क्या हमारा लोकतंत्र आदिवासियों को न्याय देगा?

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/23/2010 01:00:00 PM

ऑपरेशन ग्रीन हंट की आंच भले दिल्ली-मुंबई में बैठे लोगों तक नहीं पहुंच रही हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह आग किसी को झुलसा नहीं रही. देश के संसाधनों और जमीन को छीन कर देशी-विदेशी कंपनियों के हवाले करने के लिए और इसका विरोध करनेवाली जनता का प्रतिरोध तोड़ने के लिए चलाए जा रहे इस ऑपरेशन ने किसी तरह देश के सबसे गरीब लोगों के जीवन को नारकीय बना दिया है और किस तरह यह लोकतंत्र की चमकदार लेकिन भ्रामक बातों की कलई खोल रहा है, ग्लैडसन डुंगडुंग की यह खोजपरक रिपोर्ट. मूलतः अंगरेजी में प्रकाशित.

13 जून 2010 को झारखंड के 12 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की यात्रा सूर्योदय से पहले ही शुरू हो गयी थी। हमने सुना था कि लातेहार के बरवाडीह प्रखंड के लादी गांव की एक खरवार आदिवासी महिला, पुलिस और माओवादियों के बीच हुई मुठभेड़ की शिकार हो गयी। उस महिला का नाम जसिंता था। वह सिर्फ 25 साल की थी। गांव में अपने पति और तीन छोटे-छोटे बच्चों के साथ खुशहाल जिंदगी बिता रही थी इसलिए हम घटना की हकीकत जानना चाहते थे। हम जानना चाहते थे कि क्या वह माओवादी थी?

सबसे महत्वपूर्ण बात जो हम जानना चाहते थे, वह यह था कि किस परिस्थिति में सरकारी बंदूक ने उससे जीने का हक छीन लिया और सूर्योदय से पहले ही उसके तीन छोटे-छोटे बच्चों के जीवन को अंधेरे में डाल दिया गया? हम यह भी जानना चाहते थे कि इस अपराध के बाद राज्य की क्या भूमिका है? और निश्चित तौर पर हम यह भी जानना चाहते थे कि क्या जसिंता के तीन बच्चे हमारे बहादुर जवानों के बच्चों के तरह ही मासूम हैं?

सूर्योदय होते ही हमारे फैक्‍ट फाइडिंग मिशन का चारपहिया घूमना शुरू हो गया। जेठ की दोपहरी में हमलोग चिदंबरम के ‘रेड कॉरिडोर’ में घूमते रहे। शायद यहां के आदिवासियों ने ‘रेड कॉरिडोर’ का नाम भी नहीं सुना होगा और निश्चित तौर पर वे इस क्षेत्र को ‘रेड कॉरिडोर’ की जगह ‘आदिवासी कॉरिडोर’ कहना पसंद करेंगे। जो भी हो, इतना घूमने के बाद भी हम लोगों ने माओवादियों को नहीं देखा। लेकिन हमने जला हुआ जंगल, पेड़ और पतियां देखी। माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन चलाते समय अर्द्धसैनिक बलों ने हजारों एकड़ जंगल को जला दिया है। शायद वे माओवादियों का शिकार तो नहीं कर पाये होंगे, लेकिन उन्होंन खुबसूरत पौधे, जड़ी-बूटी, जंगली जानवर, पक्षी और निरीह कीट-फतंगों को जलाकर राख कर दिया है। उन्होंने जंगली जानवर, पक्षी और हजारों कीट-फतंगों का घर जला डाला है। अगर यही काम यहां के आदिवासी करते तो निश्चित तौर पर वन विभाग उनके खिलाफ वन संरक्षण अधिनियम 1980 और वन्यजीवन संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत कार्रवाई करता।

