘सेज’ के लिए ही 352.86 किलोमीटर क्षेत्र में फैले डेढ़ लाख से ज्यादा की आबादी वाले लालगढ़ में ऐसी स्थितियां बनायी जा रही हैं कि आदिवासी खुद ही वह अंचल छोड़कर चले जाएं। माकपा की हर्मद वाहिनी व राज्य पुलिस और केंद्र के अर्द्धसैनिक बल लालगढ़ को सबक सिखाने में लगे हैं। लालगढ़ में 29 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है और 35 प्रतिशत दलितों की। समाज के इस सबसे कमजोर तबके को लंगड़ी मारने को शासन-प्रशासन सदैव तत्पर रहता है।
सिर्फ लालगढ़ ही नहीं, पूरे देश के आदिवासी इलाके पेयजल, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी नागरिक सुविधाओं से वंचित हैं। उन्हें न बीपीएल कार्ड मिलता है, न राशन कार्ड, न इंदिरा आवास योजना का कोई लाभ मिलता है, न ही जवाहर रोजगार योजना का। सौ दिन के रोजगार की योजना का कोई लाभ लालगढ़ के आदिवासियों को क्यों नहीं मिलता? मैंने लालगढ़ से लेकर झारग्राम, पुरुलिया में 1977-80 के दौरान देखा था कि वहां कितने घने जंगल थे। वाम शासन के तैंतीस साल के राज में अधिकतर जंगल छिन्न भिन्न हो गये। संरक्षित जंगल इलाकों में ठेकेदारों से वन-विनाश कराया गया। जो जंगल बचा रह गया, उन पर भी जंगलपुत्रों का अधिकार नहीं रह गया। अरण्यजीवी अरण्य को मां मानते हैं। जंगल से ही लकड़ी, पत्ते, फल, मधु आदि संग्रह कर वे सदियों से जीवन-यापन करते आ रहे थे।
लेकिन अब माओवादियों का भय दिखाकर जंगलपुत्रों को जंगल में ही प्रवेश नहीं करने दिया जाता। इधर साल भर से लालगढ़ पर जो बर्बर अत्याचार हो रहा है, वैसा बंगाल ने निकट अतीत में कभी नहीं देखा। हाल में मारे गये कथित माओवादियों में तीन युवतियां थीं। उनकी लाशें बांस पर लटकाकर ले जाने का अधिकार सुरक्षा बलों को किसने दिया? मैं पूछना चाहती हूं कि बुद्धदेव और चिदंबरम की अशुभ जोड़ी आखिर क्या प्रमाणित करना चाहती है? बुद्धदेव व चिदंबरम क्या लालगढ़ को लालमोहन टुडु बना देना चाहते हैं? लालमोहन टुडु की तरह 56 आदिवासियों को लालगढ़ में सुरक्षा बलों और माकपा की हर्मद वाहिनी ने मार गिराया।
इस खून-खराबे के लिए मैं गृह मंत्री पी चिदंबरम को दोषी मानती हूं। वह कॉरपोरेट घरानों की तरफदारी कर रहे हैं। वह लालगढ़वासियों से इसीलिए वार्ता नहीं करना चाहते, क्योंकि तब कॉरपोरेट घराने के साथ हुए करार का उन्हें खुलासा करना पड़ेगा। इसलिए मैं वार्ता के पक्ष में हूं। लालगढ़ में माकपा की सशस्त्र वाहिनी और पुलिस वाहिनी की बर्बरता अब असह्य हो उठी है। इसीलिए लालगढ़ से अविलंब सुरक्षा बलों को हटाना चाहिए और यूएपीए नामक काला कानून तत्काल रद्द किया जाना चाहिए। बुद्धदेव और चिदंबरम को फौरन लालगढ़वासियों से बातचीत करनी चाहिए। दूसरा कोई तरीका नहीं है। मैं यह भी मानती हूं कि लालगढ़ में जो बर्बरता चल रही है, उसके खिलाफ समवेत प्रतिवाद होना चाहिए।
मैं लालगढ़ को लेकर तत्काल पदयात्रा निकाले जाने का आह्वान करती हूं। मैं यह देखकर विस्मित हूं कि जिन्होंने मेरे साथ मिलकर ‘परिवर्तन चाहिए’ का नारा दिया था, वे भी लालगढ़ के सवाल पर प्रतिवाद नहीं कर रहे। ममता बनर्जी क्यों खामोश हैं? इससे जनता में गलत संदेश जा रहा है। हर क्षेत्र में बुद्धदेव विफल रहे, इसीलिए उनकी सरकार के परिवर्तन की मांग हमने की थी।
ममता से बंगाल की जनता को बड़ी उम्मीदें हैं। कहीं-कहीं वह उम्मीदों पर खरा भी उतर रही हैं। रेल बस्तियों के बाशिंदों को वह निःशुल्क मकान बनाकर दे रही हैं। पंचायतों की तरह कई पालिकाओं पर भी उनकी पार्टी का बोर्ड बना है। ममता को हर जगह कड़ी निगरानी रखनी होगी कि काम ठीक ढंग से हो रहा है या नहीं? उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि बुद्धदेव ने जनता को लंगड़ी मारी, तो जनता क्या जवाब दे रही है? ममता की पार्टी में भी यदि जनता कोई खामी देखेगी, तो उसकी आलोचना सहने के लिए उन्हें तैयार रहना चाहिए। खामी किसी की हो, उसका नतीजा उन्हें भोगना ही होगा। (अमर उजाला से साभार)

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