हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

अभी तो शब्दों को उँगली पकड़ चलने का अभ्यास करा रहा हूँ

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/25/2010 07:32:00 PM

हम इन्हें पहचानते हैं. इससे पहले उनकी शानदार कविताएं पढ़ चुके हैं. उनके साथ हम कुछ संबल देती कविताओं से संवाद करते हैं, हम उनके जरिए जानते हैं कि जंगल में सपने देखना कितना खतरनाक है, लेकिन यह सारी दुनिया की सांसों और सपनों के लिए कितना जरूरी है, उनकी कविताएं हमें बताती हैं कि शब्दों नहीं, सिर्फ जमीन पर हो रहे बदलाव ही हमें आश्वस्त कर सकते हैं. उनकी हर कविता की तरह यह भी रणेंद्र की कविता है, जहां एक-एक शब्द निरंतर युद्ध है

अभी तो
रणेन्द्र

शब्द सहेजने की कला
अर्थ की चमक, ध्वनि का सौन्दर्य
पंक्तियों में उनकी सही समुचित जगह
अष्टावक्र व्याकरण की दुरूह साधना
शास्त्रीय भाषा बरतने का शऊर
इस जीवन में तो कठिन

जीवन ही ठीक से जान लूँ अबकी बार

जीवन जिनके सबसे खालिस, सबसे सच्चे, पाक-साफ, अनछुए
श्रमजल में पल-पल नहा कर निखरते
अभी तो,
उनकी ही जगह
इन पंक्तियों में तलाशने को व्यग्र हूँ

अभी तो,
हत्यारे की हंसी से झरते हरसिंगार
की मादकता से मताए मीडिया के
आठों पहर शोर से गूँजता दिगन्त
हमें सूई की नोंक भर अवकाश देना नहीं चाहता

अभी तो,
राजपथ की
एक-एक ईंच सौन्दर्य सहेजने
और बरतने की अद्‌भुत दमक से
चौंधियायी हुई हैं हमारी आँखें

अभी तो,
राजधानी के लाल सुर्ख होंठों के लरजने भर से
असंख्य जीवन, पंक्तियों से दूर छिटके जा रहे हैं

अभी तो,
जंगलों, पहाड़ों और खेतों को
एक आभासी कुरूक्षेत्र बनाने की तैयारी जोर पकड़ रही है

अभी तो,
राजपरिवारों और सुखयात क्षत्रिय कुलकों के नहीं
वही भूमिहीन, लघु-सीमान्त किसानों के बेटों को
अलग-अलग रंग की वर्दियाँ पहना कर
एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है
लहू जो बह रहा है
उससे बस चन्द जोड़े होंठ टहटह हो रहे हैं

अभी तो,
बस्तर की इन्द्रावती नदी पार कर गोदावरी की ओर बढ़ती
लम्बी सरल विरल काली रेखा है
जिसमें मुरिया, महारा, भैतरा, गड़बा, कोंड, गोंड
और महाश्वेता की हजारों-हजार द्रौपदी संताल हैं


अभी तो,
जीवन सहेजने का हाहाकार है
बूढ़े सास-ससुर और चिरई-चुनमुन शिशुओं पर
फटे आँचल की छाँह है
जिसका एक टुकड़ा पति की छेद हुई छाती में
फँस कर छूट गया है

अभी तो,
तीन दिन-तीन रात अनवरत चलने से
तुम्बे से सूज गए पैरों की चीत्कार है
परसों दोपहर को निगले गए
मड़ुए की रोटी की रिक्तता है
फटी गमछी और मैली धोती के टुकड़े
बूढ़ों की फटी बिवाइयों के बहते खून रोकने में असमर्थ हैं
निढ़ाल होती देह है
किन्तु पिछुआती बारूदी गंध
गोदावरी पार ठेले जा रही है

अभी तो,
कविता से क्या-क्या उम्मीदे लगाये बैठा हूँ
वह गेहूँ की मोटी पुष्ट रोटी क्यों नही हो सकती
लथपथ तलवों के लिए मलहम
सूजे पैरों के लिए गर्म सरसों का तेल
और संजीवनी बूटी