सात घंटे की थकान भरी लंबी यात्रा के बाद हमलोग लादी गांव पहुंचे। जो लातेहार जिला मुख्यालय से 60 किलोमीटर और बरवाडीह प्रखंड मुख्यालय से 22 किलोमीटर की दूरी पर जंगल के बीच में स्थित है। लादी गांव दरअसल खरवार बहुल गांव है। इस गांव में 83 परिवार रहते हैं, जिसमें 58 परिवार खेरवार, दो परिवार उरांव, 11 परिवार पराहिया, 10 परिवार कोरवा, एक परिवार लोहरा और एक परिवार साव है। इस गांव की जनसंख्या लगभग 400 है। गांव की अर्थव्यवस्था कृषि और वन पर आधारित है, जो पूरी तरह मानसून पर निर्भर करती है। यहां के खरवार समुदाय की दूसरा महत्वपूर्ण पारंपरिक पेशा पत्थर तोड़ना है, जिससे प्रति परिवार को रोज लगभग 80 रुपये तक की आमदनी होती है। यद्यपि गांव के लोग अपने कामों में व्यस्त थे लेकिन गांव में पूरा सन्‍नाटा पसरा हुआ था। ऐसा महसूस हो रहा था कि पूरा गांव खाली है। गांव में किसी के चेहरा पर मुस्कान नहीं थी। उनके चेहरे पर सिर्फ शोक, डर, भय, अनिश्चितता और क्रोध झलक रहा था।

हमलोग 28 वर्षीय जयराम सिंह के घर गये, जिसकी पत्नी जसिंता की गोली लगने से 27 अप्रैल को मौत हो गयी थी। हम मिट्टी, लकड़ी और खपड़े से बने एक सुंदर लाल रंग से सुसज्जित घर में घुसे। घर का वातावरण शोक, पीड़ा और क्रोध से भरा पड़ा था। परिवार के सदस्य चुप थे लेकिन शोक, दुःख, पीड़ा, भय और क्रोध उनके चेहरे पर झलक रही थी। हमें खटिया पर बैठने को कहा गया। कुछ समय के बाद जयराम सिंह अपने दो बच्चे – पांच साल की अमृता और तीन साल के सूचित के साथ हमारे सामने आया। जयराम बोलने की स्थिति में नहीं था। वह अभी भी अपनी पत्नी को खोने की पीड़ा से उबर नहीं पाया था। जब भी कोई उसे उस घटना के बारे में पूछता, वह रोने लगता। वह वन विभाग का एक अस्थायी कार्मचारी है, जिसकी वजह से जब उसके घर में घटना घटी, तब वह गारू नाम की जगह पर ड्यूटी पर बजा रहा था।

जयराम ने हमें बताया कि उसके तीन बच्चे भी हैं। हमने उनके दो बच्चों को देखा, जिनके चहरे पर निराशा छायी हुई थी। हम एक और बच्ची को भी देखना चाहते थे, जो सिर्फ एक साल की है। उसका नाम विभा कुमारी है। वह दूधपीती बच्ची है। मां के मारे जाने के बाद वह अपनी दादी की गोद में ही खेलती रहती है। तीनों बच्चे और उनके पिता की हम तस्वीर लेना चाहते थे, इसलिए हमने विभा को भी हमारे पास लाने को कहा। लेकिन वह हमें देखते ही रोने लगी। वह अपने पिता की गोद में बैठने के बाद भी रोती रही। शायद उसे यह लग रहा होगा कि हम उसे उसके परिवार से छीनने के लिए आये हैं, जिस तरह से उसे उसकी मां को छीन लिया गया। मैं उसको देख कर व्‍यथित था। मैंने उसे रोते हुए देखा। वह चुप ही नहीं होना चाहती थी। राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर उसका सुनहरा बचपन छीन लिया गया था।

