हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बुद्धिजीवियों की यह भाषा नयी नहीं

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/23/2010 12:41:00 PM

अनिल चमड़िया

आखिर अरुंधती ने दंतेवाड़ा के जंगल से लौटकर ऐसा क्या लिखा और कहा कि उसे माओवादी हिंसा समर्थक और राष्ट्रद्रोही कहा जाने लगा? क्या उनका एहसास, “मेरे निकलने से एक दिन पहले मेरी मां ने कॉल किया। वह उंघते हुए बोली – मैं सोच रही थी कि देश को एक अदद क्रांति की जरूरत है…” बेमानी है? लेखक क्या करता है? पूरी ताकत से हर क्षण के अपने एहसास की ऐसी तस्वीर बनाना चाहता है कि किसी रंग की कोई सतह तक नहीं छूट पाये। वह एक विरोधाभासी स्थिति की तस्वीर उतारता है। जंगल के लोगों के साथ रहकर अरुंधती की बनायी वे तस्वीरें चुभती हैं? और साथ में जंगलों में जवान लड़कियों व लड़कों के कंधे पर बंदूक? अरुंधती की तस्वीरों के ज्यादा चुभने के कारण हैं। उनकी पृष्ठभूमि से जो प्रतिनिधि चेहरा बनता है और जिस समाज की वे तस्वीर उतारती हैं, उनके बीच एक खाई दिखती है। वह वीभत्सता के खून से भरी होती है। गांधी कहते थे कि एक आम भारतीय और एक खास के बीच पांच हजार गुना कमाई का फर्क है। माओवादी कहते हैं कि आजादी, लोकतंत्र, गांधीवाद, अहिंसा, संविधान, चुनाव, संसद, मीडिया, न्यायालय… इन सबकी मौजूदगी में एक आम भारतीय और दूसरे भारतीय के बीच एक लाख गुना से ज्यादा का फर्क पहुंच गया है। अरुंधती इसे लिखती हैं और अपने जो सूत्र बुनती हैं, वे सीधे चोट करते हैं। आदिवासियों का 99 प्रतिशत हिस्सा माओवादी नहीं है लेकिन माओवादियों में 99 प्रतिशत आदिवासी हैं। जितने तीखे और गहरे नजरिये से लेखक स्थितियों को देखता है, उसकी चोट उतनी ही परेशान करती है। वही हिम्मत कर सकता है कि चलो कुछ कहने के लिए मुझे जेल में डाल दो।

अरुंधती के माओवादियों और आदिवासियों के रिश्तों पर लिखने की सबसे तीखी प्रतिक्रिया अंग्रेजी के बुद्धिजीवियों ने की है। और उन्होंने, जो भारतीय भाषाओं में लगभग अंग्रेजी की तरह ही लिखते व सोचते हैं। भाषा का प्रश्न बड़ा प्रश्न है। क्या यही बात हिंदी और पंजाबी या दूसरी भाषाओं में लिखी जाती, तो इतनी तीखी प्रतिक्रिया होती? हिंदी में पिछले दिनों दो किताबें आयीं। तेलुगु में पी शंकर की लिखी हिंदी में पारनंदि निर्मला द्वारा अनूदित “यह जंगल हमारा है” शीर्षक से। अरुंधती के लिखे में तो इसकी झलक भर है। अरुंधती कथात्मक शैली में बताती है कि इन जंगलों में 1980 के आसपास माओवादियों के आने से पहले किस किस तरह के संगठन, संस्था और लोग आये। तेलुगु की किताब बताती है कि भूमि से वंचित हुए, स्वतंत्रता को खोने वाले, जंगल पर अधिकार को भी खोने वाले, यहां तक कि एक साधारण मनुष्य को मिलने वाले सम्मान भी खोने वाले, लूटखसोट करने वालों के औजार मात्र बन गये उन आदिवासियों के लिए एक मात्र क्रांतिकारी (माओवादी) ही सहारा बनकर खड़े हुए। 262 पृष्ठों में फैली कहानियां लोक और तंत्र को दो हिस्से में स्थापित करती हैं।

दूसरी किताब पंजाबी में आयी, जिसका हिंदी में अनुवाद महेंदर ने जंगलनामा के नाम से किया। जैसे अरुंधती जंगलों में गयी। पंजाबी लेखक सतनाम भी बैलाडिला शहर से जंगल में घुसा और कई दिनों तक रहा। अरुंधती लिखती हैं, “पीएलजीए का एक कॉमरेड नीलेश काफी तेजी से खाना पकाने वाली जगह की ओर दौड़ता हुआ आ रहा था। वह पास आया, तो मैंने देखा कि उसके ऊपर लाल चीटियों का पत्ते वाला एक घोंसला था। चीटिंयां उसके पूरे शरीर पर दौड़ रही थी और हाथ व गले में काट रही थी। नीलेश खुद भी हंस रहा था। कामरेड वेणु ने पूछा, क्या आपने कभी चीटियों की चटनी खायी है?” सतनाम पंजाबी में न केवल ऐसी उनकी जीवन दशा लिखते हैं बल्कि 160 पेज में जंगलनामा पूरा करते हैं, तो वहां अरुंधती और उसकी मां गूंजती सुनाई देती है। लेकिन पंजाबी में लिखे और हिंदी में अनूदित बेबाक बयानों पर प्रतिक्रिया बिरादराना राजनीतिक जमात में ही हुई। अभी हिंदी की जनपक्षधर चेतना इस समय को अंग्रेजी के सहारे अपने को व्यक्त करने के अवसर के रूप में देख रही है। इसीलिए अंग्रेजी में जो ऐसी बातें आती हैं, उसे हिंदी का बेचैन मन अपनी भाषा देने लगता है। सुना नहीं गया कि हिंदी की कोई जनपक्षधर सामग्री का अंग्रेजी मन अनुवाद करने के लिए बेचैन हो गया हो। अरुंधती अंग्रेजी में वही लिख रही हैं, जो हिंदी और पंजाबी की जमीनी चेतना महसूस कर रही है।

