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बीच सफ़हे की लड़ाई

बरबादी की वही पुरानी दास्तान: नहर का पानी खा गया खेती

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/08/2010 12:46:00 PM

रायबरेली से लौट कर रेयाज उल हक

अपनी फूस की झोंपड़ी में गरमी से परेशान छोटेलाल बात की शुरुआत आसान हो गई खेती के जिक्र से करते हैं. वे कहते हैं, ‘पानी की अब कोई कमी नहीं रही. नहर से पानी मिल जाता है तो धान के लिए पानी की दिक्कत नहीं रहती.’
पास बैठे रामसरूप यादव मानो एक जरूरी बात जोड़ते हैं, ‘अब बाढ़ का खतरा कम हो गया है.’
राजरानी इलाके में खर-पतवार के खत्म होने का श्रेय नहर को देती हैं.
लेकिन छोटेलाल ने बात अभी खत्म नहीं की है. उनका सुर भी अब थोड़ा बदल रहा है, ‘गेहूं की फसल लेकिन अब खराब हो गई है. राशन से गेहूं न मिले तो गेहूं के दर्शन नहीं होते. जिनके पास कार्ड नहीं हैं उनकी दशा और खराब है.’
धीरे-धीरे उनकी आवाज में नाराजगी बढ़ रही है, ‘पहले अच्छी फसल होती थी. नहर ने खेती बरबाद कर दी. सीलन से नहर के पासवाली जमीनें खराब हो गई हैं. पहले धान, गेहूं, अरहर, साग-सब्जी हो जाती थी, अब जैसे-तैसे धान ही हो पाता है. गेहूं तो होता ही नहीं.’
आखिर में छोटेलाल सबसे मतलब की बात पर आते हैं, ‘जब से शारदा आई है मेरी 15-16 बिस्वा जमीन बेकार पड़ी है. याद ही नहीं उसमें कब फसल बोई गई थी.’
वे शारदा सहायक नहर की बात कर रहे हैं, जो रायबरेली जिले में अमावां प्रखंड के उनके गांव खुदायगंज के दक्षिण से होकर गुजरती है.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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