जयराम सिंह का छोटा भाई विश्राम सिंह, जो घटना के समय घर में मौजूद था, ने हमें घटना के बारे में बताया कि 27 अप्रैल को ‘मिट्टी के लाल घर’ में क्या हुआ था। शाम के लगभग साढ़े सात बज रहे थे। गांव के सभी लोग खाना खाने के बाद सोने की तैयारी में जुटे थे। उसी समय गांव में गोली चलने की आवाज सुनाई दी। कुछ समय के बाद पुलिस ने ग्राम प्रधान कामेश्वर सिंह के घर को घेर लिया। उसके बाद पुलिस वालों ने चिल्‍ला कर कहा कि घर से बाहर निकलो, नहीं तो घर में आग लगा देंगे। इस बात को सुनकर कामेश्‍वर सिंह का परिवार घबरा कर घर से बाहर निकला। कामेश्‍वर सिंह और उसके बड़े बेटे जयराम सिंह वन विभाग में अस्थायी कार्मचारी हैं, जिसकी वजह से वे घर पर नहीं थे। पुलिस की आवाज सुनकर कामेश्‍वर सिंह का छोटा बेटा विश्राम सिंह (18) दरवाजा खोलकर बाहर निकला। बाहर निकलते ही जवानों ने उसे पकड़कर पीठ के पीछे दोनों हाथ बांध कर उस पर बंदूक तान दिया।

उसके बाद पुलिस के जवान ने विश्राम सिंह की भाभी जसिंता से कहा कि घर के अंदर और कौन है? इस पर उन्होंने उनके चरवाहा पुरन सिंह (62) के अंदर सोने की बात कही। पुलिस ने उसे उठाकर बाहर लाने को कहा। जब जसिंता चरवाहा को लेकर बाहर आ रही थी, तो पुलिस ने उसके ऊपर गोली दाग दी। गोली उसके सीने में लगी और वह वहीं ढेर हो गयी। पुलिस ने फिर गोली चलायी, जो पुरन सिंह के हाथ में लगी। वह घायल हो गया। लाश देखकर परिवार के सदस्य रोने-चिल्‍लाने लगे तो पुलिस ने कहा कि चुप रहो, नहीं तो सबको गोली मार देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि तुम लोग माओवादियों को खाना खिलाते हो, इसलिए तुम्हारे साथ ऐसा हो रहा है। घटना के बाद पुलिस तुरंत लाश, घायल पूरन सिंह समेत पूरे परिवार को उठाकर ले गयी और परिवार वालों को धमकी देते हुए कहा कि लोगों को यही बताना है कि जसिंता मुठभेड़ में मारी गयी और प्रदर्शन वगैरह नहीं करना है।

गांव वालों को यह पता नहीं था कि लाश कहां है, इसलिए उन्होंने 28 अप्रैल 2010 को महुआटांड-डालटेनगंज मुख्य सड़क को जाम कर दिया। इसके बाद सदर अस्पताल, लातेहार में लाश का पोस्टमॉर्टम होने के बाद पुलिस ने विश्राम सिंह से सादा कागज पर हस्ताक्षर करवाने के बाद लाश को अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को सौंप दिया। विश्राम सिंह चार हजार रुपये पर भाड़ा में लेकर गाड़ी से लाश को गांव लाया। उसके बाद बरवाडीह के सीओ ने पारिवारिक लाभ योजना के तहत परिवार को 10 हजार रुपये दिया। 30 अप्रैल 2010 को मृतक के परिजन और गांव वाले जसिंता की हत्या के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने के लिए बरवाडीह थाना गये लेकिन वहां के थाना प्रभारी रतनलाल साहा ने मुकदमा दर्ज नहीं किया। सिर्फ डायरी में सूचना दर्ज की और उन्हें डरा-धमका कर घर वापस भेज दिया।

लेकिन गांव वालों के लगातार विरोध के बाद प्रशासन को मृतक के परिजनों को मुआवजे के रूप में तीन लाख रुपये देने की घोषणा करनी पड़ी। पुलिस ने परिजनों को मुआवजा राशि देने के लिए एक स्थानीय पत्रकार मनोज विश्वकर्मा को मध्यस्‍थता के काम में लगाया। 14 मई 2010 को मनोज विश्वकर्मा मृतक के पति जयराम सिंह को लेकर बरवाडीह थाना गया। थाना प्रभारी वीरेंद्र राम ने जयराम सिंह को एक सादा कागज पर हस्तक्षर कर 90 हजार रुपये का चेक लेने को कहा। जब जयराम सिंह ने सादा कागज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया तो थाना प्रभारी ने उसे खाली हाथ गांव वापस भेज दिया। यह हस्यास्पद ही है कि एक तरफ जयराम सिंह से उसकी पत्नी छीन ली गयी, उसके छोटे-छोटे बच्चों को रोते-बिलखते छोड़ दिया गया और उनके मिलने वाले मुआवजा को भी हड़पने का पूरा प्रयास चल रहा है। नीचे से ऊपर तक दौड़ने के बावजूद गुनहगारों को दंडित नहीं किया गया है।

