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कॉरपोरेट नेतृत्व में लोकतंत्र : विकास या विकास का आतंकवाद?

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/11/2010 12:18:00 PM


14 मई 2010 को पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के संघर्षरत साथियों पर धिनकिया ग्राम में गोलीचालन, की घटना हुई। 12 मई 2010 को कलिंग नगर में गोलीचालन, नियमगिरि एवं पोटका, झारखण्ड में दमनकारी कार्रवाई हुई। इसके खिलाफ जननेत्री दयामनी बरला के नेतृत्व में झारखण्ड के विभिन्न सांस्कृतिक व जनसंगठनों आंदोलन शुरू किया है। उड़ीसा सरकार और पोस्को कम्पनी के पुतला दहन से प्रारम्भ हुआ यह कार्यक्रम धीरे-धीरे व्यापक रूप ग्रहण कर रहा है। इसी परिप्रेक्ष्य में यह 24 मई 2010 को रांची में संवाददाता सम्मेलन में निम्नलिखित सामग्री जारी की गई है। इसे तैयार करने में अमित भादुड़ी़ की नई किताब ''द फेस यू वेयर अफ्रेड टू सी'' एवं वैकल्पिक सर्वे ग्रुप इंडियन पोलिटिकल इकॉनमी एसोसिएशन की ''वैकल्पिक आर्थिक वार्षिकी, भारत 2008-2009 से सहायता ली गई। अपने पाठकों के लिए हम इसे प्रस्तुत कर रहे हैं।