दरअसल सत्ता संरचना तब चौकन्नी हो जाती है कि उसकी बड़ी आधार भूमि में कोई सुगबुगाहट होने लगे। पी चिंदबरम बार बार कहते हैं कि माओवादियों से निपटने में सबसे ज्यादा आड़े बुद्धिजीवी आ रहे हैं। उन्हें आदिवासियों से निपटने में क्या वक्त लग सकता है? अब तक की पूरी सत्ता संरचना उनसे निपटती रही है और मध्यवर्ग को उनके हालात की खबर तक नहीं लगी। बुद्धिजीवी हथियार लेकर जंगलों में नहीं जा रहे हैं। एकाध बुद्धिजीवी केवल वहां के हालात का बयान कर रहे हैं, तो परेशानी बढ़ रही है। अगर अरुंधती भी दंतेवाड़ा से लौटकर कहती कि आदिवासियों से निपटने का सबसे अच्छा तरीका उनके घरों में टीवी सेट लगवा देना है, तो कौन कितना खुश होता। अरुंधती के आसपास का लेखक आदिवासी इलाकों में घूमकर दो तरह से अपनी बात कह सकता है। एक तो तरीका ये हो सकता है, जिसमें ये बताया जाए कि सैकड़ों वर्षों से आदिवासियों की बदतर स्थिति के बने रहने के क्या क्या कारण हैं। कारण बताये जाते हैं, तो लेखक को हिंसा का समर्थक बताये जाने का खतरा नहीं होता है। लेकिन कोई लेखक आदिवासियों के हाथों में बंदूक दिखने की पृष्टभूमि जाहिर करता है, तो उसे हिंसा समर्थक मान लिया जाता है। यदि किसी ने झूठ बोला और आपने उसे झूठा कहा तो उसे असंसदीय मान लिया जाता है और जब कहा जाए कि वह सच नहीं बोल रहा है, तो उसे शिष्ट और संसदीय भाषा मान लिया जाता है। क्या लेखक को इसी तरह आदिवासियों के हालात और उनके भीतर नफरत व गुस्से की आग को व्यक्त करने के लिए संसदीय भाषा की खोज करने की बाध्यता होनी चाहिए?

इंदिरा गांधी को भी नक्सलबाड़ी में आदिवासी किसानों के विद्रोह ने ज्यादा चिंतित नहीं किया। उनकी चिंता प्रतिभावान युवाओं की आदिवासी किसानों के साथ साझेदारी थी। सत्ता प्रतिभावानों के लोभी बने रहने में ही अपनी बेहतरी समझती है। दरअसल बुद्धिजीवियों का अपना एक इतिहास है। “द बंगाली प्रेस” में उल्लेख है कि संथालों ने 1855 में विद्रोह कर दिया। व्यापारियों, महाजनों के शोषण, पुलिस और राजस्व अधिकारियों के अत्याचार, जमींदारों द्वारा जमीनें छिनना, आदिवासी महिलाओं के साथ बदसलूकी आदि इसके कारण थे। संथालों को ये एहसास हो गया कि सरकार उनकी शिकायतें सुनने के बजाय उनका दमन और शोषण करने वालों को ही संरक्षण दे रही है तो उन्‍होंने खुद की सरकार बनाने का ऐलान कर दिया। अंग्रेज सरकार ने सेना लगा दी। तब बुद्धिजीवियों ने एक भाषा तैयार की। वह संथालों के खिलाफ सरकारी कार्रवाइयों के पक्ष में थे और आदिवासियों की बुरी स्थिति के लिए चिंता प्रकट कर रहे थे। तब से यह भाषा बूढ़ा बुद्धिजीवी समाज बोल रहा है। इससे इतर देशद्रोही और हिंसा का समर्थक हो जाता है। लोकतंत्र की यात्रा ऐसे ही कानून बनाने की दहलीज पर पहुंच चुकी हैं।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ बुद्धिजीवियों की यह भाषा नयी नहीं ”

  2. By avinash on December 25, 2010 at 5:42 PM

    jis tarah ka stand aaple rahi hai usse akhirkar ghataaadiwasion ka hi hoga.maowadi ke taar lagatar videsh se hone ke praman mile hai agar ye khabar sahi hai tojanta ki sahanbhutjo abhi aadiwasion ko milti hia wo khatam ho jayegi.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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