ग्रामप्रधान कामेश्‍वर सिंह का चरवाहा पूरन सिंह इस गोली कांड में विकलांग हो गया है और अभी भी लातेहार सदर अस्‍पताल में इलाज करा रहा है। वहां सशस्त्र बल की निगरानी में उसे रखा गया है। लातेहार के सिविल सर्जन अरुण तिग्गा को यह जानकारी ही नहीं थी कि पूरन सिंह किस तरह का मरीज है। पूरन सिंह की बातों से भी स्पष्ट है कि यह घटना मुठभेड़ का परिणाम नहीं है। लेकिन बरवाडीह थाने की पुलिस ने इसे मुठभेड़ करार देने के लिए रातदिन एक कर दिया है। पुलिस के अनुसार जसिंता की हत्या माओवादियों की गोली से हुई है।

मृतक के घर का मुआयना करने से स्पष्ट है कि उसके घर में घुसने के लिए एक ही तरफ से दरवाजा है। घर की दीवार में लगी दो गोलियों के निशान हैं, जो प्रवेश द्वार की ओर से चलायी गयी है। मुठभेड़ की स्थिति में घर के अंदर से माओवादियों द्वारा दरवाजे की तरह गोली चलायी गयी होती। जसिंता देवी के मारे जाने के बाद पुलिस घर के अंदर घुसी और छानबीन किया, लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला। अगर घर के अंदर माओवादी होते तो उन्हें पुलिस पकड़ लेती क्योंकि घर में दूसरा दरवाजा नहीं होने की वजह से उनके भागने की कोई संभावना नहीं बनती है। घटना स्थल का मुआयना करने, मृतक के परिजन, चरवाहा और ग्रामीणों की बात से यह स्पष्ट है कि जसिंता की हत्या मुठभेड़ में नहीं बल्कि पुलिस द्वारा की गयी हत्या है। लेकिन बरवाडीह की पुलिस यह कतई मानने को तैयार नहीं है। पुलिस ने हत्या के खिलाफ मुकदमा तो दर्ज नहीं ही किया लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी परिजनों को नहीं दिया। जयराम सिंह के पास उसकी पत्नी की हत्या से संबंधित कोई कागज नहीं है। यहां आज भी पुलिस अत्याचार जारी है। थाना जाने पर दहाड़ना, गांव वालों को प्रताड़ित करना, किसी भी समय घरों में घुसना, मार-पीट गाली-गलौज करना और किसी को भी पकड़कर ले जाना।

इस हत्याकांड के बाद जयराम सिंह एक पिता के साथ-साथ मां की भूमिका भी अदा कर रहा है। उसकी सबसे छोटी बेटी विभा गाय के दूध से जिंदा है। वह सिर्फ इतना कहता है कि उसको न्याय चाहिए। वह अपनी पत्नी के हत्यारों को दंडित करवाना चाहता है। उसके तीन बच्चे हैं, इसलिए वह सरकार से 5 लाख रुपये मुआवजा, एक सरकारी नौकरी और उनके बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा की मांग कर रहा है। लेकिन उसकी पीड़ा को सुनने वाला कोई नहीं है। यह भी एक बड़ा सवाल है कि जब हमारे बहादुर जवान मारे जाते हैं, तो उस पर मीडिया में बहस का दौर चलता है लेकिन विभा, सूचित और अमृता के लिए मीडिया के लोग बहस क्यों नहीं कर रहे हैं? क्यों वो खुबसूरत चेहरे टेलेविजन चैनलों में निर्दोष आदिवासियों के बच्चों के अधिकारों की बात नहीं करते हैं जब वे सुरक्षा बलों की गोलियों से अनाथ बना लिये जाते हैं? क्या ये बच्चे निर्दोष नहीं हैं? क्यों लोग उन निरीह आदिवासियों की बातों पर विश्वास नहीं करते हैं, जो रोज सुरक्षा बलों की गोली, अत्याचार और अन्याय के शिकार हो रहे हैं? क्यों यह परिस्थिति बनी हुई है कि लोगों के अधिकारों को छीनने वाले सुरक्षाकर्मियों की बातों पर ही हमेशा भरोसा किया जाता है? क्या यही लोकतंत्र है?