1991 ई0 से वित्तीय और उपभोक्तावादी पूँजीवाद को 'उदारवाद' का नाम देकर उसके प्रवेश को अबाधित किया गया। मार्गेट थैचर और निक्सन की सेल्फ रेगुलेटिंग मार्केट इकोनोमी के नाम पर ऐसे ''बाजारू पूँजीवाद'' को 'वैश्वीकरण' के नाम पर स्वीकार किया गया, जो हर तरह के राजकीय नियंत्रण से मुक्त हो।
इसमें आश्वासन यह दिया गया कि जितना ज्यादा 'पूँजी निवेश'  होगा उतना अधिक 'विकास दर' मिलेगा। जितना ज्यादा 'विकास-दर' मिलेगा उतनी ही गति से हमारा देश 'विकास' करेगा। देश की तेज गति के विकास से हमारी गरीबी, बेरोजगारी, बदहाली, कुपोषण, अशिक्षा आदि दूर हो जायेगी। इन वादों-आश्वासनों के साथ इस देश के राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों, चेम्बर ऑफ कॉमर्स, अर्थशास्त्रियों और मीडिया ने सम्मिलित रूप से 'विकास का राग' अलापना शुरू किया।
अर्थशास्त्री अमित भादुडी़ ने इसे एक आक्रामक नव पूँजीवादी 'आर्केस्ट' का नाम दिया है जिसे कॉरपोरेट, राजनीतिज्ञ, नौकरशाह, चेम्बर ऑफ कॉमर्स, लेवर यूनियनें और मीडिया मिल कर बजा रहे हैं, जिसकी धुन पर भारतीय मध्यवर्ग ता-ता थैय्या कर रहा है।
कॉरपोरेट पूंजी 1991 के वाद हमारे यहाँ 'विकास' कर रही है कि या 'विकास का आतंकवाद' फैला रही है उसे हम निम्न तथ्यों और ऑकडों के आईने में देखें :-
इस 'सेल्फ रेगुलेटिंग मार्केट इकॉनोमी' के चरण कमलों में रेड कार्पेट बिछाने के लिए हमारे 'नेशन-स्टेट' ने निम्न उपाय किये:-
  • 1992 के बाद लगातार औद्योगिक नीतियों को कॉरपोरेट हित में कमजोर किया गया।
  • 1992, 1996, 2001 और 2004 के बाद पूंजी निवेश को बढावा देने के लिए भूमि, राजस्व, खनन, श्रम आदि कानूनों को कॉरपोरेट हित के अनुकूल और जन-विरोधी बनाया गया।
  • केन्द्र और राज्य सरकारों ने पूँजी निवेश बढाने के लिए कई तरह कर (टैक्स) रियायतों की घोषणा की, यथा - भूमि के लिए बीमा किश्त भरने से मुक्ति, 100 के0वी0 तक मुफ्त बिजली, पानी टैक्स पर 30 से 40 प्रतिशत तक की छूट, केन्द्रीय शुल्क के भुगतान पर छूट, आयतित कच्चे माल पर शुल्क की छूट, व्यापारिक करों में 50 प्रतिशत तक की छूट।
इस प्रकार पल-पल बिस्तर पर बिछने को तैयार भारतीय लोकतंत्र के हर तंत्र का लाभ उठाकर कॉरपोरेट पूँजी ने भरपूर मुनाफा कमाया। वित्तीय वर्ष 2003-04 और 2006-07 के बीच बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कम्पनियों ने शुद्ध 300(तीन सौ) प्रतिशत का मुनाफा कमाया। यह इस अवधि में पूरी दुनिया के स्टॉक एक्सचेंज के मुनाफों में अधिकतम था।
इसके बदले में यह कारॅपोरेट पूँजी हिन्दुस्तानी गरीब अवाम को निम्न तीनप्रकार से और अधिक बदहाल करने पर तुली है :
  • रोजगार की वृद्धि दर को लगातार धीमा रखा गया ।
  • 1991 के पूर्व के दशक में हमारा सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 4 प्रतिशत रही थी किन्तु रोजगार वृद्धि दर 2 प्रतिशत थी। 1991 के बाद के दशक में जीडीपी वृद्धि दर 7 से 8 प्रतिशत औसत रही है किन्तु रोजगार बृद्धि दर मात्र 1 प्रतिशत रही है ।
  • सार्वजनिक ओर निजी संगठित क्षेत्र (आरगनइज्ड सेक्टर) में 1997 ई में 28.2 मिलियन श्रम शक्ति को रोजगार मिला हुआ था वह 2004 में घट कर  26.2 मिलियन रह गया।
  • निजी पूँजी अपनी इकाईयों में सार्वजनिक क्षेत्रों में घटते रोजगार के अवसर की क्षतिपूर्ति करने को एकदम उत्सुक नहीं है।
  • गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इन दशकों में सबसे ज्यादा पूँजी निवेश हुआ किन्तु रोजगार उपलव्घ कराने की गति सबसे धीमी बनी रही (7 जुलाई 2008, टाईम्स ऑफ इण्डिया)
यही पूंजी निवेश- निजी फैक्ट्री और विकास के गगनभेदी नारे की वास्तविकता है। इसका कारण यह कि कॉरपोरेट पूँजी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार की प्रतिस्पर्धा में अपने को कायम रखने के लिए 'लागत व्यय' में कटौती करती रहती है ।इस लागत व्यय में कटौती का सबसे आसान तरीका है 'मशीनीकरण' की गति को बढावा देना और मजदूरों-कर्मियों की छंटनीकरण या बी0आर0एस0 के बहाने लगातार संखया कम करना।
उदाहरण के लिए, पूना स्थित टाटा मोटर्स ने 1999 से 2004 ई. के बीच अपने श्रमिक कर्मियों की संखया 35,000 से घटा कर 21,000 कर दी किन्तु इसी अवधि में उसका उत्पादन 1,29,000 गाड़ियों से बढ़कर 3,12,000 हो गया।
इसी तरह, जमशेदपुर की टाटा स्टील ने 1999 से 2005 ई. के बीच अपनी श्रमशक्ति को घटा कर 85,000 से 44,000 कर दिया जबकि इसकी उत्पादन क्षमता इसी अवधि में बढ कर 1 से 5 मिलियन टन हो गई।
नतीजन रोजगार की तलाश असंगठित क्षेत्रों (कृषि-रिटेल मार्केट) में की जा रही हेै ।
61वें राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे के अनुसार हमारे 40 करोड श्रमशक्ति का सबसे ज्यादा बोझ कृषि पर है। वहॉ आज भी 11 करोड कृषि मजदूर है जबकि यह बाजारू पूँजीवाद कृषि में निवेश लगातार घटाते जा रही है।
दूसरा रोजगार देनेवाला सबसे बढा असंगठित क्षेत्र रिटेल मार्केट है किन्तु कारपोरेट पूँजी वहॉ भी लूट मचाने आ गई है।