अभी तो,
चाहता हूँ कविता द्रौपदी संताल की
घायल छातियों में लहूका सोता बन कर उतरे
और दूध की धार भी
ताकि नन्हे शिशु तो हुलस सकें

लेकिन सौन्दर्य के साधक, कलावन्त, विलायतपलट
सहेजना और बरतना ज्यादा बेहतर जानते हैं
सुचिन्तित-सुव्यवस्थित है शास्त्रीयता की परम्परा
अबाध रही है इतिहास में उनकी आवाजाही

अभी तो,
हमारी मासूम कोशिश है
कुचैले शब्दों की ढ़ाल ले
इतिहास के आभिजात्य पन्नों में
बेधड़क दाखिल हो जाएँ
द्रौपदी संताल, सीके जानू, सत्यभामा शउरा
इरोम शर्मिला, दयामनी बारला और ... और ...

गोरे पन्ने थोड़े सँवला जाएँ

अभी तो,
शब्दों को
रक्तरंजित पदचिन्हों पर थरथराते पैर रख
उँगली पकड़ चलने का अभ्यास करा रहा हूँ

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  1. 5 टिप्पणियां: Responses to “ अभी तो शब्दों को उँगली पकड़ चलने का अभ्यास करा रहा हूँ ”

  2. By रजनीश कुमार on June 30, 2010 at 11:00 PM

    जिस ग्लोबल गांव के देवता नामक उपन्यास को पिछले एक दशक की बेहतरीन रचनाओं के रूप में दो लोगों ने तहलका के विशेषांक में चुना है, लगता है कि शायद आप वहीं रणेंद्र हैं. अच्छा लिखते हैं आप. आपकी और कविताएं भी हाशिया पर पढ़ीं. आपमें एक खास बात मुझे यह लगी कि लोग आज आदिवासियों की पीड़ा की बातें तो बहुत करते हैं परंतु कोई उनके संघर्ष को दर्ज नहीं करता. आपने यह साहस किया है. सलाम आपको.

  3. By Anonymous on June 30, 2010 at 11:05 PM

    Many many thanks for this post.

  4. By अतुल शाही on July 2, 2010 at 12:08 PM

    इस दौर में जैसी कविताएं लिखने का चलन चल गया है, उसके कारण कविताएं पढ़ने की इच्छा मर गई है. विशेषतया जिनके ज्ञान का उदय हो चुका है या जो भारत भवन प्रायोजित कवि हैं (मेरी विनम्र इच्छा है कि इस वाक्य को इसके व्यापक अर्थ में भी लिया जाए) उनको पढ़ने के बाद तो यह धारणा पक्की हो जाती है. लेकिन रणेंद्र जी की कविता अचानक सारी संभावनाएं लेकर उपस्थित हो गई है.

    हार्दिक बधाई. आपने कोई संग्रह भी निकाला है क्या? कृपया जानकारी दें.