मिट्टी के लाल घर की पीड़ा, विभा का रोना-बिलखना और पुलिस अधिकारी का वही रौब। यह सब कुछ देखने और सुनने के बाद हम लोग रेड कॉरिडोर से वापस आ गये। लेकिन हमारा कंधा खरवार आदिवासियों के दुःख, पीड़ा और अन्याय को देखकर बोझिल हो गया था। पुलिस जवानों के अमानवीय कृत्‍य देखकर हमारा सिर शर्म से झुक गया था और विभा की रुलाई ने हमें अत्‍यधिक सोचने को मजबूर कर दिया। मैं मां-बाप को खोने का दुःख, दर्द और पीड़ा को समझ सकता हूं। लेकिन यहां बात बहुत ही अलग है। जब मेरे माता-पिता की हत्या हुई थी, उस समय मैं उस दुःख, दर्द और पीड़ा को समझने और सहने लायक था। लेकिन जसिंता के बच्चे बहुत छोटे हैं। विशेष तौर पर विभा के बारे में क्या कहा जा सकता है। उसको तो यह भी पता नहीं है कि उसकी मां कहां गयी, उसके साथ क्या हुआ ओर क्यों हुआ?

विभा अभी भी अपनी मां के आने की बाट जोहती है। वह सिर्फ मां की खोज में रोती है। दूध पीने की चाहत मे बिलखती है और मां की गोद में सोने के लिए तरसती है। क्या वह हमारे देश के बहादुर जवानों के बच्चों की तरह मासूम नही है? क्या हम सोच सकते हैं कि उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी, जब वह यह जान जाएगी कि हमारे बहादुर जवानों ने उसकी मां को घर में घुसकर गोली मार दी? उसका गुस्सा किस हद तक बढ़ जाएगा, जब वह यह जान जाएगी कि उसके मां के हत्यारे सरकार से सहायता मिलने वाली राशि को भी गटकना चाहते थे? क्या उसके क्रोध की सीमा नहीं टूट जाएगी, जब वह यह जान जाएगी कि उसकी मां के हत्यारों ने उसके परिवार और गांववालों पर माओवादी का कलंक लगा कर उन पर जम कर अत्याचार किया? क्या हम अपने बहादुर जवानों को उनके किये की सजा देंगे या विभा, सूचित और अमृता जैसे हजारों निर्दोष बच्‍चों को रोते, विलखते व तड़पते छोड़कर उनकी कब्रों पर शांति की खोज करेंगे? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारा लोकतंत्र आदिवासियों को न्याय देगा? क्या वे अपने अधिकार का स्वाद चखेंगे? क्या उनके साथ कभी इंसान सा व्यवहार किया जाएगा? विभा का लगातार रोना हमें खतरे की घंटी से आगाह तो कर ही रहा है, साथ ही एक नयी दिशा की ओर इशारा भी कर रहा है, लेकिन क्या हम उसे समझना चाहते हैं?

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ क्या हमारा लोकतंत्र आदिवासियों को न्याय देगा? ”

  2. By दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi on June 23, 2010 at 10:37 PM

    पुलिस के ऐसे काम तो माओवादियों को मजबूत कर देंगे।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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