गरीब हिन्दुस्तान को तबाह करने की दूसरी कॉरपोरेट नीति है कल्याणकारी कार्यक्रमों में आवंटन को स्थिर रखना या घटाते जाना :
  • आई0एम0एफ0 और वर्ल्ड बैंक के दवाब में भारत  सरकार 'सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों' (यथा स्वास्थ्य, शिक्षा, जनवितरण ग्रामीण रोजगार योजनाओं) का आवंटन सकल घरेलू उत्पाद का 2.2 प्रतिशत पर स्थिर रखे हुए है। इसका कारण मुद्रा की कमी बताई जाती है जो कि सच नही है।
  • सच यह है कि हमारी औसतन 7-8 प्रतिशत वृद्धि दर और विदेश विनियम रिजर्व फरवरी 2008 तक 283 मिलियन डालर तक भारत के बढते निर्यात के कारण नहीं हुआ बल्कि विदेशी संस्थागत निवेश के कारण हुआ है । इस विदेशी संस्थागत निवेश को वर्ल्ड बैंक और आई0एम0एफ0 से ही प्रोत्साहन-प्रेरणा मिलता है ।
  •  अतएव इस संस्थागत पूंजी निवेश में वर्ल्ड बैंक और आई0एम0एफ0 की केन्द्रीय भूमिका है।
  • यह विदेशी संस्थागत निवेश की पूंजी इतनी चंचल और अस्थिर है कि भारत सरकार इन्हें प्रेरित करनेवाले वर्ल्ड बैंक और आई0एम0एफ को नाराज नहीं कर सकती। नतीजन उनके दवाब  में वह अपनी 'कल्याणकारी राज्य' की भूमिका को संकुचित कर रही है और शिक्षा-स्वास्थ्य आदि में निजी पूँजी के प्रवेश को बढावा दे रही है। जिसका खामियाजा अन्ततः गरीब हिन्दुस्तानी उठा रहा है।
  • तीसरा सबसे विनाशकारीरास्ता कॉरपोरेट पूंजी अपना रही है जबरन भूमि अधिग्रहण का
  • जबरिया भूमि अधिग्रहण, कारपोरेट-नेतृत्व-विकास का सबसे मारक हथियार बना हुआ है। ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता द्वारा निर्मित 1894 ई. का 'भूमि अधिग्रहण अधिनियम' को आजाद भारत के सिपाहसलारों ने 1952, 1963 ओर 1984 में संशोधित कर और कठोर किया। 2006 में इसमें पुनः संशोधन किया गया अैार साथ में  पहली बार पुनर्वास और पुर्नस्थापन नीति भी बनी । किन्तु इस नीति को जमीन में उतारने को राज्य सरकारें इच्छुक नहीं दिखती।
  • दूसरी ओर वही राजसत्ता 'जनहित' में कारॅपोरेट पूंजी के लिए उडीसा, छत्तीसगढ, झारखंड, मध्यप्रदेश, बंगाल में भूमि छीनने को आतुर है। मुआवजे की दर बिना किसानों-जमीन मालिको सें बात किये एकतरफा तय की जाती है। जबरन अधिग्रहण हेतु सशस्त्र पुलिस बल तक उतारा जा रहा है ।
  • कथित कल्याणकारी राज्य, कॉरपोरेट की सेवा में इतना डूब गया है और इस कथित विकास के व्यक्तिगत लाभ में इतना अन्धा हो चुका है कि अपनी ही जनता पर बर्बर अत्याचार करने, दमनकारी नीति अपनाने और गोलियों से भूनने में भी नहीं हिचक रही है। चाहे वह कलिंगनगर हो याकुजंग-बलितुथा, नियमागिरि, पोटका या बस्तर। हर जगह यही कहानी दुहराई जा रही है।
    अभी 14 मई 2010 को बलिटुहा (उड़ीसा) में दक्षिण कोरियायी कम्पनी कोस्को के खिलाफ संधर्षरत पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के कार्यकर्ताओं पर गोली चलाई गई जिसमें नाथ स्वान (उम्र 32 वर्ष) एवं रमेश दास (उम्र 35 वर्ष) बुरी तरह घायल हैं। सशस्त्र पुलिस बल के लाठी चालन एवं अन्य दमनकारी रवैये से लगभग 100 स्त्री-पुरुष और बच्चे घायल हैं। चूंकि सशस्त्र बलों ने संघर्ष स्थल धिनकिया ग्राम को चारों ओर से घेर रखा है अतः इन घायलों को मेडिकल सुविधा भी उपलब्ध नहीं करवाई जा सकी।