  5. By सचिन .......... on July 2, 2010 at 1:42 PM

    पिछले दिनों झारखंड प्रवास के दिनों यह कविता सुनी थी। मार्फत अश्विनी पंकज।
    रणेन्द्र जी की यह कविता पहली बार में मासूमियत भरी तोतली जुबान से निकला जनपक्षीय बयान लगती है। लेकिन ऐसा है नहीं। हैरत है कि सुधिजन इतनी जल्दी झांसों में आ गये। यह बात रणेन्द्र जी भी जानते हैं कि "हत्यारे की हंसी से झरते हरसिंगार की मादकता से मताये मीडिया के आठों पहर शोर से गूंजता दिगंत हमें सूई की नोंक भर अवकाश देना नहीं चाहता", इस शोर को बढाने में यह कविता भी मददगार होगी। ऐसा मेरा यकीन है।
    कविता के साथ दिक्कत यही है कि इसे गुपडा नहीं जा सकता। कि कौर बनाया और समा गई अतडियों में। तीन पाठ के बाद यह कविता अंततः छद्म शाब्दिक विन्यास भर रह जाती है।
    क्यों कवि "अष्टावक्र व्याकरण की दुरूह साधना" करना चाहता है? जबकि "जंगल-जंगल आग लगी है और बच्चा-बच्चा युद्धरत" है। लडाई जब सीधी है और निशाने पर कविता में आये नाम ही हैं, तो क्यों कवि जीवन को जानने की ओर बढा जा रहा है। कहीं यह चुपके से पीछे की ओर जाने की कला तो नहीं जो इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी को अदबी बाप मानने वाले बशीर बद्र ने आजमाई थी (किसने जलाईं बस्तियां बाजार क्यों जले मैं चांद पर गया था मुझे कुछ खबर नहीं)
    शास्त्रीय भाषा बरतने का शऊर इस जीवन में कठिन मानने वाला कवि एक एक मिसरे को इस सुसंगत ढंग से साधता है कि मजाल है एक बार भी लय गायब हुई हो। राजपथ को निहारने का मौका दिलाने वाली सरकारी सेवा में लय और ताल का अभिसार ही दिखाई देगा रणेन्द्र जी। लडाई के मैदान में खडे बिरसाओं, सिद्धू-कानूओं और जयपाल सिंह मुंडाओं को जगह नहीं मिलेगी।
    कवि झारखंड में रहते हुए मुरिया, महारा, भैतरा, गड़बा समुदायों का जिक्र कर रहा है तो व्याकरण से पहले अपने लोगों की रिहायश देखनी चाहिए।
    अगर कविता से उम्मीदे लगाये बैठे ही हैं तो उसे गेहूं की पुष्ट रोटी नहीं भात ही रहने दीजिये। रोटी बनाने लायक वक्त युद्ध नहीं देता। और हां लथपथ तलवों पर मलहम लगाना ही है तो सरसों का मत लगाइये आपके आसपास करंज ज्यादा आसानी से उपलब्ध है। जो पंचपरगना की जमीन पर पडते पैरों से हमवार भी है।
    और अंत में: इस मैदान को "आभासी कुरुक्षेत्र" कहकर खारिज न करें। उदाहरण लेते हुए बारबार जिस महाभारतीय परंपरा की नजर दौडाते हैं उससे तुलना तो न ही करें, क्योंकि डोम्बारी की लडाई में रथी नहीं निरीह जनता जैसे तैसे जिंदा रहने के हक के लिए युद्धरत है।

    रणेन्द्र जी
    वह 47 के पहले था
    कि दूर देश से आये दुर्दांत हत्यारों ने
    कंपनी में भरती किये जवान
    इसी देश के
    और थमा दिये उन्हें कारतूस बंदूकों समेत, जिनमें थीं संगीनें
    बंदूकों के निशाने पर थे
    इसी देश के आमजन
    जो कराह रहे थे कंपनी राज में

    यह 2010 है
    जहां-जहां थी कंपनी वहां-वहां है केंद्र
    बाकी सब जस का तस
    और अपने ही खिलाफ हम
    आप किस तरफ हैं जनाब?

    सादर
    सचिन

  6. By Anonymous on July 3, 2010 at 10:58 AM

    सचिन श्रीवास्तव की टिप्पणी पर टिप्पणी

     सचिन श्रीवास्तव की टिप्पणी से हैरत से भर गया । रणेन्द्र की ‘अभी तो’ कविता को तीन बार पढ़कर भी वह कविता नहीं समझ पाये तो धन्य है। इस कविता को तीन बार पढ़ा जाए या तीस बार, यह कविता जन-विरोधी कैसे हो सकती है यह बात समझ में नहीं आई ?
     कविता अपनी संरचना में शब्द-विन्यास ही तो होती है अब छद्म है या नहीं यह देखने वाली की दृष्टि तय करती है।
     सचिन को ताज्जुब है कि झारखंड में रहने वाला एक कवि आखिर अन्य राज्यों की जनजातियों पर कैसे लिख रहा है। साहित्य में ऐसा इलाकावाद कहां से आ गया मेरे भाई। रणेंद्र को जानने वालों को जनजातीय जीवन से जुड़ाव की बात अच्छी तरह मालूम है। राजकमल से प्रकाशित इनसाइक्लोपीडिया से इस बाबत उनकी गंभीरता भी सर्वविदित है। फिर, रणेन्द्र जी की कहानियाँ विशेषकर ‘वह बस धूल थी’ या ‘चम्पा गाछ, अजगर और तालियाँ’ झारखण्ड की और यहाँ के आदिवासियों की पीड़ा और संघर्ष का बयान करती रही हैं । यह उनकी रचनाओं का पाठक अच्छी तरह जानता है। हाल ही में उनका उपन्यास ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ सबसे उपेक्षित और हजार वर्षों से पीड़ित असुर जनजाति की मुकम्मल दास्ताँ बयाँ करता है।
     उनके काव्य-संग्रह ‘थोड़ा सा स्त्री होना चाहता हूँ’ में दर्जन भर कविताएँ झारखण्ड के आवाम, आदिवासी-गैर-आदिवासी की पीड़ा को उकेरती हैं । खासकर ‘किशना बिरहोर की स्मृति’, ‘अवसान बेला में’ ।
     कविता नारा नहीं हुआ करती । कविता अगर है तो अपने कथ्य के आधार पर शिल्प ग्रहण करेगी अगर ‘अभी तो’ में लय है और वह पठनीय है तो यह इस कविता का दोष कैसे हो गया ? यह बात कुछ हजम नहीं हुई । क्या नारों या अखबारी कतरन में लिखी गयी कविता ही कविता मानी जायेगी?
     रणेन्द्र की ‘सलवा जुड़ूम’ शीर्षक की छह कविताओं के पढ़ने के बाद यह तय करना आसान होगा कि यह कवि किस ओर खड़ा है ? यह कविता ‘हाशिया’ पर उपलब्ध है । सचिन जी को यह कविता पढ़नी चाहिए ।
     अगर अभी तो कविता ‘बस्तर’ में आपरेशन ग्रीनहंट की बर्बरता के दबाव से करीबन दो लाख लोगों के आन्ध्रप्रदेश की ओर पलायन का जिक्र कर रही है, इन्द्रावती और गोदावरी नदियों का जिक्र कर रही है तो वहाँ तो उसी इलाके के आदिवासियों का जिक्र होगा पंचपरगना के लोगों का नहीं ।
     जहाँ तक मुझे लगता है कि ‘ग्रीन हंट’ के नाम पर जो इलाकों को ‘वधस्थली’ बनाने पर सत्ता तुली है किन्तु उसे मीडिया के माध्यम से न्यायपूर्ण युद्ध साबित कर रही है उसी विडम्बना को ‘आभासी कुरूक्षेत्र’ शब्दावली के माध्यम से कवि रेखांकित करना चाह रहा है । दूसरी ओर कविता में वर्णित ‘द्रौपदी संताल’ महाभारत की पात्रा नहीं बल्कि नक्सलबाड़ी के नायक ‘जंगल संताल’ की पत्नी हैं जिनकी शहादत पर महाश्वेता देवी की प्रसिद्ध कहानी ‘द्रौपदी’ है ।
     रोजी-रोटी कमाने के माध्यम से सचिन जी को चिढ़ है तो स्पष्ट लिखना चाहिए व्यंजना आदि का सहारा क्यों ले रहे हैं।
     दरअसल वर्तमान समय में हिन्दी कविता के नाम पर निरर्थक और भारी भरकम शब्दों का जमावड़ा देखने को मिल रहा है। ऐसे दौर में यह एक सार्थक कविता आई है। इसका खुले मन से स्वागत करना चाहिए । व्यक्तिगत विद्वेष, पेशा-चेहरे से नापसन्दी जाहिर करने के और भी तरीके हो सकते हैं।
    - अमित कुमार
    सोनारी, जमशेदपुर, झारखण्ड ।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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