    यह गोलीकांड 12 मई 2010 को कलिंग नगर में पुनः दोहराया गया। इसमें एक ग्रामीण शहीद हुआ। कलिंग नगर 02 जनवरी 2006 को अपने 14 आदिवासी ग्रामीणों की शहादत अभी तक भूला नहीं है। नियमागिरी पहाड़ीयों में छुपे तीन ट्रिलियन के बॉक्साइट के लिए वहाँ हजारों वर्ष से निवास कर रहे उन आदिवासियों को खदेड़ कर भगा दिया गया और वह बॉक्साइट स्टारलाइट कम्पनी को सौंप दी गई। ध्यातव्य है कि यह स्टारलाइट कम्पनी वेदान्ता कम्पनी की ही एक सिस्टर कन्सर्न है। वेदान्ता कम्पनी सेहमारे गृह मंत्री श्री पी. चिदम्बरम्‌ का संबंध जगजाहिर है।
    जिस 'विकास' का गलाफाडू 'नारा' कॉरपोरेट, राजनेता, नौकरशाह, चेम्बर्स और मीडिया लगा रहे हैं, उस 'विकास' का खोखलापन भारत सरकार के योजना आयोग की विभिन्न कमिटियों की रिपोर्ट से जगजाहिर हो रहा है :
  • गरीबी रेखा निर्धारण के लिए गठित सुरेश तेन्दुलकर कमिटि ने भी अपना प्रतिवेदन दिया है कि 1992-2000 को जो गरीबी रेखा 26.10 प्रतिशत पर थी वह अब बढ़ कर 37.20  प्रतिशत पर पहुॅच गई है।
  •  एन0सी0 सक्सेना कमिटि ने इसे 40 प्रतिशत से ज्यादा बताया था जिसे भारत सरकार ने स्वीकार नहीं किया।
  • यह आप ही तय करें कि यह कैसा अजूबा विकास है जिसमें सरकारी आकड़ों के अनुसार गरीबी 10 प्रतिशत बढ़ जाती हे और संगठित क्षेत्र में रोजगार दर 2 प्रतिशत से 1 प्रतिशत पर गिर जाता है।
  • सबसे ज्यादा रोजगार देनेवले कृषि क्षेत्र में निवेश दर लगातार घटती जा रही है। महाराष्ट्र और आन्ध्रप्रदेश के सम्पन्न और प्रगतिशील किसानों के लिए वैश्वीकृत बाजार की प्रतिस्पर्धा में, अमेरिकी किसानों को मिल रही कुल लागत व्यय की दो तिहाई अनुदान के कारण टिकना संभव नहीं रह गया और एक दशक मेंलगभग 1 लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली।
  •  सिंचित क्षेत्र में बढ़ोतरी नहीं हो रही। भारत सरकार की आंकड़े ही यह बता रहे हैं की सिंचाई पर निवेश घटता जा रहा है किन्तु दूसरी ओर छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में नदियां कॉरपोरेट घरानों के हाथों बेची जा रही है।
  • शिवनाथ नदी, कैलो, कुरकुट, शाबरी, खडून और मन्द नदियाँ बूट पालिसी यानी 'बिल्ड ओन ऑपरेट एन्ड ट्रासर्फर' नीति के तहत कॉरपोरेट पूंजी को दे दी गयी। इन नदियों के किनारे बसी आवादी इनके पानी से बंचित कर दी गयी।
अब आप ही तय करें कि यह बहुप्रचारित 'विकास' है या 'विकास का आतंकवाद'? यह कॉरपोरेट के नेतृत्व में चल रही भारतीय लोकतांत्रिक नाटक मंडली जिस तरह देश के गरीब आवाम के लिए छुपे और मीठे हत्यारे में तब्दील हो गई है उसके जबाव में प्रतिकार, प्रतिरोध, प्रतिशोध के अलावा और कोई रास्ता बचता है।
लिहाजा, हम आज इस देश में चल रहे विकास के आतंकवाद के खिलाफ अपनी आवाज बुलन्द करते हैं। पॉस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित करते हैं और ऐसे संघर्षों में अपने रक्त के आखिरी कतरे तक साथ देने की कसमें खाते हैं।

इप्टा, प्रलेस, जलेस, जसम, आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच, झाजपा और इंडिजिनस पीपुल्स फोरम की ओर से 24 मई 2010 को रांची में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में जारी।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ कॉरपोरेट नेतृत्व में लोकतंत्र : विकास या विकास का आतंकवाद? ”

  2. By Jandunia on June 11, 2010 at 1:03 PM

    सुंदर पोस्ट

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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